Category: कृषि क्रांति

  • नरवाई के नाम पर किसानों की प्रताड़ना

    नरवाई के नाम पर किसानों की प्रताड़ना


    सरकार ने नरवाई प्रबंधन पर कई कड़े फैसले लिए हैं। सरकार का कहना है कि नरवाई जलाने से जहां पर्यावरण प्रदूषण होता है वहीं मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी क्षीण हो जाती है। इसलिए एक मई के बाद यदि कोई किसान अपने खेतों में नरवाई जलाता पाया जाएगा तो उस पर कड़ी कार्रवाई करते हुए दंड वसूला जाएगा। यही नहीं ऐसे चिन्हित किसानों की किसान सम्मान निधि बंद कर दी जाएगी। समर्थन मूल्य पर उस किसान की फसल भी नहीं खरीदी जाएगी। इस तरह के कड़े प्रतिबंधात्मक कदमों से खेतों की नरवाई का प्रबंधन किया जाएगा। इससे जहां जमीन की उर्वरा शक्ति को बचाया जा सकेगा वहीं जानवरों के लिए भूसा भी बचाया जा सकेगा। कई जिला कलेक्टरों ने तो आगे बढ़कर किसानों से जुर्माना वसूलना भी शुरु कर दिया है। सरकार हर साल कृषि और विभाग और उसके सहयोगी संस्थानों पर लगभग पचास हजार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करती है। कृषि प्रबंधन पर तीस हजार करोड़ रुपए, उपार्जन पर बीस हजार करोड़ रुपए ,खेती के मशीनीकरण पर लगभग दो सौ करोड़ रुपए, खर्च किए जाते हैं। इसके अलावा कृषि संबंधी कार्यों पर अन्य सहयोगी विभागों की राशि मिलाकर ये आंकड़ा एक लाख करोड़ रुपयों तक पहुंच जाता है। पिछले डेढ़ दशक में कृषि कर्मण अवार्ड जैसे पुरस्कार हासिल करके मध्यप्रदेश ने देश के कृषि क्षेत्र में डंका बजा दिया है। सिंचाई प्रबंधन पर सरकार हर साल बीस हजार करोड़ रुपयों से अधिक की राशि खर्च करती है। भारी धनराशि खर्च किए जाने और निजी क्षेत्र के इससे कई गुना अधिक निवेश से राज्य की लगभग साढ़े बारह लाख हेक्टेयर जमीनें सिंचित हो चुकी हैं। सरकार हर साल अपने बजट की बड़ी धनराशि सब्सिडी के रूप में किसानी कार्यों पर खर्च करती है। यही कारण है कि आज राज्य की ज्यादातर जमीनें सिंचित हो गई हैं। किसानों ने भी आगे बढ़कर दो से तीन फसलें लेना शुरु कर दिया है। फसल काटे जाने के बाद खेत खाली करने और अगली फसल बोने के बीच बहुत कम समय मिलता है। इतने समय में कृषि अवशेषों का सड़ना गलना संभव नहीं होता है। यही वजह है कि किसानों ने नरवाई जलाने की सस्ती प्रक्रिया अपना ली है। इससे खेत के अधिकतर कृषि अवशेष जल जाते हैं और किसान रोटावेटर चलाकर खेत में हल चला देता है। इस प्रक्रिया में खेत की मिट्टी भी काफी हद तक जल जाती है और कड़ी होती चली जाती है। सरकार और इससे जुड़ा तंत्र नरवाई जलाने से रोकने वाले सरकार के फैसले का समर्थन कर रहा है। ऊपरी तौर पर ये प्रयास सराहनीय भी नजर आते हैं। इसके विपरीत जब कृषि विभाग और सरकारी तंत्र के कार्यों का अवलोकन किया जाए तो गहरी निराशा हाथ लगती है। खेती भले ही निजी क्षेत्र में की जाती हो पर कृषि प्रबंधन का ठेका लेने वाले सरकार के विभाग अपना दायित्व निभाने में बुरी तरह असफल साबित हुए हैं। पिछले पच्चीस सालों में सरकार ने कृषि यंत्रीकरण पर ही लगभग पांच हजार करोड़ रुपयों से अधिक की धनराशि खर्च की है।इसके बावजूद जमीन की जुताई ,कटाई आदि में निजी क्षेत्र की मशीनें ही दायित्व संभाल रहीं हैं। हर साल पंजाब से आने वाले हार्वेस्टर फसलें तो काट देते हैं पर वे नरवाई का भूसा खेत में ही बिखरा देते हैं। कुछ जिला कलेक्टरों ने ऐसे हार्वेस्टर बंद करने और फसलों की कटाई के लिए सुपर सीडर और हैप्पी सीडर जैसी मशीनों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने का अभियान चलाया है। बेशक ये नई मशीनें किसानों के लिए सहयोगी हैं सरकार इनका प्रमोशन भी कर रही है। इसके बावजूद सरकार अपनी कमजोरी को स्वीकार करने तैयार नहीं है। हर साल बजट की बड़ी धनराशि खर्च करने के बावजूद राज्य की खेती का मशीनीकरण फिसड्डी बना हुआ है। अपनी अकुशलता को छिपाने के लिए सरकार ने किसानों पर प्रतिबंध लगाना शुरु कर दिया है। ये कदम निश्चित ही किसानों के हित में नहीं है। यदि किसान दो या तीन फसलें लेकर अधिक खाद्यान्न का उत्पादन करना चाह रहा है तो उसे प्रोत्साहित किया जाना जरूरी है। उसे दंडित करके सरकार कृषि विपणन की अपनी अक्षमता को छिपाने का प्रयास अधिक कर रही है। सरकार को अपने फैसले पर नए संदर्भों में विचार करना होगा।

  • कृषक कल्याण मिशन से मध्यप्रदेश लिखेगा नई इबारत

    कृषक कल्याण मिशन से मध्यप्रदेश लिखेगा नई इबारत

    भोपाल,15 अप्रैल(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में मंत्रि-परिषद की बैठक मंगलवार को मंत्रालय में सम्पन्न हुई। मंत्रि-परिषद द्वारा प्रदेश के किसानों के समन्वित विकास के लिए किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग, उद्यानिकी एवं खाद्य प्र-संस्करण विभाग, मत्स्य पालन विभाग, पशु पालन एवं डेयरी विभाग, सहकारिता विभाग, खाद्य नागरिक आपूर्ति और उपभोक्ता संरक्षण विभाग में प्रचलित योजनाओं को एक मंच पर लाकर मध्यप्रदेश किसान कल्याण मिशन को प्रारंभ करने की सैद्धांतिक अनुमति दी गयी।

    मध्यप्रदेश ने कृषि क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है। कृषि उत्पादकता (किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) वर्ष 2002-2003 में 1195 था जो वर्ष 2024 में 2393 हो गया। यह वृद्धि 200 प्रतिशत हो गयी है। फसल उत्पादन (लाख मीट्रिक टन) वर्ष 2002-2003 में 224 एवं वर्ष 2024 में 723 होकर 323 प्रतिशत हो गयी है। कृषि विकास दर (प्रतिशत में) 2002-2003 में 3 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 9.8 प्रतिशत हो गयी। 327 प्रतिशत की वृद्धि हुई। कृषि क्षेत्र का बजट (करोड़ रूपये) वर्ष 2002-2003 में 600 करोड़ एवं वर्ष 2024 में 27050 करोड़ होकर वृद्धि दर 4508 प्रतिशत हुई। मध्यप्रदेश में कृषि क्षेत्र का योगदान प्रदेश की जीडीपी में 39 प्रतिशत है।

    म.प्र. कृषक कल्याण मिशन का उद्देश्य किसानों की आय में वृद्धि, कृषि को जलवायु-अनुकूल बनाना, धारणीय कृषि पद्धतियों को अपनाना, जैव विविधता और परम्परागत कृषि ज्ञान संरक्षण, पोषण एवं खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना, किसानों की उपज के लिए उचित मूल्य सुनिश्चित करना है।

    किसानों की आय में वृद्धि- कृषि तथा उद्यानिकी के अंतर्गत फसलों की उत्पादकता में वृद्धि, उच्च मूल्य फसलों की खेती, गुणवत्तापूर्ण आदानों की उपलब्धता – बीज, रोपण सामग्री, उर्वरक, कीटनाशक, और कृषि विस्तार एवं क्षमता विकास, सस्ती ब्याज दरों पर ऋण की आसान उपलब्धता, खाद्य प्र-संस्करण और कृषि आधारित उद्योग, वैल्यू-चैन विकास और मौजूदा वैल्यू-चैन का सुदृढ़ीकरण, मप्र की विशिष्ट समस्याओं के लिए अनुसंधान एवं विकास है।

    कृषि तथा उद्यानिकी सस्टेनेबल कृषि पद्धतियां के अंतर्गत गुड एग्रीकल्चर प्रैक्टिस (जीएपी) को अपनाना, जैविक/प्राकृतिक खेती क्षेत्र में बढ़ोतरी, जैविक एवं प्राकृतिक उत्पादों के लिए मार्केट लिंकेज का निर्माण तथा सुदृढ़ीकरण, जैविक एवं प्राकृतिक उत्पाद हेतु प्रमाण पत्र जारी करने तथा ट्रैसेबिलिटी सिस्टम को विकसित ,किसानों की उपज के उचित मूल्य सुनिश्चित करना,मंडियों का आधुनिकीकरण एवं उन्नयन, मंडी कार्यों के प्रबंधन के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग, मण्डी में पारदर्शी तथा निष्पक्ष नीलामी की प्रक्रिया को सुदृढ़ एवं मंडी के बाहर उपज बेचने की सुविधा को विकसित करना, जिन फसलों में वायदा अनुबंधों की अनुमति है, उनकी कार्य योजना तैयार करना है।

    किसानों की आय में वृद्धि के लिए सहकारिता एवं मत्स्य पालन के अंतर्गत सहकारिता के माध्यम से दूध संकलन के कवरेज को 26000 ग्रामों तक ले जाया जायेगा। दूध संकलन व प्र-संस्करण की वर्तमान क्षमता को बढाकर 50 लाख लीटर / दिवस किया जायेगा। पशुओं में स्टॉल फीडिंग एवं मिनरल मिक्चर का घरेलू विकल्प का उपयोग से निराश्रित गौवंश की संख्या में कमी लाना। मत्स्य पालन क्षेत्र में आय वृद्धि के लिए आधुनिक तकनीकों का प्रयोग – Cage Farming तथा Biofloc, मछुआ/किसान क्रेडिट कार्ड योजनान्तर्गत शून्य प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराकर स्व-रोजगार को बढ़ावा दिया जायेगा।

    मिशन के अन्य घटक में कृषि का जलवायु-अनुकूलन तथा रिस्क मिटिगेशन, जलवायु अनुकूल किस्मों को विकसित करवाना, कृषि फसलों के साथ ही पशुपालन, मत्स्योत्पादन को अपनाना, जैव विविधता और परम्परागत कृषि ज्ञान संरक्षण, पारंपरिक कृषि पद्धतियों का दस्तावेज़ीकरण, संरक्षण और उपयोग शामिल है।

    मिशन के अपेक्षित परिणाम में उद्यानिकी फसलों का सकल वर्धित मूल्य कृषि आधारित फसलों से अधिक किया जायेगा। उद्यानिकी फसलों का क्षेत्रफल राष्ट्रीय औसत के बराबर लाया जायेगा। कृषि यंत्रीकरण को डेढ़ गुना करना, कृषि क्षेत्र में पूंजी निवेश को 75 प्रतिशत बढाना, प्रदेश को नरवाई जलाने से मुक्त करना, जैविक / प्राकृतिक / गुड एग्रीकल्चर प्रैक्टिस कृषि के अंतर्गत संपूर्ण बोये गये क्षेत्र का 10 प्रतिशत हिस्सा एवं सूक्ष्म सिंचाई को 20 प्रतिशत क्षेत्रफल तक पहुंचाना हैं।

    फसल बीमा का कवरेज 50 प्रतिशत तक करना, संकर तथा उन्नत बीजों का विस्तार आधे क्षेत्रफल तक करना, प्रदेश के अन्नदाता को ऊर्जादाता सौर ऊर्जा पम्प अनुदान पर उपलब्ध कराये जाना, नये प्र-संस्करण क्षेत्रों की स्थापना, विपणन नेटवर्क का विस्तार और प्रदेश की बाहर की मंडियों तक पहुंच बढ़ाना, मत्स्य बीज के मामलें में प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाना, कोल्ड चेन और नेटवर्क विकास के जरिये किसानों को मत्स्य संपदा के लिए मिलने वाले मूल्य को डेढ़ गुना करना, उच्च उत्पादकता मछली का पालन 10288 मीट्रिक टन किया जाना, मत्स्य पालन के लिए 1.47 लाख किसान क्रेडिट कार्ड उपलब्ध कराये जायेंगे। संगठित क्षेत्र में दुग्ध संकलन को 50 लाख लीटर प्रतिदिन किया जायेगा। पशुधन उत्पादकता में 50 प्रतिशत की वृद्धि की जायेगी। बेसहारा गौ-वंश की देखभाल के लिए प्रदेशव्यापी नेटवर्क तैयार करना, जिससे सड़कों पर उनकी उपस्थिति शून्य हो सकेगी।

    मध्यप्रदेश कृषक कल्याण मिशन की साधारण सभा के अध्यक्ष मुख्यमंत्री होंगे। मिशन क्रियान्वयन की कार्यकारिणी समिति के अध्यक्ष मुख्य सचिव होंगे। मिशन क्रियान्वयन जिला स्तर पर कलेक्टर की अध्यक्षता में किया जायेगा।

    चिकित्सा महाविद्यालय, सतना से संबंद्ध नवीन चिकित्सालय के निर्माण के लिए राशि 383 करोड़ 22 लाख रूपये की स्वीकृति

    मंत्रि-परिषद द्वारा लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग अंतर्गत चिकित्सा महाविद्यालय, सतना से संबंद्ध नवीन चिकित्सालय के निर्माण के लिए राशि 383 करोड़ 22 लाख रूपये की स्वीकृति प्रदान की गयी है।

    गांधी चिकित्सा महाविद्यालय एवं संबद्ध चिकित्सालय में नवीन पदों की स्वीकृति

    मंत्रि-परिषद द्वारा लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के अंतर्गत गांधी चिकित्सा महाविद्यालय एवं संबद्ध चिकित्सालय में पीडियाट्रिक कार्डियोलॉजी, पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजी एवं नियोनेटोलॉजी विभाग में नियमित स्थापना के कुल 12 नवीन पदों का सृजन किये जाने की स्वीकृति प्रदान की गयी है। इन पदों में प्राध्यापक के 3 पद, सह प्राध्यापक के 3 पद, एवं सहायक प्राध्यापक के 3 पद एवं सीनियर रेसीडेंट के 3 पद शामिल हैं।

  • किसान को कारोबारी बनाएंगे एफपीओः विश्वास सारंग

    किसान को कारोबारी बनाएंगे एफपीओः विश्वास सारंग


    भोपाल, 10 फरवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। सहकारिता मंत्री विश्वास कैलाश सारंग ने कहा है कि नई तकनीक और सहकारिता से किसानों का उत्थान होगा। खेत, खलियान और किसान सरकार की प्राथमिकता है। विकसित भारत की परिकल्पना में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। इन तीनों के उन्नयन और उत्थान की दिशा में सामूहिक रूप से काम करने से ही देश विकसित हो पाएगा, सरकार इस दिशा में प्रयासरत है। मध्यप्रदेश ने कृषि क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। इससे प्रोडक्शन में रिकॉर्ड दर्ज किया और 7 बार लगातार कृषि कर्मण अवार्ड भी मिला। मंत्री श्री सारंग सोमवार को नरोन्हा प्रशासन एवं प्रबंधकीय अकादमी के स्वर्ण जयंती सभागार में आयोजित कृषि क्रांति 2025 एफपीओ कॉन्क्लेव को संबोधित कर रहे थे। इस मौके पर उद्यानिकी एवं खाद्य प्र-संस्करण मंत्री नारायण सिंह कुशवाह भी उपस्थित थे।

    मंत्री से सारंग ने कहा कि मध्यप्रदेश ने कृषि को उन्नत बनाने हर क्षेत्र में काम किया है। किसानों को फसल का सही मूल्य मिल सके, समय पर उपार्जन सहित खाद, बीज, पानी मिल सके इसका ध्यान रखा गया है। अब किसान को व्यवसायी के रूप में परिवर्तन करना सरकार का मुख्य काम है और यह केवल सहकारिता के माध्यम से ही हो सकता है। मंत्री श्री सारंग ने कहा कि किसानों को एफपीओ के माध्यम से ऑर्गेनिक खेती से जोड़ना होगा, जिससे उपभोक्ताओं का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। एफपीओ को किसानों को जागरूक करना होगा। सरकार एफपीओ को हर तरह की सुविधा देने को तैयार है। उन्होंने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष- 2025 में हर पंचायत में पैक्स के माध्यम से सहकार सभा होगी। इसमें भी एफपीओ जोड़कर किसान को सरकार से समृद्धि की ओर ले जा सकते हैं।

