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  • नीतीश कुमार की चाणक्य नीति के आगे भाजपा विवश

    नीतीश कुमार की चाणक्य नीति के आगे भाजपा विवश


    ओम प्रकाश गौर

    बिहार में नीतीश कुमार भाजपा को पानी पिला रहे हैं या नाकों लौहे के चने चबवा रहे या या फिर हमेशा की तरह ब्लैकमेल कर अपनी बात मनवा रहे हैं, यह आप तय कर लें। पलटूराम बन कर राजद में जाकर वहां मुख्यमंत्री बनने और फिर वापस आकर भाजपा के साथ मुख्यमंत्री बनने अथवा बहुत कम बहुमत के बाद भी मुख्यमंत्री बने रहे के पीछे भाजपा के चुनाव पूर्व कमिटमेंट से ज्यादा ब्लैकमेल की भूमिका थी। यह अब साफ हो रहा है। अपने को राजनीति का चाणक्य समझनेवाली भाजपा को एक बार फिर पटखनी देने को भाजपा तैयार है।
    बेहद बीमार लग रहे नीतीश कुमार ने बिहार चुनाव के समय स्वस्थ्य आदमी से ज्यादा सक्रियता बताकर सबको गलत साबित कर दिया था। चुनाव बाद वे फिर बीमार लगने लगे और तीन माह बाद ही राज्यसभा जाने को तैयार हो गए। मुख्यमंत्री भाजपा का होगा यह भी भाजपा को लगा और प्रचारित कर दिया। भाजपा कोटे के उपमुख्यमंत्री चौधरी को उनका उनका उत्तराधिकारी बताया जाने लगा। नीतीश कुमार भी इस और इशारे करते रहे। पर चालक नीतीश कुमार ने अपने मुंह से कभी नहीं कहा कि वे मुख्यमंत्री पद से कब इस्तीफा देंगे या उनका उत्तराधिकारी कौन होगा। हां जदयू पार्टी में प्रचार कर अपने पुत्र के लिये मांग उठवा दी और पार्टी की सदस्यता दिलवा दी। नीतीश कुमार की चालाकी देखिये उन्होंने आज तक अपने बेटे की राजनीति के बारे में कुछ नहीं कहा न ही अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी के बारे में कहा। यह पहले ही बता चुके हैं कि मुख्यमंत्री पद पर उनका उत्तराधिकारी कौन होगा यह भी नहीं कहा।
    राज्यसभा के चुनाव हुए तो नीतीश के साथ राजद के एक और सदस्य का नाम चुना। भाजपा ने भी अपने बिहार भाजपा अध्यक्ष के साथ एक और नाम चुना। पांच स्थान थे जबकि जदयू और भाजपा चार ही सफलतापूर्वक चुनवा सकते थे। तब भाजपा ने एनडीए के सहयोगी दल के कुशवाह के नाम को आगे बढ़ाया।
    चूंकि कुशवाह का चयन भाजपा ने किया था तो जितवाने की जिम्मेदारी भी भाजपा की थी इसलिए नीतीश कुमार चुप्पी साधे रहे।
    बिहार में विधायकों की खरीद फरोख्त आम बात है और विपक्षी राजद ने एक धनकुबेर को खड़ा किया जो जीत के पैसा लुटाने को तैयार था। राजद को अपने विधायकों के साथ छह कांग्रेस, एक बसपा, पांच मुस्लिम पार्टी के विधायक सहमत करने थे वो उसने किया और जीत के लिए 41 वोट का इंतजाम कर लिया।
    भाजपा ने पहले खरीद फरोख्त और बागियों का इंतजाम किया। उसने अपने एक चयनीत प्रत्याशी को पीछे कर पांचवां प्रत्याशी बनाया। चौथा स्थान सहयोगी पार्टी के कुशवाह को दिया।
    फिर चारों को 41 से ज्यादा वोट आवंटित किये। इसमें सावधानी बरती कि बगावत तो भी चारों जीत जाएं।
    फिर अपने पांचवे प्रत्याशी का ध्यान किया और कहा कि सभी विधायक दूसरी वरियता का वोट सिर्फ और सिर्फ पांचवे प्रत्याशी को दें। उसके आगे की वरियताओं का इस्तेमाल नहीं करें।
    राज्यसभा चुनाव कहने को गोपनीय होता है पर वोट देनेवाले को अपनी पार्टी के ऐजेंट को इस तरह से बताना होता है कि एजेंट के अलावा कोई और न देख ले। यही कारण है कि मतदान खत्म होते ही पार्टियां बता देती है कि उनका कौन बागी हुआ और किसको वोट दिया।
    इसके अलावा भाजपा ने आपरेशन कमल चलाया। नतीजा यह निकला कि कांग्रेस के तीन और राजद का एक विधायक वोट डालने ही नहीं आए। बाकी का मतदान अपेक्षा अनुसार हुआ। गणना में 41 के अतिरिक्त वोट स्वतः ही भाजपा के पांचवे उम्मीदवार के खाते में आ गए।
