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  • समृद्धि में सहायक हैं संग्रहालय बोले मनोज श्रीवास्तव

    समृद्धि में सहायक हैं संग्रहालय बोले मनोज श्रीवास्तव

    भोपाल,20 मई,(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर) मानव मन अपने गौरव के बिंदुओं का स्मरण करके खुद को मजबूत बनाता है। यही वजह है कि हमारी प्रेरणा के भावों से जुड़े संग्रहालय अर्थव्यवस्था को बूस्ट देने वाले इंजन बन जाते हैं। उज्जैन में महाकाल लोक,काशी में बाबा विश्वनाथ परिसर, गुजरात में सरदार वल्लभ भाई पटेल की विशाल प्रतिमा( स्टेच्यू आफ यूनिटी) आज सरकार के लिए रिकार्डतोड़ कमाई का साधन बन रहे हैं। भारत के संविधान ने संसद में पारित विषयों पर बने संग्रहालयों को आयकर में छूट दी है।इस नामुराद शर्त को हटाना होगा तभी देश की विरासत को संजोया जा सकता है। राजधानी में कवि दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय में आयोजित कमलेश्वर व्याख्यान माला के अंतर्गत- संग्रहालय, समाज और मीडिया- विषय पर आयोजित व्याख्यान में पूर्व संस्कृति सचिव मनोज श्रीवास्तव ने ये विचार व्यक्त किए । संस्कृति विभाग के सहयोग से आयोजित इस आयोजन की अध्यक्षता  प्रसिद्ध संस्कृति कर्मी वसंत निर्गुणे ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में पुरातत्व वेत्ता डॉ.मनोज कुमार  कुर्मी ने भी अपने विचार व्यक्त किए। संग्रहालय के अध्यक्ष श्री वामनकर ने विषय का प्रवर्तन किया और संचालन श्री घनश्याम मैथिल अमृत ने किया। संग्रहालय की सचिव सुश्री करुणा राजुरकर ने सभी आगंतुकों और सहयोगियों के प्रति अपना आभार प्रदर्शित किया।

    मुख्य अतिथि के रूप में अपने संबोधन में श्री मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि भोपाल ऐसा महानगर है  जहां 21 से ज्यादा संग्रहालय मौजूद हैं। ये दर्शाता है कि भोपाल की सांस्कृतिक विरासत कितनी समृद्ध है। आमतौर पर हमारे सामाजिक परिवेश में अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोने का भाव देखने नहीं मिलता है। इसके बावजूद किसी एक साहित्यकार की स्मृतियां संजोने के लिए एक व्यक्ति ने दीवानगी की हद तक काम किया हो ऐसा देखने नहीं मिलता है। स्वर्गीय राजुरकर राज मेरे सहपाठी रहे हैं और उन्होंने कवि दुष्यंत कुमार के संग्रहालय को समाज में विशिष्ट पहचान दिलाई है। ये  काम हमारे विश्वविद्यालय ,कालेज या कई अन्य संस्थान भी कर सकते हैं। वे यदि किसी एक व्यक्तिव के कृतित्व को संग्रहालय के रूप में संरक्षित करना शुरु कर दें तो हम अपनी विरासत से जुडा समाज बना सकते हैं।

    विश्व के कई विश्वविदयालय और संस्थानों की ओर से चलाए जा रहे संग्रहालय पूरी दुनिया के ऊर्जावान लोगों की प्रेरणा के स्रोत बने हुए हैं। मिसिसिपी विश्वविद्यालय ने नोबेल और पुलित्जर पुरस्कार विजेता लेखक विलियम फॉकनर, का संग्रहालय बनाया है। राष्ट्रकवि रवीन्द्र नाथ टैगोर की स्मृति में बना म्यूजियम पूरे भारत तो क्या विश्व के लोगों के आकर्षण का केन्द्र है। ग्लास्गो विश्वविद्यालय का मार्गन संग्रहालय अपनी विविधताओं के साथ दुनिया में अनूठा है।

    उन्होंने कहा कि हमारे देश में साहित्यिक संग्रहालय न तो किसी धनपति ने बनाए न किसी संस्थान ने और सरकार ने तो कभी इस ओर गंभीरता से विचार भी नहीं किया। जो काम संस्थानों या सरकार को करना था वो अकेले राजुरकर ने कर दिखाया। जिसके पास संसाधन नहीं थे केवल समर्पण था। संग्रहालयों को लेकर हमारे स्कूल कालेजों में कोई पाठ्यक्रम भी नहीं पढ़ाया जाता है। प्रदेश में गिने चुने स्कूल कालेज हैं जो अपने विद्यार्थियों के लिए संग्रहालयों के आऊटरीच कार्यक्रम करवाते हैं। कई देशों में ये पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं। जहां बच्चों को अपनी विरासत का संग्रह करना सिखाया जाता है। संग्रहालय में अनुसंधान होते हैं। डाक्यूमेंटेशन सिखाया जाता है। हमारे यहां तो संग्रहालय के शैक्षणिक नजरिए को भी नजरंदाज किया गया है।ऐसे में दुष्यंत संग्रहालय एक जीवंत प्रयोगशाला बन गया है।

    उन्होंने कहा कि श्री राजुरकर की बेटी विशाखा ने मुझसे पूछा कि भारत में कितने संग्रहालय सफलता पूर्वक चलाए जा रहे हैं। मैंने उसे बताया कि एक फैजावाद में सरोजिनी नायडू का है। इसी तरह कोट्टायम में रमन पिल्लई के कार्यों को संग्रहित किया गया है। हमारे यहां साहित्यकारों की स्थिति न तो जीवनकाल में अच्छी है न मरने के बाद उनके काम को सराहा जाता है। गीतकार साहिल लुधियानवी ने तो सार्वजनिक तौर पर कई बार इस पर दुख व्यक्त किया था।

