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  • दमोह में बिजली सुधारों के लिए 95 करोड़ मंजूर

    दमोह में बिजली सुधारों के लिए 95 करोड़ मंजूर

    भोपाल,28 मई( प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने कहा है कि दमोह जिले की विद्युत अधो-संरचना को सुदृढ़ करने एवं विद्युत हानियों को कम करने के उद्देश्य से 95 करोड़ रूपये स्वीकृत किये गए हैं। इसमें से केन्द्र सरकार द्वारा रिवेम्पड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम के प्रथम चरण में 49 करोड़ रूपये और राज्य सरकार द्वारा 46 करोड़ रूपये स्वीकृत किये गए हैं।

    स्वीकृत कार्यों में 220/132 के.व्ही. अति उच्च दाब पॉवर ट्रांसफार्मर की क्षमता वृद्धि, 220/132 के.व्ही. अतिरिक्त अति उच्च दाब पॉवर ट्रांसफार्मर स्थापना, 2 नवीन 33/11 के.व्ही. उप केंद्र निर्माण, वोल्टेज व्यवस्था में सुधार के लिए 28 स्थान पर कैपेसिटर बैंक स्थापना, 48 उच्च दाब फीडरों का विभक्तिकरण कार्य, 975 वितरण ट्रांसफार्मर स्थापना, 3308 किलोमीटर निम्न दाब लाइनों का केबलिंग कार्य, 396 उच्च दाब फीडरों का विभक्तिकरण और कंडक्टर क्षमता वृद्धि के कार्य शामिल हैं। इससे दमोह जिले की लगभग 13 लाख की जनसंख्या लाभान्वित होगी। साथ ही आगामी 10 वर्षों की विद्युत माँग की सफलतापूर्वक पूर्ति हो सकेगी।

