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  • दुनिया की हर थाली में हो भारत का जैविक खाद्यान्नःप्रधानमंत्री मोदी

    दुनिया की हर थाली में हो भारत का जैविक खाद्यान्नःप्रधानमंत्री मोदी

    नई दिल्ली,16 अगस्त(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। सरकार ने अनुसंधान बुनियादी ढांचे की समीक्षा, जलवायु के अनुकूल फसल किस्मों के विकास, एक करोड़ किसानों के बीच प्राकृतिक खेती को बढ़ावा और जैव-इनपुट संसाधन केंद्रों की स्थापना जैसी पहल के जरिये कृषि उत्पादकता को बढ़ाने के लिए एक व्यापक रणनीति की रूपरेखा तैयार की है।
    इसके अलावा सरकार के अन्‍य प्रयासों में दलहन एवं तिलहन में आत्मनिर्भरता हासिल करना, सब्जी उत्पादन क्लस्टर विकसित करना, कृषि में डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को लागू करना और नाबार्ड के जरिये झींगा पालन को प्रोत्‍साहित करना शामिल है। इन पहलों का उद्देश्य कृषि को आधुनिक बनाना और कृषि क्षेत्र में सतत विकास सुनिश्चित करना है। आइए, सरकार द्वारा इस क्षेत्र को उन्नत बनाने और इस संबंध में लागू सरकारी योजनाओं की प्रगति के बारे में चर्चा करते हैं।

