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  • …..और कांग्रेस ने विभाजन स्वीकारा

    …..और कांग्रेस ने विभाजन स्वीकारा

    विभाजन की चुभन / 3

    • प्रशांत पोळ

    अपने देश में चालीस का दशक अत्यंत उथल-पुथल वाला रहा. दूसरा विश्व युध्द चल रहा था. ब्रिटिश सरकार के विरोध में जनमत तीव्र हो रहा था. विश्व युध्द समाप्त होने के पश्चात् भारत को स्वतंत्रता दी जाएगी ऐसी ब्रिटिश सरकार ने घोषणा भी की थी. किन्तु आजादी जब सामने दिखने लगी, तो मुस्लिम लीग ने अपने आक्रमण तेज कर दिए. देश में अनेक स्थानों पर दंगे भड़के. दंगों के माध्यम से खौफ निर्माण करने का काम मुस्लिम लीग कर रही थी.

    मुस्लिम लीग पाकिस्तान की मांग कर रही थी. प्रारंभ में तो कांग्रेस भी बंटवारे के विरोध में थी. गांधीजी ने ऐतिहासिक भाषण दिया था, जिसमे उन्होने कहा था की, ‘पहले मेरे शरीर के टुकडे होंगे, फिर इस देश का विभाजन होगा..!’

    इस देश के करोड़ो लोगों ने गांधीजी को अपना नेता माना था. ‘महात्मा’ की पदवी से नवाजा था. उन्हें पूरा विश्वास था गांधीजी पर. लेकिन ४ जून १९४७ को, दिल्ली की प्रार्थना सभा में गांधीजी ने यह विश्वास तोड़ दिया. उन्होंने, कांग्रेस पार्टी विभाजन का समर्थन क्यों कर रही हैं, इसलिए तर्क दिए… गांधीजी ने बंटवारे का समर्थन किया..!

    विभाजन नहीं होगा, ऐसा मानने वाले करोडो लोग इस घटना से टूट गए. विशेषतः सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों पर यह बहुत बड़ा आघात था. वे विभाजन के लिए तैयार नहीं थे. उन्होंने विस्थापन के बारे में सोचा ही नहीं था. गांधीजी फिर भी कह रहे थे की, ‘प्रस्तावित पाकिस्तान से हिन्दुओं को विस्थापित होने की कोई आवश्यकता नहीं हैं..’

    लेकिन डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ज्यादा व्यावहारिक थे. गाधीजी, नेहरु और जीना की नीतियों का उन्होंने पूरजोर विरोध किया था. अपने पुस्तक ‘थॉट ऑन पाकिस्तान’ में उन्होंने लिखा हैं – “श्री गांधी अस्पृश्यों को तो कोई भी राजनीतिक लाभ देने का विरोध करते हैं, लेकिन मुसलमानों के पक्ष में एक कोरे चेक पर हस्ताक्षर करने तैयार बैठे हैं.” आंबेडकर जी की मूल चिंता थी की ‘आखिर कांग्रेस द्वारा इतना पालने पोसने के बाद भी मुसलमान अलग देश की मांग क्यों कर रहे हैं..?’

    बाबासाहब आंबेडकर मूलतः अखंड भारत के समर्थक थे. उन्होंने लिखा हैं, ‘प्रकृति ने ही भारत को अखंड बनाया हैं.’ लेकिन वास्तविक धरातल पर उन्होंने द्विराष्ट्र वाद का समर्थन किया. उन्होंने कहा की मुसलमानों का हिन्दुओं के साथ सह-अस्तित्व संभव ही नहीं हैं. इसलिए उन्हें अलग राष्ट्र देना ही ठीक रहेगा. लेकिन एक शर्त पर – हिंदुस्तान के सारे मुसलमान प्रस्तावित पाकिस्तान में जायेंगे और वहां के सारे हिन्दू हिंदुस्तान में आयेंगे..! उनके शब्द हैं, “When partition took place, I felt that God was willing to lift his curse and let India be one great and prosperous” (जब विभाजन हुआ तो मुझे लगा मानो ईश्वर ने हमे दिया हुआ अभिशाप (श्राप) हटा लिया हैं और अब भारत एक महान और समृध्द राष्ट्र बनेगा). – डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर : राइटिंग अँड स्पीचेस, पहला खंड, पृष्ठ 146.