  • इस कंबल परेड से सुधार की उम्मीद बेकार

    इस कंबल परेड से सुधार की उम्मीद बेकार

    रैगिंग की भाषा में बोला जाए तो इन दिनों मुख्यमंत्री कमलनाथ की कंबल परेड चल रही है। कांग्रेस के विधायकों ने सरकार की जो धुलाई की है उससे पार्टी के बड़े बड़े दिग्गजों की सांसें भी फूल गईं हैं। भाजपा तो अंधे के हाथों बटेर लग जाने से प्रसन्न है। कमलनाथ सरकार जितने दिनों तक इस बगावत को काबू में नहीं कर पाएगी उतने दिनों तक ये धुलाई जारी रहेगी। मुख्यमंत्री कमलनाथ कह रहे हैं कि हम सदन में पहले भी बहुमत साबित कर चुके हैं लेकिन अब ये हालत हो गई है कि कोई भी ऐरागैरा आकर बहुमत साबित करने का चैलेंज देने लग जाता है। दरअसल ये कमलनाथ सरकार की अलोकप्रियता का उद्घोष है जो वे स्वयं कर रहे हैं। सलाहकारों की बात मानकर उन्होंने विधायकों को कथित तौर पर बंधक बनाए रखने के मुद्दे पर पुलिस में प्राथमिकी दर्ज नहीं कराई है। यदि वे ऐसा कर देते तो साफ उजागर हो जाता कि उनकी सरकार अल्पमत में आ गई है। आज दिग्विजय सिंह ने जिस तरह बैंगलौर जाकर बागी विधायकों से मिलने के लिए धरना दिया उसे देखकर कहा जा सकता है कि बगावत के मैनेजर भाजपा के रणनीतिकारों की सलाह पर नहीं चल रहे हैं। दिग्विजय सिंह को विधायकों से न मिलने देने का फैसला बड़ा बचकाना था। यही वजह है कि दिग्विजय सिंह विधायकों को बंधक बनाए रखने का शोर मचा रहे हैं। उनका कहना है कि वे विधायकों को बंधक बनाए रखने के मुद्दे पर कर्नाटक हाईकोर्ट जाएंगे। कमलनाथ सरकार के तमाम रणनीतिकार और अदालत में पैरवी कर रहे वकील पुष्पेन्द्र दुबे भी कह रहे हैं कि विधायकों को बंधक बनाकर रखा गया है। यदि आज दिग्विजय सिंह को विधायकों से मिलने का मौका दे दिया जाता तो खुद ब खुद साबित हो जाता कि विधायक बंधक नहीं हैं। कैमरों के सामने सार्वजनिक मुलाकात में विधायक हाथ जोड़कर दिग्विजय सिंह से वे सभी बातें कह सकते थे जो वे पहले अपने वीडियो जारी करते वक्त कह चुके हैं। वे इस मुलाकात के मंच का उपयोग करके सारी दुनिया को सुना सकते थे कि वे कमलनाथ सरकार के साथ नहीं हैं,जाहिर है कि विधानसभा के मंच से भी ज्यादा बड़े कैनवास पर कमलनाथ सरकार की कंबल परेड बेहतरीन तरीके से की जा सकती थी। ये तो आकलन हम लोग बाहर बैठकर लगा सकते हैं कि बगावत के रणनीतिकार गलती कर रहे हैं लेकिन हमारा आकलन हमेशा सही नहीं हो सकता। जिन विधायकों ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में बहादुरी भरा फैसला लिया और सरकार को नसीहत देने का कदम आगे बढ़ाया निश्चित रूप वे किसी न किसी रणनीति पर काम जरूर कर रहे हैं। सिंधिया समर्थक विधायक आज भी कह रहे हैं कि महाराज सिंधिया जो कहेंगे हम वही करेंगे। वे दरअसल देख चुके हैं कि जिन आर्थिक सुधारों से ज्योतिरादित्य प्रदेश का काया कल्प करना चाहते थे उन्हें कमलनाथ की पुरातनपंथी सरकार लागू नहीं कर रही थी। गोस्वामी तुलसी दास कह गए हैं कि मुखिया मुख सो चाहिए खानपान को एक पाले पौसे सकल अंग तुलसी सहित विवेक। कमलनाथ इस कसौटी पर फिसड्डी साबित हुए हैं। उन्होंने प्रदेश के विधायकों, जन प्रतिनिधियों, पत्रकारों, नागरिकों से दूरी बनाई और मनमाने ढंग से बजट खर्च करने का अभियान चलाया। जनता को हित वंचित करके अपने सहयोगियों पर बेइंतहा संसाधन लुटाए और अपनी स्थिति मजबूत की। उम्र के असर से उनकी दृष्टि कमजोर हो गई है। उन्होंने अकेले छिंदवाड़ा में लगभग तेरह हजार करोड़ के निर्माण कार्य स्वीकृत करवा लिए और अन्य विधानसभा क्षेत्रों को रीता छोड़ दिया। यही वजह है कि साल भर से चेताने के बावजूद जब कमलनाथ जी की आदतें नहीं बदलीं तो उन्होंने विद्रोह जैसा फैसला किया। आजादी की लड़ाई में भी जब अंग्रेजों ने लूट का शोषणवादी तंत्र चलाया था तब भारत में विद्रोह की चिंगारी भड़की और दावानल बनी थी। आज के हिंदुस्तान में कमलनाथ की कूढ़ मगज सोच को आखिर कैसे झेला जा सकता था। जिस इंस्पेक्टर राज को नरसिम्हाराव की सरकार के कार्यकाल में डाक्टर मनमोहन सिंह दफन कर चुके थे उसे कमलनाथ दोबारा थोपने में जुटे थे। शुद्ध के लिए युद्ध के नाम पर व्यापारियों का शोषण और लूट का जो दुष्चक्र कमलनाथ सरकार ने चलाया उससे प्रदेश भर में जन आक्रोश भड़क गया था। तबादलों के माध्यम से पोस्टिंग का खुला खेल जिस तरह से साल भर में देखा गया उसने प्रदेश में अराजकता की स्थितियां निर्मित कर दीं हैं। बढ़ते अपराधों ने प्रदेश की शांति व्यवस्था भंग कर दी है। इसके बावजूद कमलनाथ दंड और दमन का दुष्चक्र चलाने में जुटे हैं। इतनी तगड़ी धुलाई के बाद भी उनकी भाषा शैली नहीं बदली है। पिछले दिनों जब उनसे पूछा गया कि ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा है कि कर्मचारियों और नागरिको से किए वादे पूरे नहीं हुए तो वे सड़क पर उतर जाएंगे तो कमलनाथ ने लगभग दुत्कारते हुए कहा, तो उतर जाएं। इस तरह की भाषा शैली और रवैये के बाद भी यदि कांग्रेस के विधायक चुप थे तो ये उनकी भलमन साहत थी। भाजपा में तो इस तरह के बर्ताव को कैडर की वजह से झेला जा सकता है लेकि कांग्रेस में जहां लीडरशिप आधारित संगठन हो वहां इस तरह के तुर्रमखां को कब तक बर्दाश्त किया जा सकता था। आज सारा दारोमदार ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों के रुख पर निर्भर कर रहा है। यदि वे अपने फैसले पर कायम रहते हैं तो कोई वजह नहीं कि कमलनाथ सत्ता से अपदस्त कर दिए जाएंगे। भाजपा के साथ शामिल होकर ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रदेश को एक अग्रगामी विकास की दिशा दे सकते हैं। लेकिन अब तक ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है। कांग्रेस के भीतर की ये बगावत यदि सफल हो जाती है तो ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रदेश के कद्दावर नेता के रूप में उभर जाएंगे। महल से अदावट रखने वाले भाजपाई ये नहीं चाहते। जाहिर है कि प्रदेश की आधुनिक आवश्यकताओं की कसौटी पर फेल हो चुके शिवराज सिंह चौहान भी नहीं चाहते कि भाजपा में कोई उनसे बड़ा लीडर बनकर उभरे। इसके बाद सत्ता की हांडी टूटने की आस लगाए बैठे नरेन्द्र सिंह तोमर, कैलाश विजयवर्गीय, नरोत्तम मिश्रा, भूपेन्द्र सिंह, गोपाल भार्गव भी नहीं चाहते कि गोविंद राजपूत और तुलसी सिलावट जैसे धाकड नेता उनके सामने चुनौती के रूप में उभरें। इन हालात में भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व को हस्तक्षेप करना पड़ेगा। यदि भाजपा का अंदरूनी महाभारत थम जाता है और ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा के नेताओं का साथ पाकर इस बगावत को सफल बना लेते हैं तो फिर प्रदेश को अबकी बार भाजपा और कांग्रेस की संकर सरकार मिलेगी जो प्रदेश के हितरक्षण के लिए नए कीर्तिमान स्थापित करेगी। ज्योतिरादित्य सिंधिया की बुआ वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे सिंधिया संगठन को किस सीमा तक बांधने में सफल होती हैं बगावत की सफलता उसी से आकी जाएगी। कमलनाथ तो इस बगावत को कुचलने की पूरी तैयारी कर रहे हैं। फिलहाल उन्हें सत्ता जाने की संभावनाओं से डरे हुए कांग्रेस विधायकों का समर्थन मिल रहा है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से यदि पलड़ा भाजपा के पक्ष में झुकता है तो कमलनाथ सरकार का अल्पमत संकट और भी ज्यादा गहरा हो जाएगा। देखना होगा कि ये बगावत सफल होती है या फिर आत्मसमर्पण की चौखट चूमती है। दोनों ही स्थितियों में कमलनाथ इस कंबल परेड से कोई सबक लेंगे इसकी संभावना फिलहाल तो नहीं दिखती।

