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  • लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार और जरूरत मंदों को भोजन कराने वाले वंदनीय

    लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार और जरूरत मंदों को भोजन कराने वाले वंदनीय


    मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव ने किया जनसंवेदना संस्था की स्मारिका का विमोचन

    भोपाल, 28 सितंबर। गरीब परिवारों के मृत परिजनों और लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करने वाली सामाजिक संस्था जन संवेदना के स्मारिका अंक(मानव सेवा ही माधव सेवा) का विमोचन आज मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव ने अपने कर कमलों से किया। भारतीय जनता पार्टी मुख्यालय में आयोजित एक संक्षिप्त समारोह में उन्होंने जरूरतमंदों की सहायता को उत्कृष्ट समाजसेवा बताया।


    संस्था के संस्थापक अध्यक्ष राधेश्याम अग्रवाल ने बताया कि संस्था के सहयोगियों और हितग्राहियों के योगदान को याद करने के लिए हर साल इस स्मारिका का प्रकाशन किया जाता है। मानवसेवा के पुनीत कार्य के अक्षयपात्र में अपना योगदान देने वाले समाजसेवियों को देख सुनकर आम नागरिकों के मन में भी अपने सामाजिक दायित्वों का बोध हो सके इस उद्देश्य से संस्था ने अपनी वेवसाईट भी बनाई है। इसके बावजूद प्रमाणिक दस्तावेज के रूप में हम दानदाताओं और हितग्राहियों के नाम समाज के सामने लाते हैं।


    श्री अग्रवाल ने बताया कि माननीय मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव ने कहा कि उन्हें संस्था के पुनीत कार्यों की जानकारी पहले से है। इस तरह के सामाजिक कार्य ही वसुधैव कुटुंबकम की भावना को मजबूती प्रदान करते हैं। भारतीय जनता पार्टी मुख्यालय में आयोजित मानव सेवा ही माधव सेवा कार्यक्रम में उन्होंने संस्था की स्मारिका को आम नागरिकों के लिए लोकार्पित किया। इस दौरान भोपाल मध्य विधानसभा क्षेत्र के विधायक और भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश महामंत्री भगवान दास सबनानी,भाजपा मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल,एवं हिमांशु अग्रवाल भी मौजूद थे।


    संस्था की ओर से पिछले सोलह सालों से लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार किया जा रहा है। पुलिस को प्राप्त होने वाली लावारिस लाशें हों या फिर गरीबी से जूझते बेसहारा परिवारों के परिजनों का अंतिम संस्कार हो,संस्था आगे बढ़कर इस पुनीत कार्य को अपने हाथों से संपन्न कराती है। बीमारी से जूझते गरीब परिवारों और जरूरत मंदों को भी संस्था की ओर से भोजन कराया जाता है। आमतौर पर भोजन वितरण का कार्य एम्स या राजधानी के अन्य असपतालों में इलाज के लिए आने वाले मरीजों के परिजनों के बीच किया जाता है।


    उन्होंने बताया कि राजधानी के अलावा प्रदेश के अन्य स्थानों के लोग सहयोग देकर इस पुनीत कार्य की ज्योति जलाए हुए हैं। विदेशों में नौकरियां करने वाले युवा और वहां बस चुके बुजुर्ग भी अपने परिजनों की याद में समाजसेवा करके अपना जन्म सार्थक करने का अवसर तलाशते हैं। संस्था ने समाजसेवा के इस कार्य को पूरी पारदर्शिता से करने के लिए दान राशि को आन लाईन प्राप्त करने की सुविधा विकसित की है। इस कार्य को स्थानीय पुलिस के रिकार्ड के अनुसार ही संपन्न कराया जाता है। संस्था की विश्वसनीयता बनी रहे इसके लिए डाक्टर्स क्लब परिसर स्थित जनसंवेदना के कार्यालय में समाजसेवियों से योगदान लिया जाता है। संस्था के भवन निर्माण और शव वाहन व एंबुलेंस सेवा के लिए भी विभिन्न संगठनों और नागरिकों की ओर से योगदान दिया जाता है।