    दुर्भाग्य से कांग्रेस ने भारत विभाजन का प्रस्ताव तो स्वीकार किया, किन्तु जनसंख्या के अदलाबदली को सिरे से नकारा… इसका नतीजा रहा, इतिहास के सबसे दर्दनाक दंगे. लाखों लोगों की मृत्यु. करोडो लोगों का बिना किसी योजना के बलात विस्थापन..!

    पंधरा अगस्त जैसे जैसे निकट आ रहा था, वैसे वैसे बंगाल, पंजाब और सिंध में दंगे बढ़ रहे थे. हिन्दुओं को घर-बार छोड़ने के लिए विवश किया जा रहा था…

    ऐसे समय हमारा नेतृत्व क्या कर रहा था..?

    अगस्त, १९४७ के पहले और दुसरे सप्ताह में नेहरु व्यस्त थे, सत्तांतरण के कार्यक्रम की तैयारी में. उनकी बहन कृष्णा हाथिसिंग लिखती हैं – Jawahar was concerned about his wardrobe. १४ अगस्त के रात वाले समारोह में पहनने के लिए नेहरु ने अचकन और जाकिट पेरिस से मंगवाए थे. सीमा पर हो रहे दंगों की चिंता करने के बजाय, उन कपड़ों की चिंता नेहरु को थी. लॉर्ड माउंटबेटन को नेहरू आश्वस्त कर रहे थे की स्वतंत्रता के बाद भी भारत की सरकारी इमारतों पर, ब्रिटेन के शासकीय महत्व के दिनों में, यूनियन जैक फहराया जाएगा..!

    लेकिन जब पंजाब और सिंध जल रहा था, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरूजी ५ अगस्त से ८ अगस्त तक सिंध के दंगा पीड़ित क्षेत्रों में (जो अब पाकिस्तान में हैं) थे. कराची के हवाईअड्डे पर श्री गुरूजी को लेने के लिए जिस भारी मात्रा में स्वयंसेवक आये थे, उसके एक चौथाई भी लीगी कार्यकर्ता, जीना को लेने नहीं आए थे…!

    श्री गुरूजी ने धधकते वातावरण में कराची और हैदराबाद (सिंध) में स्वयंसेवकों की बैठके ली. साधु वासवानी जी के साथ सार्वजनिक सभा को संबोधित किया. लोगों को ढाढस बंधाया.

    श्री गुरूजी के पश्चात् १३ अगस्त को राष्ट्र सेविका समिति की तत्कालीन प्रमुख संचालिका वन्दनीय मौसी केलकर भी कराची पहुची. १४ अगस्त को, अर्थात जिस दिन पाकिस्तान का निर्माण हो रहा था, ठीक उसी दिन, उसी कराची शहर में मौसी केलकर जी ने समिति की बहनों की एक विशाल बैठक ली. साहस और समर्पण इसे कहते हैं !

    उस अशांत परिस्थिति में जब संघ, समिति और आर्य समाज के अधिकारी और कार्यकर्ता, लोगों में ढाढस बंधा रहे थे, उनके सुरक्षित भारत लौटने के प्रबंध कर रहे थे, तब देश का कांग्रेसी नेतृत्व दिल्ली में राज्यारोहण की खुशिया मनाने में व्यस्त था…! (क्रमशः)

    • प्रशांत पोळ

    विभाजन #भारत_विभाजन #Partition

  • नोट पर महापुरुषों को भी जगह मिलेःअतुल मलिकराम

    नोट पर महापुरुषों को भी जगह मिलेःअतुल मलिकराम

    हर दिन आगे बढ़ने के साथ-साथ पीछे छूट जाती हैं कई बातें, कई कहावतें, और महज़ कहानियाँ बनकर रह जाते हैं वो तमाम मुहावरें, जो हमारे बड़े-बुजुर्ग कह गए हैं। “परिवर्तन ही संसार का नियम है….” कभी तो यह एक दिन में कई बार कही जाने वाली कहावत थी, और आज हम इसका अर्थ ही भूल चले हैं। अब तो यह बात देश के नोट भी कहने लगे हैं।

