अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता संभालते ही जो सार्वजनिक फैसले लिए हैं वो पूरी दुनिया की शासन प्रणालियों के लिए सत्ता का नया पैमाना बनकर सामने आए हैं।अब तक जिन मनोभावों को बेड़ियां बनाकर विकास की स्वछंद धारा को बांधा जाता रहा है ट्रंप ने एक झटके में उन बेड़ियों को ताक पर धर दिया है।सबसे पहले – अमेरिका फिर से एक फ्री कंट्री है. किसी को भी उसके ओपिनियन के लिए प्रताड़ित नहीं किया जाएगा.
दक्षिणी सीमा पर इमरजेंसी की घोषणा – यानि अवैध घुसपैठ बंद, घुसपैठियों की शामत.
देश में DEI (Diversity, Equality, Inclusion) का ड्रामा बंद.. यानि रेस, जेंडर, सेक्सुअलिटी को रखिए पिछवाड़े, बताइए कि आप किस काम के हैं, और काम कीजिए.
फौज के भीतर आइडियोलॉजिकल बकवास बन्द.. फौज का बस एक काम है, देश के दुश्मनों को परास्त करना. और फौज को इतना मजबूत बनाना कि लड़ाइयाँ लड़नी ही ना पड़े. इजरायली बंधकों की तत्काल वापसी.
और सबसे बड़ा धमाका – सिर्फ और सिर्फ दो जेंडर… स्त्री और पुरुष.
उसके अलावा आर्थिक पहलुओं पर कुछ छोटे छोटे धमाके… ड्रिल बेबी ड्रिल… अमेरिका अपने तेल भंडार से तेल निकालेगा और इस्तेमाल करेगा. यानि वामपंथ की ग्रीन डिक्टेटरशिप समाप्त. और गाड़ी जैसी मर्जी, वैसी चलाओ.. चाहे पेट्रोल-डीजल, चाहे इलेक्ट्रिक..
ट्रम्प ने टेस्ला के मालिक एलोन मस्क को बाजू में बिठा कर यह घोषणा की… ऐसा नहीं है कि मस्क ने ट्रम्प को इलेक्शन जितवाया है तो वह ट्रम्प से अपने फायदे के लिए फैसले भी करवाएगा. बल्कि ट्रम्प ने इलेक्ट्रिक कारों का बाजार खड़ा किया, लेकिन वह खुद पेट्रोल कारों पर रोक लगाए जाने का विरोधी है. यह होना चाहिए कैपिटलिज्म का कैरेक्टर… आओ, आकर कम्पीट करो!
उसके अलावा, ट्रम्प ने स्टार एंड स्ट्राइप को मार्स तक ले जाने का इरादा भी जताया है.
सिर्फ एक बात है पूरे संबोधन में, जो अर्थशास्त्र की दृष्टि से कमजोर लगी – आयात पर ट्रेड टैरिफ लगाने की घोषणा. जब कोई देश कोई चीज निर्यात करता है तो उसमें उसका फायदा है, और जब कुछ आयात करता है तो वह भी अपने फायदे के लिए ही करता है. इंपोर्ट पर टैरिफ लगाना किसी भी देश के हित में नहीं है. कोई चीज आप बाहर से खरीदते हैं तो इसलिए खरीदते हैं क्योंकि वह चीज उतनी कीमत पर आपके यहाँ नहीं बन सकती. आयात पर टैरिफ लगा कर आप किसी और का नहीं, अपने ही लोगों का नुकसान करते हैं, अपने ही नागरिकों को महंगा खरीदने के लिए मजबूर करते हैं.
यहां तक तो है कहने की बात. पर उससे बड़ा प्रश्न है, जितना कहा गया है, उसमें से कितना किया जा सकेगा? स्कूलों में, यूनिवर्सिटी में, ज्यूडिशियरी में, फौज में जो भी वोक एलिमेंट्स हैं वे अपना काम करते रहेंगे… प्रेसिडेंट के कहने से टीचर्स क्लासरूम में जो पढ़ा रहे हैं उसे बदल नहीं देंगे. अमेरिका फेडरल है, राज्यों पर प्रेसिडेंट का बस नहीं चलता. इसलिए ट्रम्प के एक भाषण से अमेरिका बदल जाएगा यह सोचना नादानी होगी. कम्युनिज्म से खुली दुश्मनी के जमाने में, जोसेफ मैकार्थी के जमाने में भी जो वामपंथी घड़ा अपना काम करता रहा वह एक भाषण के सामने घुटने टेक देगा यह उम्मीद तो मत रखें.
लेकिन ट्रम्प ने अपने एक भाषण से पॉलिटिकल करेक्टनेस को कम से कम बीस साल पीछे धकेल दिया है. उन्होंने दुनिया की साइलेंट मेजॉरिटी को स्वर दिया है. कॉमन सेंस की जो बात कहने में एक आम आदमी हिचकने लगा था, वह फिर से कहने की हिम्मत दी. एक बार फिर से अमेरिका को लैंड ऑफ द फ्री एंड होम ऑफ द ब्रेव बना दिया.
भारत से अंग्रेजों को विदा हुए सतत्तर साल हो चुके हैं लेकिन उनका लूट का तंत्र आज भी बदस्तूर जारी है। आज भी आला अफसरों में एक वर्ग ऐसा है जो सरकारी संसाधनों को लूटने वालों को पनाह देता रहता है। सैडमैप के संसाधनों की लूटमार में ये कहानी स्पष्ट रूप से सामने आ रही है।सरकारी नौकरियां बेचने वालों के लिए सैडमैप आज एक मुफीद अखाड़ा बन गया है।नौकरशाही के ही एक वर्ग ने गुणवत्ता पूर्ण कार्य बल उपलब्ध कराने के लिए एक कंपनी सेक्रेटरी अनुराधा सिंघई को यहां का एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर बनाया था। उन्हें पांच सालों के लिए नियुक्ति दी गई थी। उन्होंने अपना काम संभालते ही सैडमैप में जुटे नौकरी माफिया और रिश्वत देकर नौकरी में आए फोकटियों की छुट्टी करनी शुरु कर दी। इससे हड़कंप मच गया और नौकरी माफिया ने कुछ निकाले गए कर्मचारियों को आगे करके ईडी अनुराधा सिंघई पर कथित अनियमितताओं को लेकर प्राथमिकी दर्ज करवा दी। मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो विद्वान न्यायाधीशों ने अनुराधा सिंघई को क्लीनचिट दे दी। उन्होंने अपना काम फिर चालू किया और सैडमैप को भंडार क्रय नियमों के अधिकार दिलाकर संस्थान की आय और बढ़ा दी। जब उन्होंने कार्यभार संभाला था तब सैडमैप की आय लगभग बीस करोड़ रुपए थी, कर्मचारियों को लगभग दस महीनों से तनख्वाह नहीं मिली थी। संस्थान लगभग बंद होने की कगार पर पहुंच गया था। विभिन्न कंपनियों और सरकारी प्रतिष्ठानों से कारोबार लेकर उन्होंने सैडमैप का टर्नओवर बीस करोड़ रुपयों से बढ़ाकर एक सौ तीस करोड़ रुपए कर दिया। जैसे ही ये चमत्कार लोगों की निगाह में आया वैसे ही लुटेरे सत्ता माफिया की लार टपकने लगी। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कुछ सत्ता के दलालों से सांठगांठ करके उन्होंने इस बार ईडी अनुराधा सिंघई को निलंबित करा दिया।
इस अन्याय के खिलाफ जब वे हाईकोर्ट गईं तो शासन ने सैडमैप के फंड से ही लगभग नौ लाख रुपए निकालकर वकीलों की फौज पर खर्च कर दिए। हाईकोर्ट जबलपुर में जब शासन की ओर से महाधिवक्ता और उनके सहयोगी दर्जन भर वकीलों ने कहा कि निलंबन कोई सजा थोड़ी है। हमने तो केवल दस्तावेजों की जांच करने के लिए ईडी को निलंबित किया है। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि ठीक है अभी मामला पूरी तरह पका नहीं है इसलिए शासन को जांच कर लेने दी जाए। जिस तरह इकतरफा निलंबन की कार्यवाही की गई वह प्राकृतिक न्याय सिद्धांत के विरुद्ध थी। सैडमैप एक स्वायत्तशासी निकाय है और उद्योग विभाग के सचिव केवल इसके संरक्षक होते हैं। शासन इस संस्थान को कोई अनुदान भी नहीं देता है। ईडी, उद्योग विभाग का भी अधिकारी नहीं होता है इसके बावजूद श्रीमती सिंघई को उद्योग विभाग में हाजिरी देने के निर्देश दिए गए. संस्थान के लिए करोड़ों रुपए कमाने वाली इस कंपनी सेक्रेटरी को गुजारे भत्ते के रूप निलंबन के बाद मात्र आठ हजार रुपए दिए गए।
इस अन्याय के विरुद्ध अनुराधा सिंघई ने मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव को पत्र लिखा जिसमें कहा गया कि उन्हें उद्योग विभाग के सचिव आईएएस नवनीत मोहन कोठारी अनावश्यक रूप से प्रताडि़त कर रहे हैं। अपने पत्र में उन्होंने न्याय के लिए अनुरोध करते हुए लिखा कि सैडमैप के अध्यक्ष और सचिव नवनीत मोहन कोठारी अपनी शक्ति और पद का दुरुपयोग करते हुए एक वरिष्ठ महिला अधिकारी का उत्पीड़न, दुर्व्यवहार, मानसिक यातना, अपमान,गलत निलंबन और अब जीवन भत्ता निर्वाह रोक रहे हैं । ऐसे में मुख्यमंत्री और जनप्रतिनिधि होने के नाते आप मामले में हस्तक्षेप करें और न्याय दिलाएं।
उद्योग विभाग के सचिव ने मध्यप्रदेश औद्योगिक विकास निगम के कार्यकारी निदेशक सीएस धुर्वे के माध्यम से बीस अगस्त को एक पत्र भेजा और 21 अगस्त तक एक दिन में लगभग डेढ़ लाख पृष्ठों की जानकारी देने का दबाव बनाया। इसके जवाब में ईडी ने पत्र लिखकर निवेदन किया इस इस डेटा को संग्रहित करने में लगभग एक महीने का समय लगेगा इसलिए कृपया जवाब देने की समय सीमा बढ़ाने की कृपा करें। इस पत्र पर उद्योग विभाग ने कोई फैसला नहीं लिया और तीन सितंबर को ईडी को इकतरफा निलंबित कर दिया गया। उद्योग विभाग ने एक छोटे अफसर अंबरीश अधिकारी को भेजकर इकतरफा ईडी का कार्यभार हथिया लिया। श्री अंबरीश को विभाग के कुछ कर्मचारियों के साथ ईडी के दफ्तर भेजा गया और जबर्दस्ती ईडी की कुर्सी हथिया ली गई। ईडी को कार्यालय में मौजूद अपना निजी सामान भी नहीं उठाने दिया गया और सुरक्षा के लिए लगाए गए सभी कैमरे बंद कर दिए गए। उद्योग विभाग ने हाईकोर्ट को कहा कि कर्मचारियों के पीएफ, ईसआईसी चालान और फार्म 16 मे कोई छेड़छाड़ न हो सके इसके लिए श्रीमती सिंघई को निलंबित किया गया है जो कि कोई सजा नहीं है। एक स्वायत्तशासी निकाय की ईडी को पद से हटाने के इस षड़यंत्र में सैडमैप के ही फंड से लाखों रुपए निकाले गए और महाधिवक्ता समेत सचिव ने आठ प्रमुख वकीलों को खड़ा करके ऐसा माहौल बनाया कि हाईकोर्ट कोई राहत न दे पाए। यही नहीं अनुकूल रोस्टर का इंतजार करने के नाम पर भी मामले को कई दिनों तक लटकाया गया।
श्रीमती अनुराधा सिंघई की कार और ड्राईवर छीन लिए गए। गौरतलब ये है कि जिस जानकारी को इकट्ठा करने के लिए उद्योग विभाग उन्हें एक महीने का वक्त नहीं दे रहा था उस जानकारी को अब तक उद्योग विभाग का अमला भी एकत्रित नहीं कर पाया है।फिर वो जानकारियां केंद्र या अन्य विभागों के पास संरक्षित है।जब सैडमैप के कर्मचारियों को दस दस महीनों तक वेतन नहीं मिल पा रहा था तब तो सूक्ष्म एवं लघु उद्योग विभाग कभी सामने नहीं आया। जिस स्ववित्त पोषित संगठन को अनुराधा सिंघई ने पैरों पर खड़ा किया उनके विरुद्ध कर्मचारियों को मानव ढाल बनाकर हमले किए जा रहे हैं। जिस नौकरी माफिया को सैडमैप से निकाल बाहर किया गया था उसने एक होनहार महिला अधिकारी का चरित्र हनन करने के लिए फर्जी मोबाईल चैट बनाया को पुलिस जांच में सामने आ गया। इस कूटरचना के आरोपी सिक्योरिटी एजेंसी के संचालक और उसके कर्मचारी का अपराध भी पुलिस ने उजागर कर दिया जिससे षड़यंत्र का पूरा खुलासा हो गया है। तब भी उद्योग विभाग ने आगे आकर कभी नौकरी माफिया के विरुद्ध सैडमैप को सहयोग नहीं किया।
उन्होंने अपने पत्र में लिखा है कि एक महिला अधिकारी ने अपने पसीने और परिश्रम से मृत संगठन को पुर्नजीवित किया तो लोग फसल काटने आ गए और बीज बोने वाले को कुचलने लगे। इन लोगों को पुरुष भी कैसे कहा जा सकता है। एक झुंड में आकर ये एक महिला का शिकार करने में जुटे हुए हैं। ईडी ने अपने जिन सहयोगियों को संविदा आधार पर नियुक्त किया था उन्हें तोड़ने के लिए सचिव ने अध्यक्ष के रूप में फैसला लिया कि उन्हें सैडमेप में नहीं बल्कि किन्हीं अन्य सूचीबद्ध एजेंसियों के पेरोल पर रखा जाए। इसके लिए एक मानव संसाधन समिति का गठन किया जाए। ईडी ने सचिव को संभावित अधिकारियों की सूची भेजकर कहा कि आप आपने स्तर पर इस सूची को तय कर दीजिए । इसके बावजूद किसी समिति को गठित नहीं किया गया ताकि ईडी अपने सहयोगियों की टीम बढ़ाकर लंबित कार्यों का निपटारा न कर पाएं।
लगभग तीन सालों में श्रीमती सिंघई ने सैडमेप का टर्नओवर चार गुना तक बढ़ा दिया है। नौकरियां बेचने वाले गिरोह को निकाल बाहर किया गया। मैनपावर आऊटसोर्सिंग उद्योग को साफ सुथरा बनाकर सरकारी कार्यालयों में संविदा के आधार पर नियुक्तियां सरल बना दी गईं। यही वजह थी कि सैडमेप को मध्यप्रदेश भंडार क्रय नियम अंतर्गत नैमेत्तिक नोडल एजेंसी बनाया गया।
श्रीमती अनुराधा सिंघई ने अपने पत्र में लिखा है कि उन्होंने अगले दो सालों में लगभग पचास लाख नौकरियां सृजित करके रोजगार समस्या का समाधान करने का बीड़ा उठाया है। इस लक्ष्य को वे लगातार हासिल करती जा रहीं हैं जबकि नौकरी माफिया के लोग इन बेरोजगारों से नौकरी के एवज में रिश्वत लेकर बेरोजगारों और राज्य के साथ गद्दारी करने का षड़यंत्र कर कर रहे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री से अनुरोध किया है कि उनका गलत निलंबन रद्द किया जाए और उन्हें सम्मान के साथ बहाल किया जाए। उनके वित्तीय नुक्सान की भरपाई की जाए और वास्तविक दोषी को दंडित किया जाए।
इस पत्र के जवाब में आईएएस और सूक्ष्म एवं लघु उद्योग विभाग के सचिव नवनीत कोठारी का कहना है कि श्रीमती सिंघई कई छोटे कर्मचारियों का वेतन नहीं दे रहीं थीं इसलिए उन्हें निलंबित किया गया है। जब उनसे कहा गया कि जिन कर्मचारियों की नौकरियां संदिग्ध हैं तो उन्हें वेतन क्यों दिया जाना चाहिए तो उन्होंने कहा कि हम मामले की जांच करा रहे हैं। उनके हटाए गए नौकरी माफिया को दुबारा सैडमैप में जगह दिए जाने पर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि मैं पिछले सात महीनों से सचिव पद पर आया हूं इससे पुराने मामलों के बारे में मैं कुछ नहीं बोल सकता।
पाकिस्तान में सेना ने जिस तरह हर कमाई के तंत्र पर अपना कब्जा जमा लिया है और वहां कि अर्थव्यवस्था छिन्न भिन्न कर दी है उसी प्रकार मध्यप्रदेश में नौकरशाही ने हर कमाई के तंत्र पर अपना सिक्का जमा लिया है। लगभग अस्सी हजार करोड़ का स्थापना व्यय हड़प जाने वाला सरकारी तंत्र जनता की समस्याओं का समाधान देने में असफल साबित हो रहा है। उत्पादकता बढ़ाने के स्थान पर उद्यमियों से लूटमार की जाने लगी है।मोदी सरकार ने राज्य की आय बढ़ाने का लक्ष्य तय करके डाक्टर मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाकर भेजा है। चेतन काश्यप जैसे हुनरमंद उद्योगपति सूक्ष्म एवं लघु उद्योग विभाग के मंत्री बनाए गए हैं इसके बावजूद उनकी नाक तले नौकरी माफिया का षड़ंयत्र बदस्तूर जारी है।व्यापम भर्ती घोटाले की कहानियों की स्याही अभी सूखी नहीं है और एक बार फिर सेडमैप से नौकरियां बेचे जाने की नींव रखी जाने लगी है।उम्मीद की जानी चाहिए कि इस विषय पर राज्य के नीति निर्धारक एक बार गंभीरता से विचार करेंगे और समस्या का समाधान ढूंढ़ने में अपने हुनर का प्रयोग करेंगे। प्रशासनिक प्रमुख को बदलकर राज्य सरकार ने सुशासन की अपनी मंशा तो जाहिर कर दी है देखना है कि इसका असर कितने दिनों में साकार होता नजर आता है।