    1. प्राकृतिक खेती
      माननीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केंद्रीय बजट में कृषि को प्राथमिकता दी है। उन्‍होंने प्रमाणन एवं ब्रांडिंग द्वारा समर्थित 1 करोड़ किसानों के समक्ष प्राकृतिक खेती करने का प्रस्ताव रखा है। इसका कार्यान्वयन इच्छुक ग्राम पंचायतों के साथ वैज्ञानिक संस्थानों के जरिये किया जाएगा। इसके अलावा आवश्यकता पर आधारित 10,000 बीआरसी स्थापित किए जाएंगे, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर सूक्ष्म उर्वरक एवं कीटनाशक विनिर्माण नेटवर्क स्‍थापित होगा।
      क्या है प्राकृतिक खेती
      प्राकृतिक खेती रसायन मुक्त खेती है, जिसमें पशुधन को शामिल करते हुए कृषि के प्राकृतिक तरीके और भारतीय पारंपरिक ज्ञान पर आधारित विविध फसल व्‍यवस्‍था शामिल हैं। इसका उद्देश्‍य जलवायु के प्रति बेहतर अनुकूलता के साथ मृदा स्‍वास्‍थ्‍य में सुधार लाने और किसानों की इनपुट लागत को कम करने के लिए गैर-सिंथेटिक रासायनिक इनपुट का उपयोग करना है।
      भारत में प्राकृतिक खेती
      भारत सरकार ने परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) के तहत सीमित क्षेत्रों में ‘भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (बीपीकेपी)’ के जरिये 2019-20 में प्राकृतिक खेती की शुरुआत की थी। बीपीकेपी को राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन (एनएमएनएफ) के जरिये मिशन मोड में आगे बढ़ाने की योजना है।
      एनएमएनएफ, को खेती की प्रकृति पर आधारित टिकाऊ प्रणालियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्रस्तावित किया जा रहा है। इसमें कृषि इनपुट भी शामिल है ताकि बाहर से खरीदे गए इनपुट पर निर्भरता कम होगी, मृदा क्वालिटी बेहतर होगी और इनपुट लागत में कमी आएगी। साथ ही इसमें विस्तार एवं अनुसंधान संस्थानों की खेतों पर कृषि-पारिस्थितिकी अनुसंधान एवं ज्ञान पर आधारित विस्तार क्षमताओं को मजबूत करना, प्राकृतिक खेती के फायदे, संभावना एवं कार्यप्रणाली पर बेहतर ज्ञान एवं प्रस्‍तुति के लिए प्राकृतिक खेती कर रहे किसानों के अनुभव और वैज्ञानिक विशेषज्ञता को साथ लाते हुए उनसे सीखना, प्राकृतिक रूप से उगाए गए रसायन मुक्त उत्पादों के लिए वैज्ञानिक तौर पर समर्थित एवं किसानों के अनुकूल आसान प्रमाणन प्रक्रियाएं स्थापित करना और प्राकृतिक रूप से उगाए जाने वाले रसायन मुक्त उत्पादों के लिए एकल राष्ट्रीय ब्रांड स्‍थापित करना और उसका प्रचार करना शामिल हैं।
      चार वर्षों (2022-23 से 2025-26) की अवधि के लिए इस योजना का कुल परिव्यय 2,481.00 करोड़ रुपये है।
    2. दलहन एवं तिलहन में आत्मनिर्भरता के लिए सरकारी पहल
      दलहन एवं तिलहन में आत्मनिर्भरता हासिल करना भारत सरकार की प्राथमिकता रही है। इसके लिए विभिन्न पहल एवं योजनाएं शुरू की गई हैं:
      राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एनएफएसएम)
      भारत सरकार द्वारा 2018-19 से देश में खाद्य तेल में उत्‍पादन बढ़ाकर, आयात का बोझ कम करने के उद्देश्‍य से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन- तिलहन (एनएफएसएम-ओएस) को लागू किया गया है।
      इसका उद्देश्य देश में तिलहन (मूंगफली, सोयाबीन, रेपसीड एवं सरसों, सूरजमुखी, कुसुम, तिल, नाइजर, अलसी एवं अरंडी) के उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि करना है। साथ ही, पाम ऑयल एवं वृक्ष आधारित तिलहन (जैतून, महुआ, कोकम, जंगली खुबानी, नीम, जोजोबा, करंज, सिमरोबा, तुंग, च्यूरा एवं जेट्रोफा) का क्षेत्र विस्तार करना है।
      सरकार के प्रयासों के परिणामस्वरूप तिलहन की खेती के लिए कुल क्षेत्र 2014-15 में 2.56 करोड़ हेक्टेयर से बढ़कर 2023-24 में 30.08 करोड़ हेक्टेयर हो गया है, जो 17.5 % की वृद्धि दर्शाता है। परिणामस्‍वरूप पिछले 9 वर्षों में खाद्य तेलों का घरेलू उत्पादन 2015-16 में 86.30 लाख टन के मुकाबले 40 % से अधिक बढ़कर 2023-24 में 121.33 लाख टन हो गया है। घरेलू मांग में भारी उछाल के बावजूद अब आयात पर हमारी निर्भरता 63.2 % से घट कर 57.3% हो गयी है । राष्ट्रीय पाम ऑयल मिशन के तहत भी हमारे किसानों की मदद से तिलहन की खेती के लिए क्षेत्र बढ़कर 4.7 लाख हेक्टेयर तक हो गया है।
      न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी)
      एमएसपी हमारे किसानों के लिए उनकी उपज की वास्तविक लागत के मुकाबले 50 प्रतिशत अधिक मूल्‍य सुनिश्चित करता है । इस प्रकार कृषि लागत पर आकर्षक रिटर्न मिलता है। आज एमएसपी सबसे अधिक है । एक दशक पहले के मुकाबले मसूर के एमएसपी में 117 प्रतिशत, मूंग के एमएसपी में 90 प्रतिशत, चना दाल के एमएसपी में 75 प्रतिशत, तुअर और उड़द के एमएसपी में 60 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। नाफेड और एनसीसीएफ, किसानों को दलहन और मसूर की खेती में विविधता लाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। वे किसानों के साथ सरकारी खरीद के लिए एक निर्धारित मूल्‍य पर 5 साल का अनुबंध करने के लिए तैयार हैं। यह भारत सरकार द्वारा उठाया गया एक बड़ा कदम है ।
    3. अधिक उपज और जलवायु के अनुकूल किस्में: भारत में समय की मांग
      भारत सरकार ने देश भर में कृषि पद्धतियों में क्रांतिकारी बदलाव लाने के उद्देश्य से 32 क्षेत्रीय व बागवानी फसलों में 109 नई उच्च उपज देने वाली और जलवायु-अनुकूल किस्मों को पेश करने की एक महत्वपूर्ण पहल की घोषणा की है। इन नई किस्मों को फसल उत्पादकता बढ़ाने और सस्‍टेनेबिलिटी सुनिश्चित करते हुए विविध जलवायु परिस्थितियों के अनुकूललिए विकसित किया गया है।
      वर्ष 2014-15 से 2023-24 के दौरान अधिक उपज देने वाली कुल 2,593 किस्में जारी की गईं। इनमें 2,177 जलवायु के अनुकूल (कुल का 83 प्रतिशत) जैविक एवं अजैविक तनाव प्रतिरोध के साथ और 150 जैव-फोर्टिफाइड फसल किस्में शामिल हैं। इसके अलावा 56 फसलों की 2,200 से अधिक किस्मों के 1 लाख क्विंटल से अधिक ब्रीडर बीजों का उत्पादन किया जा रहा है। जलवायु के अनुकूल प्रौद्योगिकी को अपनाए जाने से असामान्य वर्षों के दौरान भी उत्पादन में वृद्धि हुई है।
    4. कृषि में बदलाव: डिजिटल फसल सर्वेक्षण में क्रांति लाने के लिए डीपीआई पहल
      कृषि में डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई) को लागू किए जाने संबंधी सरकार की पहल का उद्देश्य किसानों को लाभ पहुंचाने और कृषि दक्षता को बेहतर करने के लिए डिजिटल तकनीक का फायदा उठाते हुए इस क्षेत्र में क्रांति लाना है। पायलट परियोजनाओं की सफलता से उत्साहित होकर इस राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम को तीन वर्षों के दौरान राज्य सरकारों के सहयोग आगे बढ़ाया जाएगा।
      शुरुआती चरण में खरीफ सीजन के दौरान 400 जिलों में डिजिटल फसल सर्वेक्षण किया जाएगा। इसके तहत डीपीआई का उपयोग करते हुए तीनों फसल सीजन में खेतों में बोआई की गई फसल और उसके रकबे के बारे में विस्तृत आंकड़े जुटाए जाएंगे। इससे हरेक खेत के लिए सटीक, वास्तविक समय आधारित फसल क्षेत्र की जानकारी प्रदान करने और गिरदावरी जैसे पारंपरिक सर्वेक्षण तरीकों को बदलने में मदद मिलेगी। इन पहलुओं के डिजिटलीकरण के साथ सरकार सब्सिडी वितरण, बीमा कवरेज और आपदा प्रबंधन सहित कृषि रणनीतियां तैयार करने और उन्हें बेहतर ढंग से लागू कर सकती है।
    5. तकनीकी पहल: सुलभ किसान क्रेडिट कार्ड के साथ किसानों का सशक्तिकरण
      कृषि एवं किसान कल्याण विभाग (डीएएंडएफडब्लू) अपनी प्रमुख संशोधित ब्याज सहायता योजना (एमआईएसएस) के जरिये किसानों की सहायता के प्रतिबद्ध है। इसका उद्देश्य किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) के जरिये अल्पकालिक आवश्यकताओं के लिए किफायती ऋण प्रदान करना है। इस योजना की दक्षता, पारदर्शिता और समय पर लाभ वितरण को बेहतर करने के लिए कृषि एवं किसान कल्याण विभाग ने पिछले साल शुरू किए गए किसान ऋण पोर्टल (केआरपी) के जरिये दावा प्रक्रिया को डिजिटल कर दिया है।
      फिलहाल केआरपी 1,71,221 बैंक शाखाओं, 33 अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (एससीबी), 356 जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों (डीसीसीबी), 20 राज्य सहकारी बैंकों (एसटीसीबी), 45 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (आरआरबी), आरबीआई और नाबार्ड के साथ एकीकृत हो चुका है। यह पोर्टल फिलहाल किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) खातों के लिए ब्याज अनुदान एवं पीआरआई दावों को प्रॉसेस कर रहा है, जिसमें वर्ष 2024-25 के लिए 22,600 करोड़ रुपये का बढ़ा हुआ आवंटन शामिल है।
      इसके अलावा सरकार संस्थागत ऋण तक व्यापक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए प्रौद्योगिकी का फायदा उठाते हुए किसान ऋण पोर्टल (केआरपी) की क्षमताओं को बढ़ा रही है। इससे किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) के जरिये कृषि ऋण तक निर्बाध और बिना किसी परेशानी के पहुंच सुन‍िश्चित होगी। सरकार के प्रयासों के परिणामस्वरूप चालू केसीसी खातों की संख्या 2013 में 6.46 करोड़ से बढ़कर 2024 में 7.75 करोड़ हो गई है। इसी प्रकार इन केसीसी खातों में बकाया ऋण 2013 में 3.63 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024 में 9.81 लाख करोड़ रुपये हो गया है।
    6. पर ड्रॉप मोर क्रॉप (पीडीएमसी)
      देश में 2015-16 से पर ड्रॉप मोर क्रॉप (पीडीएमसी) यानी प्रति बूंद अधिक फसल योजना लागू की जा रही है। पीडीएमसी सूक्ष्म सिंचाई यानी ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणालियों के माध्यम से खेत स्तर पर जल उपयोग दक्षता बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करती है। सूक्ष्म सिंचाई से जल की बचत होने के साथ-साथ उर्वरक उपयोग, श्रम खर्च एवं अन्य इनपुट लागत में भी कमी आती है और किसानों की समग्र आय में वृद्धि होती है।
      इस योजना के तहत सूक्ष्म सिंचाई की व्‍यवस्‍था के लिए लघु एवं सीमांत किसानों को 55 प्रतिशत और अन्य किसानों को 45 प्रतिशत की दर से वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। सूक्ष्म सिंचाई के कवरेज का विस्तार करने के लिए संसाधन जुटाने में राज्यों की मदद के लिए भारत सरकार ने राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के साथ मिलकर सूक्ष्म सिंचाई कोष (एमआईएफ) स्‍थापित किया है।
      वर्ष 2015-16 से 2023-24 तक पीडीएमसी के जरिये देश में सूक्ष्म सिंचाई के तहत कुल 90 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया गया है, जो पीडीएमसी से पहले के नौ वर्षों की कवरेज की तुलना में काफी (92 प्रतिशत) अधिक है।
      निष्कर्ष
      केंद्र सरकार की समग्र कृषि रणनीति का उद्देश्य अनुसंधान एवं विकास के जरिये उत्पादकता एवं पर्यावरण के प्रति अनुकूलता को बेहतर करना और अधिक उपज वाली नई फसल किस्मों को पेश करना है। इसके तहत एक करोड़ किसानों के लिए प्राकृतिक खेती की पहल को प्राथमिकता दी गई है, जैव-इनपुट केंद्र स्‍थापित करने और दलहन एवं तिलहन के उत्‍पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने की दिशा में भी प्रयास जारी हैं । डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचा और झींगा प्रजनन केंद्रों के लिए मदद जैसी पहल देश भर में कृषि के विस्‍तार एवं आधुनिकीकरण के लिए भारत सरकार द्वारा उठाये जा रहे महत्वपूर्ण क़दमों को रेखांकित करती हैं।
  • संसाधन हड़पने वाले खलनायक को कौन कुचलेगा