    भारतीय रिजर्व बैंक समय-समय पर नोटों की रुपरेखा में बदलाव करता है। गाँधी जी से पहले, नोटों पर जानवर, बांध, संसद भवन, अंतरिक्ष उपग्रह आदि मुद्रित हुआ करते थे। तमाम बड़े परिवर्तनों के बाद, करीब 50 वर्षों से अब तक भारत के नोटों पर गाँधी जी की ही तस्वीर पेश की जा रही है, लेकिन आरबीआई ने आज तक इस तस्वीर में परिवर्तन का कोई इरादा नहीं दिखाया है। भारत माता की गोद में पले-बढ़े कई वीर सपूत ऐसे हैं, जिन्होंने भारत के हित में अनन्य कार्य करने के चलते देश की गरिमा को जीवंत रखा है। इन वीर पुरुषों का अमिट योगदान भारत की कर्मभूमि में अनंत काल तक गूंजता रहेगा। इसलिए परिवर्तन ही संसार का नियम है, पंक्ति को पुनः जीवंत करने का समय आ गया है, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह और जेआरडी टाटा को भारत के नोटों पर स्थान देने का समय आ गया है।

    महात्मा गाँधी हमारे देश के ‘राष्ट्रपिता’ हैं। भारतीय नोटों पर उनकी छवि भारतीय लोकाचार और मूल्यों को दर्शाती है। हम बहुत लंबे समय से नोटों पर गाँधी जी की छवि देख रहे हैं, यह गर्वित करने वाली बात है। लेकिन अन्य महान नेताओं और स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को पहचानने और सम्मान करने में कहीं न कहीं एक बड़ी कसर है, जिन्होंने भारत और इसके वासियों के लिए अपना सर्वस्व कुर्बान कर दिया। भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस और जेआरडी टाटा ने जीवन पर्यन्त भारत वासियों को सरल जीवन देने और देश को बेहतर बनाने के लिए कड़ा संघर्ष किया, इसके साथ ही अटूट समर्पण, देशभक्ति और निष्ठा के साथ देश की सेवा की। भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस भारत माता के वीर योद्धा थे, जिन्होंने भारत की आज़ादी के लिए लड़ाई लड़ी और शहादत हासिल की। उनके शक्तिशाली व्यक्तित्व ने ही भारतीयों को खुलकर जीने के लिए प्रेरित किया।

    अतुल मलिकरामः भारत के नोटों पर कई अन्य महापुरुषों का भी हक

    जेआरडी टाटा की प्रेरणा भी देश वासियों के लिए अविश्वसनीय है। उन्होंने टाटा ग्रुप के चैयरमेन के रूप में व्यवसायों और संस्थानों का निर्माण करके राष्ट्र की अमिट सेवा की। भारत की प्रगति में उनका योगदान अतुलनीय है। चाहे स्वास्थ्य क्षेत्र (टाटा मेमोरियल अस्पताल) हो या वैज्ञानिक क्षेत्र (टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च), जेआरडी टाटा ने समृद्ध भारत के निर्माण में कोई कमी नहीं रखी। जिस गति से भारत ने तरक्की की है, सबसे बड़े हाथों में से एक हाथ जेआरडी टाटा का है, जिन्होंने हमें व्यवसाय को बुलंदियों पर पहुँचना सिखाया।

    मुद्रा यानी नोटों पर दी जाने वाली इन छवियों का मूल उद्देश्य देश की संस्कृति, मूल्यों और जैव विविधता का प्रतिनिधित्व करना है। भारतीय नोटों पर जेआरडी टाटा, भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस जैसे दिग्गजों की छवियों का उपयोग करना एक प्रगतिशील भारत की ताकत और समृद्धि का प्रतीक होगा। नोटों पर गाँधी जी की तस्वीर के साथ ही इन महान विभूतियों को भी स्थान दिया जाना आवश्यक है। यह भारतीयों को भी भारत माता की सेवा करने के लिए प्रेरित करेगा, जैसा कि राष्ट्र के इन वीर पुरुषों ने किया। यह परिवर्तन नई पीढ़ी को देश के गौरव से रूबरू कराने में कारगर सिद्ध होगा, साथ ही उनके अंतर्मन में भी देशभक्ति की अमिट भावनाओं का सैलाब लाने में मदद करेगा, क्योंकि परिवर्तन ही संसार का नियम है…

  • विचारधारा की कंगाली से डूबती कांग्रेस

    विचारधारा की कंगाली से डूबती कांग्रेस

    भोपाल,12 मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)। ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आने और फिर राज्य सभा भेजे जाने की तैयारी ने देश के तमाम राजनैतिक पंडितों को चकित कर दिया है। अपने समर्थक विधायको के साथ कांग्रेस छोड़ने से मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार संकट में घिर गई है। सरकार को पतन से बचाने के लिए जो डैमेज कंट्रोल के प्रयास किए जा रहे हैं उन पर गौर करें तो साफ तौर पर यही उभरता है कि कांग्रेस ने अपनी हार मान ली है और वह एक लूजर की तरह कुतर्क गढ़ने का प्रयास कर रही है।

