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  • द्रौपदी मुर्मू की विजय को सुनहरा बनाएगी सिन्हा की हार

    द्रौपदी मुर्मू की विजय को सुनहरा बनाएगी सिन्हा की हार

    के. विक्रम राव

    नौकरशाही से राजनीति में प्रविष्ट हुये यशवंत सिन्हा को यदि कुछ भी लाज—लिहाज हो तो राष्ट्रपति चुनाव से हट जायें। हजारीबाग में अपने व्यवसाय को देखें। व्यापार बढ़ायें, ज्यादा मुनाफा कमायें। राजनीति में हनीमून पर दोबारा आये हैं। अब पूरा हो गया। क्योंकि जनसेवा तो राजनीति में अब चन्द निस्वार्थ जन के लिये ही रह गयी है। यशवंत सिन्हा को इसी जुलाई 1 को ही नाम वापस ले लेना चाहिये था, जब उनकी प्रस्ताविका कुमारी ममता बनर्जी ने कहा था : ”भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रपति पद हेतु राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू को चुनावी मैदान में उतारने से पहले विपक्ष के साथ चर्चा की होती तो विपक्षी दल उनका समर्थन करने पर विचार कर सकते थे।” उन्होंने यह भी कहा कि ”मुर्मू के पास 18 जुलाई होने वाले राष्ट्रपति चुनाव जीतने की बेहतर संभावना है, क्योंकि महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन के बाद एनडीए की स्थिति मजबूत हुयी है।”

    उत्तर प्रदेश जो राष्ट्रीय राजनीति का ध्रुव केन्द्र है में यशवंत सिन्हा के लिये धूमधाम से अखिलेश यादव ने समर्थन जुटाया। पर दरार पड़ गयी। चचा शिवपाल के शब्दों में भतीजा अपरिपक्व हैं। मगर नासमझी इस कदर ? ओमप्रकाश राजभर को न बैठक में बुलाया। न उनसे सिन्हा के लिये समर्थन मांगा। खिसियाये राजभर योगी आदित्यनाथ के घर पर डिनर खाने चले गये। वहां द्रौपदी मुर्मू के लिये सभी अपने वोट की घोषणा कर रहे थे। वहीं शिवपाल सिंह भी वादा कर आये। शिवपाल समाजवादी पार्टी के कुछ और वोट काट सकते हैं। उन्होंने ने कहा कि ”मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राष्ट्रपति चुनाव में राजग प्रत्याशी द्रौपदी मुर्मू के पक्ष में वोट मांगा है। लिहाजा मैं मुर्मू को ही वोट करूंगा।” श्री यादव ने यहां कहा, ”मैंने पहले ही कहा था, राष्ट्रपति चुनाव में जो प्रत्याशी मुझसे वोट मांगेगा, मैं उसके पक्ष में वोट करुंगा। योगी आदित्यनाथ ने मुझसे (द्रौपदी मुर्मू के लिये) वोट देने को कहा था और मैंने फैसला किया है कि मैं उन्हें वोट दूंगा।” जयंत चौधरी बच गये। सपा मुखिया के साथ रह गये। मगर क्या फर्क डाल पायेंगे ?

    सिलसिलेवार अन्य राज्यों पर गौर करें। अन्नाद्रमुक और अन्य सहयोगी दल एनडीए की प्रत्याशी द्रौपदी मुर्मू का समर्थन करेंगे। मुर्मू ने अन्नाद्रमुक नेताओं—के. पलानीस्वामी और ओ. पन्नीरसेल्वम, तमिल मनीला कांग्रेस के अध्यक्ष जी. के. वासन, पट्टाली मक्कल काचि (पीएमके) के अध्यक्ष डॉ. अंबुमणि रामदास से मुलाकात की। सभी ने उनके प्रति समर्थन व्यक्त किया। वहीं शिरोमणी अकाली दल (शिअद) ने भी कहा कि वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की उम्मीदवार का समर्थन करेगा। शिअद ने मुर्मू का समर्थन करने का फैसला किया है। पार्टी का मानना है कि वह अल्पसंख्यकों, शोषित और पिछड़े वर्गों के साथ—साथ महिलाओं की प्रतीक है। देश में गरीब व आदिवासी वर्गों के प्रतीक के रुप में उभरी हैं। यही वजह है कि पार्टी राष्ट्रपति चुनाव में उनका समर्थन करेगी। ”सिख समुदाय पर अत्याचारों के कारण हम कांग्रेस के साथ कभी नहीं जायेंगे।”

    पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कह चुकीं हैं कि ”यदि एनडीए की ओर से पहले द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी के बारे में बता दिया जात तो हम भी राजी हो जाते और सर्वसम्मति से उन्हें चुना जा सकता था। ममता बनर्जी ने द्रौपदी मुर्मू की जीत की संभावनाएं ज्यादा होने की बात भी स्वीकार की।”

    बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजग उम्मीदवार के बारे में कहा, ”हम लोगों को पूरा भरोसा है कि मुर्मू भारी बहुमत से जीतेंगी। यह बहुत खुशी की बात है कि एक आदिवासी महिला देश के सर्वोच्च पद के लिये उम्मीदवार है।” मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का झारखण्ड मुक्ति मोर्चा अब द्रौपदी को वोट देगा जिससे गठबंधन सहयोगी कांग्रेसी पार्टी को शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी।

    बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने स्पष्ट किया कि सिर्फ अनुसूचित जनजाति की महिला होने के कारण ही उनकी पार्टी ने द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति चुनाव के लिये समर्थन देने का ऐलान किया है। उनका एक ही विधायक है।

    प्रतिद्वंदी यशवंत सिन्हा ने द्रौपदी पर तनिक शकुनि के अंदाज में विवाद उठा दिया। वे बोले कि ”यह महिला प्रत्याशी रबर स्टांप राष्ट्रपति बनेगी।” सिन्हा की घोषणा है कि वे खुद राष्ट्रपति चुने गये तो ”केवल संविधान के प्रति उत्तरदायी रहूंगा।” हालांकि भारत का संविधान गत 70 वर्षों में 108 बार संशोधित हो चुका है। तुलना में अमेरिका का संविधान गत सवा दो सौ वर्षों में केवल 25 बार संशोधित हुआ। जब 1975 में एमर्जेंसी इंदिरा गांधी ने थोपी थी तो जनाब यशवंत सिन्हाजी कलक्टरी कर रहे थे। सरकारी अफसर थे उस शासन के जो भ्रष्टाचार—विरोधी संघर्ष में जननायकों को जेल में कैद कर रही थी। तब उन्हीं के परिवारजन लोकनायक जयप्रकाश नारायण भी इंदिरा गांधी की जेल में नजरबंद थे। बाद में इन्हीं जेपी की सिफारिश पर प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने सिन्हा पर कृपादृष्टि दर्शायी थी। यही सिन्हाजी अब आदिवासी गरीब विधवा द्रौपदी मुर्मू से बेहिचक वचन मांग रहे है कि वे ”नाममात्र” की राष्ट्रपति नहीं रहेंगी। खामोश नहीं रहा करेंगी। मगर जब दस साल मनमोहन सिंह गूंगे रहे, सोनिया की धौंस के चलती रही, तब?

    अब जानिये अगर सिन्हा स्वयं राष्ट्रपति बन गये (मुंगेरी लाल के सपने जैसा) तो यशवंतजी क्या—क्या कर देंगे? वे केन्द्रीय संस्थाओं द्वारा विपक्ष को तंग करना बंद करा देंगे। नीक है, सब इसे स्वीकारते हैं। सांप्रदायिकता को रोकेंगे? दुरुस्त है। राज्य सरकारों को डगमायेंगे नहीं। यह भी वाजिब है। मगर इंदिरा गांधी काल का यही सरकारी (84—वर्षीय) नौकर चालीस साल के दौरान तो ”जी हुजूरी” भर करता रहा। कैसा कर्तव्य निभाया?

    यशवंत सिन्हा को बैठ जाने के आग्रह के लिये तर्क है, वे कभी भी गंभीर चुनौती देने वाले, प्रत्याशी नहीं रहे। विपक्ष की चौथी पसंद रहे। शरद पवार चतुर थे। हार की प्रतीती हो गयी थी। पलायन कर गये। अधिक फजीहत से बचने के पूर्व यशवंत सिन्हा को संतुष्ट होना चाहिये कि उन्हें आशातीत प्राप्ति तो हो गयी। हशिए पर पड़े इस राजनेता को फोकट में देशव्यापी मीडिया पब्लिसिटी मिल गयी। बड़े—बड़े राजनेताओं से भेंट हो गयी जो अब उनके समर्थक बन बैठे। बिन रकम खर्चे सिन्हा लाभ पा गये। विपुल चुनावी बजट पा गये। फ्री भारत दर्शन करने का मौका मिल गया। अब उनके राजनीति करने में कुछ ही वर्ष रह गये है। वानप्रस्थ खत्म हो गया। संन्यास का वक्त दस साल पूर्व ही आ गया था। अभी भी देर नहीं है कि सिन्हा साहब रिटायमेंट की घोषणा के लिये। इसमें राष्ट्रहित है। उनका यश भी बना रहेगा।

