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  • सत्ता के लुटेरों को क्यों पनाह दे रही अफसरशाही

    सत्ता के लुटेरों को क्यों पनाह दे रही अफसरशाही

    भारत से अंग्रेजों को विदा हुए सतत्तर साल हो चुके हैं लेकिन उनका लूट का तंत्र आज भी बदस्तूर जारी है। आज भी आला अफसरों में एक वर्ग ऐसा है जो सरकारी संसाधनों को लूटने वालों को पनाह देता रहता है। सैडमैप के संसाधनों की लूटमार में ये कहानी स्पष्ट रूप से सामने आ रही है।सरकारी नौकरियां बेचने वालों के लिए सैडमैप आज एक मुफीद अखाड़ा बन गया है।नौकरशाही के ही एक वर्ग ने गुणवत्ता पूर्ण कार्य बल उपलब्ध कराने के लिए एक कंपनी सेक्रेटरी अनुराधा सिंघई को यहां का एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर बनाया था। उन्हें पांच सालों के लिए नियुक्ति दी गई थी। उन्होंने अपना काम संभालते ही सैडमैप में जुटे नौकरी माफिया और रिश्वत देकर नौकरी में आए फोकटियों की छुट्टी करनी शुरु कर दी। इससे हड़कंप मच गया और नौकरी माफिया ने कुछ निकाले गए कर्मचारियों को आगे करके ईडी अनुराधा सिंघई पर कथित अनियमितताओं को लेकर प्राथमिकी दर्ज करवा दी। मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो विद्वान न्यायाधीशों ने अनुराधा सिंघई को क्लीनचिट दे दी। उन्होंने अपना काम फिर चालू किया और सैडमैप को भंडार क्रय नियमों के अधिकार दिलाकर संस्थान की आय और बढ़ा दी। जब उन्होंने कार्यभार संभाला था तब सैडमैप की आय लगभग बीस करोड़ रुपए थी, कर्मचारियों को लगभग दस महीनों से तनख्वाह नहीं मिली थी। संस्थान लगभग बंद होने की कगार पर पहुंच गया था। विभिन्न कंपनियों और सरकारी प्रतिष्ठानों से कारोबार लेकर उन्होंने सैडमैप का टर्नओवर बीस करोड़ रुपयों से बढ़ाकर एक सौ तीस करोड़ रुपए कर दिया। जैसे ही ये चमत्कार लोगों की निगाह में आया वैसे ही लुटेरे सत्ता माफिया की लार टपकने लगी। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कुछ सत्ता के दलालों से सांठगांठ करके उन्होंने इस बार ईडी अनुराधा सिंघई को निलंबित करा दिया।

    इस अन्याय के खिलाफ जब वे हाईकोर्ट गईं तो शासन ने सैडमैप के फंड से ही लगभग नौ लाख रुपए निकालकर वकीलों की फौज पर खर्च कर दिए। हाईकोर्ट जबलपुर में जब शासन की ओर से महाधिवक्ता और उनके सहयोगी दर्जन भर वकीलों ने कहा कि निलंबन कोई सजा थोड़ी है। हमने तो केवल दस्तावेजों की जांच करने के लिए ईडी को निलंबित किया है। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि ठीक है अभी मामला पूरी तरह पका नहीं है इसलिए शासन को जांच कर लेने दी जाए। जिस तरह इकतरफा निलंबन की कार्यवाही की गई वह प्राकृतिक न्याय सिद्धांत के विरुद्ध थी। सैडमैप एक स्वायत्तशासी निकाय है और उद्योग विभाग के सचिव केवल इसके संरक्षक होते हैं। शासन इस संस्थान को कोई अनुदान भी नहीं देता है। ईडी, उद्योग विभाग का भी अधिकारी नहीं होता है इसके बावजूद श्रीमती सिंघई को उद्योग विभाग में हाजिरी देने के निर्देश दिए गए. संस्थान के लिए करोड़ों रुपए कमाने वाली इस कंपनी सेक्रेटरी को गुजारे भत्ते के रूप निलंबन के बाद मात्र आठ हजार रुपए दिए गए।

    इस अन्याय के विरुद्ध अनुराधा सिंघई ने मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव को पत्र लिखा जिसमें कहा गया कि उन्हें उद्योग विभाग के सचिव आईएएस नवनीत मोहन कोठारी अनावश्यक रूप से प्रताडि़त कर रहे हैं। अपने पत्र में उन्होंने न्याय के लिए अनुरोध करते हुए लिखा कि सैडमैप के अध्यक्ष और सचिव नवनीत मोहन कोठारी अपनी शक्ति और पद का दुरुपयोग करते हुए एक वरिष्ठ महिला अधिकारी का उत्पीड़न, दुर्व्यवहार, मानसिक यातना, अपमान,गलत निलंबन और अब जीवन भत्ता निर्वाह रोक रहे हैं । ऐसे में मुख्यमंत्री और जनप्रतिनिधि होने के नाते आप मामले में हस्तक्षेप करें और न्याय दिलाएं।