    एफपीओ कॉन्क्लेव से सहकार की भावना मजबूत होगी

    मंत्री श्री सारंग ने कहा कि एफपीओ कॉन्क्लेव से सहकार की भावना मजबूत होगी। सहकारिता मानव स्वभाव का मूलभूत आधार है.सहकारिता के बिना इस समाज की परिकल्पना नहीं की जा सकती। आज के समय में सहकारिता के माध्यम से नई-नई तकनीक से जोड़ना, फूड प्रोसेसिंग आदि पर काम करना, खेती में वैल्यू एडिशन करने की आवश्यकता हैं, जिससे अच्छे परिणाम आए इसमें सरकार सहायता देने को तैयार है। उन्होंने कहा कि सरकार के साथ समाज जनता सहकारी संस्थाओं एफपीओ सब मिलकर काम करें, इस दिशा में कार्य करने के लिए सरकार प्रदेश के उन्नयन के लिए तत्पर है।

    खाद्य प्र-संस्करण से किसानों की आत्मनिर्भरता

    उद्यानिकी एवं खाद्य प्र-संस्करण मंत्री श्री कुशवाह ने कहा कि एफपीओ और खाद्य प्र-संस्करण को मजबूत बनाना किसानों की आत्मनिर्भरता की कुंजी है। उन्होंने फसल विविधीकरण और कृषि आधारित उद्योगों को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया। साथ ही, उन्होंने घोषणा की कि”राज्य सरकार जल्द ही एक विशाल फूड प्रोसेसिंग सम्मेलन का आयोजन करेगी, जिसमें किसानों, उद्यमियों, क्रेताओं और विक्रेताओं को एक मंच पर लाया जाएगा।”

    मंत्री श्री कुशवाह ने कहा कि किसान की आय दोगुना करने के लिये चल रहे कार्यों से फसलों का मूल्य अच्छा मिल सकेगा और उसका संवर्धन हो सकेगा। आत्मनिर्भर भारत बनाने में किसानों का बहुत बड़ा योगदान है। उन्होंने कहा कि कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि मध्यप्रदेश मसाला उद्योग में एक नम्बर पर है। सरकार अलग-अलग योजनाओं से किसानों की उत्थान की दिशा में काम कर रही है। उद्यानिकी विभाग के पोर्टल पर नये किसानों को रजिस्टर करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। विकसित कृषि के लिये नई खेती से जुड़ना होगा, इसके लिये किसान उद्यानिकी से भी जुड़े।

    मंत्री श्री कुशवाह ने कहा कि कई देश जैविक खेती में आगे बढ़ रहे हैं। जैविक खेती से पैदा होने वाली फसल से दुष्प्रभाव नहीं होता। इससे बीमारियों का सामना नहीं करना पड़ता और स्वास्थ्य प्रभावित नहीं होता। उन्होंने कहा कि प्र-संस्करण के क्षेत्र में कोई भी परियोजना व्यक्ति या संस्था लगाती है तो 35 प्रतिशत अनुदान सरकार दे रही है। साथ ही अनेक योजनाओं और कृषि उपकरण में भी सरकार अनुदान दे रही है।

    मंत्री श्री कुशवाह ने कहा कि आधुनिक कृषि यंत्र खराबी पर मैकेनिक एवं उपकरण स्टोर, प्रबंधन आदि आवश्यक है। इस पर भी ध्यान देकर आगे बढ़ा जा सकता है। तकनीकी विशेषज्ञ के माध्यम से किसानों को मदद मिलेगी और उचित दाम से किसान संबल होंगे।

    ‘कृषि क्रांति : एफपीओ कॉन्क्लेव’ में अधिकारियों, विशेषज्ञों, निर्यातकों, क्रेताओं और तकनीकी प्रदाताओं ने एफपीओ के विकास के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिए। इस कॉन्क्लेव का मुख्य उद्देश्य एफपीओ को खाद्य प्र-संस्करण और निर्यात योग्य उत्पाद तैयार करने में सक्षम बनाना था। कॉन्क्लेव का आयोजन भूमिशा ऑर्गेनिक, डिक्की और सर्च एंड रिसर्च डेवपलमेंट सोयायटी ने किया।

    विशेषज्ञों के विचार एवं मार्गदर्शन

    कृषिका नेचुरल्स प्राइवेट लिमिटेड की प्रबंध निदेशक सुश्री प्रतिभा तिवारी, डिक्की के अध्यक्ष डॉ. अनिल सिरवैया और सर्च एंड रिसर्च डेवलपमेंट सोसायटी की अध्यक्ष डॉ. मोनिका जैन ने भी कॉन्क्लेव में विचार रखे। कॉन्क्लेव में सॉलिडरिडाड के जनरल मैनेजर सुरेश मोटवानी, एसबीआई के एजीएम श्री शशांक कुमार, एमपी स्टार्ट-अप सेंटर के श्री अरुणाभ दुबे, सी-मैप लखनऊ के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आलोक कृष्णा और उद्यानिकी विभाग के अपर संचालक श्री कमल सिंह किरार प्रमुख थे।

    कृषि रत्न सम्मान एवं सहयोग

    कार्यक्रम में 8 एफपीओ और 2 किसानों को ‘कृषि रत्न सम्मान प्रदान किया गया। इनका सम्मान पत्र बांस से तैयार किया गया था। राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनएसडीसी) द्वारा पीएमएफएमई योजना के अंतर्गत 2 एफपीओ को 28.5 लाख रुपये की परियोजना स्वीकृत की गई, जिसकी पहली किश्त सहकारिता मंत्री श्री सारंग और एनएसडीसी की क्षेत्रीय निदेशक सुश्री इंद्रजीत कौर ने प्रदान की। इस मौके पर लक्ष्य प्राप्ति के सूत्र पुस्तिका का विमोचन भी किया गया।

  • बुंदेलखंड-की-तस्वीर बदलेगी केन बेतवा लिंक परियोजना

    बुंदेलखंड-की-तस्वीर बदलेगी केन बेतवा लिंक परियोजना

    डॉ रबीद्र पस्तोर, सीईओ, ईफसल

    1. नदियों को आपस में जोड़ने की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान मद्रास प्रेसीडेंसी के मुख्य अभियंता सर आर्थर कॉटन ने पहली बार 1919 में नदियों को जोड़ने का प्रस्ताव रखा था। स्वतंत्रता के बाद, लेकिन भारतीय नदियों को आपस में जोड़ने के विचार को कुछ दशक पहले एम. विश्वेश्वरैया, के.एल. राव और डी.जे. दस्तूर द्वारा स्वतंत्र रूप से पुनर्जीवित किया गया था। मंत्री केएल राव ने दक्षिण में पानी की कमी और उत्तर में बाढ़ को दूर करने के लिए 1960 में गंगा और कावेरी नदियों को जोड़ने का सुझाव दिया था। 1980 में, जल संसाधन मंत्रालय ने जल विकास परियोजना को हिमालयी और प्रायद्वीपीय घटकों में विभाजित करते हुए एक रिपोर्ट प्रकाशित की। राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (NWDA) की स्थापना 1982 में तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने की थी। 2002 में, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को 2003 तक नदी जोड़ने की योजना पूरी करने और 2016 तक इसे लागू करने का निर्देश दिया। नदी-जोड़ने के कार्यक्रम पर राज्य की सहमति प्राप्त करने और व्यक्तिगत लिंक प्रस्तावों का मूल्यांकन करने के लिए दिसंबर 2002 में एक टास्क फोर्स का गठन किया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से 2012 में परियोजना शुरू करने का आग्रह किया। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार आई.एल.आर. कार्यक्रम को क्रियान्वित करने के लिए सितंबर 2014 में नदी जोड़ो पर एक विशेष समिति का गठन किया गया। इसके अतिरिक्त, आई.एल.आर. कार्यक्रम की प्रगति में तेजी लाने के लिए अप्रैल 2015 में नदियों को जोड़ने के लिए एक टास्क फोर्स की स्थापना की गई। 2014 में, मंत्रिमंडल ने केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना को मंजूरी दी, लेकिन पर्यावरणविदों के विरोध के कारण इसके कार्यान्वयन में देरी हुई। 2002 में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भारत सरकार को अगले 12-15 वर्षों के भीतर नदी जोड़ने की परियोजना को पूरा करने का आदेश दिया। इस आदेश के जवाब में, भारत सरकार ने एक टास्क फोर्स नियुक्त किया और वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, पारिस्थितिकीविदों, जीवविज्ञानियों और नीति निर्माताओं ने इस विशाल परियोजना की तकनीकी, आर्थिक और पर्यावरण के अनुकूल व्यवहार्यता पर विचार-विमर्श करना शुरू कर दिया।मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के 13 जिलों से मिलकर बना बुंदेलखंड क्षेत्र उत्तर मध्य भारत में स्थित है।
    2. बुन्देलखण्ड की सीमाओं के संबंध में एक जन किंवदंती के अनुसार “इत यमुना, उत नर्मदा, इत चंबल, उत टोंस। छत्रसाल सों लरन की,रही न काहू हौंस।” सीमाएँ मानी जाती है। इस क्षेत्र का इतिहास एक जैसा है और यह अक्सर साझा राज्यों का हिस्सा रहा है। बुंदेलखंड का नाम इसके सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले राजवंशों में से एक बुंदेला राजपूतों के नाम पर पड़ा है और इसकी बहुत सी महान पहचान चंदेलों की है, जिन्होंने सबसे लंबे समय तक शासन किया और वास्तुकला, कला और संस्कृति के महान निर्माता और संरक्षक थे। यह लगातार छोटे सामंतों में विभाजित रहा, जो या तो स्थानीय राजवंशों के प्रति निष्ठा रखते थे।
    3. भारत के बुंदेलखंड क्षेत्र में कृषि अर्थव्यवस्था है, जो कई चुनौतियों का सामना करती है, जिनमें शामिल हैं: 1.कम आय: इस क्षेत्र की प्रति व्यक्ति आय कम है, और ग्रामीण कृषि आय राष्ट्रीय औसत की तुलना में कम है। 2. कम साक्षरता: इस क्षेत्र में साक्षरता दर कम है। 3. वर्षा पर निर्भरता: यह क्षेत्र वर्षा पर निर्भर है, और अपर्याप्त सिंचाई और सूखे और जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता का सामना करता है। 4. कम कार्यबल भागीदारी: इस क्षेत्र में कार्यबल भागीदारी कम है। 5. कम भूमि जोत: इस क्षेत्र में औसत भूमि जोत कम है। 6. बुनियादी सुविधाओं तक पहुँच का अभाव: इस क्षेत्र में कम परिवारों के पास बुनियादी सुविधाओं तक पहुँच है। 7. महिला प्रधान परिवारों का उच्च अनुपात: इस क्षेत्र में महिला प्रधान परिवारों का उच्च अनुपात है। 8. बढ़ता हुआ ऋण: बढ़ते ऋण के कारण कई लोग आत्महत्या कर रहे हैं। 9.कृषि पर निर्भरता: अर्थव्यवस्था काफी हद तक कृषि पर निर्भर करती है, जो क्षेत्र की शुष्क जलवायु के कारण अनियमित वर्षा के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। 10.सूखे की संवेदनशीलता: बार-बार पड़ने वाले सूखे से कृषि उत्पादकता और आय स्थिरता पर काफी प्रभाव पड़ता है।11. सीमित औद्योगिक विकास: इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण औद्योगिक विकास का अभाव है, जिससे कृषि के अलावा रोजगार के सीमित विकल्प हैं। 12.उच्च गरीबी दर: बुंदेलखंड की आबादी का एक बड़ा हिस्सा गरीबी रेखा से नीचे रहता है।13. निम्न साक्षरता स्तर: बुंदेलखंड में साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से काफी कम है।14.जलवायु परिवर्तन के प्रभाव: बढ़ते तापमान और अप्रत्याशित वर्षा पैटर्न क्षेत्र की कमज़ोरियों को बढ़ाते हैं।
    4. केन-बेतवा लिंक परियोजना (केबीएलपी) क्या है?  केबीएलपी में केन नदी से पानी को बेतवा नदी में स्थानांतरित करने की परिकल्पना की गई है, जो यमुना की दोनों सहायक नदियाँ हैं। केन-बेतवा लिंक नहर की लंबाई 221 किलोमीटर होगी, जिसमें 2 किलोमीटर लंबी सुरंग भी शामिल है। जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार, इस परियोजना से 10.62 लाख हेक्टेयर (मध्य प्रदेश में 8.11 लाख हेक्टेयर और उत्तर प्रदेश में 2.51 लाख हेक्टेयर) भूमि को सालाना सिंचाई प्रदान करने, लगभग 62 लाख लोगों को पीने का पानी उपलब्ध कराने और 103 मेगावाट जलविद्युत और 27 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पन्न करने की उम्मीद है। यह नदियों को जोड़ने की राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना के तहत पहली परियोजना है, जिसे 1980 में तैयार किया गया था। इस योजना के प्रायद्वीपीय घटक के तहत 16 परियोजनाएं हैं, जिनमें केबीएलपी भी शामिल है। इसके अलावा हिमालयी नदियों के विकास योजना के तहत 14 लिंक प्रस्तावित हैं। केन-बेतवा लिंक परियोजना के दो चरण हैं। चरण- I में दौधन बांध परिसर और इसकी सहायक इकाइयों जैसे निम्न स्तरीय सुरंग, उच्च स्तरीय सुरंग, केन-बेतवा लिंक नहर और बिजली घरों का निर्माण शामिल होगा। चरण- II में तीन घटक शामिल होंगे – लोअर ओर्र बांध, बीना कॉम्प्लेक्स परियोजना और कोठा बैराज। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने दिसंबर 2021 में केबीएलपी परियोजना के लिए 44,605 करोड़ रुपये (2020-21 की कीमतों पर) को मंजूरी दी थी दौधन बांध 2,031 मीटर लंबा है, जिसमें से 1,233 मीटर मिट्टी का और बाकी 798 मीटर कंक्रीट का होगा। बांध की ऊंचाई 77 मीटर होगी। जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार, बांध से लगभग 9,000 हेक्टेयर भूमि जलमग्न हो जाएगी, जिससे 10 गांव प्रभावित होंगे।
    5. परियोजना कब तक पूरी होगी?  जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार, केबीएलपी परियोजना को आठ वर्षों में लागू करने का प्रस्ताव है।
    6. केन-बेतवा परियोजना समझौते पर कब हस्ताक्षर किए गए? 22 मार्च, 2021 को केन-बेतवा लिंक परियोजना को लागू करने के लिए जल शक्ति मंत्रालय और मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकारों के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।
    7. परियोजना की अवधारणा कैसे बनाई गई?  केन को बेतवा से जोड़ने के विचार को अगस्त 2005 में बड़ा बढ़ावा मिला, जब केंद्र और दोनों राज्यों के बीच विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने के लिए त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए। 2008 में, केंद्र ने केबीएलपी को एक राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया। बाद में, इसे सूखाग्रस्त बुंदेलखंड क्षेत्र के विकास के लिए प्रधान मंत्री पैकेज के हिस्से के रूप में शामिल किया गया था। अप्रैल 2009 में, यह निर्णय लिया गया था कि डीपीआर दो चरणों में तैयार की जाएगी। 2018 में, चरण- I, II और मध्य प्रदेश द्वारा प्रस्तावित अतिरिक्त क्षेत्र सहित एक व्यापक डीपीआर तैयार किया गया था। इसे अक्टूबर 2018 में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और केंद्रीय जल आयोग को भेजा गया था। केन-बेतवा लिंक जल संसाधन विकास के लिए राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना के प्रायद्वीपीय घटक के तहत 16 लिंकों में से एक है, तब से एनडब्ल्यूडीए, सीडब्ल्यूसी और जल संसाधन मंत्रालय द्वारा दो लाभार्थी राज्यों उत्तर प्रदेश (यूपी) और मध्य प्रदेश (एमपी) के बीच आम सहमति बनाने के प्रयास किए जा रहे थे। अंततः केंद्र और संबंधित राज्यों के बीच आम सहमति बन गई और केन-बेतवा लिंक की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने के लिए 25 अगस्त 2005 को मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार द्वारा एक त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।
    8. इससे किन क्षेत्रों को लाभ होगा?  यह परियोजना बुंदेलखंड में है, जो उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 13 जिलों में फैला है। जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार, यह परियोजना पानी की कमी वाले क्षेत्र, विशेष रूप से मध्य प्रदेश के पन्ना, टीकमगढ़, छतरपुर, सागर, दमोह, दतिया, विदिशा, शिवपुरी और रायसेन और उत्तर प्रदेश के बांदा, महोबा, झांसी और ललितपुर जिलों के लिए बहुत फायदेमंद होगी। मंत्रालय ने एक बयान में कहा, “इससे और अधिक नदी जोड़ो परियोजनाओं का मार्ग प्रशस्त होगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि पानी की कमी देश में विकास के लिए बाधक न बने।” 8. परियोजना के संभावित पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव क्या हैं?  नदी जोड़ो परियोजना को इसके संभावित पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव के लिए गहन जांच का सामना करना पड़ा है। इस परियोजना में पन्ना राष्ट्रीय उद्यान और टाइगर रिजर्व के हृदय स्थल के अंदर बड़े पैमाने पर वनों की कटाई शामिल होगी। साथ ही, पिछले कुछ वर्षों में विशेषज्ञ मांग कर रहे हैं कि केन के अधिशेष पानी के हाइड्रोलॉजिकल डेटा को गहन समीक्षा या नए अध्ययन के लिए सार्वजनिक किया जाना चाहिए। आईआईटी-बॉम्बे के वैज्ञानिकों द्वारा पिछले साल प्रकाशित एक अध्ययन में यहां तक पाया गया कि नदी जोड़ो परियोजनाओं के हिस्से के रूप में बड़ी मात्रा में पानी ले जाने से भूमि-वायुमंडल का परस्पर संबंध और प्रतिक्रिया प्रभावित हो सकती है और सितंबर में औसत वर्षा में 12 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है। सीईसी ने परियोजना की आर्थिक व्यवहार्यता पर सवाल उठाए थे, पहले ऊपरी केन बेसिन में अन्य सिंचाई विकल्पों को समाप्त करने की वकालत की थी। पन्ना राष्ट्रीय उद्यान के लगभग 98 वर्ग किलोमीटर का जलमग्न होना, जहां 2009 में बाघ स्थानीय रूप से विलुप्त हो गए थे, और लगभग दो से तीन मिलियन पेड़ों की कटाई परियोजना के सबसे विवादास्पद पहलुओं में से एक रही है। दौधन बांध राष्ट्रीय उद्यान के अंदर स्थित है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने पन्ना बाघ अभयारण्य के भीतर इसके निर्माण को मंजूरी दी, बावजूद इसके कि राष्ट्रीय उद्यानों और बाघ अभयारण्यों के भीतर इस तरह की भारी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की कोई मिसाल नहीं है। सीईसी ने यह भी बताया था कि परियोजना बाघों की सफल पुन: स्थापना को खत्म कर देगी जिसने बाघों की आबादी को स्थानीय विलुप्ति से वापस उछालने में मदद की थी बांध के निर्माण से छतरपुर जिले के 5,228 परिवार और पन्ना जिले के 1,400 परिवार जलमग्न होने और परियोजना से संबंधित अधिग्रहण के कारण विस्थापित हो जाएंगे। अधिग्रहण प्रक्रिया में स्थानीय लोगों द्वारा अपर्याप्त मुआवज़ा और पन्ना जिले के लिए कम लाभ के कारण बहुत सारे विरोध प्रदर्शन हुए हैं।
  • किसानों की काया पलटेगी मक्का की खेती