    ऐसा समाज जहां कोई संग्रहालय नहीं बनाता वहां दुष्यंत संग्रहालय अपने आप में अनूठा है। क्या होशंगाबाद में भवानी प्रसाद मिश्र या बाबई में माखनलाल चतुर्वेदी,उज्जैन में श्रोत्रिय जी का संग्रहालय नहीं बनाया जाना चाहिए। नरेश मेहता से गजानंद माधव मुक्तिबोध जैसे साहित्यकार हमारे यहां हुए हैं उनके भी संग्रहालय नहीं है। राजुरकर राज का काम उल्लेखनीय तो है पर अभी वैसा नहीं है जैसा होना चाहिेए। ये साहित्यकारों का मंच तो बन गया है लेकिन अभी संग्रहालय नहीं बन पाया है। यहां दुष्यंत जी के जीवन वृत्त से संबंधित सारी चीजें होनी चाहिए। उनकी व्यक्तिगत उपयोग की वस्तुएं भी रखी जानी चाहिए। दुष्यंत जी की पुस्तकों और पांडुलिपियों का सेट बल्कि उन पर लिखी पुस्तकें और शोध भी रखे जाने चाहिए। उनकी रचना प्रक्रिया की कुछ व्यावहारिकताएं और वास्तविकताएं थीं उनका सूचनात्मक प्रस्तुतिकरण होना चाहिए। यह दूसरा भाग राजुरकर जी की बेटी विशाखा को पूरा करना है।

    उन्होंने कहा कि हमारे यहां संग्रहालय की संस्कृति नहीं है। आईसलेंड में तो नाव का संग्रहालय बना हुआ है। जिस नाव से दक्षिण अमेरिका से चलकर लोग आईसलेंड पहुंचे थे। उस नाव को संरक्षित किया गया है। वहां लोग जाते हैं और वहां की संस्कृति को आत्मसात करते हैं।

    कई शहरों में सिटी म्युजियम की परंपरा है । हर नगर का एक इतिहास है। रमेश शर्मा जी किताब लिख रहे हैं जो भारत के वैदिक इतिहास को बताएगी। उन सब चीजों को लेकर हमारी क्या तैयारी है। किस काल में जनजीवन कैसा था। किचिन कैसे थे घर कैसे थे। ये भी दर्शाया जाता है। विश्व के विकसित समाज अपनी उपलब्धियों का ही म्यूजियम नहीं बनाते वे अपनी लज्जा का भी म्यूजियम बनाते हैं। लिवरपूल में दास प्रथा का म्यूजियम बना है। जिसमें दासों के व्यापार को दर्शाया गया है। शेख्सपीयर का म्यूजियम सरकार की ओर से नहीं चलाया जाता। उसे मिला दान आयकर में छूट दिलाता है। यदि आप दान देंगे तो कर में छूट मिलेगी। मास्को में पुश्किन का म्यूजियम है उसे भी एक संस्थान चलाता है ।पुश्किन सरकार के समर्थक साहित्यकार माने जाते हैं लेकिन उनका संग्रहालय सरकार नहीं चलाती।  ये संग्रहालय कई पार्टनर, और सदस्य मिलकर चलाते हैं। मध्यप्रदेश में कालिदास संग्रहालय है। भोपाल के कुछ संग्रहालयों में स्टेट म्यूजियम, आदिवासी संग्रहालय, ओरछा में राम राजा म्यूजियम इस तरह के अच्छे प्रयास हैं। हमने वाणिज्यकर विभाग में रहते हुए डाक टिकिट का म्यूजियम बनाया था। हमें अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सहेजकर रखना आना चाहिए।

    हमारे देश में भारतीय पुरातत्व संग्रहालय विभाग ने लगभग 3800 स्थानों को संरक्षित किया है। जबकि ब्रिटेन छोटा सा देश है वहां बीस  हजार राष्ट्रीय संग्रहालय हैं। फ्रांस में चवालीस हजार संग्रहालय हैं। हमारे संविधान में संग्रहालय बनाने के लिए जो प्रावधान किए गए हैं उनमें इसे बनाना राज्य का कर्तव्य बताया गया है। लेकिन केवल उन्हीं संग्रहालयों को अनुमति दी जाती है जो संसद की निगाह में राष्ट्रीय महत्व के होते हैं हमारे देश के संविधान को ऐतिहासिक कहा जाता है पर उसमें राष्ट्रीय महत्व की शर्त रख दी गई है। जबकि दुनिया भर के सारे देशों में इनकी अनुमति देना राज्य का कर्तव्य होता है।इसमें संसद की घोषणा की क्या आवश्यकता है। कभी किसी ने ये कानून लिखा होगा पर हमने उस संस्कृति की बाधा को दूर नहीं किया।जब इस विषय पर चिंतन होगा तभी हमारे समाज में और मीडिया में कोई चेतना आएगी। मीडिया ही बहुत सारी चीजों को चलाता है। यदि मीडिया में डिबेट शुरु नहीं होगी तो हमारी संवेदना इन बातों को प्रस्तुत नहीं कर पाएगी।  