  • बेसहारा बच्चों और घुमंतू आवासहीनों को भोजन कंबल का सहारा बनी जनसंवेदना

    बेसहारा बच्चों और घुमंतू आवासहीनों को भोजन कंबल का सहारा बनी जनसंवेदना


    भोपाल, 14 जनवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मकर संक्रांति के अवसर पर आज बेसहारा और लावारिसों की सेवा में जुटे जनसंवेदना संस्था परिवार के सदस्यों ने आवासहीन बच्चों और नागरिकों को भोजन,मिठाई और कंबल बांटकर उनके चेहरों पर मुस्कान बिखेरी। इस आयोजन को मानवता संरक्षण ट्रस्ट ने अपने मार्गदर्शन में संपन्न कराया ।


    मानवता संरक्षक ट्रस्ट की सचिव अधिवक्ता विनीता तोमर ने आज जनसंवेदना परिवार को सिंगार चोली पुल के नीचे अस्थायी तौर पर रह रहे आवासहीन परिवारों और बेसहारा घूमंतू बच्चों की जानकारी दी थी। मानवता संरक्षक ट्रस्ट इन बच्चों के पुनर्वास, शिक्षा और उन्हें मूलभूत जनरूरतें पूरी करने के लिए अभियान चला रही है। विनीता तोमर ने बताया कि ये बच्चे उचित देखभाल के अभाव में आपराधिक गतिविधियों में सक्रिय होते जा रहे थे। ये बच्चे स्कूली शिक्षा से भी वंचित हैं इसलिए ट्रस्ट के सदस्यों ने इन बच्चों में आधारभूत ज्ञानबोध जगाने की मुहिम चला रखी है।

    जनसंवेदना संस्था के राधेश्याम अग्रवाल ने आवासहीनों को ठंड से बचाने के लिए कंबल वितरित किए.


    मकर संक्रांति के त्यौहार पर ये बच्चे और उनके अभिभावक स्वयं को समाज से कटा हुआ महसूस न करें इसके लिए ट्रस्ट के सदस्यों ने जनसंवेदना संस्था के अध्यक्ष राधेश्याम अग्रवाल से आग्रह किया था कि हम मिल जुलकर इन बच्चों के साथ यदि त्यौहार मनाएंगे तो उन्हें समाज की मुख्य धारा में लाने का माहौल बन सकेगा। इस पर संस्था परिवार के उदयभान सिंह, आलोक सिंघई और सुनील ने श्री अग्रवाल के साथ मिलकर बच्चों के लिए लड्डू ,मिठाई के पैकेट और पूरी सब्जी के साथ भोजन के पैकेट बांटकर उनके चेहरों पर मुस्कान बिखेरने का प्रयास किया। इस अवसर पर जरूरतमंदों को कंबल बांटकर उन्हें ठंड से बचाने का प्रबंध भी किया गया।

    आवारा बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए संस्था उन्हें रेखांकित भी करती जा रही है।


    मानवता संरक्षण ट्रस्ट की सचिव अधिवक्ता विनीता तोमर ने बताया कि इन बच्चों के आधारकार्ड नहीं हैं जिससे इनकी पहचान करना कठिन होता है। आए दिन इनके विरुद्ध पुलिस प्रकरण भी लाद दिए जाते हैं। हमारा प्रयास है कि इनकी पहचान सुनिश्चित करने के लिए इनके आधार कार्ड बनवाए जाएं ताकि उन्हें असामाजिक तत्वों के षड़यंत्रों से बचाया जा सके। सिंगारचोली ओव्हर ब्रिज के नीचे रह रहे इन बच्चों के जीवन में ज्ञान का प्रकाश लाने के लिए ट्रस्ट की यूथ वालिंटियर नगमा शेख, श्याला अली, इलमा आदि भी लगातार प्रयास कर रहीं हैं।

    समाजसेवियों के सहयोग से विकास की दौड़ में पिछड़ गए लोगों को मुख्यधारा में लाने के प्रयास हो रहे हैं.


