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  • आयुर्वेद के उपायों से महिलाओं का उपचार सरल

    आयुर्वेद के उपायों से महिलाओं का उपचार सरल

    महिला स्वास्थ्य विषय पर सेमिनार कर आयुर्वेद डॉक्टर्स ने मनाया मकर संक्रांति पर्व

    • भोपाल,14 जनवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। शहर के महिला आयुर्वेद डॉक्टर के संगठन वीमेन ऑफ़ विजडम के भोपाल चैप्टर द्वारा अपोलो सेज हॉस्पिटल के सेज आनंदम विभाग के संयुक्त तत्वाधान में महिला स्वास्थ्य संरक्षण, एवं प्रसूति से संबंधित जटिल समस्याओं एवम उनके समाधान, विषय पर एक दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया गया, जिसमें भोपाल संभाग की लगभग 100 आयुष महिला डॉक्टर्स ने हिस्सा लिया।

    • कार्यक्रम संयोजक डॉक्टर बबिता शर्मा ने बताया की यह संगठन नियमित रूप से स्वास्थ संबंधित महत्वपूर्ण विषयों पर सेमिनार, अतिथि व्याख्यान, कर्मशाला आदि का आयोजन करता रहता है। इस कार्यक्रम के प्रथम हिस्से में अपोलो सेज अस्पताल के स्त्री रोग विभाग के वरिष्ठ चिकित्सकों के साथ स्त्री रोग एवम प्रसव संबंधित जटिलताओं और उसके उपचार विषय पर हेल्थ टॉक के द्वारा अपना ज्ञानवर्धन किया तथा अगले हिस्से में संगठन के सभी सदस्यों ने मिलकर उत्तरायण पर्व के उपलक्ष्य में पीले रंग की ड्रेसेज पहनकर तथा पतंग प्रॉप के साथ रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम का जमकर मजा उठाया, जिसमे समूह नृत्य प्रतियोगिता, रैंप वॉक में सभी डॉक्टर ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया।
    • कार्यक्रम में आयुर्वेद के विकास और प्रचार के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए नगर की वरिष्ठ महिला आयुर्वेद विशेषज्ञ
      डॉक्टर निबेदिता मिश्र को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया । आयोजन समिति सदस्य डॉ गायत्री, डॉ प्रीति चोपड़ा, डॉ मोनिका, डॉ स्वाति, डॉ श्रद्धा डॉ आशी, डॉ नीरू कुंदवानी थीं।
  • आसव और अरिष्ट से संवारें स्वास्थ्य

    आसव और अरिष्ट से संवारें स्वास्थ्य

    अर्जुनारिष्ट : शरीर में वायु अधिक होने से हृदय की धड़कन बढ़ना, पसीना अधिक आना, मुँह सूखना, नींद कम आना, दिल घबराना, फेफड़े के रोग तथा हृदय रोगों में लाभकारी।

    अभ्रयारिष्ट : सभी प्रकार के बवासीर की प्रसिद्ध दवा है। कब्जियत, मंदाग्नि आदि उदर रोगों को नष्ट कर अग्नि को बढ़ता है। पीलिया, तिल्ली, उदर रोग, झांई, अर्बुद, ग्रहणी तथा ज्वरनाशक है।

    अमृतारिष्ट : सब तरह के बुखार में लाभकारी। विषम ज्वर, जीर्ण ज्वर व पित्त ज्वर में विशेष लाभ करता है। बालकों के यकृत बढ़ने पर लाभकारी।

    अरविन्दासव : बालकों को सूखा रोग, अतिसार, दूध न पचना आदि रोगों को दूर कर उन्हें हृष्ट-पुष्ट, बलवान बनाता है। पाचन क्रिया ठीक होकर रक्त, मांस व बल वृद्धि होती है। बुद्धि वर्द्धक व रक्त शुद्धि कारक है।

    अशोकारिष्ट : स्त्रियों के सब प्रकार के रोग, प्रदर, (लाल, पीला, सफेद पानी), मासिक धर्म के विकार, सिर पेडू व कमर वगैरह के दर्द, पित्त दाह (हाथ व पाँव के तलवों की जलन), प्रमेह, अरुचि, उदरशूल आदि इसके सेवन से नष्ट होते हैं। शरीर की शक्ति व मुख की कांति बढ़ती है।