    उद्योग विभाग के सचिव ने मध्यप्रदेश औद्योगिक विकास निगम के कार्यकारी निदेशक सीएस धुर्वे के माध्यम से बीस अगस्त को एक पत्र भेजा और 21 अगस्त तक एक दिन में लगभग डेढ़ लाख पृष्ठों की जानकारी देने का दबाव बनाया। इसके जवाब में ईडी ने पत्र लिखकर निवेदन किया इस इस डेटा को संग्रहित करने में लगभग एक महीने का समय लगेगा इसलिए कृपया जवाब देने की समय सीमा बढ़ाने की कृपा करें। इस पत्र पर उद्योग विभाग ने कोई फैसला नहीं लिया और तीन सितंबर को ईडी को इकतरफा निलंबित कर दिया गया।
    उद्योग विभाग ने एक छोटे अफसर अंबरीश अधिकारी को भेजकर इकतरफा ईडी का कार्यभार हथिया लिया। श्री अंबरीश को विभाग के कुछ कर्मचारियों के साथ ईडी के दफ्तर भेजा गया और जबर्दस्ती ईडी की कुर्सी हथिया ली गई। ईडी को कार्यालय में मौजूद अपना निजी सामान भी नहीं उठाने दिया गया और सुरक्षा के लिए लगाए गए सभी कैमरे बंद कर दिए गए। उद्योग विभाग ने हाईकोर्ट को कहा कि कर्मचारियों के पीएफ, ईसआईसी चालान और फार्म 16 मे कोई छेड़छाड़ न हो सके इसके लिए श्रीमती सिंघई को निलंबित किया गया है जो कि कोई सजा नहीं है। एक स्वायत्तशासी निकाय की ईडी को पद से हटाने के इस षड़यंत्र में सैडमैप के ही फंड से लाखों रुपए निकाले गए और महाधिवक्ता समेत सचिव ने आठ प्रमुख वकीलों को खड़ा करके ऐसा माहौल बनाया कि हाईकोर्ट कोई राहत न दे पाए। यही नहीं अनुकूल रोस्टर का इंतजार करने के नाम पर भी मामले को कई दिनों तक लटकाया गया।

    श्रीमती अनुराधा सिंघई की कार और ड्राईवर छीन लिए गए। गौरतलब ये है कि जिस जानकारी को इकट्ठा करने के लिए उद्योग विभाग उन्हें एक महीने का वक्त नहीं दे रहा था उस जानकारी को अब तक उद्योग विभाग का अमला भी एकत्रित नहीं कर पाया है।फिर वो जानकारियां केंद्र या अन्य विभागों के पास संरक्षित है।जब सैडमैप के कर्मचारियों को दस दस महीनों तक वेतन नहीं मिल पा रहा था तब तो सूक्ष्म एवं लघु उद्योग विभाग कभी सामने नहीं आया। जिस स्ववित्त पोषित संगठन को अनुराधा सिंघई ने पैरों पर खड़ा किया उनके विरुद्ध कर्मचारियों को मानव ढाल बनाकर हमले किए जा रहे हैं। जिस नौकरी माफिया को सैडमैप से निकाल बाहर किया गया था उसने एक होनहार महिला अधिकारी का चरित्र हनन करने के लिए फर्जी मोबाईल चैट बनाया को पुलिस जांच में सामने आ गया। इस कूटरचना के आरोपी सिक्योरिटी एजेंसी के संचालक और उसके कर्मचारी का अपराध भी पुलिस ने उजागर कर दिया जिससे षड़यंत्र का पूरा खुलासा हो गया है। तब भी उद्योग विभाग ने आगे आकर कभी नौकरी माफिया के विरुद्ध सैडमैप को सहयोग नहीं किया।

    उन्होंने अपने पत्र में लिखा है कि एक महिला अधिकारी ने अपने पसीने और परिश्रम से मृत संगठन को पुर्नजीवित किया तो लोग फसल काटने आ गए और बीज बोने वाले को कुचलने लगे। इन लोगों को पुरुष भी कैसे कहा जा सकता है। एक झुंड में आकर ये एक महिला का शिकार करने में जुटे हुए हैं। ईडी ने अपने जिन सहयोगियों को संविदा आधार पर नियुक्त किया था उन्हें तोड़ने के लिए सचिव ने अध्यक्ष के रूप में फैसला लिया कि उन्हें सैडमेप में नहीं बल्कि किन्हीं अन्य सूचीबद्ध एजेंसियों के पेरोल पर रखा जाए। इसके लिए एक मानव संसाधन समिति का गठन किया जाए। ईडी ने सचिव को संभावित अधिकारियों की सूची भेजकर कहा कि आप आपने स्तर पर इस सूची को तय कर दीजिए । इसके बावजूद किसी समिति को गठित नहीं किया गया ताकि ईडी अपने सहयोगियों की टीम बढ़ाकर लंबित कार्यों का निपटारा न कर पाएं।