    किसानों की काया पलटेगी मक्का की खेती

    डॉ रबीद्र पस्तोर, सीईओ, ईफसल

    हरित क्रांति के जनक, नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. नॉर्मन ई. बोरलॉग, ने कहानी कि “पिछले दो दशकों में चावल और गेहूं में क्रांति देखी गई, अगले कुछ दशकों को मक्का युग के रूप में जाना जाएगा”।

    भारत में मक्का की खेती, बढ़ती घरेलू मांग, निर्यात वृद्धि की संभावना और उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकारी पहलों के कारण भविष्य में एक आशाजनक व्यावसायिक अवसर प्रस्तुत करती है। आने वाले वर्षों में बाजार में उल्लेखनीय रूप से उच्च उपज वाले संकर बीज, प्रसंस्करण और इथेनॉल उत्पादन जैसे मूल्यवर्धित उत्पादों के क्षेत्रों में विस्तार होने की उम्मीद है। भारत में मक्का का उत्पादन 2023-2024 में लगभग 35.67 मिलियन मीट्रिक टन था। मक्का उगाने वाले देशों में, भारत क्षेत्रफल में 4वें और उत्पादन में 7वें स्थान पर है।

    मक्का उत्पादक  तीन सबसे बड़े देश अमेरिका, ब्राजील और अर्जेंटीना  है। यह देश मुख्य रूप से चीन को निर्यात किए जाने वाले 197 मीट्रिक टन मक्का के वैश्विक व्यापार पर हावी हैं।

    भारतीय राज्यों में मध्य प्रदेश और कर्नाटक में मक्का के तहत सबसे अधिक क्षेत्र (प्रत्येक 15%) है, इसके बाद महाराष्ट्र (10%), राजस्थान (9%), उत्तर प्रदेश (8%) और अन्य हैं। कर्नाटक सालाना अनुमानित 12.5 मिलियन मीट्रिक टन मक्का का उत्पादन करता है, कर्नाटक और मध्य प्रदेश के बाद बिहार सबसे अधिक मक्का उत्पादक राज्य है। आंध्र प्रदेश राज्य की उत्पादकता सबसे अधिक है। अनाज की रानी मक्का न केवल इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने के लिए बल्कि भारत में बढ़ते पोल्ट्री, पशु आहार, स्टार्च और अन्य उद्योगों के कच्चे माल का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।

    मक्का की खेती और भारत में इसके भविष्य के बारे में मुख्य बिंदु:

    * बढ़ती मांग: मक्का एक मुख्य भोजन और पशु आहार है, जिसकी मांग पोल्ट्री उद्योग द्वारा संचालित है, जिससे मक्का उत्पादन के लिए एक सुसंगत बाजार बन रहा है। भारत में मक्के की मांग बहुत अधिक है और ईंधन के साथ 20% इथेनॉल मिलाने के सरकार के E20 आदेश के कारण इसमें वृद्धि होने की उम्मीद है।

    फ़ीड उद्योग: फ़ीड उद्योग मक्के का सबसे बड़ा उपभोक्ता सेक्टर है, जिसकी  कुल मांग का लगभग 60% हिस्सा मक्के से पूरी होती है।स्टार्च उद्योग: स्टार्च उद्योग लगभग 14% मक्के की खपत करता है, जिसका उपयोग बेकिंग, फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल और पेपर जैसे क्षेत्रों में किया जाता है।

    खाद्य प्रसंस्करण उद्योग: खाद्य प्रसंस्करण उद्योग लगभग 7% मक्के की खपत करता है। मानव उपभोग: लगभग 5 MMT मक्के का भोजन के रूप में सेवन किया जाता है।

    * उत्पादन क्षमता: भारत में बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए मक्का उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि का अनुमान है। वर्तमान देश में उत्पादन को तीन गुना करने की क्षमता है। इथेनॉल उत्पादन: वर्ष 2023-2024 में इथेनॉल उत्पादन के लिए लगभग 5.5 MMT मक्के का उपयोग किए जाने की उम्मीद है। सरकार 2022-23 से 2025-26 तक मक्के के उत्पादन में 10% की वृद्धि का लक्ष्य बना रही है। मांग को पूरा करने के लिए, भारत को 2024-25 तक उत्पादन को 346 लाख टन से बढ़ाकर 420-430 लाख टन और 2029-30 तक 640-650 लाख टन करने की आवश्यकता है।

    * सरकारी समर्थन: सरकारी नीतियाँ उच्च उपज वाले संकर बीजों और उन्नत कृषि पद्धतियों को अपनाने सहित उपज और उत्पादकता में सुधार करने की पहल के माध्यम से मक्का की खेती को बढ़ावा दे रही हैं। मक्का उत्पादन बढ़ाने के कुछ तरीकों में शामिल हैं: उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की पेशकश, खरीद आश्वासन प्रदान करना, परिवहन रियायतें प्रदान करना, मक्का मूल्य श्रृंखला में मेगा सहकारी समितियों को शामिल करना और उच्च उपज वाली किस्म के बीजों के उपयोग का विस्तार करना।

    * इथेनॉल उत्पादन: भारत ने हाल ही में राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति (एनपीबी) 2018 के तहत मक्का और अनाज आधारित इथेनॉल के मिश्रण की अनुमति देने के लिए एक नई नीति  शुरू की है। इसके अलावा, इथेनॉल पेट्रोल के मिश्रण का लक्ष्य 2013-14 में सिर्फ 1.53 प्रतिशत से कई गुना बढ़कर 2021-22 में 10 प्रतिशत, 2022-23 में 12.1 प्रतिशत हो गया है और 2024-25 तक 20 प्रतिशत और 2029-30 तक 30 प्रतिशत मिश्रण का लक्ष्य हासिल करने की उम्मीद है। वर्तमान में, अनाज आधारित डिस्टिलरी तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) वर्ष 2022-23 में अनुमानित 494 करोड़ लीटर इथेनॉल की आपूर्ति कर रही हैं, जो मुख्य रूप से चीनी के रस, गन्ने के गुड़ और चावल से प्राप्त होता है, जिसे 2024-25 तक बढ़ाकर 1,016 करोड़ लीटर करने की जरूरत है। नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों पर बढ़ते फोकस से मक्का आधारित इथेनॉल उत्पादन के अवसर खुलते हैं,  जिससे मांग में और वृद्धि होगी ।

    मक्का क्षेत्र में संभावित व्यावसायिक क्षेत्र:

    * बीज उत्पादन: विविध भारतीय जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल उच्च उपज वाली संकर मक्का किस्मों का विकास और विपणन करने की ज़रूरत है। भारत में मक्का बीज तैयार कर विपणन करनेवाली शीर्ष कंपनियाँ बेयर एजी, कॉर्टेवा एग्रीसाइंस, कावेरी सीड्स, नुजिवीडू सीड्स लिमिटेड, व सिंजेन्टा ग्रुप है। भारत में मक्का के संकर बीजों की मांग काफी अधिक है, तथा संकर किस्में अपनी बेहतर उपज क्षमता, रोग प्रतिरोधक क्षमता और अनुकूलन क्षमता के कारण बाजार में छाई हुई हैं, जिसके कारण किसानों में पारंपरिक खुले परागण वाली किस्मों की तुलना में संकर मक्का बीजों को चुनने की प्रवृत्ति बढ़ रही है; वर्तमान में भारत की 60% से अधिक मक्का खेती वाले क्षेत्र में संकर बीजों का उपयोग किया जाता है।

    * फसल प्रसंस्करण और मूल्यवर्धित उत्पाद: मक्का को मकई के गुच्छे, मकई स्टार्च, मकई तेल और पशु चारा जैसे उत्पादों में संसाधित करने के लिए सुविधाएँ स्थापित करने के लिए सरकार द्वारा अनेक योजनाओं का संचालन किया जा रहा है।

    * अनुबंध खेती: प्रसंस्करण के लिए गुणवत्ता वाले मक्का की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए किसानों के साथ साझेदारी करने के लिए अनेक प्रसंस्करण करनेवाली कम्पनियों द्वारा अनुबंधित खेती प्रारंभ की गई है।

    * भंडारण और रसद: कटाई के बाद के नुकसान का प्रबंधन करने और कुशल बाजार पहुँच की सुविधा के लिए भंडारण बुनियादी ढांचे में निवेश करने हेतु सरकार द्वारा अनेक तरह के अनुदान आधारित योजनाओं का लाभ दिया जा रहा है।

    * निर्यात बाजार विकास: अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मक्का निर्यात करने के अवसरों की खोज करना, विशेष रूप से उच्च मांग वाले क्षेत्रों में। उच्च घरेलू मांग के कारण, 2023-2024 में भारत का मक्का निर्यात 14,42,671.48 मीट्रिक टन (MT) था, जिसमें पिछले वर्ष की तुलना में मात्रा में 58% की गिरावट और डॉलर मूल्य में 60% की गिरावट थी। 2023-2024 में भारत से मक्का के लिए शीर्ष निर्यात देश वियतनाम, नेपाल, बांग्लादेश, मलेशिया और थाईलैंड थे। इस फसल की बढ़ती घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय मांग के परिणामस्वरूप, 2025 में मक्का निर्यात के लिए भारत का भविष्य आशाजनक हो सकता है।

    विचार करने के लिए चुनौतियाँ:

    * जलवायु परिवर्तनशीलता: मक्का भावी पीढ़ियों के लिए अवसर की फसल है, जबकि लगातार बढ़ते चावल के कारण सिंधु-गंगा के मैदानी इलाकों में चावल उगाने वाले क्षेत्रों में जल स्तर कम हो रहा है, जिसके परिणामस्वरूप आर्थिक और पारिस्थितिक स्थिति खराब हो रही है। उच्च उपज देने वाली एकल क्रॉस की शुरुआत के साथ, संकर मक्का खरीफ मौसम में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सिंचित स्थितियों में चावल के स्थान पर लाभदायक और सबसे उपयुक्त विकल्प बन गया है। परिणामस्वरूप, सिंचित क्षेत्र में क्षेत्रों का विस्तार करने, बिहार में रबी में मक्का का विस्तार करने, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और पूर्वोत्तर राज्यों में रबी में मक्का के साथ चावल की परती भूमि और उत्तरी भारत में आलू, हरी मटर और सरसों की फसल के बाद वसंत मक्का की खेती करने का अवसर है। इन क्षेत्रों में मक्का की खेती में विविधता लाने से उत्पादन में वृद्धि होगी।जोखिम रहित फसल सघनता जो मक्का आधारित फसल प्रणाली के विविधीकरण और गहनीकरण की योजना में भी बहुत अच्छी तरह से फिट होगी। लेकिन सूखे और बाढ़ मक्का की उपज को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकते हैं, जिसके लिए अनुकूलन रणनीतियों की आवश्यकता होती है।

    * कीट और रोग प्रबंधन: उपज को अधिकतम करने के लिए प्रभावी कीट और रोग नियंत्रण प्रथाओं को लागू करना आवश्यक है जिसके लिये बाज़ार में विभिन्न कम्पनियों द्वारा तरह-तरह के ग़ैर रासायनिक व रासायनिक उत्पादक निरंतर प्रस्तुत किए जा रहे है।

    * बाजार में उतार-चढ़ाव: कीमतों में उतार-चढ़ाव किसानों और व्यवसायों के लिए चुनौतियां खड़ी कर सकता है। इस के नुक़सान से किसानों को बचाने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकार द्वारा ख़रीदी की व्यवस्था की गई है।

    कुल मिलाकर, इसकी बढ़ती घरेलू मांग, निर्यात की संभावना और सरकारी समर्थन के साथ, भारत में मक्का की खेती भविष्य के व्यावसायिक उपक्रमों के लिए एक आशाजनक अवसर प्रस्तुत करती है, विशेष रूप से उच्च उपज वाली किस्मों, प्रसंस्करण और मूल्यवर्धित उत्पादों पर ध्यान केंद्रित कर किसानों की आय को बढ़ाया जा सकता है।

  • स्वामित्व योजना में पलीता लगा रहा राजस्व महकमा

    स्वामित्व योजना में पलीता लगा रहा राजस्व महकमा

    डॉ रबीद्र पस्तोर, सीईओ, ईफसल

    भारत में भूमि अभिलेख प्रणाली विभिन्न ऐतिहासिक युगों में गतिशील रूप से विकसित हुई है। शेरशाह सूरी और मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान, भूमि के वर्गीकरण और माप की शुरूआत के साथ उल्लेखनीय प्रयास किए गए, जिसने व्यवस्थित भूमि अभिलेखों की नींव रखी (ठाकुर एट अल.; वेंकटेश, 2005)। हालाँकि, यह ब्रिटिश राज के दौरान था कि विभिन्न भूमि अधिनियम विभिन्न रियासतों में पेश किए गए, जिससे भूमि अभिलेखों के रखरखाव में असंगति आई। स्वतंत्रता से पहले, जमींदारों के पास केंद्रित भूमि थी, जो मुख्य रूप से राजस्व आकलन के लिए रिकॉर्ड प्रणाली का उपयोग करते थे। स्वतंत्रता के बाद, भारत ने ब्रिटिश भूमि अभिलेख प्रणाली को बरकरार रखा, जो शुरू में राजस्व संग्रह पर केंद्रित थी।

    राष्ट्रीय भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (एनएलआरएमपी) की स्थापना 2008 में की गई थी। तब से, 2016 में इसका नाम बदलकर डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (डीआईएलआरएमपी) कर दिया गया और इसे केंद्रीय क्षेत्र योजना के अंतर्गत लाया गया। यह दो योजनाओं, राजस्व और प्रशासन को सुदृढ़ बनाना और भूमि अभिलेखों को अद्यतन करना (एसआरए और यूएलआर) और भूमि अभिलेखों का कम्प्यूटरीकरण (सीएलआर) का विलय है।

    स्वामित्व, पंचायती राज मंत्रालय की एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना है, जो ड्रोन तकनीक का उपयोग करके भूमि पार्सल का मानचित्रण करके संपत्ति के मालिकों को कानूनी स्वामित्व कार्ड (संपत्ति कार्ड/शीर्षक विलेख) जारी करने के साथ गांव के घरेलू मालिकों को ‘अधिकारों का रिकॉर्ड’ प्रदान करती है।उद्देश्य

    ग्रामीण नियोजन के लिए सटीक भूमि अभिलेखों का निर्माण और संपत्ति से संबंधित विवादों को कम करना। ग्रामीण भारत में नागरिकों को ऋण लेने और अन्य वित्तीय लाभ लेने के लिए वित्तीय परिसंपत्ति के रूप में अपनी संपत्ति का उपयोग करने में सक्षम बनाकर वित्तीय स्थिरता लाना। संपत्ति कर का निर्धारण, जो सीधे उन राज्यों में जीपी को मिलेगा जहां इसे हस्तांतरित किया गया है या फिर राज्य के खजाने में जोड़ा जाएगा। सर्वेक्षण बुनियादी ढांचे और जीआईएस मानचित्रों का निर्माण, जिनका उपयोग किसी भी विभाग द्वारा उनके उपयोग के लिए किया जा सकता है। जीआईएस मानचित्रों का उपयोग करके बेहतर गुणवत्ता वाली ग्राम पंचायत विकास योजना (जीपीडीपी) तैयार करने में सहायता करना। यह योजना ग्रामीण आबादी क्षेत्रों में संपत्ति के स्पष्ट स्वामित्व की स्थापना की दिशा में एक सुधारात्मक कदम है, जिसमें ड्रोन तकनीक का उपयोग करके भूमि पार्सल का मानचित्रण किया जाएगा और संपत्ति के मालिकों को कानूनी स्वामित्व कार्ड (संपत्ति कार्ड/शीर्षक विलेख) जारी करने के साथ गांव के घरेलू मालिकों को ‘अधिकारों का रिकॉर्ड’ प्रदान किया जाएगा। देश में लगभग 6.62 लाख गाँव हैं जिन्हें और भी अधिक एकीकृत किया जाएगा।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी SVAMITVA योजना के तहत 50 लाख से अधिक प्रॉपर्टी कार्ड्स का वितरण करेंगे, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक सुधार और प्रॉपर्टी विवादों को कम करने में मदद मिलेगी. ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल कर 3.1 लाख गांवों में सर्वेक्षण पूरा किया गया है. प्रॉपर्टी विवादों को कम करने में मदद मिलेगी. ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल कर 3.1 लाख गांवों में सर्वेक्षण पूरा किया गया है. 3.1 लाख से अधिक गांवों में ड्रोन सर्वेक्षण पूरा हो चुका है, जिसमें टार्गेटेड गांवों का 92% हिस्सा शामिल है. अब तक लगभग 1.5 लाख गांवों के लिए लगभग 2.2 करोड़ संपत्ति कार्ड तैयार किए जा चुके हैं.