    अश्वगंधारिष्ट : दिमागी ताकत बढ़ाने और शरीर को पुष्ट करने में विशेष लाभकारी है। मूर्छा (बेहोशी), अकारण भय, दिल की घबराहट, चित्त भ्रम, अनिद्रा, याददाश्त की कमी, मंदाग्नि, बवासीर, कब्जियत, काम में चित्त न लगना, स्नायु दुर्बलता व कमजोरी दूर करता है, बुद्धि, बल-वीर्य बढ़ाता है।

    उशीरासव : समस्त पित्त विकारों में लाभदायक। रक्तपित्त, प्रमेह, बवासीर आदि में विशेष लाभकारी। पांडू रोग, कोढ़, सूजन आदि में लाभप्रद।

    कनकासव : नए- पुराने दमा (श्वास), खाँसी, कुकर खाँसी, क्षय रोग आदि में अत्यंत लाभकारी। पुराना बुखार, रक्तपित्त और उरुक्षत रोगों में लाभदायक।

    पुटजारिष्ट : खून के दस्त, संग्रहणी, खूनी बवासीर, आमांश, रक्तातिसार व जीर्ण ज्वर आदि रोगों में अत्यंत लाभदायक ।
    कुमारी असाव : सब प्रकार के उदर रोग, तिल्ली व जिगर बढ़ना, गुल्म (वायु गोला), भोजन के बाद पेट का दर्द आदि उदर रोग नष्ट होते हैं। भोजन ठीक से पचता है तथा अरुचि दूर होती है। श्वास, खाँसी, बवासीर, पीलिया, धातुक्षय, हृदय रोग, कब्जियत व वात व्याधि को नष्ट करता है। यकृत रोग में विशेष लाभकारी।

    कुमारी आसव (लौह युक्त) : ऊपर लिखे गुणों के अतिरिक्त पथरी, अपस्मार, प्रमेह व शूल रोग नष्ट करता है तथा खून बढ़ाता है। मूत्र कृच्छ, अपस्मार, कृमि रोग, शुक्रदोष आदि में लाभकारी है।

    खदिरादिष्ट : सब प्रकार के चर्म रोग (फोड़े-फुंसी, खुजली आदि) गण्डमाला एवं खून की तमाम खराबियों आदि में विशेष लाभकारी है।

    चन्दनासव : शुक्रमेह (सुजाक), प्रमेह, पेशाब की जलन, धातु का जाना, पथरी आदि मूत्र विकारों में अत्यंत लाभदायक। पित्त शामक, पुष्टिकारक व हृदय को ताकत देता है। बल- वीर्य वर्द्धक।

    जीरकाद्यरिष्ट : हाथ-पैरों की जलन, भूख कम लगना व उदर विकारों पर अतिसार, संग्रहणी व सूतिका रोगों पर लाभकारी।

    दशमूलारिष्ट : बल, वीर्य व तेज बढ़ाता है तथा बाजीकारक है। स्त्रियों के प्रसूत रोग, अरुचि, शूल सूतिका, संग्रहणी, मंदाग्नि, प्रदर रोग, श्वास, खांसी वात व्याधि, कमजोरी आदि रोगों की प्रसिद्ध दवा है। शरीर पुष्ट करता है। प्रसूता स्त्रियों तथा प्रसूति के बाद इसका सेवन अवश्य करना चाहिए।

    दयाल द्राक्षासव : ताकत और ताजगी से भरा सुमधुर टॉनिक है। यह भूख बढ़ाता है। दस्त साफ लाता है, खून में तेजी लाता है, काम की थकावट दूर करता है तथा नींद लाता है। दिल व दिमाग में ताजगी पैदा करता है। बल, वीर्य, रक्त मांस बढ़ाता है। कफ, खाँसी, सर्दी-जुकाम, क्षय की खाँसी, कमजोरी में लाभदायक। सब ऋतुओं में बाल, वृद्ध, स्त्री, पुरुष सभी सेवन कर सकते हैं।