    लगभग तीन सालों में श्रीमती सिंघई ने सैडमेप का टर्नओवर चार गुना तक बढ़ा दिया है। नौकरियां बेचने वाले गिरोह को निकाल बाहर किया गया। मैनपावर आऊटसोर्सिंग उद्योग को साफ सुथरा बनाकर सरकारी कार्यालयों में संविदा के आधार पर नियुक्तियां सरल बना दी गईं। यही वजह थी कि सैडमेप को मध्यप्रदेश भंडार क्रय नियम अंतर्गत नैमेत्तिक नोडल एजेंसी बनाया गया।

    श्रीमती अनुराधा सिंघई ने अपने पत्र में लिखा है कि उन्होंने अगले दो सालों में लगभग पचास लाख नौकरियां सृजित करके रोजगार समस्या का समाधान करने का बीड़ा उठाया है। इस लक्ष्य को वे लगातार हासिल करती जा रहीं हैं जबकि नौकरी माफिया के लोग इन बेरोजगारों से नौकरी के एवज में रिश्वत लेकर बेरोजगारों और राज्य के साथ गद्दारी करने का षड़यंत्र कर कर रहे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री से अनुरोध किया है कि उनका गलत निलंबन रद्द किया जाए और उन्हें सम्मान के साथ बहाल किया जाए। उनके वित्तीय नुक्सान की भरपाई की जाए और वास्तविक दोषी को दंडित किया जाए।

    इस पत्र के जवाब में आईएएस और सूक्ष्म एवं लघु उद्योग विभाग के सचिव नवनीत कोठारी का कहना है कि श्रीमती सिंघई कई छोटे कर्मचारियों का वेतन नहीं दे रहीं थीं इसलिए उन्हें निलंबित किया गया है। जब उनसे कहा गया कि जिन कर्मचारियों की नौकरियां संदिग्ध हैं तो उन्हें वेतन क्यों दिया जाना चाहिए तो उन्होंने कहा कि हम मामले की जांच करा रहे हैं। उनके हटाए गए नौकरी माफिया को दुबारा सैडमैप में जगह दिए जाने पर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि मैं पिछले सात महीनों से सचिव पद पर आया हूं इससे पुराने मामलों के बारे में मैं कुछ नहीं बोल सकता।

    पाकिस्तान में सेना ने जिस तरह हर कमाई के तंत्र पर अपना कब्जा जमा लिया है और वहां कि अर्थव्यवस्था छिन्न भिन्न कर दी है उसी प्रकार मध्यप्रदेश में नौकरशाही ने हर कमाई के तंत्र पर अपना सिक्का जमा लिया है। लगभग अस्सी हजार करोड़ का स्थापना व्यय हड़प जाने वाला सरकारी तंत्र जनता की समस्याओं का समाधान देने में असफल साबित हो रहा है। उत्पादकता बढ़ाने के स्थान पर उद्यमियों से लूटमार की जाने लगी है।मोदी सरकार ने राज्य की आय बढ़ाने का लक्ष्य तय करके डाक्टर मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाकर भेजा है। चेतन काश्यप जैसे हुनरमंद उद्योगपति सूक्ष्म एवं लघु उद्योग विभाग के मंत्री बनाए गए हैं इसके बावजूद उनकी नाक तले नौकरी माफिया का षड़ंयत्र बदस्तूर जारी है।व्यापम भर्ती घोटाले की कहानियों की स्याही अभी सूखी नहीं है और एक बार फिर सेडमैप से नौकरियां बेचे जाने की नींव रखी जाने लगी है।उम्मीद की जानी चाहिए कि इस विषय पर राज्य के नीति निर्धारक एक बार गंभीरता से विचार करेंगे और समस्या का समाधान ढूंढ़ने में अपने हुनर का प्रयोग करेंगे। प्रशासनिक प्रमुख को बदलकर राज्य सरकार ने सुशासन की अपनी मंशा तो जाहिर कर दी है देखना है कि इसका असर कितने दिनों में साकार होता नजर आता है।

  • डॉ.मोहन यादव सरकार नहीं तो कौन चला रहा है मध्यप्रदेश

    डॉ.मोहन यादव सरकार नहीं तो कौन चला रहा है मध्यप्रदेश


    भोपाल,23 सितंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। पचास लाख युवाओं को नौकरी दिलाने का अभियान चला रहे सैडमैप की कार्यकारी निदेशक अनुराधा सिंघई(शर्मा) को इकतरफा आदेश से सस्पेंड करने वाला मामला गहराता जा रहा है। ईडी ने इस अन्याय की शिकायत मध्यप्रदेश हाईकोर्ट से की तो मध्यप्रदेश सरकार की ओर से महाधिवक्ता समेत आठ कानूनविद हाईकोर्ट में कैविएट का जवाब लेकर पहुंच गए। हाईकोर्ट ने लताड़ लगाई तो जजों को मैनेज करने के लिए सैडमैप से ही नौ लाख रुपए निकालकर मुकदमेबाजी पर खर्च कर दिए गए। मजेदार बात तो ये है कि इस अवैधानिक कार्रवाई के बारे में सूक्ष्म एवं लघु उद्योग मंत्री को भी विश्वास में नहीं लिया गया। मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव के सुशासन की जवाबदारी संभालने वालों को इस मामले में कुछ पता नहीं। सचिव नवनीत कोठारी कहते हैं मैं बता नहीं सकता। जब किसी को कुछ पता नहीं तो आखिर प्रदेश सरकार को चला कौन रहा है।