    Dr. Ravindra Pastor

    Co-Founder & CEO E-FASAL at Electronics, Farming Solutions Associates Pvt. Ltd. Indore, Social e-Commerce

  • जंगलों से दोस्ताना बढ़ाने में सफल हुआ वन मेला

    जंगलों से दोस्ताना बढ़ाने में सफल हुआ वन मेला


    भोपाल, 23 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर) राज्य के वन विभाग ने पिछले कुछ सालों में जिस तरह से वन मेलों का आयोजन किया है,उसके सकारात्मक नतीजे सामने आने लगे हैं। जंगलों से लघुवनोपज एकत्रित करने वाले वनवासी हों या बीज बैंक बनाकर खेती को बढ़ावा देने वाले आदिवासी सभी ने प्रोत्साहन पाकर अपना कारोबार विकसित कर लिया है। इनमें से कुछ तो अपना माल विदेशों में भी भेजने लगे हैं। वनमेलों के आयोजन से आम जनता का रुझान भी जड़ी बूटियों की ओर बढ़ा है और इनकी खपत स्थानीय बाजार में भी बढ़ती जा रही है।

    शुभम राठौरःसतपुड़ा के जंगलों से एकत्रित जड़ी बूटियों को विदेशों में लोकप्रिय बनाया


    जड़ी बूटियों का एक्सपोर्ट करने वाले इटारसी के बनवारी राठौर ने बताया कि शुभांशु हर्बल्स नाम से उन्होंने एक फर्म बनकर जड़ी बूटियों का एकत्रीकरण और विपणन शुरु किया था। आज उनका माल पूरी दुनिया के कई देशों में बिक रहा है। उनकी सर्वाधिक कमाई डालरों में हो रही है जिसकी वजह से वे अपने कारोबार को बढ़ाने में सफल हुए हैं। उन्होंने बताया कि उनके पास एनपीओपी, एनोडी, एफएफएल, और इयू जैसे आवश्यक आर्गेनिक सर्टिफिकेट हैं। वे विश्व की सभी बड़ी मंडियों में अपना माल बेच सकते हैं। इस कारोबार से उन्होंने सैकड़ों वनवासियों और किसानों को आत्मनिर्भर बनाया है। वे हर साल मुंबई में भी इसी तरह के वन मेले में शामिल होते हैं। यहां सतपुड़ा और विंध्याचल पर्वतों से एकत्रित कराई गई जड़ी बूटियों की बहुत डिमांड होती है।वन विभाग ने वन मेलों के आयोजन से उन्हें अपना कारोबार विकसित करने की राह सुझाई थी जिस पर चलकर वे अब एक सफल व्यवसायी बन गए हैं।उनके पुत्र शुभम राठौर ने इस कारोबार को वैश्विक प्लेटफार्म पर स्थापित करने में सफलता पाई है।

    सुजाता जैनः महिलाओं को रोजगार दिलाने की मुहिम कारगर


    जैन महिला गृह उद्योग नामक स्व सहायता समूह की सुजाता जैन ने बताया कि उन्होंने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए किचिन के जरूरी व्यंजनों को तैयार करने का कारोबार शुरु किया है। उन्होंने बताया कि उनकी कोई दूकान नहीं है लेकिन उनके उत्पाद इतने लोकप्रिय हो रहे हैं कि लोग आनलाईन आर्डर देकर या घर से स्वयं आकर ले जाते हैं। उन्होंने बताया किवे अपना कारोबार महिलाओं की सुविधा को देखकर चलाती हैं जिससे वे अपने घर के कामकाज के बाद बचे समय का उपयोग करके पैसे भी कमा लेती हैं। वन मेले ने उन्हें अपना माल विक्रय करने और लोगों तक पहुंच बनाने के लिए सुलभ मंच प्रदान किया है। वन मेले से हमें लोगों को अपना हुनर दिखाने का मौका मिला है। शहरों में आमतौर पर शुद्ध तेल और छने पानी से निर्मित पापड़ ,खीचले, नमकीन ,केला चिप्स, जीरामन नमक आदि तैयार करना कठिन होता है। ऐसे में हमारे उत्पाद लोगों के लिए सहूलियत साबित होंगे।

    सेवकराम मरावीः दुनिया भर के बीज बैंकों के बीच अनूठा आदिवासी बीज बैंक.


    अनूपपुर जिले की पुष्पराजगढ़ तहसील के बीजापुरी गांव से आए बीज संरक्षक सेवकराम मरावी ने बताया कि उन्होंने वन विभाग और कृषि विभाग के सहयोग से सामुदायिक बीज बैंक विकसित किया है। इस बीज भंडार में उनके पास भारत के वे तमाम बीज उपलब्ध हैं जिन्हें मूल बीज कहा जाता है। इन बीजों में गुणात्मक सुधार करके ही आज के बीज बनाए गए हैं। उन्होंने कहा कि देशी बीजों के सरंक्षण और संवर्धन से उन्होंने समाज के प्रति अपना दायित्व पूरा करने में सफलता पाई है। उन्होंने बताया कि अब वे इस बीज बैंक को और विशाल रूप प्रदान कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनके पास काला नमक चावल और लुचई चावल जैसी पारंपरिक बीज भी उपलब्ध हैं। लुचई चावल की किस्म बहुत खुशबूदार होती है और पोषण के मामले में भी बेजोड़ है।


    वन मेले के आयोजन में आम जन की बढ़ती भागीदारी ने जल, जंगल, जमीन के साथ मानव सभ्यता के कदमताल को सुरीले संगीत के रूप में विकसित किया है।जिस तरह कांतारा(Kantara) फिल्म ने पिछले साल आम जनमानस का ध्यान आकर्षित किया था उसी तरह वनमेले में आम जनता की रुचि बढ़ती जा रही है। आम जन का जंगलों से दोस्ताना बढ़ाने में ये वन मेला जिस तरह सफल हो रहा है उसे देखकर उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले समय में भारत अपनी प्रचुर वन संपदा का एक नया खजाना बनकर दुनिया में प्रतिष्ठा अर्जित करेगा।

  • सहकारी मत्स्य पालन से बढ़ेगा एक्सपोर्ट

    सहकारी मत्स्य पालन से बढ़ेगा एक्सपोर्ट

    भोपाल, (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर) भारत सरकार ने देश में सहकारी आंदोलन को मजबूत करने और अगले पांच वर्षों में देश के कवर न किए गए पंचायत/गांव में नई बहुउद्देशीय पीएसीएस या प्राथमिक डेयरी/मत्स्य सहकारी समितियों की स्थापना करके जमीनी स्तर तक अपनी पहुंच को मबजूब बनाने के लिए योजना को मंजूरी दी है। पंद्रह फरवरी 2023 को लिए गए फैसले के माध्यम से भारत सरकार के मत्स्य विभाग की निम्नलिखित योजनाओं सहित विभिन्न भारत सरकार की योजनाओं का तालमेल करके मत्स्य पालन को बढावा देने की प्रक्रिया शुरु की है।

    1. प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना (पीएमएमएसवाई) – पीएमएमएसवाई का उद्देश्य मछली उत्पादन, उत्पादकता, गुणवत्ता, प्रौद्योगिकी, कटाई के बाद के बुनियादी ढांचे और प्रबंधन, आधुनिकीकरण और मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने में बड़े अंतर को दूर करना है। इस योजना के तहत, लाभार्थी कुल परियोजना लागत/इकाई लागत के 40% से 60% तक की वित्तीय सहायता के लिए पात्र हैं।
    • II. मत्स्य पालन और जलीय कृषि अवसंरचना कोष (एफआईडीएफ) – एफआईडीएफ का उद्देश्य समुद्री और अंतर्देशीय मत्स्य पालन क्षेत्र दोनों में ढांचागत सुविधाएं बनाना है। इस योजना में बर्फ संयंत्रों का निर्माण, कोल्ड स्टोरेज का विकास, मछली परिवहन और कोल्ड चेन नेटवर्क अवसंरचना, ब्रूड बैंकों की स्थापना, हैचरी का विकास, मछली प्रसंस्करण इकाइयाँ, मछली चारा मिलों/संयंत्रों और आधुनिक मछली बाजारों का विकास शामिल है। एफआईडीएफ के तहत परियोजनाएं उपर्युक्त अवसंरचना सुविधाओं के विकास के लिए प्रति वर्ष 3% की ब्याज सब्सिडी के लिए पात्र हैं।

    मत्स्य पालन एवं अन्य सहकारी समितियों सहित नई प्राथमिक सहकारी समितियों की स्थापना की यह योजना एनसीडीसी द्वारा राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड), राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी), राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड (एनएफडीबी), राष्ट्रीय स्तरीय सहकारी संघों और राज्य सरकारों के सहयोग से कार्यान्वित की जा रही है।

    इसके अलावा, एनसीडीसी ने भारत के तटीय राज्यों अर्थात् आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, गोवा, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और ओडिशा में मत्स्य कृषक उत्पादक संगठनों (एफपीपीओ) के रूप में विकास के लिए 910 प्राथमिक मत्स्य सहकारी समितियों का चयन किया है और सहकारी क्षेत्र में 70 नए एफएफपीओ पंजीकृत किए हैं। एनसीडीसी ने 44 गहरे समुद्र में चलने वाले ट्रॉलरों की खरीद के लिए महाराष्ट्र सरकार और गुजरात की सहकारी समिति को वित्तीय सहायता भी प्रदान की है।

    सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग ने राज्य की आय बढ़ाने के लिए केन्द्रीय योजनाएं लागू करने पर जोर दिया है।

    उपरोक्त कदम मछली उत्पादन में लगे सीमांत मछुआरों सहित छोटे और सीमांत किसानों को अपेक्षित फॉरवर्ड और बैकवर्ड लिंकेज, कौशल विकास, प्रसंस्करण और कोल्ड चेन अवसंरचना सुविधाएं प्रदान करेंगे, जिससे उन्हें अपनी आय बढ़ाने में मदद मिलेगी। अभिसरण के लिए पहचानी गई योजनाओं के तहत लाभ उठाकर, सीमांत मछुआरे विभिन्न मत्स्य पालन और जलीय कृषि से संबंधित बुनियादी सुविधाओं का आधुनिकीकरण/उन्नयन और स्थापना करने में सक्षम होंगे, जिससे उन्हें अपनी उत्पादकता में सुधार करने में मदद मिलेगी।

    यह बात सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में कही।

  • बिजली बेचकर आय बढ़ा सकेंगे किसानःराकेश शुक्ल

    बिजली बेचकर आय बढ़ा सकेंगे किसानःराकेश शुक्ल


    भोपाल, 23 अक्टूबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा मंत्री राकेश शुक्ल ने कहा है कि भारत सरकार की प्रधानमंत्री कुसुम योजना जल्दी ही किसानों को बिजली कारोबारी के रूप में भी सक्षम बनाने जा रही है। इस योजना के कार्यान्वयन को सफल बनाने के लिए सरकार सौर ऊर्जा का लागत व्यय घटाने पर ध्यान केन्द्रित कर रही है। आज हमारे पास प्रदेश की ही फैक्टरियों में बने सोलर पैनलऔर मोटर आदि सामान उपलब्ध है।इससे हम जल्दी ही सौर बिजली के माध्यम से ऊर्जा आत्मनिर्भरता का लक्ष्य हासिल कर लेंगे।


    राजधानी में आयोजित एक पत्रकार वार्ता में उन्होंने बताया कि हमारे प्रदेश में कुल सात हजार मेगावाट सौर बिजली का उत्पादन हो रहा है जिसे हम अन्य राज्यों को बेचकर अपनी आय बढ़ाने में सफल हुए हैं। बारह साल पहले हम केवल पांच सौ मेगावाट बिजली बनाते थे जो अब लगातार बढ़ती जा रही है। मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव ने सोलर बिजली का उत्पादन बढ़ाने में जो रुचि दिखाई है उससे हम जल्दी ही सोलर ऊर्जा उत्पादन के अग्रणी राज्यों में शामिल हो जाएंगे।जल्दी ही हम सोलर ऊर्जा संयंत्रों से बीस हजार मेगावाट तक बिजली बनाने लगेंगे।


    सरकार ने इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए सागर और धार में तीन तीन सौ मेगावाट के सोलर पार्क बनाने के लिए मंजूरी प्रदान की है। रीवा जिले की गुढ़,ओंकारेश्वर और नीमच के अलावा मुरैना में भी सोलर बिजली संयंत्र स्थापित किए जा रहे हैं। चंबल के बीहड़ों में हम बिजली का उत्पादन करके लोगों को आत्मनिर्भर बना सकें इसके भी प्रयास किए जा रहे हैं। रीवा में स्थापित 750 मेगावाट क्षमता का सबसे बड़ा सोलर प्लांट राज्य की सफलता का उद्घोष कर रहा है। इस परियोजना का शुभारंभ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कर कमलों से हुआ था।


    उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री कुसुम योजना से हम किसानों को अन्नदाता के साथ ऊर्जा दाता भी बना रहे हैं। ये दो मेगावाट की बिजली योजनाएं किसान अपनी ही जमीनों पर लगा सकेंगे। यहां उत्पादित बिजली पावर मैनेजमेंट कंपनी सवा तीन रुपए प्रति यूनिट की दर से खरीद रही है। कुसुम स परियोजना में उद्योगों के लिए सस्ती बिजली दिन के वक्त उपलब्ध कराने का कार्य किया जा रहा है। कुसुम ब योजना में किसानों को अपनी जमीन पर केवल बोर कराना होगा। सोलर पंप, पैनल और बैटरी आदि सभी सामान इस योजना में सरकार उपलब्ध कराएगी। ये सभी सामान अच्छी गुणवत्ता का होगा और किसान को अगले पच्चीस सालों तक बिजली के बिल से मुक्ति मिल जाएगी। सरकारी भवनों पर सोलर रूफटाप लगाए जा रहे हैं। रेस्को परियोजना के इन कार्यों से सरकारी भवनों का बिजली बिल घटाया जा रहा है।