  • सिंधिया से ठलुए कांग्रेसी और बोगस भाजपाई दोनों खफा

    सिंधिया से ठलुए कांग्रेसी और बोगस भाजपाई दोनों खफा

    भोपाल,14 मार्च,(प्रेस सूचना केन्द्र)। मोदी अमित शाह की जोड़ी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्यसभा में भेजने का फैसला लेकर भारतीय राजनीति के परंपरावादी युग का अंत कर दिया है। इसके साथ ही चंद मुद्दों के इर्द गिर्द चकरघिन्नी बनी राजनीति की इबारतें भी वाशिंग मशीन के ड्रायर में रखे गीले कपड़ों के समान सींलन मुक्त होने लगीं हैं। इस एक अकेले मूव ने न केवल कांग्रेस बल्कि भारतीय जनता पार्टी के भी पिछलग्गू राजनेताओं को हतप्रभ कर दिया है। स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे ने कांग्रेसी राजनीति के शीर्ष दिनों में भी कर्मठ कार्यकर्ताओं की फौज जुटाकर जो संगठन खड़ा किया था वह आज सिफारिशी भाजपाईयों से भर गया है। चौदह सालों के शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में जो भाजपा चमचों की भी़ड़ बनकर रह गई थी वह सिंधिया के आगमन से उत्साहित तो है लेकिन उसमें भी भविष्य को लेकर संशय के स्वर उभर रहे हैं।