    जब सैडमैप घाटे की घाटी पर लुढ़क रहा था कर्मचारियों को दस दस महीने क तनख्वाह नहीं मिल रही थी सरकार इसे बंद करने का विचार कर रही थी तब एक कंपनी सेक्रेटरी अनुराधा सिंघई ने अपनी हिकमतअमली से संस्थान को अपने पैरों पर खड़ा कर दिया। आते ही उन्होंने जब संस्थान में जोंक की तरह लिपटे नौकरी माफिया को निकाल बाहर किया तो इन लोगों नेऊटपटांग कहानियां गढ़कर ईडी के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करवा दी। अदालत और सरकार को गुमराह करके की गई इस शिकायत की पोल हाईकोर्ट में खुल गई और श्रीमती सिंघई को बेदाग बरी कर दिया गया। उसी नौकरी माफिया ने इस बार सरकार के चोर दरवाजे से घुसकर संस्थान के निकाले गए भ्रष्ट अफसरों को दुबारा नौकरी में लाने की मुहिम चला दी है। इकतरफा सस्पेंशन के आदेश के माध्यम से सूक्ष्म एवं लघु उद्योग विभाग के एक जूनियर अधिकारी को यहां बिठा दिया गया उसने न तो विधिवत चार्ज लिया और न ही श्रीमती सिंघई के सस्पेंशन की प्रक्रिया पूरी की गई।


    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मेक इन इंडिया अभियान को सफल बनाने के लिए धड़ाधड़ नौकरियां जनरेट कर रहीं श्रीमती अनुराधा सिंघई को ये कहकर सस्पेंड किया गया कि वे आला अधिकारियों की बात नहीं मानती हैं। जबकि यही माईबाप संस्थान को कभी ठीक से नहीं चला सके । पिछले तीस सालों में संस्थान ने कोई करिश्मा नहीं किया। यहां पदस्थ ईडी और अन्य अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त रहे। लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू जैसे संस्थानों को छापे मारकर जांच करनी पड़ी। जब प्रदेश की एक हुनरमंद कंपनी सेक्रेटरी ने राज्य की पूंजी बनाने का पारदर्शी अभियान शुरु किया तो नौकरी माफिया ने तरह तरह के षड़यंत्र रचकर युवाओं की राह अवरुद्ध करने की मुहिम छेड़ दी है।


    हाईकोर्ट के पीठासीन जजों ने याचिका के निपटारे के लिए सरकार से जो सवाल जवाब किए उससे महाधिवक्ता समेत तमाम कानूनविद हकला गए। उन्होंने कई तरह के तर्क जुटाकर अदालत में रखे हैं इसके बावजूद वे किसी न्यायाधीश का सामना नहीं कर पा रहे हैं। नतीजतन रोटेशन के आधार पर किसी ऐसे जज का इंतजार किया जा रहा है जिसके माध्यम से शासन की काली करतूतों पर पर्दा डाला जा सके।


    सवाल तो ये है कि आखिर क्या वजह है कि राज्य सरकार स्वयं युवाओं को रोजगार दिलाने के अभियान में टांग फंसा रही है। सरकार में बैठे वो कौन लोग है जो राज्य की उत्पादकता बढ़ाने के अभियान में रोड़े अटका रहे हैं। यदि सैडमैप की ईडी कोई गलती कर रहीं थीं या कोई भ्रष्टाचार कर रहीं थीं तो राज्य मंत्रालय में बैठे आईएएस अफसरों में से ही कई अधिकारी उपलब्ध हैं जिनसे जांच करवाकर ईडी की गलतियां उजागर की जा सकतीं थीं। जिस नौकरी माफिया ने लोकायुक्त में शिकायत की उसी की जांच करवाकर ईडी के विरुद्ध कार्रवाई की जा सकती थी। ये न करते हुए शासन के विधि एवं न्याय विभाग ने मुकदमेबाजी पर मोटी फीस खर्च करने का फैसला ले लिया। सूत्र बताते हैं कि अपनी आत्मनिर्भरता की राह खोज रहे सैडमैप के ही फंड से नौ लाख रुपए वकीलों की फीस निकाली गई है।


    इस षड़यंत्र की भी पोल खुल गई है। कथित तौर पर शासन में सक्रिय जिस मंच के माध्यम से ये अभियान चलाया जा रहा है वह नौकरी माफिया का अड्डा बन गया है। सवा तीन लाख करोड़ रुपयों का बजट खर्च करने वाली मोहन यादव की भाजपा को पार्टी फंड के लिए कोई चंदे की जरूरत तो नहीं जो वह दिन को रात करने के लिए वकीलों और जजों की नाव पर डोल रही है।