    साहित्य में यश का रंग सफेद, धवल कहा गया है। कवि भूषण ने कहा था कि छत्रपति शिवाजी के अपार यश से तीनों लोकों में सफेदी छा गयी। तब इन्द्र अपने सफेद हाथी ऐरावत को तलाशते रहे। खुद ऐरावत गोरे इन्द्र को खोजता रहा। अत: सारी गोरी चीजें और गोरे लोग खो गये। अब यशवंत को भी यश की तरह गोरे बने रहना चाहिये। पराजय की कालिमा से बचें।

    K. Vikram Rao

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  • डॉ. अम्बेडकर के अनमोल विचार…  “मेरे नाम की जयकार ना करें, उससे बेहतर है- मेरे बताए रास्‍ते पर चलें”

    डॉ. अम्बेडकर के अनमोल विचार… “मेरे नाम की जयकार ना करें, उससे बेहतर है- मेरे बताए रास्‍ते पर चलें”

    नईदिल्ली,7 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।14 अप्रैल, 1891 को जन्मे बाबासाहेब के नाम से लोकप्रिय अम्बेडकर ने संविधान के पहले मसौदे को तैयार करने में अहम योगदान दिया था. उन्होंने अछूतों के प्रति सामाजिक भेदभाव के खिलाफ और निचली जातियों के उत्थान के लिए काफी संघर्ष किया था|

    डॉ.अंबेडकर लोकतांत्रिक भारत के सबसे प्रभावशाली शख्सियतों में से एक हैं. बाबासाहेब के नाम से लोकप्रिय, डॉ अम्बेडकर एक न्यायविद, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक थे. डॉ. अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 को तत्कालीन मध्य भारत प्रांत (अब मध्य प्रदेश) के महू नगर छावनी में हुआ था. बेहद गरीब परिवार में जन्मे बाबासाहेब के नाम से लोकप्रिय अम्बेडकर ने संविधान के पहले मसौदे को तैयार करने में अहम योगदान दिया था.
    उन्होंने अछूतों के प्रति सामाजिक भेदभाव के खिलाफ और निचली जातियों के उत्थान के लिए काफी संघर्ष किया था. डॉ. अम्बेडकर को मरणोपरांत, वर्ष 1990 में, भारत रत्न से सम्मानित किया गया था. 6 दिसंबर, 1956 को उनका निधन हो गया था, जिसे परिनिर्वाण दिवस के तौर पर मनाया जाता है. उन्होंने अपने कार्यों और विचारों से समाज सुधारकों, शिक्षाविदों और राजनेताओं को बहुत प्रभावित किया था.

    डॉ. अम्बेडकर देश के पहले कानून मंत्री थे. वह अपने अनुयायियों से कहा करते थे कि मेरे नाम की जय-जयकार करने से अच्‍छा है, मेरे बताए हुए रास्‍ते पर चलें. उनकी 65वीं पु्ण्यतिथि आइए हम उनके कुछ सबसे प्रेरक उद्धरणों और संदेशों पर एक नज़र डालते हैं:

    “किसी भी कौम का विकास उस कौम की महिलाओं के विकास से मापा जाता हैं.”
    “जो व्यक्ति अपनी मौत को हमेशा याद रखता है वह सदा अच्छे कार्य में लगा रहता है.”
    “मैं ऐसे धर्म को मानता हूँ जो स्वतंत्रता, समानता, और भाई-चारा सीखाये.”
    “मेरे नाम की जय-जयकार करने से अच्‍छा है, मेरे बताए हुए रास्‍ते पर चलें.”
    “रात-रातभर मैं इसलिये जागता हूँ क्‍योंकि मेरा समाज सो रहा है.”
    “जो कौम अपना इतिहास नहीं जानती, वह कौम कभी भी इतिहास
    “जो कौम अपना इतिहास नहीं जानती, वह कौम कभी भी इतिहास नहीं बना सकती.”
    “अपने भाग्य के बजाय अपनी मजबूती पर विश्वास करो.”
    “मैं राजनीति में सुख भोगने नहीं बल्कि अपने सभी दबे-कुचले भाइयों को उनके अधिकार दिलाने आया हूँ.”
    “मनुवाद को जड़ से समाप्‍त करना मेरे जीवन का प्रथम लक्ष्‍य है.”
    “जो धर्म जन्‍म से एक को श्रेष्‍ठ और दूसरे को नीच बनाए रखे, वह धर्म नहीं, गुलाम बनाए रखने का षड़यंत्र है.”
    “राष्‍ट्रवाद तभी औचित्‍य ग्रहण कर सकता है, जब लोगों के बीच जाति, नस्ल या रंग का अन्‍तर भुलाकर उसमें सामाजिक भ्रातृत्‍व को सर्वोच्‍च स्‍थान दिया जाये.”
    “मैं तो जीवन भर कार्य कर चुका हूँ अब इसके लिए नौजवान आगे आएं.”

    Koo App
    महान विधिवेत्ता, सामाजिक न्याय के प्रबल पक्षधर, भारत के सर्वसमावेशी संविधान के शिल्पकार, ’भारत रत्न’ बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर जी के महापरिनिर्वाण दिवस पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि। राष्ट्र निर्माण एवं समतामूलक समाज की स्थापना हेतु आपके कार्य सभी के लिए महान प्रेरणा हैं। Yogi Adityanath (@myogiadityanath) 6 Dec 2021
  • ब्राह्मणत्व जन्म नहीं आचरण का विषय

    ब्राह्मणत्व जन्म नहीं आचरण का विषय

    जयराम शुक्ल

    “यदि शूद्र में सत्य आदि उपयुक्त लक्षण हैं और ब्राह्मण में नहीं हैं, तो वह शूद्र शूद्र नहीं है, न वह ब्राह्मण ब्राह्मण। युधिष्ठिर कहते हैं कि हे सर्प जिसमें ये सत्य आदि ये लक्षण मौजूद हों, वह ब्राह्मण माना गया है और जिसमें इन लक्षणों का अभाव हो, उसे शूद्र कहना चाहिए”….
    -महाभारत,वनपर्व सर्प-युधिष्ठिर संवाद

    धर्मशात्रों में ब्राह्मणों का स्थान अप्रतिम और अमोघ माना गया है। लोग कह सकते है क्योंकि शास्त्रकार सबके सब ब्राह्मण होते थे इसलिए खुद को सर्वोपरि रखा। फिर भी ब्राह्मणत्व में ऐसा कुछ न कुछ तो होगा कि प्रायः प्रत्येक थर्मशास्त्रों में बार बार समाज को सावधान किया गया है कि वह ब्राह्मणों को रुष्ट होने का अवसर नहीं दे। क्योंकि….

    मन्युप्रहरणा विप्राः न विप्रा शस्त्रयोधिनः।
    निहन्युर्मन्युना विप्राः बज्रपाणिर वासुरान।।

    ब्राह्मण शस्त्र उठाकर युद्ध नहीं करता, उसका हथियार उसका क्रोध है। क्रोध के द्वारा ब्राह्मण वैसा ही विनाश करता है, जैसा विनाश असुरों का इंद्र करते हैं।

    वास्तविक पक्ष यह है कि ब्राह्मणों के शील, स्वभाव और चरित्र की कल्पना जिस ऊंचे धरातल पर की गई है उसे देखते हुए यह सर्वोपरि स्थान प्राप्त हुआ।

    ब्राह्मण नैतिकता के प्रहरी थे। वे समाज के विवेक के प्रतिनिधि होते थे, अतेव उनका धर्म था कि स्वयं राजा भी कुमार्ग पर चले तो उसका प्रतिरोध करे।

    स्पष्टतः यह वही कर सकता है जिसे किसी वस्तु का लोभ न हो। राजा के चरणों में बिछा ब्राह्मण चारण हो सकता है ब्राह्मण नहीं। वह धन और कीर्ति के लोभ में पड़कर अपने कर्तव्य से विमुख न हो।