    संसाधन हड़पने वाले खलनायक को कौन कुचलेगा


    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से देश को जगाने का जो प्रयास किया है आज पूरा देश उस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दे रहा है। प्रधानमंत्री ने आज कोई कलात्मक भाषण की झांकी न देकर जिन तथ्यों और योजनाओं से देश को अवगत कराया है वह भविष्य के हिंदुस्तान की एक रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। प्रधानमंत्री ने भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तुष्टिकरण जैसी तीन बुराईयों को समाप्त करने का संकल्प खुलेआम दुहराया और कहा कि मेरा वादा है कि मैं जीवन भर इनसे लड़ता रहूंगा। प्रधानमंत्री ने कहा कि अगले साल भी मैं लाल किले पर आऊंगा और देश के सामर्थ्य और सफलता का गौरवगान करूंगा। उन्हें देश के प्रमुख विपक्षी दल की विचारधारा पर प्रहार करते हुए कहा कि आजादी के अमृत महोत्सव तक वे केवल बातें करते रहे जबकि हमने सरकार में आकर देश के संकल्पों को साकार कर दिखाया है। दरअसल कांग्रेस जिसे देश की विचारधारा कहती रही है वह एक परिवार के चंद सहयोगी परिवारों को पुष्ट करने का षड़यंत्र रहा है। देश के करोड़ों हाथों को काम देना कोई उपकार की बात नहीं बल्कि मानव बल का सदुपयोग करके उत्पादकता बढ़ाना है। जबकि सर्वाधिक सत्ता संभालने वाली कांग्रेस इसे देश पर उपकार गिनाते नहीं थकती।राजाओं, मुगलों, अंग्रेजों, जमींदारों, साहूकारों, जमाखोरों, मिलावटखोरों से लड़ने का काम देश की आम जनता आगे बढ़कर संभालती रही है लेकिन कांग्रेसी इसे अपना किया अहसान बताने में ही लगे रहते हैं। किसी भी कांग्रेसी से पूछिए वह यही दुहराता है हमने देश को आजादी दिलाई। जबकि हकीकत ये है कि करोड़ों हिंदुस्तानियों ने बलिदान देकर अंग्रेजों को देश से भागने पर विवश किया था। गांधी नेहरू की कांग्रेस ने तो अंग्रेजों को निकल भागने के लिए सुरक्षित पैसेज उपलब्ध कराया और उसका इनाम बटोरा। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच वैमनस्य के बीज बोकर पाकिस्तान बंटवारा स्वीकार करना इसी गहरे षड़यंत्र का हिस्सा था। आजादी के बाद से लेकर जब तक कांग्रेस सत्ता में रही वह केवल फूट डालो राज करो की नीति पर ही अमल करती रही। आज भी देश में कांग्रेस को वोट देने वाला बड़ा तबका इसी तरह वैमनस्य की खेती करके अपना उल्लू सीधा करता है।केवल डेढ़ दो प्रतिशत लोगों को मंहगी सरकारी नौकरियां देकर शेष हिंदुस्तान के विरुद्ध षड़यंत्र की कलई तब खुल रही है जब भारतीय जनता पार्टी ने अंत्योदय के विचार पर अमल करके हर नागरिक को संसाधनों का बंटवारा करने की नीति पर अमल शुरु किया है। दरअसल हमेशा से यही समस्या रही है कि समाज के संसाधनों पर कुछ लोग कब्जा जमा लेते थे। कभी राजा,कभी मुगल, कभी अंग्रेज, कभी जमींदार,साहूकार और आज उन पर कब्जा बेतहाशा बढ़ते सरकारी तंत्र ने जमा लिया है। शोषण का ये कहर इतना अधिक बढ़ गया है कि लोग त्राहिमाम कर उठे हैं। जनता विद्रोह पर उतारू है। वह ये नहीं समझ पा रही है कि उसका असली खलनायक कौन है। कांग्रेस को अपना तारणहार मानने वाला तबका भाजपा को खलनायक बताने में जुटा है । भाजपा पर ये आरोप इसलिए चिपक रहा है क्योंकि लगभग दो दशक तक शासन करने के बाद भी भाजपा जनता के कंधे पर रखा ये जुआ नहीं उतार सकी है। सरकारी नौकरियों का वेतन लगातार बढ़ता जा रहा है और अमीरी गरीबी की खाई भी बढ़ती जा रही है।भाजपा ने अपने समर्थकों को सरकारी नौकरियों में भेज दिया तो शोषण का ये आंकड़ा और बढ़ गया। दिन भर में दो सौ रुपए की मजदूरी पाने वाला श्रमिक दाल,चावल,सब्जी उसी भाव पर खरीद रहा है जिस भाव पर ढाई तीन लाख रुपए मासिक वेतन पाने वाला अफसर खरीद रहा है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पच्चीस लाख रुपए का पैकेज पाने वाले अमीर तबके से तय हो रहा है जबकि गरीब वर्ग बेवजह उसमें पिसा जा रहा है। मोदी जी जब मेरे प्यारे परिवारजन का संबोधन देते हैं को उन्हें और उनकी भाजपा को सोचना होगा कि वह अपने परिवारजनों के लिए मुखिया कैसे साबित हों। कहा गया है मुखिया मुख सो चाहिए, खान पान को एक, पाले पोसे सकल अंग तुलसी सहित विवेक । यदि मोदी जी और उनकी भाजपा कांग्रेस की छाया से बाहर नहीं निकल पाएगी और देश के संसाधनों का न्यायोचित बंटवारा नहीं कर पाएगी तो वह लाख बार कांग्रेस के परिवार वाद को गाली देती रहे जनता की समस्याओं का समाधान नहीं हो पाएगा। चंद परिवारों को जरूरत से ज्यादा संसाधन बांटने से उपभोक्ता सामग्री बनाने बेचने वाला कार्पोरेट सेक्टर तो मजबूत होता जा रहा है लेकिन वह सरकार और आम जनता दोनों का धन उलीचता जा रहा है। जनता इससे परेशान है और इससे अमीरी गरीबी के बीच खाई बढ़ती जा रही है। भाजपा ने हितग्राही मूलक योजनाओं से संसाधनों का बंटवारा आम जनता तक पहुंचाने की पहल तो की है लेकिन इसमें भी इतनी सारी शर्तें थोप दी गईं हैं कि वह संसाधन हर व्यक्ति को लाभ नहीं पहुंचा पा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने खुली चुनौती है कि वे हर नागरिक तक देश के संसाधन पहुंचाना सुनिश्चित करें। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की भाजपा भी चीन्ह चीन्ह के रेवड़ी बांटने की शैली पर कार्य कर रही है। जाहिर है कि इससे जन आक्रोश बढ़ेगा और आने वाले विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनावों में भाजपा को इसकी मंहगी कीमत चुकानी पड़ेगी। संसाधन तो सीमित हैं। कर्ज लेकर बांटने की सीमा भी निश्चित है। जाहिर है कि सरकार को निष्पक्ष होकर शल्यक्रिया करनी होगी। संसाधन रिसकर आम जनता तक पहुंचाने वाला कांग्रेसी मॉडल उसे न केवल छोड़ना होगा बल्कि अंत्योदय की विचारधारा पर अमल की नाटकबाजी छोड़कर सख्ती से अमल शुरु करना होगा। अनुत्पादक सरकारी तंत्र को पालते रहने से वह भले ही चुनावी हेराफेरी करने में थोड़ी हद तक सफल हो जाए लेकिन जन आक्रोश का सैलाब उसे न घर का रहने देगा न घाट का ।