  • दुनिया की हर थाली में हो भारत का जैविक खाद्यान्नःप्रधानमंत्री मोदी

    दुनिया की हर थाली में हो भारत का जैविक खाद्यान्नःप्रधानमंत्री मोदी

    नई दिल्ली,16 अगस्त(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। सरकार ने अनुसंधान बुनियादी ढांचे की समीक्षा, जलवायु के अनुकूल फसल किस्मों के विकास, एक करोड़ किसानों के बीच प्राकृतिक खेती को बढ़ावा और जैव-इनपुट संसाधन केंद्रों की स्थापना जैसी पहल के जरिये कृषि उत्पादकता को बढ़ाने के लिए एक व्यापक रणनीति की रूपरेखा तैयार की है।
    इसके अलावा सरकार के अन्‍य प्रयासों में दलहन एवं तिलहन में आत्मनिर्भरता हासिल करना, सब्जी उत्पादन क्लस्टर विकसित करना, कृषि में डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को लागू करना और नाबार्ड के जरिये झींगा पालन को प्रोत्‍साहित करना शामिल है। इन पहलों का उद्देश्य कृषि को आधुनिक बनाना और कृषि क्षेत्र में सतत विकास सुनिश्चित करना है। आइए, सरकार द्वारा इस क्षेत्र को उन्नत बनाने और इस संबंध में लागू सरकारी योजनाओं की प्रगति के बारे में चर्चा करते हैं।

    1. प्राकृतिक खेती
      माननीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केंद्रीय बजट में कृषि को प्राथमिकता दी है। उन्‍होंने प्रमाणन एवं ब्रांडिंग द्वारा समर्थित 1 करोड़ किसानों के समक्ष प्राकृतिक खेती करने का प्रस्ताव रखा है। इसका कार्यान्वयन इच्छुक ग्राम पंचायतों के साथ वैज्ञानिक संस्थानों के जरिये किया जाएगा। इसके अलावा आवश्यकता पर आधारित 10,000 बीआरसी स्थापित किए जाएंगे, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर सूक्ष्म उर्वरक एवं कीटनाशक विनिर्माण नेटवर्क स्‍थापित होगा।
      क्या है प्राकृतिक खेती
      प्राकृतिक खेती रसायन मुक्त खेती है, जिसमें पशुधन को शामिल करते हुए कृषि के प्राकृतिक तरीके और भारतीय पारंपरिक ज्ञान पर आधारित विविध फसल व्‍यवस्‍था शामिल हैं। इसका उद्देश्‍य जलवायु के प्रति बेहतर अनुकूलता के साथ मृदा स्‍वास्‍थ्‍य में सुधार लाने और किसानों की इनपुट लागत को कम करने के लिए गैर-सिंथेटिक रासायनिक इनपुट का उपयोग करना है।
      भारत में प्राकृतिक खेती
      भारत सरकार ने परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) के तहत सीमित क्षेत्रों में ‘भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (बीपीकेपी)’ के जरिये 2019-20 में प्राकृतिक खेती की शुरुआत की थी। बीपीकेपी को राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन (एनएमएनएफ) के जरिये मिशन मोड में आगे बढ़ाने की योजना है।
      एनएमएनएफ, को खेती की प्रकृति पर आधारित टिकाऊ प्रणालियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्रस्तावित किया जा रहा है। इसमें कृषि इनपुट भी शामिल है ताकि बाहर से खरीदे गए इनपुट पर निर्भरता कम होगी, मृदा क्वालिटी बेहतर होगी और इनपुट लागत में कमी आएगी। साथ ही इसमें विस्तार एवं अनुसंधान संस्थानों की खेतों पर कृषि-पारिस्थितिकी अनुसंधान एवं ज्ञान पर आधारित विस्तार क्षमताओं को मजबूत करना, प्राकृतिक खेती के फायदे, संभावना एवं कार्यप्रणाली पर बेहतर ज्ञान एवं प्रस्‍तुति के लिए प्राकृतिक खेती कर रहे किसानों के अनुभव और वैज्ञानिक विशेषज्ञता को साथ लाते हुए उनसे सीखना, प्राकृतिक रूप से उगाए गए रसायन मुक्त उत्पादों के लिए वैज्ञानिक तौर पर समर्थित एवं किसानों के अनुकूल आसान प्रमाणन प्रक्रियाएं स्थापित करना और प्राकृतिक रूप से उगाए जाने वाले रसायन मुक्त उत्पादों के लिए एकल राष्ट्रीय ब्रांड स्‍थापित करना और उसका प्रचार करना शामिल हैं।
      चार वर्षों (2022-23 से 2025-26) की अवधि के लिए इस योजना का कुल परिव्यय 2,481.00 करोड़ रुपये है।
    2. दलहन एवं तिलहन में आत्मनिर्भरता के लिए सरकारी पहल
      दलहन एवं तिलहन में आत्मनिर्भरता हासिल करना भारत सरकार की प्राथमिकता रही है। इसके लिए विभिन्न पहल एवं योजनाएं शुरू की गई हैं:
      राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एनएफएसएम)
      भारत सरकार द्वारा 2018-19 से देश में खाद्य तेल में उत्‍पादन बढ़ाकर, आयात का बोझ कम करने के उद्देश्‍य से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन- तिलहन (एनएफएसएम-ओएस) को लागू किया गया है।
      इसका उद्देश्य देश में तिलहन (मूंगफली, सोयाबीन, रेपसीड एवं सरसों, सूरजमुखी, कुसुम, तिल, नाइजर, अलसी एवं अरंडी) के उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि करना है। साथ ही, पाम ऑयल एवं वृक्ष आधारित तिलहन (जैतून, महुआ, कोकम, जंगली खुबानी, नीम, जोजोबा, करंज, सिमरोबा, तुंग, च्यूरा एवं जेट्रोफा) का क्षेत्र विस्तार करना है।
      सरकार के प्रयासों के परिणामस्वरूप तिलहन की खेती के लिए कुल क्षेत्र 2014-15 में 2.56 करोड़ हेक्टेयर से बढ़कर 2023-24 में 30.08 करोड़ हेक्टेयर हो गया है, जो 17.5 % की वृद्धि दर्शाता है। परिणामस्‍वरूप पिछले 9 वर्षों में खाद्य तेलों का घरेलू उत्पादन 2015-16 में 86.30 लाख टन के मुकाबले 40 % से अधिक बढ़कर 2023-24 में 121.33 लाख टन हो गया है। घरेलू मांग में भारी उछाल के बावजूद अब आयात पर हमारी निर्भरता 63.2 % से घट कर 57.3% हो गयी है । राष्ट्रीय पाम ऑयल मिशन के तहत भी हमारे किसानों की मदद से तिलहन की खेती के लिए क्षेत्र बढ़कर 4.7 लाख हेक्टेयर तक हो गया है।
      न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी)
      एमएसपी हमारे किसानों के लिए उनकी उपज की वास्तविक लागत के मुकाबले 50 प्रतिशत अधिक मूल्‍य सुनिश्चित करता है । इस प्रकार कृषि लागत पर आकर्षक रिटर्न मिलता है। आज एमएसपी सबसे अधिक है । एक दशक पहले के मुकाबले मसूर के एमएसपी में 117 प्रतिशत, मूंग के एमएसपी में 90 प्रतिशत, चना दाल के एमएसपी में 75 प्रतिशत, तुअर और उड़द के एमएसपी में 60 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। नाफेड और एनसीसीएफ, किसानों को दलहन और मसूर की खेती में विविधता लाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। वे किसानों के साथ सरकारी खरीद के लिए एक निर्धारित मूल्‍य पर 5 साल का अनुबंध करने के लिए तैयार हैं। यह भारत सरकार द्वारा उठाया गया एक बड़ा कदम है ।
    3. अधिक उपज और जलवायु के अनुकूल किस्में: भारत में समय की मांग
      भारत सरकार ने देश भर में कृषि पद्धतियों में क्रांतिकारी बदलाव लाने के उद्देश्य से 32 क्षेत्रीय व बागवानी फसलों में 109 नई उच्च उपज देने वाली और जलवायु-अनुकूल किस्मों को पेश करने की एक महत्वपूर्ण पहल की घोषणा की है। इन नई किस्मों को फसल उत्पादकता बढ़ाने और सस्‍टेनेबिलिटी सुनिश्चित करते हुए विविध जलवायु परिस्थितियों के अनुकूललिए विकसित किया गया है।
      वर्ष 2014-15 से 2023-24 के दौरान अधिक उपज देने वाली कुल 2,593 किस्में जारी की गईं। इनमें 2,177 जलवायु के अनुकूल (कुल का 83 प्रतिशत) जैविक एवं अजैविक तनाव प्रतिरोध के साथ और 150 जैव-फोर्टिफाइड फसल किस्में शामिल हैं। इसके अलावा 56 फसलों की 2,200 से अधिक किस्मों के 1 लाख क्विंटल से अधिक ब्रीडर बीजों का उत्पादन किया जा रहा है। जलवायु के अनुकूल प्रौद्योगिकी को अपनाए जाने से असामान्य वर्षों के दौरान भी उत्पादन में वृद्धि हुई है।
    4. कृषि में बदलाव: डिजिटल फसल सर्वेक्षण में क्रांति लाने के लिए डीपीआई पहल
      कृषि में डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई) को लागू किए जाने संबंधी सरकार की पहल का उद्देश्य किसानों को लाभ पहुंचाने और कृषि दक्षता को बेहतर करने के लिए डिजिटल तकनीक का फायदा उठाते हुए इस क्षेत्र में क्रांति लाना है। पायलट परियोजनाओं की सफलता से उत्साहित होकर इस राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम को तीन वर्षों के दौरान राज्य सरकारों के सहयोग आगे बढ़ाया जाएगा।
      शुरुआती चरण में खरीफ सीजन के दौरान 400 जिलों में डिजिटल फसल सर्वेक्षण किया जाएगा। इसके तहत डीपीआई का उपयोग करते हुए तीनों फसल सीजन में खेतों में बोआई की गई फसल और उसके रकबे के बारे में विस्तृत आंकड़े जुटाए जाएंगे। इससे हरेक खेत के लिए सटीक, वास्तविक समय आधारित फसल क्षेत्र की जानकारी प्रदान करने और गिरदावरी जैसे पारंपरिक सर्वेक्षण तरीकों को बदलने में मदद मिलेगी। इन पहलुओं के डिजिटलीकरण के साथ सरकार सब्सिडी वितरण, बीमा कवरेज और आपदा प्रबंधन सहित कृषि रणनीतियां तैयार करने और उन्हें बेहतर ढंग से लागू कर सकती है।
    5. तकनीकी पहल: सुलभ किसान क्रेडिट कार्ड के साथ किसानों का सशक्तिकरण
      कृषि एवं किसान कल्याण विभाग (डीएएंडएफडब्लू) अपनी प्रमुख संशोधित ब्याज सहायता योजना (एमआईएसएस) के जरिये किसानों की सहायता के प्रतिबद्ध है। इसका उद्देश्य किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) के जरिये अल्पकालिक आवश्यकताओं के लिए किफायती ऋण प्रदान करना है। इस योजना की दक्षता, पारदर्शिता और समय पर लाभ वितरण को बेहतर करने के लिए कृषि एवं किसान कल्याण विभाग ने पिछले साल शुरू किए गए किसान ऋण पोर्टल (केआरपी) के जरिये दावा प्रक्रिया को डिजिटल कर दिया है।
      फिलहाल केआरपी 1,71,221 बैंक शाखाओं, 33 अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (एससीबी), 356 जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों (डीसीसीबी), 20 राज्य सहकारी बैंकों (एसटीसीबी), 45 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (आरआरबी), आरबीआई और नाबार्ड के साथ एकीकृत हो चुका है। यह पोर्टल फिलहाल किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) खातों के लिए ब्याज अनुदान एवं पीआरआई दावों को प्रॉसेस कर रहा है, जिसमें वर्ष 2024-25 के लिए 22,600 करोड़ रुपये का बढ़ा हुआ आवंटन शामिल है।
      इसके अलावा सरकार संस्थागत ऋण तक व्यापक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए प्रौद्योगिकी का फायदा उठाते हुए किसान ऋण पोर्टल (केआरपी) की क्षमताओं को बढ़ा रही है। इससे किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) के जरिये कृषि ऋण तक निर्बाध और बिना किसी परेशानी के पहुंच सुन‍िश्चित होगी। सरकार के प्रयासों के परिणामस्वरूप चालू केसीसी खातों की संख्या 2013 में 6.46 करोड़ से बढ़कर 2024 में 7.75 करोड़ हो गई है। इसी प्रकार इन केसीसी खातों में बकाया ऋण 2013 में 3.63 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024 में 9.81 लाख करोड़ रुपये हो गया है।
    6. पर ड्रॉप मोर क्रॉप (पीडीएमसी)
      देश में 2015-16 से पर ड्रॉप मोर क्रॉप (पीडीएमसी) यानी प्रति बूंद अधिक फसल योजना लागू की जा रही है। पीडीएमसी सूक्ष्म सिंचाई यानी ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणालियों के माध्यम से खेत स्तर पर जल उपयोग दक्षता बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करती है। सूक्ष्म सिंचाई से जल की बचत होने के साथ-साथ उर्वरक उपयोग, श्रम खर्च एवं अन्य इनपुट लागत में भी कमी आती है और किसानों की समग्र आय में वृद्धि होती है।
      इस योजना के तहत सूक्ष्म सिंचाई की व्‍यवस्‍था के लिए लघु एवं सीमांत किसानों को 55 प्रतिशत और अन्य किसानों को 45 प्रतिशत की दर से वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। सूक्ष्म सिंचाई के कवरेज का विस्तार करने के लिए संसाधन जुटाने में राज्यों की मदद के लिए भारत सरकार ने राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के साथ मिलकर सूक्ष्म सिंचाई कोष (एमआईएफ) स्‍थापित किया है।
      वर्ष 2015-16 से 2023-24 तक पीडीएमसी के जरिये देश में सूक्ष्म सिंचाई के तहत कुल 90 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया गया है, जो पीडीएमसी से पहले के नौ वर्षों की कवरेज की तुलना में काफी (92 प्रतिशत) अधिक है।
      निष्कर्ष
      केंद्र सरकार की समग्र कृषि रणनीति का उद्देश्य अनुसंधान एवं विकास के जरिये उत्पादकता एवं पर्यावरण के प्रति अनुकूलता को बेहतर करना और अधिक उपज वाली नई फसल किस्मों को पेश करना है। इसके तहत एक करोड़ किसानों के लिए प्राकृतिक खेती की पहल को प्राथमिकता दी गई है, जैव-इनपुट केंद्र स्‍थापित करने और दलहन एवं तिलहन के उत्‍पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने की दिशा में भी प्रयास जारी हैं । डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचा और झींगा प्रजनन केंद्रों के लिए मदद जैसी पहल देश भर में कृषि के विस्‍तार एवं आधुनिकीकरण के लिए भारत सरकार द्वारा उठाये जा रहे महत्वपूर्ण क़दमों को रेखांकित करती हैं।
  • किसान पर रुपया बरसाएगी डिजिटल मुद्रा

    किसान पर रुपया बरसाएगी डिजिटल मुद्रा

    बजट में तेल, खाद्यान्न व उर्वरकों पर सब्सिडी का सर्वाधिक बोझा होता है। भारत सरकार ने तेल कंपनियों को बाज़ार के अनुरूप मूल्य निर्धारित करने का अधिकार दे कर तेल सब्सिडी से लगभग छुटकारा पा लिया है। खाद्य सुरक्षा का संवैधानिक दायित्व होने के कारण आज सरकार विश्व की सबसे बड़ी खाद्य सुरक्षा योजना संचालित कर रही है जिसके तहत 813 मिलियन से अधिक लोगों को सब्सिडी पर राशन उपलब्ध करवाया जा रहा है। इस कड़ी में तीसरी सबसे बड़ी सब्सिडी हैं उर्वरक पर दी जाने वाली सब्सिडी जो 2.53 ट्रिलियन रूपये तक पहुँच गई है।

    हमारे देश में प्रति वर्ष लगभग 65 मिलियन टन विभिन्न प्रकार के उर्वरकों की पूर्ति देश में स्थापित 0.26 मिलियन पॉइंट ऑफ सेल (पीओएस) आउटलेट्स के माध्यम से की जाती है। जहां लाभार्थियों की पहचान आधार कार्ड के नम्बर, किसान क्रेडिट कार्ड या अन्य दस्तावेजों के माध्यम से की जाती है।खुदरा विक्रेताओं द्वारा किसानों को की गई बिक्री के आधार पर उर्वरक निर्माता कंपनियों को उर्वरक सब्सिडी जारी की जाती है। देश अपनी डीएपी की लगभग आधी आवश्यकता आयात करता है और लगभग 25% यूरिया की आवश्यकता आयात के माध्यम से पूरी की जाती है। घरेलू म्यूरेट ऑफ पोटाश (एमओपी) की मांग पूरी तरह से आयात (बेलारूस, कनाडा और जॉर्डन आदि से) के माध्यम से पूरी की जाती है।डायमोनियम फॉस्फेट सहित फॉस्फेटिक और पोटाश (पी एंड के) उर्वरक की खुदरा कीमतें (डीएपी) को सरकार द्वारा एक वर्ष में दो बार घोषित पोषक तत्व आधारित सब्सिडी तंत्र के हिस्से के रूप में ‘निश्चित-सब्सिडी’ व्यवस्था की शुरूआत सन् 2020 से की गईं हैं । उदाहरण के लिये आज यूरिया के मामले में, प्रति बैग (45 किलोग्राम) उत्पादन लागत  लगभग 2,650 रुपये है जबकि किसानों को 242 रुपये की निर्धारित कीमत का भुगतान कर उपलब्ध करवाई जा रही है तथा शेष राशि सरकार द्वारा उर्वरक इकाइयों को सब्सिडी के रूप में प्रदान की जाती है।