  • मंदिर में दान आया तो खर्च करने जुट गए समाजसेवी

    मंदिर में दान आया तो खर्च करने जुट गए समाजसेवी

              जिसके कारण आज आपका अस्तित्व है उसके प्रति कृतज्ञता का भाव रखना जैन धर्म की मूल पहचान है।उदार हृदय होकर ईश्वर की आराधना करने वाले जैनियों की इसी साख की वजह से उन्हें समाज का खजांची माना जाता  है। सामाजिक संस्कार के इस भाव की पूजा मंदिर में श्री जी के अभिषेक से पुष्पित पल्लवित होती है। राजधानी के जैन धर्मावलंबी भी इस भाव से अछूते नहीं हैं और इसी वजह से राजधानी के जैनियों को प्रदेश की जैन समाज का शीर्ष  (अपेक्स ) प्रतिनिधि माना जाता रहा है। इसके बावजूद यहां कई बार जैनियों के बीच अप्रिय घटनाएं भी सामने आती रहती हैं जिसका कारण अज्ञानता, संकीर्णता और अहंकार का भाव होता है। कस्तूरबा नगर के धर्मावलंबियों के बीच कुप्रबंधन से जुड़ी कुछ इसी तरह की बैचेनी इन दिनों देखी जा रही है। कस्तूरबानगर, रचनानगर ,गौतम नगर, भारती निकेतन,  शांतिनिकेतन जैसी कालोनियों में रहने वाले जैन धर्मावलंबियों के पुण्य की आराधना के बीच पनपा कटुता का भाव इन दिनों सु स्वादु भोजन के बीच आए कंकड़ की तरह खटक रहा है।

            ये कहानी न केवल कस्तूरबानगर बल्कि देश भर की जैन संस्थाओं में देखी सुनी जा रही है। इसकी वजह समासेवा के नाम पर जुटने वाले अहंकारियों का कुप्रबंधन,मनमानी और अराजकता है।  राजधानी के कस्तूरबानगर और रचनानगर के लोगों ने वर्ष 2002-03 में एक सार्वजनिक वाचनालय और भगवान सुपार्श्वनाथ के संदेशों का प्रसार करने के लिए मंदिर का निर्माण किया था। मंदिर के संधारण और निर्माण का कार्य श्री महावीर कुंदकुंद दिगंबर जैन वाचनालय एवं पुस्तकालय समिति जिसका रजिस्ट्रेशन 10249/2002 है इसके अधीनस्थ श्री 1008 सुपार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर समिति कस्तूरबा नगर(उपसमिति) करती रही । मंदिर की स्थापना करने वाले समाजसेवियों की बनाई इस उप समिति का कार्यकाल 30 अप्रैल 2023 को समाप्त हो गया। उसके चुनाव की नई तिथि अभी तक घोषित नहीं हुई है। इसकी घोषणा मंदिरजी की स्थापना करने वाली श्री महावीर कुंद कुंद दिगंबर जैन वाचनालय एवं पुस्तकालय समिति को करना है। इस उपसमिति के अध्यक्ष का पद काल दो वर्ष रखा गया है। जाहिर है कि दो साल बाद उप समिति का अध्यक्ष बदला जाता है। वाचनालय के लिए बनी मूल समिति ने लगभग इक्कीस सालों के अथक प्रयासों और जन सहयोग से सुंदर सार्वजनिक स्थल का निर्माण किया है। यही नहीं दानराशि का एक बड़ा फंड सामाजिक गतिविधियों के लिए भी एकत्रित किया है। फंड के दुरुपयोग की भी कोई शिकायत कभी सामने नहीं आई। ये काम मंदिर समिति से जुड़े तमाम जैन धर्मावलंबी बडी पारदर्शिता और लगन से करते रहे हैं। सभी का एकमेव लक्ष्य है कि वे रोज सुबह भगवान के दर्शन कर सकें और सामाजिक मानदंडों की उत्कृष्टता का संकल्प ले सकें।

           ये सब गतिविधियां शुरुआती अवरोध के बाद से निर्बाध चल रहीं हैं और समाज के कई लोग इस अभियान से जुड़ते चले जा रहे हैं। इसमें न केवल जैन समाज बल्कि कई अन्य स्थानीय नागरिकों ने भी बढ़ चढ़कर अपनी हिस्सेदारी निभाई है। अदालतों के विभिन्न फैसलों की वजह से सरकार ने मंदिर स्थलों के निर्माण और नियमन को लंबे समय से रोक रखा है। यही वजह है कि कस्तूरबानगर जैन मंदिर को जमीन आबंटन की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी, मंदिर से जुड़े लोगों के सब्र का बांध अब टूटने लगा है। मंदिर की जिस उपसमिति का कार्यकाल हाल ही में 30 अप्रैल को समाप्त हुआ है, उसके अध्यक्ष रहे सुनील जैन(जैनाविन) ने मंदिर के नवनिर्माण पर पच्चीस लाख रुपए खर्च कर दिए। इस मनमानी पर श्री महावीर कुंदकुंद दिगंबर जैन वाचनालय एवं पुस्तकालय समिति के कई सदस्यों ने आपत्ति उठाई । उनका कहना था कि वाचनालय या मंदिर की जमीन आबंटन की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है इसलिए इस तरह की फिजूलखर्ची की अनुमति नहीं दी जा सकती। समिति के सदस्यों ने लोगों से प्राप्त धनराशि को पाई पाई करके जोड़ा है इसे बर्बाद नहीं किया जा सकता ।जिस तरह राम जन्मभूमि मंदिर का जमीन विवाद सुलझने के बाद ही मंदिर निर्माण शुरु किया गया उसी तरह यहां सरकार की मंजूरी का इंतजार किया जाना चाहिेए। इस पर व्यवस्था संभाल रहे कुछ लोगों और अध्यक्ष सुनील जैन ने आरोप लगाने शुरु कर दिये कि मूल समिति की जिद से मंदिर का नवनिर्माण नहीं हो पा रहा है। उन्होंने स्थानीय लोगों और समिति के सदस्यों को बरगलाया कि मंदिर के निर्माण में स्वर्गीय पंडित कस्तूरचंद जी का परिवार आड़े आ रहा है, इसलिए मंदिर का प्रबंधन उनके हाथ से छीन लिया जाए।ये भी कहा गया कि मूल समिति की स्थापना मुमुक्षु पंथ के लोगों ने की थी इसलिए मुनिभक्तों को उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए। जबकि स्थापना से लेकर अभी तक इस तरह का कोई विवाद नहीं था।