    द्राक्षारिष्ट : उरक्षत छाती में दर्द होना, कुकर खाँसी, गले के रोग, श्वास, काँस, क्षय, फेफड़ों की कमजोर व कब्जियत में लाभकारी तथा बलवर्द्धक है।
    देवदार्व्यारिष्ट : प्रमेह, वातरोग, ग्रहणी, अर्श, मूत्र, कृच्छ, दद्रु व कुष्ठ नाशक।

    पत्रांगासव : सब तरह के प्रदर रोग, गर्भाशय की शिथिलता, सोमरस, ज्वर, पांडू, सूजन मंदाग्नि, अरुचि आदि रोगों को दूर करता है। वेदनायुक्त रक्त प्रदर व श्वेत प्रदर पर लाभकारी।

    पिपल्यासव : मंदाग्नि, क्षय, कफ, खांसी, गुल्म, उदर रोग, ग्रहणी तथा अर्श नाशक। शोथ, यकृत व प्लीहा वृद्धि, ज्वर व अतिसार में लाभप्रद।

    पुनर्नवारिष्ट : शोथ (सूजन) रोग, उदर रोग, प्लीहा वृद्धि, यकृत, जिगर बढ़ना, अम्लपित्त गुल्म आदि रोगों को नष्ट करता है तथा अधिक पेशाब लाता है। शोथ, यकृत तथा गुर्दों को विशेष लाभकारी है।

    बबूलारिष्ट : रक्त विकार, अतिसार, खांसी, दमा, तपेदिक, बहुमूत्र, प्रमेह, प्रदर, उरक्षत, सोम रोग आदि में लाभकारी। छाती का दर्द, पेशाब में जलन व पीड़ा होना, धातु क्षय व सूखी खांसी में लाभकारी है।

    वासारिष्ट : पुरानी खाँसी, श्वास, रक्तपित्त, बुखार में खाँसी के साथ कफ और खून का निकलना, सूखी खाँसी, गले के रोग आदि रोगों में अत्यंत लाभकारी है।

    भृंगराजासव : धातु क्षय, कमजोरी, स्मरण शक्ति की कमी, नेत्र रोग, बालों का सफेद होना, प्रमेह, खाँसी आदि रोग नष्ट करता है। बलकारक व कामोद्दीपक है तथा बन्ध्यापन नष्ट करता है व खून साफ करता है।
    मुस्तकारिष्ट : अग्निमांद्य, संग्रहणी, अजीर्ण, अतिसार, आदि अनेक रोगों को नष्ट करता है तथा भूख बढ़ाता है।

    महामंजिष्ठाद्यरिष्ट : सब प्रकार के कुष्ठ रोग, खून की खराबियाँ, उपदंश (गर्मी), फोड़े-फुंसी चकत्ते आदि रोगों पर लाभकारी तथा चर्म रोग नष्ट करता है।

    रोहितकारिष्ट : तिल्ली, जिगर (लीवर), गुल्म (वायु गोला), अग्निमांद्य, पांडू, संग्रहणी आदि रोगों को दूर करता है। जिगर व तिल्ली के बढ़ जाने पर इसके उपयोग से विशेष लाभ होता है।

    लोध्रासव : कफ तथा पित्त जनक प्रमेह, पेशाब की जलन, मूत्राशय में दर्द, पेशाब के रास्ते में सूजन, प्रदर आदि स्त्रियों के रोगों पर विशेष लाभकारी है। गर्भाशय की शुद्धि करता है। पांडू, बवासीर, ग्रहणी, खांसी, चक्कर आना आदि नष्ट करता है।

    लोहासव : खून बढ़ाने की सुप्रसिद्ध औषधि। खून की कमी, पीलिया, गुल्म रोग, बवासीर, भगंदर संग्रहणी, बढ़े हुए जिगर और तिल्ली में विशेष लाभदायक है। दमा, खाँसी, क्षय, जीर्ण ज्वर, हृदय रोग आदि में लाभप्रद तथा बलवर्धक।

    विडंगारिष्ट व विडंगासव : सब प्रकार के पेट के कृमि (कीड़ों) को नष्ट करता है तथा भगंदर, गण्डमाला, गुल्म, अश्मीर, विद्रधि, कफ, खांसी, श्वास आदि रोगों में भी लाभदायक है।

