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  • कांग्रेस के दामन पर ही लगे हैं दो दशकों से जारी पलायन के दाग

    कांग्रेस के दामन पर ही लगे हैं दो दशकों से जारी पलायन के दाग

    गिरीश पांडे,वरिष्ठ पत्रकार

    पब्लिक सब जानती है, मत बहाएं प्रवासी श्रमिकों को लेकर घड़ियाली आंसू

    कोरोना के इस अभूतपूर्व संकट के दौरान प्रवासी श्रमिकों एवं कामगारों को लेकर राजनीति चरम पर है। एक ओर जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुआई में लॉकडाउन के पहले चरण से ही श्रमिकों के ससम्मान और सुरक्षित वापसी के लिए हर संभव प्रयास किये जा रहें हैं वहीं कुछ दिनों से अपनी असली-नकली बसों के जरिए कांग्रेस प्रदेश इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। सपा और बसपा कमोबेश यही काम ट्वीटर पर कर रहे हैं।
    इस आरोप-प्रत्यारोप से दीगर पलायन से जुड़ी समस्या का एक और पहलू भी है। क्या वजह है कि उप्र के लोग इतनी बड़ी संख्या में घर-परिवार, नाते-रिश्तेदार को छोड़ अपनी जवानी खपाने दूसरे प्रदेशों के बड़े शहरों में जाते हैं? आजादी के इतने वर्षों के बाद भी देश की सबसे उर्वर भूमि (इंडो गंगेटिक बेल्ट) गंगा, यमुना और घाघरा जैसी बड़ी नदियों, वैविध्यपूर्ण जलवायु और प्रचुर मानव संसाधन होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर क्यों नहीं उपलब्ध हैं? इसके लिए दोषी कौन है?
    कुछ आंकड़ों से यह तस्वीर साफ हो जाएगी।
    उप्र से पिछले दो दशकों में 20 से 29 वर्ष की उम्र के लोगों का पलायन 97 फीसद बढ़ा है। यही किसी व्यक्ति की सर्वाधिक उत्पादक उम्र होती है। इसी उम्र में वह घर-परिवार, समाज, प्रदेश और देश को अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकता है। त्रासदी यह कि इसी समयावधि में उप्र से पलायन की यह दर पड़ोसी राज्य बिहार की तुलना में दोगुनी है।

    ये आंकड़े खेतीबाड़ी से जुड़ी देश की सबसे बड़ी संस्था भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के हैं। आईसीएआर द्वारा प्रकाशित रिसर्च जनरल डबलिंग फार्मर इनकम स्ट्रेटजी ऑफ उत्तर प्रदेश में इसका जिक्र है। गौर करने लायक है कि पिछले दो दशकों के दौरान प्रदेश में किनकी सत्ता थी। साथ ही आजादी के बाद प्रदेश में सर्वाधिक समय तक कौन सत्ता में रहा।

    हर कोई जानता है कि सर्वाधिक समय तक प्रदेश की सत्ता में कांग्रेस रही है और पिछले दो दशकों में अधिकांश समय तक सपा और बसपा ही सत्ता पर काबिज रहीं। फिर भी अगर यहां से लोग रोजी-रोटी की तलाश में बाहर जाते रहे तो इसका दोषी कौन?

    संबंधित दलों के प्रबुद्ध लोग जरूर इस आंकड़े से वाकिफ होंगे। अगर नहीं है तो ये उनके लिए शर्म की बात है। शर्त यह है कि अगर उनके पास शर्म बची हो। ऐसे में कोरोना के संकट के कारण महाराष्ट्र, पंजाब, दिल्ली और हरियाणा के बड़े शहरों में अपने सपनों को पूरा करने के लिए जो लोग गये हैं उनके संकट से भी जरूर वाकिफ होंगे। फिर पहले लॉकडाउन के समय से ही उनको इसका आभास क्यों नहीं हुआ? क्यों वे शुतुरमुर्ग की तरह इस संकट को बढऩे की प्रतीक्षा कर रहे थे? दिल्ली को छोड़ इनमें से सभी राज्यों में कांग्रेस सत्ता में साझीदार है। सवाल उठता है कि कांग्रेस ने तब तक का इंतजार क्यों किया जब प्रवासी सडक पर आ गये। जेठ की तपती धूप में वे भूख-प्यास से बेहाल होने लगे। सडकों पर कुचलकर वे मरने लगे। क्या कांग्रेस अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए इसी समय की प्रतीक्षा कर रही थी।