    लगभग बीस सालों तक कांग्रेस की राजनीति को शीर्ष मंच पर करीब से देखने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया का राजनीतिक प्रशिक्षण बहुत लंबा रहा है। बचपन से राजघराने में जन्म लेने के बाद आधुनिक राजनीति के पुरोधा स्वर्गीय माधवराव सिंधिया की सफल राजनीति को करीब से देखने वाले ज्योतिरादित्य को जनसेवा का पाठ अपने खानदान से मिला है। उनकी दादी स्वर्गीय विजयराजे सिंधिया ने जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी में बदले एक नए राजनीतिक दल को अपने राजघराने की विरासत से पाला पोसा था। वीर शिवाजी जिस तरह आधुनिक महाराष्ट्र की राजनीति की पहचान रहे हैं। मध्यप्रदेश में यही पहचान आज भी बालाजी बाजीराव पेशवा द्वितीय की कर्मठता से है। परम प्रतापी राजा भोज द्वितीय के शासन की जो सुगंध मध्यप्रदेश के स्मृतिपटल पर आज भी अंकित है उसे चिरस्थायी बनाने का काम बालाजी बाजीराव पेशवा ने किया था। पेशवा ने ही ग्वालियर में सिंधिया वंशजों को सल्तनत सौंपी थी। इसके बाद सिंधिया घराने के कई राजाओं ने उस राजनीति को आगे बढ़ाया।

    राजमाता विजयाराजे सिंधिया इस राजनीतिक गौरव की मशाल लेकर ही राजनीति में आईं थीं। उनके ऐश्वर्य और विरासत से ईर्ष्या करने वाली श्रीमती इंदिरा गांधी ने सिंधिया राजघराने को मटियामेट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लोकतंत्र और स्वाधीनता की दुहाई देकर अंग्रेजों की पिछलग्गू कांग्रेस का नेतृत्व करते हुए श्रीमती गांधी ने भारतीय राजनीति के तमाम ठिए ठिकानों को ध्वस्त करने का अभियान चलाया था। उनके कुछ सिपाहसालारों ने जिस तरह की कहानियां गढ़ीं उस पर अमल करते श्रीमती इंदिरागांधी ने सिंधिया सल्तनत को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। एसपी बनाकर भेजे गए स्वर्गीय अयोध्यानाथ पाठक को लगातार सात गैलेन्ट्री अवार्ड इसी सोच का सबूत हैं। इस दमन चक्र का ही नतीजा था कि चंबल घाटी डकैतों के आतंक से थर्राती रही। श्रीमती विजयाराजे सिंधिया के निधन के बाद भी भारतीय जनता पार्टी ने चंबल में सामाजिक न्याय की बड़ी लड़ाई लड़ी। उमा भारती के नेतृत्व में बनी भाजपा की सरकार तक ये परंपरा जारी रही। शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा ने डकैती उन्मूलन के नाम पर खेती को सिंचित करने का जो अभियान चलाया उससे न केवल चंबल बल्कि धार झाबुआ के आदिवासी अंचल में भी अपराधों का ग्राफ गिरा था।

    इस सबके बावजूद मध्यप्रदेश की राजनीति में आर्थिक विषयों के जानकार नेतृत्व की जरूरत महसूस की जाती रही है। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपनी राजनीतिक पारी शुरु करने से पहले आधुनिक अर्थशास्त्र की जो तैयारी की वह अब तक चलती रही राजनीति में फिट नहीं बैठती है। कांग्रेस की राजनीति तो इसके लिए बिल्कुल ही बोगस है। कांग्रेस गरीबी को संरक्षित करने की जिस राजनीति के तहत समाज को बांटने की विचारधारा लेकर चलती है उससे मध्यप्रदेश कभी गुजरात जैसा या उससे भी आधुनिक राज्य नहीं बन सकता है। दिग्विजय सिंह का बंटाढ़ार शासनकाल रहा हो या फिर शिवराज सिंह चौहान का कर्ज लेकर खैरात बांटने वाला दीर्घ शासनकाल सभी में प्रदेश की जनता की भरपूर उपेक्षा की गई। योजनाओं के नाम पर खैरात बांटकर वोट खरीदने की इस शैली का अंत कभी न कभी तो होना ही था। ये पहल कौन करता। कमलनाथ को उद्योगपति के रूप में प्रचारित करने वाला वर्ग राजनीति की इसी पाठशाला से आता है। बैंकों से कर्ज लेकर घाटे के उद्योग स्थापित करने वाली फर्जी उद्योगपतियों की लाबी इस राजनीति की सूत्रधार है। इस राजनीति से देश को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकानामी बना पाना किसी भी तरह संभव नहीं है।