    सारस्वतारिष्ट : बुद्धिवर्द्धक, आयु, वीर्य एवं कांतिवर्धक है। स्मरण शक्ति बढ़ाता है तथा मज्जान्तु हृदय व दिमाग को ताकत पहुँचाता है। मानसिक एवं शारीरिक दुर्बलता, आवाज भारी होना, नींद न आना, स्वर भंग, रुक-रुककर बोलना, (तोतलापन), हकलाना, कानों में तरह-तरह की आवाजों का होना, कम सुनाई देना आदि में अच्छा लाभ होता है। दिमागी काम करने वालों के लिए उत्तम ब्रेन टॉनिक है। उन्माद ऋतु दोष, वीर्य रोग, मूर्च्छा व अपस्मार को नष्ट करता है और बच्चों के तोतलेपन व मंदबुद्धि में लाभकारी।

    सरिवाद्यासव : खून साफ करने की प्रसिद्ध दवा है। यह खून और पित्त की खराबी को मिटाता है। फोड़ा-फुंसी, खाज-खुजली, चकत्ते, वातरक्त आदि रक्त विकार, सुजाक, भगंदर, हाथ-पैर, आँख, छाती की जलन, गठिया, आमवात, वात व्याधि सभी प्रकार के रक्त दोष उपद्रव, कब्जियत, रक्त संचार की अनियमितता आदि की उत्तम औषधि है।

    नोट : अधिकांश आसव-आरिष्ट 10 से 25 मिलीलीटर तक बराबर पानी मिलाकर भोजन करने के बाद दोनों समय पिए जाते हैं।

  • आयुर्वेद में पहले से उपलब्ध है वायरस मुक्ति का उपायःआचार्य हुकुमचंद शनकुशल

    आयुर्वेद में पहले से उपलब्ध है वायरस मुक्ति का उपायःआचार्य हुकुमचंद शनकुशल

    भोपाल,8 अप्रैल(प्रेस इन्फार्मेशन सेंटर)। आयुर्वेद की शास्त्रोक्त पद्धति से बनाई गईं औषधियां कोरोना को परास्त करने में पूरी तरह सक्षम हैं।इसके पहले भी वायरसों के हमलों से आयुर्वेद रक्षा करता रहा है। आधुनिक चिकित्सा के वैज्ञानिक अनुसंधानों के बीच आयुर्वेद की जो परंपरा भुला दी गई है उस पर अमल करके भारत को दुनिया का मार्गदर्शन करना चाहिए। राजधानी में भारतीय योग अनुसंधान केन्द्र आनंदनगर के संस्थापक आचार्य हुकुमचंद शनकुशल ने कोरोना के उपचार की जो दवाएं विकसित की हैं वे उनके माध्यम से लोगों को मुफ्त उपचार सेवाएं भी दे रहे हैं।

    श्री शनकुशल ने बताया कि उन्होंने आयनिक पानी और अग्नि तत्व के माध्यम से कोरोना के उपचार की पूरी विधि विकसित की है। इस उपचार विधि में स्वर्णिम जल, विष्णुजल,नस्य, और धूनी मसाला व शर्बत बनाया है जो कोरोना संक्रमण को रोकने में कारगर है। उन्होंने अपने दावे की प्रमाणिकता को साबित करने के लिए आयुर्वेद में दिए गए उपायों का भी विवरण प्रस्तुत किया है। आयनिक जल का प्रयोगशाला में भी परीक्षण कराया गया है जिससे इसके सुरक्षित होने का विश्वास बढ़ेगा। इन दवाओं से उन्होंने आम मरीजों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सफलता भी पाई है।

    योग और आयुर्वेद को पिछले पचास सालों से भी अधिक समय से वैज्ञानिक आधार पर परिभाषित करते रहे आचार्य हुकुमचंद शनकुशल ने बताया कि ये जग जाहिर तथ्य है कि पीने का पानी यदि शुद्ध हो तो कई बीमारियों से बचा जा सकता है। पानी हमारी कोशिकाओं का प्रमुख तत्व भी होता है। हमारा शरीर कई किस्म के न्यूरोन्स की गतिविधियों से ही सक्रिय रहता है। यही वजह है कि स्वर्णिम जल शरीर पर तुरंत असर करता है। इसे बनाने के लिए ज्वालामुखी के चार सौ फीट की गहराई से निकाले गए पानी का शोधन किया जाता है।इस पानी में सोना, मैग्नीशियम और एल्यूमीनियम जैसे तत्वों के लवण मौजूद हैं। गहन चुंबकीय क्षेत्र से गुजारे गए इस पानी को सोने और तांबे के बीच से गुजारा जाता है। यही वजह है कि ये आयनिक पानी हमारे शरीर पर तेज असर डालता है। सरकार यदि पहल करे तो आम जनता को ये जल बहुत सस्ती कीमत पर उपलब्ध कराया जा सकता है।