-आलोक सिंघई- डाक्टर मोहन यादव की भाजपा सरकार सरकारी तंत्र के मकड़जाल में बुरी तरह उलझ गई है। नीति आयोग ने आय बढ़ाने के जो निर्देश दिए हैं उनसे सरकारी मशीनरी अपना रिकार्ड तो अपडेट कर रही है लेकिन आम जनता की आय बढ़ाने में ये कवायद बुरी तरह असफल साबित हो रही है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने तो कर्ज लेकर खूब खैरात बांटी और भरपूर लोकप्रियता बटोरी। खुद प्रधानमंत्री को कहना पड़ा था कि वे मध्यप्रदेश के अतिलोकप्रिय मुख्यमंत्री हैं। अब ये शोर तो शांत हो गया है लेकिन सुशासन की जिद ने राज्य के उद्यमियों की बैचेनी बढ़ा दी है।बजट में अस्सी हजार करोड़ रुपए का स्थापना व्यय देकर मोहन यादव समझ रहे हैं कि इतना मंहगा प्रशासन राज्य के विकास में चार चांद लगा देगा ।हकीकत ये है कि बोगस अफसर और नाकारा सरकारी तंत्र प्रदेश के विकास की राह में बेड़ियां बन गया है। शिवराज सिंह चौहान की सरकार लगभग दो दशकों से कर्ज लेकर आधारभूत ढांचे के विकास का जो शोर मचा रही थी उसे अब मोहन यादव की सरकार केवल आंकड़ों में बदल रही है।पिछले लगभग दस महीनों से डाक्टर मोहन यादव सुशासन पर जोर दे रहे हैं। वे इस सुशासन का ख्वाब उस सरकारी तंत्र के माध्यम से साकार करने का प्रयास कर रहे हैं जो प्रदेश के खोखले विकास का जनक ही साबित हुआ है। सरकार ने उत्पादकता के जिन पैमानों पर काम शुरु किया है उनमें सबसे बड़ा राजस्व महा अभियान खोखली कवायद साबित हो रहा है। नए साफ्टवेयर के माध्यम से पटवारियों और वित्तीय प्रबंधन को जिस तरह से कसा गया है उससे सरकारी तंत्र में आक्रोश और उदासीनता बढ़ी है नतीजा सिफर रहा है। भूमिसुधार के साथ राजस्व महाअभियान 2 के नतीजे सामने आने लगे हैं। जनता से कहा गया था कि वह आनलाईन माध्यम से और तहसील स्तर पर अपनी शिकायत दर्ज कराए। लोग सरकारी अमले के पास पहुंचे भी ।उन्होंने सरकारी अमले की सेवा में कोर्निशें भी बजाईं पर परिणाम केवल शिकायत के कागज पर खात्मे तक ही पहुंच पाया। सरकारी अमले का प्रयास रहा कि फिलहाल शिकायत बंद हो जाए और हम सरकार को अपनी कार्रवाई सुनिश्चित करने की सूचना दे दें। ये प्रक्रिया भी आनलाईन ही थी इसलिए जवाब पुख्ता तरीके से दिया जा रहा है। ये कुछ वैसे विकास का नमूना है जिसके बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लाल किले की प्राचीर से और विदेशों में किए जाने वाले आयोजनों में दहाड़कर सुनाते हैं। देश के आंकड़ें बताते हैं कि जून तिमाही में जीडीपी ग्रोथ रेट पिछली 5 तिमाही में सबसे कम रही है। अप्रैल-जून 2024 तिमाही में भारत की GDP ग्रोथ रेट 6.7% दर्ज की गई है। ये तयशुदा लक्ष्य से कम है। मुख्य मंत्री अपील कर रहे हैं कि आप अपनी कृषि भूमियां बेचें नहीं क्योंकि सरकार की नीतियों से जल्दी ही खेतों पर पैसा बरसेगा। बेशक खेती पर मुनाफा बरसने की तमाम संभावनाएं खुली पड़ीं हैं। रूस यूक्रेन युद्ध हो या इस्राईल फिलिस्तीन संग्राम, समूचे विश्व में तीसरे विश्व युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं। ऐसे में भारत की जमीन विश्व की भूख शांत करने में उपयोगी साबित हो सकती है। इसके बावजूद सरकार इस अवसर को भुनाने लायक तंत्र विकसित नहीं कर पा रही है। तीन कृषि कानून देश की आर्थिक समृद्धि में सहायक साबित होने वाले थे। किसान की भी तकदीर बदल सकते थे। सरकार भले ही उन्हें देश भर में लागू न कर पाई हो लेकिन भाजपा शासित राज्यों पर तो कोई बंधन नहीं है कि वे अपनी कृषि का ढांचा इस तरह विकसित करें कि वे कृषि सुधारों के माडल बन जाएं। इसके विपरीत संघ के नाम पर भू माफिया जमीनों के दस्तावेजों का हेर फेर करने में जुटा हुआ है। फिलहाल जो आंकड़े हैं वे सरकारों के दावे की असलियत उजागर कर रहे हैं। MoSPI डेटा के अनुसार, चालू वित्त वर्ष 2024-25 की पहली तिमाही के लिए भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर धीमी होकर 6.7% हो गई है। भारत के सबसे अहम सेक्टर माने जाने वाला एग्रीकल्चर और माइनिंग सेक्टर में बड़ी गिरावट देखी गई है. एग्रीकल्चर सेक्टर में ग्रोथ घटकर दो फीसदी हो गई है जबकि पिछले वर्ष ये 3.7 प्रतिशत थी। ये बताता है कि जब दुनिया को खाद्यान्न की सबसे अधिक जरूरत है तब भारत का कृषि ढांचा बाजार की मांग का उपयोग नहीं कर पा रहा है। मध्यप्रदेश भी इससे अछूता नहीं है। एमपी में तो सरकारी खरीद घटती जा रही है और आढ़तियों के चंगुल में फंसा किसान हर चौराहे पर छला जा रहा है। आम आदमी की खरीद क्षमता घटने से बाजार की रौनक भी उड़ गई है। संगठित रोजगार के क्षेत्र तो प्रसन्न हैं पर असंगठित क्षेत्र के लिए चुनौतियां जस की तस बनी हुई हैं। सरकारी तंत्र सोच रहा है कि लाड़ली बहना,किसान सम्मान निधि और अन्य हितग्राही मूलक योजनाओं से उनका पेट काटा जा रहा है जबकि हकीकत ये है कि उद्योगों को बल देने के लिए बढ़ाए गए सरकारी तंत्र का स्थापना व्यय आम नागरिकों का कचूमर निकाल रहा है। अपनी उपयोगिता साबित करने के लिए सरकारी तंत्र ने जो सख्ती अपनाई है उससे भी जनता के बीच आक्रोश गहराता जा रहा है। पिछले दिनों मध्यप्रदेश के प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने जिस आक्रामक शैली में आंदोलन किए उनसे भी उजागर हो रहा है कि विपक्षियों को सरकार और जनता के बीच जमी मिठाई की सड़ांध महसूस हो रही है।इसके बावजूद संगठन के दंभ में डूबे भाजपा के नेतागण और सरकार अपने पैरों तले खिसकती जमीन की हकीकत से बेखबर है। तख्त और ताज का गुमान शासकों को एक सुनहरे संसार की सैर कराता है। मुख्यमत्री डॉक्टर मोहन यादव तो राजा विक्रमादित्य के सुशासन की सौंधी महक में पले बढ़े हैं।उम्मीद है कि उन्हें राजा विक्रमादित्य के सिंहासन की बत्तीस पुतलियों की गवाही अच्छे से याद होगी।
दिग्विजय सिंह की दिग्भ्रमित सरकार को 2003 में घाटी पर उतारकर उमाश्री भारती ने जिस भारतीय जनता पार्टी की सरकार को सत्ता दिलाई थी वह सत्ता में आते ही आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश के फार्मूले पर काम करने लगी। वैश्विक सूदखोरों की लॉबी ने उमाजी के पंच ज अभियान को सत्ता से धकेलकर जिस कर्ज आधारित विकास की अर्थव्यवस्था को सत्तासीन कराया वह बीस सालों तक छायी रही । बिजली ,सड़क और पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए वैश्विक संस्थाओं ने राज्य को भरपूर कर्ज मुहैया कराया। शिवराज जी को इस दौर के लिए सत्ता में भेजा गया था तो उन्होंने आधारभूत ढांचे का धन जनता के बीच बांटकर खूब वाहवाही बटोरी। आज शिवराज सिंह चौहान जनता के बीच बड़ा ब्रांड बन चुके हैं लेकिन अब राज्य उस अंधी गली में पहुंच गया है कि उसे विकास के नए प्रतिमान तलाशने पड़ रहे हैं। नए मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव के सामने चुनौती है कि वे विकास के उत्पादक मॉडल को जमीन पर उतारें और राज्य की समस्याओं का उचित समाधान तलाशें । ऐसे में पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने रतलाम शहर के विधायक और डॉ.मोहन यादव केबिनेट के मंत्री चेतन काश्यप के माध्यम से जो संदेश दिया है वह गौर करने लायक है। रतलाम शहर के विधायक चेतन काश्यप अपनी दानशीलता और जमीनी विकास को महत्व देने के लिए मॉडल बन चुके हैं। उनके बेटे कारोबार करते हैं जबकि चेतन काश्यप राजनीति की रीढ़ बने हुए हैं। उन्होंने जिन प्रकल्पों को साकार किया है वे आत्मनिर्भर समाज के लिए मार्गदर्शक बन गए हैं। उन्होंने सौ लोगों को ऐसे आवास बनवाकर दिए हैं जो आत्मिर्भरता की राह पर चलकर समृद्ध हो रहे हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत उन्होंने रोजगार को जोड़कर सुखमय संसार की गारंटी सुनिश्चित की है। उनके विशाल आवास की भोजनशाला कार्यकर्ताओं और जरूरतमंदों को समाजसेवा का मंच देती है। पूरे नगर और आसपास के गांवों में चेतन काश्यप को लक्ष्मी पुत्र माना जाता है। लोग जानते हैं कि भाई जी यदि खड़े हैं तो वहां सुशासन खुद ब खुद हाथ बांधे खड़ा हो जाएगा। यही वजह है कि वे चुनाव में गली गली की धूल नहीं फांकते। जनता स्वयं उनके लिए चुनाव लड़ती है।ऐसे आदर्श लोक सेवक यदि हर विधानसभा को मिलने लगें तो एक पंचवर्षीय योजना में राज्य की काया ही पलट जाए। कांग्रेस जिस भाजपा को सेठों और बनियों की पार्टी कहकर उपहास उड़ाती थी उस भाजपा ने उन्हें पार्टी का कोषाध्यक्ष बनाया। राज्य की अर्थव्यवस्था में किस ढांचे की जरूरत है वे अच्छी तरह जानते हैं। पिछले दो दशकों में भाजपा ढांचागत विकास पर कार्य कर रही थी तब चेतन काश्यप की भूमिका का उपयोग किया जा सकता था लेकिन शिवराज जी और उनके बटोरनाथ मंत्री अपने काम में किसी प्रकार का खलल नहीं चाहते थे। यही वजह है कि उन्होंने चेतन काश्यप की प्रतिभा का इस्तेमाल करने पर कोई गौर नहीं किया। चेतन काश्यप रतलाम में जो गोल्ड सोक (सोने का बाजार)बनवा रहे हैं। वह जब आकार ले लेगा तो रतलाम देश की प्रमुख सोने की मंडी बन जाएगा। यहां बनने वाले गोल्ड के आभूषण दुबई की तरह देश और विदेश के लिए आकर्षण का केन्द्र बन जाएंगे। सोने के कारोबार को इससे पहले इतनी कुशलता से दुनिया में कहीं नहीं खड़ा किया गया है।ऐसे ढेरों विचार काश्यप की झोली में हर वक्त मौजूद रहते हैं। खुद चेतन काश्यप बताते हैं कि जैन साध्वी ने उन्हें प्रेरणा दी थी कि वे अपने हुनर और भाग्य की सौगात समाज के पिछड़े और दलित लोगों को मुख्यधारा में लाने के दें। तबसे काश्यप का लक्ष्य बन गया है कि वे विकास की दौड़ में पिछड़ चुके नागरिकों का जीवन संवारने में जुट गए हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब मध्यप्रदेश में अपने चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत की तो उन्होंने रतलाम शहर को ही चुना। पहली चुनावी सभा में उनके साथ चेतन काश्यप और मंदसौर के सांसद सुधीर गुप्ता भी मौजूद थे। सुधीर गुप्ता संसद में लोक लेखा समिति, वित्त समिति, रसायन व उर्वरक समितिके अलावा लोकसभा आवास समिति की जवाबदारी भी संभालते हैं। वे प्रधानमंत्री के उन प्रमुख सहयोगियों में शामिल हैं जो भाजपा की विकास की अवधारणा की आधारशिला हैं। चेतन काश्यप को मंत्री बनाकर डॉक्टर मोहन यादव सरकार ने जता दिया है कि मध्यप्रदेश अब भाजपा की उस सुविचारित विकास नीतियों पर अमल करने जा रहा है जो देश को न केवल पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बना देंगे बल्कि इस लक्ष्य से भी कई गुना आगे निकल जाएंगे। ऐसे में पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने चेतन काश्यप को सलाह देकर विकास के इस मॉडल के प्रति अपनी सहमति जताई है। उमा भारती अपने भाषणों में कहती रहीं हैं कि वे दलितों और पिछड़ों को विकसित तभी मानेंगी जब वे खुद शहरों के प्रमुख बाजारों में अपने प्रतिष्ठान खड़े करके देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देने लगें। समाज में वैमनस्य फैलाती कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी जैसे दलों के लिए भाजपा ने जो प्रतिमान खड़े किए हैं वे हतप्रभ कर देने लायक हैं। पचहत्तर सालों के बाद मध्यप्रदेश की सरकारी नौकरियों में मात्र चार लाख दलितों और पिछड़ों को रोजगार मिल सके हैं जबकि भारतीय जनता पार्टी ने अकेले लाड़ली बहना योजना से चालीस लाख दलितों के घर में आय का दीपक जला दिया है। अन्य योजनाओं का आंकड़ा देखा जाए तो पिछड़ों और दलितों की राजनीति करने वाले तमाम राजनीतिक दल अवाक रह जाएंगे। विकास का वामपंथी मॉडल जिन श्रमिकों की बात करता है भाजपा ने उन्हें समाज की उत्पादकता में हिस्सेदार बनाकर सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं। सत्ता संभालते ही मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव ने हुकुमचंद मिल और ग्वालियर की विनोद मिल के परिसमापन की जो पहल की वह भाजपा के श्रमिकों के प्रति समर्पण की आहट है। नई सरकार राज्य में पूंजी उत्पादन का जो मॉडल खड़ा करना चाह रही है उसकी झलक अभी से मिल गई है। उमा भारती ने चेतन काश्यप के बहाने एक बड़ी बहस को जन्म दिया है। वे कह रहीं हैं कि चेतन काश्यप को वेतन लेना चाहिए और अपने कर कमलों से उसे समाज की बेहतरी के लिए खर्च करना चाहिए। उनके सेवा कार्य तभी भाजपा के समर्पण के प्रकाश स्तंभ बन पाएंगे। आने वाले समय में राज्य एक बड़ी बहस में शामिल होने जा रहा है जिसमें एक ओर राज्य को कर्जदार बनाकर वाहवाही लूटने वाली लॉबी खड़ी होगी वहीं दूसरी ओर वित्तीय संसाधनों का विकास करके देश को बुलंदी पर पहुंचाने वाले स्वयंसेवक खड़े होंगे। तब विकास की अवधारणा का अंतर साफ समझा जा सकेगा।
कांग्रेस की अराजक सरकारों से मुक्ति के दो दशक बाद तक मध्यप्रदेश किताबी प्रयोगों से गुजरता रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने जिस पंच ज अभियान की नींव रखी थी वह साकार हो पाती इसके पहले ही अंतर्राष्ट्रीय सूदखोरों के एजेंटों ने मध्यप्रदेश की सत्ता हथिया ली थी। बाबूलाल गौर हों या शिवराज सिंह चौहान और थोड़े समय के लिए आए कांग्रेस के कमलनाथ सभी कर्ज आधारित अर्थव्यवस्था के पक्षधर रहे हैं। यही वजह है कि सरकारों का आकलन करने में जनता को खासी परेशानी महसूस होती थी। भाजपाई उन्हें एक तरह से कांग्रेसी ही नजर आते थे। जाहिर है कि जब विकास की अवधारणा कर्ज लेकर घी पीने के सूत्रवाक्य पर टिकी हो तो राज्य की उत्पादकता बढ़ाने की ओर किसका ध्यान जाता।कर्ज लेना और फिर सत्ता के इर्द गिर्द जुटे माफिया के माध्यम से उसे हड़प लेना सरकार की शैली बन गई थी। पहली बार महाकाल ने एमपी में सुशासन के लिए अपने ऐसे भक्त को भेजा है जो सुशासन की पाठशाला में तपकर सामने आया है।
मुख्यमंत्री रहते हुए शिवराज सिंह चौहान ने किसानों का नाम जपना शुरु किया था। एमपी की कृषि ही एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जो बगैर निवेश किए खासी उत्पादकता देता है। औद्योगिक विकास में तो भारी निवेश करने के बाद भी उत्पादकता की कोई गारंटी नहीं होती। फिर जब उद्योगों को जबरिया थोपा गया हो तब तो वे अपनी स्थापना के समय ही उपसंहार का अध्याय भी लिख देते हैं। ऐसे में प्रदेश को आत्मनिर्भरता की परंपरा की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। शिवराज सिंह चौहान के होनोलुलु शासन से हर कोई खफा था लेकिन कांग्रेस न आ जाए इस भय से सभी खामोश रहते थे। हवाई जहाजों में फुदककर गांव खेड़ों में जाना और मैं हूं न कहकर लोगों को हूल देना कोई शिवराज सिंह चौहान से सीख सकता है।अभी ये भ्रम फैलाया जा रहा है कि मामा के जाने से लाड़ली बहना योजना बंद कर दी जाएगी,जबकि ये तो शासन की योजना है। ये बात लाड़ली बहनों को थोड़े दिनों में जरूर समझ में आ जाएगी।
भाजपा के नेता रघुनंदन शर्मा ने तो शिवराज जी को घोषणावीर का तमगा देकर उनकी कार्यशैली पर सवालिया निशान लगा दिया था लेकिन अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के समर्थन से उनकी नैया चलती रही। क्या भाजपा और क्या कांग्रेसी सभी उनके समर्थन में खामोश रहे। शिवराज सिंह चौहान विनम्र शासक रहे हैं और बीस सालों बाद भी उनमें अहंकार नहीं पनप पाया है इसी वजह से उनकी सारी नाकामियों पर पार्टी और संगठन दोनों परदा डालते रहे। खोखली ललकार के सहारे उन्होंने सत्ता चलाने की कोशिश जरूर की लेकिन वे शुरु से लेकर अंत तक नौकरशाही और पुलिस प्रशासन पर लगाम नहीं लगा सके।
भारतीय जनता पार्टी कार्यालय में जब विधायक दलकी बैठक हो रही थी तब पार्टी का संगठन और सरकार के नुमाइंदे सभी अपनी नाकामियों का सबूत पेश कर रहे थे। भारतीय जनता पार्टी संगठन ने कोई प्लान नहीं बनाया था कि जब नए नेता की घोषणा होगी तो किस तरह वो आने वाले नागरिकों, पदाधिकारियों या प्रेस को संबोधित करेंगे। बैठक समाप्त होते ही प्रेस के प्रतिनिधियों को जब फैसले की जानकारी मिली तो वे पार्टी कार्यालय में भीतर घुस गए। भारी धक्कामुक्की और अव्यवस्था के बीच जनता तक जानकारी पहुंचाने की कोई व्यवस्था नहीं थी।
नए नेता के चयन की सूचना जनता तक पहुंचाने के लिए प्रेस मीडिया को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा।
ऐसा लगता है कि ये अराजकता पार्टी के प्रदेश हाईकमान के निर्देश पर ही की गई थी। व्यवस्थित चुनाव प्रचार अभियान चलाने वाला भाजपा का संगठन फैसला सुनने के बाद ऐसा शून्य हो गया था कि उसने अव्यवस्था का लांछन नए नेता पर थोपने की तैयारी पहले से ही कर रखी थी। महिलाएं और युवा पत्रकार इसी धक्कामुक्की के बीच जनता को जानकारियां पहुंचा रहे थे। नाकाम पुलिस प्रशासन भी तैयार नहीं था। वह तय ही नहीं कर पाया कि किस तरह वह उत्साहित कार्यकर्ताओं के इस सैलाब का प्रबंधन कर पाएगा। माईक संभाले पुलिस के अधिकारी स्वयं अपनी अव्यवस्था के शिकार बने और भीड़ ने उन्हें धकेलकर गिरा दिया।
विदा होती सत्ता ने नए मुख्यमंत्री के चयन की सूचना के मार्ग में दरवाजा बंद करके कई बाधाएं खड़ी कर दीं थीं.