    भगवान शंकराचार्य से जुड़ी एक कथा है..संन्यास की दीक्षा के उपरान्त वे भिक्षा के लिए एक ब्राह्मणी के घर पहुंचे- मातु भिक्षाम् देहि, की टेर लगाई। ब्राह्मणी अत्यंत गरीब थी। उसके घर अन्न का एक दाना भी न था। वह स्वयं कई दिनों से भूखी थी ..पर याचक अतिथि को कैसे लौटाती। उसके घर एक सूखा आँवला था उसे भिक्षु शंकर को दे दिया।

    कृशकाय गरीब ब्रह्माणी की दशा देखकर आचार्य शंकर की करुणा जगी। शंकर ने स्त्रोत पाठकर माँ लक्ष्मी का आह्वान किया। माँ प्रसन्न हुईं और शंकर की याचनानुसार गरीब ब्राह्मणी के घर को स्वर्ण आँवलों से भर दिया।

    शंकराचार्य यह स्वयं के लिए कर सकते थे या ब्राह्मणी क्षुधापूर्ति के अंतिम साधन से अपना पेट भर सकती थी। पर दोनों ने अपने अपने धर्म का अनुपालन किया। वास्तव में ब्राह्मण धर्म यही है इसीलिए वेदान्त, पुराणों में ब्राह्मण की सर्वोच्चता है।

    सच्चा ब्राहमण वो जो धन, यश, कीर्ति, सम्मान की अपेक्षा न करे। इसीलिए मनुस्मृति में बार बार ब्राह्मणों को सावधान किया गया है।

    असम्मानात्तपोवृद्धिः सम्मानातु तपःक्षयः

    असम्मान पाने से तपस्या में वृद्धि होती है, सम्मान पाने से तप का विनाश होता है।

    सम्मानाद् ब्राह्मणो नित्यं उद्धिजेत विषादिव
    अमृतस्यैव चाकांक्षेत अवमानस्य सर्वदा।

    सम्मान से ब्राह्मण उसी प्रकार भागे, जैसे मनुष्य जहर से भागता है और अपमान की कामना वह उसी प्रकार करे, जैसे लोग अमृत की कामना करते हैं।

    अर्चितः पूजितो विप्रः दुग्ध गौरिव सीदति।

    अर्थात अर्चित पूजित विप्र दुही हुई गौ के समान सूख जाता है। यह मनु का आख्यान है उनके स्मृति ग्रंथ में।

    क्या ऐसा नहीं लगता कि हम ब्राह्मणत्व के गौरव का तो उपभोग करना चाहते हैं पर उसके जीवन आचरण के कठोर अनुशासन को विस्मृत कर देते हैं। वैदिक काल में ब्राह्मणों का इसलिए सत्कार था क्योंकि वे कठोर जीवन का निर्वाह करते थे।

    एक बड़ा प्रश्न वैदिक काल से ही विमर्श का विषय रहा है कि ब्राह्मणत्व जन्म से प्राप्त होता है या कर्म से।

    जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उचयते।

    इस श्लोक से स्पष्ट है वर्ण निर्धारण कर्म से होना चाहिए। किंतु अत्रि संहिता में यही बात विपरीत ढंग से कही गयी है।

    जन्मना ब्राह्मणौं ग्येयः संस्काराद् द्विज उच्यते।

    अर्थात् ब्राह्मण जन्म से ही ब्राह्मण होता है, संस्कारों से द्विजत्व की प्राप्ति होती है।

    यह शंका महाभारतकार महर्षि व्यास के भी मन में भी थी, जिसे उन्होंने वनपर्व में वर्णित युधिष्ठिर-सर्प संवाद में प्रत्यक्ष किया है। सर्प युधिष्ठिर से पूछता है..ब्राह्मण कौन है? इस पर युधिष्ठिर कहते हैं कि ब्राह्मण वह है, जिसमें सत्य, क्षमा, सुशीलता, क्रूरता का अभाव तथा तपस्या और दया, इन सद्गुणों का निवास हो। इस पर सर्प शंका करता है कि ये गुण तो शूद्र में भी हो सकते हैं, तब ब्राह्मण और शूद्र में क्या अंतर है?

    शूद्रेष्वपि च सत्यं च दानम्क्रोध एव च
    आनृशंस्रमहिंसा च घृणा चैव युधिष्ठिर।

    अर्थात् हे युधिष्ठिर, सत्य, दान,दया, अहिंसा आदि गुण तो शूद्रों में भी हो सकते हैंं। इस पर युधिष्ठिर ने जो उत्तर दिया, वह किसी भी अभिनव मनुष्य का उत्तर हो सकता है। युधिष्ठिर ने कहा..