    गौरतलब है कि प्रदेश के युवाओं में नौकरी की आकांक्षा होते हुए भी सरकार उन्हें रोजगार मुहैया नहीं करा पा रही है। लगभग अस्सी हजार करोड़ रुपयों के बजट से दस लाख अनुत्पादक सरकारी अमले को पाला पोसा जा रहा है। इसके विपरीत जब सरकार का ही एक संस्थान सरकारी के साथ कार्पोरेट,कोआपरेटिव, सेक्टर और उद्यमिता को बढ़ावा देकर रोजगार संवर्धन का पथ प्रशस्त कर रहा हो तो आखिर वो कौन है जो सरकार के इस अभियान में पलीता लगा रहा है। डाक्टर मोहन यादव की सरकार के नुमाईंदों को इसकी पड़ताल करनी होगी ताकि युवाओं को न्याय मिल सके और मोदी सरकार के राष्ट्रीय अनुष्ठान की आहूतियां बेरोकटोक जारी रह सकें।

    भारतीय जनता पार्टी स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा राजनीतिक संगठन होने का दावा करती है। कहा जाता है कि उसके नेतागण देश को सबसे तेज बढ़ती इकानामी बनाना चाहते हैं। ऐसे में जब कोई संस्थान उसके ही वोटरों को रोजगार दिलाने का बीड़ा उठाए हुए है तब उसे अस्थिर करने से आखिर किसे लाभ होने वाला है। ये षड़यंत्र भी तब चल रहा है जब सूक्ष्म एवं लघु उद्योग मंत्री चेतन काश्यप स्वयं उद्यमिता को बढ़ावा देने की मुहिम चलाए हुए हैं। वे खुद उद्योगपति हैं और सरकार से कोई वेतन भत्ते नहीं लेते हैं। भाजपा को सोचना होगा कि वह वित्तीय संरचनाओं में देश को आगे ले जाने वाले युवाओं को भर्ती करना चाहते हैं या फिर भेड़िया धसान युवाओं के सहारे शेखचिल्ली ख्वाब देखते रहना चाहेंगे।भारत माता की आराधना सुपुत्रों से होती है माफियागिरी से तो केवल पप्पू पैदा होते हैं।