  • किसान को खुशहाल बनाएंगे नए कानूनःकमल पटेल

    किसान को खुशहाल बनाएंगे नए कानूनःकमल पटेल

    अन्नदाताओं के जीवन में आसानी, समृद्धि, किसानी में आधुनिकता और प्रगति का मूल मंत्र लिए मोदी सरकार निरंतर कार्य कर रही है।इसका लाभ देश के करोड़ों किसानों को लगातार मिल रहा है।नए कृषि कानूनों के आने से यह सुनिश्चित हो गया है कि किसान अपनी फसलों को चाहे मंडी में बेचें या फिर मंडी के बाहर, ये उनकी मर्जी होगी। अब जहां किसान को लाभ मिलेगा वह बिना किसी अवरोध और रोक-टोक के वहां अपनी उपज बेच सकेगा।किसान पुत्र कृषिगत उद्योग धंधे अपने गांवों में ही लगा सकेंगे। किसान अब इन नवीन विधेयकों की बदौलत उद्योगपति भी बनेंगे।

    मोदी सरकार ने प्राथमिकता से स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशों के अनुरूप प्रगतिशील कदम उठाए है।देश के हर गांव का किसान अपनी फसलों की सुरक्षा को लेकर आश्वस्त रहे इसलिए भंडारण की आधुनिक व्यवस्थाएं बनाने, कोल्ड स्टोरेज बनाने और फूड प्रोसेसिंग के नए उपक्रम लगाने के लिए सरकार ने तेजी से कदम बढ़ाते हुए नए द्वार खोल दिए हैं।यदि बात न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की करें, तो मोदी सरकार किसानों को बेहतर लागत मूल्य देकर किसानों के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने में सफल हुई है। वर्ष 2014 के पूर्व और वर्ष 2014 के बाद एमएसपी का तुलनात्मक अध्ययन करें, तो हम पायेंगे कि विभिन्न फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य वर्ष 2014 के बाद निरंतर बढ़ा है। यूपीए सरकार में गेहूँ का एमएसपी 1400 रुपये प्रति क्विंटल था, जबकि आज 1975 रुपये प्रति क्विंटल है। मूंग दाल पर एमएसपी 4500 रुपये था, जबकि वर्तमान सरकार में 7200 रुपये है। मसूर दाल की एमएसपी 2950 रुपये से बढ़कर आज 5100 रुपये है। ज्वार 1520 रुपये से बढ़कर 2640 रुपये है। धान की एमएसपी 1310 रुपये से बढ़कर 1870 रुपये है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने हाल ही में मध्यप्रदेश के किसानों से बात करते हुए इन उपलब्धियों का जिक्र भी किया और पूरी विनम्रता से अन्नदाताओं के हितों के लिए सभी सकारात्मक कदम उठाने का भरोसा भी दिलाया।

    किसान हितों के लिए दूरगामी और प्रभावकारी योजनाएँ केन्द्र सरकार लागू कर रही है। नवीन कृषि विधेयक किसानों के आर्थिक सशक्तिकरण के मार्ग को सरल और सुगम बनाएंगे। यह विधेयक किसानों के आर्थिक उत्थान का मुख्य साधन बनेंगे। मध्यप्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान स्वयं किसान है और वे किसानों के हितों के लिए प्रतिबद्धता से कार्य करने के लिए जाने जाते हैं। वे लगातार प्रदेश के किसानों से संवाद कर रहे है। ये कानून उनके हित में हैं। मैंने हरदा जिले में किसान चौपाल अभियान प्रारंभ किया है। नवीन कृषि कानूनों के समर्थन में किसान चौपालों में नये कृषि कानूनों पर मैं स्वयं बात कर रहा हूँ। हम सभी को मिलकर नये कृषि कानूनों को लेकर किसानों से बातचीत करना चाहिए। इससे इन कानूनों को लेकर किसानों में फैले भ्रम को दूर किया जा सकेगा। सही मायनों में इन विधेयकों से किसानों की तकदीर और प्रदेश एवं देश की तस्वीर बदलेगी। इन विधेयकों में वे तमाम प्रावधान किए गए हैं, जिनसे किसानों में खुशहाली आये और वे समृद्द हों। राष्ट्र में सुख और समृद्धि बढ़े। अंततः हम सबका लक्ष्य अपने राष्ट्र की खुशहाली है और सरकार लोककल्याणकारी नीतियों से देश के करोड़ों लोगों के सपनों को साकार कर रही है।

