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  • राज्य के बैंकिंग सुधार राष्ट्र आराधना का पड़ावःभगवानदास सबनानी

    राज्य के बैंकिंग सुधार राष्ट्र आराधना का पड़ावःभगवानदास सबनानी

    भोपाल, 10 सितंबर (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।  भोपाल दक्षिण पश्चिम विधानसभा क्षेत्र के विधायक और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश महामंत्री (State General Secretary) भगवानदास सबनानी ने कहा है कि राज्य सरकार के बैंकिंग सुधार राष्ट्र आराधना के संकल्पों का एक अभिनव पड़ाव है।सरकार ने कड़ी स्पर्धा में जन हितैषी बैंकिग देने वाले संस्थानों से कारोबार करके उत्कृष्ट बैंकिंग परंपरा को बढ़ावा दिया है।वे आज इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक के बैंकिंग क्षेत्र में दस वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित ग्राहक मिलन कार्यक्रम में शामिल हुए थे। भोपाल के एमपी नगर स्थित शाखा में आयोजित समारोह में बैंक की दस वर्ष की यात्रा और भविष्य की योजनाओं पर चर्चा हुई। इस अवसर पर भोपाल मध्यप्रदेश फार्मेसी काउंसिल के चेयरमैन संजय जैन ने भी केक काटकर समारोह की गरिमा बढ़ाई।

    श्री सबनानी ने कहा कि राज्य शासन की सजग निगाहों ने बैंकिंग के क्षेत्र में जो फैसले लिए हैं  उनका दूरगामी असर होगा। निगम मंडलों और सरकारी संस्थानों की आय बढ़ाने में इक्विटास बैंक अवश्य सार्थक भूमिका निभाएगा। भोपाल में आयोजित कार्यक्रम में बैंक के क्षेत्रीय प्रबंधक अमित देशपांडे,बैंक भोपाल संभाग प्रमुख मनीष मरदवार और शाखा प्रबंधक लोकेश जैन सहित अधिकारी ,कर्मचारी और प्रतिष्ठित ग्राहकगण भी मौजूद रहे।

    मध्यप्रदेश फार्मेसी काऊंसिल के चेयरमेन संजय जैन ने केक काटकर बैंक कर्मियों को बधाई दी।

    कार्यक्रम में शामिल मध्यप्रदेश फार्मेसी काऊंसिल के चेयरमेन संजय जैन ने कहा कि जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को संबल प्रदान करने के लिए राज्य सरकार ने गुणवत्तापूर्ण सेवाएं देने वाले बैंकों को जवाबदारियां दी हैं। इक्विटास बैंक अपने कुशल माईक्रोफायनेंस और ‘कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व’ की स्वस्थ परंपरा के लिए जाना जाता है। रिजर्व बैंक के कठोर मापदंडों पर खरा उतरने की वजह से सरकार के वित्त विभाग ने उसे अपना सहयोगी संस्थान बनाया है। बैंकिंग करते हुए मात्र एक दशक में बैंक ने जो स्थान हासिल किया है वह प्रशंसनीय है।

    इक्विटास की बैंकिंग यात्रा छोटे वित्त बैंक के रूप में शुरू हुई थी। पिछले दस वर्षों में बैंक ने देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी पहुंच बढ़ाई है। बचत खाते, जमा योजनाएं, ऋण और डिजिटल बैंकिंग जैसी सेवाओं के माध्यम से बैंक ने छोटे कारोबारियों, उद्यमियों और आम ग्राहकों तक पहुंच बनाने पर जोर दिया है। बैंक प्रबंधन के अनुसार आने वाले समय में तकनीक आधारित सेवाओं के साथ ग्राहक अनुभव को और बेहतर बनाने पर ध्यान दिया जाएगा।

    दसवीं वर्षगांठ के अवसर पर चेन्नई में बैंक के नए मुख्यालय इक्विटास टावर्स का उद्घाटन भी किया गया। अन्ना सलाई स्थित नए कॉरपोरेट कार्यालय का उद्घाटन भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर और मद्रास स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के चेयरमैन डॉ. सी. रंगराजन ने किया। समारोह में IRDAI के पूर्व चेयरमैन और इक्विटास होल्डिंग्स के पूर्व चेयरमैन एन. रंगाचारी, मुरुगप्पा ग्रुप के पूर्व चेयरमैन एम.ए. अलगप्पन तथा Aptus Value Housing Finance India के संस्थापक और कार्यकारी चेयरमैन एम. अनंदन विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। बैंक के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी पी.एन. वासुदेवन तथा चेयरमैन अनिल कुमार शर्मा ने भी कार्यक्रम को संबोधित किया।

    नए मुख्यालय का उद्घाटन बैंक की दस वर्ष की यात्रा में महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। नए भवन में एक हजार से अधिक कर्मचारियों के काम करने की क्षमता है। बैंक प्रबंधन ने इसे संगठन के अगले चरण के विस्तार, बेहतर कार्यप्रणाली और कर्मचारियों के बीच सहयोग बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है। समारोह में ‘व्हेन ऑर्गनाइजेशंस विन’ पुस्तक का विमोचन भी किया गया, जिसमें नेतृत्व, संगठनात्मक संस्कृति और बेहतर प्रशासन से जुड़े विषयों पर विचार प्रस्तुत किए गए।