  • सरकार ने तय किया तो विकास पथ पर बढ़ चला सैडमैप

    सरकार ने तय किया तो विकास पथ पर बढ़ चला सैडमैप


    कांग्रेस में भगदड़ मची है और सभी समझदार देशभक्त पुरानी लीक छोड़कर भाजपा में शामिल हो रहे हैं। इसकी वजह विकास की वो इबारत है जो मोदी सरकार ने बुलंद आवाज के रूप में उद्घोषित की है। मुक्त बाजार व्यवस्था का आगाज तो भारत में पूर्व प्रधानमंत्री पी व्ही नरसिंम्हाराव की सरकार ने किया था लेकिन उस पर अमल करने का भगीरथ नरेन्द्र मोदी की भाजपा ही कर पाई है। राहुल कांग्रेस आज भी मानने तैयार नहीं है कि उनके पूर्वज कितनी बड़ी गलती कर रहे थे। वे बार बार कांग्रेस की उसी विचारधारा के सहारे फूट के बीज बोकर गरीबी को संरक्षित करने का प्रयास कर रहे हैं जो उनकी दादी श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता मजबूत करने के लिए लागू की थी। जातिगत जनगणना हो या सरकारीकरण सभी का फटा ढोल पीटती राहुल कांग्रेस आज भी देश में भ्रमजाल फैलाने में जुटी है। अडानी अंबानी को गालियां देकर राहुल गांधी और उनकी चिलम भरने वाले कांग्रेसी बार बार विकास के पैरों में बेडियां पहनाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन जनता अब इस भ्रमजाल से बाहर निकल चुकी है। मध्यप्रदेश की भाजपा पर जबसे शिवराज सिंह चौहान की कांग्रेस की पूंछ पकड़कर चलने वाली सरकार का साया हटा है तबसे राज्य की भाजपा देश के मूलभूत विचार पथ पर मजबूती से कदम बढ़ाती नजर आ रही है। सरकार के निगम,मंडलों और संस्थाओं में सरकार की बदली कार्यप्रणाली की छाप स्पष्ट तौर पर दृष्टिगोचर होने लगी है। डॉक्टर मोहन यादव सरकार ने उन फिजूल योजनाओं को बंद कर दिया है जिनके माध्यम से सत्ता माफिया अपना उल्लू सीधा करता था। गरीब कल्याण की बात कहकर माफिया के गुर्गे ठेके, सप्लाई ,निर्माण आदि में खजाने की चोरी करते थे। हालांकि आज भी इन मुफ्तखोरों पर पूरी तरह अंकुश नहीं लग पाया है इसके बावजूद सरकार के प्रतिष्ठान इन नई राह पर धीरे धीरे बढ़ चले हैं। सरकार को प्रशिक्षित कार्यबल उपलब्ध कराने के लिए बनाया गया सैडमैप अपने काम को कुशलता पूर्वक अंजाम दे रहा है। सरकार के संरक्षण में यहां ऐसा प्रबंधन अपना कार्य कर रहा है जिससे संस्थान की आय में कई गुना इजाफा हो गया है। सिक्योरिटी एजेंसी, प्रशिक्षण संस्थाओं और नियोक्ताओं की आड़ में मलाई काटने वाले माफिया को खदेड़कर बाहर कर दिए जाने से मुफ्तखोरों का एक बड़ा वर्ग आहत हो गया है। भारत सरकार हो या राज्य सरकार दोनों आगे बढ़ते इस संस्थान को लगातार अपना संरक्षण और संबल प्रदान कर रहे हैं। वे जानते हैं कि विरोध या गड़बड़ियों के आरोप लगाने वाले कौन हैंऔर क्यों तिलमिला रहे हैं। जिन प्रशिक्षण कार्यक्रमों को बंद किया गया है उनके विकल्प के रूप में जो ढांचा खड़ा किया जा रहा है वह युवाओं के लिए ज्यादा उपयोगी और कारगर है। सरकार पर बोझ घटाने में भी ये सुधारात्मक उपाय सहयोगी साबित हो रहे हैं। दरअसल आजादी के बाद से संरक्षण वाद और बेचारगी को सहारा देने का जो भाव सरकारों के बीच पनप गया था उससे इतर कोई भी उपाय लोगों को आक्रामक नजर आता है। लोगों को लगता है कि यदि सरकार ने कृपा नहीं की तो देश भूखों मर जाएगा। जबकि जनता के विकास कार्यों को संरक्षण देने का सबसे उचित तरीका यह है कि उन पर से मुफ्तखोरों का बोझ हटा दिया जाए। यदि माफिया के संरक्षण में पनप रहे ये मुफ्तखोर खदेड़ दिए जाएंगे तो जाहिर है कि सरकार की कार्यक्षमता में जो इजाफा होगा उसका लाभ सीधे आम जन को मिलने लगेगा। सैडमैप अपने आर्थिक संसाधनों को लगातार विकसित कर रहा है और अपनी उपयोगिता स्थापित करता जा रहा है। कमोबेश ऐसे ही सुधार तमाम निगम मंडलों के लिए अपरिहार्य है। सरकार को कारगर और उपयोगी समूहों का नेतृत्व कर्ता बनाना है तो जाहिर है कि गरीबी और बेचारगी के नाम पर फल फूल रहे माफिया की विदाई करना सबसे उचित फैसला होगा। इसका विरोध करने वालों को भी अपनी सोच पर एक बार ठहरकर आत्ममंथन करना चाहिए ताकि वे अपनी गलतियों को सुधार सकें।

  • सेडमैप को सफल बनाया तो मिली अग्निपरीक्षा की चुनौती

    सेडमैप को सफल बनाया तो मिली अग्निपरीक्षा की चुनौती


    भोपाल,14 अगस्त(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, हिंदुस्तान को पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का जो महा अभियान चला रहे हैं उसे सफल बनाने के लिए मध्यप्रदेश की अनुराधा सिंघई जैसी उद्यमी अपने हुनर का इस्तेमाल करके योग्य मानव बल उपलब्ध करा रहीं हैं। नौकरियां बेचने के गोरखधंधे में शरीक न होने की वजह से सैडमेप की इस एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर को अग्निपरीक्षा देने के लिए मजबूर किया जा रहा है। इसके पीछे कई ऐसे दिग्गज भी अपने गुंताड़े फिट कर रहे हैं जो खुद को महान देशभक्त बताते नहीं थकते।

    तैतीस साल की अपनी यात्रा में सैडमेप को महज एक एचआर मैनेजर की तरह ही इस्तेमाल किया जाता रहा है। इस संस्थान की बेहतरी के लिए किसी ने इसलिए प्रयास नहीं किए क्योंकि उनके लिए तो ये केवल नौकरियां बेचने की आड़ थी। संयुक्त राष्ट्र की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में चार बार देश का नेतृत्व कर चुकीं अनुराधा सिंघई ने दो साल पहले जब मध्य प्रदेश सरकार के एमएसएमई विभाग के तहत इस स्वायत्त शासी निकाय CEDMAP (Centre for Entrepreneurship Development Madhya Pradesh) (उद्यमिता विकास केंद्र मध्य प्रदेश) की कार्यकारी निदेशक का पदभार संभाला तो ये संस्थान लगभग बंद होने की कगार पर पहुंच गया था। आज भी इसे वेतन और प्रशासनिक खर्चों के लिए भी सरकार से कोई धन सहायता नहीं मिलती है। संस्थान में कर्मचारियों का दस महीनों से वेतन नहीं बंटा था।एक महीने का वेतन पाने के लिए, नई ईडी को कार्यभार संभालते ही पिछले 10 महीनों का राजस्व अर्जित करना था । वह अगस्त 2021 से सभी स्टाफ को वेतन दिलवाने लगीं,लेकिन उन्होंने तय किया कि 10 महीने का पूरा वेतन देने से दक्षता हासिल किए बगैर वे अपना वेतन नहीं लेंगी। कार्यभार संभालने के चार महीने बाद उन्होंने पहला वेतन लिया।नतीजतन आज संस्थान अपना बोझ उठाने लगा है।