    वर्ष 2014 के बाद केंद्र की मोदी सरकार की लोककल्याणकारी नीतियों से देश के किसानों के जीवन में बेहद सुधार हुआ है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना से किसानों के बैंक खातों में रुपये छ: हजार की राशि सीधे ट्रांसफर होती है। इतना ही नहीं प्रदेश सरकार भी मुख्यमंत्री किसान सम्मान योजना अंतर्गत चार हजार रुपये की अतिरिक्त राशि किसानों के खातों में ट्रांसफर कर रही है। यह क्रांतिकारी बदलाव है जिससे करोड़ों भोले-भाले किसानों को सीधे उनके बैंक खातों में पूरे पैसे मिलना सुनिश्चित किया है। देश के हर किसान को पानी मिले और हर खेत तक पानी पहुंचे इस दिशा में मोदी सरकार लगातार काम कर रही है और हजारों करोड़ रुपए खर्च करके इन सिंचाई परियोजनाओं को मिशन मोड में पूरा करने में जुटी है। इसके साथ ही मधुमक्खी पालन,पशुपालन पालन और मछली पालन को भी लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है।

    इस साल पंचायती राज स्थापना दिवस 24 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर के सरपंचों से बात करते हुए किसानों के जीवन में बदलाव के लिए प्रधानमंत्री स्वामित्व योजना की रूप में एक स्वर्णिम योजना की शुरुआत की थी। जिससे भारत  के किसान,ग्रामीण समाज का विकास और प्रगति से सीधे जुडने का मार्ग प्रशस्त हुआ है। प्रधानमंत्री स्वामित्व योजना के तहत गांवों में ड्रोन से गाँव,खेत और भूमि की मैपिंग की जा रही है। इससे गांवों में संपत्ति को लेकर विवाद खत्म हो जाएंगे। इससे भूमि की सत्यापन प्रक्रिया में तेजी और भूमि भ्रष्टाचार को रोकने में सहायता मिलेगी। पहले गांव की जमीन पर लोन मिलना मुश्किल होता था,इसी कारण जोत की जमीन बेचकर किसान परिवार शहर की ओर पलायन कर जाते थे। अब गांवों में भी लोग बैंकों से लोन ले सकेंगे और इन सब सुविधाओं के कारण ग्रामों के विकास कार्यों को प्रगति मिलेगी। जमीन की मैपिंग के बाद गांव के लोगों को उस संपत्ति का मालिकाना प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। ग्रामीणों के पास स्वामित्व होगा तो उस संपत्ति के आधार पर ग्रामीण बैंक से लोन ले सकेंगे। नये विधेयकों के आने से किसान आगे बढ़कर उद्यमी बनेंगे। हम सब मिलकर आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश और आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करेंगे।

  • कृषि में निवेश से छोटे किसानों को लाभ होगा बोले कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर

    कृषि में निवेश से छोटे किसानों को लाभ होगा बोले कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर

    नरेन्द्र सिंह तोमरः किसानों की आय बढ़ाने में कामयाब रहेगा नया प्रबंधन फार्मूला

    केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण, ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की शुक्रवार को कहा कि कृषि क्षेत्र में नए निवेश से छोटी जोत वाले किसानों को ज्यादा फायदा होगा। उन्होंने कहा कि देश में अधिकांश किसानों के पास छोटी जोत की जमीन है और एक लाख करोड़ रुपये के कृषि इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड से इस क्षेत्र में नए निवेश आकर्षित होंगे जिसका किसानों को लाभ मिलेगा।

    केंद्रीय कृषि मंत्री यहां वर्चुअल कॉन्फ्रेंस के जरिए राज्यों के कृषि एवं सहकारिता मंत्रियों से बातचीत कर रहे थे। तोमर ने कहा, एक लाख करोड़ रुपये के कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर फंड और 10 हजार नए कृषक उत्पादक संगठन (एफपीओ) बनने से आने वाले दिनों में कृषि एवं ग्रामीण विकास के क्षेत्र में आमूलचूल बदलाव देखने को मिलेंगे।” उन्होंने राज्यों से नई प्रौद्योगिकी के माध्यम से क्षेत्रवार उपयुक्त अधोसंरचना विकसित करने में सहयोग की अपील की। तोमर ने कहा कि केंद्र सरकार के लिए कृषि उच्च प्राथमिकता का क्षेत्र है और इसका विकास इस प्रकार करने की आवश्यकता है ताकि नई पीढ़ी कृषि की ओर आकर्षित हो।

    बैठक के दौरान केंद्रीय कृषि मंत्री ने एफपीओ की गाइडलाइंस भी जारी की। इस मौके पर कृषि मंत्रालय के अधिकारियों ने एक लाख करोड़ रुपये के कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर फंड, एफपीओ, किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) के संबंध में प्रेजेन्टेशन के जरिए जानकारी दी। कॉन्फ्रेंस के दौरान उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा, गुजरात, तेलंगाना, बिहार, केरल, उत्तराखंड, पंजाब, छत्तीसगढ़, राजस्थान, मणिपुर, सिक्किम, नागालैंड सहित विभिन्न राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के मंत्रियों एवं विभागीय अधिकारियों ने भी विचार रखे। गुजरात के कृषि मंत्री आर.सी. फल्दू ने पशुपालकों को भी नई स्कीम में जोड़ने पर केंद्र सरकार का आभार जताया।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल ‘आत्मनिर्भर भारत’ की सराहना करते हुए बिहार के कृषि मंत्री डॉ. प्रेम कुमार ने कहा कि इससे कृषि क्षेत्र की भी प्रगति होगी। कई अन्य राज्यों के मंत्रियों ने भी अपने विचार पेश किए। इस मौके पर कृषि सचिव संजय अग्रवाल ने कहा कि देशभर में 90 हजार से ज्यादा सहकारी समितियां हैं, जिनमें से 60 हजार के पास जमीन भी हैं और वे सक्षम हैं। इनके जरिये एफपीओ गठन करते हुए ग्रामीण क्षेत्र में निवेश बढ़ाने की कोशिश होनी चाहिए। केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री कैलाश चैधरी भी कॉन्फ्रेंस के दौरान मौजूद थे।

