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  • सोनिया-कांग्रेस का पुरसा हाल !

    सोनिया-कांग्रेस का पुरसा हाल !

    के. विक्रम राव

    पत्रकार सब शायद वांगमय में भ्रमित हो गए, अथवा वर्तनी की त्रुटि कर बैठे! कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने असल में अपने बयान (23 अगस्त) में कहा होगा : “जाऊँगी, नहीं रहूंगी|” सब एडिटर ने अल्पविराम को खिसका कर ‘नहीं’ के बाद लगा दिया| मायने ही बदल गए| दो दिनों के दैनिक देख लीजिये| भला सोचिये राजपाट, खजाना, वैभव और ये ऐश तज दिया तो फिर कहाँ? तेईस तीसमार खान बड़े शेखी बघार रहे थे कि 135-वर्ष पुरानी पार्टी को पूरा बदल डालेंगे| संभवतः जैसा होता आया है वे सब मायाजाल पकड़ नहीं पाए| क्या “जी हुजूरिये” लोग कभी “न” बोल सकते हैं ? फिर बात हो उस प्रतीक्षारत प्रधान मंत्री पर? अब तो वे बावन पार गए और फिर भी युवा समझते हैं ! टट्टू का कभी अरबी घोड़ों से मुकाबला संभव है? मगर लोग हैं कि लगे रहे| समझे नहीं कि ठूंठ पर हरियाली नहीं आती| बहत्तर साल के कपिल सिब्बल और उनसे बस एक साल छोटे नबी भाई, जो गुलाम भी हैं, पर लिखते हैं आजाद, वे तक तलवार भांज रहे थे| दिन ढला, उनके तेवर भी ढीले हो गए| सूरमाओं की शेखी होती है, पर दिखी नहीं|सोनिया गाँधी चली थीं पोखरण तृतीय करने| बड़ा विस्फोट तो उनकी सासू माँ ने 1974 में किया था| इस बार हुआ नहीं| बस इतना हुआ कि दो दिन अखबार तथा टीवी पर से नरेंद्र मोदी को सोनिया ने बाहर कर दिया| तीसरे ही दिन सब सामान्य हो गया| सारा एक फूहड़ मजाक था! यूं भी इंदिरा गाँधी के पुराने वीडियो और समाचार की कतरनों के आधार पर सोनिया गाँधी काफी जानती, सीखती रहती हैं| उन्हें याद रहा उनके भारतीय बहू बनने वाले वर्ष (25 फ़रवरी 1968) के समय ही कांग्रेस विभाजन की कगार तक पहुंच रही थी| पार्टी अध्यक्ष एस. निजलिंगप्पा प्रधानमंत्री को पार्टी से निष्कासित करने का निर्णय ले चुके थे| कुछ महीनों बाद पार्टी प्रत्याशी नीलम संजीव रेड्डी के वोट काटकर इंदिरा गाँधी ने अपने निर्दलीय प्रत्याशी वी.वी. गिरि को राष्ट्रीय पद पर जिताने की तैयारी कर ली थी| उसी दौर में निजी बैंकों के राष्ट्रीयकरण का निर्णय हो गया था| आमजन को आभास हो रहा था कि ऐतिहासिक जनक्रांति हो रही थी| अंततः कांग्रेस टूटी, साल भर में दो कांग्रेस पैदा हो गई| मगर इंदिरा गाँधी का दांव चतुराई का था| उन्होंने दलित (जगजीवन राम) और मुस्लिम (फकरुद्दीन अहमद) को अपना मोहरा बनाया| वोटरों के दो बड़े तबके उनकी पार्टी के समर्थक बन गए| डेढ़ साल बाद “गरीबी हटाओ” के लुभावने नारे पर इंदिरा कांग्रेस सत्ता पर सवार हो गयी| विरोधी दफ़न हो गए| आज सोनिया गाँधी उसी पुराने (1971) सीन को दुबारा मंचित करना चाहती थीं| वे भूल गयीं कि 1970 के दौर के कोई भी नेता नरेंद्र मोदी के बाल बांका करने