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  • शराब की खपत बढ़ी तो आय भी बढ़ाइए

    शराब की खपत बढ़ी तो आय भी बढ़ाइए

    भोपाल01 अक्टूबर(अजय खेमरिया).
    प्रदेश की मौजूदा आबकारी नीति में बड़े बदलाब की आवश्यकता है क्योंकि जिस व्यापक पैमाने पर शराब का अवैध कारोबार मैदानी स्तर पर हो रहा है उसे आबकारी विभाग रोक पाने में नाकाम साबित हो रहा है। सीमित मानव संसाधन और केंद्रीयकृत नियंत्रण तंत्र के अभाव में सरकार को इस अवैध कारोबार से राजस्व की क्षति भी हजारों करोड़ में हो रही है।
    तथ्य यह है कि प्रदेश में जितनी आधिकारिक शराब दुकानें है उससे दोगुने अनुपात में शराब का अवैध विक्रय संगठित तौर पर किया जा रहा है।प्रदेश में एक भी गांव ऐसा नही है जहां सरकारी दुकानों से अवैध परिवहन कर शराब नही बेची जा रही हो। यही नही इसी अनुपात में अवैध रूप से शराब निर्माण भी गांव-गांव में किया जा रहा है। इसके दुष्परिणाम सरकारी राजस्व में चपत के साथ आम नागरिकों की अमानक शराब से असमय मौत के रूप में भी सामने आ रहे हैं। मुरैना जिले में पिछले सालों जिस तरह से अवैध शराब भट्टियों से निर्मित शराब पीने से जो मौते हुई थी उससे सरकार ने कोई सबक नही सीखा।
    सरकार नहीं कर सकती शराब दुकानें बंद?
    मध्यप्रदेश सरकार बिहार या गुजरात की तरह शराब बंदी नहीं कर सकती है, क्योंकि राज्य के राजस्व का एक बड़ा हिस्सा उसे आबकारी से ही प्राप्त होता है। प्रदेश में अभी तीन हजार 600 शराब दुकानों से सरकार को 13 हजार 916 करोड़ का राजस्व चालू वित्तीय बर्ष में मिला है। 2003 में यह आंकड़ा लगभग 750 करोड़ रुपए था। जाहिर है कि औधोगिक एवं खनिज संसाधनों रूप में बीमारू मप्र के लिए सरकारी राजस्व का बड़ा स्रोत शराब भी है।
    वर्तमान तीन हजार छह सौ दुकानों की संख्या आंकड़े के रूप में तो बहुत नजर आती है, लेकिन जो जमीनी हकीकत है वह इन आंकड़ों से जुदा है क्योंकि बिना सरकारी दुकानों के भी हजारों जगह शराब का अवैध विक्रय हो रहा है और इसी अनुपात में अवैध भट्टियों का संचालन भी जारी है। यह दोनों तथ्य सरकार से छिपे हुए नहीं है।
    सरकार के राजस्व का इतना महत्वपूर्ण स्रोत होने के बाबजूद आबकारी महकमा मानव संसाधन की गंभीरतम कमी से जूझ रहा है। अधिकतर जिलों में आबकारी उपनिरीक्षक, हवलदार, आरक्षक के आधे से ज्यादा पद खाली है। एक एक उपनिरीक्षक के पास दो से तीन सर्किल का प्रभार है। नतीजतन अवैध भट्टियों पर कारवाई के लिए महकमें के पास कोई संसाधन ही नहीं हैं । इस अवैध कारोबार को स्थानीय दबंगो के अलावा राजनीतिक स्तर पर भी खुला संरक्षण मिला हुआ है। जब भी आबकारी महकमा अवैध बिक्री या निर्माण पर कारवाई करता है उसे स्थानीय माफिया और नेता कारवाई नहीं करने देते हैं। नेताओं के संरक्षण के कारण ही उन अवैध कारोबारियों को न तो पुलिस का भय है और न ही आबकारी विभाग का।