डॉ.मोहन यादव सख्त प्रशासक माने जाते हैं। वे स्वर्गीय वीरेन्द्र सखलेचा की तरह आदर्शवाद के तले दबने वाले व्यक्ति भी नहीं हैं। उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि समाज और भीड़ का प्रबंधन कैसे करना होता है। उज्जैन में लगने वाले कुंभ की व्यवस्था संभालने का उन्हें लंबा अनुभव है। ऐसे में जनता को क्या सुविधाएं कब उपलब्ध करवाना है वे अच्छी तरह जानते हैं। किन पाखंडियों की सत्ता में घुसपैठ रोकना है वे ये भी अच्छी तरह समझते हैं।समर्पित भाव से जनसेवा करने का उनका लंबा इतिहास है। पार्टी को जाति या वर्ग के दायरे से बाहर निकलकर व्यवस्था संभालने में भी उनकी युक्तियां सदैव से चर्चित रहीं हैं।
भारत सरकार की योजनाएं हों या फिर राज्य सरकार की उन्होंने अपने क्षेत्र के लोगों को मुहैया कराने में रिकार्ड स्थापित किया है। योजनाओं को जरूरतमंदों तक पहुंचाना और इनमें घोटाला करने वालों को उनकी हैसियत बताना उनका प्रिय शगल है। इसलिए अराजकता के दौर के आदी हो चुके मध्यप्रदेश के सत्ता माफिया को अब सावधान हो जाना चाहिए। सत्ता की आड़ में बजट की चोरी करने वालों का गिरोह भी अब सावधान हो जाए तो ही बेहतर होगा क्योंकि सत्ता के लुटेरों की खाल खींचने वाला जांबाज अब मैदान पर आ गया है। ऐसे ठग समझ लें कि उनका सामना अब तक शिवराज जी जैसे भलेमानस से पड़ा था। पहली बार उन्हें जाणता राजा मिला है। जो एमपी को नई ऊंचाईयों पर ले जाने के लिए कमर कसकर तैयार है।फिर मोदीजी का डबल इंजन तो पहले ही उनके साथ मौजूद है।
भाजपा ने तीसरी सूची में आदिवासी नेता रहे मनमोहन शाह बट्टी की बेटी मोनिका बट्टी को अमरवाड़ा से टिकिट देकर खलबली मचा दी है। कभी सनातन परंपरा के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले आदिवासी नेता मनमोहन शाह बट्टी की बेटी को चुनाव मैदान में उतारकर भाजपा ने कांग्रेस के अरमानों पर घड़ों पानी उढ़ेल दिया है। मनमोहन शाह बट्टी आदिवासी सम्मान का नारा देकर राजनीति में उतरे थे। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी बनाई। इस पार्टी ने समय समय पर अपनी मौजूदगी भी दर्ज कराई लेकिन राजनीतिक बदलाव लाना रेत में नाव खेने के समान होता है। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी में फूट भी पड़ी और पार्टी अप्रासंगिक भी हो गई। इसके बावजूद पिछले विधानसभा चुनावों में कमलनाथ कांग्रेस ने हीरालाल अलावा के नेतृत्व में जयस संगठन के नेतृत्व तले आदिवासियों को लामबंद करने में सफलता पा ली थी. आदिवासी वोट बैंक प्रदेश की 36 सीटों पर निर्णायक होता है। नतीजतन वोट का गणित गड़बड़ाया और भारतीय जनता पार्टी अधिक वोट पाने के बावजूद सत्ता से दूर रह गई थी। कमलनाथ की कूटनीति ने उन्हें सत्ता तक तो पहुंचा दिया था लेकिन शुचिता के अभाव ने सत्ता की लूट का जो नंगा नाच किया उससे क्षुब्ध होकर ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस के विधायकों ने विद्रोह कर दिया। कमलनाथ की सरकार औंधे मुंह गिर गई। तबसे भाजपा ने अपना खोया जनाधार वापस समेटने का अनुष्ठान शुरु कर दिया और आज वह मजबूत स्थिति में चुनावी कीर्तिमान स्थापित करने चल पड़ी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हालिया भोपाल दौरे के बाद तरह तरह की अटकलबाजियां शुरु हो गईं थीं लेकिन लोग तब भौंचक्के रह गए जब उनके दौरे के तुरंत बाद भाजपा हाईकमान ने अपने प्रत्याशियों की दूसरी सूची जारी कर दी। इस सूची में भाजपा ने तीन केन्द्रीय मंत्रियों और चार सांसदों को मैदान में उतारकर सभी को चौंका दिया। टिकिट बांटकर लौटे नरेन्द्र सिंह तोमर, प्रहलाद पटेल और फग्गन सिंह कुलस्ते को भी शायद अंदाजा नहीं था कि उन्हें मैदान में दो दो हाथ करना पड़ेंगे। बरसों से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की शासन शैली के खिलाफ शिकायतें आती रहीं हैं। भाजपा के कई दिग्गज स्वयं को मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं। खुद शिवराज सिंह चौहान बार बार खुद को चुनौतियों के सामने असहाय पाते रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनावों में जब उनकी सरकार चली गई तो उन्होंने ये कहते हुए संतोष व्यक्त किया था कि मैं मुक्त हो गया। आखिर उन्हें किसने बांध रखा था। खुला हाथ मिलने के बावजूद वे खुद को बंधक क्यों महसूस कर रहे थे। दरअसल शिवराज सिंह चौहान लगभग अठारह सालों तक प्रदेश में ऐसी सरकार चलाते रहे हैं जो सत्ता माफिया की गिरफ्त में जकड़ी रही है। वे चाहकर भी इस गिरोह पर लगाम नहीं लगा सके। इस माफिया गिरोह ने एक क्लब बना रखा है और सारे कमाऊ ठेके इसी गिरोह के चंगू मंगू हड़प लेते रहे हैं। सत्ता की इस लूटपाट में आईएएस अफसरों का एक गिरोह भी शामिल रहा है। आज राजधानी की सड़कों पर रोज वाहनों का जाम लगता है। इसकी वजह सत्ता की लूट से आई काली कमाई रही है। अरबों रुपयों का विदेशी कर्ज लेकर जन कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर जन धन की लूट ने ये हालात निर्मित किए हैं। कल्याणकारी योजनाएं सफल भी हुईं हैं जनता को उनका लाभ भी मिला है लेकिन ये लाभ उस कर्ज की तुलना में बहुत कम है जिसका ब्याज आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि मोदी है तो मुमकिन है।इस पर शिवराज के एक करीबी मंत्री ने कहा कि ये बड़बोला पन है किसी को अपने मुंह मियां मिट्ठू थोड़ी बनना चाहिए। भाजपा संगठन से जुड़े समर्पित स्वयंसेवक जानते हैं कि जिन नेताओं ने खुद को ब्रांड के रूप में स्थापित करके जनता के दिलों तक सफर किया है उन्होंने मतदाताओं को भरोसा दिलाने के लिए खुदकी मौजूदगी बताई है। कभी नारा दिया जाता था बच्चा बच्चा अटल बिहारी । शिवराज खुद मैं हूं न बोलकर लोगों को भरोसा दिलाने का प्रयास करते रहे हैं। इसके बावजूद उनकी सरकार की घोषणाएं सौ फीसदी सफल नहीं रहीं। यही वजह है कि भाजपा के ही वरिष्ठ नेता ने उन्हें घोषणा वीर की संज्ञा दे डाली थी। भाजपा हाईकमान के पास स्पष्ट फीड बैक था कि शिवराज सिंह चौहान के नाम को लेकर लोगों में बैचेनी है। खास तौर पर युवा वर्ग बदलाव चाहता है। उसने जबसे होश संभाला है भाजपा सरकार ही देखी है। ये सरकार न तो उसे रोजगार दे पाई न ही पूंजी निर्माण का कोई माहौल बना पाई है। ऐसे में कांग्रेस ने उसे पिछले विधानसभा चुनावों में बरगला लिया था। इस बार फिर ऐसा न हो इसके लिए हाईकमान ने शिवराज सिंह चौहान को हटाया तो नहीं है। इसकी वजह ये है कि शिवराज पर पिछले दो दशकों में भाजपा ने करोड़ों रुपए खर्च किए हैं। उन्हें ब्रांड के रूप में स्थापित किया है। इसलिए उन पर ही जवाबदारी है कि पार्टी को एक बार फिर सत्ता में लाएं। शिवराज के इर्द गिर्द जुटे सत्ता माफिया ने पंचायतों से लेकर स्वास्थ्य ,सड़क, बिजली, पानी और उद्योग सभी क्षेत्रों में जो लूट मचाई है उससे सभी खफा हैं। जाहिर है कि भाजपा को यदि 2024 में लोकसभा का चुनाव जीतना है तो उसे मध्यप्रदेश की अपनी सत्ता बचानी पड़ेगी। यही वजह है कि मोदी शाह की जोड़ी और भाजपा हाईकमान पूरी गंभीरता से मध्यप्रदेश में अपना परचम फहराने में जुट गए हैं। नरेन्द्र मोदी ने देश की अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डॉलर का टारगेट रखकर जो योजनाएं बनाई हैं उसमें वे कोई चूक नहीं होने देना चाहते हैं। कांग्रेस जहां डिफाल्टरों को पालने पोसने में जुटी रही है वहीं भाजपा ने किसानों और महिलाओं को अपना साथी बनाया है। आधी आबादी को मजबूती देकर वे अर्थ व्यवस्था में लंबी छलांग लगाना चाहते हैं। उन्होंने जाति,धर्म, वर्ग की राजनीति नहीं खेली। उन्होंने देश के विशाल वर्कफोर्स पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है। यही वजह है कि मोदी ने जब अपने भाषण में शिवराज सिंह चौहान का नाम नहीं लिया तो उनके समर्थक बौखला गए। उनके समर्थक एक मंत्री ने कहा कि जब शिवराज सिंह इस चुनावी रण के दूल्हे हैं तो उन्हें नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए। जबकि दूसरी सूची में जिन दिग्गजों और क्षेत्रीय क्षत्रपों को चुनाव में भेजकर भाजपा ने उन्हें चुनाव जिताने की जो जवाबदारी सौंपी है उससे साफ है कि भाजपा हाईकमान शिवराज का साफ विकल्प तैयार करना चाहती है। ये जनता की मांग पर लिया गया फैसला है जो भले ही कड़वा लगे पर समस्या का इससे अच्छा समाधान दूसरा नहीं हो सकता। इस फैसले से फिलहाल कांग्रेस तो चौखाने चित्त नजर आ रही है।
किसान का कर्जा माफ, मुफ्त बिजली, सरकारी नौकरियों का खोखला उद्घोष, जाति और धर्म आधारित वर्ग भेद जैसे मसालों के भरोसे कमलनाथ कांग्रेस मध्यप्रदेश में काठ की हांडी चढ़ाने का प्रयास कर रही है। कांग्रेस का वचन पत्र कमलनाथ की थोथी शोशेबाजी से मुक्त नहीं हो पाया है। इसके विपरीत भारतीय जनता पार्टी अपने अंत्योदय के फार्मूले से जन जन तक पैठ बढ़ाती जा रही है। शिवराज सिंह चौहान की भाजपा सरकार पर घोषणाओं का आरोप उस वक्त फीका पड़ गया है जब चुनावी बेला में सरकार ने दनादन हितग्राही मूलक योजनाओं का सैलाब ला दिया है। लाड़ली बहना योजना से भाजपा ने घर घर में पैठ बना ली है। इस योजना का दूसरा चरण 20 अगस्त तक चलेगा। इस बीच पंद्रह अगस्त का राष्ट्रीय त्यौहार भी है। इसमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह अपने बीस साल के कार्यकाल में आए बदलाव की झांकी भी पेश करेंगे। भाजपा सरकार के पिटारे में सफलताओं के इतने मुद्दे हैं कि अच्छा भला कांग्रेसी भी खामोश रह जाता है।आम जनता को अब ये समझ में आ गया है कि जाति धर्म और वर्गभेद की राजनीति से इतर भारतीय जनता पार्टी का अंत्योदय समाज के हर तबके के लिए सुखद संदेश ला रहा है। कांग्रेस ने भाजपा पर जो अडानी अंबानी जैसे व्यापारियों की पार्टी होने का आरोप लगाया था वह हकीकत में मुंह के बल गिरा है। जन जन तक ये संदेश पहुंचाने में भाजपा कामयाब रही है कि वह वास्तव में देश के उद्यमियों के साथ खड़ी है और एकनया भारत समृद्ध भारत बनाने में सफलताएं हासिल कर रही है।
जनता का ये भरोसा एक दिन में नहीं जमा बल्कि मध्यप्रदेश में लगातार बीस सालों तक भाजपा ने ये शहनाई बजाई है। बीच में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार ने जिस तरह वैमनस्य और संकीर्ण नजरिये से इंस्पेक्टरराज की कलह मचाई उससे लोगों को दोनों पार्टियों की मानसिकता का अंतर समझ में आ गया है। कांग्रेस आज भी डिफाल्टरों के साथ खड़ी है। कमलनाथ कह रहे हैं कि वे सत्ता में आने पर कर्जा माफ करेंगे। कांग्रेस उन फोकटियों का कर्जा माफ करने और उन्हें अपने साथ लाने का प्रयास कर रही है जो विकास करने वाले नहीं बल्कि मुफ्तखोर हैं। भाजपा कर्मठ किसानों को नकद राशि देकर आगे बढ़ने में मदद कर रही है। सरकारी नौकरियों के नाम पर एक दो फीसदी लोगों तक लाखों रुपए का वेतन बांटकर कांग्रेस ने जिस उपभोक्तावाद की नींव रखी थी भाजपा ने उसे तो नहीं छेड़ा है लेकिन इसके साथ वह जन जन तक सरकारी योजनाओं का संदेश लेकर पहुंच रही है। ऐसा कोई वर्ग नहीं कोई नागरिक नहीं जो सरकार की योजनाओं का सीधा लाभ नहीं उठा रहा हो। ऐसे में आने वाले चुनाव की तस्वीर इकतरफा नजर आने लगी है।
कांग्रेस के दंभी नेता आज भी अपनी विचारधारा छोड़ने तैयार नहीं हैं। जो विचारधारा अप्रासंगिक हो चली। समय की आंधी ने जिसके परखचे उड़ा दिए उसे ही गले लगाए बैठी कांग्रेस को आने वाला पंद्रह अगस्त एक तगड़ा पंच साबित होने वाला है। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लाल किले से देश को संदेश देंगे और बताएंगे कि उनकी सरकारों ने क्या बदलाव किए हैं जो जनता महसूस कर रही है तो देश की जनता को अपना मानस बनाने में सरलता होगी।
विकास की ये कहानी तब लिखी जा रही है जब सरकारी बैंक ऊंची दूकान फीका पकवान बनकर असहयोग कर रहे हैं। सरकारी बैंकों का स्थापना व्यय उपभोक्ता कंपनियों के लिए तो मुनाफे का सौदा बना हुआ है जबकि आम जनता बैंकों के राष्ट्रीयकरण से लेकर अब तक वंचित बनी रही है। आज जब हर नागरिक को बैंक की चौखट तक पहुंचाने का प्रयास चल रहा है तब सरकारी बैंक हांफ रहे हैं। इसके विपरीत निजी क्षेत्र के स्माल फाईनेंस बैंक तक धड़ल्ले से आगे बढ़ते जा रहे हैं। आईडीएफसी फर्स्ट बैंक हो या इक्विटास स्माल फाईनेंस बैंक, एयू स्माल फाईनेंस बैंक, बंधन बैंक सभी तेजी से लोन बांट रहे हैं और मुनाफा बटोर रहे हैं। इसके विपरीत सरकारी बैंक ग्राहकों के धन की अघोषित चोरियां कर रहे हैं। कोई टीडीएस के नाम पर रकम उड़ा रहा है तो कोई बैंक लाकर के किराए के नाम पर ऊटपटांग बिलिंग कर रहा है। इसके बावजूद निगरानी तंत्र खामोश है।
मध्यप्रदेश की सुशासन और विकास रिपोर्ट-2022 के अनुसार राज्य में आए बदलाव से मध्यप्रदेश बीमारू से विकसित प्रदेशों की पंक्ति में उदाहरण बन कर खड़ा हुआ है। इस उपलब्धि में प्रदेश में जन-भागीदारी से विकास के मॉडल ने अहम भूमिका निभाई है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में केन्द्र और राज्य की डबल इंजन सरकार ने मध्यप्रदेश को अन्य राज्यों के लिये अनुकरणीय बना दिया है। इस अरसे में सड़क, बिजली, पानी, कृषि, पर्यटन, जल-संवर्धन, सिंचाई, निवेश, स्व-रोजगार और अधो-संरचना विकास के साथ उन सभी पहलुओं पर सुविचारित एवं सर्वांगीण विकास की नवीन गाथा लिखी गई जो जन-कल्याण के साथ विकास के लिये जरूरी हैं।
बेहतर वित्तीय प्रबंधन और चौतरफा विकास से आज प्रदेश की विकास दर 19.7 प्रतिशत है, जो देश में सर्वाधिक है। देश की अर्थ-व्यवस्था में मध्यप्रदेश 4.6 प्रतिशत का योगदान दे रहा है। सकल घरेलू उत्पाद में बीते दशक में 200 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। मध्यप्रदेश की आर्थिक वृद्धि दर निरंतर बढ़ रही है। वर्ष 2001-02 में 4.43 प्रतिशत की दर आज बढ़ कर 16.43 प्रतिशत हो गई है प्रदेश का सकल घरेलू उत्पाद 71 हजार 594 करोड़ रूपये से बढ़ कर 13 लाख 22 हजार 821 रूपये हो गया है। वर्ष 2001-02 में प्रति व्यक्ति आय 11 हजार 718 रूपये थी, जो वर्ष 2022-23 में बढ़ कर एक लाख 40 हजार 583 रूपये हो गई है। राज्य की जीएसडीपी की वृद्धि दर विगत एक दशक में राष्ट्रीय जीडीपी वृद्धि दर से अधिक रही है।
विकास प्रक्रिया में राज्य का अधो-संरचना विकास निरंतर हो रहा है। अधो-संरचना बजट जो वर्ष 2002-03 में 3873 करोड़ रूपए था, वह वर्ष 2023-24 में बढ़ कर 56 हजार 256 करोड़ रुपए हो गया है। एक समय था जब बिजली आती कम थी और जाती ज्यादा थी। आज प्रदेश बिजली क्षेत्र में आत्म-निर्भर है और 24 घंटे बिजली की उपलब्धता है। वर्ष 2003 में ऊर्जा क्षमता 5173 मेगावाट थी, जो बढ़ कर 28 हजार मेगावाट हो गई है।
अच्छी सड़कें विकास की धुरी होती है। एक समय था, तब यह पता ही नहीं चलता था कि सड़क में गड्डे हैं या गड्डे में सड़क है। अब गाँव-गाँव, शहर-शहर अच्छी गुणवत्तायुक्त सड़कों का जाल बिछाया गया हैं। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में वर्ष 2001-02 में 44 हजार किलोमीटर सड़कें थी, अब 4 लाख 10 हजार किलोमीटर सड़कें बन गई हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना में लगभग 1500 किलोमीटर लंबाई के 40 हजार करोड़ की लागत के 35 कार्य स्वीकृत हैं। अटल, नर्मदा और विंध्य प्रगति पथ के साथ मालवा, बुंदेलखंड और मध्य विकास पथ निर्मित किए जा रहे हैं।
प्रदेश में सभी रेलवे क्रॉसिंग समाप्त करने के लिए 105 रेलवे ओवर ब्रिज के साथ 334 पुलों का निर्माण हो रहा है। साथ ही 86 हजार करोड़ से अधिक की रेल परियोजनाओं के कार्य चल रहे हैं। वर्ष 2009 से 2014 के बीच जहाँ प्रदेश को औसतन 632 करोड़ रूपए का रेलवे बजट मिलता था, वहीं वर्ष 2022-23 में 13 हजार 607 करोड़ का रेलवे बजट प्रावधान मिला है, जो इक्कीस गुना अधिक है। अमृत भारत रेलवे स्टेशन योजना में प्रदेश के 80 रेलवे स्टेशन विश्व स्तरीय बनाए जाएंगे। अत्याधुनिक रानी कमलापति स्टेशन देश में एक मॉडल बना है। एक वंदे भारत ट्रेन प्रारंभ हो चुकी है.
प्रदेश में कृषि को लाभ का धंधा बनाना के लिए सिंचाई क्षमताओं का निरंतर विकास किया जा रहा है। वर्ष 2003 में सिंचाई क्षमता केवल 7 लाख 68 हजार हेक्टेयर थी, जो वर्ष 2022 में बढ़ कर 45 लाख हेक्टेयर से अधिक हो गई है। वर्ष 2025 तक सिंचाई क्षमता को बढ़ा कर 65 लाख हेक्टेयर किये जाने पर भी तेजी से काम किया जा रहा है। हर घर जल से नल योजना पर तेज गति से कार्य हो रहा है, अभी तक लगभग 50% घरों तक नल से जल पहुँच चुका है। कृषि विकास दर जो वर्ष 2002-03 में 03 प्रतिशत थी, वह वर्ष 2020-21 में बढ़ कर 18.89 प्रतिशत हो गई है। खेती और एलाइड सेक्टर का बजट भी 600 करोड़ से बढ़ कर 53 हजार 964 करोड़ हो गया। खाद्य उत्पादन भी इस अवधि में 159 लाख मीट्रिक टन से बढ़ कर 619 लाख मीट्रिक टन हो गया है।
उद्यानिकी फसलों का रकबा 4 लाख 67 हजार हेक्टेयर से बढ़ कर 25 लाख हेक्टेयर हो गया है। फसल उत्पादन 224 लाख मीट्रिक टन से बढ़ कर 725 लाख मीट्रिक टन से अधिक हो गया है। फसल उत्पादकता 1195 किलोग्राम से बढ़ कर 2421 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई है। किसान-कल्याण के ध्येय से प्रदेश में गत 3 वर्षों में फसलों की नुकसानी पर 4000 करोड़ से अधिक की राहत राशि वितरित की गई है। प्रदेश के 11 लाख से अधिक डिफाल्टर किसानों का 2123 करोड़ का ब्याज माफ करने के लिए मुख्यमंत्री कृषक ब्याज माफी योजना प्रारंभ की गई है। पिछले 3 वर्षों में किसानों को विभिन्न शासकीय योजनाओं में 2 लाख 69 हजार 686 करोड़ रुपये से अधिक के हितलाभ वितरण किए गए हैं। फसल क्षति प्रतिपूर्ति दरों में भी कई गुना वृद्धि की गई है।
कांग्रेस जहां एक तरफ मुफ्तखोर प्रभावशाली वर्ग को सहेजने का जतन कर रही है वहीं भाजपा ने हर घर तक अपनी योजनाओं का लाभ पहुंचाया है। ऐसे में अब भाजपा को केवल नई भाजपा ही मात दे सकती है। कांग्रेस के हौसलों की हवा दिन ब दिन निकलती नजर आ रही है।
राजनीतिक दलों द्वारा प्रदान किए जाने वाले मुफ्त उपहारों को रोकने या विनियमित करने के लिए कानूनों का अधिनियमन एक संभावना है, लेकिन यह कानूनी ढांचे, राजनीतिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और एक लोकतांत्रिक समाज में सरकार की भूमिका के बारे में महत्वपूर्ण विचार करता है।