    जब उन्होंने संस्थान की काया पलटने का प्रमाण दे दिया तब उनकी नियुक्ति पर सवालिया निशान लगाए जा रहे हैं । प्रदेश की पंद्रह दिग्गज प्रमुख हस्तियों ने जो चयन किया उसे गलत ठहराने से पहले षड़यंत्रकारियों ने सैडमेप के इतिहास को पढ़ने का प्रयास भी नहीं किया। सैडमेप का गठन प्रदेश को प्रशिक्षित और उत्कृष्ट मानव बल मुहैया कराने के लिए किया गया था। संस्थान के संस्थापकों ने लंबी छानबीन के बाद ऐसे फार्मूले तैयार किए जिनके माध्यम से उद्यमी युवाओं की पहचान आसानी से की जा सकती थी। इसके बावजूद सत्ता के कई खिलाडियों के हस्तक्षेप से नौकरियां बेचने वालों का एक गिरोह भी इस प्रक्रिया के इर्दगिर्द इकट्ठा हो गया था। आज वही गिरोह खुद का सूरज अस्त होते देख रहा है।

    वार करने का जब कोई अवसर नहीं दिखा तो कुछ अधूरे दस्तावेजों को आधार बनाकर एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर के विरुद्ध अदालती हस्तक्षेप की मुहिम छेड़ दी गई। हालांकि मुहिम चलाने वाले स्वयं जानते हैं कि वे एक हारी लड़ाई लड़ रहे हैं क्योंकि देश अब एक अलग दौर में प्रवेश कर गया है।आज जबकि कॉरपोरेट सेक्टर में नए प्रबंधकों के लिए 25लाख का वेतन पैकेज आम बात हो गई है तब कंगाल सोच वाले षड्यंत्र कारी संस्थान की नई कार पर ही सवाल उठा रहे हैं।

    पहली बार जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार के लघु एवं सूक्ष्म उद्योग विभाग के मंत्री ओमप्रकाश सखलेचा ने अपने पिता स्वर्गीय वीरेंद्र कुमार सखलेचा की परंपरा को आगे बढ़ाकर अधीनस्थों को तथ्यात्मक कार्य करने की सुविधा उपलब्ध कराई तो एक बार फिर प्रशासनिक दक्षता को घेरा जाने लगा है।वहीं घर की गृहिणी की तरह साज संभाल करने वाली अनुराधा सिंघई ने अपने सुदीर्घ आर्थिक प्रबंधन ज्ञान का उपयोग करके संस्थान को नई राह पर अग्रसर कर दिया है।


    कौन हैं अनुराधा सिंघई

    पहले वह इंडो यूरोपियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री की संस्थापक अध्यक्ष रहीं हैं, जो एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त विकास क्षेत्र संगठन है, जिसे संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक संगठन की विशेष सलाहकार स्थिति प्राप्त है। वह 21 साल के अनुभव के साथ इंस्टीट्यूट ऑफ कंपनी सेक्रेटरीज ऑफ इंडिया की फेलो हैं।

    कानूनी, वित्त, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व, क्लस्टर विकास, व्यवसाय मॉडलिंग, उद्यमिता, प्रशिक्षण, आजीविका, अनुसंधान और अध्ययन, कॉर्पोरेट समाधान, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और सहित विकास और कॉर्पोरेट क्षेत्र में 21 वर्षों से अधिक के विशाल और बहुमुखी अनुभव के साथ एक अनुभवी उच्च प्रबंधन पेशेवर हैं ।प्रमुख आंदोलन- “पर्पल मार्च” के माध्यम से विकास क्षेत्र में सुधार, लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण में एक अनुभवी शख्सियत हैं । किसी भी क्षेत्र में संकल्पना से लेकर कार्यान्वयन तक अत्यधिक उद्यमशील, परिणामोन्मुखी, समाधान चाहने वाला संगठन उनकी सेवाओं को अव्वल मानता है । वे कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय, भारत सरकार के लिए कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) की विशेषज्ञ और पर्यटन सलाहकार भी हैं।

    उन्हें भारत के प्रतिनिधि के रूप में तीन बार रॉटरडैम, नीदरलैंड में सीबीआई (आयात संवर्धन केंद्र-नीदरलैंड मंत्रालय का एक निकाय) ने चुना और आमंत्रित किया । उन्होंने भारत से यूरोपीय देशों और संबद्ध विषयों पर निर्यात बाजार विकास पर 2001, 2007 में प्रशिक्षण प्राप्त किया।