    मध्यप्रदेश फार्मेसी काऊंसिल के अध्यक्ष और समिति के वर्तमान अध्यक्ष संजय जैन का कहना था कि श्री महावीर कुंदकुंद दिगंबर जैन वाचनालय एवं पुस्तकालय समिति ने इस सार्वजनिक स्थल के निर्माण के लिए सरकार के विभिन्न मंचों पर सहमति बना ली है जिस दिन सरकार मंदिरों के बारे में कोई फैसला करेगी यहां का भी गतिरोध टूट जाएगा और वाचनालय के साथ मंदिर भी भव्य बन जाएगा। बताया जाता है कि कार्यकाल समाप्त होने की तिथि सामने देख सुनील जैन ने एक पुरानी बंद पड़ी मिलते जुलते नाम वाली समिति की खाना पूर्ति करवाई और उसे असली समिति बताने लगे। इस समिति का नाम  श्री 1008 सुपार्शनाथ दिगंबर जैन समिति है जिसका रजिस्ट्रेशन क्रमांक 1402/1992है।इस समिति का कार्यालय चेतक ब्रिज की रचनानगर साईड है। ये समिति बी-83 के पते पर किसी अन्य व्यक्ति ने पंजीकृत करवाई थी और इस समिति का कस्तूरबा नगर जैन मंदिर से कोई भी लेना देना नहीं है।इसके रजिस्ट्रेशन के वक्त मंदिर का कोई अस्तित्व नहीं था।

           मंदिर निर्माण की ललक रखने वाले भोले भाले श्रद्धालुओं की आंखों में धूल झोंककर जो समिति आनन फानन में तैयार की गई उसकी नकल की पोल पहली बैठक में ही खुल गई। आरटीआई से प्राप्त जानकारी में साफ दिख रहा है कि किस तरह एक ही व्यक्ति ने फर्जी दस्तखत करके समिति को अद्यतन किया है । इसकी आपराधिक जांच भी चल रही है। संजय जैन ने बैंक मैनेजर को जब सारी जानकारी दी तो उन्होंने खाता सीज कर दिया। समस्या ये थी कि ये बैंक खाता अस्थायी उपसमिति के नाम से खोला गया था और उसकी केवाईसी में श्री महावीर कुंदकुंद दिगंबर जैन वाचनालय एवं पुस्तकालय समिति का पैन नंबर दर्ज किया गया था। समिति के सभी सदस्य समिति और उपसमिति दोनों के भी सदस्य थे इसलिए पहले किसी को कोई आपत्ति नहीं थी। बताते हैं कि रोक लगवाए जाने के बाद सुनील जैनाविन ने बैंक मैनेजर को धमकाया और कहा कि वे खाते का संव्यवहार जारी ऱखें क्योंकि खाते में रखा लगभग सवा करोड़ रुपया सदस्यों के प्रयासों से  ही एकत्रित हुआ है। मूल समिति के दस्तावेजों में हेरफेर करके एक फर्जी समिति खड़ी करके फंड पर कब्जा जमाने की ये कोशिश धोखाघड़ी के दायरे में आती है इसलिए संजय जैन ने इसकी शिकायत एसडीएम एमपीनगर श्री सतीश गुप्ता को भी की।  पुलिस कमिश्नर प्रणाली चालू होने के बाद राजस्व संबंधी धोखाघड़ी पर भी राजधानी पुलिस गभीरता से निगरानी कर रही है। जाहिर है गोविंदपुरा पुलिस की जांच में चोर दरवाजे से फंड पर कब्जा और फिजूलखर्ची करने की असली कहानी लोगों के सामने आ जाएगी।