  • साकार होने लगा किसानों की आय दोगुनी करने का संकल्प

    साकार होने लगा किसानों की आय दोगुनी करने का संकल्प

    भोपाल,12 जुलाई(प्रेस सूचना केन्द्र)।इसके अंतर्गत किसानों की आय दोगुनी करने से संबंधित मुद्दों की जाँच करने और वास्तविक रूप से किसानों की आय दोगुनी करने के लिये रणनीति की सिफारिश करने हेतु एक अंतर-मंत्रालयी समिति का गठन किया है।

    समिति के अनुसार, इस क्षेत्र में डिजिटल प्रौद्योगिकी की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण है, जो ग्रामीण भारत में कृषि गतिविधियों को अंजाम देने, इसे आधुनिक बनाने और व्यवस्थित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

    प्रौद्योगिकियों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence), बिग डेटा एनालिटिक्स (Big Data Analytics), ब्लॉक चेन टेक्नोलॉजी (Block chain Technology), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (Internet of Things) आदि शामिल हैं।

    सरकार ने प्रौद्योगिकियों के प्रसार के लिये ज़िला स्तर पर 713 कृषि विज्ञान केंद्र और 684 कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसियों की स्थापना की है।

    इसके अलावा, किसानों को केंद्रित प्रचार अभियान, किसान कॉल सेंटर, कृषि-क्लीनिक और कृषि-व्यवसाय केंद्रों के उद्यमी योजना, कृषि मेलों और प्रदर्शनियों, किसान एसएमएस पोर्टल इत्यादि के माध्यम से जानकारी प्रदान की जाती है।

    मंत्रालय की योजनाओं को सफल बनाने हेतु प्रौद्योगिकी का प्रसार बहुत महत्त्वपूर्ण है। प्रमुख

    किसानों को महत्त्वपूर्ण मापदंडों पर सूचना के प्रसार के लिये किसान सुविधा मोबाइल एप्लिकेशन को विकसित किया गया है, उदाहरण के लिये मौसम, बाजार मूल्य, पौध संरक्षण, इनपुट डीलर (बीज, कीटनाशक, उर्वरक) फार्म मशीनरी, मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card), कोल्ड स्टोरेज और गोदाम, पशु चिकित्सा केंद्र और डायग्नोस्टिक लैब्स आदि।

    आधुनिक प्रौद्योगिकी के माध्यम से किसानों को बाजार की जानकारी के साथ उपज बेचने के लिये बाजारों के बारे में बेहतर जानकारी दी जाती है, साथ ही बाजार की मौजूदा कीमतें और बाजार में वस्तुओं की मांग की जानकारी भी उपलब्ध कराई जाती है, जिससे किसान उचित मूल्य और सही समय पर उपज बेचने के लिये उचित निर्णय ले सकते हैं।

    भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (Indian Council of Agriculture Research-ICAR) ने राज्य कृषि विश्वविद्यालयों (State Agricultural Universities) और कृषि विज्ञान केंद्रों (Krishi Vigyan Kendras) द्वारा विकसित 100 से अधिक मोबाइल एप्लिकेशन भी विकसित किये हैं जो इनकी वेबसाइट पर उपलब्ध हैं।

    ये मोबाइल ऐप फसलों, बागवानी, पशु चिकित्सा, डेयरी, पोल्ट्री, मत्स्य पालन, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और एकीकृत विषयों के क्षेत्रों में किसानों को बहुमूल्य जानकारी प्रदान करते हैं, जिसमें विभिन्न वस्तुओं के बाजार मूल्य, मौसम से संबंधित जानकारी, सेवाएँ आदि शामिल हैं।

    पंजीकृत किसानों को SMS के माध्यम से विभिन्न फसल संबंधी मामलों पर सलाह भेजने के लिये mKisan पोर्टल (www.mkisan.gov.in) का विकास।

    किसानों को इलेक्ट्रॉनिक ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म प्रदान करने के लिये ई-राष्ट्रीय कृषि बाजार (e-National Agriculture Market- e-NAM) पहल की शुरूआत की गई है।

    कृषि उत्पादन के भंडारण, प्रसंस्कृत कृषि उत्पाद और उत्पादन के पश्चात होने वाले फसल नुकसान को कम करने के लिये वैज्ञानिक तरीके से भंडारण क्षमता को बढ़ाया जाएगा, इसके लिये कृषि बाजार से जुड़ी एकीकृत कृषि योजनाओं को क्रियांवित किया जाएगा।

    देश भर के सभी किसानों को 2 वर्ष के चक्र के भीतर एक बार मृदा स्वास्थ्य कार्ड प्रदान करने में राज्य सरकारों की सहायता की जा रही है इसके माध्यम से किसानों को मृदा के पोषक तत्वों की स्थिति की जानकारी प्रदान की जाती है। फसल उत्पादकता में वृद्धि करने तथा मृदा की उर्वरता को बनाए रखने के लिये किसानों को उचित पोषक तत्त्वों का उपयोग करने की सलाह भी दी जाती है।

    किसानों को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (ऑयल सीड्स और ऑयल पाम) के तहत बीज उपलब्ध करवाना, तकनीक का अंतरण (Transfer) करना, उत्पादन इकाइयों तथा जल संसाधन का उपयोग करने के लिए आवश्यक उपकरणों को भी उपलब्ध कराया जा रहा है। इस योजना के अंतर्गत किसानों को आर्थिक सहायता भी उपलब्ध की जा रही है जिससे किसानों को कृषि से संबंधित प्रशिक्षण भी प्राप्त हो सके ताकि किसान फसल का उत्पादन बढ़ा कर आर्थिक लाभ में वृद्धि कर सकें।

    कृषि-मौसम विज्ञान और भूमि आधारित अवलोकन परियोजना, बागवानी आकलन और प्रबंधन पर समन्वित प्रोग्राम के लिये भू-सूचना विज्ञान का उपयोग, राष्ट्रीय कृषि विकास आकलन और निगरानी प्रणाली जैसी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के माध्यम से कृषि को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

    देश में किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य

    सरकार ने 2022-23 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा है और इसके लिये कृषि सहयोग एवं किसान कल्याण विभाग के राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी की अध्यक्षता में एक अंतर-मंत्रिस्तरीय समिति गठित की है। इस समिति को किसानों की आय दोगुनी करने से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श करने और वर्ष 2022 तक सही अर्थों में किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य की प्राप्ति के लिये एक उपयुक्त रणनीति की सिफारिश करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है।

    समानांतर रूप से सरकार आय में वृद्धि को केंद्र में रखते हुए कृषि क्षेत्र को नई दिशा देने पर विशेष ध्यान दे रही है। किसानों के लिये शुद्ध धनात्मक रिटर्न सुनिश्चित करने हेतु राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के ज़रिये निम्नलिखित योजनाओं को बड़े पैमाने पर क्रियान्वित किया जा रहा है:

    मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, नीम लेपित यूरिया, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, परंपरागत कृषि विकास योजना, राष्ट्रीय कृषि बाज़ार योजना (e-NAM), बागवानी के एकीकृत विकास के लिये मिशन, राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, इत्यादि।

    इनके अलावा कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) की सिफारिशों के आधार पर खरीफ और रबी दोनों ही फसलों के लिये MSP को अधिसूचित किया जाता है। यह आयोग खेती-बाड़ी की लागत पर विभिन्न आँकड़ों का संकलन एवं विश्लेषण करता है और फिर MSP से जुड़ी अपनी सिफारिशें पेश करता है।

    किसानों की आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि सुनिश्चित करने के उद्देश्य से सरकार ने वर्ष 2018-19 के सीजन के लिये सभी खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्यों में वृद्धि की थी। गौरतलब है कि वर्ष 2018-19 के बजट में MSP को उत्पादन लागत का कम-से-कम 150 फीसदी तय करने की बात कही गई थी।

  • अब जनता की अदालत में चलेगा कर्जमाफी के झूठ का मुकदमा बोले कमल पटेल

    अब जनता की अदालत में चलेगा कर्जमाफी के झूठ का मुकदमा बोले कमल पटेल

    कांग्रेस को सत्ता में लाने के लिए राहुल गांधी ने किसान कर्जमाफी का जो पांसा फेंका था उसने तीन राज्यों में उन्हें सत्ता तो दिला दी लेकिन डेढ़ साल तक जब किसानों को लाभ नहीं हुआ तो मामला बिगड़ गया। उपजे जन असंतोष ने पार्टी में फूट के हालात पैदा किए और मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार का असमय अवसान हो गया। खुद कमलनाथ तो कर्ज माफी कर नहीं पाए अब बाहर बैठकर भाजपा सरकार पर राहुल गांधी के वादे को पूरा करने का दबाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं। जिस फार्मूले से किसानों के छोटे कर्ज माफ करने की शुरुआत कमलनाथ ने की थी उससे सहकारी समितियां कंगाल हो गईं हैं। किसान नए झमेलों में फंस गए हैं।उन्हें कांग्रेस के झूठे वादे की असलियत समझ में आ गई है। इसके विपरीत भाजपा ने किसानों को बेहतर मूल्य और मुआवजा दिलाने की जो पहल की है उससे कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ गईं हैं। आगामी उपचुनाव में मध्यभारत और प्रदेश के कई अंचलों में कांग्रेस को कर्जमाफी की असफलता के मुद्दे पर जनता के सवालों का सामना करना पड़ेगा। कृषि मंत्री कमल पटेल कहते हैं कि कर्जमाफी के इस झूठ का मुकदमा अब जनता चलाएगी और कांग्रेस को उसके पापों की सजा अवश्य भोगनी पड़ेगी।

    एक चुनावी दांव के तहत बड़बोले राहुल गांधी ने चुनावी सभा में ऐलान किया था कि अगर सत्ता में आने के बाद दस दिनों के भीतर किसानों के दो लाख रुपए तक के कर्ज माफ नहीं हुए तो मुख्यमंत्री बदल दिया जाएगा। इस वादे में कर्ज की बात कही गई थी जबकि सत्ता में आने के तत्काल बाद कमलनाथ ने उसमें कृषि ऋण शब्द जोड़ दिया। कहा जाने लगा ये काम पांच सालों में कई चरणों में होगा। फिर कई शर्तें और भी जोड़ी गईं। कुल मिलाकर किसान को कर्ज माफी एक झुनझुना ही साबित हुई। कांग्रेस के इस झूठे वादे का असर बैंकिंग व्यवस्था को झेलना पड़ा। कांग्रेस ने ये वादा सरकारी और सहकारी बैंकों के भरोसे कर तो दिया था लेकिन सत्ता में आने के बाद इस ढोल की पोल खुल गई। राष्ट्रीयकृत बैंकों ने तो मोदी सरकार के बैंकिंग सुधारों के चलते इस झूठे वादे को पूरा करने में साफ असहमति जता दी। जबकि सहकारी बैंकों का ढांचा भ्रष्टाचारों की वजह से पहले ही धराशायी पड़ा था।जिन सहकारी साख समितियों ने बेहतर काम करके कुछ फंड बनाया था सरकार ने सबसे पहली गिद्ध दृष्टि उसी फंड पर टिका दी। सहकारी समितियों से कहा गया कि वे अपने फंड का आधा हिस्सा कर्जमाफी के लिए दे दें जिसकी भरपाई भविष्य में सरकार कर देगी। सरकार के इस निर्देश को कई समितियों ने सिरे से नकार दिया।

    किसान कर्ज माफी का मामला सबसे पहले कागजों में उलझा हुआ नजर आने लगा जब प्रमाण पत्रों और प्रचार अभियानों की पोल खुलना प्रारंभ हुई । कमलनाथ ने बाकायदा सार्वजनिक आयोजनों में पुरस्कारों की तरह कर्जमाफी के प्रमाण पत्र बांटने शुरु कर दिए। बहुत छोटे कर्जों के इन प्रमाणपत्रों के बाद किसानों को लगने लगा कि उनकी असफलता का ढिंढोरा पीटकर सरकार उन्हें सरे चौराहे बदनाम कर रही है।बगैर सोचे समझे किया गया कर्जमाफी का वादा इतना हवा हवाई था कि सरकार ने शिवराज सरकार की तमाम हितग्राही मूलक योजनाओं को बंद करके कर्जमाफी पूरी करने का शोर मचाना शुरु कर दिया। जबकि इस बचत का धेला भर भी किसान कर्जमाफी के लिए नहीं दिया गया। इसी बीच लोकसभा चुनाव आ गए तो सरकार को लगा कि चलो कुछ समय के लिए तो आपदा टल गई है। सभी प्रभारी मंत्रियों से लेकर राज्य शासन के मंत्रियों एवं विधायकों की ड्यूटी लगाई गई कि लोकसभा चुनाव के बाद किसी भी स्तर पर किसानों को प्रमाण पत्रों के साथ-साथ कर्ज माफी दे दी जाएगी । लोकसभा चुनावों में जनता इस झांसे में नहीं आई और उसने कांग्रेस को अंडा पकड़ा दिया। केवल मुख्यमंत्री कमलनाथ के पुत्र खींचतान के सांसद बन पाए वह भी तब जबकि उन्होंने भाजपा के नेताओं की चरण वंदना करके छिंदवाड़ा में कोई बड़ी चुनावी सभा नहीं होने दी।लोकसभा चुनाव के बाद सरकार का तंत्र एवं संबंधित मंत्री ट्रांसफर पोस्टिंग के धंधे में लग गए । लगभग 2 महीने तक अथवा उससे कहीं अधिक समय तक यह धंधा बेशर्मी से बदस्तूर चलता रहा।