    बैंगलोर के रिसार्ट में ज्योतिरादित्य सिंधिया के जिन विधायकों को प्रशिक्षण सत्र में रखा गया है वहां जाकर सरकार बचाने की गुहार लगाने पहुंचे कमलनाथ कैबिनेट के सदस्य जीतू पटवारी ने एक पुलिस अधिकारी से बदतमीजी शुरु कर दी। प्रायोजित कैमरे के सामने की गई इस बहस को जीतू पटवारी से दुर्व्यवहार करना बताया गया। यहां प्रेस वार्ता में दिग्विजय सिंह ने कहा कि विधायकों को बंदी बनाकर रखा गया है ये लोकतंत्र की हत्या है। जबकि उनके कानूनी सहयोगी विवेक तन्खा ने कहा कि विधायकों के अपहरण को लेकर उनकी पार्टी अदालत जाएगी।

    अपना सबसे बड़ा स्तंभ भरभराकर गिर जाने पर सफाई देते राहुल गांधी ने कहा कि ज्योतिरादित्य मेरे साथ पढ़े हैं मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूं। वे अपने भविष्य को लेकर चिंतित हो गए थे इसलिए उन्होंने भाजपा में जाने जैसा कदम उठाया। वहां न तो उन्हें आदर मिलेगा और न ही वे आत्मसम्मान बरकरार रख पाएंगे।

    राजनीति की इस चौपड़ पर भाजपा ने कांग्रेस को न केवल शह दी बल्कि एमपी में उसकी सरकार की नींव खोदकर उसे मात भी दे दी है। जिस विचारधारा की बात राहुल गांधी कह रहे हैं उसे देश की जनता ने बहुत पहले ही छोड़ दिया था। तभी तो देश के कई राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं और केन्द्र में लगातार दूसरी बार जनता ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को दूसरी बार सत्ता में भेजा है। जाहिर है कि उसी कड़ी में ज्योतिरादित्य का कांग्रेस छोड़ना विचारधारा के इसी पतन का उद्घोष बन गया है।

    कांग्रेस की जिस विचारधारा की बात राहुल गांधी कर रहे हैं उसे तो पीवी नरसिम्हाराव की सरकार ने 1991 में ही छोड़ दिया था। तब तत्कालीन वित्तमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने जिस मुक्त बाजार वाली अर्थव्यवस्था को हरी झंडी दिखाई थी उसने कांग्रेस की खैरात बांटने वाली नीति को समाप्त कर दिया था। इंस्पेक्टर राज की समाप्ति की घोषणा करके उन्होंने ये तो बता दिया था कि देश अब नई दिशा में चल पड़ा है। देश के लोगों को पूंजी बनाने में अपना योगदान देना होगा। खैरात के नाम पर देश के गले में मुर्दा बनकर लटकने का दौर खत्म हो गया है। ये बात जरूर है कि कांग्रेस की पुरानी साम्यवादी, समाजवादी छाया वाली मानसिकता,अवसरवाद और अंग्रेजों की गुलामी भरी चापलूसी की सोच की कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार सार्वजनिक रूप से निंदा नहीं की थी। उन्होंने सिर्फ यही कहा कि आने वाले भारत के निर्माण के लिए हमें अब नए मार्ग पर चलना होगा।