    उपरोक्त कारणों के कारण ही सरकार ई- रूपी से सब्सिडी सार्वजनिक सेवा वितरण के लिए डिजिटल वाउचर का लाभ उठाने के लिए प्रयास कर रही है। हमारे देश में सार्वजनिक सेवा वितरण डिजिटल क्रांति के शिखर पर है जिसके तहत सरकार द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र में डिजिटल परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण निवेश और प्रगति के लिए अनेक योजनाएँ शुरू की गई है जैसे जन धन-आधार-मोबाइल ट्रिनिटी (जेएएम) से लेकर सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली (पीएफएमएस) से लेकर इंडिया स्टैक से लेकर यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) तक, भारत ने सामाजिक चुनौतियों से निपटने के लिए डिजिटल नेतृत्व वाली व्यवस्था को अपनाया है। इस दिशा में एक परिवर्तनकारी कदम हाल ही में लॉन्च किया गया ई-आरयूपीआई है, जो एक व्यक्ति को विशिष्ट उद्देश्य के लिए डिजिटल भुगतान का साधन है। जिसे रिसाव और लक्ष्यीकरण समस्याओं को समाप्त करने के लिए प्रभावी समाधान के रूप में देखा जा रहा है।आधार कार्ड योजना, यूपीआई के माध्यम से सीधे बैंक खाते से भुगतान की योजना, किसान सम्मान निधि का भुगतान तथा घरेलू गैस सिलेंडर पर सब्सिडी का सीधा भुगतान आदि अनेक सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं में सीधे हितग्राहियों के खाते में पैसा सीधे ट्रांसफ़र किया जा रहा है। भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा जारी ई-रूपी  इसी कड़ी का अगला कदम है।  यह प्रौद्योगिकी के लिए “सामान्य रूप से व्यवसाय” दृष्टिकोण में एक बदलाव है और जो वास्तव में प्रधान मंत्री के “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास”के आह्वान के अनुरूप है।

    जब देश में नई सरकार चुनने के लिए चुनाव की प्रक्रिया चल रही है तभी  भारतीय रिज़र्व बैंक व अनेक सरकारी विभाग उर्वरक सब्सिडी प्राप्तियों के वित्तपोषण को बंद करने की संभावना पर बैंकों के साथ चर्चा कर रहे है। जिस के तहत लाभार्थियों को खुदरा विक्रेताओं की वास्तविक बिक्री के आधार पर उर्वरक कंपनियों को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) की पेशकश की जाना है।

    उर्वरक सब्सिडी के लिए सरकार पायलट आधार पर कर्नाटक, असम, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और महाराष्ट्र सहित सात राज्यों के एक-एक जिले में पायलट प्रोजेक्ट शुरू करेगी। जिसके तहत इन राज्यों के सात जिलों में उर्वरकों की सब्सिडी को  प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) योजना  के तहत, किसानों को उनकी भूमि जोत को ध्यान में रखते हुए सब्सिडी वाले उर्वरकों की बिक्री की सीमा तय की जाएगी।अनेक स्तर पर विभिन्न संगठनों द्वारा प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण के विचार पर आपत्ति जताई गई थी, क्योंकि उस मॉडल के तहत, किसानों को वास्तविक सब्सिडी राशि उनके बैंक खातों में स्थानांतरित होने से पहले उर्वरक खरीदने के लिए एक बड़ी राशि का भुगतान करना होगा। हालाँकि, सरकार ने किसानों को उनके बैंक खातों में सब्सिडी प्राप्त करने से पहले, बाजार दरों पर पोषक तत्वों को क्रय कर अग्रिम  भुगतान करने की योजना को छोड़ दिया है।क्योंकि विभाग का मानना है कि बाज़ार दर पर उर्वरक ख़रीदने के लिए कई किसानों के पास पैसा नहीं होता है।विभाग का मानना है कि “बेचे गए उर्वरक का सब्सिडी घटक काफी अधिक है जबकि किसानों की वास्तविक बाजार दर पर उर्वरक खरीदने की क्षमता सीमित है।”

    पायलटों की प्रतिक्रिया के आधार पर संशोधित डीबीटी को पूरे देश में लागू किया जाएगा। उर्वरक विभाग  के मुताबिक, किसानों के भूमि रिकॉर्ड के आधार पर उन्हें बेचे जाने वाले अत्यधिक सब्सिडी वाले उर्वरक का कोटा तय किया जाएगा तथा निर्धारित कोटा से ऊपर की किसी भी मात्रा के लिए, किसानों को उर्वरक बाजार दर पर खरीदना होगा।इसका उद्देश्य मिट्टी के पोषक तत्वों के तर्कसंगत उपयोग को बढ़ावा देना है।पायलट परियोजनाओं को शुरू करने से पहले राज्यों को डिजिटल भूमि रिकॉर्ड, फसल सर्वेक्षण, मृदा स्वास्थ्य कार्ड की कवरेज और लैंडिंग होल्डिंग्स में औपचारिक और अनौपचारिक किरायेदारी के प्रावधानों को डिजीटल करने की आवश्यकता है।

    भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) द्वारा विकसित ई-आरयूपीआई, एक बार का संपर्क रहित और कैशलेस वाउचर-आधारित भुगतान का तरीका है, जिसमें वाउचर का मोचन किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए किसी विशिष्ट व्यक्ति तक ही सीमित है। यह अनिवार्य रूप से एक प्रीपेड डिजिटल वाउचर है जो लाभार्थी को एसएमएस या क्यूआर कोड के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक रूप से वितरित किया जाता है। लाभार्थी इन वाउचरों को इच्छित वस्तुओं या सेवाओं के बदले नामित विक्रेताओं और सेवा प्रदाताओं पर भुना सकता है। उदाहरण के लिए, एक किसान को सार्वजनिक योजना के तहत जारी किए गए ई-आरयूपीआई खाद ख़रीदने के लिए जारी वाउचर के साथ एक निर्दिष्ट खाद की दुकान से संपर्क कर सकता है जहां वह खाद पर उपलब्ध सब्सिडी सेवाओं का लाभ उठाने के लिए वाउचर को भुना सकता है। जैसे ही एसएमएस कोड दर्ज किया जाता है या क्यूआर कोड स्कैन किया जाता है, वाउचर राशि तुरंत सरकार द्वारा वित्तीय मध्यस्थों के माध्यम से खाद निर्माता कम्पनी के खाते में जमा कर दी जाती है।

    जबकि डीबीटी प्रणाली के लिए लाभार्थी के पास आधार कार्ड से जुड़ा एक पंजीकृत बैंक खाता होना आवश्यक है, ई-आरयूपीआई के लिए केवल एक कार्यात्मक बुनियादी फोन की आवश्यकता होती है। स्मार्टफोन की कोई जरूरत नहीं! किसी डेबिट/क्रेडिट कार्ड, डिजिटल भुगतान ऐप, इंटरनेट बैंकिंग एक्सेस या यहां तक कि इंटरनेट कनेक्शन की भी आवश्यकता नहीं है! लाभार्थी को बस एक मोबाइल फोन चाहिए, जो एसएमएस या क्यूआर-कोड प्राप्त करने में सक्षम हो। दूसरे, सेवा प्रदाता खातों में पैसा तभी जमा किया जाता है जब लाभार्थी द्वारा लेनदेन पूरा कर लिया जाता है। यह एक लीक-प्रूफ भुगतान प्रणाली बनाता है जिसमें वैकल्पिक उपयोग के लिए धन के विचलन की संभावना को नियंत्रित किया जाता है। तात्कालिक हस्तांतरण व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि सेवा प्रदाताओं को कोई दावा, उपयोगिता प्रमाण पत्र या सहायक दस्तावेज जमा किए बिना तुरंत भुगतान किया जाता है, जिससे उनके निपटान में कार्यशील पूंजी की उपलब्धता भी बढ़ती है। जारीकर्ता के दृष्टिकोण से, ई-आरयूपीआई किसी भी उपभोग के बाद के सत्यापन की परेशानियों को समाप्त कर देता है, क्योंकि लाभार्थी एक तरह से पूर्व-सत्यापित होता है, और केवल निर्दिष्ट उद्देश्य के लिए वाउचर को भुनाने के लिए पात्र होता है। ई-आरयूपीआई, एक वास्तविक समय भुगतान प्रणाली होने के नाते, सार्वजनिक सेवा वितरण की रसद लागत को कम करने, स्थानीय क्षेत्रों में आर्थिक विकास को बढ़ावा देने और बढ़ी हुई दक्षता और प्रभाव के माध्यम से सार्वजनिक धन के सीमांत मूल्य में सुधार करने के लिए बाध्य है। लक्ष्य लोगों को पहले स्थान पर रखना, सेवाओं को लागत प्रभावी, सुविधाजनक और समावेशी तरीके से डिजाइन और वितरित करना है।

    किसी भी प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण योजना के साथ मुख्य चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि लाभार्थी को हस्तांतरित नकदी का उपयोग इच्छित परिणामों के लिए किया जा रहा है या नहीं। भारत सरकार द्वारा हाल ही में लॉन्च की गई ई-आरयूपीआई भुगतान प्रणाली का लक्ष्य सामाजिक लाभ हस्तांतरण को इच्छित उद्देश्य से जोड़ना और बिना किसी मध्यस्थ के सेवा प्रदाताओं को समय पर भुगतान सुनिश्चित करना है। उम्मीद है कि सार्वजनिक सेवाओं की लक्षित, पारदर्शी और लीकेज-प्रूफ डिलीवरी सुनिश्चित करने में ई-आरयूपीआई एक प्रमुख भूमिका निभाएगी।

  • कृषक की सोच बदलें तो दौड़ेगा विकास का इंजन

    कृषक की सोच बदलें तो दौड़ेगा विकास का इंजन


    संसद में बजट प्रस्तुत करने के पहले आर्थिक समीक्षा 2023-24 को प्रस्तुत किया गया। जिसके अनुसार वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 8.2% रहने का अनुमान किया गया है। जबकि मुद्रास्फीति काफ़ी हद तक नियंत्रण में है तथा व्यापार घाटा भी सकल घरेलू उत्पाद का 0.7% ही हैं तथा विदेशी मुद्रा भंडार भी पर्याप्त मात्रा में है। इसके साथ सार्वजनिक व निजी निवेश की गति निरंतर जारी है। 33,000 से अधिक निजी कम्पनियों के परिणाम बताते हैं कि वर्ष 2020 से 2023 के बीच भारतीय कॉरपोरेट क्षेत्र का कर पूर्व लाभ लगभग चार गुना हो गया है। जिस कारण निफ़्टी व सेंसेक्स सूचकांकों में तेज़ी बनी हुई है।
    कृषि और किसान किसी भी देश के लिए महत्वपूर्ण होते हैं और भारत भी इसका अपवाद नहीं है। इसलिए भारत में किसानों को पानी, बिजली और उर्वरक पर सब्सिडी दी जाती है। उनकी आय पर कर नहीं लगता। सरकार 23 चुनिंदा फसलों के लिए उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करतीं हैं। पीएम किसान योजना के तहत किसानों को मासिक नक़द राशि प्रदान की जाती है। राष्ट्रीय व राज्य सरकारें समय समय पर किसानों के ऋण माफ़ कर देती है। लेकिन किसानों की समस्याओं को देखते हुए इन नीतियों में बदलाव करने के लिए अखिल भारतीय संवाद की आवश्यकता है।
    भारतीय कृषि क्षेत्र लगभग 42%आबादी को आजीविका प्रदान करता है तथा सकल घरेलू उत्पाद में 18% योगदान देता है। कृषि क्षेत्र 4.18% की गति से प्रति वर्ष वृद्धि कर रहा है। विश्व कृषि में भारत दूध, दालों व मसालों के उत्पादन में प्रथम स्थान व चावल, गेहूँ, कपास और गन्ना उत्पादन में द्वितीय स्थान पर है।
    राष्ट्रीय व राज्य सरकारों के एक-दूसरे के विपरीत उद्देश्यों वाली नीतियों के कारण किसानों के हितों को नुक़सान पहुँच रहा है, मिट्टी की उर्वरता नष्ट हो रहीं है, भूजल स्तर घट रहा है, नाइट्रेट ऑक्साइड से नदियाँ और पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है, फसलों में पोषक तत्वों की कमी के कारण हमारे भोजन में फ़ाइबर और प्रोटीन के बजाय चीनी और कार्बोहाइड्रेट से भरपूर भोजन के कारण लोगों के स्वास्थ्य को नुक़सान पहुँच रहा है। यदि हम कृषि नीतियों में व्याप्त विसंगतियों को समाप्त कर दे तो इस के परिणाम स्वरूप बहुत अधिक सामाजिक व आर्थिक लाभ होगा तथा राष्ट्र को बेहतर भविष्य की ओर ले जाने के आत्मविश्वास और क्षमता में विश्वास बहाल होगा।
    पहले के विकास मॉडलों में अर्थव्यवस्था को कृषि, औद्योगीकरण और मूल्य संवर्धित सेवाओं के विकास के क्रम में प्रतिपादित किया जाता रहा है। लेकिन व्यापार संरक्षणवाद, संसाधन जमाख़ोरी, अतिरिक्त क्षमता और डंपिग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के आने से विश्व में नई चुनौतियों का निर्माण हो रहा है। आर्थिक सर्वेक्षण में इसका हल खेती के मामले में जड़ों की ओर लौट कर परम्परागत खेती को बढ़ावा देने के रूप में प्रस्तुत किया गया है तथा उम्मीद की गई है कि इससे किसानों की आय बढ़ाई जा सकेगी। इससे उच्च मूल्य संवर्धन के लक्ष्य को प्राप्त करने के साथ खाद्य प्रसंस्करण से निर्यात के अवसर पैदा होने की उम्मीद जताई गई है तथा कृषि क्षेत्र को फ़ैशनेबल बना कर शहरी युवाओं को काम करने के लिए आकर्षित किया जा सकता है।
    क्या आज के पेचीदा समाज में यह प्रस्तावित समाधान कृषि क्षेत्र का उद्धारक हो सकता है? इस विषय में आप क्या सोचते हैं? आप किसानों को विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से अपनी राय व्यक्त करना चाहिए जिससे शासन प्रशासन में बैठे लोगों, नीति निर्माताओं तथा जनता की राय की दिशा बनाने वाले प्रभावशाली लोगों तक बात पहुँच सके। यदि इस समय भी आप चुप रहे तो कोई ओर आपके लिए निर्णय लेगा।

  • सावन की फुहार लाए विजया भारती के लोकगीत

    सावन की फुहार लाए विजया भारती के लोकगीत

    भोपाल,26 जुलाई(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर) देश की प्रख्यात लोकगायिका विजया भारती इन दिनों राजधानी भोपाल में अपने सदाबहार लोकगीतों के साथ एक फिल्म की शूटिंग में व्यस्त हैं। उनके लोकगीत इतने मधुर हैं कि सावन की फुहारें एक बार फिर जीवन संगीत बनकर बरसने लगीं हैं। भारतीय लोक संगीत की दुनिया में विजया भारती का नाम बड़े प्यार और सम्मान से लिया जाता है. विजया बिहार की हैं. इसलिए बिहार की तमाम लोक भाषाओं भोजपुरी, मैथिली, अंगिका आदि में तो वे गाती ही हैं, किन्तु उनकी पहचान समूचे देश और दुनिया में 18 भाषाओं में गाने वाली एक स्तरीय और झुमा देने वाली गायिका के रूप में स्थापित है. सुर-सौंदर्य और सौम्यता से परिपूर्ण विजया भारती ने संगीत के मंचों से लेकर ऑडियो-वीडियो एलबमों तथा टेलीविजन चैनलों के अलावा फिल्मों में भी अपनी कला का जादू बिखेरा है. विजया ने मुंबई फिल्म जगत की तमाम जानी-मानी हस्तियों यथा महानायक अभिताभ बच्चन, स्व अमरीशपुरी, गोविन्दा, अमोल पालेकर, जितेन्द्र, यश चोपड़ा, जया प्रदा, शत्रुघन सिन्हा, मनोज बाजपेयी, उदित नारायण, स्व. रविन्द्र जैन आदि के साथ दिल्ली, मुंबई से लेकर यूरोप के अनेक देशों में मंचों पर सफलता के साथ कार्यक्रम पेश कर अपार लोकप्रियता अर्जित की है.

    विजया पारंपरिक लोकगीतों के अलावा ज्यादातर स्वरचित और स्वयं संगीतबद्ध गीत गाती हैं और इसीलिए उनकी अपनी विशिष्ट् पहचान है. हिन्दी और संगीत में डबल एमए के अलावा, विद्यावाचस्पति की उपाधि प्राप्त विजया भारती ने हिंदी, भोजपुरी, मैथिली और अंगिका भाषाओं में सैकड़ों गीत लिखे और गाये हैं.