    विधायकों की परेशानी यह थी कि जब भी वह अपने विधानसभा क्षेत्रों में विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में जाते थे तो उन्हें किसानों का विरोध झेलना पड़ता था।किसान उलाहना देते थे कि उनके साथ इतना बड़ा मजाक क्यों किया गया। लोकसभा चुनाव के बाद तो किसानों के साथ किए गए छल और कंगाली भरे कुशासन को झेलना कांग्रेस के विधायकों के लिए असहनीय हो गया था। जब भी कांग्रेस के विधायक अथवा प्रभारी मंत्री क्षेत्रों में जाते थे तो किसान कर्जमाफी का दबाव बनाते हुए घेराव करने लगते। सोशल मीडिया पर लोकसभा चुनाव होने के बाद लगातार 6 महीने तक सरकार का जमकर मजाक उड़ता रहा ।किसान कर्जमाफी के ढोल की पोल खुलती जा रही थी और मालवा के साथ साथ ग्वालियर चंबल संभाग के अंचल के किसान भी सरकार की नीतियों का माखौल उड़ाने लगे।

    ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ कांग्रेस के कुछ नेताओं ने आलाकमान के इशारे पर जो घेराबंदी की थी और उन्हें चुनाव हरवाया था उसकी भी असलियत सामने आने लगी। सिंधिया समर्थक मंत्रियों विधायकों को भी लगा कि चुनावी चेहरे के रूप में तो सिंधिया को आगे रखा गया लेकिन उनकी उपेक्षा करके सिंधिया समर्थकों को निपटाया जा रहा है। किसानों से गालियां पड़वाईं जा रहीं हैं।कमलनाथ को छिंदवाड़ा के अलावा प्रदेश के किसी अंचल के किसानों और आम नागरिकों की चिंता नहीं है।जब कोई विधायक या मंत्री मुख्यमंत्री निवास से संपर्क करने का प्रयास करता तो उससे आपत्तिजनक व्यवहार करके उसकी उपेक्षा कर दी जाती। ये हालत कमोबेश प्रदेश के हर अंचल के विधायकों की थी लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक विधायकों ने इस समस्या से निपटने के लिए समाधान की तलाश तेज कर दी।

    कर्जमाफी तो कमोबेश हर राज्य में असफल साबित हुई है। उसके फेल होने के दो कारण थे । कर्ज माफी की घोषणा का क्रियान्वयन मुख्य रूप से ग्रामीण स्तर पर स्थापित सहकारी बैंकों से जुड़ा हुआ था । जबकि सहकारी बैंकों को कांग्रेस के नेता माफिया राज बताते हुए मुकदमों में धकेलते गए। अपना ही बाग नोंचते बंदरों की तरह कांग्रेस ने सहकारी आंदोलन का ही भट्टा बिठालना शुरु कर दिया। दूसरा ये कि दिग्विजय सिंह समर्थक अशोक सिंह को अपेक्स बैंक का चेयरमैन बना दिया गया। उन्हें तो कांग्रेसियों की लूट की हवस शांत करनी थी वे इसी का जतन करते रहे लेकिन कर्जमाफी के लिए फंड जुटाना उनके लिए नामुमकिन था।इस बीच कमलनाथ का वो बदनामशुदा बयान सामने आ गया जिसमें उन्होंने सिंधिया को लगभग दुत्कारते हुए कहा कि यदि जनता की मांगों को लेकर वे सड़क पा उतरना चाहते हैं तो उतर जाएं। इस बयान ने कमलनाथ सरकार के सारे रास्ते बंद कर दिए और तय हो गया कि ये सरकार चंद दिनों की ही मेहमान है।

    किसानों को दो लाख तक कर्ज माफी की घोषणा में 31 मार्च 2018 की स्थिति में फसल ऋण माफी 56 हजार करोड़ से कहीं अधिक थी । जाहिर था कि इतनी बड़ी रकम सरकार अपने खजाने से नहीं लुटा सकती थी। जब कर्ज माफी की पोल खुलने लगी तो आंकड़े भी उलझाए जाने लगे। 1 अप्रैल 2007 तक तो कांग्रेसियों को भी समझ में आ गया कि कर्जमाफी संभव नहीं है। भाजपा ने सत्ता संभालते ही कर्जमाफी पर स्थिति स्पष्ट करना शुरु कर दी कि कांग्रेस ने झूठा वादा किया था। उसने केवल सत्ता पाने के लिए ये सफेद झूठ बोला था जबकि भाजपा की पूर्ववर्ती सरकार किसानों को लाभकारी मूल्य और मुआवजा दिलाने की दिशा में बहुत काम कर रही थी। कैबिनेट की बैठक में 23 जून को कृषि मंत्री कमल पटेल ने कहा कि किसान कर्जमाफी कांग्रेस का धोखा था और इसकी जांच कराई जाना जरूरी है।राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति की बैठक के तैयार एजेंडे में कोरोना के बाद कर्जमाफी ही अहम मुद्दा था।राष्ट्रीयकृत बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों ने बताया कि सरकार ने पहले चरण की जो कर्जमाफी धूमधाम से की थी उसका ही पैसा सरकार ने नहीं दिया था। बैठक में मौजूद कुछ अफसरों ने एलएलबीसी के समन्वयक एस डी माहुरकर से इस मुद्दे पर चर्चा न करने को भी कहा क्योंकि ऐसा करने से उनकी पोल भी खुलती थी कि जब कर्जमाफी गलत फैसला था तो उन्होंने उस वक्त उसका विरोध क्यों नहीं किया।

    बैंकरों की ये रिपोर्ट बताती है कि सरकार ने कर्जमाफी का झूठा वादा किया था और वादा निभाने के चक्कर में बैंकों से धोखाघड़ी तक कर डाली। राष्ट्रीकृत बैंकों की तो मजबूरी है कि वे लोकतांत्रिक सरकारों के विरुद्ध धोखाधड़ी का मुकदमा नहीं चला सकतीं लेकिन किसानों के सामने ऐसी कोई मजबूरी नहीं है। किसानों ने अब कांग्रेस के विरुद्ध खुलकर बयानबाजी शुरु कर दी है। कई किसान तो कर्जमाफी के इस झूठे वादे के लिए कांग्रेस को अदालत की चौखट तक भी ले जाने की तैयारी कर रहे हैं। अदालत उनके इस वाद पर विचार करती है या नहीं ये तो वक्त आने पर ही पता चलेगा लेकिन इतना तय है कि आगामी आम चुनावों में जनता की अदालत जरूर वायदा खिलाफी के लिए कांग्रेस को सूली चढ़ाएगी। कांग्रेस के नेताओं से किसानों का सवाल यही रहेगा कि जब औकात नहीं थी तो कर्जमाफी का वादा किया क्यों था।