    आचार्य हुकुमचंद शनकुशलः विश्व को स्वस्थ और सफल बनाने का सतत अनुष्ठान

    गौमूत्र से निर्मित विष्णुजल कोरोना जैसे वायरसों को निष्क्रिय करने में प्रभावी भूमिका निभाता है। शास्त्रोक्त विधि से इसे बनाने का विवरण कई ग्रंथों में पहले से मौजूद है। इसे बनाने के लिए आठ लीटर बछिया के मूत्र में आधा किलो सौंफ, आधा किलो धनिया मिलाकर 24 घंटे के लिए रख दिया जाता है। इसके बाद इसा अर्क उतार लिया जाता है। पांच लीटर इस अर्क में 250 ग्राम गंधक शोधित आंवला सार, 250 ग्राम चूना, 5 ग्राम लौंग, 5 ग्राम इलायची मिलाई जाती है। इसे नारंगी होने तक उबाला जाता है और फिर 24 घंटे बाद निथारकर छानकर रख लिया जाता है। इससे त्वचा को शुद्ध किया जाता है और शरीर पर भी छिड़ककर वायरस को निष्क्रिय कर दिया जाता है।

    कोरोना जिस तरह से मस्तिष्क की चेतना प्रभावित करता है और फेंफड़ों में रुकावट लाता है उसे बेअसर करने के लिए वैदिक नस्य बनाई जाती है। इसमें अपामार्ग, अरीठा, आक(मदार), गोलोचन, और केसर डालकर पीसा जाता है। इसे बनाने के लिए 25ग्राम चावल का आटा, 2 ग्राम शुद्ध केसर, 10 ग्राम अपामार्ग का आटा, 70 मिलीग्राम सफेद अर्क का दूध मिलाकर 24 घंटे बाद घोंटा जाता है। 5 ग्राम अरीठे का झाग 2 मिलीलीटर मिलाकर तब तक घोंटा जाता है जब तक कि ये सूख न जाए। इसमें 1 ग्राम शुद्ध गोलोचन मिलाकर घोंट दिया जाता है। इस नस्य को दिन में 11 बजे से 4 बजे के बीच सूंघा जाता है। अंगूठा और उसके पास वाली उंगली से चुटकी भर नस्य लेकर जोर से सूंघा जाता है। सूर्य की ओर नासा छिद्र करके सांस ली जाती है तो छींकें आने लगती हैं। कफ निकलने के बाद छींकें बंद हो जाती है। इसके बाद उंगली में थोड़ा गाय का घी मिलाकर नाक का सूखापन दूर कर दिया जाता है। इसके उपयोग से नाक से पानी बहना, सर्दी जुकाम और बुखार से रक्षा होती है और मस्तिष्कीय चेतना बढ़ती है।

    कोरोना में फेंफड़ों में फाईब्राईड विकसित हो जाते हैं और उनका स्पंज समाप्त होने लगता है।इससे फेंफड़ों में सांस रोक सकने की क्षमता समाप्त हो जाती है। इसका इलाज हवन प्रक्रिया से किया जाता है। हवन की जो समिधा बनाई जाती है उसमें अर्क(मदार) की लकड़़ी का उपयोग होता है। धूम लेने के लिए काले धतूरे के पत्ते, सत्यानाशी के बीज, बिल्ली की विष्टा, मोर पंख, गाय का सींग, सांप की केंचुली, नीम के पत्ते, वासा की छाल, अर्क के फूल, तुलसी पत्र, बहेड़ा पाऊडर, घी, शहद और गुग्गल मिलाकर धूनी दी जाती है। इससे फेंफड़े खराब नहीं हो पाते। अथर्व वेद की भूत विद्या में इस फार्मूले का विवरण दिया गया है। सन्निपात, भूत बाधा और नाड़ी चिकित्सा में ये विधि बहुत सफल साबित होती रही है। कोरोना वायरस को बेअसर करने में भी यही विधि रामबाण साबित होगी।