    देश में धनाड्य राजनीति की इस उड़ान का पायलट कोई आर्थिक विषयों का जानकार ही हो सकता है। भाजपा के प्रवक्ता के रूप में काम करने वाले डायचे बैंक के पूर्व प्रबंध निदेशक जफर इस्लाम ने ज्योतिरादित्य सिंधिया में वे क्षमताएं देखीं और उन्हें भाजपा की राजनीति की तरफ मोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। भाजपा को उनकी दादी राजमाता सिंधिया ने सिंधिया सल्तनत की बागडोर से सींचा था। उनकी बुआएं श्रीमती यशोधरा राजे सिंधिया और राजस्थान की मुख्यमंत्री रहीं वसुंधरा राजे सिंधिया ने इस विरासत को सहेजकर रखा था। यशोधरा जी जब मध्यप्रदेश की उद्योगमंत्री थीं तो उन्होंने विश्व भर में फैले औद्योगिक घरानों को प्रदेश से जोड़ने का सफल अभियान चलाया था। शिवराज सिंह चौहान को संरक्षण देने वाली लाबी को ये पसंद नहीं था और उन्होंने इस अभियान को धराशायी कर दिया।

    कांग्रेस हो या भाजपा दोनों में इंदिरागांधी के बैंकों के राष्ट्रीयकरण वाले अभियान से लूट करने वाले दलालों का वर्चस्व रहा है। इस लाबी को कमलनाथ अनुकूल लगते हैं लेकिन ज्योतिरादित्य खटकते हैं। कांग्रेस की सरकार बनाने में मध्यभारत से लगभग चौबीस विधायकों का साथ रहा है। ज्योतिरादित्य सिंधिया से जुड़े यही विधायक और पूर्व मंत्री आज कमलनाथ सरकार के पतन की वजह बन रहे हैं। मध्यप्रदेश को यदि देश की नई अर्थनीति के साथ कदमताल करना है तो उसे कमलनाथ सरकार से मुक्ति पाना ही होगा। कमलनाथ सरकार के पतन के बाद जो भी नेतृत्व उभरेगा उसमें सिंधिया का असर जरूर रहेगा। ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्यसभा में भेजने के बाद भाजपा चाहे नरेन्द्र सिंह तोमर को प्रदेश की कमान थमाए या फिर उमा भारती या कैलाश विजयवर्गीय को ,शिवराज, नरोत्तम मिश्रा या बीडी शर्मा कोई भी हो ये लीडरशिप प्रदेश में मोदी सरकार की नीतियों को लागू करने में सफल साबित होगी।

    जाहिर सी बात है कि कर्ज आधारित अर्थव्यवस्था की राजनीति की पैरवी करने वाले गमले में उगे राजनेता प्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनता की अपेक्षाओं को अब तक पूरा नहीं कर पाए हैं। कमलनाथ तो छिंदवाड़ा के ही मुख्यमंत्री बनकर रह गए। उनके कार्यकाल में सरकारी क्षेत्र को जिस तरह लूट का अड़्डा बना दिया गया उससे जनता में भारी निराशा है। शिवराज सरकार की सारी कल्याणकारी योजनाओं को बंद करके कमलनाथ जिस सस्ती बिजली का ढिंडोरा पीट रहे हैं वह जनता के लिए मंहगा सौदा है। शिवराज सिंह चौहान की खैराती राजनीति की तरह ये भी मीठा जहर बनकर जनता को लुभा रहा है। जाहिर है कि ऐसे में आर्थिक विकास की मूलभूत राजनीति करने वालों का वर्चस्व बढ़ना इन ठलुओं और बोगस राजनेताओं को भला कैसे रुचेगा। वे भले ही खफा होते रहें लेकिन इतना तो तय है कि मध्यप्रदेश ने एक नई राजनीति की दिशा में अपने कदम बढ़ा लिये हैं। दिग्गी के चमचे इसे गद्दारी कहें या शिवराज विभीषण की उपमा दें लेकिन बदलाव की ये बयार फिलहाल थमने वाली नहीं है।