कानूनी ढांचा और संवैधानिकता: राजनीतिक दलों द्वारा मुफ्त उपहारों को प्रतिबंधित या प्रतिबंधित करने के उद्देश्य से किसी भी कानून को देश के संवैधानिक प्रावधानों का पालन करने की आवश्यकता होगी। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि इस तरह के कानून मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं करते हैं, जिसमें संविधान द्वारा गारंटीकृत भाषण, संघ और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता शामिल है।
परिभाषा और दायरा: कानून को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने की आवश्यकता होगी कि फ्रीबी क्या है और इसकी प्रयोज्यता की सीमाएं निर्धारित करें। इससे अस्पष्टता से बचने और इसके कार्यान्वयन में निरंतरता सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
प्रवर्तन और दंड: कानून को लागू करने के लिए प्रभावी तंत्र स्थापित करना और गैर-अनुपालन के लिए दंड लगाना महत्वपूर्ण होगा। इसके लिए उचित कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त संसाधन, निगरानी प्रणाली और निष्पक्ष निरीक्षण की आवश्यकता होगी।
जनता की भावना और राजनीतिक इच्छाशक्ति: इस तरह के कानून की व्यवहार्यता और स्वीकृति प्रचलित सार्वजनिक भावना और इस मुद्दे को हल करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करेगी। यदि परिवर्तन के लिए अपर्याप्त सार्वजनिक मांग है तो राजनीतिक दल विरोध कर सकते हैं या कानून को दरकिनार करने के तरीके खोज सकते हैं।
लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर प्रभाव: राजनीतिक दलों की मुफ्त उपहार देने की क्षमता को सीमित करना राजनीतिक अभियानों में राज्य के हस्तक्षेप की सीमाओं के बारे में सवाल उठाता है। संसाधनों के दुरुपयोग को रोकने और निष्पक्ष और प्रतिस्पर्धी चुनावी प्रक्रिया सुनिश्चित करने के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण है।
केवल कानून पर निर्भर रहने के बजाय, राजनीतिक दलों द्वारा मुफ्त उपहारों के मुद्दे को संबोधित करने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। इसमें मुफ्त उपहारों के परिणामों के बारे में मतदाताओं के बीच जागरूकता बढ़ाना, जिम्मेदार शासन को प्रोत्साहित करना और अभियान के वित्तपोषण में पारदर्शिता को बढ़ावा देना शामिल है। इसमें जवाबदेही और नागरिक भागीदारी की संस्कृति को बढ़ावा देना भी शामिल है, जहां मतदाता अल्पकालिक लाभों के बजाय पार्टी की व्यापक दृष्टि और नीतियों के आधार पर सूचित विकल्प चुनते हैं।
आखिरकार, मुफ्त उपहारों को विनियमित करने और लोकतांत्रिक सिद्धांतों को बनाए रखने के बीच सही संतुलन बनाना एक जटिल चुनौती है। यह सुनिश्चित करने के लिए कानूनी, संवैधानिक और सामाजिक कारकों पर सावधानीपूर्वक विचार करने की आवश्यकता है कि कोई भी उपाय प्रभावी, निष्पक्ष और लोकतंत्र के सिद्धांतों के अनुरूप हो।
इस आलेख को श्री अजय व्यास , पूर्व कार्यपालक निदेशक, देना बेंक ने लिखा है।अजय का बेंकिग में महत्वपूर्ण पदों पर 35 साल का अनुभव है एवं वह राष्ट्रीय, सामाजिक समस्याओं पर सटीक, बेबाक बातचीत कर विचार रखते हैं।
सत्ता के लिए राष्ट्र के दीर्धकालिक हित क्या वाकई महत्वहीन होते हैं।वस्तुतः संसदीय राजनीति का चरित्र कुछ ऐसा ही ढलता जा रहा है।इस समय देश में सरकारी कार्मिकों के लिए पुरानी पेंशन का मुद्दा खूब छाया हुआ है।गले तक कर्ज में डूबे पंजाब ने अपने 1.60 लाख कार्मिकों के लिए एनपीएस के स्थान पर पुरानी पेंशन बहाली के लिए कदम बढ़ाएं हैं।राजस्थान,छत्तीसगढ़ ,झारखंड पहले ही एनपीएस को अपने यहां बंद कर 1972 की पेंशन योजना को बहाल करने की घोषणा कर चुके है।मप्र में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वित्त विभाग को इस मामले का परीक्षण करने के लिये कहा है और देर सबेर मप्र भी अगले कुछ महीनों में अपने 4.5 लाख कर्मचारियों को पुरानी पेंशन बहाल करने वाला राज्य होगा।गुजरात में कांग्रेस एवं आप भी अपने वादों में इसे दोहरा रहे हैं।स्पष्ट है पुरानी पेंशन मुद्दा एक चुनावी हथकंडा बन गया है और इसकी बहाली में राजनीतिक दल सत्ता की चाबी अंतर्निहित मान चुके हैं।यह जानते समझते हुए भी कि सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन देना सही मायनों में आर्थिक रूप से एक जोखिमपूर्ण नीति है।यह भी एक तरह से रेवड़ी संस्कृति ही है जिसका सामाजिक न्याय या सुरक्षा के साथ कोई तार्किक औऱ युक्तियुक्त संबंध नही है।2004 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 1972 के पेंशन उपबन्धों के स्थान पर भागीदारी केंद्रित एनपीएस योजना को आकार दिया था जिसे बाद में यूपीए सरकार ने भी परिवर्धित रूप से सशक्त बनाया।बंगाल को छोड़कर सभी राज्यों ने इसे अपने यहां लागू किया और आज भी सभी राज्यों एवं केंद्र के कार्मिकों के लिए यह लागू ही है।पुरानी पेंशन असल में 70 के दशक की सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों की मांग पर निर्भर थी।यह रिटायरमेंट के समय अंतिम वेतन पर 50 फीसदी रकम को पेंशन के रूप में निर्धारित करती थी और कर्मचारी की मृत्यु उपरांत कुछ अंतर के बाद परिवार पेंशन में यानी पत्नी के नाम हो जाती हैं। यह वह दौर था जब वेतन आज की तरह ऊंचे नही थे।औसत आयु भी कम थी।इसमें कर्मचारियों को सीधे कुछ भी नही देना होता था जबकि एनपीएस में उन्हें 10 फीसद का अंशदान देना होता है।सरकार भी अपनी ओर से 14 फीसद जमा कर पेंशन फंड में अपना योगदान देतीं हैं।इस एनपीएस के स्थान पर कर्मचारियों द्वारा पुरानी पेंशन को बहाल करने के लिए संगठित रूप से देश भर में दबाव बनाया जा रहा है।सरकार में बैठे और बाहर सत्ता में आने को आतुर राजनीतिक दलों को लगता है कि कर्मचारियों के थोक वोट बैंक से उनकी किस्मत खुल सकती है, इसलिए वे इस योजना के पुराने एवं पश्चावर्ती दुष्परिणामों से वाकिफ होने के बाबजूद आगे बढ़ रहे है।ऐसा इसलिए क्योंकि हर दल को लगता है कि उसकी घोषणा से उस राज्य में तत्काल आर्थिक संकट खड़ा नही होगा इस स्थिति में 10 से 15 साल लगेंगे। इसलिए सत्ता के लिए 15 साल की कड़वी सच्चाई को आज क्यों स्वीकृति दी जाए।वस्तुतः पुरानी पेंशन उस समाजवादी सोच की उपज रही है जिसने राज्य की अवधारणा में नागरिकों को राज्य पर आश्रित बनाकर रखना चाहा है।आज भारत समाजवाद से आगे वैशविक आर्थिक शक्ति के रूप में अपनी जगह बना रहा है।1991 के बाद से जिन आर्थिक नीतियों पर देश आगे बढ़ा है वहां पुरानी पेंशन जैसे प्रकल्प स्वीकार नही हैं।सवाल यह भी कि 2004में इस पुरानी पेंशन को एनपीएस में बदलने की आवश्यकता ही क्यों पड़ी?असल मे 1990 तक आते आते केंद्र एवं राज्यों की अधिकतर सरकार अपने कार्मिकों को समय पर वेतन एवं पेंशन देनें की स्थिति में नही रह गई थीं।58 साल में रिटायरमेंट की आयु 60 फिर कुछ मामलों में 62 औऱ 65 तक कर दी गई। और यह भी तथ्य है कि आज औसतन आयु के मामले में भी 15 से 20 बर्ष का इजाफा हुआ है।ऐसे में पुरानी पेंशन का बोझ करदाताओं के साथ अन्याय तो है ही साथ ही लोकधन के समावेशी वितरण पर भी सवाल उठाता है।
सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के मुताबिक राज्यों के अपने राजस्व में पेंशन खर्च का हिस्सा तेजी से बढ़ रहा है। यह 1990 तक 8.7 फीसद था और 2020-21 तक बढ़कर करीब 26 फीसद पर आ चुका था। चुनावी लिहाज से अगर राज्य पुरानी पेंशन पर वापिस आते हैं तो परिणाम बहुत खतरनाक हो सकते हैं। यह राज्यों की खस्ताहाल वित्तीय स्थिति को और जर्जर कर देगा।
एसबीआई रिसर्च के आंकड़ों को देखे तो अधिकतर राज्य अपने कुल राजस्व संग्रहन का अधिकांश हिस्सा अपने कार्मिकों के वेतन,भत्ते,पेंशन पर खर्च कर रहे हैं। बिहार 58.9%उत्तराखंड 58.3%झारखंड 31.5%पश्चिम बंगाल 32.8% कुल राजस्व का खर्च सरकारी कार्मिकों पर खर्च हो रहा है।जिस राजस्थान ने एनपीएस को खत्म करने का निर्णय लिया है वहां हालात यह है कि कुल राजस्व के 58 हजार करोड़ में से 48 हजार करोड़ वेतन भत्तों औऱ 19 हजार करोड़ पेंशन पर खर्च करने पड़ते रहे हैं।उत्तरप्रदेश में कुल 6 लाख करोड़ के बजट में से 55 फीसद अपने कर्मचारियों के वेतन,पेंशन पर जा रहा है।पंजाब में पिछले पांच साल में 44 फीसद कर्ज बढ़ा है और वह अपने डेढ़ लाख करोड़ के बजट में से करीब 61 हजार करोड़ कर्मचारियों के वेतन पेंशन पर खर्च कर रही है।मप्र में भी करीब 52फीसद बजट की राशि इसी मद में व्यय की जा रही है।कुल मिलाकर सभी राज्यों की कहानी एक सी ही है।
बुनियादी सवाल यह है कि क्या यह आर्थिक सामाजिक न्याय के नजरिये से उचित है? देश मे करीब 12 करोड़ लोग 60 साल से ऊपर है जिनमें से 90 फीसद को किसी प्रकार की संस्थागत पेंशन नही मिलती है।साढ़े पांच करोड़ विधवा महिलाएं इस देश मे है जो अफ्रीका औऱ तंजानिया की कुल आबादी से अधिक हैं।इनमें से अधिकतर आर्थिक सुरक्षा कवच से बाहर है।दुरूह सरकारी तंत्र की दया पर इनमें से कुछ को ही 300 से 600 रुपए मासिक पेंशन मिलती है।देश मे करीब 3 करोड़ दिव्यांग भी है जिन्हें कमोबेश इसी राशि के समतुल्य पेंशन नसीब होती है।31 मार्च 2022 तक एनपीएस में केंद्र सरकार के 2283671 एवं बंगाल छोड़कर राज्यों के मिलाकर कुल 7860657 सरकारी कर्मचारी पंजीबद्ध हैं।यह संख्या 2004 के बाद सरकारी सेवा में आने वालों की है शेष इस तिथि से पहले के भी कार्यरत है जिन्हें पुरानी पेंशन योजना 1972 के तहत लाभ मिलने हैं।एनपीएस में कारपोरेट के 140492,असंगठित क्षेत के 2291660,स्वावलंबन क्षेत्र के 4186943 लोग भी शामिल हैं।अकेले सरकारी कार्मिकों का 7860657 करोड़ एनपीएस में जमा है।जो जीडीपी का करीब 2.4 फीसद है।चुनावी मुहाने पर खड़े राज्यों को लगता है कि वे इस मामले से चुनाव जीत सकते है लेकिन ताजा उत्तरप्रदेश ,उत्तराखंड के उदाहरण सामने है जहां भाजपा को विपक्षी दल इस वादे के बाबजूद हरा नही पाए हैं।बेहतर होगा केंद्र सरकार की तरह सभी राज्य सरकारे भी इस मांग को राष्ट्रीय हितों के साथ विश्लेषित करने का साहस दिखाएं।ऐसा नही होना चाहिये कि विपक्षी दल भाजपा के विरुद्ध इसे एक चुनावी हथियार के रूप में प्रयुक्त करें।राज्यों को यह भी सोचना होगा कि उन्होंने 2004 में इस एनपीएस को अपनाया ही क्यों था?देश में वास्तविक जरूरतमंदों को सामाजिक आर्थिक सुरक्षा का कवच कैसे उपलब्ध हो इस दिशा में चुनावी नही एक सर्वस्पर्शी औऱ समावेशी दृष्टि की आवश्यकता है।एक बार एनपीएस के दायरे में शामिल कुल कर्मचारियों की संख्या और वास्तविक जरूरतमंदों की संख्या का तुलनात्मक अध्ययन भी किया जाना चाहिए।
क्रांतिदीप अलूने शिव सर्वगत अचल आत्मा है, शिव की आराधना शक्ति की आराधना है। शिव अव्यक्त है, उनके सहस्त्रों रूप है। भारत की विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत को “श्री महाकाल लोक” में जिस सुंदर ढंग से प्रदर्शित किया गया है वह अतुलनीय है। यहाँ शांति और निश्चिन्तता के साकार रूप शिव ही शिव है। “श्री महाकाल लोक” सनातन संस्कृति की पौराणिकता,ऐतिहासिकता और गौरवशाली परम्परा का अद्भुत संगम और अद्वितीय नूतन रूप है। इसे जिस भव्यता और सुंदरता से प्रदर्शित किया गया है, वह चमत्कृत कर देता है।
दरअसल प्राचीन पुण्य सलिला माँ क्षिप्रा के तट पर बसी प्राचीनतम नगरी उज्जैन का “श्री महाकाल लोक” भगवान शिव के भक्तों के स्वागत के लिए तैयार है। महाकाल मंदिर के नवनिर्मित कॉरिडोर को 108 स्तंभ पर बनाया गया है, 910 मीटर का ये पूरा महाकाल मंदिर इन स्तंभों पर टिका होगा। महाकवि कालिदास के महाकाव्य मेघदूत में महाकाल वन की परिकल्पना को जिस सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया था, सैकड़ों वर्षों के बाद उसे साकार रूप दे दिया गया है। दुनिया भर से उज्जैन आने वाले शिव भक्तों के लिए यह शिव महिमा का सम्पूर्ण अनुभव देने का अनूठा और अद्भुत प्रयास है।
“श्री महाकाल लोक” आधुनिक व्यवस्थाओं और संसाधनों से भी परिपूर्ण बनाया गया है। इसकी व्यवस्था इतनी उत्कृष्ट है कि भक्तों और पर्यटकों को अभिभूत कर देगी। मंदिरों के साथ ही पूजा सामग्री और हार-फूल की दुकानों को भी विशिष्ट तरीके से लाल पत्थर से बनाया गया है,जिन पर सुंदर नक्काशी की गई है। “श्री महाकाल लोक” के निर्माण से भगवान शिव की जिन कथाओं का महाभारत, वेदों तथा स्कंद पुराण के अवंती खंड में उल्लेख है, उनका जीवंत अनुभव शिव भक्त धर्मनगरी उज्जैन में कर पाएंगे। महाकाल ज्योतिर्लिंग एक मात्र ज्योतिर्लिंग है जो दक्षिणमुखी है। सनातन धर्म में महाकाल के दर्शन जीवन का एक महत्वपूर्ण और आवश्यक भाग माना जाता है, जिससे शांति मिलती है। इसलिए लाखों भक्त नित्य इस देव स्थान पर आते हैं। “श्री महाकाल लोक” के जरिए शिव के सभी स्वरूप एक स्थान पर लाना मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार का ऐसा दुर्लभ कार्य है जिसकी और कोई मिसाल नहीं हो सकती।
शिव मंगल, शुभ और सौभाग्यसूचक देव है, वे सदाशिव है, जो ब्रह्मा से सृष्टि रचवाते है, विष्णु से उसका पालन करवाते है तथा रूद्र से उसका नाश करवाते है। “श्री महाकाल लोक” में शिव, शम्भू, शशिशेखर के सहस्त्रों रूप और उनकी महिमा को सुंदर ढंग से उकेरा गया है। शिवलिंग सार्वभौमिक रूप से सृजन का प्रतीक है और “श्री महाकाल लोक” भारतीय सांस्कृतिक विरासत को साक्षात् प्रतिबिम्बित कर रहा है। यहाँ शिव का मृत्युंजय रूप भी है, जिसकी उपासना से मृत्यु को भी मात दी जा सकती है। यहाँ महादेव भी है जिसकी उपासना से हर ग्रह नियंत्रित रहता है।
मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान स्वयं शिव भक्त है, वे सावन माह की शाही सवारी में कई वर्षों से शामिल होते रहे है। उनके कार्यकाल में वर्ष 2016 में उज्जैन में ऐतिहासिक सिंहस्थ सम्पन्न हुआ था। व्यवस्थाओं और संसाधनों की दृष्टि से इसे भारत का अब तक का सबसे सफलतम धार्मिक आयोजन माना जाता है। वे उज्जैन को धार्मिक पर्यटन नगरी के रूप में उभारने को लेकर प्रतिबद्ध रहे और इसी के दृष्टिगत सिंहस्थ के ठीक बाद वर्ष 2017 में “श्री महाकाल लोक” की योजना बनी। यह करोड़ों भारतीयों का सौभाग्य है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी भी शिव भक्त है और उनके नेतृत्व में देश भर में आध्यात्मिक और धार्मिक स्थानों का निरंतर कायाकल्प हो रहा है। इस प्रकार प्रधानमंत्री की दूरदर्शिता तथा मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की कार्यकुशलता से ही “श्री महाकाल लोक” का सपना साकार हो सका है।
हम सभी जानते हैं कि महाकाल दर्शन का बड़ा धार्मिक महत्व है। इसे मोक्ष प्रदान करने वाला स्थल माना जाता है। स्कंदपुराण के अनुसार इसे मंगल ग्रह की उत्पत्ति का स्थान माना जाता है। उज्जैन का इतिहास अनादि काल से माना जाता है और राजनीतिक, आध्यात्मिक और साहित्यिक दृष्टि से भी इसे उत्कृष्ट स्थान माना जाता है। भारत की पौराणिक और धार्मिक महत्व की सात प्रसिद्ध पुरियों या नगरियों में उज्जैन प्रमुख स्थान रखता है बल्कि यहाँ साक्षात दैवीय शक्तियों का आज भी वास है। उज्जयिनी को विशाला, प्रतिकल्पा, कुमुदवती, स्वर्णश्रंगा और अमरावती के नाम से भी जाना जाता है तथा यहाँ स्थित महाकालेश्वर मंदिर भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। पुराणों, महाभारत और कालिदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में इस मंदिर का मनोहर वर्णन मिलता है।
उज्जैन में “श्री महाकाल लोक” के निर्माण का फायदा न केवल शिव भक्तों को मिलेगा बल्कि रोजगार और पर्यटन की दृष्टि से भी यह फलदायी होगा। “श्री महाकाल लोक” में लाखों लोग एक साथ भ्रमण कर सकते हैं और रुकने की दृष्टि से भी इसे सर्व सुविधायुक्त बनाया गया है। अब शिव भक्त यहाँ महाकाल के दर्शन के लिए आएंगे भी और आराम से वे रुक भी सकेंगे। ऐसे में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। उज्जैन के पास मंदसौर का प्रसिद्ध पशुपतिनाथ का मंदिर, मांडू और ओंकारेश्वर भी है। अत: मध्य प्रदेश में मालवा का यह सम्पूर्ण क्षेत्र धार्मिक कॉरिडोर के रूप में पहचान बनाने में निश्चित ही सफल होगा। मालवा के क्षेत्र को शांत और मौसम के लिहाज से उत्कृष्ट माना जाता है, अब “श्री महाकाल लोक” की लोकप्रियता और आकर्षण से इस क्षेत्र में नये-नये उद्योग भी बढ़ेंगे। बहरहाल उज्जैन में नवनिर्मित “श्री महाकाल लोक” भारत के धार्मिक और आध्यात्मिक स्थानों के लिए उत्कृष्ट उदाहरण बनने जा रहा है। सांस्कृतिक विरासत,रोजगार और पर्यटन के अदभुत केंद्र के रूप में दुनिया भर में अपना विशिष्ट स्थान बनाने में यह सफल होगा, इसकी स्वर्णिम संभावनाएं है।