    चार अनुपस्थियों के कारण राजद के उम्मीदवार के 37 वोट रह गए। और भाजपा के उम्मीदवार को 30 वोट मिले। पर दूसरी वरियता के वोटों के मूल्यांकन और अतिरिक्त वोटों को मिलाकर भाजपा के पांचवे उम्मीदवार के 38 वोट माने गए और वह जीत गया। इस प्रकार से भाजपा नीतीश कुमार सहित एनडीए के पांचों उम्मीदवार जितवा लाई।
    सारी लंबी कहानी देर से ही सही संदर्भ के लिए बताने का कारण यह है कि इस घटनाक्रम ने नीतीश कुमार को चौंका दिया। जो नीतीश कुमार राज्यसभा के नामांकन के समय अस्वस्थ दिख रहे थे वह फिर स्वस्थ दिखने लगे और उत्साह के साथ बिहार में समृद्धि यात्रा में लग गए।
    लोग अटकलें लगाते रहे कि नीतीश विधान परिषद और मुख्यमंत्री पद से कब इस्तीफा देंगे। अगला मुख्यमंत्री जदयू से होगा या भाजपा से। किसी का भी बने पर होगा कौन। इन सवालों पर सब चुप्पी साधे रहे।
    हमने आपको काफी पहले बताया था कि एक तय समय सीमा के बाद कोई भी व्यक्ति दो सदनों का सदस्य नहीं रह सकता। वह समय सीमा में इस्तीफा न दे तो नया निर्वाचन निरस्त हो जाता है। यह भी कहा था कि बिना किसी सदन का सदस्य बने कोई भी व्यक्ति छह माह तक मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री रह सकता है। बस उसे संबंधित सदन में अपना बहुमत साबित करना होता है। बहुमत न हो तो निर्वाचित सदस्य भी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री नहीं रह सकता है।
    काफी बहस के बाद राजनीतिक समीक्षकों और विशेषज्ञों ने समय सीमा 14 दिन बताई। तब कहा गया कि 30 मार्च या उससे पहले नीतीश कुमार विधानपरिषद से इस्तीफा दे देंगे ताकि राज्यसभा की सदस्यता बच जाए।
    दिलचस्प बात यही है कि इस पर भी नीतीश कुमार चुप रहे।
    अब राजनीतिक समीक्षक बता रहे हैं कि राज्यसभा निर्वाचन के परिणामों गजट नोटिफिकेशन की तिथि से 14 दिन गिने जाएंगे। अभी तक राज्यसभा निर्वाचन परिणामों का गजट नोटिफिकेशन नहीं हुआ है। इस पर बहस जारी है। इसमें स्वयं नीतीश कुमार के केन्द्रीय रेलमंत्री से इस्तीफा देकर बिहार के मुख्यमंत्री बनने का उदाहरण दिया जा रहा है। जिनका अंतर 14 दिन से ज्यादा था। अजित जोगी के छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बनने का भी उदाहरण दे रहे हैं क्योंकि मुख्यमंत्री बनते समय जोगी मध्यप्रदेश विधानसभा के सदस्य थे। बाद में छत्तीसगढ़ विधानसभा के सदस्य बने इसमें भी समयावधि ज्यादा थी।
    इस मामले में अटलजी की 13 दिन की सरकार एक वोट से गिरने का उदाहरण याद करें जब सरकार एक राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री के वोट से गिरी थी क्योंकि उस दिन वह लोकसभा के सदस्य भी थे।
    फिर बिहार पर लौटें और कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार 30 मार्च को इस्तीफा नहीं देंगे। वहीं जानकार सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि जब भी नीतीश कुमार इस्तीफा देंगे तब देंगे पर अभी वह तीन माह और मुख्यमंत्री रहने की इच्छा भाजपा को बता रहे हैं।
    राज्यसभा चुनाव की रणनीति से नीतीश कुमार के सतर्क होने को भाजपा ने गंभीरता से लिया था और कभी भी यह नहीं कहा कि अगर भाजपा का मुख्यमंत्री बना तो कौन होगा। यही कहा गया कि जो भी होगा उस पर नीतीश कुमार की सहमति रहेगी। इसलिए बस अटकलें चलती रहीं।
    अब फिर पूछा जा रहा है कि क्या भाजपा नीतीश कुमार के तीन बार और मुख्यमंत्री चाहने की बात मान ले। अब हम पूछना चाहते हैं कि तीन माह बाद वह तीन माह और मांग लेंगे तब भाजपा क्या करेगी। उसे मानने के बाद यानि छह माह बाद राजनीतिक परिदृश्य क्या बनेगा यह कौन बता सकता है।
    वैसे भी जदयू की मुख्यमंत्री या भाजपा और जदयू के ढ़ाई ढ़ाई साल के मुख्यमंत्री की भी तो चर्चा उठती रही है।
    भाजपा जानती है कि बिहार में बगैर नीतीश कुमार की कृपादृष्टि के उसका मुख्यमंत्री नहीं बन सकता है। इसलिए क्या वह नीतीश कुमार की कथित सहमति यानि ब्लेकमेल के लिए अभिशप्त है।