    जनसंवेदना के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता राधेश्याम अग्रवाल ने बताया कि संस्था बेसहारा एवं गरीब परिवारों के लिए निःशुल्क भोजन और विभिन्न बीमारियों के इलाज के लिए आने वाले मरीजों और उनके परिजनों के लिए निःशुल्क भोजन की व्यवस्थाएं करती है। आज प्रवासी मजदूरों, बच्चों और उनके अभिभावकों के लिए संस्था ने जो भोजन के पैकेट वितरित किए उसके लिए मानतवा संरक्षण ट्रस्ट की अध्यक्ष मिथिलेश सिंह ने आभार व्यक्त किया है।

  • जीवन का बेहतर उपसंहार समृद्ध समाज की गारंटी है-राधेश्याम अग्रवाल

    जीवन का बेहतर उपसंहार समृद्ध समाज की गारंटी है-राधेश्याम अग्रवाल


    भोपाल, 03 जून(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर ). जिन लावारिस लाशों का पता ठिकाना पुलिस भी नहीं जानती राजधानी का एक आवारा मसीहा उन्हें सद्गति देकर पुण्य बटोर रहा है। उसके पुण्य भंडार को भरने में ऐसे सैकड़ों समाजसेवी जुटे हैं जिन्हें आम लोग नहीं जानते। हर दिन बीमार जरूरतमंदों को भोजन मुहैया कराना और लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करना उसकी दिनचर्या ही बन गई है। जनसंवेदना नाम की जिस संस्था को उन्होंने समाज में अनोखी पहचान दिलाई है उसमें कई चिकित्सक, पुलिस कर्मी, व्यापारी, उद्योगपति, इंजीनियर, लेखक और सामान्य लोग भी जुड़े हैं। हर दिन वे स्वेच्छा से संस्था को भोजन और कफन दफन की राशि मुहैया कराते हैं। लोगों का भरोसा जीतने में कामयाब राधेश्याम अग्रवाल नाम के ये समाजसेवी कहते हैं कि जनसहयोग ने मेरा जीवन सफल बना दिया है। गुमनाम लोगों की अंतिम यात्रा का बेहतर उपसंहार देखकर उन्हें लगता है कि यही एक समृद्ध समाज की गारंटी है।
    सत्तर वर्षीय राधेश्याम अग्रवाल हर दिन सुबह घर से नाश्ता करके निकलते हैं और जेल पहाड़ी स्थित अपनी संस्था के दफ्तर पहुंच जाते हैं। विभिन्न पुलिस थानों और अस्पतालों से जो जानकारियां आती हैं उसके अनुसार वे धनराशि मुहैया कराते हैं। ये दानराशि जुटाने के लिए वे दिन भर समाजसेवियों से जाकर मिलते हैं और उन्हें इस पुण्य कार्य से जोड़ते हैं। संस्था से जुड़े स्वयंसेवी और विभिन्न लोग इस दौरान दफ्तर आकर भी मिलते रहते हैं। संस्था के अभियान को जिस लगन से वे सफल बनाते रहे हैं उन्हें देखकर हर व्यक्ति नतमस्तक हो जाता है।
    आमतौर पर श्रेष्ठिवर्ग में पूजा, और अपने प्रतिष्ठान के प्रति लगाव देखा जाता है, लेकिन राधेश्याम अग्रवाल के लिए तो लाशों की अंतिम क्रिया ही पूजा है ।वे लगभग अठारह सालों से ये पुण्य कार्य कर रहे हैं और कभी विश्राम नहीं करते। वे कहते हैं कि हर दिन जरूरत मंदों को भूख लगती है और हर दिन कहीं न कहीं जीवन की डोर यमराज के हाथों में जा अटकती है। वे कहते हैं कि एक दुर्घटना में बाल बाल बचने के बाद उन्होंने संकल्प किया था कि वे किसी भी गुमनाम इंसान को लावारिस होकर नहीं जाने देंगे। उन्हें इस कार्य की प्रेरणा देने का काम मेडीकोलीगल एक्सपर्ट डॉक्टर डी.के.सत्पथी ने किया था। तब वे अपराध संवाददाता के रूप में उनके पास खबर लेने जाते थे। डाक्टर सत्पथी ने उन्हें बताया कि जिन लावारिस लाशों का वे पोस्टमार्टम करते हैं उनका अंतिम संस्कार पुलिस के लिए बड़ी समस्या होता है। यदि कोई समाजसेवी ये बीड़ा उठा ले तो बेगुनाह लोगों को भी बैकुंठयात्रा कराई जा सकती है। इसी विचार ने आगे चलकर जनसंवेदना संस्था को जन्म दिया और आज यह एक विशाल नेटवर्क का रूप ले चुकी है। हजारों दानदाता इससे जुड़कर अपना भी जन्म सफल बना रहे हैं और लावारिस मरने वालों के लिए आशा की किरण बन गए हैं।