देश में लागू किशोर न्याय अधिनियम कहता है कि एक बालक 18 साल की आयु पूरा करने पर बालिग यानी वयस्क माना जायेगा।मताधिकार कानून भी यही परिभाषा देता है लेकिन उप्र के सहारनपुर स्थित देवबंद इस्लामी अध्ययन केंद्र कहता है कि 15 साल के बालक या बालिका को बालिग माना जाना चाहिये।हेग घोषणापत्र से बंधे भारत में बाल सरंक्षण और पुनर्वास के लिए किशोर न्याय अधिनियम को संसद ने पारित किया है लिहाजा इसके सभी उपबन्ध सभी नागरिकों पर लागू है।दत्तकग्रहण यानी बच्चों को गोद लेनें के लिए देश में एक विहित प्रक्रिया संस्थित है जो यह सुनिश्चित करती है कि गोद लिए जाने वाले हर बच्चे को अपने नए परिवार में वे सभी अधिकार हांसिल होगें जो उसे जैविक मातापिता से मिलते है यानी उत्तराधिकार से लेकर सम्पति तक।देवबंद की तालीमी दुनियां एक अलग फतवा जारी कर इस कानून को पलट रही है और यह निर्देश देती है कि गोद लिए गए किसी भी बालक को जैविक संतान की तरह किसी प्रकार के अधिकार नही मिल सकते है।यही नही यह फतवा कहता है कि ऐसा बालक परिवार के अन्य बच्चों के साथ 15 बर्ष की आयु के बाद कोई सुमेलन नही रखेगा।मसलन अगर किसी मुस्लिम दम्पति ने अपने दो पुत्रों के बाद किसी बेटी को विधिक प्रक्रिया के अनुरूप गोद लिया है तो वह बेटी अपने परिवार में पहले से मौजूद दो भाइयों के साथ बहन के रिश्ते में नही रह सकती है।यहां तक कि ऐसे बच्चे के साथ उसकी मां को भी पर्दा करना पड़ेगा। हाल ही में देवबंद उलूम के इन फतवों के विरुद्ध एक लिखित शिकायत राष्ट्रीय बाल सरंक्षण आयोग को प्राप्त हुई जिसकी जांच के बाद आयोग के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगों ने एक पत्र उतरप्रदेश के मुख्य सचिव को भेजा है।इस पत्र में देवबंद के उन दस फतवों का उल्लेख है जो किशोर न्याय अधिनियम समेत भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14,15,21 के अलावा आईटी एक्ट की धारा 69 के खुले उल्लंघन को रेखांकित करते हैं।आयोग के अध्यक्ष श्री कानूनगो इन फतवों को विधि के शासन के विरुद्ध भी निरूपित करते है।रोचक तथ्य यह है कि एक फतवा बालिकाओं की शिक्षा ऐसे स्कूलों में कराने को प्रतिबंधित करने की बात करता है जहां कक्षा 9 के बाद पढ़ाने का कार्य पुरुष शिक्षकों के द्वारा कराया जाता है।मुस्लिम बेटियों को सहशिक्षा देनें वाले स्कूलों में दाखिले को देवबंद के फतवे हराम घोषित कर रहे है। देश में लागू शिक्षा का अधिकार कानून बच्चों के शारीरिक दंड को निषिद्ध करता है लेकिन देवबंद के फतवे में इसे शरिया के अनुरूप बताकर उचित निरूपित किया गया है।यानी मदरसे में शिक्षक अगर चाहें तो बच्चों के साथ मारपीट कर सकते है। अगर किसी मुस्लिम परिवार की बेटियां किसी केंद्रीय विद्यालय या सहशिक्षा व्यवस्था वाले स्कूल में पढ़ती है तो क्या कक्षा 9 के बाद उन्हें इस स्कूल में पढ़ाया जा सकता है?इस विषय पर जारी देवबंद का फतवा स्पष्ट रूप से कहता है कि गैर इस्लामिक माहौल में जहां उस स्कूल की गणवेश पहनना अनिवार्य हो बेटियों को पढ़ाना हराम है और तत्काल किसी ऐसे स्कूल में उनका दाखिला कराया जाए जो इस्लामिक हो और शरिया के अनुसार वहाँ पुरुष शिक्षक न हो। देवबंद इस बात को भी प्रतिबंधित करता है कि अगर किसी स्कूल में ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से भी मुस्लिम बच्चों को मंदिर,चर्च या अन्य धार्मिक पूजा स्थलों की सैर कराई जाए।ऐसे ही तमाम फतवों से देवबंद की आधिकारिक बेबसाइट भरी पड़ी है।खासबात यह है कि इन सवालों को उठाने वाले उच्च शिक्षित मुस्लिम है।देवबंद भारत में मुस्लिम दर्शन की बहावी धारा का सबसे प्रभावशाली और व्यापक अध्ययन केंद्र है।इसकी स्थापना बुनियादी रूप से खलीफा की धार्मिक सम्प्रभुता को वैचारिक रुप से मजबूत करने के उद्देश्य से की गई थी।सवाल यह है कि भारत में जिसे स्कॉलरों की संस्था कहा जाता है वहां नागरिकों के लिए संविधान प्रदत्त अधिकारों एवं संसद द्वारा निर्मित कानूनों की अनुपालना के लिए प्रेरित करने के स्थान पर शरियत के अबलंबन की शिक्षा क्यों दी जा रही है।इन फतवों से आखिर किसका भला हो सकता है इस सवाल के जबाब में कोई मुस्लिम स्कॉलर सामने नही आना चाहता है उल्टे बाल सरंक्षण आयोग पर साम्प्रदायिक नजरिये से काम के आरोप लगाए जा रहे है।इस्लामिक स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन ऑफ इंडिया एसआईओ के राष्ट्रीय सचिव फवाज शाहीन ने एक बयान जारी कर इस मामले का बचाव करते हुए कहा है कि ”फतवे, निजी एवं सामाजिक जीवन से जुड़े विभिन्न मुद्दों के संदर्भ में केवल धार्मिक विद्वानों के निजी विचार होते हैं”।यहां बुनियादी सवाल यह है कि जब नागरिकता संशोधन कानून पर देश भर में विरोध के स्वर अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा बुलंद किये जा रहे थे तब संविधान को आगे रखा जा रहा था।नागरिक हितों को संवैधानिक सरंक्षण की दलील दी जा रहीं थी और देवबंद इसी संविधान द्वारा प्रदत्त समता और शिक्षा के अधिकार को छोड़कर शरिया की अनुपालना की वकालत कैसे कर सकता है।कैसे किशोर न्याय कानून से विपरीत गोद लिए जाने वाले बालकों के हकों के विरुद्ध धार्मिक आड़ लेकर क्रूरता और बाल शोषण की सलाह दे सकता है?फतवे अगर कानून नही है तो क्या इस बात की गारंटी है कि कोई भी इन्हें जीवन में अपनाता नही है।जिस व्यापकता के साथ देवबंद की आधिकारिक बेबसाइट पर कुलीनवर्गीय लोग इस विमर्श को आगे बढ़ा रहे है उससे स्पष्ट है कि भारत में संवैधानिक व्यवस्थाओं के प्रति एक बड़ा वर्ग सुविधाजनक अनुज्ञा की मानसिकता से जीना चाहता है।बेहतर हो देवबंद जैसे संस्थान जिनकी पहुँच भारत में करोड़ों मुसलमानों तक इस बात की शिक्षा का प्रसार करे कि देश के कानून ही सर्वोपरि है यह न केवल नागरिकों के हित में है अपितु उन मासूमों के रूप में अल्लाह की इबादत भी है जिसे खुदा का घर कहा गया है।दुनियां के घोषित इस्लामिक राष्ट्रों ने भी नवाचारों एवं नवोन्मेष के बल पर तकनीकी,प्रौधोगिकी औऱ आधुनिकता के सहारे खुद को बदला है लेकिन भारत में इस्लामिक कट्टरतावादी अभी भी करोड़ों बच्चों को आधुनिकता और शिक्षा की रोशनी से दूर रखना चाहते है।हजारों करोड़ के दान से चलने वाले देवबंद जैसे संस्थानों के कर्ताधर्ता खुद तो उन्नत जीवनशैली और संसाधनों के उपयोग में आगे है लेकिन करोड़ों बेटियों को शरीयत के नाम पर आगे बढ़ने से रोककर देश और कौम दोनों का नुकसान कर रहे है। (सदस्य किशोर न्याय बोर्ड मप्र )
विनीत नारायण देश भर में पुलिस कमिश्नर प्रणाली को अपराध नियंत्रण की दवाई समझा जा रहा है जबकि हकीकत में जिन शहरों में पुलिस कमिश्नर प्रणाली को लागू किया गया है वहां पुलिस ने अपराध की पहचान करने का तो काम किया है लेकिन अपराध को नियंत्रित करने में पुलिस का तंत्र बुरी तरह असफल रहा है। देश में पुलिस प्रणाली, पुलिस अधिनियम 1861 पर आधारित है। आज भी ज्यादातर शहरों में पुलिस प्रणाली इसी अधिनियम से चलती है। लेकिन कुछ शहर पहले उत्तर प्रदेश में लखनऊ और नोयडा में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू की गई थी।दावा यह किया गया था कि इसमें अपराध को रोकने और कानून व्यवस्था सुधारने में लाभ होगा,पर असल में हुआ क्या। पुलिस व्यवस्था में पुलिस कमिश्नर सर्वोच्च पद होता है। वैसे ये व्यवस्था अंग्रेजों के जमाने की है जो तब कोलकाता, मुंबई और चेन्नई में ही हुआ करती थी। जिसे धीरे धीरे और राज्यों में लाया गया। भारतीय पुलिस अधिनियम 1861 के भाग (4) के तहत हर जिलाधिकारी के पास पुलिस पर नियंत्रण रखने के कुछ अधिनियम होते हैं। साथ ही, दंड प्रक्रिया संहिता(सीआरपीसी) एक्जुकेटिव मैजिस्ट्रेट को कानून और व्यवस्था को विनियमित करने के लिए कुछ शक्तियां भी प्रदान करता है। साधारण शब्दों में कहा जाए तो पुलिस अधिकारी कोई भी फैसला लेने के लिए स्वतंत्र नहीं है। वह आकस्मिक परिस्थितियों में डीएम या मंडल कमिश्नर या फिर शासन के आदेश के तहत ही कार्य करते हैं। परंतु पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू हो जाने से जिलाधिकारी और एग्जीक्यूटिव मैजिस्ट्रेट के अधिकार पुलिस अधिकारियों को ही मिल जाते हैं। जिससे वह किसी भी परिस्थिति में निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र रहता है। बड़े शहरों में अक्सर आपराधिक गतिविधियों की दर भी उच्च होती है। ज्यादातर आपातकालीन परिस्थितियों में लोग उग्र हो जाते हैं। क्योंकि पुलिस के पास तत्काल निर्णय लेने के अधिकार नहीं होते। कमिश्नर प्रणाली में पुलिस प्रतिबंधात्मक कार्रवाई के लिए खुद ही मैजिस्ट्रेट की भूमिका निभाती है। इस सिस्टम में पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी के पास सीआरपीसी के तहत कई अधिकार आ जाते हैं और वह कोई भी फैसला लेने के लिए स्वतंत्र होता है। साथ ही साथ कमिश्नर सिस्टम लागू होने से पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही भी बढ़ जाती है।हर दिन के अंत में पुलिस कमिश्नर, जिला पुलिस अधीक्षक, पुलिस महानिदेशक को अपने कार्यों की रिपोर्ट अपर मुख्य सचिव (गृह मंत्रालय) को देनी होती है। इसके बाद ये रिपोर्ट मुख्य सचिव को दी जाती है। पुलिस आयुक्त शहर में उपलब्ध स्टाफ का उपयोग अपराधों को सुलझाने, कानून और व्यवस्था को बनाए रखने, अपराधियों और असामाजिक लोगों की गिरफ्तारी, ट्रेफिक सुरक्षा आदि के लिए करता है। साथ ही साथ पुलिस कमिश्नर सिस्टम से त्वरित पुलिस प्रतिक्रिया, पुलिस जांच की उच्च गुणवत्ता सार्वजनिक शिकायतों के निवारण की उच्च संवेदनशीलता, प्रौद्योगिकी का अधिक से अधिक उपयोग आदि भी बढ़ जाता है। उत्तर प्रदेश में नागरिकता कानून के खिलाफ प्रदर्शन और उससे भड़की हिंसा के समय ये देखा गया था कि कई जिलों में एसएसपी व डीएम के बीच तालमेल नहीं था। इसीलिए भीड़ पर काबू पाने में वहां की पुलिस नाकामयाब रही। इसके बाद ही सुश्री मायावती के शासन के दौरान 2009 से लंबित पड़े इस प्रस्ताव को गंभीरता से लेते हुए योगी सरकार ने पुलिस कमिश्नर व्यवस्था को लागू करने का विचार बनाया। सवाल यह आता है कि इस व्यवस्था से क्या वास्तव में अपराध कम हुआ। जानकारों की मानें तो कुछ हद तक अपराध रोकने में ये व्यवस्था ठीक है जैसे दंगों के समय लाठीचार्ज करना हो तो मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारी को डीएम से अनुमति नहीं लेनी पड़ेगी। इसके साथ ही कुछ अन्य धाराओं के तहत जैसे धारा 144 लगाने, कर्फ्यु लगाने, 151 में गिरफ्तार करने, 107।16 में चालान करने जैसे कई अधिकार भी सीधे पुलिस को मिल जाते हैं। प्रायः देखा जाता है कि यदि किसी मुजरिम को गिरफ्तार किया जाता है तो साधारण पुलिस व्यवस्था में उसे 24 घंटों के भीतर डीएम के समक्ष पेश करना अनिवार्य होता है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद डीएम के निर्णय पर ही मुजरिम दोषी है या नहीं ये तय होता है। लेकिन कमिश्नर व्यवस्था में पुलिस के आला अधिकारी ही ये तय कर लेते हैं कि मुजरिम को जेल भेजा जाए या नहीं। चौंकाने वाली बात ये है कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े के अनुसार जिन जिन शहरों में ये व्यवस्था लागू हुई है वहां प्रतिलाख व्यक्ति अपराध की दर में कोई कमी नहीं आई है। मिसाल के तौर पर जयपुर में 2011 में जब ये व्यवस्था लागू हुई उसके बाद से अपराध की दर में 50 प्रतिशत की दर तक बढ़ोत्तरी हुई है। 2009 के बाद से लुधियाना में यही आंकड़ा 30 प्रतिशत है। फरीदाबाद में 2010 के बाद से ये आंकड़ा 40 प्रतिशत से अधिक है। गुवाघाटी में 2015 में जब कमिश्नर व्यवस्था लागू हुई तो वहीं भी 50 प्रतिशत तक अपराध दर में वृद्धि हुई है। ब्यूरो के आंकड़ों से ये पता चलता है कि कमिश्नर व्यवस्था में पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए लोगों में से दोष सिद्धि दर में भी भारी गिरावट आई है। पुणे में 14.14 प्रतिशत, चेन्नई में 7.97 प्रतिशत, मुंबई में 16.36 प्रतिशत, दिल्ली में 17.20 प्रतिशत,बेंगलुरु में 17.32 वहीं इंदौर में जहां सामान्य पुलिस व्यवस्था है वहां इसकी दर 40.13 प्रतिशत है। यानि पुलिस कमिश्नर व्यवस्था में पुलिस द्वारा नाहक गिरफ्तार किए गए लोगों की संख्या दोषियों से काफी अधिक है। जिस तरह आनन फानन में सरकार ने बिना गंभीर विचार किए कृषि कानूनों को लागू करने के बाद उन्हें वापस लिया, उसी तरह देश के अन्य शहरों में पुलिस व्यवस्था में बदलाव लाने से पहले,सरकार को इस विषय में जानकार लोगों के सहयोग से इस विषय पर गंभीर चर्चा कर ही निर्णय लेना चाहिए। गृहमंत्री अमित शाह को विशेषज्ञों की एक टीम गठित कर इस बात पर अवश्य गौर करना चाहिए कि आंकड़ों को अनुसार पुलिस कमिश्नर व्यवस्था से अपराध घटे नहीं बल्कि बढ़े हैं और निर्दोष नागरिकों को नाहक प्रताड़ित किया गया है।
अगर इतिहासकार अलबरूनी की बात स्वीकारें तो श्रेष्ठतम सम्पादक हैं गणेश। इसे वेदव्यास ने भी प्रमाणित किया था। वर्तनी, लेखनी, प्रवाह और त्रुटिहीनता की कसौटी पर गणेश खरे उतरते है। इस पूरी गणेशकथा में हम श्रमजीवी पत्रकारों के लिये रूचिकर वाकया यह है कि गणेश सर्वप्रथम लेखक और उपसम्पादक हैं। यूं तो देवर्षि नारद को प्रथम घुमन्तू संवाददाता और संजय को सर्वप्रथम टीवी एंकर कहा जा सकता है, मगर गणेश का रिपोर्ताज में योगदान अनूठा है। मध्येशियाई इतिहासकार, गणितज्ञ, चिन्तक और लेखक अल बरूनी ने एक हजार वर्ष पूर्व लिखा था कि वेद व्यास ने ब्रह्मा से आग्रह किया था कि किसी को तलाशे जो उनसे महाभारत का इमला ले सके। ब्रह्मा ने हाथीमुखवाले गणेश को नियुक्त किया। वेदव्यास की शर्त यह थी कि गणेश लिखते वक्त रुकेंगे नहीं और वही लिखेंगेगे जो वे समझ पायेंगे। इससे गणेश सोचते हुए, समझते हुये लिखते रहे और व्यास भी बीच-बीच में विश्राम करते रहे। (एडवार्ड सी.सचान, अलबरूनीज इंडिया, मुद्रक एस. चान्द, दिल्ली, 1964, भाग एक, पृष्ट 134)।अब एक आधुनिक पहलू पर गौर करें। एडोल्फ हिटलर ने अपनी नेशनल सोशलिस्ट (नाजी) पार्टी का निशान (1930) स्वस्तिक बनाया था, तो प्राच्य के मनीषियों का व्यग्र होना सहज था। ओमकार स्वरूप गणेश के इस सौर प्रतीकवाले शुभ संकेत को उसने वीभत्स बना डाला था। हिटलर ने अपने अमांगलिक और अमानुषिक कार्ययोजना में इस वैदिक प्रतीक का जुगुप्सित प्रयोग किया था। स्वस्तिक को गणेश पुराण के अनुसार गजानन का स्वरूप तथा हर कार्यों में मांगलिक स्थापना हेतु शुरूआत को मानते हैं। श्रीगणेशाय नमः के उच्चारण के पूर्व स्वस्तिक चिन्ह बनाकर ”स्वस्ति न इन्द्रो बुद्धश्रवाः“ स्वस्तिवचन करने का विधान है। अपने स्वराष्ट्रवासी प्राच्यशास्त्री मेक्सम्यूलर को पढ़कर इस जर्मन नाजी तानाशाह ने अपने पैशाचिक अभीष्ट को हासिल करने हेतु स्वस्तिक को अपनाया था। लेकिन हिटलर का वही हश्र हुआ जो सूर्यपुत्र अहंतासुर का हुआ जिसका भगवान गजानन ने धूम्रवर्ण के अवतार में जगद् कल्याणार्थ वध किया। ब्रह्मा द्वारा कर्माध्यक्ष पद पाकर सूर्य को अहंकार हो गया था और तभी उनके नथुनों के वायु से अहंतासुर का जन्म हुआ था। वह भी अभिमानी होकर समस्त ब्रह्माण्ड का शासक, अमर तथा अजेय होना चाहता था। दैत्यगुरू शुक्राचार्य से गणेश मंत्र की दीक्षा प्राप्त कर अहन्तासुर राक्षस ने पार्वतीपुत्र की घोर उपासना की। भोले बाबा के आत्मज ने इस दैत्य को तथास्तु कहकर वर दे डाला। फिर वही हुआ जो हर दैत्य करता आया है। वही जो हिटलर ने गत सदी में किया था। पापाचार, नरसंहार, तबाही आदि। लाचार, निरीह देवताओं तथा मानवों ने गणेश की उपासना की। अपने भक्तों की रक्षा में गजानन ने उग्रपाश फेंक कर सभी असुरों का वध कर दिया। घमण्ड तजकर अहंतासुर गणेश का शरणागत हो गया। उसे आदेश मिला कि जहां गणेश की आराधना न होती हो वहीं जा कर वास करे।राजनीतिक रूप में गणेश का राष्ट्रवादी तथा जनकल्याणकारी उपयोग स्वाधीनता सेनानी, महाराष्ट्र केसरी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने हिटलर के आविर्भाव के पैंतीस वर्ष पूर्व पुणे में सर्वप्रथम किया था। अंग्रेजी साम्राज्यवादियों ने अपने भारतीय उपनिवेश में हर प्रकार की सार्वजनिक क्रियाशीलता पर प्रतिबंध लगा दिया था। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857) कुचल दिया गया था। शासकों ने भारतीयों को जाति तथा मजहब के आधार पर विभाजित कर दिया था। महाराष्ट्र के पेशवा शासक 1893 के पूर्व तक गणेश चतुर्थी भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाते थे। लोकमान्य तिलक ने इस धार्मिक उत्सव के जनवादी पहलू को पहचाना। उसे जनान्दोलन बनाया। तभी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना मुम्बई में हुये आठ वर्ष हो चुके थे। मगर सार्वजनिक आयोजन पर रोक बरकरार थी। हिन्दू चेतना को तिलक ने जगाया और जनपदीय स्तर से उठाकर गणेश चतुर्थी को राष्ट्रीय रूप दिया। चूंकि अन्य ईश्वरों की तुलना में गणेश किसी जाति या वर्ग विशेष के नहीं थे, अतः सर्वजन के इष्ट बन गये। गणेशोत्सव में सभी हिन्दू शरीक हो गये। उन्हीं दिनों तिलक के उग्र संपादकीय (समाचारपत्र मराठा तथा केसरी में) छपते थे जिनसे साम्राज्यवाद-विरोधी भावना को बल मिलता था। उनका सिंहनाद कि ”स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, मैं इसे लेकर रहूंगा“ काफी ख्यात हुआ। गणेश चतुर्थी को तिलक ने जनविरोध का माध्यम बनाया। बौद्धिक चर्चायें, नुक्कड़ नाटक, कविता पाठ, संगीत आदि माध्यम अपना कर गणेश चतुर्थी को मात्र लोकरंजन ही नहीं लोकराज के संघर्ष का मंच भी बनाया गया। स्वतंत्रता के बाद तो गणेश चतुर्थी को राष्ट्रीय पर्व की मान्यता मिल गई।गणेश के गृहस्थ होने की बात विवादित है। दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में, उन्हें ब्रह्मचारी मानते हैं। उत्तर भारत में प्रसंग भिन्न है। यह जानीमानी घटना है कि दोनों भ्राताओं (कार्तिकेय) में प्रतिस्पर्धा हुई कि पहले किसका पाणिग्रहण हो। दुनिया की परिक्रमा की शर्त रखी थी माता-पिता ने तो गणेश ने शार्टकट का रास्ता अपनाया और शिवपार्वती की परिक्रमा कर अपना दावा पुख्ता कर लिया। नाराज होकर देवताओं के सेनापति कार्तिकेय दक्षिण भारत में बस गये और अविवाहित रहे। गणेश की दो भार्या थीः ऋद्धि और सिद्धि तथा दो सन्ताने हुई क्षेम और लाभ जिसकी वणिकवर्ग और श्रेष्ठिजन पूजा करते हैं।यूं शिव ने देवताओं के शुभकार्य हेतु गणेश की सृष्टि की मगर अन्य गमनीय विभूतियां और विलक्षणतायें भी गणेश में हैं। शिव के रौद्ररूप की धार कम करना हो तो गणेशोपासना कीजिए। निर्विघ्नता, कर्मनाश और धर्मप्रवर्तन के अलावा गणेश ललित कलाओं और संस्कृति के संरक्षक हैं। एक बार वे मृदंग बजा रहे थे कुपित शिव ने उसे त्रिशूल से तोड़ दिया। तबला की उत्पत्ति तभी से हुई। जटिलता को सुगम बनाने में उन्हें महारत है जैसे भारीभरकम हाथीवाला शरीर नन्हे चूहे पर टिके, यह भौतिक संतुलन मुमकिन कर दिखाया।चूहे का ही प्रसंग है। एक बार सांप दिख गया था तो चूहा भागा और गड़बडा कर गणेश जी घराशायी हो गये। इस नजारे पर चन्द्रमा हंस पड़े। गणेश ने शाप दे दिया कि उसका आकार घटता बढ़ता रहेगा। तभी से चन्द्रमा के लिए बालेन्दु से पूर्णचन्द्र और फिर प्रतिपदा से अमावस तक का दौर चलता है। तो उस महान सम्पादक व लेखक वक्रतुण्ड, एकदन्त, गजवक्त्र, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज, धूम्रवर्ण, भालचन्द्र, विनायक, गणपति, गजानन को उनके जन्मोत्सव पर हमारा सादर नमन।K Vikram RaoMobile :9415000909E-mail: [email protected]
रैगिंग
की भाषा में बोला जाए तो इन
दिनों मुख्यमंत्री कमलनाथ
की कंबल परेड चल रही है। कांग्रेस
के विधायकों ने सरकार की जो
धुलाई की है उससे पार्टी के
बड़े बड़े दिग्गजों की सांसें
भी फूल गईं हैं। भाजपा तो अंधे
के हाथों बटेर लग जाने से
प्रसन्न है। कमलनाथ सरकार
जितने दिनों तक इस बगावत को
काबू में नहीं कर पाएगी उतने
दिनों तक ये धुलाई जारी रहेगी।