    मूलत: बिहार की रहने वाली और मुंबई में पैदा विजया भारती ने भारत सरकार के ‘भारतीय सास्कृतिक संबधं परिषद’ (आईसीसीआर) के माध्यम से दुनिया के 20 देशों में भोजपुरी गायन प्रस्तुत कर अंर्तराष्ट्रीय पहचान बनायी है. उनके कार्यक्रम रूस, ब्रिटेन, हालेंड, जर्मनी, बेल्जियम, त्रिनिडाड, पोर्ट ऑफ स्पेन, फ्रांस तथा अनेक कैरेबियन देशों में काफी यादगार रहे हैं. त्रिनिडाड के एक अखबार ने विजया का कार्यक्रम देखने के बाद प्रशंसा करते हुए शीर्षक लिखा – इलेक्ट्रिफाइंग भारती.

    विजया भारती (संगीत और हिंदी में डबल एमए व विद्यावाचस्पति) देश की जानी मानी लोकगायिका, एंकर, कवयित्री व लोक संस्कृति की मर्मज्ञ हैं| आकाशवाणी व दूरदर्शन की ऐ ग्रेड कलाकार विजया ने देश के कोने कोने से लेकर 20 से अधिक देशों में भारतीय लोक संस्कृति का परचम लहराया है| तमाम टीवी चैनलों पर नियमित कार्यक्रम करने के अलावा आपने महुआ टीवी पर लगातार चार साल तक प्रतिदिन बिहाने बिहाने कार्यक्रम की एंकरिंग कर रिकार्ड बनाया है| अनेकों पुरस्कार के अलावा आपको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विजया की सराहना करते हुए आपको कुपोषण और बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान में शामिल होने के लिए प्रेरित और निमंत्रित भी किया|

    विजया के कार्यक्रम केन्द्र सरकार के विभिन्न संस्थानों के अलावा कई राज्य सरकारों के जरिये नियमित तौर पर होते हैं. विजया बिहार-यूपी की पहली कलाकार हैं, जिन्होंने दूरदर्शन पर ‘सुबह-सवेरे’ जैसे बेहद लोकप्रिय कार्यक्रम के जरिये भोजपुरी लोकगीतों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलायी. आकाशवाणी और दूरदर्शन की नियमित कलाकार रहीं विजया ने ‘सुबह-सवेरे’ के बाद एनडीटीवी, आज तक, स्टार न्यूज, आईबीएन सेवन, जी टीवी, सहारा समय, पी-7 तथा ईटीवी आदि अनेक निजी टीवी चैनलों पर छा गयीं. इन चैनलों पर लोकसंगीत के अनेकानेक कार्यक्रमों के अलावा ईटीवी यूपी और बिहार पर भी विजया कई सालों तक लगातार ‘फोक जलवा’, ‘धुन’ और ‘तेरे मेरे गीत’ जैसे कार्यक्रमों में गायन व एंकरिंग सहित पेश करती रही हैं. विजया के नाम एक और बड़ा रिकॉर्ड है – महुआ चैनल पर लगातार चार सालों तक बिहाने बिहाने कार्यक्रम की एंकरिंग. इस कार्यक्रम के जरिये विजया को अपार लोकप्रियता हासिल हुई. इसके बाद विजया एक अन्य टीवी सीरियल भौजी नंबर वन की प्रमुख जज के रूप में भी खासी चर्चित रही हैं. विजया को अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार व सम्मान मिल चुके हैं.

    उनके गीत टी-सीरीज, वीनस, टिप्स, लिप्स, रामा, भारत और नीलम आदि अनेक कैसेट कंपनियों से भोजपुरी, मैथिली और अंगिका भाषाओं में जारी हो चुके हैं.

    विजया ने अपने गाये गीतों में ज्यादातर खुद ही लिखे और कंपोज किए हैं. विजया ने उन्हीं गीतों को अपना सुर और स्वर दिया है, जिसमें भारतीय संस्कृति, संस्कार और माटी की खुशबू है. विजया का मानना है कि लोक संस्कृति में जन्म से लेकर मृत्यु तक के गीत है. प्रकृति, उत्सव और उपनयन संस्कार के गीतों के अलावे जन -जन की आत्मा में लोक गीत और लोक संगीत रचा बसा है. वे कहती है कि लोक गीत और संगीत के बिना जीवन अधूरा है. मुझे अपनी विशुद्ध लोकगायिकी पर गर्व है.

    VIJAYA BHARTI
    India’s Multilingual Folk Singer
    Mob – 9810482284
    F-1 & 2, 6/155, Behind Milind Academy,
    Media Enclave, Sec-6, Vaishali, Ghaziabad 201012, UP
    Email- [email protected]

    http://folksingervijayabharti.blogspot.in

  • बाबा रामदेव की कंपनियों में रोजगार दिलाएगा सैडमैप

    बाबा रामदेव की कंपनियों में रोजगार दिलाएगा सैडमैप

    सेडमैप की कार्यकारी संचालक श्रीमती अनुराधा सिंघई ने किया पतंजलि आयुर्वेद से समझौता

    भोपाल। आजीविका सृजन के विभिन्न क्षेत्रों के लिए अब पतंजलि समूह और उद्यमिता विकास केन्द्र मध्यप्रदेश (सेडमैप) मिलकर काम करेंगे। केन्द्र की कार्यकारी संचालक श्रीमती अनुराधा सिंघई, बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने इस आशय के एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए।


    सेडमैप की कार्यकारी संचालक श्रीमती अनुराधा सिंघई ने बताया कि पतंजलि समूह के साथ आने से आजीविका अभिवृद्धि के प्रयासों को बल मिला है। रोजगार-स्वरोजगार के क्षेत्र में सेडमैप द्वारा किए जा रहे प्रयास किसी से छिपे नहीं हैं। सेडमैप की उपलब्धियों को देखते हुए ही अब पतंजलि समूह द्वारा युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने, महिलाओं के समग्र उत्थान और विभिन्न क्षेत्रों में आजीविका सृजन पर सेडमैप के साथ मिलकर काम किया जाएगा।


    सेडमैप के साथ कार्य किए जाने पर बाबा रामदेव ने भी प्रसन्नता जताई। इस अवसर पर पतंजलि समूह के आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि आजीविका सृजन के लिए जो सुझाव सेडमैप द्वारा प्रस्तुत किए गए हैं वह सराहनीय हैं। सेडमैप और पतंजलि समूह दोनों देश की सेवा के लिए प्रतिबद्ध है, और पतंजलि में किए गए अनुसंधान कार्यों का लाभ मध्यप्रदेश के विकास के कार्यों मंद हो सकेगा। सेडमैप के साथ नए करार के उपरांत कई व्यावसायिक अवसरों की खोज और मुख्यधारा से बेरोजगार युवाओं को जोड़ने का मार्ग प्रशस्त हुआ है। इस अवसर पर रोजगार-स्वरोजगार के लिए आवश्यक उद्यमशीलता की सफलता पर चर्चा की गई।

  • इक्विटास बैंक के प्रशंसकों ने चलाई पर्यावरण बचाने की मुहिम

    इक्विटास बैंक के प्रशंसकों ने चलाई पर्यावरण बचाने की मुहिम


    भोपाल, 5 जून(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर). विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर इक्विटास बैंक के प्रशंसकों और ग्राहकों ने शालीमार एन्क्लेव परिसर में पौधा रोपण करके पर्यावरण बचाने की मुहिम शुरु की है। रोपण किया गया। इस अवसर पर समिति के रहवासियों ने अपने ही परिसर में विभिन्न प्रजातियों के पौधे रोपित किए और अपने परिचितों को शहर के विभिन्न स्थानों में पेड़ लगाने के लिए उनके पौधे वितरित किए।


    इक्विटास बैंक एमपीनगर शाखा के प्रबंधक श्री लोकेश जैन ने बताया कि दुनिया भर में बढ़ते तापमान का असर अब नजर आने लगा है। ग्लैशियर पिघल रहे हैं और ऋतु चक्र बदलने लगा है। ऐसे में खाद्यान्न उत्पादन का कैलेन्डर बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। बैंक ने अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वहन करते हुए आम नागरिकों के बीच में जन जागरण अभियान चलाया है। जिन नागरिकों को हमारी बैंकिंग सुविधाओं से फायदा पहुंच रहा है हमने उन्हें खासतौर पर पर्यावरण प्रतिनिधि के रूप में समाज का मार्गदर्शन करने को प्रेरित किया है।


    उन्होंने बताया कि इक्विटास बैंक ने अपने वित्तीय प्रबंधन में नवाचारों के चलते कम समय में ऊंचा लाभांश देकर आम नागरिकों का जीवन सफल बनाया है। हम अपने कुशल वित्तीय सलाहकारों की मदद से आम नागरिकों को अपना वित्तीय प्रोफाईल सुधारने में मदद कर रहे हैं। ऐसे में आम नागरिकों के मन में हमारी बैंकिंग प्रणाली अपनी साख स्थापित करती जा रही है। अपनी इस कारोबारी साख के माध्यम से हम पर्यावरण अनुकूल बेहतर समाज का निर्माण करने का प्रयास कर रहे हैं। हमारे इस अभियान में हमारे बैंकिंग मार्गदर्शकों का पूरा सहयोग मिलता है। बैंक प्रबंधन के उच्चाधिकारी भी यही चाहते हैं कि हम अपनी बैंकिंग गतिविधियों से समाज में संतोष और उत्तरदायित्व का भाव विकसित करें। इस कार्यक्रम में बैंक के सीएसआर विभाग के राजेश भूमरकर ने आगे बढ़कर अपना सक्रिय सहयोग प्रदान किया।


    श्री जैन ने बताया कि विश्व पर्यावरण दिवस के वृक्षारोपण कार्यक्रम में आम नागरिकों के साथ क्षेत्रीय प्रबंधक अमित देश पांडे, क्लस्टर प्रमुख मनीष मरदवार, ने भी अपना सक्रिय योगदान देकर कार्यक्रम को गरिमा प्रदान की।उन्होंने बताया कि हमारे बैंक का हर कर्मचारी अपने ग्राहकों को बेहतर वित्तीय प्रबंधन की सलाह देता है और उन्हें पर्यावरण बचाने की सामाजिक जिम्मेदारी निभाने की प्रेरणा भी देता है।

  • वनों को समृद्धि का आधार बनाएं: राज्यपाल मंगुभाई पटेल

    वनों को समृद्धि का आधार बनाएं: राज्यपाल मंगुभाई पटेल

    भोपाल, 24 जनवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने कहा है कि पर्यावरण संतुलन और समृद्धि के लिए अधिक से अधिक वृक्ष लगाए जाने चाहिए। वृक्ष होंगे तो पर्यावरण स्वस्थ होगा और वनोपज से समृद्धि आएगी। उन्होंने वन उत्पाद और औषधियों के गुणों के व्यापक स्तर पर प्रसार की आवश्यकता बताई है। उन्होंने अधिकारियों से कहा है कि पारंपरिक रूप से सदियों से उपचार में उपयोग किए जाने वाली जड़ी-बूटियों, औषधियों का वैज्ञानिक स्वरूप में प्रमाणीकरण के प्रयास किए जाने चाहिए। उन्होंने जनजातीय समुदाय में प्रचलित अनुवांशिक रोग सिकल सेल के बारे में बताते हुए कहा कि वह 21 प्रकार के रोगों का कारण होता है। वन विभाग और आयुर्वेद विशेषज्ञों से कहा है कि वह रोग के उपचार में आयुर्वेदिक औषधियों के अनुसंधान के कार्य करें। उन्होंने मेले के संबंध में नगर में लाउड स्पीकर पर सूचना के प्रसार की आवश्यकता बताई है।

    राज्यपाल श्री पटेल राज्य लघु वनोपज व्यापार एवं विकास सहकारी संघ द्वारा आयोजित वन मेला 2024 के उद्घाटन समारोह को संबोधित कर रहे थे। मेले का आयोजन हाट बाजार में किया गया है। वन, पर्यावरण एवं अनुसूचित जाति कल्याण मंत्री श्री नागर सिंह चौहान, वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री श्री दिलीप अहिरवार भी उद्घाटन समारोह में मौजूद थे।

    राज्यपाल श्री मंगुभाई पटेल ने कहा है कि लघु वनोपज से समृद्धि के लिए वन मेले का आयोजन सराहनीय पहल है। उन्होंने नागरिकों से अपील की है कि वह मेले में अधिक से अधिक खरीदारी कर, समाज के वंचित वर्ग के आर्थिक सशक्तिकरण के प्रयासों में सहभागी बने। उन्होंने कहा कि समाज की विकास की मुख्य धारा में पिछड़ने का प्रमुख कारण अशिक्षा है। विकास की पहली सीढ़ी शिक्षा है। उन्होंने वंचित वर्गों का आव्हान किया है कि वह बच्चों की शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दें। उन्होंने कहा कि जल वायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग की चुनौतियां पर्यावरणीय असंतुलन का परिणाम है। पर्यावरण संतुलन का आधार वृक्षारोपण है।

    उन्होंने पेड़ों के आरोग्य, पर्यावरणीय और सांस्कृतिक महत्व के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि वन औषधियों के साइड इफेक्ट नहीं होते। उनके उपचार का प्रभाव कोविड के समय हम सब ने देखा है। उन्होंने कहा कि घर की खिड़की के बाहर नीम अथवा पीपल के पेड़ होते हैं तो एयर कंडीशनिंग की आवश्यकता भी नहीं पड़ती है। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में वृक्षारोपण में जनसहभागिता के लिए 12 राशि, 27 नक्षत्र और 9 ग्रह वनों की आयोजना की थी। उन्होंने कहा कि शहरी क्षेत्रों में सघन वृक्षारोपण बहुत जरूरी है। नागरिकों का आह्वान किया कि वे अपने जन्मदिन पर प्रतिवर्ष पौधरोपण और उसकी देख-भाल का संकल्प लें।

    वन, पर्यावरण एवं अनुसूचित जाति कल्याण मंत्री श्री नागर सिंह चौहान ने बताया कि प्रदेश में 35 लाख लोग वनोपज संग्रहण कार्य से जुड़े हुए हैं। राज्य सरकार उनके कल्याण के लिए प्रभावी प्रयास कर रही है। तेंदूपत्ता संग्रहण की दर 3 हजार रुपए प्रति मानक बोरा से बढ़ाकर, 4 हजार रुपए कर दी है। प्रदेश में 126 वन धन केन्द्र स्थापित किए गए हैं। एकलव्य शिक्षा विकास योजना के द्वारा उत्कृष्ट शिक्षण संस्थानों में शिक्षा की व्यवस्था की जा रही है।

    वन पर्यावरण राज्य मंत्री श्री दिलीप अहिरवार ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के वोकल फॉर लोकल की दिशा में राज्य सरकार द्वारा तेजी से कार्य किया जा रहा है। वन मेले का आयोजन वनोपज संग्राहकों को सीधे लाभांवित करने का प्रयास है।

    राज्यपाल का कार्यक्रम के प्रारंभ में जनजातीय लोक कलाकारों ने पारंपरिक लोक नृत्य के द्वारा स्वागत किया। उन्होंने कार्यक्रम के प्रारंभ में माँ सरस्वती की प्रतिमा पर पुष्पांजलि और दीप प्रज्ज्वलन कर मेले का उदघाटन किया। कार्यक्रम में अतिथियों का औषधीय पौधे भेंट कर स्वागत किया गया। उन्हें वरली आर्ट की कृति और हर्बल उत्पादों का गिफ्ट हेम्पर भेंट किया।

    स्वागत उद्बोधन अपर मुख्य सचिव वन, श्री जे.एन. कांसोटिया ने किया । आभार प्रदर्शन प्रबंध संचालक लघु वनोपज संघ श्री विभाष ठाकुर ने किया। इस अवसर पर मुख्यवन संरक्षक, वन बल प्रमुख श्री अभय पाटिल, वनोपज संग्राहक और बड़ी संख्या में आम नागरिक उपस्थित थे।

  • फसल का पैटर्न बदलें बोले मुख्यमंत्री

    फसल का पैटर्न बदलें बोले मुख्यमंत्री


    1500 करोड़ रूपए की लागत के आईटीसी की खाद्य प्र-संस्करण इकाइयों का शिलान्यास
    5000 लोगों को मिलेगा रोजगार

    भोपाल 3सितंबर (प्रेस इंफॉर्मेशन सेंटर)मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आज सीहोर के औद्योगिक क्षेत्र बडियाखेड़ी में आईटीसी कम्पनी की कुल 1500 करोड़ रुपये के निवेश से स्थापित होने वाली दो इकाइयों- इंटीग्रेटेड फूड मैन्यूफैक्चरिंग एंड लॉजिस्टिक्स फैसिलिटी और सस्टेनेबल पैकेजिंग प्रोडक्ट्स मैन्यूफैक्चरिंग फैसिलिटी का शिलान्यास किया। ये दोनों इकाइयाँ 57 एकड़ में लगेंगी। इससे 5000 लोगों को रोजगार मिलेगा।

