Tag: #sun

  • मन को समझकर दूर करें चंद्रमा का बुरा प्रभाव

    मन को समझकर दूर करें चंद्रमा का बुरा प्रभाव



    भोपाल 06 नवंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। चंद्रमा या उसके ग्रहण का मन पर असर पूरे व्यक्तित्व को झिंझोड़कर रख देता है। कुंडली के अध्ययन से हर व्यक्ति के लिए अलग लोकव्यवहार और जीवनचर्या निर्धारित की जा सकती है। इससे सामाजिक उन्नति की राह भी प्रशस्त की जा सकती है। देश को ऐसे ज्योतिषियों की जरूरत है जो मनोविज्ञानी भी हों। वे लोगों का मार्गदर्शन करें ताकि समाज में सुख शांति और समृद्धि की स्थापना की जा सके। ये विचार रविवार को भोपाल के केन्द्रीय संस्कृत संस्थान में आयोजित राष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन एवं सम्मान समारोह में प्रख्यात ज्योतिषी सुश्री हेमलता तिवारी ने व्यक्त किए। ये आयोजन ज्योतिष विचार मंच भोपाल की ओर से आयोजित किया गया था। इस अवसर पर देश भर से आए कई विद्वान ज्योतिषियों को सम्मानित भी किया गया।
    मानसिक रोगों पर चंद्रमा के असर का विश्लेषण करते हुए डॉ.हेमलता तिवारी ने कहा कि हमारे आसपास के लोगों के प्रति हमारा व्यवहार कुंडली में चंद्रमा की स्थितियों के अनुरूप निर्धारित होता है। यदि जातक का जन्म चंद्रमा की जिस स्थिति में हुआ है उसका व्यवहार उसी के मुताबिक होता है। हमारी मनोदशा से ही हमारे लोकव्यवहार निर्धारित होते हैं और यही भाग्य को संवारते भी हैं और बिगाड़ते भी हैं। समाज को बड़ी संख्या में ऐसे मनोविज्ञानी चाहिए जो ज्योतिष का मर्म समझते हों। जातक की कुंडली के अध्ययन से उसकी कई बीमारियों का निदान भी चुटकियों में किया जा सकता है।
    प्रोफेसर हंसराज ने कहा कि सूर्य की प्रतिनिधि आत्मा, और मन का प्रतिनिधि चंद्रमा लग्न के प्रतिनिधि शरीर के साथ मिलकर जीवन की दशा और दिशा तय करते हैं। आत्मा और मन राजा की तरह जीवन के आरोह अवरोह बनाते हैं। जो ग्रह हमारे जीवन पर असर डालते हैं हम केवल उन्हीं का अध्ययन कर पाते हैं। जैसे सूर्य और चंद्रमा का असर तो भौतिक जीवन पर स्पष्ट देखा जाता है लेकिन नवग्रहों और 27 नक्षत्रों के अध्ययन से कई समस्याओं का समाधान किया जाता है। ज्योतिष कर्म करने वाले साधक यदि अर्थलोलुपता के दुष्प्रभाव से बचे रहें तो इस विधा की शान दिन ब दिन बढ़ती जाएगी।


    इस अवसर पर प्रमुख संरक्षक एमएस श्रीवास्तव ने चिकित्सा ज्योतिष के विभिन्न आयामों के आधार पर बताया कि देश के कई राज्यों में गंभीर बीमारियों का इलाज ज्योतिषीय मार्गदर्शन में किया जा रहा है। मंच के प्रमुख केसी कलानिधि ने कहा कि ज्योतिष शास्त्र में ऐसे लोगों की जरूरत नहीं है जो लोगों को ठगते रहते हैं। उन्होंने कहा कि कालसर्प दोष या तो होता है या नहीं होता लेकिन वह कभी आंशिक नहीं होता। जबकि कई ज्योतिषी भ्रांतियां फैलाकर लोगों को ठगने का काम करते रहते हैं।
    कार्यक्रम में न्यूसी समैया, राजेश सोनी, श्वेता विजयवर्गीय, पं.सुदर्शन लव पांडेय.समेत कई विद्वानों ने ज्योतिषीय घटनाओं पर प्रकाश डाला।

  • मकर संक्रांति अब साठ सालों तक 15 जनवरी को ही मनेगी

    मकर संक्रांति अब साठ सालों तक 15 जनवरी को ही मनेगी

    भोपाल,14 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)।आम चर्चा में कहा जाता है कि मकर संक्रांति ही ऐसा पर्व है जो हर साल चौदह जनवरी को आता है। लेकिन अब ये पर्व 15 जनवरी को पड़ रहा है। इसे देखते हुए लोग असमंजस में हैं कि संक्रांति अब 15 जनवरी को क्यों हो रही है?

    खगोल शास्त्र की गणनाओं को देखें तो 2008 से 2080 तक मकर संक्राति 15 जनवरी को ही होगी। विगत 72 वर्षों से (1935 से) प्रति वर्ष मकर संक्रांति 14 जनवरी को ही पड़ती रही है।इसीलिए लोगों के बीच तारीख को लेकर भ्रम की स्थिति बनना स्वाभाविक है।जबकि 2081 से आगे 72 वर्षों तक अर्थात 2153 तक यह 16 जनवरी को रहेगी।

    ज्ञातव्य रहे, कि सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश (संक्रमण) का दिन मकर संक्रांति के रूप में जाना जाता है। इस दिवस से, मिथुन राशि तक में सूर्य के बने रहने पर सूर्य उत्तरायण का तथा कर्क से धनु राशि तक में सूर्य के बने रहने पर इसे दक्षिणायन का माना जाता है।

    सूर्य का धनु से मकर राशि में संक्रमण प्रति वर्ष लगभग 20 मिनिट विलम्ब से होता है। स्थूल गणना के आधार पर तीन वर्षों में यह अंतर एक घंटे का तथा 72 वर्षो में पूरे 24 घंटे का हो जाता है।

    यही कारण है, कि अंग्रेजी तारीखों के मान से, मकर-संक्रांति का पर्व, 72 वषों के अंतराल के बाद एक तारीख आगे बढ़ता रहता है।