    शूद्रे तु यद् भवेल्लक्ष्म द्विजे तच्च न विद्यते,
    न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मणः।
    यत्रैतल्लक्ष्यते सर्प वृत्तं स ब्राह्मणः स्मृतः
    यत्रैतन्न भवेत सर्प तं शूद्रमति निर्दिशेत।

    अर्थात यदि शूद्र में सत्य आदि उपयुक्त लक्षण हैं और ब्राह्मण में नहीं हैं, तो वह शूद्र शूद्र नहीं है, न वह ब्राह्मण ब्राह्मण। हे सर्प जिसमें ये सत्य आदि ये लक्षण मौजूद हों, वह ब्राह्मण माना गया है और जिसमें इन लक्षणों का अभाव हो, उसे शूद्र कहना चाहिए।

    भारतीय ग्यान परंपरा की अमूल्य निधि वैदिक वाग्यमय की रचना अकेले ब्राह्मणों ने नहीं की है। ऋषिपरंपरा में वर्ण व्यवस्था नहीं थी। प्रकारान्तर में वे ब्राह्मण माने गए जिन्होंने तप,साधना और ग्यान से ब्रह्म के रहस्य को जाना।

    वेद सहित उस समय का रचा हुआ समग्र साहित्य श्रुति और स्मृति परंपरा
    से होते हुए उस काल तक पहुँचा जहाँ जनसंचार के साधन मिलने शुरू हुए। जब यह ग्यान वृहद ग्रंथों के रूप में संकलित होने लगा तब इसमें ग्रंथकारों की ओर से क्षेपक और बुद्धिविलास बखानने का काम शुरू हुआ। वैदिक ग्रंथों की टीकाएं सुविधानुसार की जाने लगी इससे ग्यान की मूल अवधारणा दूषित होने लगी।

    जिस वर्ग पर इसके संरक्षण व संवर्धन की जिम्मेदारी थी उसी ने सबसे ज्यादा यह काम किया। ऋषिपरंपरा से प्रवाहित प्रवाहित होकर चली यह ग्यान संपदा समयकाल के साथ विरूपित होती गयी।

    आज जिस शोध व अनुसंधान की जरूरत है वह यही कि नीर-क्षीर विवेक का प्रयोग करते हुए वेद पुराणों के शुद्ध व संशोधित संस्करण लाए जाएं जो समयकाल के विरूपण से मुक्त हों।

    ग्यान पर ब्राह्मणों का एकाधिकार कभी नहीं रहा। उसे हर वर्ग के लोगों ने संपन्न किया। विश्व के दो महान ग्रंथ हैं, पहला बाल्मीक कृत रामायण, दूसरा वेदव्यास कृत महाभारत। ये दोनों ही महापुरुष जन्म से ब्राह्मण नहीं हैं। सूतजी जिन्हें कथावाचक या सूत्रधार के रूप में पुराणों को लोकमानस तक पहुंचाने का श्रेय जाता है वे ब्राह्मण नहीं अपितु वर्ण से शूद्र थे।

    वेद ध्वनि सुनने पर शूद्र और स्त्री के कानों में पिघला हुआ सीसा डाल देने का श्लोक रचने वाले वही स्वार्थी तत्व थे जिन्होंने ने ऋषि परंपरा से निकले ग्यान को कर्मकाण्ड में बदलकर उसे अपनी वृत्ति(पेशा) बना लिया। यह जानना चाहिए कि वेद किन्हीं एक व्यक्ति द्वारा नहीं लिखे गए। यह तत्कालीन समाज की सहकारी रचनाकर्म है जिसमें महिलाओं का योगदान अग्रगण्य है।

    वेदों में विदुषियों का सम्मान सहित उल्लेख है। और फिर इस बात का उल्लेख पहले ही कर चुका हूँ कि वेदों के रचनाकाल के समय वर्णव्यवस्था थी ही नहीं। यह तो बहुत बाद स्मृति ग्रंथों व पुराणों के रचनाकाल में घनीभूत हुई।

    इसलिए महाभारत में युधिष्ठिर-सर्प संवाद में ब्राह्मण व शूद्र को जिस तरह परिभाषित किया गया और ग्रंथकार वेदव्यास ने जो परिभाषा दी वही सबको ग्राह्य और विशाल हिंदू समाज में उसी की ही पुर्नप्राणप्रतिष्ठा की जानी चाहिए।

    संपर्क- 8225812813