    लॉकडाउन के पहले ही चरण में राजधानी और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में लाखों की संख्या में श्रमिक सडक पर आ गये तो कांग्रेस सहित अन्य दल क्या कर रहे थे? कोटा और राजस्थान की समृद्धि में योगदान देने वाले हजारों बच्चों को उनके घर तक पहुंचाने के लिए कांग्रेस ने क्या किया? जब पानी सर के ऊपर से गुजर गया तो सोचा कि बहती गंगा में डुबकी लगा कर पुण्य कमा लिया जाये। आने वाले समय में जनता उससे ये सवाल जरूर पूछेगी।

    जहां तक भाजपा खास कर उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बात है तो वह पहले दिन से ही वे प्रवासी मजदूरों से होने वाली इस समस्या और इससे उत्पन्न समस्याओं एवं चुनौतियों के प्रति संजीदा थे। दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से अप्रैल के अंत में दिन-रात एक कर चार दिनों में चार लाख से अधिक श्रमिकों की वापसी, कोटा से 12 हजार बच्चों और प्रयागराज से 10 हजार बच्चों की वापसी इसका सबूत है। यही नहीं अब तक 1000 से अधिक ट्रेनों और बसों के जरिये करीब 22 लाख से अधिक लोगों की घर वापसी हो चुकी है। वह भी पूरी सुरक्षा और सम्मान से। हर आने वाले को उसकी दक्षता के अनुसार वह स्थानीय स्तर पर रोजी-रोटी की भी चिंता कर रहे हैं। बावजूद इसके इतनी घटिया राजनीति का कोई औचित्य नहीं।

  • इंस्पेक्टर राज से उद्योगों को राहत

    इंस्पेक्टर राज से उद्योगों को राहत

    भोपाल,5मई(प्रेस सूचना केन्द्र) उद्योगों और श्रमिकों के हित में 4 केन्द्रीय और 3 राज्य अधिनियमों में संशोधन की अधिसूचना जारी कर दी गई है। इसके साथ ही लोक सेवा प्रदाय गारंटी अधिनियम में 18 सेवाओं को एक दिन में देने का प्रावधान किया जा रहा है। मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने अधिकारियों के साथ बैठक में विभिन्न अधिनियमों में प्रस्तावित संशोधनों में बिन्दुवार चर्चा कर कोरोना के बाद उत्पन्न स्थिति में आगामी एक हजार दिनों में उद्योगों को विभिन्न रियायतें देने की जरूरत बताई थी। श्री चौहान ने आज के प्रतिस्पर्धी दौर में निवेश बढ़ाने और श्रमिकों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से श्रम कानूनों में आवश्यक संशोधन के प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए थे।

    कारखाना अधिनियम 1948 के अंतर्गत कारखाना अधिनियम 1958 की धारा 6,7,8 धारा 21 से 41 (एच), 59,67,68,79,88 एवं धारा 112 को छोड़कर सभी धाराओं से नवीन उद्योगों को छूट रहेगी। इससे अब उद्योगों को विभागीय निरीक्षणों से मुक्ति मिलेगी। उद्योग अपनी मर्जी से थर्ड पार्टी इंस्पेक्शन करा सकेंगे। रजिस्टर के संधारण में छूट मिलेगी। फेक्ट्री इंस्पेक्टर द्वारा जाँच एवं निरीक्षण से मुक्ति मिलेगी। उद्योग अपनी सुविधा में शिफ्टों में परिवर्तन कर सकेंगे।