    उन्होंने चार बार अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व किया, जिसमें 2014 में मलेशिया के कुआलालंपुर में भ्रष्टाचार के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन और इसके समीक्षा तंत्र पर नशीली दवाओं और अपराध पर संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (यूएनओडीसी) में प्रतिनिधित्व भी शामिल है।

    भारतीय ज्ञान प्रणाली और प्राचीन भारतीय विरासत में उनकी गहरी रुचि के कारण, उनके पास भारतीय प्राचीन ज्ञान प्रणाली- “वेद, वेदांग और दर्शन”, “उपनिषद”, “पुराण” और “गीता” और “भारतीय कला और साहित्य” में प्रशिक्षण और प्रमाण पत्र भी है। वास्तुकला”।

    उनके कुछ प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान हैं- 2012 में एमपी और सीजी राज्य के लिए दैनिक भास्कर द्वारा “बिजनेस वुमेन ऑफ द ईयर” पुरस्कार, 2019 में “अनहद नाद” सामाजिक कार्यकर्ता पुरस्कार, द इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ लायंस द्वारा “सेवा सम्मान”। 2020 में क्लब, आदि।
    वह विभिन्न मंचों पर अतिथि संकाय और नियमित वक्ता हैं, जैसे – राज्य कृषि शिक्षा और प्रशिक्षण संस्थान (एसआईएईटी), केंद्रीय पुलिस प्रशिक्षण अकादमी, भारतीय वन प्रबंधन संस्थान (आईआईएफएम), भोपाल, पर्यावरण और वन मंत्रालय, भारत सरकार, बैंक ऑफ भारत, स्टाफ ट्रेनिंग कॉलेज, भारतीय कंपनी सचिव संस्थान (आईसीएसआई), अन्य प्रबंधन कॉलेज, आदि।

    उन्होंने स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड, जर्मनी, फ्रांस, बेल्जियम, डेनमार्क, सिंगापुर, मलेशिया, दुबई, थाईलैंड और श्रीलंका का अध्ययन दौरा किया है।

    वह बिजनेस मॉडलिंग में विशेषज्ञ हैं और उन्होंने लगभग 1200 उद्यमियों का मार्गदर्शन किया है जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में सफलतापूर्वक अपने उद्यम स्थापित किए हैं।

    Profile of Ms Anuradha Singhai

    Anuradha Singhai is Executive Director of CEDMAP (Centre for Entrepreneurship Development Madhya Pradesh), an autonomous body under Department of MSME, Government of Madhya Pradesh. 

    Previously she was founder president of Indo European Chamber of Commerce and Industry, an internationally recognized development sector organization having Special Consultative Status of United Nations Economic and Social Organisation.

    She is fellow of the Institute of Company Secretaries of India with 21 years of post qualification experience.

    A seasoned upper management professional with vast and versatile experience of over 21 years in development and corporate sector including legal, finance, Corporate Social Responsibility, Cluster development, business modelling, entrepreneurship, training, livelihood,  research & studies, corporate solutions, international trade and government advisory.

    A veteran in development sector reforms, Gender equality and women empowerment through flagship movement-“Purple March”.  A highly enterprising, result-oriented, solution seeker, right from conceptualization to implementation, in any sector.

    Ms Singhai is also an expert on Corporate Social Responsibility  (CSR) for Ministry of Corporate Affairs, GOI and tourism consultant. 

    She was selected and invited by CBI (Centre for Promotion of Imports- a body of Ministry of Netherlands) at Rotterdam, Netherlands for three times as India representative & received training on Export market development from India to European countries & allied topics in 2001, 2007 and 2009.

    She represented India on international forum for four times, including representation at United Nations Office on Drug and Crime (UNODC) on United Nations Convention against Corruption and its review mechanism at Kualalumpur, Malaysia in 2014.

    Out of her profound interest in Indian Knowledge System and ancient Indian heritage, she also posses training and certificate in Indian ancient knowledge system- “Ved, vedang & Darshan”, “Upanishads”, “Puraan” and “Gita” and “Indian art and architecture”.

    Some of her prestigious awards and honors are-“Business Women of the year”  award by Dainik Bhaskar for the state of MP and CG in 2012, “Anhad Naad” social worker award in 2019, “Sewa Samman” by The International Association of Lions Club in 2020, etc.

    She is guest faculty and regular speaker at various forums like -State Institute of Agriculture Education and Training (SIAET), Central Academy for Police training, Indian Institute of Forest Management (IIFM), Bhopal, Ministry of Environment & Forest, GOI, Bank of India, Staff Training College, Institute of Company Secretaries of India (ICSI), Other Management colleges, etc.

    She has undertaken study visits at Switzerland, Netherlands, Germany, France, Belgium, Denmark, Singapore, Malaysia, Dubai, Thailand and Srilanka.

    She is an expert in business modelling and mentored around 1200 entrepreneurs who have successfully established their ventures in various sectors.