मुख्यमंत्री कमलनाथ कह रहे
हैं कि हम सदन में पहले भी बहुमत
साबित कर चुके हैं लेकिन अब
ये हालत हो गई है कि कोई भी
ऐरागैरा आकर बहुमत साबित करने
का चैलेंज देने लग जाता है।
दरअसल ये कमलनाथ सरकार की
अलोकप्रियता का उद्घोष है जो
वे स्वयं कर रहे हैं। सलाहकारों
की बात मानकर उन्होंने विधायकों
को कथित तौर पर बंधक बनाए रखने
के मुद्दे पर पुलिस में प्राथमिकी
दर्ज नहीं कराई है। यदि वे ऐसा
कर देते तो साफ उजागर हो जाता
कि उनकी सरकार अल्पमत में आ
गई है। आज दिग्विजय सिंह ने
जिस तरह बैंगलौर जाकर बागी
विधायकों से मिलने के लिए धरना
दिया उसे देखकर कहा जा सकता
है कि बगावत के मैनेजर भाजपा
के रणनीतिकारों की सलाह पर
नहीं चल रहे हैं। दिग्विजय
सिंह को विधायकों से न मिलने
देने का फैसला बड़ा बचकाना
था। यही वजह है कि दिग्विजय
सिंह विधायकों को बंधक बनाए
रखने का शोर मचा रहे हैं। उनका
कहना है कि वे विधायकों को
बंधक बनाए रखने के मुद्दे पर
कर्नाटक हाईकोर्ट जाएंगे।
कमलनाथ सरकार के तमाम रणनीतिकार
और अदालत में पैरवी कर रहे
वकील पुष्पेन्द्र दुबे भी कह
रहे हैं कि विधायकों को बंधक
बनाकर रखा गया है। यदि आज
दिग्विजय सिंह को विधायकों
से मिलने का मौका दे दिया जाता
तो खुद ब खुद साबित हो जाता कि
विधायक बंधक नहीं हैं। कैमरों
के सामने सार्वजनिक मुलाकात
में विधायक हाथ जोड़कर दिग्विजय
सिंह से वे सभी बातें कह सकते
थे जो वे पहले अपने वीडियो
जारी करते वक्त कह चुके हैं।
वे इस मुलाकात के मंच का उपयोग
करके सारी दुनिया को सुना सकते
थे कि वे कमलनाथ सरकार के साथ
नहीं हैं,जाहिर है
कि विधानसभा के मंच से भी ज्यादा
बड़े कैनवास पर कमलनाथ सरकार
की कंबल परेड बेहतरीन तरीके
से की जा सकती थी। ये तो आकलन
हम लोग बाहर बैठकर लगा सकते
हैं कि बगावत के रणनीतिकार
गलती कर रहे हैं लेकिन हमारा
आकलन हमेशा सही नहीं हो सकता।
जिन विधायकों ने ज्योतिरादित्य
सिंधिया के नेतृत्व में बहादुरी
भरा फैसला लिया और सरकार को
नसीहत देने का कदम आगे बढ़ाया
निश्चित रूप वे किसी न किसी
रणनीति पर काम जरूर कर रहे
हैं। सिंधिया समर्थक विधायक
आज भी कह रहे हैं कि महाराज
सिंधिया जो कहेंगे हम वही
करेंगे। वे दरअसल देख चुके
हैं कि जिन आर्थिक सुधारों
से ज्योतिरादित्य प्रदेश का
काया कल्प करना चाहते थे उन्हें
कमलनाथ की पुरातनपंथी सरकार
लागू नहीं कर रही थी। गोस्वामी
तुलसी दास कह गए हैं कि मुखिया
मुख सो चाहिए खानपान को एक
पाले पौसे सकल अंग तुलसी सहित
विवेक। कमलनाथ इस कसौटी पर
फिसड्डी साबित हुए हैं। उन्होंने
प्रदेश के विधायकों, जन
प्रतिनिधियों, पत्रकारों,
नागरिकों से दूरी बनाई
और मनमाने ढंग से बजट खर्च
करने का अभियान चलाया। जनता
को हित वंचित करके अपने सहयोगियों
पर बेइंतहा संसाधन लुटाए और
अपनी स्थिति मजबूत की। उम्र
के असर से उनकी दृष्टि कमजोर
हो गई है। उन्होंने अकेले
छिंदवाड़ा में लगभग तेरह हजार
करोड़ के निर्माण कार्य स्वीकृत
करवा लिए और अन्य विधानसभा
क्षेत्रों को रीता छोड़ दिया।
यही वजह है कि साल भर से चेताने
के बावजूद जब कमलनाथ जी की
आदतें नहीं बदलीं तो उन्होंने
विद्रोह जैसा फैसला किया।
आजादी की लड़ाई में भी जब
अंग्रेजों ने लूट का शोषणवादी
तंत्र चलाया था तब भारत में
विद्रोह की चिंगारी भड़की और
दावानल बनी थी। आज के हिंदुस्तान
में कमलनाथ की कूढ़ मगज सोच
को आखिर कैसे झेला जा सकता था।
जिस इंस्पेक्टर राज को नरसिम्हाराव
की सरकार के कार्यकाल में
डाक्टर मनमोहन सिंह दफन कर
चुके थे उसे कमलनाथ दोबारा
थोपने में जुटे थे। शुद्ध के
लिए युद्ध के नाम पर व्यापारियों
का शोषण और लूट का जो दुष्चक्र
कमलनाथ सरकार ने चलाया उससे
प्रदेश भर में जन आक्रोश भड़क
गया था। तबादलों के माध्यम
से पोस्टिंग का खुला खेल जिस
तरह से साल भर में देखा गया
उसने प्रदेश में अराजकता की
स्थितियां निर्मित कर दीं
हैं। बढ़ते अपराधों ने प्रदेश
की शांति व्यवस्था भंग कर दी
है। इसके बावजूद कमलनाथ दंड
और दमन का दुष्चक्र चलाने में
जुटे हैं। इतनी तगड़ी धुलाई
के बाद भी उनकी भाषा शैली नहीं
बदली है। पिछले दिनों जब उनसे
पूछा गया कि ज्योतिरादित्य
सिंधिया ने कहा है कि कर्मचारियों
और नागरिको से किए वादे पूरे
नहीं हुए तो वे सड़क पर उतर
जाएंगे तो कमलनाथ ने लगभग
दुत्कारते हुए कहा, तो
उतर जाएं। इस तरह की भाषा शैली
और रवैये के बाद भी यदि कांग्रेस
के विधायक चुप थे तो ये उनकी
भलमन साहत थी। भाजपा में तो
इस तरह के बर्ताव को कैडर की
वजह से झेला जा सकता है लेकि
कांग्रेस में जहां लीडरशिप
आधारित संगठन हो वहां इस तरह
के तुर्रमखां को कब तक बर्दाश्त
किया जा सकता था। आज सारा
दारोमदार ज्योतिरादित्य
सिंधिया और उनके समर्थकों के
रुख पर निर्भर कर रहा है। यदि
वे अपने फैसले पर कायम रहते
हैं तो कोई वजह नहीं कि कमलनाथ
सत्ता से अपदस्त कर दिए जाएंगे।
भाजपा के साथ शामिल होकर
ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रदेश
को एक अग्रगामी विकास की दिशा
दे सकते हैं। लेकिन अब तक ऐसा
होता नजर नहीं आ रहा है। कांग्रेस
के भीतर की ये बगावत यदि सफल
हो जाती है तो ज्योतिरादित्य
सिंधिया प्रदेश के कद्दावर
नेता के रूप में उभर जाएंगे।
महल से अदावट रखने वाले भाजपाई
ये नहीं चाहते। जाहिर है कि
प्रदेश की आधुनिक आवश्यकताओं
की कसौटी पर फेल हो चुके शिवराज
सिंह चौहान भी नहीं चाहते कि
भाजपा में कोई उनसे बड़ा लीडर
बनकर उभरे। इसके बाद सत्ता
की हांडी टूटने की आस लगाए
बैठे नरेन्द्र सिंह तोमर,
कैलाश विजयवर्गीय,
नरोत्तम मिश्रा,
भूपेन्द्र सिंह,
गोपाल भार्गव भी नहीं
चाहते कि गोविंद राजपूत और
तुलसी सिलावट जैसे धाकड नेता
उनके सामने चुनौती के रूप में
उभरें। इन हालात में भाजपा
के केन्द्रीय नेतृत्व को
हस्तक्षेप करना पड़ेगा। यदि
भाजपा का अंदरूनी महाभारत थम
जाता है और ज्योतिरादित्य
सिंधिया भाजपा के नेताओं का
साथ पाकर इस बगावत को सफल बना
लेते हैं तो फिर प्रदेश को
अबकी बार भाजपा और कांग्रेस
की संकर सरकार मिलेगी जो प्रदेश
के हितरक्षण के लिए नए कीर्तिमान
स्थापित करेगी। ज्योतिरादित्य
सिंधिया की बुआ वसुंधरा राजे
और यशोधरा राजे सिंधिया संगठन
को किस सीमा तक बांधने में सफल
होती हैं बगावत की सफलता उसी
से आकी जाएगी। कमलनाथ तो इस
बगावत को कुचलने की पूरी तैयारी
कर रहे हैं। फिलहाल उन्हें
सत्ता जाने की संभावनाओं से
डरे हुए कांग्रेस विधायकों
का समर्थन मिल रहा है। सुप्रीम
कोर्ट के हस्तक्षेप से यदि
पलड़ा भाजपा के पक्ष में झुकता
है तो कमलनाथ सरकार का अल्पमत
संकट और भी ज्यादा गहरा हो
जाएगा। देखना होगा कि ये बगावत
सफल होती है या फिर आत्मसमर्पण
की चौखट चूमती है। दोनों ही
स्थितियों में कमलनाथ इस कंबल
परेड से कोई सबक लेंगे इसकी
संभावना फिलहाल तो नहीं दिखती।
भोपाल,17मार्च(प्रेस
सूचना केन्द्र)।मुख्यमंत्री
कमलनाथ की कांग्रेस सरकार
विदाई की बेला में है। उनकी
पार्टी के ही 22 विधायकों
ने अपनी सरकार के खिलाफ बगावत
कर दी है। सरकार का प्रयास है
कि उन विधायकों को डरा धमकाकर
या पुटियाकर अपने खेमे में
वापस लौटा लिया जाए और सरकार
बचा ली जाए। बगावत को कुचलने
के लिए कमलनाथ ने मुख्यसचिव
और डीजीपी बदलकर प्रशासन और
पुलिस के जेबी इस्तेमाल की
तैयारी की है।इस तानाशाही
भरे रवैये के बावजूद कमलनाथ
की विदाई पल प्रतिबल और भी
ज्यादा बलवती होती जा रही है।
जैसे जैसे वे बगावत को कुचलने
का षड़यंत्र रच रहे हैं उसका
प्रतिरोध भी बढ़ता जा रहा है।
सत्ता के इस दुरुपयोग से
उन्होंने कांग्रेस के ही अन्य
विधायकों की सहानुभूति भी खो
दी है। सुप्रीम कोर्ट के नोटिस
के बाद तो कमलनाथ के तमाम प्रयास
नाकाफी साबित हो जाएंगे।
बैंगलौर
में बैठे विधायकों ने बाकायदा
प्रेस वार्ता करके खुद के बंधक
बनाने की बात झूठी साबित कर
दी है। उन्होंने कहा कि हम
अपनी मर्जी से सरकार के खिलाफ
इस्तीफा देकर आए हैं और दुबारा
चुनाव का सामना करने के लिए
भी तैयार हैं। कमलनाथ सरकार
जनहित के कार्यों की उपेक्षा
कर रही थी हम इसलिए सरकार का
विरोध कर रहे हैं। हमारे नेता
ज्योतिरादित्य सिंधिया के
काफिले पर जिस तरह सार्वजनिक
तौर पर हमला किया गया उसे देखते
हुए हमें अपनी सुरक्षा का खतरा
है। सरकार हमें तोड़ने के लिए
विविध हथकंडे अपना रही है।
यदि हमें केन्द्रीय बलों की
सुरक्षा दिलाई जाएगी तो हम
भोपाल वापस आकर सदन के फ्लोर
टेस्ट में भाग लेंगे। मध्यप्रदेश
पुलिस सरकार के दबाव में है
इसलिए हमें उस पर भरोसा नहीं
है।
सरकार
के वित्तमंत्री तरुण भनोट और
जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा
बार बार कह रहे हैं कि विधायकों
को यहां कोई खतरा नहीं है लेकिन
कांग्रेस और कमलनाथ को करीब
से समझने वाले विधायकों को
सरकार के बयानों पर भरोसा नहीं
है। दरअसल कमलनाथ ने डीजीपी
वीके सिंह को हटाकर विवेक
जौहरी को न केवल डीजीपी बना
दिया है बल्कि उन्हें दो साल
की सेवावृद्धि भी दे दी है।
सरकार से उपकृत होने के बाद
विवेक जौहरी ने पुलिस के और
निजी बाऊंसर्स की सेवाएं सरकार
को उपलब्ध कराई हैं। इन टोलियों
में संविदा नियुक्ति वाले
गुंडों को भी शामिल किया गया
है। यही नहीं एक विधायक के
नेतृत्व में गुंडों की एक टोली
भी सक्रिय है जिसका मार्गदर्शन
भोपाल के डीआईजी इरशाद वली
कर रहे हैं।
सरकार
के प्रशासकीय नियंत्रण की
कमान नए प्रशासनिक मुखिया
गोपाल रेड्डी और प्रशासन
अकादमी के डीजी बना दिए गए
पूर्व सीएस सुधीरंजन मोहंती
संभाल रहे हैं। कमलनाथ की जिस
हेकड़ी भरी कार्यशैली की वजह
से आज कांग्रेस की सरकार संकट
में आई है उसके पीछे अफसर शाही
का यही खुला दुरुपयोग प्रमुख
वजह है। बागी विधायकों का दो
टूक कहना है कि मुख्यमंत्री
सचिवालय ने चुने हुए विधायकों
को बाईपास करके अफसरों के
माध्यम से लूट का तंत्र चला
रखा है। उनके पास माफिया से
मुलाकात के लिए तो समय है पर
अपने विधायकों के लिए वक्त
नहीं है।जनहितैषी योजनाएं
बंद कर दी गई हैं या फिर उनका
लाभ आम जनता को नहीं मिल पा
रहा है।
दरअसल
जिस तरह से कमलनाथ की कार्यशैली
को कांग्रेस के ही विधायकों
ने नकार दिया है उससे सरकार
अल्पमत में आ गई है। इस बगावत
को कमलनाथ अपनी ही शैली में
कुचलना चाह रहे हैं जो अब किसी
भी तरह संभव नहीं है।कमलनाथ
की विदाई तय है। यदि वे सत्ता
में बने रहने के लिए गुंडागर्दी
का सहारा लेने की कोशिश करेंगे
तो मध्यप्रदेश में सत्ता
संग्राम का खूनी माहौल बन
जाएगा। इतिहास के आधार पर
कमलनाथ इस बगावत को संविद
सरकार के दौर से तुलना करके
देख रहे हैं जबकि इस बार की
बगावत ज्यादा परिष्कृत है और
केन्द्र में भी एक ऐसी लोकतांत्रिक
सरकार है जो किसी तानाशाही
को छूट नहीं देगी।
भोपाल,14 मार्च,(प्रेस सूचना केन्द्र)। मोदी अमित शाह की जोड़ी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्यसभा में भेजने का फैसला लेकर भारतीय राजनीति के परंपरावादी युग का अंत कर दिया है। इसके साथ ही चंद मुद्दों के इर्द गिर्द चकरघिन्नी बनी राजनीति की इबारतें भी वाशिंग मशीन के ड्रायर में रखे गीले कपड़ों के समान सींलन मुक्त होने लगीं हैं। इस एक अकेले मूव ने न केवल कांग्रेस बल्कि भारतीय जनता पार्टी के भी पिछलग्गू राजनेताओं को हतप्रभ कर दिया है। स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे ने कांग्रेसी राजनीति के शीर्ष दिनों में भी कर्मठ कार्यकर्ताओं की फौज जुटाकर जो संगठन खड़ा किया था वह आज सिफारिशी भाजपाईयों से भर गया है। चौदह सालों के शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में जो भाजपा चमचों की भी़ड़ बनकर रह गई थी वह सिंधिया के आगमन से उत्साहित तो है लेकिन उसमें भी भविष्य को लेकर संशय के स्वर उभर रहे हैं।
लगभग
बीस सालों तक कांग्रेस की
राजनीति को शीर्ष मंच पर करीब
से देखने वाले ज्योतिरादित्य
सिंधिया का राजनीतिक प्रशिक्षण
बहुत लंबा रहा है। बचपन से
राजघराने में जन्म लेने के
बाद आधुनिक राजनीति के पुरोधा
स्वर्गीय माधवराव सिंधिया
की सफल राजनीति को करीब से
देखने वाले ज्योतिरादित्य
को जनसेवा का पाठ अपने खानदान
से मिला है। उनकी दादी स्वर्गीय
विजयराजे सिंधिया ने जनसंघ
से भारतीय जनता पार्टी में
बदले एक नए राजनीतिक दल को
अपने राजघराने की विरासत से
पाला पोसा था। वीर शिवाजी जिस
तरह आधुनिक महाराष्ट्र की
राजनीति की पहचान रहे हैं।
मध्यप्रदेश में यही पहचान आज
भी बालाजी बाजीराव पेशवा
द्वितीय की कर्मठता से है।
परम प्रतापी राजा भोज द्वितीय
के शासन की जो सुगंध मध्यप्रदेश
के स्मृतिपटल पर आज भी अंकित
है उसे चिरस्थायी बनाने का
काम बालाजी बाजीराव पेशवा ने
किया था। पेशवा ने ही ग्वालियर
में सिंधिया वंशजों को सल्तनत
सौंपी थी। इसके बाद सिंधिया
घराने के कई राजाओं ने उस
राजनीति को आगे बढ़ाया।
राजमाता
विजयाराजे सिंधिया इस राजनीतिक
गौरव की मशाल लेकर ही राजनीति
में आईं थीं। उनके ऐश्वर्य
और विरासत से ईर्ष्या करने
वाली श्रीमती इंदिरा गांधी
ने सिंधिया राजघराने को मटियामेट
करने में कोई कसर नहीं छोड़ी
थी। लोकतंत्र और स्वाधीनता
की दुहाई देकर अंग्रेजों की
पिछलग्गू कांग्रेस का नेतृत्व
करते हुए श्रीमती गांधी ने
भारतीय राजनीति के तमाम ठिए
ठिकानों को ध्वस्त करने का
अभियान चलाया था। उनके कुछ
सिपाहसालारों ने जिस तरह की
कहानियां गढ़ीं उस पर अमल करते
श्रीमती इंदिरागांधी ने
सिंधिया सल्तनत को लूटने में
कोई कसर नहीं छोड़ी। एसपी
बनाकर भेजे गए स्वर्गीय
अयोध्यानाथ पाठक को लगातार
सात गैलेन्ट्री अवार्ड इसी
सोच का सबूत हैं। इस दमन चक्र
का ही नतीजा था कि चंबल घाटी
डकैतों के आतंक से थर्राती
रही। श्रीमती विजयाराजे
सिंधिया के निधन के बाद भी
भारतीय जनता पार्टी ने चंबल
में सामाजिक न्याय की बड़ी
लड़ाई लड़ी। उमा भारती के
नेतृत्व में बनी भाजपा की
सरकार तक ये परंपरा जारी रही।
शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व
वाली भाजपा ने डकैती उन्मूलन
के नाम पर खेती को सिंचित करने
का जो अभियान चलाया उससे न
केवल चंबल बल्कि धार झाबुआ
के आदिवासी अंचल में भी अपराधों
का ग्राफ गिरा था।
इस
सबके बावजूद मध्यप्रदेश की
राजनीति में आर्थिक विषयों
के जानकार नेतृत्व की जरूरत
महसूस की जाती रही है। ज्योतिरादित्य
सिंधिया ने अपनी राजनीतिक
पारी शुरु करने से पहले आधुनिक
अर्थशास्त्र की जो तैयारी की
वह अब तक चलती रही राजनीति में
फिट नहीं बैठती है। कांग्रेस
की राजनीति तो इसके लिए बिल्कुल
ही बोगस है। कांग्रेस गरीबी
को संरक्षित करने की जिस राजनीति
के तहत समाज को बांटने की
विचारधारा लेकर चलती है उससे
मध्यप्रदेश कभी गुजरात जैसा
या उससे भी आधुनिक राज्य नहीं
बन सकता है। दिग्विजय सिंह
का बंटाढ़ार शासनकाल रहा हो
या फिर शिवराज सिंह चौहान का
कर्ज लेकर खैरात बांटने वाला
दीर्घ शासनकाल सभी में प्रदेश
की जनता की भरपूर उपेक्षा की
गई। योजनाओं के नाम पर खैरात
बांटकर वोट खरीदने की इस शैली
का अंत कभी न कभी तो होना ही
था। ये पहल कौन करता। कमलनाथ
को उद्योगपति के रूप में
प्रचारित करने वाला वर्ग
राजनीति की इसी पाठशाला से
आता है। बैंकों से कर्ज लेकर
घाटे के उद्योग स्थापित करने
वाली फर्जी उद्योगपतियों की
लाबी इस राजनीति की सूत्रधार
है। इस राजनीति से देश को 5
ट्रिलियन डॉलर
की इकानामी बना पाना किसी भी
तरह संभव नहीं है।
देश
में धनाड्य राजनीति की इस
उड़ान का पायलट कोई आर्थिक
विषयों का जानकार ही हो सकता
है। भाजपा के प्रवक्ता के रूप
में काम करने वाले डायचे बैंक
के पूर्व प्रबंध निदेशक जफर
इस्लाम ने ज्योतिरादित्य
सिंधिया में वे क्षमताएं देखीं
और उन्हें भाजपा की राजनीति
की तरफ मोड़ने का महत्वपूर्ण
कार्य किया। भाजपा को उनकी
दादी राजमाता सिंधिया ने
सिंधिया सल्तनत की बागडोर से
सींचा था। उनकी बुआएं श्रीमती
यशोधरा राजे सिंधिया और राजस्थान
की मुख्यमंत्री रहीं वसुंधरा
राजे सिंधिया ने इस विरासत
को सहेजकर रखा था। यशोधरा जी
जब मध्यप्रदेश की उद्योगमंत्री
थीं तो उन्होंने विश्व भर में
फैले औद्योगिक घरानों को
प्रदेश से जोड़ने का सफल अभियान
चलाया था। शिवराज सिंह चौहान
को संरक्षण देने वाली लाबी
को ये पसंद नहीं था और उन्होंने
इस अभियान को धराशायी कर दिया।
कांग्रेस
हो या भाजपा दोनों में इंदिरागांधी
के बैंकों के राष्ट्रीयकरण
वाले अभियान से लूट करने वाले
दलालों का वर्चस्व रहा है।
इस लाबी को कमलनाथ अनुकूल लगते
हैं लेकिन ज्योतिरादित्य
खटकते हैं। कांग्रेस की सरकार
बनाने में मध्यभारत से लगभग
चौबीस विधायकों का साथ रहा
है। ज्योतिरादित्य सिंधिया
से जुड़े यही विधायक और पूर्व
मंत्री आज कमलनाथ सरकार के
पतन की वजह बन रहे हैं। मध्यप्रदेश
को यदि देश की नई अर्थनीति के
साथ कदमताल करना है तो उसे
कमलनाथ सरकार से मुक्ति पाना
ही होगा। कमलनाथ सरकार के पतन
के बाद जो भी नेतृत्व उभरेगा
उसमें सिंधिया का असर जरूर
रहेगा। ज्योतिरादित्य सिंधिया
को राज्यसभा में भेजने के बाद
भाजपा चाहे नरेन्द्र सिंह
तोमर को प्रदेश की कमान थमाए
या फिर उमा भारती या कैलाश
विजयवर्गीय को ,शिवराज,
नरोत्तम मिश्रा
या बीडी शर्मा कोई भी हो ये
लीडरशिप प्रदेश में मोदी सरकार
की नीतियों को लागू करने में
सफल साबित होगी।
जाहिर
सी बात है कि कर्ज आधारित
अर्थव्यवस्था की राजनीति की
पैरवी करने वाले गमले में उगे
राजनेता प्रदेश की साढ़े सात
करोड़ जनता की अपेक्षाओं को
अब तक पूरा नहीं कर पाए हैं।
कमलनाथ तो छिंदवाड़ा के ही
मुख्यमंत्री बनकर रह गए। उनके
कार्यकाल में सरकारी क्षेत्र
को जिस तरह लूट का अड़्डा बना
दिया गया उससे जनता में भारी
निराशा है। शिवराज सरकार की
सारी कल्याणकारी योजनाओं को
बंद करके कमलनाथ जिस सस्ती
बिजली का ढिंडोरा पीट रहे हैं
वह जनता के लिए मंहगा सौदा है।
शिवराज सिंह चौहान की खैराती
राजनीति की तरह ये भी मीठा जहर
बनकर जनता को लुभा रहा है।
जाहिर है कि ऐसे में आर्थिक
विकास की मूलभूत राजनीति करने
वालों का वर्चस्व बढ़ना इन
ठलुओं और बोगस राजनेताओं को
भला कैसे रुचेगा। वे भले ही
खफा होते रहें लेकिन इतना तो
तय है कि मध्यप्रदेश ने एक नई
राजनीति की दिशा में अपने कदम
बढ़ा लिये हैं। दिग्गी के चमचे
इसे गद्दारी कहें या शिवराज
विभीषण की उपमा दें लेकिन
बदलाव की ये बयार फिलहाल थमने
वाली नहीं है।
सत्ता
संभालने के एक साल पूरा होने
पर मुख्यमंत्री कमलनाथ ने
अपनी डींगें हांकने के लिए