    मध्यप्रदेश औद्योगिक संबंध अधिनियम 1960 में संशोधन के साथ इस अधिनियम के प्रावधान उद्योगों पर लागू नहीं होंगे। इससे किसी एक यूनियन से समझौते की बाध्यता समाप्त हो जायेगी। औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 में संशोधन के बाद नवीन स्थापनाओं को एक हजार दिवस तक औद्योगिक विवाद अधिनियम में अनेक प्रावधानों से छूट मिल जायेगी। संस्थान अपनी सुविधानुसार श्रमिकों को सेवा में रख सकेगा। उद्योगों द्वारा की गयी कार्यवाही के संबंध में श्रम विभाग एवं श्रम न्यायालय का हस्तक्षेप बंद हो जायेगा।

    मध्यप्रदेश औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम 1961 में संशोधन के बाद 100 श्रमिक तक नियोजित करने वाले कारखानों को अधिनियम के प्रावधानों से छूट मिल जायेगी। इससे श्रमिक निष्ठापूर्वक उत्पादन में सहयोग करेंगे। मध्यप्रदेश श्रम कल्याण निधि अधिनियम 1982 के अंतर्गत जारी किये जाने वाले अध्यादेश के बाद सभी नवीन स्थापित कारखानों को आगामी एक हजार दिवस के लिये मध्यप्रदेश श्रम कल्याण मण्डल को प्रतिवर्ष प्रति श्रमिक 80 रूपये के अभिदाय के प्रदाय से छूट मिल जायेगी। इसके साथ ही वार्षिक रिटर्न से भी छूट मिलेगी।

    लोक सेवा प्रदाय गारंटी अधिनियम 2010 के अंतर्गत जारी अधिसूचना के अनुसार श्रम विभाग की 18 सेवाओं को पहले तीस दिन में देने का प्रावधान था। अब इन सेवाओं को एक दिन में देने का प्रावधान किया गया है। कारखाना अधिनियम 1948, दुकान एवं स्थापना अधिनियम 1958, ठेका श्रम अधिनियम 1970, अंतर्राज्यीय प्रवासी कर्मकार अधिनियम 1979, मोटर परिवहन कर्मकार अधिनियम 1961, मध्यप्रदेश भवन एवं अन्य संनिर्माण कर्मकार अधिनियम 1996 और बीड़ी एवं सिगार कामगार (नियोजन की शर्ते) अधिनियम 1966 में पंजीयन के लिये ऑनलाइन आवेदन करने पर एक दिन में ही ऑनलाइन पंजीयन मिल जाएगा। इससे पंजीयन के लिये बेवजह कार्यालयों के चक्कर काटने से मुक्ति मिलेगी।

    दुकान एवं स्थापना अधिनियम 1958 में संशोधन के बाद कोई भी दुकान एवं स्थापना सुबह 6 से रात 12 बजे तक खुली रह सकेगी। इससे दुकानदारों के साथ ही ग्राहकों को भी राहत मिलेगी। पचास से कम श्रमिकों को नियोजित करने वाले स्थापनाओं में श्रम आयुक्त की अनुमति के बाद ही निरीक्षण किया जा सकेगा। निरीक्षण में पारदर्शिता होगी। कारखानों को दो रिटर्न के स्थान पर एक ही रिटर्न भरना पड़ेगा।

    ठेका श्रमिक अधिनियम 1970 में संशोधन के बाद ठेकेदारों को 20 के स्थान पर 50 श्रमिक नियोजित करने पर ही पंजीयन की बाध्यता होगी। 50 से कम श्रमिक नियोजित करने वाले ठेकेदार बिना पंजीयन के कार्य कर सकेंगे। इस अधिनियम में संशोधन के लिये प्रस्ताव केन्द्र सरकार को भेजा गया है।

    कारखाना अधिनियम के अंतर्गत कारखाने की परिभाषा में विद्युत शक्ति के साथ 10 के स्थान पर 20 श्रमिक और बगैर विद्युत के 20 के स्थान पर 40 श्रमिक किया गया है। इस संशोधन का प्रस्ताव भी केन्द्र शासन को भेजा गया है। इससे छोटे उद्योगों को कारखाना अधिनियम के पंजीयन से मुक्ति मिलेगी। इसके पूर्व 13 केन्द्रीय एवं 4 राज्य कानूनों में आवश्यक श्रम संशोधन किये जा चुके हैं।