    इसके विपरीत राहुल गांधी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के फैसले पर सवालिया निशान लगाते समय उनके उन समर्थक विधायकों मंत्रियों को भी दोषी ठहरा दिया जिन्होंने कांग्रेस की सोच को ठुकराने का फैसला लिया। ऐसा कहकर वे देश के उन करोड़ों लोगों की मानसिकता को भी दोषी ठहरा रहे हैं जिन्होंने भाजपा को सत्ता में भेजकर देश चलाने का अवसर दिया है। एक अपरिपक्व नेता की तरह बचकानी भूमिका निभाते राहुल गांधी ने तो लोकसभा चुनावों के दोरान बदतमीजी की सीमाएं लांघ डालीं थी। उनकी ही शैली की नकल करते हुए कमलनाथ ने मध्यप्रदेश में विधायकों, अफसरों और नागरिकों को दोषी ठहराने की मुहिम चलाई थी। शुद्ध के लिए युद्ध के नाम पर व्यापारियों को दोषी ठहराना, अफसरों के तबादले करके पोस्टिंग में मोटा चंदा लेकर उन्हें अपराधी साबित करना, पत्रकारों को दूसरा धंधा करने की सलाह देकर पूरी पत्रकारिता को कटघरे में खड़ा करना, माफिया के विरुद्ध संग्राम का शोर मचाकर हर उद्यमी को अपराधी बताने जैसी हरकतें कांग्रेस की उस मूल विचारधारा का ही हिस्सा रहीं हैं जिस पर आजादी के बाद से कांग्रेस चलती रही है। गौर से देखें तो अंग्रेजों के विरुद्ध जब देश के सामंतों जमींदारों और राजाओं ने स्वाधीनता संग्राम चलाया था तब अंग्रेजों ने शाक एब्जार्बर के रूप में कांग्रेस को खड़ा किया था। इसी कांग्रेस के हाथों देश की सत्ता सौंपकर अंग्रेजों ने परोक्ष तौर पर सामंतों और राजाओं पर निशाना साधा। बाद में इंदिरागांधी ने रोटी कपड़ा और मकान का स्वप्न दिखाकर मिलावटियों और जमाखोरों पर निशाना लगाया। अस्सी के दशक की उम्र पहुंचे कमलनाथ आज भी उसी फाम्रूले को दुहराकर शासन चलाना चाह रहे थे। जिसे देश और प्रदेश के तमाम लोगों ने ठुकरा दिया है।एमपी के विधायकों और मंत्रियों ने तो खुलकर इस विचारधारा का विरोध किया है। इसके बावजूद राहुल गांधी इसे सही बताकर ज्योतिरादित्य को गलत साबित करने पर तुले हुए हैं।

    देश की आम जनता को विविधता के नाम पर जातियों, वर्गों,संप्रदायों में बांटकर देखने की सोच आज के कारोबारी दौर में कैसे जारी रखी जा सकती है। इसके बावजूद कई बार असफल साबित हो चुकी इस सोच को कांग्रेस जबरिया देश पर लादना चाह रही है।

    राहुल गांधी और उनका दंभ एक पल भी विचार करने तैयार नहीं हैं कि एक साथ देश का बड़ा वर्ग उन्हें क्यों धक्के मारकर सत्ता से बाहर कर रहा है। दरअसल कांग्रेस की विचारधारा मौलिक नहीं थी बल्कि वह समय काल और परिस्थितियों की उपज थी। अंग्रेजों ने कांग्रेस को जिस मकसद के लिए खड़ा किया उसके तहत उसे बड़े लोगों पर हमला करके उन्हें शोषक साबित करना था और गरीब को सहलाकर उसका समर्थन हासिल करना था। इसके लिए जरूरी था कि समर्थन देने वाला बहुसंख्यक वर्ग गरीब ही रहे ताकि ज्यादा से ज्यादा वोट हासिल किए जा सकें। पूंजीवाद ने इस विचारधारा को बदल दिया है। ज्योतिरादित्य का पाली बदलने का वर्तमान फैसला इसी सोच की देन है। देश को गरीबी के दलदल से बाहर निकालने वाले तमाम विचारक आज मोदी सरकार की सोच से सहमत हैं। इसलिए ज्योतिरादित्य सिंधिया के फैसले पर नहीं बल्कि राहुल गांधी की सोच पर आश्चर्य करने की जरूरत है। वे गहरी जड़ता के शिकार हैं और बंदरिया के मृत बच्चे की तरह मर चुकी सोच को गले लगाकर बैठ गये हैं। राहुल सोनिया कांग्रेस की यही जड़ता कांग्रेस के पतन की वजह बन गई है।इसी सोच पर चल रही कमलनाथ सरकार आज अल्पमत में आ चुकी है शेष कांग्रेसी राज्यों में भी यही सोच सरकारों के पतन की वजह बनने जा रही है ये आने वाले समय में साफ नजर आने लगेगा।