विज्ञापनों का रेला पेल दिया
है। जिस शिवराज सिंह सरकार
को विज्ञापनों की सरकार बताकर
कमलनाथ ने मीडिया पर लांछन
लगाया आज उसी मीडिया की चौखट
पर उनकी सरकार औंधे मुंह गिरी
पड़ी है। करोड़ों के विज्ञापन
कार्पोरेट मीडिया की झोली
में डालकर वे प्रदेश की जनता
के टूटते भरोसे को टिकाए रखना
चाहते हैं। कर्ज माफी और इंदिरा
ज्योति योजना जैसी वाहवाही
लूटने वाले उनके ध्वजवाहक
अभियान ही जनता को उनके वादे
और हकीकत की पहचान कराने के
लिए काफी हैं। तरह तरह की नई
शर्तें कर्जमाफी को छलावा
बता रहीं हैं तो बिजली कंपनियां
अपना घाटा पाटने के लिए जिस
तरह बिजली बिलों की रीडिंग
लंबित करके उपभोक्ताओं से
भारी भरकम बिल वसूल रही है
उससे सरकार की कथनी और करनी
की पोल खुल जाती है। बात बात
में भाजपा सरकार पर खजाना खाली
छोड़कर जाने का आरोप मढ़ने
वाले मुख्यमंत्री कमलनाथ और
उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी
ये समझाने में असफल रहे हैं
कि राज्य की मासिक आय क्यों
घटती जा रही है। यदि उनका
वित्तीय प्रबंधन बहुत अच्छा
है तो साल भर में उन्हें उन्नीस
हजार करोड़ का कर्ज क्यों लेना
पड़ा है। छिंदवाड़ा माडल का
शिगूफा छोड़कर कमलनाथ ने खुद
को उद्योगपति बताने की कारीगरी
तो कर ली लेकिन वे अब तक एक
डिफाल्टर मुख्यमंत्री ही
साबित हुए हैं। प्रदेश के
बरसों पुराने बेशकीमती बांस
जंगलों को मिट्टी मोल बेचने
के लिए उन्होंने आईटीसी को
कारखाना लगाने की छूट तो दे
दी लेकिन इससे प्रदेश की कितनी
संपदा कौड़ियों के मोल बेची
जाएगी ये बताने को वे तैयार
नहीं हैं। छतरपुर के बक्सवाहा
की हीरा खदान सरकार ने अस्सी
हजार करोड़ में बिड़ला को
बेचकर ये बताने का प्रयास किया
है कि वे प्रदेश के लिए आर्थिक
संसाधन जुटाने में बहुत गंभीर
हैं। जबकि हकीकत ये है कि भारत
सरकार अभी अपने बहुमूल्य
खनिजों को बेचने की नौबत नहीं
आने देना चाहती। खनिज मंत्री
प्रदीप जायसवाल कहते हैं कि
केन्द्र से मंजूरियां लेने
की जवाबदारी ठेका लेने वाली
कंपनी की है। उसे हमने दो साल
का वक्त दिया है। हालांकि
केन्द्र के रुख को देखते हुए
ये अनुमतियां मिल पाएंगी
फिलहाल तो संभव नहीं दिखता।
कमलनाथ सरकार ने तबादलों और
पोस्टिंग का जो खुला खेल किया
उसकी वजह से नौकरशाही पूरी
तरह मनमर्जी की मालिक हो गई
है। जिस अफसर ने करोड़ों रुपये
देकर पोस्टिंग हड़पी है वह
राजस्व उगाही आखिर कहां से
करे। उसकी सहूलियत के लिए ही
सरकार ने पहले शुद्ध के लिए
युद्ध और फिर माफिया पर हमले
जैसे लोकप्रियता बटोरने वाले
अभियान चला दिए। शुद्ध के लिए
युद्ध के नाम पर सरकार ने सात
हजार से भी अधिक व्यापारियों
के नमूने लिए। अस्सी से अधिक
व्यापारियों को रासुका में
जेल भेज दिया जबकि उनमें से
अधिकतर की खाद्य सामग्री शुद्ध
पाई गई है। इसके बाद जेल भेजे
गए व्यापारियों को भी सरकार
की कृपा के आधार पर ही छोड़ा
जा रहा है। जो लोग सरकार की
कृपा नहीं खरीद सके हैं वे
बेगुनाह होते हुए भी जेलों
में बंद हैं। उनके कारोबार
बंद हैं और उनसे जुड़े हजारों
कर्मचारी बेरोजगार हो गए हैं।
ये बात सही है कि कांग्रेस ने
लगभग हवा हवाई वादे करके सत्ता
की चाभी छीनी है। किसानों को
गुमराह किया गया आदिवासियों
को बहकाया गया, आम
नागरिकों को शिवराज सरकार की
कमजोरियां दिखाकर बरगलाया
गया और सत्ता तो हासिल कर ली
लेकिन अब इसे बनाए रखना सरकार
के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा
है। ये बात सही है कि शिवराज
सिंह सरकार प्रशासनिक तौर पर
इतनी असफल सरकार थी कि वह अपने
अच्छे कार्यों की पैरवी करने
लायक लोगों को भी तैयार नहीं
कर सकी। भीड़ भंगार के बीच
कर्ज लेकर योजनाओं की टाफिया
बांटते शिवराज सिंह चौहान को
पता ही नहीं था कि उन्होंने
कैसे भाजपा के कर्मठ कार्यकर्ताओं
को संगठन से बेदखल कर दिया है।
उनकी सरकार लगभग जड़ विहीन
थी यही वजह है कि आज जब कमलनाथ
सरकार ने माफिया के नाम पर
उनके चमचों को जूते की नोंक
पर रखना शुरु कर दिया है तब
भाजपा के पास सरकार का मुकाबला
करने के लिए रक्षा पंक्ति तक
नहीं है। पाखंडी अभियानों से
शिवराज की भाजपा ये भ्रम फैलाने
का प्रयास कर रही है कि वो
कमलनाथ सरकार से मुकाबला कर
रही है लेकिन उनके साथ रहे
भ्रष्ट मंत्रियों और चापलूसों
की भीड़ को कमलनाथ बहादुरी
के साथ काबू में कर रहे हैं।
अधिकतर तो सरकार के माफिया
वाले अभियान से ही डरकर अपने
घरों तक सिमट गए हैं।दरअसल
कमलनाथ जिन कारोबारियों को
माफिया का नाम देकर वसूलियां
कर रहे हैं वे सरकारी तंत्र
के ही संरक्षण में तो फले फूले
हैं। असली माफिया तो टैक्स
वसूली करने वाले भ्रष्ट अफसरों
का तंत्र है। कमलनाथ जी उसी
तंत्र से चुनावी चंदा वसूलकर
माफिया के विरुद्ध संग्राम
का ऐलान कर रहे हैं जो सिर्फ
छलावा ही साबित हो रहा है।
शिवराज सिंह चौहान सरकार भी
योजनाओं के नाम पर कर्ज लेकर
जनता को बांट रही थी और कमोबेश
यही काम कमलनाथ कर रहे हैं।
कमलनाथ सरकार के वित्तमंत्री
तरुण भनोट ने तो अपने बजट में
भारी भरकम वसूली के टारगेट
तय किए थे लेकिन जब मध्यप्रदेश
अपने हिस्से का जीएसटी ही नहीं
वसूल कर पा रहा हो तो वह किस
मुंह से केन्द्र से अपना हिस्सा
मांग सकता है। बेशक केन्द्र
ने देर सबेर सभी राज्यों को
जीएसटी की भरपाई राशि दे दी
है लेकिन जब तक कमलनाथ सरकार
बेईमान सरकारी तंत्र के भरोसे
वसूली के रिकार्ड बनाने का
मुगालता पाले बैठी रहेगी तब
तक उसे असफलता ही हाथ लगेगी।
हंसना और गाल फुलाना एक साथ
नहीं हो सकता। आप अफसरों से
यदि पार्टी फंड वसूल रहे हों
तब आपको ये मुगालता नहीं पालना
चाहिए कि वे ये राज्य का खजाना
भी अपनी जेब से भरेंगे। कांग्रेस
सरकार ने पार्टी फंड वसूलने
की जवाबदारी जब अफसरों को ही
थमा दी है तो फिर राज्य के
संसाधन जुटाने के लिए निश्चित
रूप से वे जनता पर अत्याचार
करेंगे। यही कार्य श्रीमती
इंदिरा गांधी के लगाए आपातकाल
के दौरान हुआ था। तब जमाखोरों,
मिलावटियों और कथित
शोषकों के विरुद्ध मुहिम चलाई
गई थी। नतीजा ये हुआ कि आपातकाल
की आड़ में सरकारी भ्रष्ट
तंत्र ने अत्याचारों की बाढ़
ला दी। नतीजतन श्रीमती गांधी
चुनाव हारीं और देश को आपातकाल
जैसे सिरफिरे फैसले से निजात
मिल सकी थी। आपातकाल का कलंक
आज भी कांग्रेस के सिर पर लगा
है इसके बावजूद कमलनाथ आपातकाल
2 लेकर मैदान में
कूद पड़े हैं। अब तक जो कहानियां
उजागर हो रहीं हैं उनसे सरकार
के झूठ की पोल रोज खुल रही है।
निश्चित रूप से ये कहानियां
मीडिया की सुर्खियां नहीं बन
पा रही हैं लेकिन आखिर कब तक
सरकार मीडिया का मुंह बंद कर
सकती है।रोते बच्चे के मुंह
को हाथ से दबा दिया जाए तो उसके
रोने की आवाज जरूर बंद हो जाती
है लेकिन उसका रोना जारी रहता
है और जैसे ही हाथ हटाया जाता
है उसके रोने की आवाज बुक्का
फाड़कर बाहर आ जाती है। सरकार
विज्ञापनों के मायाजाल के
सहारे आखिर कब तक जनता की घुटन
को दबाकर रख सकती है। राजनैतिक
वसूलियों से केन्द्र की नीतियों
के विरुद्ध झूठे आंदोलन खड़े
करने से जनता का पेट भरने वाला
नहीं है। जनता के बीच आक्रोश
पनप रहा है। अभी यूरिया की
कालाबाजारी ने जिस तरह किसानों
को आक्रोशित कर दिया है उसी
तरह सरकार की जनविरोधी
नीतियों की असलियत भी जल्दी
ही सामने आ जाएगी। अभी भी
वक्त है कांग्रेस के सलाहकार
अपनी सरकार का मार्गदर्शन
करें तो गलती सुधारी जा सकती
है।
देश के
वर्तमान प्रधानमंत्री राष्ट्रीय
स्वयंसेवक संघ के प्रचारक
रहे हैं l प्रचारक
और संचारक लगभग समानार्थी है
l संघ
का प्रत्येक स्वयंसेवक एक
कुशल संचारक होता है l
इसी प्रकार एक
प्रचारक में श्रेष्ठ संचारक
के सारे गुण विद्यमान होते
हैं l प्रधानमंत्री
श्री मोदी टेक्नोसेवी भी हैं
l वे
संचार के परम्परागत,
आधुनिक और अत्याधुनिक
साधनों का खूब इस्तेमाल करते
हैं l एक
अर्थ में वे भारत के वैश्विक
संचारक और प्रचारक प्रतीत
होते हैं l श्री
नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के
संचार कौशल के करोड़ों मुरीद
हैं l इसमें
बड़ी संख्या संघ के स्वयंसेवकों
की भी है l श्री
मोदी की संचार साधना में आभासी
और वास्तविक संचार का संतुलन
कमाल का है l यह
आदर्श और अनुसरण योग्य है l
लेकिन यह आधा सच है
l इसके
आगे की बात यह है कि संघ में
संचार प्रणाली,
प्रकिया,
संचार माध्यमों
और उपकरणों को लेकर अंतर्द्वन्द्व
और कशमकश की स्थिति है l
संघ के अनेक अधिकारी,
वरिष्ठ कार्यकर्ता
और स्वयंसेवक हैं जिनकी आभासी
सक्रियता वास्तविक गतिशीलता
की तुलना में नगण्य है l
हाल ही में संघ के
उच्च अधिकारियों का ट्विटर
खाता खुला, लेकिन
उसमें अंतरण न के बराबर
है l
संचार
पुरानी अवधारणा है l
समाज और संघ अपेक्षाकृत
नई अवधारणा है l
संघ अर्थात राष्ट्रीय
स्वयंसेवक संघ l
यह एक सामाजिक-सांस्कृतिक
संगठन है l नित्य
गतिशील शाखा के माध्यम से संघ
सामाजिक परिवर्तन और पुनर्रचना
के लिए प्रयासरत है l
सामान्य तौर पर कहा
जा सकता है कि समाज में मत-निर्माण,
मत परिवर्तन,
विचार परिमार्जन,
लोकमत परिष्कार
और व्यवहार परिवर्तन ही संघ
का मुख्य कार्य है l
संघ का यह प्रयास
लोगों के साथ निरंतर संपर्क
और संवाद पर आधारित है l
इसके सम्पूर्ण
प्रयासों के केंद्र में
सुनियोजित, सुसंगत
और सम्यक संचार व सम्प्रेषण
ही है l संघ
के योजनाकार और विचारक यह
भली-भांति
जानते हैं कि जैसे मनुष्य के
लिए हवा और पानी आवश्यक है,
वैसे ही समाज के
लिए संचार जरूरी है l
यही कारण है कि संघ
ने संचार प्रक्रिया,
पद्धति और तकनीक
पर शुरू से ही गंभीर दृष्टि
रखी है l संघ
ने संगठन और समाज की आवश्यकताओं
के अनुसार संचार प्रविधि व
प्रक्रिया में युक्तिसंगत
परिवर्तन भी किये
हैं l
संघ ने शाखा,
स्वयंसेवक,
और प्रचारक को
संचार-तंत्र
के रूप में विकसित किया है l
संघ का पूरा ताना-बाना
ही संचार आधारित है l
संघ के प्रारम्भ
से ही संचार और जनसंचार के
विभिन्न माध्यमों का नियोजित
उपयोग देखने को मिलता है l
स्वयंसेवकों का
व्यापक तंत्र ही संघ की सूचना
प्रौद्योगिकी है l
स्वयंसेवकों के
माध्यम से संघ की विचारधारा
प्रवाहित या संप्रेषित होती
है l स्वयंसेवक
में संपर्क, परिचय
और नियमित संवाद के द्वारा
विचारधारा को विस्तार देने
का गुण विद्यमान होता है l
संचार
विशेषज्ञों के अनुसार,
मनुष्य और समाज की
ही तरह प्रौद्योगिकी की भी
अपनी विचारधारा होती है l
यह विचारधारा भले
ही वैचारिक संगठनों की तरह न
होती हो, लेकिन
प्रौद्योगिकी भी अपनी विचारधारा
को सतत आगे बढाने,
अपने अनुसरणकर्ताओं
की संख्या बढाने,
उनमें उपयोग की आदत
डालने की कोशिश करता है l
इसमें उपयोगर्ताओं
के साथ ही अन्य लोगों को प्रभावित
करने का गुण विद्यमान होता
है l सामान्यत:
विचारधारा की दृष्टि
से स्वयंसेवक और तकनीक अतुलनीय
है l लेकिन
जब हम सामाजिक अंत:क्रिया
के परिप्रेक्ष्य में विचार
करते हैं तो विचारधारा के
प्रचार-प्रसार
में तकनीक और स्वयंसेवक की
तुलना की जा सकती है l
किसी भी संगठन के
कार्यकर्ता में अगर मानवीय
गुणों को पृथक कर दें तो वह
सिर्फ मशीन या प्रौद्योगिकी
के सामान ही होगा l
कमोबेश यही स्थिति
संघ के स्वयंसेवकों में भी
संभावित है l अगर
स्वयंसेवकों में मानवीयता
का गुण न हो तो उनमें और
प्रौद्योगिकी की विचारधारा
में अंतर नगण्य रह जाएगा l
इसलिए कहा जा सकता
है कि संघ के स्वयंसेवकों की
विचारधारा मानवीय है,
किन्तु प्रौद्योगिकी
की विचारधारा अमानवीय l
तो क्या तकनीक का
अनियोजित, अनियंत्रित
उपयोग, उसकी
आदत और उसका अनुसरण व्यक्ति,
समाज और संगठन को
अमानवीय बना सकता है?
अगर ऐसा है तो दुनियाभर
में क्यों प्रौद्योगिकी का
इतना उपयोग हो रहा है?
मानव संगठनों में
इसका दिनों-दिन
बढता उपयोग क्या चिंता का विषय
है?
भारत और
दुनिया में मानव समाज को संगठित
करने के काम में सन 1925
से ही प्रयासरत
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
प्रारम्भिक समय से ही प्रौद्योगिकी
के बारे में अन्य संगठनों से
भिन्न विचार रखता रहा है l
इसीलिये आरएसएस
की स्थापना के शुरुआती दिनों
में मानव संसाधन के अलावा अन्य
सभी संसाधनों से एक निश्चित
दूरी की परम्परा रही l
कार्यक्रमों,
गतिविधियों और
योजनाओं का समाचार देना भी
बहुत आवश्यक नहीं समझा जाता
था l संचार
तकनीक को तो तिरस्कार भाव से
ही देखा जाता था l
डोर टू डोर,
मैन टू मैन और हार्ट
टू हार्ट संचार सिर्फ संयोग
नहीं, बल्कि
संघ की सुदीर्घ नीति रही है
l यद्यपि
संघ के सिद्धांत और दर्शन में
तो यह आज भी विद्यमान है,
लेकिन व्यवहार में
विचलन प्रतीत होता है l
सकारात्मक या
नकारात्मक, किसी
भी प्रकार की सूचना को प्रसारित
करने की संघ की विशिष्ट शैली
रही है l संघ
ने संवाद की भारतीय पद्धति
और प्रारूप (माडल)
को ही अपनाया है l
अनेक अनूकूल-प्रतिकूल
परिस्थितियों में सूचना-सम्प्रेषण
का यह प्रारूप सफलतापूर्वक
उपयोग किया जाता रहा है l
आरएसएस की संगठनात्मक
गठ संरचना सूचना-सम्प्रेषण
की अदभुत व्यवस्था है l
दरअसल यह संघ की
संचार प्रौद्योगिकी ही है,
जिसका लोहा उसके
विरोधी भी मानते हैं l
जैसे डिजिटल संचार
के तहत कंप्यूटर का संजाल
दुनियाभर में एक-दूसरे
से जुड़ा है, ठीक
वैसे ही संघ के स्वयंसेवकों
का संजाल है, जो
अल्प समय में अत्यंत तीव्र
गति से संदेशों को संप्रेषित
करने में सक्षम है l
अनेक विषम परिस्थितियों
और आपदाओं में संघ ने इस सूचना
तंत्र का सकारात्मक उपयोग
किया है l हांलाकि
संघ की इस संचार क्षमता का मधु
लिमये जैसे समाजवादी चिंतक
व वैचारिक विरोधी ‘रियुमर्स
स्प्रेडिंग सोसाइटी’
(आरएसएस)
कह कर आलोचना करते
रहे l
कई शोधकर्ताओं
और विश्लेषकों ने इस तथ्य का
उल्लेख किया है कि कि संघ की
सूचना प्रणाली को वर्तमान या
आधुनिक संचार तकनीक ने काफी
प्रभावित किया है l
गत 20-25
वर्षों में संचार,
विशेषकर संचार
तकनीक में आमूल-चूल
परिवर्तन होता दिखाई देता है
l इसके
कारण संघ की कार्यशैली,
विशेषकर संपर्क
और संवाद शैली में भी परिवर्तन
हुआ है l सूचनाओं
के तीव्र और गहन सम्प्रेषण
के दौर में संघ के स्वयंसेवक
भी पीछे नहीं रहना चाहते l
संघ के विचारक
प्रौद्योगिकी की विचारधारा
और उसके प्रभावों से बखूबी
वाकिफ हैं l वे
भली-भाँति
जानते हैं कि संचार-प्रौद्योगिकी
अब लोगों की जरूरत और बहुत हद
तक मजबूरी बन चुकी है l
संचार तकनीक या
सूचना प्रौद्योगिकी एक आवश्यक
बुराई के रूप में ही सही,
लेकिन स्वीकार्य
हो चुका है l संघ
में बौद्धिक विभाग के साथ ही
बकायदा एक प्रचार विभाग भी
है जो वर्षों से स्वयंसेवकों
में प्रचार के महत्त्व का
प्रतिपादन करता आ रहा है l
यह प्रचार विभाग
स्वयंसेवकों से ज्यादा समाज
में विचार और सूचना सम्प्रेषण
के लिए है l लेकिन
तकनीक का प्रभाव ऐसा बढा है
कि इससे संघ का स्वयं का तंत्र
भी प्रभावित हुए बिना नहीं
रह सका है l दुनियाभर
में विचार फैलाने और प्रतिगामी
व विरोधी विचारों जवाब देने
से लेकर संगठन के आतंरिक
सूचना-प्रवाह
तक में संचार-
प्रौद्योगिकी की
भूमिका अत्यधिक बढ़ गई है l
इसमें कुछ तो तकनीक
के इस्तेमाल का फैशन है,
देखा-देखी
है, लेकिन
बहुत कुछ तकनीकी-उदारीकरण
का प्रभाव भी है l
संघ में अब सिर्फ
बौद्धिक और प्रचार के लिए ही
नहीं, बल्कि
शारीरिक प्रशिक्षण के लिए भी
संचार तकनीक का उपयोग आम चलन
में है l
एक समय था
जब संघ में टेलीफोन से किसी
कार्यक्रम की सूचना देना भी
मजबूरी समझा जाता था,
लेकिन आज ई-मेल,
फेसबुक मैसेंजर,
वाट्सेप,
एसएमएस,
गूगल हैंग-आउट
आदि कम्प्युटर और मोबाईल फोन
आधारित संचार-तकनीक
के द्वारा सूचनाओं का आदान-प्रदान
सामान्य-सी
बात है l संघ
की गठ-संरचना
अब मोबाइल ‘एसएमएस-ग्रुप’
या वाट्सेप व्यवस्था
पर अवलंबित हो चुकी है l
संघ में स्मार्टफोन,
आईपौड,
आईपैड और लैपटाप
से परहेज करने वाले अब कम ही
बचे हैं l डिजिटल
संचार माध्यमों से परहेज करने
वाले इक्के-दुक्के
लोग संघ के भीतर भी आधुनिकता
विरोधी और रूढ़िवादी माने जाने
लगे हैं l संचार-तकनीक
का उपयोग करने वालों का अपना
तर्क है l यद्यपि
आधुनिक संचार तकनीक से परहेज
करने वाले संघ में अल्पसंख्यक
हैं, लेकिन
उनका भी अपना मजबूत तर्क है
l सूचना
सम्प्रेषण के अत्याधुनिक
तकनीक का उपयोग करने वाले इसके
गुण और फायदे बताते हैं,
जबकि पारंपरिक
संचार के समर्थक सूचना-प्रौद्योगिकी
के नकारात्मक पहलुओं को उजागर
कर इससे बचने की सलाह देते हैं
l
कई मुद्दों
की तरह संचार पद्धति को लेकर
संघ के भीतर एक कश्मकश की स्थिति
बरकरार है l इस
मामले में भी संघ ‘चिर
पुरातन और नित्य-नूतन’
दो खेमों में बंटा
है l एक
तर्क ये है कि अगर युवाओं को
जोडना है, दुनिया
में विचारधारा को फैलाना है,
भारत को दुनिया में
सिरमौर बनाना है तो आज के
चाल-चलन
और तौर-तरीके
को स्वीकारना ही होगा l
तकनीक के प्रयोग
में बढ़-चढ़कर
हिस्सा लेना ही होगा l
नई सोच के तरफदार
हर क्षेत्र की तरह संचार क्षेत्र
में भी संघ को सिरमौर होता हुआ
देखना चाहते हैं l
लेकिन संघ के भीतर
एक तबका ऐसा है जो संघ की
विचारधारा के साथ तकनीक की
विचारधारा को भी बखूबी समझता
है l वह
तकनीक की ताकत को जानता है l
वह डरता है कि “संघौ
शक्ति कलियुगे”
कहीं ‘तकनीकौ
शक्ति कलियुगे’
न बन जाए l
उसे डर है कि तकनीक
का आकर्षण परम्परागत व्यवहार
पद्धति पर भारी न पड़ जाए l
तकनीक स्वयंसेवकों
और समाज की आदत न बन जाए l
इस मामले में वे
महात्मा गांधी की सीख को भूलना
नहीं चाहते जिसमें उन्होंने
मानव सभ्यता के तकनीकीकरण का
विरोध किया है l
संघ का यह तबका गांधी
जी की ही तरह प्रकृति आधारित
मानव-सभ्यता
के विकास का समर्थक है l
इसी कारण वह इस
सभ्यता के विधायक गुणतत्वों
– धर्म,
नीति,
मूल्य आदि को बढ़ावा
देना चाहता है l
जबकि चर्च (ईसाइयत)
पोषित वर्तमान
सभ्यता यन्त्र,
तकनीक,
मशीन और प्रौद्योगिकी
आधारित है l यह
विविधता और विकेंद्रीकरण का
विरोधी है l
संचार-तकनीक
की भी यही प्रवृत्ति प्रतीत
होती है l
हालांकि
आज संघ के भीतर और संघ समर्थकों
के द्वारा आधुनिक सूचना तकनीक
का उपयोग करने की होड-सी
दिख रही है l मोबाईल
फोन के अत्याधुनिक एप्लीकेशन,
इंटरनेट अनुसमर्थित
– वेबसाईट,
ब्लॉग,
सोशल नेटवर्क और
इलेक्ट्रानिक जनमाध्यमों
के उपयोग में संघ के स्वयंसेवक
किसी से भी पीछे नहीं हैं l
संघ में तकनीक विरोधी
अब अल्पसंख्यक हो चुके हैं l
तो क्या यह मान लेना
उचित होगा कि संघ के लिए
संचार-तकनीक
के उपयोग का लाभ-ही-लाभ
है? कोई
हानि नहीं, कोई
नुकसान नहीं?