लायक भी नहीं थे| दूसरा उस समय कोई इंदिरा गाँधी का सानी नहीं था| इसी तरह आज भी सोनिया गाँधी तो सास की साया तक नहीं बन पायीं| इसी आधार पर गौर करें कि आज की चुनौती पर यह तिगड्डा (माँ, बेटा, बेटी) कितना जंगजू हो सकता है ? मान भी लें कि धनबल के आधार पर हो भी जाये, तो पाता क्या ? ये सब पुरोधा वही हैं जो आम चुनाव जीत न पाए| तब 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी रिटायर्ड और टायर्ड दिख रहे थे| सोनिया अपने सितारों की चाल से जीती| वर्ना सरदार मनमोहन सिंह दिल्ली से ही लोकसभा चुनाव बुरी तरह हार चुके थे| फिलहाल बटेर हाथ लग ही गयी| वे प्रधानमंत्री बन ही गए | मगर तब तारीफ के पुल बंधे सोनिया के| इस पूरे परिवेश में इस मौजूदा दो-दिवसीय (23-24 अगस्त) मैच पर गौर करें तो स्पष्टतयः आभास होता है कि यह फिक्स्ड था| कौन खिलाड़ी कब किस ओर से गेंद फेंकेगा ? कौन किस दिशा में हिट लगाएगा ? फिर कौन, कब आउट होगा ? सब तय होता है| दोनों “बागी” नेता जानते थे|मगर दुःख इस बात का रहेगा कि खुर्राट रणबांकुरों जैसे कपिल सिब्बल और गुलाम नबी आजाद अपनी पारी ठीक से खेल नहीं पाए| आजाद को तो भान हो गया होगा कि शीघ्र ही वे काबीना मंत्री के समकक्ष वाली सुविधाओं से मरहूम हो जायेंगे| अब राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड्गे होने वाले हैं| वे पिछले दिनों कर्णाटक से राज्यसभा में आये हैं| लोकसभा चुनाव हार गये थे|राज्यसभा में विपक्ष का नेता महत्वपूर्ण होता है, अतः दलित होने के कारण खड्गे का हक़ बनता है| उधर कपिल सिब्बल की राज्यसभा अवधि भी अब साल भर शेष है| इस बार उत्तर प्रदेश से कई प्रत्याशी होंगे| कांग्रेस के पास इतने विधायकों कि संख्या नहीं है की वे सिब्बल को दुबारा जिता पायें|इन सियासी तथ्यों पर गौर करें तो इस कथित विद्रोह के समस्त कारण समझ में आ जाते हैं| दबाव की राजनीति है| फ़िलहाल सोनिया से राहुल दो दशक तक, फिर राहुल से सोनिया तक का दौर| क्रम चलता रहेगा और तब पधारेंगी प्रियंका वाड्रा| अर्थात कांग्रेस में वंशावली चलती रहेगा| कुतुब्बुद्दीन ऐबक वाला गुलाम वंश फिर चालू हो जायेगा | अतः लब्बो लुआब यही है कि अब सीधी, सामान्य सियासी मांग है कि कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष वोट द्वारा मतपेटियों से निर्वाचित हो, नामित होने की परम्परा ख़त्म हो| कई वर्ष हो गए कांग्रेसियों ने पार्टी संगठन के निर्वाचन में मतपत्र ही नहीं देखा| सोनिया गाँधी ने तो करिश्मा ही कर दिखाया था, जब उन्होंने सीताराम केसरी को सशरीर पार्टी कार्यालय से फिकवा दिया था| स्वयं अध्यक्ष बन बैठीं| न नामांकन, न मतदान, न परिणाम| लेकिन अब कांग्रेस तभी बचेगी जब मतपत्र का पुनः दीदार होगा| वर्ना संग्रहालय में पार्टी का स्थान आरक्षित है|K Vikram RaoMobile : 9415000909E-mail : [email protected]