  • विचारधारा की कंगाली से डूबती कांग्रेस

    विचारधारा की कंगाली से डूबती कांग्रेस

    भोपाल,12 मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)। ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आने और फिर राज्य सभा भेजे जाने की तैयारी ने देश के तमाम राजनैतिक पंडितों को चकित कर दिया है। अपने समर्थक विधायको के साथ कांग्रेस छोड़ने से मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार संकट में घिर गई है। सरकार को पतन से बचाने के लिए जो डैमेज कंट्रोल के प्रयास किए जा रहे हैं उन पर गौर करें तो साफ तौर पर यही उभरता है कि कांग्रेस ने अपनी हार मान ली है और वह एक लूजर की तरह कुतर्क गढ़ने का प्रयास कर रही है।

    बैंगलोर के रिसार्ट में ज्योतिरादित्य सिंधिया के जिन विधायकों को प्रशिक्षण सत्र में रखा गया है वहां जाकर सरकार बचाने की गुहार लगाने पहुंचे कमलनाथ कैबिनेट के सदस्य जीतू पटवारी ने एक पुलिस अधिकारी से बदतमीजी शुरु कर दी। प्रायोजित कैमरे के सामने की गई इस बहस को जीतू पटवारी से दुर्व्यवहार करना बताया गया। यहां प्रेस वार्ता में दिग्विजय सिंह ने कहा कि विधायकों को बंदी बनाकर रखा गया है ये लोकतंत्र की हत्या है। जबकि उनके कानूनी सहयोगी विवेक तन्खा ने कहा कि विधायकों के अपहरण को लेकर उनकी पार्टी अदालत जाएगी।

    अपना सबसे बड़ा स्तंभ भरभराकर गिर जाने पर सफाई देते राहुल गांधी ने कहा कि ज्योतिरादित्य मेरे साथ पढ़े हैं मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूं। वे अपने भविष्य को लेकर चिंतित हो गए थे इसलिए उन्होंने भाजपा में जाने जैसा कदम उठाया। वहां न तो उन्हें आदर मिलेगा और न ही वे आत्मसम्मान बरकरार रख पाएंगे।

    राजनीति की इस चौपड़ पर भाजपा ने कांग्रेस को न केवल शह दी बल्कि एमपी में उसकी सरकार की नींव खोदकर उसे मात भी दे दी है। जिस विचारधारा की बात राहुल गांधी कह रहे हैं उसे देश की जनता ने बहुत पहले ही छोड़ दिया था। तभी तो देश के कई राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं और केन्द्र में लगातार दूसरी बार जनता ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को दूसरी बार सत्ता में भेजा है। जाहिर है कि उसी कड़ी में ज्योतिरादित्य का कांग्रेस छोड़ना विचारधारा के इसी पतन का उद्घोष बन गया है।

    कांग्रेस की जिस विचारधारा की बात राहुल गांधी कर रहे हैं उसे तो पीवी नरसिम्हाराव की सरकार ने 1991 में ही छोड़ दिया था। तब तत्कालीन वित्तमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने जिस मुक्त बाजार वाली अर्थव्यवस्था को हरी झंडी दिखाई थी उसने कांग्रेस की खैरात बांटने वाली नीति को समाप्त कर दिया था। इंस्पेक्टर राज की समाप्ति की घोषणा करके उन्होंने ये तो बता दिया था कि देश अब नई दिशा में चल पड़ा है। देश के लोगों को पूंजी बनाने में अपना योगदान देना होगा। खैरात के नाम पर देश के गले में मुर्दा बनकर लटकने का दौर खत्म हो गया है। ये बात जरूर है कि कांग्रेस की पुरानी साम्यवादी, समाजवादी छाया वाली मानसिकता,अवसरवाद और अंग्रेजों की गुलामी भरी चापलूसी की सोच की कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार सार्वजनिक रूप से निंदा नहीं की थी। उन्होंने सिर्फ यही कहा कि आने वाले भारत के निर्माण के लिए हमें अब नए मार्ग पर चलना होगा।