    भोपाल में आयोजित समारोह में बैंक के अधिकारियों ने मध्यप्रदेश में बैंक की बढ़ती भूमिका का भी उल्लेख किया।बैंक के क्षेत्रीय व्यवसाय प्रबंधक मनीष मरदवार ने कहा कि बैंक ने रिजर्व बैंक की नियामकीय कसौटियों को पूरा करते हुए छोटे उद्यमियों और समाज के विभिन्न वर्गों तक बैंकिंग सुविधाएं पहुंचाने पर लगातार काम किया है। उनके अनुसार बैंकिंग व्यवस्था में अब प्रतिस्पर्धा का दायरा बढ़ रहा है। वित्तीय मजबूती और नियामकीय शर्तों को पूरा करने वाले निजी तथा छोटे वित्त बैंकों को भी संस्थागत बैंकिंग में अवसर मिल रहे हैं। इससे सरकारी संस्थाओं को बैंकिंग सेवाओं के अधिक विकल्प मिलने के साथ बैंकों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ने की संभावना है।

    शाखा प्रबंधक लोकेश जैन ने कहा कि मध्यप्रदेश सरकार के वित्त विभाग ने निर्धारित मापदंडों को पूरा करने वाले बैंकों की सूची में इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक को भी शामिल किया है। इससे सरकारी निकायों, निगमों, मंडलों, बोर्डों, उपक्रमों और विश्वविद्यालयों के पास उपलब्ध राशि को निर्धारित नियमों और शर्तों के अनुसार बैंक में जमा करने का अवसर मिल सकेगा।शासन के इस फैसले से राज्य के विकास का नया अध्याय शुरु होगा।

    उत्साह से लबरेज अधिकारियों और कर्मचारियों ने बैंक को जनहितैषी बनाने की प्रतिबद्धता दुहराई

    भोपाल में आयोजित समारोह में बैंक के अधिकारियों, कर्मचारियों और गणमान्य नागरिकों ने दस वर्ष की यात्रा को याद करते हुए अगले दशक के लिए शुभकामनाएं दीं। कार्यक्रम का मुख्य संदेश ग्राहक विश्वास, तकनीक आधारित बैंकिंग और जिम्मेदार विस्तार के साथ बैंकिंग सेवाओं को और व्यापक बनाने का रहा।

  • भारत में विष घोलने में जुटे दुनिया के बड़े सूदखोर

    भारत में विष घोलने में जुटे दुनिया के बड़े सूदखोर

    भारत पिछले एक दशक में दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल रहा है। डिजिटल भुगतान, आधार आधारित सेवा वितरण, जीएसटी, दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी), प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, विनिर्माण को बढ़ावा देने वाली योजनाएँ, बुनियादी ढाँचे में निवेश और रक्षा उत्पादन जैसे क्षेत्रों में हुए परिवर्तन को सरकार अपनी आर्थिक उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत करती है। दूसरी ओर, इन नीतियों और अन्य सरकारी निर्णयों का विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, किसान समूहों, छात्र संगठनों और नागरिक मंचों पर विरोध भी किया गया है।यहीं से एक महत्वपूर्ण प्रश्न जन्म लेता है—क्या ये विरोध केवल लोकतांत्रिक असहमति हैं, या इनका व्यापक आर्थिक प्रभाव भी पड़ता है? इस प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है और इसे तथ्यों के आधार पर समझना आवश्यक है।

    इतिहास बताता है कि बड़े आर्थिक सुधार लगभग हर लोकतंत्र में विवाद का विषय बने हैं। भारत में भी जीएसटी, कृषि कानून, श्रम सुधार, निजीकरण, भूमि अधिग्रहण, भर्ती परीक्षाओं की व्यवस्था, पर्यावरणीय स्वीकृतियाँ तथा शिक्षा संबंधी निर्णयों पर समय-समय पर व्यापक विरोध हुए हैं। इन आंदोलनों के पीछे अलग-अलग कारण रहे हैं—कहीं आजीविका की चिंता, कहीं प्रक्रियागत पारदर्शिता की मांग, तो कहीं राजनीतिक मतभेद।

    साथ ही यह भी सत्य है कि लंबे समय तक चलने वाले आंदोलन, अनिश्चितता और राजनीतिक टकराव का आर्थिक गतिविधियों पर प्रभाव पड़ सकता है। उद्योग जगत प्रायः नीति की स्थिरता, कानून-व्यवस्था और पूर्वानुमेय वातावरण को निवेश के लिए महत्वपूर्ण मानता है। जब किसी बड़े सुधार के विरुद्ध लंबा गतिरोध पैदा होता है, तो परियोजनाओं में विलंब, निवेश संबंधी निर्णयों में सावधानी और बाज़ार में अनिश्चितता देखी जा सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर विरोध विकास-विरोधी होता है, बल्कि यह कि लंबे समय तक बनी अनिश्चितता आर्थिक लागत उत्पन्न कर सकती है।