           कस्तूरबानगर जैन मंदिर से जुड़े आम नागरिकों का कहना है कि सुनील जैन अपना रौब जमाने के लिए खुद को महापौर का खासमखास बताते हैं। जबकि वे नगर निगम के एक ब्लैकलिस्टेड ठेकेदार हैं जिन्हें घटिया बिजली का माल सप्लाई के कारण प्रतिबंधित किया गया था। बताते हैं कि वे मंदिर समिति के फंड से निर्माण का काम महापौर से जुड़े ठेकेदारों को दिलवाते रहे हैं। उनकी इस शैली का लाभ मंत्री और स्थानीय विधायक विश्वास सारंग के कई करीबी भी उठाते रहे हैं। पीड़ितों का कहना है कि सुनील खुद को एक बड़े समाचार पत्र समूह के मालिकों का फंड मैनेजर बताकर प्रभाव जमाते हैं। मंदिर समिति से जुड़े लोग ये सब जानते हैं लेकिन वे खुलकर विरोध नहीं कर पा रहे हैं। मंदिर के फंड पर कब्जा जमाने के लिए सुनील ने समानांतर बनाई गई समिति का चुनाव करवाने की तैयारी कर डाली जबकि मूल मंदिर समिति से इसकी कोई अनुमति नहीं ली गई। श्री महावीर कुंदकुंद दिगंबर जैन वाचनालय एवं पुस्तकालय समिति ने बाकायदा नोटिस चिपकाकर इस पर आपत्ति जताई और पुलिस से अनुरोध किया कि इस गैरकानूनी घुसपैठ को रोका जाए क्योंकि इससे शांति भंग होने की संभावना है। पुलिस ने आनन फानन में कार्रवाई की है। संजय जैन ने राजधानी में जैन समाज की प्रतिनिधि संस्था श्री चौक जैन मंदिर कमेटी ट्रस्ट से भी हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया है। इस पर चौक कमेटी के अध्यक्ष मनोज जैन बांगा ने कहा कि दोनों पक्ष आपस में मिलजुलकर विवाद को सुलझा लें यदि समाज के लोग अनुरोध करेंगे तो चौक ट्रस्ट भी इसमें हस्तक्षेप करेगा। मामला अब पुलिस और अदालत की चौखट तक पहुंच गया है। जाहिर है इस विवाद ने न केवल जैन समाज बल्कि सभी धार्मिक संस्थाओं में पनप रही लूटपाट और अराजकता की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित कराया है।

            धार्मिक संस्थाओं में विधि का पालन न किए जाने से दान दाताओं की भी अनदेखी हो रही है। परमार्थिक दान को आयकर अधिनियम में कई प्रकार की छूट प्रदान की गई है। इसके बावजूद मंदिर के फंड में दान करने वाले नागरिकों को छूट का लाभ नहीं मिल पा रहा है। टैक्स की चोरी और अनियमित लेखों को देखकर चार्टर्ड एकाऊंटेंट श्री नागेन्द्र पवैया ने आपत्ति दर्ज कराई थी और अंकेक्षण का कार्य करने इंकार कर दिया था। उनका कहना था कि मंदिर की प्रभारी समिति के सदस्य नकद आठ लाख रुपए तक अपने पास रखते हैं जो नियमानुसार नहीं है। मंदिर समिति को हाथखर्च के लिए पच्चीस हजार रुपए तक रखने की छूट होती है क्योंकि दान राशि की सीमा बीस हजार रुपए तक निर्धारित है। जैसे ही दान प्राप्त हो उसे समिति के बैंक खाते में जमा कराया जाना चाहिए। मंदिर के खर्चों के बिल और वाऊचर भी आडिट में सामने रखे जाने चाहिए। इस तरह की वित्तीय अनियमिताओं की ओर जब समिति का ध्यान आकर्षित किया गया तो सुनील जैनाविन और उनके कुछ सहयोगी कहने लगे कि हमने कोई घोटाला थोड़ी कर लिया है। जब उनसे कहा गया कि दान का पैसा खाते में जमा क्यों नहीं किया गया था तो उनका कहना था कि वे भूल गए थे। एक सदस्य ने तो अहसान जताते हुए ये भी कहा कि उन्होंने अपनी व्यक्तिगत एफडी तुड़वाकर समिति के खाते में धनराशि जमा कराई है जबकि ऐसा करने की नौबत क्यों आई इस पर समिति के सदस्य खामोश हैं। जाहिर है कि ये खामोशी जैन समाज के भीतर खदबदाते आक्रोश की आहट भी दे रही है। ऩई पीढ़ी के धर्मानुरागी जिस तरह दान देने में उदार हैं उसी तरह वे किसी अनियमितता के भाव को तिरस्कार की नजर से देखते हैं। समय आ गया है कि जब समाज के जिम्मेदार लोगों को गड़बड़ियां सुधारने के लिए आगे आना होगा।उत्तर प्रदेश में तो योगी जी की सरकार जन धन के अतिक्रमणकारियों का मुफीद इलाज कर रही है लेकिन मध्यप्रदेश की नौकरशाही में अभी सुशासन का जज्बा भरने की सख्त जरूरत है।

  • गद्दार दोस्त मोहम्मद के जाल से मुक्त हुआ जगदीशपुर

    गद्दार दोस्त मोहम्मद के जाल से मुक्त हुआ जगदीशपुर

    भोपाल,14 फरवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि 308 वर्ष बाद जगदीशपुर को खोई हुई पहचान मिल रही है। इस्लामनगर अब जगदीशपुर के नाम से जाना जाएगा। मुख्यमंत्री श्री चौहान जगदीशपुर के चमन महल में गौरव दिवस कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने 26 करोड़ 71 लाख 86 हजार रूपए के कार्यों का लोकार्पण और शिलान्यास किया। उन्होंने जगदीशपुर नामकरण शिला का अनावरण भी किया।

    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि ऐतिहासिक दृष्टि से जगदीशपुर देवड़ा राजपूतों का गढ़ था। दोस्त मोहम्मद खान ने जगदीशपुर पर अधिकार कर इसका नाम इस्लामनगर रख दिया। पर्यटन स्थल जगदीशपुर में गोंड महल, रानी महल एवं चमन महल प्रमुख हैं। सांसद सुश्री साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, विधायक श्री विष्णु खत्री, अध्यक्ष एमपी स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कार्पोरेशन श्री शैतान सिंह पाल और श्री केदार सिंह मण्डलोई उपस्थित थे।