  • गांधी का सत्याग्रह अंग्रेजों का नाटक था बोले हेगड़े

    गांधी का सत्याग्रह अंग्रेजों का नाटक था बोले हेगड़े

    बैंगलुरु,2 फरवरी(शैलेश शुक्ला)।पूर्व केंद्रीय मंत्री और कर्नाटक से बीजेपी सांसद अनंत कुमार हेगड़े एक बार फिर से विवादों में हैं।हेगड़े ने राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी पर हमला बोला है और आजादी के आंदोलन को ‘ड्रामा’ करार दिया।बीजेपी नेता ने कहा कि पता नहीं लोग कैसे ‘इस तरह के लोगों को’ भारत में ‘महात्‍मा’ कहा जाता है।

    उत्‍तर कन्‍नड लोकसभा सीट से सांसद हेगड़े ने कहा कि पूरा स्‍वतंत्रता संघर्ष अंग्रेजों की सहमति और मदद से अंजाम दिया गया।’ हेगड़े ने कहा, ‘इन कथित नेताओं में से किसी नेता को पुलिस ने एक बार भी नहीं पीटा था। उनका स्‍वतंत्रता संघर्ष एक बड़ा ड्रामा था।’ महात्मा गांधी के ग्रुप के लोगों पर अंग्रेजों ने अत्याचार नहीं किया था। इन्हें जेल में भी सभी सुविधाएं दीं गई थी।

    हेगड़े ने कहा, ‘स्‍वतंत्रता संघर्ष को इन नेताओं ने ब्रिटिश लोगों की सहमति से रंगमंच पर उतारा था। यह वास्‍तविक संघष नहीं था। यह मिलीभगत से हुआ स्‍वतंत्रता संघर्ष था।’ बीजेपी नेता ने महात्‍मा गांधी के भूख हड़ताल और सत्‍याग्रह को एक ‘ड्रामा’ करार दिया।

    उन्‍होंने कहा, ‘कांग्रेस का समर्थन करने वाले लोग लगातार यह कहते रहते हैं कि भूख हड़ताल और सत्‍याग्रह की वजह से भारत को आजादी मिली। यह सत्‍य नहीं है। अंग्रेज सत्‍याग्रह की वजह से भारत से नहीं गए। अंग्रेजों ने निराशा में आकर हमें आजादी दी। जब मैं इतिहास पढ़ता हूं तो मेरा खून खौल उठता है। इस तरह से लोग हमारे देश में महात्‍मा बन गए।’

    इस बीच कांग्रेस नेता जयवीर शेरगिल ने अनंत कुमार हेगड़े के बयान की तीखी आलोचना की है। जयवीर ने कहा, महात्मा गांधी को देशप्रेम का सर्टिफिकेट उस पार्टी से नहीं चाहिए जो गोरों की सरकार के चमचे थे। अनंत हेगड़े उस संगठन से आते हैं जिन्होंने तिरंगे का विरोध किया, संविधान का विरोध किया, जिन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया।(नवभारत टाईम्स से साभार)