    इस फूड प्लांट में आईटीसी के विश्वस्तरीय भारतीय ब्रांड जैसे देश का नंबर-1 आटा ब्रांड आशीर्वाद, सनफीस्ट बिस्कुट और यिप्पी नूडल्स का उत्पादन होगा, जबकि मोल्डेड फाइबर प्रोडक्ट्स प्लांट सस्टेनेबल पैकेजिंग के क्षेत्र में नए मानक बनाएगा। इससे इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं, एफएमसीजी और फूड एवं बेबरेज सेक्टर में पैकेजिंग के लिए प्लास्टिक का विकल्प मिलेगा। सीहोर में फूड प्रोसेसिंग सेक्टर में आईटीसी का यह निवेश राज्य के मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में मूल्य सृजित करेगा और एग्री-वैल्यू चेन में सहयोग देगा।

    शिलान्यास कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि खेती में मध्यप्रदेश ने देश के सभी राज्यों को पीछे छोड़ दिया है। मध्यप्रदेश ने डेढ़ दशकों तक 18 प्रतिशत की कृषि विकास दर प्राप्त कर चमत्कार किया है।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि कहा कि फसल नुकसान से बचने और खेती को लाभ का धंधा बनाने के लिए फसल उत्पादन के पैटर्न को बदलना होगा। परंपरागत फसलों के साथ-साथ व्यावसायिक फसलों जैसे औषधीय फसलों का भी उत्पादन भी आवश्यक है।

    खेती आधारित उद्योग लगाने के प्रयास

    श्री चौहान ने कहा कि खरीफ की फसल में अधिकतर सोयाबीन और धान ही लगाते है और कई बार एक फसल पर संकट आने से किसान को नुकसान होता है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग फसलों की किस्मों से किसानों को अधिक से अधिक लाभ हो सके। इसके लिए आईटीसी ने 7000 एकड़ में तुलसी, अश्वगंधा, कलौंजी की खेती की है। उन्होंने कहा कि खेती पर आधारित उद्योग धंधे लगाने का निरंतर प्रयास किया जा रहा है, ताकि किसानों को अपनी फसलों का अच्छा दाम और स्थानीय नागरिकों को रोजगार मिले।

    15 लाख 42,750 करोड़ के निवेश प्रस्ताव

    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में 15 लाख 42 हजार 750 करोड़ रुपए के निवेश के प्रस्ताव आए हैं। आईटीसी कंपनी ने भी प्रस्ताव दिया था जिसके तहत बड़ियाखेड़ी में 1500 करोड रुपए का निवेश हो रहा है।

    श्री चौहान ने कहा कि आईटीसी किसानों के साथ मिलकर उद्योग और खेती के विकास दोनों के लिए काम कर रही है। इस पहल से सीहोर और आसपास के 5000 लोगों को रोजगार मिलेगा। निरंतर प्रयास है कि ज्यादा से ज्यादा उद्योग स्थापित हों और ज्यादा से ज्यादा युवाओं को रोजगार मिले। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि अल्प वर्षा होने के कारण किसान चिंतित है। किसान चिंता न करें, सरकार हर संकट से निपटने के लिए उनके साथ में है। उन्होंने कहा कि बारिश कम होने के कारण बिजली की मांग बढ़ गई है। पहले 7 हजार मेगावाट की आवश्यकता थी जो बढ़कर 15000 मेगावाट की मांग बढ़ गई है।

    आईटीसी लिमिटेड के चेयरमैन श्री संजीव पुरी ने सीहोर में आईटीसी की नई निवेश परियोजनाओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी। कार्यक्रम में इछावर विधायक श्री करण सिंह वर्मा, सीहोर विधायक श्री सुदेश राय, आष्टा विधायक श्री रघुनाथ मालवीय, जिला पंचायत अध्यक्ष श्री गोपाल सिंह इंजीनियर, सीहोर जनपद अध्यक्ष श्रीमती नावड़ी बाई बारेला, नगर पालिका अध्यक्ष श्री प्रिंस राठौर उपस्थित थे।

  • जल प्रबंधन में देश भर में अव्वल बना मध्यप्रदेश

    जल प्रबंधन में देश भर में अव्वल बना मध्यप्रदेश


    भोपाल 17 जून(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्यप्रदेश को जल संसाधन के संरक्षण, संवर्धन और प्रबंधन में उत्कृष्ट कार्यों के लिए सर्वश्रेष्ठ राज्य श्रेणी का प्रथम राष्ट्रीय जल पुरस्कार प्राप्त हुआ है। यह देश का चौथा राष्ट्रीय जल पुरस्कार-2022 है। उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने मध्यप्रदेश के जल संसाधन मंत्री तुलसीराम सिलावट और अपर मुख्य सचिव एस.एन. मिश्र को नई दिल्ली विज्ञान भवन में प्रथम पुरस्कार के प्रशस्ति-पत्र और ट्रॉफी से सम्मानित किया। केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, जल शक्ति राज्य मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल और बिश्वेश्वर टुडु भी उपस्थित थे। कार्यक्रम में 11 विभिन्न श्रेणी में 41 विजेताओं को सम्मानित किया गया।
    इंदौर नगर निगम को जल आपूर्ति तथा वितरण में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए सर्वश्रेष्ठ शहरी स्थानीय निकाय श्रेणी के द्वितीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव और अपर आयुक्त सिद्धार्थ जैन को प्रशस्ति-पत्र, ट्रॉफी और एक लाख 50 हजार रूपये नकद पुरस्कार से सम्मानित किया।
    जल संसाधन मंत्री सिलावट ने कहा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में कृषि और किसानों के लिए ऐतिहासिक काम हुए हैं। विगत 18 वर्ष में प्रदेश में सिंचाई का रकबा बढ़ कर 45 लाख हेक्टेयर हो गया है, जिसे वर्ष 2025 तक 65 लाख हेक्टेयर किये जाने के लिए राज्य सरकार प्रतिबद्ध है। जल प्रबंधन के हर क्षेत्र में मध्यप्रदेश ने उत्कृष्ट कार्य किया है।
    प्रदेश में बांध से सीधे खेतों तक भूमिगत पाइप लाइन से जल पहुँचाने का नवाचार हुआ है। प्रदेश की मोहनपुरा एवं कुंडालिया परियोजना, जिसकी सिंचाई क्षमता 2 लाख 25 हज़ार हेक्टेयर है, जल उपयोग दक्षता उन्नयन के क्षेत्र में अनुकरणीय सिंचाई परियोजना के रूप में स्थापित हो चुकी है।

  • किसानों को अमीर बनाएंगे एफपीओः नरेन्द्र सिंह तोमर

    किसानों को अमीर बनाएंगे एफपीओः नरेन्द्र सिंह तोमर

    बालाघाट, 20 मई(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। देश में कृषि के अधो-संरचनात्मक विकास पर निरंतर काम किया जा रहा है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में किसानों को मुनाफे की खेती कर आत्म-निर्भर बनाने के लिये केन्द्र सरकार विभिन्न योजनाएँ संचालित कर रही है। केन्द्रीय कृषि एवं किसान-कल्याण मंत्री श्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने यह बात विश्व मधुमक्खी दिवस पर बालाघाट में हुई राष्ट्रीय कार्यशाला में कही। प्रदेश के किसान-कल्याण एवं कृषि विकास मंत्री श्री कमल पटेल ने कहा कि किसानों के आर्थिक सशक्तिकरण के लिये सरकार तत्पर होकर कार्य कर रही है। विश्व मधुमक्खी दिवस पर मधु एक्स-पो का शुभारंभ किया गया। कार्यक्रम में आयुष एवं जल-संसाधन राज्य मंत्री श्री रामकिशोर ‘नानो’ कावरे, मध्यप्रदेश पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग के अध्यक्ष श्री गौरीशंकर बिसेन, छत्तीसगढ़ के पूर्व मंत्री एवं विधायक श्री बृजमोहन अग्रवाल सहित जन-प्रतिनिधि और अधिकारी उपस्थित थे।

    केन्द्रीय कृषि मंत्री श्री तोमर ने राष्ट्रीय कार्यशाला में कहा कि किसानों को आत्म-निर्भर बनाने के लिये केन्द्र और राज्य सरकार मिल कर निरंतर कार्य कर रही है। किसानों को आत्म-निर्भर बनाने के लिये उनके उत्पाद की ग्रेडिंग, प्रोसेसिंग और पैकेजिंग द्वारा अधिक से अधिक लाभान्वित करने को 10 हजार एफपीओ बनाये जा रहे हैं। एफपीओ पर केन्द्र सरकार 6 हजार 865 करोड़ रूपये व्यय कर रही है। केन्द्रीय मंत्री ने बालाघाट को विश्व मधुमक्खी दिवस पर राष्ट्रीय कार्यशाला के आयोजन के लिये बधाई दी।

    कृषि मंत्री श्री पटेल ने कहा कि प्रदेश सरकार किसानों के सशक्तिकरण के लिये निरंतर कार्य कर रही है। सरकार द्वारा ग्रीष्मकालीन मूंग, उड़द एवं सरसों की समर्थन मूल्य पर खरीदी के लिये पंजीयन कराया जा रहा है। इससे किसानों को सीधे लाभ मिलेगा। प्रदेश में सिंचाई क्षमता को बढ़ा कर 45 लाख हेक्टेयर से बढ़ा कर 65 लाख हेक्टेयर करने का लक्ष्य निर्धारित कर कार्य किया जा रहा है। किसानों के फसल बीमे की प्रीमियम राशि सरकार द्वारा भरी जा रही है।

    कृषि महाविद्यालय में भवन लोकार्पित

    केन्द्रीय मंत्री श्री तोमर, कृषि मंत्री श्री पटेल एवं अन्य अतिथियों ने बालाघाट के राजा भोज कृषि महाविद्यालय में 80 करोड़ रूपये की लागत से बने भवन, छात्रावास एवं ऑडिटोरियम हॉल का लोकार्पण किया।

    बैलजोड़ी दौड़ का हुआ आयोजन

    राजा भोज कृषि महाविद्यालय में बैलजोड़ी दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन हुआ। इसमें देश की 170 से अधिक बैलजोड़ियों ने भाग लिया। प्रतियोगिता के प्रथम पुरस्कार विजेता को 47 हॉर्स पॉवर, द्वितीय पुरस्कार विजेता को 42 हॉर्स पॉवर और तृतीय पुरस्कार विजेता को 32 हॉर्स पॉवर का ट्रेक्टर प्रदान किया गया। इसके अतिरिक्त 22 विजेता को मोटर-साइकिल प्रदान की गई।

  • नानाजी देशमुख विश्विद्य़ालय ने विकास की सोच को कुशासन से रौंदा

    नानाजी देशमुख विश्विद्य़ालय ने विकास की सोच को कुशासन से रौंदा

    प्रदेश के एकमात्र मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय के शिक्षकों को पांच महीनों से नहीं मिला वेतन

    भोपाल,20 जनवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्यप्रदेश की अफसरशाही जब सुशासन की शाबासी लूटने के लिए आईएएस सर्विस मीट का उत्सव मना रही है तब जबलपुर के मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय के शिक्षक पांच महीनों से वेतन न मिलने की वजह से दर दर की ठोकरें खा रहे हैं। देश के मत्स्य कारोबार में प्रशिक्षित उद्यमियों को खड़ा करने वाला ये संस्थान नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय जबलपुर के कुलपति एसपी तिवारी के उस कुशासन की सजा भुगत रहा है जो उन्होंने नौकरियां बांटने की वाहवाही लूटने की वजह से थोपी है। प्रदेश में मछुआ कल्याण तथा मत्स्य पालन विभाग होते हुए इस कॉलेज को पशुपालन विभाग के हवाले सौंपने की नादानी इसी नौकरशाही ने की है जो आज पूरे देश में सुशासन का मॉडल बनी हुई है।

         चुनाव की देहलीज पर बैठी शिवराज सिंह चौहान सरकार ने अपने सभी विभागों को टारगेट दिया है कि वह अधिकाधिक भर्तियां करके युवाओं में बढ़ रही निराशा की भावना को दूर करे। इसका लाभ लेते हुए नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय के कुलपति ने लगभग सौ भर्तियां कर डाली हैं।कथित तौर पर भारी कमीशनखोरी में की गई इन भर्तियों ने न केवल विश्विद्यालय के बजट का भट्टा बिठाल दिया बल्कि अपने अधीन आने वाले मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय का बजट भी स्वाहा कर दिया है। लगभग ग्यारह करोड़ बजट दिए जाने के बावजूद विश्विद्यालय ने केवल सात करोड़ बीस लाख रुपए महाविद्यालय को दिए और बाकी बजट कहां लुटा दिया इसकी कोई जानकारी नहीं दी है। बजट की इस राशि का उपयोग अन्यत्र कर लिए जाने से महाविद्यालय को वेतन बांटने के लाले पड़ गए हैं।

            इस संबंध में कुलपति एसपी तिवारी का कहना है कि सरकार ने सातवें वेतन आयोग की अनुशंसाएं लागू कर दीं हैं इसलिए बजट कम पड़ गया है। नई भर्तियों से नौकरी में आए युवाओं को तो वेतन दिया जा रहा है पर पुराने शिक्षकों के वेतन के लिए सरकार से और राशि मिलने का इंतजार है। वे भर्तियों में भर्राशाही के आरोपों से इंकार करते हुए कहते हैं कि हमने पारदर्शी तरीके से नौकरियां बांटी हैं। उनसे जब पूछा गया कि जब बजट नहीं था तो नई भर्तियां क्यों कर लीं तो उनका कहना था कि हम सभी के वेतन की व्यवस्था कर रहे हैं।

           प्रदेश के एकमात्र मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय को जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर के वैज्ञानिकों ने मछली के कारोबार की संभावनाओं को देखते हुए स्थापित कराया था। तबसे इसे इंडियन काऊंसिल आफ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च की मान्यता के आधार पर ही चलाया जाता है। इस कॉलेज से पढ़कर निकले हजारों छात्र आज समुद्र तटीय इलाकों में कारोबार करने वाली इंटरनेशनल कंपनियों में कार्य कर रहे हैं। राज्य के तालाबों में किए जा रहे मत्स्यपालन कारोबार को विकसित करके इन विद्यार्थियों ने प्रदेश और देश के लिए विदेशी आय का खजाना खोल दिया है। राज्य के मछुआरों और निषाद जाति समुदाय के युवाओं के लिए जीवनरेखा बन चुके इस महाविद्यालय के विकास की संभावनाओं को देखते हुए राज्य सरकार ने अधिक ग्रांट देकर इसे संबल दिया था। इसके बावजूद कुलपति एसपी तिवारी ने महाविद्यालय में केवल चार नई भर्तियां की हैं और पुराने अधिकारियों कर्मचारियों और प्रोफेसरों का वेतन रोककर कालेज का माहौल विषाक्त बना दिया है।

            नानाजी देशमुख का नाम आत्मनिर्भर विकास के फार्मूलों के लिए जाना जाता है। जबकि उनके नाम पर बना विश्वविद्यालय आज विकास की संभावनाओं में पलीता लगाने में जुटा हुआ है। सरकार से अधिक बजट की मांग करके ये स्वशासी संस्थान एक पंगु व्यवस्था का जन्मदाता बन गया है। इन हालात से ऐसा नहीं कि राज्य सरकार या उसकी प्रशासनिक मशीनरी वाकिफ नहीं है। महाविद्यालय के विद्यार्थियों ने कई बार आंदोलन करके सरकार को अपनी व्यथा से अवगत कराया है। मत्स्यपालन के व्यवसाय से जुड़े राज्य के बड़े मतदाता वर्ग ने भी बार बार सरकार को अपने समुदाय की दुर्दशा की जानकारी दी है। इसके बावजूद नौकरियां बेचने में जुटे कई चमचे भाजपा सरकार को गुमराह कर रहे हैं।

            मछुआ कल्याण एवं मत्स्यपालन मंत्री तुलसी सिलावट ने भी कई बार प्रशासन को निर्देश देकर इस महाविद्यालय को अपने विभाग में शामिल करने की सलाह दी है। इसके बावजूद प्रशासनिक अधिकारियों ने मत्स्य कारोबार की संभावनाओं का दोहन करने में कोई रुचि नहीं दिखाई है। मछुआ कल्याण एवं मत्स्य पालन विभाग की प्रमुख सचिव कल्पना श्रीवास्तव से इस संबंध में मुलाकात करने का प्रयास किया गया पर वे आईएएस सर्विस मीट में व्यस्त होने की वजह से उपलब्ध नहीं हो सकीं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हर मंच से दावा करते रहते हैं कि उनकी प्रशासनिक मशीनरी ने प्रदेश को सर्वश्रेष्ठ राज्य बना दिया है लेकिन इस राज्य में कई विभाग ऐसे हैं जहां शिक्षकों और अधिकारियों को वेतन के लिए दर दर की ठोकरें खानी पड़ रहीं हैं।