    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि आज हम सबका मन आनंद और प्रसन्नता से भरा हुआ है। अफगानी ने 308 साल पहले अन्याय और बर्बरता की थी। उसने धोखा दिया था। जगदीशपुर राजपूतों ने बसाया था। यहाँ के शासक नरसिंह देवड़ा थे। जगदीशपुर का किला अपनी वास्तु-कला के लिए जाना जाता है। दोस्त मोहम्मद खान ने राजा नरसिंह देवड़ा को निमंत्रण दिया था और भोजन करते समय हत्या कर दी गई। रानियों ने जल जौहर कर लिया था। आजादी के 75 साल बाद आज हम फिर से जगदीशपुर नाम कर पाए हैं।

    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि असंभव को संभव करने का कार्य प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और वर्तमान सरकार कर रही है। पुराने और गौरवशाली नामों को पुर्नस्थापित किया जाना चाहिए। इतिहास की घटनाओं को ध्यान में रखकर नाम बदलने का क्रम चल रहा है। हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर रानी कमलापति किया गया है। ऐसे कई नामों को बदला जाएगा। जगदीशपुर का वैभव पुन: स्थापित किया जाएगा। उन्होंने प्रशासन को निर्देश दिए कि गाँवों का मास्टर प्लान बनाया जाए। जगदीशपुर ऐसा गाँव बने कि लोग देखते रह जाये। उन्होंने कहा कि यहाँ राजाओं का स्मारक बनाया जाएगा।

    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि विकास यात्रा से विकास की नई गंगा बह रही है। उन्होंने कहा कि बेटी को वरदान बनाने के लिए लाड़ली लक्ष्मी योजना बनाई गई। अब तक प्रदेश में 44 लाख लाड़ली लक्ष्मी हो चुकी हैं। इसी तरह मेधावी विद्यार्थी योजना बनाई गई। अब बहनों को सशक्त बनाने के लिए लाड़ली बहना योजना बनाई गई है। इस योजना में गरीब बहनों के खातों में एक-एक हजार रूपए की राशि हर माह दी जाएगी। उन्होंने कहा कि किसानों को प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की ओर से सम्मान निधि दी जा रही है।

    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि एक के बाद एक योजना बन रही है। जनता की जिंदगी बदलने की कोशिश है। वृद्धावस्था पेंशन राशि 600 से बढ़ा कर 1000 रूपये कर दी जाएगी। आगामी 5 मार्च से मुख्यमंत्री बहना योजना के गाँव-गाँव में शिविर लगा कर कार्य कराए जाएंगे। जून माह से पैसा आना शुरू हो जाएगा। जनता की जिंदगी बदलने का अभियान है। उन्होंने कहा कि हम परिवार की भाँति ध्यान रखने की कोशिश कर रहे हैं। सबका मंगल और कल्याण हो। सब सुखी हों। मुख्यमंत्री ने विकास कार्यों में जनता का सहयोग भी मांगा।

    सांसद सुश्री प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने कहा कि जगदीशपुर का जन-जन चाहता था कि इस्लामनगर का नाम पुन: जगदीशपुर हो जाए। उन्होंने कहा कि जब हम परतंत्र थे तब इसका नाम इस्लामनगर था। जगदीशपुर का अपना एक इतिहास है। इसी को ध्यान में रख कर पुन: जगदीशपुर नामकरण किया गया है। जगदीशपुर अपने पुराने वैभव में लौटा है। केन्द्र और प्रदेश सरकार द्वारा विकास के लिए निरंतर कार्य किए जा रहे हैं। सांसद सुश्री ठाकुर ने गाँव में भगवान जगदीश का भव्य मंदिर निर्माण कराने का सुझाव रखा।

    बैरसिया विधायक श्री विष्णु खत्री ने स्वागत उद्बोधन देते हुए कहा कि आज जगदीशपुर में गौरव दिवस मनाने का अवसर मिला है। यह ऐतिहासिक क्षण है। उन्होंने कहा कि 308 वर्ष बाद यह क्षण देखने को मिला है। जब इस्लामनगर का नाम बदल कर पुन: जगदीशपुर कर दिया गया है। मुख्यमंत्री श्री चौहान की सक्रियता से यह संभव हो पाया है। उन्होंने कहा कि जगदीशपुर को आदर्श पंचायत बनाने के लिए विकास कार्यों की कोई कमी नहीं छोड़ी जाएगी। सामाजिक सरोकार और जन-भागीदारी से कार्यों को आगे बढ़ाया जाएगा। श्री खत्री ने बाणगंगा के किनारे बलिदानी राजाओं का स्मारक बनाने की मांग रखी।

    प्रारंभ में मुख्यमंत्री श्री चौहान ने मंच पर पहुँच कर साधु-संतों का शाल-श्रीफल से स्वागत और कन्या-पूजन किया। उन्होंने दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम की शुरुआत की। वंदे-मातरम का गायन हुआ। ग्रामीणों ने साफा पहना कर अतिथियों का स्वागत किया। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने लाम्बाखेड़ा से जगदीशपुर मार्ग, भदभदा से निपानिया जाट मार्ग मजबूतीकरण, लाम्बाखेड़ा से निपालिया बाजखां मार्ग और ईंटखेड़ी से अचारपुरा मार्ग के चौड़ीकरण, 33:11 केव्ही विद्युत उपकेन्द्र परेवाखेड़ा, ईंटखेड़ी एमआरएफ सेंटर, स्वच्छता परिसर ग्राम पंचायत अचारपुरा, गोलखेड़ी, जगदीशपुर, ईंटखेड़ी सड़क सहित अनेक विकास कार्यों का लोकार्पण और शिलान्यास किया। कार्यक्रम में जन-प्रतिनिधि और बड़ी संख्या में ग्रामीणजन मौजूद रहे।

