इसे कहते हैं नेता की छत्रछाया


दिल्ली में रविवार, 25 मई को NDA शासित राज्यों के सीएम और डिप्टी सीएम की मीटिंग में पीएम नरेंद्र मोदी ने पार्टी नेताओं से कहा है, “कहीं भी, कुछ भी मत बोलिए.”यह कहकर उन्होंने भाजपा और एनडीए के नेताओं को साफ साफ समझाईश दी है। रविवार को मुख्यमंत्रियों और डिप्टी मुख्यमंत्रियों के बीच सम्मेलन में उन्होंने देश में कैसा विकास चाहिए इस विषय पर भी अपने खेमे का मार्गदर्शन किया है। दरअसल पिछले दिनों मध्यप्रदेश के आदिवासी नेता और वरिष्ठ मंत्री कुंवर विजय शाह की जुबान ऐसी फिसली कि पूरे देश में हंगामा शुरु हो गया। विपक्ष और मोदी विरोधियों ने इसे लेकर भारी उछलकूद शुरु कर दी। मीडिया के तमाम दिग्गज भी बहती गंगा में हाथ धोने उतर आए। ऐसा माहौल बनाया गया कि मानों देश के विरुद्ध कोई बड़ी साजिश की जा रही हो. इसी सीरीज में राज्य के वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा ने भी पार्टी नेता नरेन्द्र मोदी के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए सेना को अपने साथ खड़ा कर लिया । इसे भी मोदी विरोधियों ने सेना का अपमान बताना शुरु कर दिया। इसी तरह पहलगाम आतंकी हमले पर अब हरियाणा से BJP के राज्यसभा सांसद रामचंद्र जांगड़ा ने विवादित बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अपना सुहाग खोने वाली महिलाओं में वीरांगना का भाव व जोश नहीं था, इसलिए 26 ‌‌लोग गोली का शिकार बने।नेताओं के बड़बोलेपन के इन कुछ उदाहरणों ने भाजपा को बैकफुट पर ला दिया है। उनके ऊटपटांग बयानों पर नाराजगी भरी प्रतिक्रियाएं भी आईँ हैं। भारतीय समाज के लोकतांत्रिक सोच का उद्घोष करती इन प्रतिक्रियाओं के बीच न्यायपालिका के भी कुछ जजों ने बढ़ चढ़कर अपनी आस्तीनें चढाना शुरु कर दिया। कुंवर विजय शाह का मामला तो अदालत के सामने भी पहुंचा दिया गया है। सोशल मीडिया के दौर में जनता के बीच से जो प्रतिक्रियाएं आईं उससे परेशान जनजाति मामलों के मंत्री कुंवर विजय शाह घबरा गए और उन्होंने विभिन्न समाचार माध्यमों और सोशल मीडिया पर अपने बयानों पर खेद व्यक्त किया और माफी मांगी।दरअसल कुंवर विजय शाह भाजपा के संघर्ष के दौर में उभरे नेताओं में से हैं. जब दिग्विजय सिंह की सरकार हरसूद के विस्थापितों पर लाठियां भांज रही थी तब विजय शाह सरकार के आक्रोश के बीच नेता बनकर उभरे थे। राज्य के लगभग बाईस प्रतिशत आदिवासी मतदाताओं के बीच सबसे सशक्त नेता के रूप में विजय शाह सबकी निगाहों में बने रहते हैं। उनके इसी तरह के बयानों से एक बार शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें राजनीति के मैदान से हटाने का मन बना लिया था। इसके बावजूद विजय शाह को जानने वालों को ये पता है कि वे किस तरह जन भावनाओं की अभिव्यक्ति करते हुए कुछ भी कह गुजरते हैं। उनके चुटीले अंदाज को अक्सर नजरंदाज किया जाता रहा है। यही सब जानकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें उनके घर जाकर मनाया और पार्टी में उनका महत्व बरकरार रखा।