    इसी संदर्भ में कुछ राजनीतिक विश्लेषक यह तर्क देते हैं कि भारत के तेज़ आर्थिक उभार से वैश्विक शक्ति-संतुलन प्रभावित हो रहा है। उनका कहना है कि विश्व अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहती; तकनीक, पूँजी, आपूर्ति शृंखलाएँ, मुद्रा, ऊर्जा और भू-राजनीतिक प्रभाव भी इसमें शामिल होते हैं। इसलिए बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है।

    ऐसा पहली बार हुआ है कि अमेरिका जैसा विकसित देश खुलेआम भारत को चुनौतियां देता नजर आ रहा है। अब तक उसके नेता लुक छुपकर अपनी बातें कहते रहे हैं,ऐसा पहली बार हुआ है जब अमेरिका ने भारतीय युवाओं को अपने देश से खदेड़ना शुरु किया। दरअसल अप्रवासी भारतीय मोदी सरकार के लिए एक कमजोर कड़ी साबित हो रहे हैं। भारत सरकार खुलकर अमेरिका का विरोध नहीं कर पा रही है जबकि वह ईरान में भारतीय निवेश वाले बंदरगाह पर बम बरसाकर दादागिरी करता जा रहा है।भारत ने जिस तरह एशिया के आर्थिक एकीकरण की पहल की है उससे दुनिया की  स्थापित अर्थव्यवस्थाएं घबरा गईं हैं। उन्हें लगता है कि भारत ,चीन, रूस और ईरान जैसे देश यदि मिलकर आगे बढ़ने लगेंगे तो डालर की सत्ता धराशायी हो जाएगी। पहली बार दुनिया में जिस तरह सीआईए के शोषणकारी नेटवर्क के विरुद्ध दुनिया के देश लामबंद हो रहे हैं उससे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बौखला गए हैं। उनके नेतृत्व वाली सरकार जिस तरह खुलेआम गुंडागर्दी कर रही है उसे देखकर स्वयं अमेरिका के बुद्धिजीवी भी बेचैन हो गए हैं और अपनी ही सरकार को ट्रोल कर रहे हैं।

    वैश्विक वित्तीय संस्थाएँ, निवेशक, रेटिंग एजेंसियाँ और बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ किसी भी बड़े देश की आर्थिक नीतियों पर नज़र रखती हैं। ब्याज दरों, पूँजी प्रवाह, विदेशी निवेश, मुद्रा विनिमय दर और ऋण बाज़ार के माध्यम से वैश्विक वित्त का प्रभाव सभी उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता है। इसी प्रकार अंतरराष्ट्रीय मीडिया, थिंक टैंक और निवेशक भी किसी देश की राजनीतिक स्थिरता और नीतिगत वातावरण का विश्लेषण करते हैं। लेकिन यह प्रभाव और किसी घरेलू आंदोलन को नियंत्रित करने का दावा दो अलग-अलग बातें हैं।

    भारत में विरोध प्रदर्शनों की राजनीति को समझने के लिए घरेलू कारकों की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती। विपक्ष का दायित्व सरकार की आलोचना करना है, जबकि सरकार का दायित्व अपने निर्णयों का औचित्य सिद्ध करना और जनता का विश्वास बनाए रखना है। लोकतंत्र में यह स्वाभाविक प्रक्रिया है। किंतु जब किसी भी पक्ष द्वारा अपुष्ट सूचनाएँ, भ्रामक प्रचार या भावनात्मक ध्रुवीकरण का सहारा लिया जाता है, तब सामाजिक विश्वास और आर्थिक वातावरण दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

    आर्थिक विकास और लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच संतुलन किसी भी आधुनिक राष्ट्र की सबसे बड़ी परीक्षा है। यदि विकास परियोजनाएँ बिना पर्याप्त संवाद के आगे बढ़ेंगी, तो विरोध की संभावना बढ़ेगी। वहीं यदि प्रत्येक बड़े सुधार को केवल राजनीतिक संघर्ष का माध्यम बना दिया जाएगा, तो नीतिगत स्थिरता प्रभावित हो सकती है।

    भारत की दीर्घकालिक आर्थिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह एक ओर निवेश, नवाचार और औद्योगिक विकास को गति दे, तो दूसरी ओर संस्थागत पारदर्शिता, न्यायसंगत निर्णय-प्रक्रिया और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक संवाद को भी समान महत्व दे। यही संतुलन देश को स्थायी आर्थिक प्रगति की दिशा में आगे ले जा सकता है।

    इसलिए बहस का वास्तविक प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि हर विरोध राष्ट्रहित में है या राष्ट्रविरोधी। अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या विरोध तथ्यों पर आधारित है, क्या सरकार संवाद के लिए तैयार है, क्या सुधारों की प्रक्रिया पारदर्शी है, और क्या राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच देश की दीर्घकालिक आर्थिक क्षमता को सुरक्षित रखा जा रहा है। फिलहाल जिस तरह सोनम वांगचुक से हुए संवाद के बाद समाधान की राह प्रशस्त हुई है उसे देखकर सरकार की सकारात्मक सोच की पुष्टि हो रही है।