  • फेब्रिकेटेड शादियों से बढ़ रहे जैन समाज में तलाक के मामले

    फेब्रिकेटेड शादियों से बढ़ रहे जैन समाज में तलाक के मामले

    भोपाल,19 दिसंबर (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। दिगंबर जैन समाज में झूठी शान और दिखावे की वजह से कराई गई शादियां तलाक की वजह बन रहीं हैं। भोपाल में चल रहे जैन समाज के परिचय सम्मेलन में ये बात प्रमुखता से नजर आ रही है। अधिक प्रविष्टियां दिखाने के प्रलोभन में आयोजन के संचालकों ने जिन लोगों के आवेदन बुलाए हैं उनमें लोफर और बदनाम लड़के लड़कियों की भीड़ इकट्ठा हो रही है। ये अपने बारे में बढ़ा चढ़ाकर जो बातें बोलते  हैं उससे प्रभावित होकर शादियां तो हो जाती हैं लेकिन कुछ ही दिनों बाद मनमुटाव के चलते ये शादियां टूट जाती हैं।पत्रिका के तलाकशुदा युवाओं वाले सेक्शन में बढ़ती संख्या को देखकर पहली ही नजर में इस मामले की गंभीरता को समझा जा सकता है।ऐसे कई मामलों में लड़कियां घर के जेवर लेकर भाग गईं और अदालतों में मंहगे हर्जाने की मांग करते हुए मुकदमे दर्ज कराए हैं।

    अदालत के मीडिएशन सेंटर से जुड़े वकीलों से बात करने पर इस मामले की भयावहता सामने आ रही है। वकील आभा जैन बताती हैं कि जरूरत से ज्यादा उम्मीद युवाओं में तलाक की प्रमुख वजह बन रही है। जैन समाज में लड़की को मायके से मिलने वाला स्त्री धन हो या ससुराल से मिलने वाली जायदाद ये दोनों झगड़े की वजह होती हैं। वर्ष 2005 में बना संपत्ति का अधिकार भी झगड़े की वजह बन रहा है।जो फेब्रिकेटेड शादियां परिचय सम्मेलन की झूठी शान बढ़ाने के लिए कराई जा रहीं हैं उनमें शादी की वजह प्रेम या सम्मान नहीं है बल्कि लड़के लड़की का ऊंचा पैकेज और धनाड्य परिवारों की प्रतिष्ठा प्रमुख देखी जा रही है। लड़की को भारी जेवरात चढ़ाए जाते हैं जो लड़की और उसके परिजनों का मानसिक संतुलन बिगाड़ देते हैं। कई मामलों में लड़कियां अपने भाईयों से ज्यादा जायदाद हड़पने के लिए स्वयं माता पिता से अधिक दहेज दिए जाने की मांग करती हैं। जो लड़कियां आत्म निर्भर हैं उन्हें ससुराल की परिस्थितियों और लड़के की संपदा दोनों में खोट नजर आती है। वे शादी करते ही पति से कहने लगती हैं कि तुम्हारी हैसियत ही क्या है। जबकि 25-28 साल से लड़के तब अपने जीवन की शुरुआत ही कर रहे होते हैं।

    जब ये केस अदालत पहुंचते हैं तो वकीलों का धंधा शुरु  हो जाता है। वकील न तो तलाक होने देते हैं और न ही शादी को सफल बनाने का उपाय करते हैं। लड़कियों की शारीरिक और मानसिक कमियों को छुपाकर की गई शादियों में भी वकील जब ज्यादा मुआवजा दिलाने का लालच दिखाकर ज्यादा फीस कमाने का उपाय तलाशते हैं तो लड़कियों का दिमाग  ही फिर जाता है। फिर वे लड़कों पर ऐसे आरोप जड़ने लगती हैं जो हकीकत से कोसों दूर होते हैं।

    परिचय सम्मेलन के तलाकशुदा लड़के लड़कियों के सेक्शन में जो युवा प्रस्तुत हुए हैं उन सभी की कमोबेश इसी तरह की समस्याएं सामने आई हैं। कई मामलों में एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर, एक दूसरे के प्रति सम्मान में कमी, कम्युनिकेशन की समस्या, प्यार और इंटिमेसी की कमी, प्रमुख कारण हैं। लड़कियां जिस तरह की संपदा मिलने की उम्मीद कर रहीं हैं उन शर्तों को कोई राजकुमार युवक नहीं बल्कि कोई डाकू ही पूरा कर सकता है। ये जैन समाज में जगाई गई झूठी शान और लालच भरी सोच की वजह से हो रहा है। परिचय  सम्मेलन से जुड़े लोग समाजसेवा की भावना छोड़कर जिस तरह रिकार्ड बनाने की सोच से काम कर रहे हैं उससे ये समस्या बढ़ती जा रही है।

  • भोपाल विलीनीकरण के सेनानियों को पुष्पांजलि

    भोपाल विलीनीकरण के सेनानियों को पुष्पांजलि

    भोपाल,1 जून(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, भोपाल विलीनीकरण दिवस एक जून के अवसर पर विलीनीकरण शहीद स्मृति द्वार पर कार्यक्रम में सम्मिलित हुए। राज्य सभा सांसद श्री जे.पी. नड्डा विशेष रूप से उपस्थित थे। चिकित्सा शिक्षा मंत्री श्री विश्वास सारंग, सांसद श्री वी.डी. शर्मा, पूर्व महापौर श्री आलोक शर्मा तथा विलीनीकरण आंदोलन के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिजन सम्मिलित हुए।