क्या यह मान लिया
जाए कि संघ,
विचारधारा की
दुनियावी लड़ाई में तकनीक के
सहारे सबको पछाड़ ही देगा?
क्या तकनीक की
विचारधारा का संघ की विचारधारा
पर कोई प्रभाव नहीं होगा?
क्या संघ पर तकनीक
बे-असर
है? क्या
यह मान लेना मुनासिब होगा कि
तकनीक के सहारे स्वयंसेवकों
की संघ-साधना
डा. हेडगेवार
के अभीष्ट को बिना किसी हानि
के प्राप्त कर लेगी ?
ये कुछ ऐसे सवाल
हैं जिनके प्रति संघ के
आधुनिकतावादी शायद बेपरवाह
हैं l शायद
उन्हें लगता है,
अभी सोचने का नहीं,
सबसे आगे निकल जाने
करने का वक्त है !
लेकिन संघ के
परम्परावादी चिंतित हैं l
वे कट्टर और रूढ़िवादी
होने के आरोपों से बेपरवाह
संघ में तकनीकी अनुप्रयोगों
पर लगाम लगाने,
इसे नियंत्रित और
नियोजित करने की हर संभव कोशिश
में हैं l
कुछ लोग
भले ही तकनीक को नई सभ्यता का
सिर्फ एक औजार भर मानते हों
l लेकिन
इस औजार का भी गलत उपयोग होना
संभावित है l इस
बात का खतरा तो है ही कि
प्रौद्योगिकी आधारित संचार
प्रक्रिया समाज में अमानवीय-संचार
को बढ़ावा दे दे l
डोर टू डोर,
मैन टू मैन और हार्ट
टू हार्ट की प्रतिस्थापना
कम्प्युटर टू कम्प्युटर,
फोन टू फोन,
मेल-टू-मेल
और व्हाट्सेप टू व्हाट्सेप
के रूप में होने की संभावना
को नकारा नहीं जा सकता l
यह भी संभव है कि
स्वयंसेवकों की मानवीय विचारधारा
को तकनीक की अमानवीय विचारधारा
प्रभावित कर दे l
तब शायद संघ सबसे
तेज, सबसे
आगे और सबसे बड़ा होकर भी निष्फल
रह जाए! संघ
वह न रहे जिसके लिए संघ है l
पवित्र साध्य के
लिए साधन की पवित्रता को कैसे
झुठलाया जा सकता है l
संघ के परम्परावादी
साधन की पवित्रता और मानवीयता
के सवाल पर सजग हैं,
अपना पक्ष लेकर संघ
में खड़े, समाज
में डटे हैं l यह
सही वक्त है कि संघ के आधुनिकतावादी
भी संचार प्रौद्योगिकी की
चकाचौंध में अपनी आँखें न
भींचे – तकनीक
के उपयोग के साथ उसकी विचारधारा
को भी परखें !
चूंकि संघ
समाज के लिए, समाज
में और समाज के द्वारा कार्य
करता है l आज
संघ मानव गतिविधि से जुड़े लगभग
सभी क्षेत्रों में सक्रिय है
l नि:सन्देश
संघ कार्य की धुरी मनुष्य है
l कोई
भी उपकरण, मशीन,
तकनीक या प्रौद्योगिकी
संघ कार्य के लिए साधन मात्र
हो सकता है, लेकिन
लक्षित क्षेत्र तो मनुष्य और
समाज ही है l संघ
इस बात के लिए दृढ निश्चयी है
की मानव सभ्यता को देव सभ्यता
(प्रकृति
उन्मुखी) की
ओर ले जाना है, न
कि दानव सभ्यता (मशीनोन्मुखी)
की ओर l
इसलिए संघ के योजनाकार
संचार और संवाद के लिए भी मानवीय
गुणों से युक्त संचार प्रारूप
को ही श्रेष्ठ और युक्तिसंगत
मानते हैं l इंटरनेट,
कम्प्युटर,
मोबाईल फोन आदि
डिजिटल व तकनीक (उपकरण)
आधारित सूचना तंत्र
संघ को फौरी तौर पर मजबूरी में
या आवश्यक बुराई के रूप में
स्वीकार्य तो हो सकता है,
लेकिन नीतिगत और
दीर्घकालिक रूप से यह त्याज्य
ही होगा l
संघ को यह
बखूबी पता है कि वर्तमान सूचना
तकनीक ने एक अलग दुनिया निर्मित
कर दी है जिसे संचार विशेषज्ञ
‘आभासी दुनिया’ कहते हैं l
इस नव-निर्मित
आभासी दुनिया और वास्तविक
दुनिया में जमीन-आसमान
का अंतर है l जो
लोग जब भी, जितनी
देर तक तकनीक के साथ आभासी
दुनिया में होते हैं तो वे
वास्तविक दुनिया से अलग-थलग
हो जाते हैं l इस
दुनिया में व्यक्ति अकेला
होता है और उसके साथ होते हैं
कम्प्यूटर, मोबाइल,
गैजेट,
चित्र,
संकेत,
ध्वनियाँ आदि l
संघ को आभासी नहीं,
वास्तविक दुनिया
में काम करना है l
इसलिए उसके लिए
उपकरण और तकनीक से अधिक मानवीय
गुणों- संवेदना,
भावना आदि के साथ
मनुष्य के मस्तिष्क और ह्रदय
की चिंता है l संघ
मानवीय समाज के विकास और
सशक्तिकरण के लिए प्रतिबद्ध
है, न
कि मशीनी या तकनीकी समाज के
लिए l
मुख्यमंत्री कमलनाथ इन दिनों सत्ता माफिया से किए गए अपने चुनावी वादों को पूरा करने में जुटे हुए हैं। उनके नेतृत्व वाली कांग्रेस ने जनता से जो वादे किए थे वे तो बेअसर रहे लेकिन जिन गिरोहों को उन्होंने इनाम देने के वादे किए थे उन्हें पूरा करने के लिए वे राज्य का खजाना लुटाने में जुटे हुए हैं। बात बात में खजाना खाली है का शोर मचाने वाले कमलनाथ ने हाल ही में उज्जैन पहुंचकर तीन सौ करोड़ रुपए के विकास कार्यों की घोषणा कर डाली। जबकि शिवराज सिंह चौहान सरकार ने सिंहस्थ के दौरान करोड़ों रुपयों के विकास कार्य उज्जैन में कराए थे। उन निर्माण कार्यों में भारी घोटाले के आरोप भी लगे थे। चुनाव के दौरान कांग्रेस ने भी सिंहस्थ घोटाले का शोर मचाया था।भाजपा के हाथों से बजट लूटने का काम जिस महाकाल माफिया ने किया था सत्ता में आने के बाद कमलनाथ फिर उसी महाकाल माफिया के सामने साष्टांग लेट गए हैं। इस माफिया का भगवान महाकाल से कोई लेना देना नहीं है। इसके विपरीत जनता को लूटने के लिए बिजली के दाम अनाप शनाप बढ़ा दिए गए हैं।
मध्यप्रदेश
का महाकाल माफिया लंबे समय
से राज्य की सरकारों को ब्लैकमेल
करता रहा है। कमोबेश हर सरकार
इस गिरोह के हाथों ब्लैकमेल
होती रही है। इस गिरोह का काम
नेताओं, आला अफसरों,
पत्रकारों, बैंकरों,
न्यायाधीशों की
नियुक्तियां कराना और फिर
उन्हें अपने लाभ के लिए इस्तेमाल
करना रहा है। चुनावों के दौरा
ये गिरोह अपने अनुकूल सरकार
बनाने के लिए तमाम रणनीतियां
इस्तेमाल करता है। उज्जैन के
कई अखाड़ों से इस गिरोह का
संचालन किया जाता है। राज्य
की सरकार को धमकाने के लिए
गिरोह के सदस्य हमेशा प्रचारित
करते रहते हैं कि कोई मुख्यमंत्री
उज्जैन में रात्रि निवास नहीं
कर सकता क्योंकि महाकाल ही
राजा हैं। हर सिंहस्थ के बाद
या तो मुख्यमंत्री हट जाता
है या फिर सरकार बदल जाती है।
इस किंवदंती को सच साबित करने
के लिए देश भर में फैले माफिया
से जुड़े सदस्य बयान देकर
माहौल बनाते रहते हैं।
महाकाल
का इतिहास देखें तो वर्तमान
मंदिर को श्रीमान पेशवा बाजी
राव और छत्रपति शाहू महाराज
के जनरल श्रीमान रानाजिराव
शिंदे महाराज ने 1736 में
बनवाया था। इसके बाद श्रीनाथ
महादजी शिंदे महाराज और श्रीमान
महारानी बायजाबाई राजे शिंदे
ने इसमें कई बदलाव और मरम्मत
भी करवायी थी।महाराजा श्रीमंत
जयाजिराव साहेब शिंदे आलीजाह
बहादुर के समय में 1886 तक,
ग्वालियर रियासत के
बहुत से कार्यक्रमों को इस
मंदिर में ही आयोजित किया जाता
था।तभी से सिंधिया राजघराने
की भूमिका महाकाल मंदिर के
संचालन में प्रमुख तौर पर रहती
आई है।
यही
वजह है कि पिछले कई दिनों से
राज्य में महाकाल माफिया ने
ये कहानी उड़ाई कि ज्योतिरादित्य
सिंधिया कांग्रेस के विद्रोह
करके भाजपा में जा सकते हैं
और भाजपा उनके नेतृत्व में
कमलनाथ सरकार को गिराकर सत्तासीन
हो जाएगी। इस कहानी को बल देने
के लिए बाकायदा भाजपा के अध्यक्ष
अमित शाह से ज्योतिरादित्य
सिंधिया की मुलाकात की घटना
प्रचारित की गई।कहा गया कि
सिंधिया अपने समर्थकों के
साथ भाजपा को लेकर सरकार बनाने
जा रहे हैं। भाजपा ने उन्हें
मुख्यमंत्री बनाने का वादा
किया है। जब जनता के बीच ये
कहानी सुनी सुनाई जाने लगी
तो कमलनाथ को अपनी कुर्सी पर
खतरा मंडराता दिखा। इस दौरान
ज्योतिरादित्य सिंधिया खामोश
रहे और उन्होंने अपने पक्ष
में चलती इस मुहिम का भरपूर
आनंद लिया। लीपापोती करने
पहुंचे कमलनाथ ने सार्वजनिक
तौर पर महाकाल के आसपास विकास
कार्यों के लिए तीन सौ करोड़
रुपए की योजना घोषित कर डाली।
गौरतलब है कि जब प्रदेश का
खजाना कथित तौर पर खाली है तब
कमलनाथ को प्रदेश के विकास
की कोई चिंता नहीं है और वे
महाकाल माफिया के आगे घुटने
टेककर खड़े हो गए हैं।
दरअसल
पिछले विधानसभा चुनावों में
इसी महाकाल माफिया ने सपाक्स
पार्टी को झाड़ पोंछकर मैदान
में उतारा था। तब ये अफवाह
उड़ाई गई कि भाजपा सवर्णों
के खिलाफ है। महाकाल माफिया
के कारिंदों ने प्रदेश के सीधे
साधे ब्राह्मणों को उकसाया
कि वे आरक्षण के खिलाफ सवर्ण
समाज पार्टी को वोट दें। इस
षड़यंत्र का नतीजा ये रहा कि
भाजपा का समर्पित वोटर पार्टी
से खफा हो गया और वोट को बर्बाद
होने से बचाने के लिए उसने
कांग्रेस को अपना समर्थन
दिया।अपने इस षड़यंत्र को
हवा देने के लिए महाकाल माफिया
ने शिवराज सिंह चौहान से वह
बयान दिलवाया जिसमें उन्होंने
कहा था कि कोई माई का लाल आरक्षण
समाप्त नहीं कर सकता।
भगवान
महाकाल की नीलकंठेश्वर वाली
त्यागी भूमिका को सृष्टि के
उद्भव का कारक माना जाता है।
उनकी संहारक वाली छवि भी जन
जन के बीच जिज्ञासा का केन्द्र
होती है। ऐसे में महाकाल माफिया
कहानियां प्रचारित करता रहता
है कि यदि सिंहस्थ के बाद
मुख्यमंत्री नहीं बदला गया
या सरकार नहीं बदली तो प्रलय
हो जाएगा। अपनी इस कहानी को
सच साबित करने के लिए महाकाल
माफिया ने शिवराज सिंह चौहान
सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए
अभियान चलाया था। तब प्रदेश
के पंडितों के माध्यम से इसे
धर्मयुद्ध बताया गया। कहा
गया कि यदि सरकार नहीं बदली
तो महाकाल के प्रति आस्थाओं
में कमी आ जाएगी। पंडितों ने
भी बढ़ चढ़कर इस सुर में सुर
मिलाए। सरकार में आने के बाद
कमलनाथ ने धर्मस्व विभाग का
ढांचा बदल दिया और धर्मस्थलों
को नियमित करने के नियम भी
ढीले कर दिए।
मध्यप्रदेश
में कमलनाथ सरकार ने जनता की
सहानुभूति बटोरने के लिए न
केवल शुद्धता को लेकर अभियान
चलाया बल्कि हर जिले में कुछेक
व्यापारियों के खिलाफ रासुका
लगाकर अपने अभियान की पूर्णाहुति
भी कर डाली है। हालांकि विकास
के मोर्चे पर कमलनाथ सरकार
बुरी तरह असफल साबित हुई है।
उद्योगपति कमलनाथ ने कथित
छिंदवाड़ा माडल की आड़ में
उद्योगपतियों से जो वसूली
अभियान चलाया उससे राज्य में
अफरातफरी के हालात बन गए हैं।
नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव
तो कहते हैं कि नौ माह बाद भी
सरकार जनता को नतीजे नहीं दे
पाई है। उसके मंत्री तबादलों
में ही जुटे हैं। जनता की
समस्याएं बढ़ती जा रहीं हैं
और जनता में आक्रोश फैल रहा
है।
राज्य में कमलनाथ को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करते समय कांग्रेस ने उन्हें उद्योपति बताया था। अब जबकि उद्योगों के बीच भय का माहौल है तब लोग सवाल कर रहे हैं कि कमलनाथ आखिर कौन सा उद्योग चलाते हैं और उनके कारखाने प्रदेश या देश के लिए कौन सा माल बनाते हैं।जब सरकार ने नवंबर 2019 तक प्रदेश के सभी मीटर बदलने का अभियान चलाया है। लोग पूछ रहे हैं कि प्रदेश में बिजली की क्षति लगातार बढ़ती जा रही है तब मीटर बदलने की ये मुहिम कमलनाथ से जुड़े किस उद्योगपति को लाभ पहुंचाने के लिए चलाई जा रही है।इसी बीच महाकाल माफिया को दस्तूरी पहुंचाने के कदम ने कमलनाथ की असलियत उजागर कर दी है।
विदेशी
तकनीक के आयात से भारत को कर्ज
के दलदल में धकेलने वाले राजीव
गांधी की सोच को मुख्यमंत्री
कमलनाथ अब मध्यप्रदेश में
लागू करने की तैयारी कर रहे
हैं। इसे वे अपने बहु प्रचारित
छिंदवाड़ा मॉडल का प्रेरणा
स्रोत बता रहे हैं। राजीव
गांधी के 75 वें
जन्मदिवस को उन्होंने राजीव
गांधी को 21 वीं सदी
के आधुनिक भारत का निर्माता
बताया। जबकि हकीकत ये है कि
कंप्यूटर तकनीक के आयात की
देश को जो मंहगी कीमत चुकानी
पड़ी है वह भारत के विकास के
मार्ग में रोड़ा साबित
हुई है। आज चीन जहां तकनीक के
विकास से 13 ट्रिलियन
डॉलर की अर्थव्यवस्था बन चुका
है वहीं भारत आज भी 5ट्रिलियन
डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने
की जद्दोजहद से जूझ रहा है।
कांग्रेस
के जिस विकास मॉडल को देश ने
खारिज करके मोदी सरकार को
सत्ता सौंपी है उसने भारतीय
मुद्रा को रीसेट करके देश में
पनप चुकी समानांतर अर्थव्यवस्था
को समाप्त करने का एतिहासिक
फैसला लिया था। नोटबंदी से
देश का काला धन तो उजागर हुआ
ही साथ में बैंकों के सरकारीकरण
का लाभ लेकर कालाधन बनाने
वालों की पोल भी देश के सामने
खुल चुकी है। जिन राजीव गांधी
को देश में कंप्यूटर क्रांति
का जनक बताया जाता है उसे
उन्होंने माईक्रोसाफ्ट का
कथित एजेंट बनकर देश में लागू
करवाया था। विश्वसनीय सरकारी
सूत्र बताते हैं कि पूरे देश
की ओर से भारत सरकार ने माईक्रोसाफ्ट
से अनुबंध किया था। उसी अनुबंध
की तर्ज पर आज तक भारत सरकार
और राज्यों की सरकारें
माईक्रोसाफ्ट से ही आपरेटिंग
सिस्टम खरीदती हैं। भारत ये
युवा यदि आपरेटिंग सिस्टम
बना भी लें तो उस अनुबंध की
वजह से सरकारें वो साफ्टवेयर
नहीं खरीद सकती हैं।भारत का
कोई आंत्रप्न्योर यदि मुफ्त
में भी वो साफ्टवेयर सरकारों
को देना चाहे तो उसे नहीं खरीदा
जा सकता।
देश
में राजीव गांधी के मित्र सैम
पित्रोदा ने जिस सी डॉट एक्सचेंज
की खरीदी पूरे देश में करवाई
थी वो तकनीक पूरी दुनिया में
बंद हो चुकी थी। इसके बाद देश
में पेजर आए और वे भी मोबाईल
की वजह से विदा हो गए। इस तरह
मंहगी तकनीकें खरीदे जाने से
देश को अरबों रुपयों की हानि
पहुंची और कमीशन के रूप में
मिला अरबों रुपयों का धन कथित
तौर पर विदेशी बैंकों में
रिश्वत के रूप में पहुंचाया
गया। जबकि सैम पित्रोदा ने
अहसान जताते हुए एक रुपये का
वेतन लेकर देशभक्त होने का
नाटक खेला था।
भोपाल
गैस त्रासदी के आरोपी वारेन
एंडरसन को विदेश भगाने के लिए
जिम्मेदार राजीव गांधी की
पोल पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल
गौर विधानसभा में उजागर कर
चुके हैं। उनका कहना था कि
स्वर्गीय अर्जुनसिंह को फोन
करके राजीव गांधी ने एंडरसन
को छोड़ने का हुक्म दिया था।
जिसे तत्कालीन कलेक्टर मोती
सिंह और एसपी स्वराज पुरी ने
सकुशल वापस पहुंचाया था।
स्वराज पुरी तो स्वयं कार
चलाकर एंडरसन को विमान तल तक
छोड़ने गए थे। यूनियन कार्बाइड
ने सुप्रीम कोर्ट के माध्यम
से जो हर्जाना दिलवाया उसकी
बंदरबांट की कहानी भोपाल के
गली कूंचों में आज भी सुनी
सुनाई जाती है। गैस राहत विभाग
के मंत्री आरिफ अकील और पूर्व
मंत्री बाबूलाल गौर इस एपीसोड
की कहानियां समय समय पर सुनाते
रहते हैं।
कांग्रेस
में राजीव गांधी की विचारधारा
देश को आत्मनिर्भर बनाने के
बजाए कर्ज लेकर बांटने वाली
सोच के रूप में ही जानी जाती
है। युवाओं को वैश्विक उद्योगों
के लिए बेचने की इस विचारधारा
में प्रशिक्षण तो सरकारी
संसाधनों से दिया गया लेकिन
वे युवा नौकरी के लिए भारत
छोड़कर विदेश चले गए। वहीं
बस गए और सरकारें लाभ के नाम
पर विदेशी मुद्रा का फायदा
गिनाती रहीं। आज विश्व भर में
फैले भारत के युवा अपने देश
को याद करते हैं और घरों से
उजड़ने का दुख उन्हें सालता
रहता है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री
नरेन्द्र मोदी ने जब मेक इन
इंडिया का नारा दिया तो कई
उद्योगपतियों ने अपने दफ्तर
भारत में खोल दिए। आज वे उद्योगपति
पूरी दुनिया में तीन दफ्तर
और कारखाने चलाते हैं जिनमें
भारत के युवाओं को रोजगार के
अवसर मिले हैं। कई वैश्विक
कंपनियां भी भारत के युवाओं
से तकनीकी कामकाज कराती हैं।
इसके विपरीत चीन ने अपने युवाओं की तस्करी नहीं की। अपनी लागत पर दुनिया भर के उद्योगों को रोशन नहीं किया। चीन ने घरेलू उत्पादन को पूरी दुनिया में बेचा और आज उसकी मुद्रा पूरी दुनिया में तहलका मचा रही है। भारत में नरेन्द्र मोदी जब मेक इन इंडिया का नारा दे रहे हैं तब मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार युवाओं को विदेश भेजने की मुहिम चला रही है। जाहिर है कि ये भारत सरकार की राष्ट्रीय सोच के विपरीत कदम है। जिसे केन्द्र की भाजपा सरकार लंबे समय तक बर्दाश्त नहीं कर पाएगी। कमलनाथ सरकार का ये अभियान अंततः कांग्रेस सरकार की विदाई की वजह भी बन सकता है।