इस बार मंच पर मौजूद भाजपा की वरिष्ठ नेत्री ऊषा ठाकुर स्वयं कह रहीं हैं कि ये जुबान फिसलने जैसा मामला है। विजय शाह अक्सर अपनी रौ में बहकर वो बातें भी कह देते हैं जो अमूमन सड़कों की भाषा कही जाती है। पाकिस्तान के कट्टर पंथियों के बारे में भारत के राष्ट्रप्रेमी जिस तरह की भाषा का प्रयोग करते हैं ऐसी की कुछ भाषा का इस्तेमाल विजय शाह ने किया था।खुद ऊषा ठाकुर बेहतरीन वक्ता हैं और उनका ओजस्वी भाषण मुर्दों में भी जान फूंकने जैसा होता है। अपनी बहन की बराबरी करने के लिए विजय शाह ने भी बढ़ चढ़कर बयान दे दिया। उनका बयान पाकिस्तान के उन कट्टर पंथियों के लिए चेतावनी देने वाला था कि हमारे हिंदुस्तान की एक मुसलमान महिला ही तुम्हारा मुकाबला कर लेती है, तो फिर पूरे हिंदुस्तान से टकराने की जुर्रत न करो। बेशक उनका भाषण गली छाप कहा जा सकता है लेकिन वह न तो देश के खिलाफ था न सेना के विरुद्ध। सेना की प्रवक्ता कर्नल सोफिया कुरैशी के प्रति अपमान का भाव भी नहीं था। बल्कि वे तो सोफिया कुरैशी को पूरे पाकिस्तान की सेना से भी ज्यादा भारी बताना चाह रहे थे। शब्दों का उचित चयन न करने की वजह से विजय शाह को दोनों हाथ जोड़कर माफी मांगनी पड़ी। विभिन्न माध्यमों पर उनकी प्रतिक्रियाओं से लोगों ने उन्हें माफ भी कर दिया और हल्का फुलका व्यंग्य समझकर बात समाप्त कर दी। भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने भी विजय शाह के बयान को अदालत का विषय बताकर अपना पल्ला झाड़ लिया। उन्होंने तो कांग्रेस के नेताओं के देश विरोधी बयानो का उल्लेख करते हुए कहा कि कांग्रेस नेताओं को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। विजय शाह के मामले में अदालत क्या निर्णय लेती है ये तो सुनवाई के बाद ही पता चलेगा लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एऩडीए के नेताओं को इस तरह के बयानों में न उलझने की सलाह देते हुए स्वयं को विशाल हृदय वाले नेता होने का परिचय दिया है. बेशक विजय शाह जैसे नेताओं के बयानों को नैतिकता या मर्यादा की कसौटी पर कम नंबर मिलें लेकिन इससे उनके पूर्व में किए गये कार्यों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। वैसे भी लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम राजनेताओं को बोलने की आजादी देता है। वह नेताओं को जनता की आवाज बनने की छूट भी देता है।अभिव्यक्ति की आजादी तो हर भारतीय नागरिक का अधिकार है ही। ऐसे में विजय शाह को केवल लापरवाही से भरी बयानबाजी के बाद मंत्रिमंडल से बर्खास्त करने की मांग करना ज्यादति कही जाएगी। फिलहाल नरेन्द्र मोदी ने विजय शाह के माध्यम से भारत सरकार को नैतिकता के कटघरे में खड़ा करने वाले षड़यंत्रकारियों को करारा जवाब दे दिया है.ये उनकी परिपक्व राजनीति का परिचायक है।वास्तव में किसी भी पार्टी का मुखिया होता ही इसलिए है कि वो सभी नेताओं को संरक्षण प्रदान करे. कहा भी गया है कि मुखिया मुख सौ चाहिए, खानपान को एक, पाले पौसे सकल अंग तुलसी सहित विवेक। जाहिर है कि विजय शाह के माध्यम से मोदी विरोध का ख्वाब पालने वालों के स्वप्न अब धरातल पर उतर आएंगे।

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