  • डूबकर उबरने का ख्वाब देखती कांग्रेस

    डूबकर उबरने का ख्वाब देखती कांग्रेस

    नागरिकता संशोधन विधेयक और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर को लेकर कांग्रेस ने जिस तरह अफवाहों की खेती करने की रणनीति अपनाई है उससे नई पीढ़ी के बीच बुढ़ाती कांग्रेस के पाप जोरदार ढंग से उजागर हो रहे हैं। कांग्रेस ने भाजपा पर देश को बांटने और धर्म के आधार पर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने का आरोप लगाया है लेकिन वह अपनी बोई जहर की खेती के बीच खुद घिर गई है। जिस नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर उसने देश भर में वितंडावात खड़ा किया। गैर कांग्रेस शासित राज्यों में दंगा फैलाने वालों का हाथ थामा उससे कांग्रेस की भद पिटी है। सोशल मीडिया के दौर में कांग्रेस और टुकड़े टुकड़े गैंग की असलियत उजागर हो गई है। रही सही कसर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली से दिए अपने लंबे भाषण से पूरी कर दी। उन्होंने जिस तरह भड़काने वालों की धुलाई की उससे तो पूरे देश में लोक शिक्षण का महाअभियान पूरा हो गया है। अब लोग इस कानून पर भड़काने वालों की लू उतार रहे हैं। जिस नागरिकता संशोधन विधेयक का देश के किसी भी नागरिक से वास्ता नहीं है उसे देश से मुसलमानों को भगाने वाला कानून बताया जा रहा है। जबकि ये कानून 31 दिसंबर 2014 तक भारत में शरण मांगने आए शरणार्थियों की मदद का कानून है। वे लोग जो जातिगत प्रताड़ना से मजबूरी में भारत आए थे और आजादी के बाद से नागरिकता से वंचित रहे उनके कष्ट निवारण के लिए लाए गए कानून को संविधान की मूल भावना के खिलाफ बताया जा रहा है। आज दिल्ली में कांग्रेस के आलाकमान ने इस कानून के विरोध में कथित सत्याग्रह किया। प्रदेशों की इकाईयों ने कानून के खिलाफ में बैठकें बुलाईं इसके बावजूद कांग्रेस के भीतर से जागरूक युवाओं का बड़ा तबका पार्टी की इस रणनीति से क्षुब्ध है। वह जानता है कि कांग्रेस केवल खिसियानी बिल्ली खंभा नोंचे वाले अंदाज में बोझिल राजनीति कर रही है। जो कानून नागरिकता देने का है उसे मुस्लिम भगाओ कानून बताकर कांग्रेस और उसके नेतागण देश में साम्प्रदायिक विद्वेष के बीज बो रहे हैं। वैसे तो देश का विभाजन स्वीकार करके कांग्रेस ने अंग्रेजों की ही राजनीति को आगे बढ़ाया था इसके बावजूद पिछले दरवाजे से भारत को धर्मनिरपेक्ष देश का तमगा देकर कांग्रेस खुद पर सहिष्णु होने का लेबल लगाती रही है। अब जबकि देश में भाजपा की सरकारें पंद्रह पंद्रह साल पूरे करके सामप्रदायिक सौमनस्य की मिसालें खड़ी कर चुकीं हैं तब कांग्रेस की राजनीति की असलियत उजागर हो गई है। एस बार तो राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर पर कांग्रेस के दुष्प्रचार से उसकी जातिवादी राजनीति का खुलासा ही हो गया है। एनआरसी का कानून कांग्रेस सरकार ही लाई थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने असम के बंग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान करने और उन्हें वापस खदेड़ने के लिए लागू किया। यह कानून शेष भारत में लागू नहीं है। इसके बावजूद दुष्प्रचार करने वाली टुकड़े टुकड़े गेंग ने कहना शुरु कर दिया है कि जब भाजपा अल्पमत में होने के बावजूद राज्यसभा में भी कानून पारित करा सकती है तो भविष्य में वह मुसलमानों को देश से बाहर निकालने का कानून भी बना सकती है। इससे भयभीत मुस्लिम लामबंद हो गए हैं। उनमें से कुछ असामाजिक तत्वों ने दंगा फैलाने और पुलिस पर हमले करने की कोशिशें भी करनी शुरु कर दीं हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अभियान के बाद देश भर में कानून के समर्थन में भी लोग सड़कों पर उतरने लगे हैं। कांग्रेस के नीति निर्धारक चाहते हैं कि देश में दंगा फसाद हो और भाजपा सरकार को बदनाम करने के साथ साथ देश में वोटों की खेती भी की जा सके। इसके विपरीत कांग्रेस का ये दांव उलटा पड़ रहा है। कांग्रेस ने मुस्लिमों को लामबंद करने की जो रणनीति अपनाई है उससे हिंदु मतों का ध्रुवीकरण भी हो रहा है। कांग्रेस के ये नेता जानते हैं कि सौ फीसदी मुस्लिम मत हासिल करके वह अपना खोया जनाधार फिर पा सकती है। मध्यप्रदेश में आदिवासी और मुस्लिम मतों से सत्ता में आने का सफल प्रयोग वह आजमा चुकी है। कांग्रेस के नेतागण इसी रणनीति पर चल रहे हैं। देश में उसने गठबंधन की रणनीति अपनाकर पिछले दरवाजे से सत्ता में आने का सफल राजनीतिक खेल खेला है।महाराष्ट्र के बाद अब झारखंड में भी उसने यही फार्मूला दोहराया है। इसके बावजूद सत्ता का ये खेल देश के सामजिक सद्भाव को तार तार कर रहा है। जिस संविधान की शपथ लेकर कमलनाथ जैसे उसके क्षत्रप सत्ता में पहुंचे हैं वे अब उसी संविधान के कानून का विरोध करके उस संविधान की औकात दो कौंड़ी की बता रहे हैं। कांग्रेस पुत्र राहुल गांधी तो कई मंचों पर कानूनी कागजों को फाड़कर अपने इरादे बता चुके हैं। अब इस कानून की दुहाई यदि भाजपा देती भी रहे तो क्या फर्क पड़ता है। भाजपा अभी तक कांग्रेस के बनाए राजमार्ग पर चलने की राजनीति करती रही है। पहली बार उसे महसूस हो रहा है कि उसका कैडर और कानून का पालन करने की सदाशयता कोई काम की नहीं है। वास्तव में देश को जनहित की राजनीति करने वाले राजनीतिक दल की जरूरत है। कांग्रेस और भाजपा दोनों कानून के आड़ में सत्ता चलाने का खेल खेलती रहीं हैं। निश्चित रूप से देश को सीरिया बनने से बचाने के लिए युवाओं को आगे आना होगा। विभाजनकारी राजनीतिक को धराशायी करना होगा। तभी हम बुलंद देश के अपने सपने को साकार होता देख सकेंगे। कांग्रेस को हक है कि वह नकारात्मक राजनीति करके डूबकर उबरने का ख्वाब देखे पर देश को आज सकारात्मक राजनीति की जरूरत है। जिसके लिए षड़यंत्रों की राजनीति को उसकी हैसियत बताना जरूरी है।