    अवैध शराब के लिए बाजार की उपलब्धता होना है, वर्तमान में मध्य प्रदेश में संपूर्ण प्रदेश को दो ,तीन या चार-चार दुकानों के समूहों में बांटा गया है, प्रत्येक समूह किसी न किसी ठेकेदार को टेंडर के माध्यम से आवंटित किया जाता है जिसके एवज में सरकार को राजस्व की प्राप्ति होती है। दुकानें शासकीय होती हैं और ड्यूटी पेड शराब सरकारी वेयर हाउस से उनको प्रदान की जाती हैं जिनको वो एमएसपी और एमआरपी के बीच अपने सुविधा जनक रेट पर विक्रय करने हेतु स्वतंत्र होते हैं। अब सवाल ये उठता है कि अवैध शराब यदि दुकानों से नहीं बिकती तो फिर कहां बिकती है? प्रत्येक मदिरा समूह में ठेकेदार को आवंटित दुकानों की संख्या कम होने और उन दुकानों से संबद्ध क्षेत्र बहुत बड़ा होने से प्रति व्यक्ति दुकान तक मदिरा खरीदने जाने के लिए सक्षम नहीं होता इसलिए ठेकेदार प्रत्येक गांव में अपना एक कमीशन किसी सामान्य पान या परचून दुकानदार को दे देते हैं जिस से प्रत्येक गांव में ड्यूटी पेड शराब प्रत्येक व्यक्ति को आसानी से स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हो जाती है।
    अवैध शराब विक्रय को रोकने के लिये प्रत्येक गांव में अघोषित रूप से खुली हुई कलारियों को सरकार नियमों के अंतर्गत लाकर उनके नियमित लाइसेंस प्रदान करने की कार्यवाही करें, जिससे सरकार के राजस्व में वृद्धि होगी और जनहानि की संभावना भी खत्म हो जाएगी। इसके अलावा शराब की कीमतों में कमी की जानी चाहिए क्योंकि जो शराब का आदि है, वह तो शराब पियेगा, फिर चाहे जहरीली ही क्यों न हो। ऐसे में यदि कीमत कम होगी, तो यह मौतों का सिलसिला भी कम होगा। आबकारी विभाग द्वारा की जाने वाली कार्यवाहियों का पूर्ण अधिकार विभाग को ही दिया जाना चाहिए, ताकि विभागीय अधिकारियों का अवैध करोबार पर अंकुश लगाए जाने के प्रति रूझान बढ सके। अन्यथा पुलिस द्वारा की जाने वाली कार्यवाहियों के कारण आबकारी अपने कर्तव्यों के प्रति उदासीन हो जाती है, फलस्वरूप दिखावे की कार्यवाहियां कर अपने काम की इतिश्री कर ली जाती है। आबकारी अधिनियम में कठोर दण्ड का प्रावधान करना और पालन करना चाहिए। दुकानों की संख्या में वृद्धि की जाकर ड्यूटी पेड मदिरा की उपलब्धता में वृद्धि की जानी चाहिए।

  • जबलपुर में शराब तस्कर का मकान  जमींदोज

    जबलपुर में शराब तस्कर का मकान जमींदोज

    भोपाल,4 मई, (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।मध्य प्रदेश शासन द्वारा भू-मफिया राशन की काला बाजारी, मिलावटखोरों, भू-माफियाओं/चिटफंड कंपनी के कारोबारियों एवं सूदखोरों के विरूद्ध सख्त कार्यवाही करने के निर्देश प्रशासन व पुलिस विभाग को दिये गये हैं। इन निर्देशों के तहत पुलिस, प्रशासन तथा नगर निगम की संयुक्त टीम के द्वारा इस प्रकार के माफियाओं की लिस्ट एवं उनके द्वारा किये गये अवैध निर्माण एवं कब्जे की जानकारी तैयार की गई है तथा उनके विरूद्ध कार्यवाही की योजना तैयार कर लगातार कार्यवाही की जा रही है।

    इसी क्रम में आज कलेक्टर जबलपुर डॉ. इलैयाराजा टी. एवं पुलिस अधीक्षक जबलपुर श्री सिद्धार्थ बहुगुणा तथा नगर निगम कमिश्नर श्री आशीष वशिष्ठ के मार्गदर्शन में थाना हनुमानताल अंतर्गत महिला शराब तस्कर मीरा बाई सोनकर जिसके विरूद्ध 21 अपराध आबकारी एक्ट के एवं मीरा बाई सोनकर के पांच बेटे बाबा सोनकर के विरूद्ध 31 अपराध, बोरा उर्फ मोनू सोनकर के विरूद्ध 30 अपराध, कल्लू उर्फ श्याम सोनकर के विरूद्ध 28 अपराध, सोनू सोनकर के विरूद्ध 27 अपराध, राजा सोनकर के विरूद्ध 12 अपराध हत्या का प्रयास, एनडीपीएस एक्ट, अवैघ वसूली, आर्म्स एक्ट, बलवा कर घर में घुसकर मारपीट तोड़फोड़ , आबकारी एक्ट , जुआ आदि के दर्ज हैं, के द्वारा बाबा टोला सिंध केम्प में लगभग 3000 वर्गफुट भूमि जिसकी अनुमानित कीमत लगभग 3 करोड़  रूपये है पर अनाधिकृत रूप से लगभग 50 लाख रूपये की लागत से निर्मित दो मकान को जमींदोज किया गया।

    विवाद होने की आशंका को ध्यान मे रखते हुये कार्यवाही के दौरान एस.डी.एम. आधारताल श्री नमः शिवाय अरजरिया, नगर पुलिस अधीक्षक गोहलपुर श्री अखिलेश गौर, नगर पुलिस अधीक्षक अधारताल श्रीमती प्रियंका करचाम, नायब तहसीलदार श्री संदीप जायसवाल एवं श्री श्याम आनंद, थाना प्रभारी हनुमानताल श्री उमेश गोल्हानी, थाना प्रभारी कैंट श्री विजय तिवारी, थाना प्रभारी बेलबाग सुश्री प्रियंका केवट, टूआईसी अधारताल, टूआईसी गोहलपुर, नगर निगम भवन अधिकारी श्री मनीष तड़से, नगर निगम अतिक्रमण दस्ता प्रभारी श्री लक्ष्मण कोरी, श्री अहसान खान सहित थाने एवं नगर निगम के कर्मचारी मौजूद थे।