    गले की नली में खराश करने वाला कोरोना वायरस लिवर और किडनी को भी क्षतिग्रस्त करता है। इसके निदान के लिए आंवला, बहेड़ा, पारिजात और गुड़हल के फूल का शरबत रोगी को पिलाया जाता है। इससे वायरस का असर भी समाप्त होता है और पीड़ित की चेतना भी लौटने लगती है।

    श्री शनकुशल ने बताया कि पूरी चिकित्सा विधि अग्नि और आयनिक जल के प्रयोग पर केन्द्रित है। इसका असर अब तक वायरसों के आक्रमण से रक्षा के लिए होता रहा है। यजुर्वेद में भी इन विधियों का उल्लेख है। बड़े पैमाने पर ये कार्य सरकारी संरक्षण के बगैर संभव नहीं है। यदि कोरोना संक्रमितों को इस विधि से उपचार दिया जाए तो न केवल मरीजों को ठीक किया जा सकता है बल्कि देश के संसाधनों की बड़ी क्षति भी बचाई जा सकती है।

  • कोरोना वायरस संक्रमण से मुक्ति दिलाएगा आयुर्वेद

    कोरोना वायरस संक्रमण से मुक्ति दिलाएगा आयुर्वेद

    भोपाल,28 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। कोरोना वायरस(Corona Virus) ने चीन में जिस तरह का कोहराम मचा रखा है उससे पूरी दुनिया दहशत में आ गई है। विश्व के कई देशों में कोरोना वायरस से निपटने की तैयारियां चल रहीं हैं। वे देश खासे दहशत में हैं जहां मांसाहार को बड़े पैमाने पर अपनाया जाता है। यही वजह है कि कई देशों में शाकाहार अपनाने की मुहिम चल पड़ी है। इस बीच भारत में कोरोना वायरस का इलाज आयुर्वेदिक तरीकों से करने के दावे किए जाने लगे हैं। कमोबेश यही दावे एड्स जैसी बीमारी को नियंत्रित करने के भी किए जाते रहे हैं।

    दरअसल में आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति जीवन दर्शन की वो शैली है जो इंसान को रोगों की गिरफ्त में ही नहीं आने देती। यदि भूल वश स्वस्थ इंसान का शरीर बीमार भी हो जाए तो आयुर्वेद में वात पित्त और कफ को संतुलित करके स्वस्थ बनाने की विधि मौजूद है। नाड़ी विज्ञान से शरीर की दशा को समझा जाता है फिर आयुर्वेदिक दवाओं से नाड़ी को संतुलित किया जाता है। इसी विधि से जटिल से जटिल रोगों का उपचार हो जाता है। यह उपचार पूरे प्राकृतिक तरीकों से किया जाता है।

    कोरोना वायरस के प्रकोप को लेकर मध्यप्रदेश के वरिष्ठ आयुर्वेदाचार्य कहते हैं कि आयुर्वेदिक दवाओं के संतुलित इस्तेमाल से कोरोना वायरस से मुक्ति पाई जा सकती है। जो फार्मूला सुझाया गया है उसके मुताबिक हरिद्राखंड, संशमणि बटी, और त्रिकटु चूर्ण के युक्तियुक्त प्रयोग से कोरोना वायरस आसानी से परास्त हो सकता है। तुलसी और गिलोय का काढ़ा जिसमें सात काली मिर्च डालकर उबाला गया हो वह कोरोना वायरस के संक्रमण को समाप्त कर सकता है। भारत में फेंफड़ों के रोगों और सर्दी जुकाम में इन दवाओं का इस्तेमाल सदियों से किया जाता रहा है। ये दवाएं सभी प्रमुख आयुर्वेदिक दवा फार्मेसियां बनाती हैं।

    हरसिंगार के पांच पत्तों की चाय बनाकर पीने से भी गंभीर संक्रमण को रोकने में मदद मिलती है।