    इसके विपरीत राहुल गांधी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के फैसले पर सवालिया निशान लगाते समय उनके उन समर्थक विधायकों मंत्रियों को भी दोषी ठहरा दिया जिन्होंने कांग्रेस की सोच को ठुकराने का फैसला लिया। ऐसा कहकर वे देश के उन करोड़ों लोगों की मानसिकता को भी दोषी ठहरा रहे हैं जिन्होंने भाजपा को सत्ता में भेजकर देश चलाने का अवसर दिया है। एक अपरिपक्व नेता की तरह बचकानी भूमिका निभाते राहुल गांधी ने तो लोकसभा चुनावों के दोरान बदतमीजी की सीमाएं लांघ डालीं थी। उनकी ही शैली की नकल करते हुए कमलनाथ ने मध्यप्रदेश में विधायकों, अफसरों और नागरिकों को दोषी ठहराने की मुहिम चलाई थी। शुद्ध के लिए युद्ध के नाम पर व्यापारियों को दोषी ठहराना, अफसरों के तबादले करके पोस्टिंग में मोटा चंदा लेकर उन्हें अपराधी साबित करना, पत्रकारों को दूसरा धंधा करने की सलाह देकर पूरी पत्रकारिता को कटघरे में खड़ा करना, माफिया के विरुद्ध संग्राम का शोर मचाकर हर उद्यमी को अपराधी बताने जैसी हरकतें कांग्रेस की उस मूल विचारधारा का ही हिस्सा रहीं हैं जिस पर आजादी के बाद से कांग्रेस चलती रही है। गौर से देखें तो अंग्रेजों के विरुद्ध जब देश के सामंतों जमींदारों और राजाओं ने स्वाधीनता संग्राम चलाया था तब अंग्रेजों ने शाक एब्जार्बर के रूप में कांग्रेस को खड़ा किया था। इसी कांग्रेस के हाथों देश की सत्ता सौंपकर अंग्रेजों ने परोक्ष तौर पर सामंतों और राजाओं पर निशाना साधा। बाद में इंदिरागांधी ने रोटी कपड़ा और मकान का स्वप्न दिखाकर मिलावटियों और जमाखोरों पर निशाना लगाया। अस्सी के दशक की उम्र पहुंचे कमलनाथ आज भी उसी फाम्रूले को दुहराकर शासन चलाना चाह रहे थे। जिसे देश और प्रदेश के तमाम लोगों ने ठुकरा दिया है।एमपी के विधायकों और मंत्रियों ने तो खुलकर इस विचारधारा का विरोध किया है। इसके बावजूद राहुल गांधी इसे सही बताकर ज्योतिरादित्य को गलत साबित करने पर तुले हुए हैं।

    देश की आम जनता को विविधता के नाम पर जातियों, वर्गों,संप्रदायों में बांटकर देखने की सोच आज के कारोबारी दौर में कैसे जारी रखी जा सकती है। इसके बावजूद कई बार असफल साबित हो चुकी इस सोच को कांग्रेस जबरिया देश पर लादना चाह रही है।

    राहुल गांधी और उनका दंभ एक पल भी विचार करने तैयार नहीं हैं कि एक साथ देश का बड़ा वर्ग उन्हें क्यों धक्के मारकर सत्ता से बाहर कर रहा है। दरअसल कांग्रेस की विचारधारा मौलिक नहीं थी बल्कि वह समय काल और परिस्थितियों की उपज थी। अंग्रेजों ने कांग्रेस को जिस मकसद के लिए खड़ा किया उसके तहत उसे बड़े लोगों पर हमला करके उन्हें शोषक साबित करना था और गरीब को सहलाकर उसका समर्थन हासिल करना था। इसके लिए जरूरी था कि समर्थन देने वाला बहुसंख्यक वर्ग गरीब ही रहे ताकि ज्यादा से ज्यादा वोट हासिल किए जा सकें। पूंजीवाद ने इस विचारधारा को बदल दिया है। ज्योतिरादित्य का पाली बदलने का वर्तमान फैसला इसी सोच की देन है। देश को गरीबी के दलदल से बाहर निकालने वाले तमाम विचारक आज मोदी सरकार की सोच से सहमत हैं। इसलिए ज्योतिरादित्य सिंधिया के फैसले पर नहीं बल्कि राहुल गांधी की सोच पर आश्चर्य करने की जरूरत है। वे गहरी जड़ता के शिकार हैं और बंदरिया के मृत बच्चे की तरह मर चुकी सोच को गले लगाकर बैठ गये हैं। राहुल सोनिया कांग्रेस की यही जड़ता कांग्रेस के पतन की वजह बन गई है।इसी सोच पर चल रही कमलनाथ सरकार आज अल्पमत में आ चुकी है शेष कांग्रेसी राज्यों में भी यही सोच सरकारों के पतन की वजह बनने जा रही है ये आने वाले समय में साफ नजर आने लगेगा।