  • प्रज्ञा से झुलसने वालों को रद्दी में फेंको

    प्रज्ञा से झुलसने वालों को रद्दी में फेंको

    भोपाल की सांसद प्रज्ञा सिंह को भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय की समिति का सदस्य बना दिए जाने से विघ्न संतोषी ताकतों के पिछवाड़े मिर्ची लग गई है। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब साध्वी प्रज्ञा सिंह के प्रति सार्वजनिक तौर पर नाराजगी व्यक्त की थी तो उन्हें रक्षा समिति जैसे महत्वपूर्ण कार्य की जवाबदारी कैसे दी जा सकती है। भोपाल की सांसद से चिढ़ने वालों की फेरहिस्त बड़ी लंबी है। जबसे साध्वी प्रज्ञा को भाजपा ने सांसद के रूप में प्रोजेक्ट किया था तबसे उन्हें विवादों में घसीटने के प्रयास लगातार होते रहे हैं। अब जबकि वे 21 सदस्यों वाली रक्षा समिति की सदस्य बनाई गईं हैं तब यही विघ्न संतोषी अपना पिछवाड़ा संभालते हुए उछलने लगे हैं। साध्वी प्रज्ञा सिंह को 2008 में हुए मालेगांव बम धमाके का आरोपी बनाकर कांग्रेस के कुछ षड़यंत्रकारियों ने हिंदू आतंकवाद की नई परिभाषा गढ़ी थी। इसे खूब प्रचारित किया गया। कर्नल श्रीकांत पुरोहित को भी इस बम धमाके में आरोपित किया गया था जिन्हें बाद में निर्दोष पाया गया और अब वे सेना में दुबारा अपना काम संभाल चुके हैं। दरअसल तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल और उसके बाद कांग्रेस के ही सुशील कुमार शिंदे ने इस बम धमाके को हिंदू बनाम मुस्लिम झड़प का रूप देने का प्रयास किया था। कांग्रेस के ही दिग्विजय सिंह ने इसे हिंदू आतंकवाद का नाम देते हुए साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का अभियान चला दिया। देश में लंबे समय तक ये बम धमाका जातिगत वैमनस्य की वजह बना रहा। अब जबकि एनआईए की गढ़ी गई कहानी झूठी साबित हो रही है तब देश का एक बड़ा तबका इस पर संशय महसूस कर रहा है। इस मामले की सुनवाई कर रहे जज ने भी सवाल पूछा कि यदि एनआईए की कहानी झूठी है तो बम धमाका किसने किया था। दरअसल एनआईए के तत्कालीन अफसरों के माध्यम से कांग्रेस सरकार ने जिस तरह बम धमाके को साम्प्रदायिक रंग देने का प्रयास किया उससे आज भी लोग असमंजस महसूस कर रहे हैं। मालेगांव के बम धमाके में 7 लोगों की मौत हुई थी और सौ से अधिक लोग जख्मी हो गए थे। इस धमाके के वास्तविक आरोपियों को तो जांच के दायरे से बाहर कर दिया गया और आतंक के खिलाफ काम करने वालों को आरोपी बना दिया गया। जाहिर है कि अब जबकि साध्वी प्रज्ञा को देश की रक्षा समिति का सदस्य बना दिया गया है तब उनके खिलाफ षड़यंत्र रचने वाला बड़ा समूह आहत महसूस करेगा ही। अब समय आ गया है कि जब भारत की सेना और नागरिकों पर हिंदू आतंकवाद जैसा लांछन लगाने में असफल होने के बाद जो लोग बैचेन हो रहे हैं उनकी आपत्तियों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया जाना चाहिए। भारत में आतंकवाद फैलाने वालों पर कड़ी कार्रवाई होने से जो लोग परेशान महसूस करते हैं उनकी चिंता की जाएगी तो फिर भारत में भी एक नया पाकिस्तान बन जाएगा। आज पाकिस्तान ऐसे ही आतंकवादियों से परेशान है। भारत में इस आतंक की कमर तोड़ने के लिए सेना और सरकार को जो भी उपाय बन पड़ें बेखौफ होकर करने चाहिए। इसमें किसी आतंकवादी के मानवाधिकारों की चिंता करने वालों की भी खबर ली जाना जरूरी है।जो लोग आतंकवाद की पैरवी करते फिरते हैं उनके लिए साध्वी प्रज्ञा भारती के रक्षा समिति में चयनित होने पर चिंतित होना लाजिमी है। देश की सुरक्षा के प्रति चिंतन करने का काम वही लोग कर सकते हैं जो देश के लिए मरने मिटने के लिए तैयार हों। अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए तैयार हों। साध्वी प्रज्ञा सिंह मालेगांव बम धमाके के प्रताड़ना तंत्र से चोखी साबित होकर वापस आईं हैं। भोपाल की जनता ने षड़यंत्रकारी दिग्विजय सिंह को भारी मतों से हराकर उन्हें संसद भेजा है। महात्मा गांधी की हत्या निश्चित तौर पर निंदनीय और गलत थी। देश महात्मा गांधी की क्षति पूर्ति कभी नहीं कर सकता। इसके बावजूद नाथूराम गोड़से की देशभक्ति पर सवाल खड़े करना उन लोगों की सीमित दृष्टि का ही नतीजा है जो खरगोश की तरह आंखें बंद करके दुश्मन के चले जाने का भ्रम पालते फिरते हैं। साध्वी प्रज्ञा के बयानों पर लाख सवाल उठाए जाएं पर उनकी देशभक्ति शंका से परे है। रक्षा मंत्रालय या भारत सरकार के जिन भी लोगों ने साध्वी को ये महत्वपूर्ण जवाबदारी दी है उन्होंने देश को संदेश देने का प्रयास किया है कि वे रक्षा के मुद्दे पर किन्हीं भी सीमाओं तक जा सकते हैं। निश्चित रूप से भारत में आतंक फैलाने की मंशा रखने वालों के लिए ये कड़ा संदेश है।इसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है।