    मुख्यमंत्री श्री चौहान तथा सांसद श्री नड्डा ने शहीद स्मृति द्वार पर स्थापित रानी कमलापति की प्रतिमा पर नमन किया। साथ ही भोपाल विलीनीकरण आंदोलन के स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति में पुष्पांजलि अर्पित की गई। कार्यक्रम में स्वतंत्रता सेनानियों के परिजन का सम्मान भी किया गया। भोपाल की स्वतंत्रता की 73 वीं वर्षगांठ हर्ष और उल्लास के साथ मनाई गई।

  • होलिका में गौकाष्ठ का  उपयोग करें- कलेक्टर

    होलिका में गौकाष्ठ का उपयोग करें- कलेक्टर

    भोपाल12 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)।कलेक्टर तरूण पिथोड़े और केन्द्रीय पर्यावरण विभाग के अधिकारियों के साथ हुई चर्चा में निर्णय लिया गया कि इस बार होलिका दहन में लकड़ी का उपयोग नहीं करते हुए अधिकाधिक गौकाष्ठ का उपयोग हो इसके लिए विशेष अभियान चलाकर नागरिकों और स्कूली विद्यार्थियों को जागरूक किया जाये । भोपाल जिले में शवदाह गृहों में भी गौकाष्ठ का उपयोग हो इसके लिए भी मुहिम चलाई जायेगी । पर्यावरणविद डॉ. योगेश सक्सेना ने बताया कि जिले की शासन सेअनुदान प्राप्त गौशालाएं गौकाष्ठ का निर्माण कर शवदाह गृहों एवं लकड़ी के टालों पर इसका विक्रय कर रोजगार का जरिया बनाया जा सकता है । इसी प्रकार सेन्ट्रल जेल भोपाल के कैदियों को भी गौकाष्ठ निर्माण कराकर रोजगार से जोड़ा गया है । इसके लिए गोकाष्ठ निर्माण की मशीन जेल परिसर में स्थापित की गई है ।

    पर्यावरण संरक्षण प्रदेश के लिए स्थाई जरूरतों में से एक है । पर्यावरण केसंरक्षण, बचाव और हरा भरा शीतल प्रदेश हो इसके लिए शासन प्रशासन हर संभव प्रयास कर रहा है । पेड़ों को कटने से बचाने के लिए गौकाष्ठ आधारित लकड़ी, कंडे और अन्य संसाधन आज पर्यावरण को सामान्य स्थिति में लाने के लिए उपयोग में लाए जा रहे हैं ।

    कमिश्नर एवं कलेक्टर भोपाल के इस अभियान से नवाचार हो रहे हैं । गौकाष्ठ के उपयोग से सघन जंगल, जलवायु और पर्यावरण को बचाने में मदद मिलेगी । गौकाष्ठ आधारित वस्तुएं पर्यावरण को नुकसान से बचाने के लिए उपयोग में लाई जा रही हैं ।इस ओर कईं सामाजिक संस्थाएं, समाजसेवी भी अपना योगदान कर रहे हैं । गौकाष्ठ के उपयोग से जहां पर्यावरण को नई ऊर्जा मिल रही है वहां इसके उपयोग से पर्यावरण और बेवक्त बदलते मौसम की प्रतिकूल परिस्थिति को बदलने में मदद मिल रही है । गौकाष्ठ के उपयोग से जहां पेड़ों को कटने से बचाने में मदद मिलेगी वहां इसके उपयोग से रोजगार के नवीन अवसरों का सृजन हो सकेगा । साथ ही विभिन्न संस्थाओं को, आजीविका मिशन और गौशालाओं को पर्याप्त व्यवस्था के साथ साथ उनकी आर्थिक स्थिति में भी बदलाव लाया जा सकेगा । महिलाओं को भी रोजगारसे जोड़ा जा सकेगा । इससे शासन प्रशासन की विभिन्न योजनाओं का लाभ विभिन्न संस्थाओं और शासकीय अशासकीय गौशालाओं को भी मिल सकेगा ।

    क्या है गौकाष्ठ

    गाय के गोबर से निर्मित कंडे रूपी लकड़ियां हैं । गौकाष्ठ के उपयोग से वातावरण में कार्बनडाई आक्साईड की मात्रा भी कम होती है और गौकाष्ठ की केलोरिक वेल्यू लकड़ी से अधिक और घनत्व ज्यादा होता है जो पर्याप्त मात्रा में ईधन के लिए भी अनुपयोगी है । गौकाष्ठ निर्मित वस्तुएं प्रदूषण को रोकने, बढ़ती जरूरतों के लिए उपयोगी साबित हो रही हैं । गौकाष्ठ दैनिक जीवन में भी बहुतायत उपयोगी साबित हो रही है, साथ ही कईं कार्यक्रमों में भी इसकी उपयोगिता प्रमाणित है । गौकाष्ठ के उपयोग से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के नए अवसर प्राप्त होंगे । साथ ही पूरे प्रदेश में लकड़ियों एवं अन्य वस्तुओं के जलाने से पर्यावरण को बचाया जा सकेगा । पेड़ों की अत्यधिक कटाई को रोकने में मदद मिलेगी एवं इसके दोहरे उपयोग से हम पर्यावरण के संरक्षण में भागीदार बनेंगे और वातावरण को शुद्ध बना सकेंगे ।