Category: राज्य मंत्रालय

  • बुंदस जैसे अफसरों का सोच आज भी औपनिवेशिक

    बुंदस जैसे अफसरों का सोच आज भी औपनिवेशिक

    (डॉ अजय खेमरिया)
    मप्र में छतरपुर के कलेक्टर कलेक्टर है मोहित बुंदस।सीधी भर्ती के आईएएस अफसर है इन्हें हटाने के लिये जिले की तीन पार्टियों के सभी पांच विधायक मप्र के सीएम से गुहार लगा चुके है।बीजेपी के विधायक राजेश प्रजापति को कलेक्टर महोदय ने पूरे दो घण्टे तक बाहर बिठाए रखा मिलने से पहले।कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे सत्यव्रत चतुर्वेदी के विधायक भाई आलोक चतुर्वेदी भी कुछ इन्ही अनुभवों से बेजार है।जिस सपा विधायक के समर्थन से कमलनाथ सरकार टिकी है वे राजेश शुक्ला भी मुख्यमंत्री से फरियाद कर रहे है कि कलेक्टर को हटाया जाए क्योंकि वे न किसी की सुनते है न फील्ड में जाते।बाबजूद मोहित बुंदस पर मुख्यमंत्री की कृपा बरस रही है।यह पहला मौका नही है जब मप्र में आईएएस अफसरों के सामने इस तरह चुने गए विद्यायको को लाचार और विवश होकर खड़ा होना पड़ा है।असल में मप्र में लगातार अफसरशाही की निरंकुशता बढ़ रही है न केवल कमजोर बहुमत वाली मौजूदा कमलनाथ सरकार में बल्कि मजबूत बहुमत से चलीं बीजेपी की सरकारों में भी अफसरशाही से जनता ही नही सत्ता पक्ष के विधायक और मंत्री तक परेशान रहे है।
    आखिर क्या वजह है कि भारत मे आज भी कलेक्टर का पद इतना ताकतवर होता जा रहा है इस उलटबांसी के की देश मे लोकतंत्र निचले स्तर पर मजबूत हुआ है लोगों में लोकतांत्रिक अधिकार और जागरूकता का व्यापक प्रसार हुआ है।कलेक्टर की ताकत अपरिमित रूप में बढ़ रही है।यह जानते हुए की इस पद का निर्माण गोरी हुकूमत ने औपनिवेशिक साम्राज्य की मैदानी पकड़ मजबूत करने के लिये किया था।कलेक्टर मतलब राजस्व औऱ लगान कलेक्शन करने वाला साहब।अंग्रेजी राज में इसे सूबा साहब भी कहा जाता था।क्योंकि तब आज की तरह जिलों की छोटी इकाइयां नही थी।आईसीएस की भर्ती भी अंग्रेजों के पास थी और शरुआती दौर में परीक्षा भी इंग्लैंड में ही हुआ करती थी।यानी समझ लीजिये ये पद जो बाद में आईसीएस की जगह आईएएस में तब्दील हुआ है उसकी गर्भ नाल उस अंग्रेजी साम्राज्यवाद में छिपी है जो भारतीयों को दोयम दर्जे का इंसान मानती थी।क्या यही मानसिकता इन अफसरों को मैदान में परिचालित करती है?मोहित बुंदस जैसे प्रहसन इसे साबित करने के लिये पर्याप्त आधार प्रदान करते है।सीधी भर्ती के अधिकतर आईएएस अफसर खुद को भारत मे सबसे काबिल और ताकतवर शख्स मानते है वे सोचते है कि यूपीएससी की परीक्षा पास कर आईएएस संवर्ग हासिल करने के बाद दुनियां में अब कुछ भी ऐसा नही जो उनसे ऊपर हो।अधिकतर आईएएस अधिकारी जब प्रशिक्षण प्राप्त कर मैदानी पदस्थापना पर आते है तो उन्हें इस बात का अहसास रहता है कि देश के सभी नेता अनपढ़ प्रायः है कानून औऱ नियमों का उन्हें कोई ज्ञान नही है।और इस देश मे हर कोई कानून तोड़कर गलत काम करना चाहता है।आईएएस ही कानून के अकेले रक्षक है उन्हें हर हाल में अडिग,सख्त,और अनुदार बने रहना है।वस्तुतः यह भारत की आइएएस बिरादरी का स्थायी चरित्र बन गया है।सवाल यह है कि क्या वाकई यूपीएससी की परीक्षा प्रवीण शख्स दुनिया का सर्वाधिक श्रेष्ठ और प्रतिभाशाली माना जाना चाहिये?पिछले 70 साल से तो यह मान ही लिया जाना चाहिये क्योंकि हर दिन इस बिरादरी की ताकत बढ़ती गई है।जिस अनुपात में सरकारों के काम बढ़े ,राज्य का चेहरा लोककल्याण के नाम पर जीवन के हर क्षेत्र में हस्तक्षेपनीय बना उसी अपरिमित अनुपात में आईएएस बिरादरी की ताकत,रुतबा,और अहं बढ़ता चला गया है।आज का कलेक्टर सही मायनों में अंग्रेज बहादुर से कम नही है औपनिवेशिक सूबों की तरह सूबा साहब को आज चरितार्थ कर रहा है। कलेक्टर दो तीन बीघा के सर्वसुविधायुक्त बंगलों में रहता है उसके पास भारतीय (दोयम)सेवादार है जो घर,रसोई,बगीचों से लेकर दफ्तरों तक हर जगह अर्दली में लगे है।जिसके घर के बिजली, पानी से लेकर खाने पीने तक कि किसी भी सुविधा का कोई ऑडिट नही होता है।जिसकी एक आवाज पर अधीनस्थ अफसरों की फ़ौज आधी रात को शीर्षासन करने पर ततपर रहती है।जिसकी सुरक्षा में 24 घण्टे जवान खड़े रहते है।आप उसकी मर्जी के बगैर उससे मिल नही सकते है।वह आपका फ़ोन उठाये यह उसकी मर्जी पर निर्भर है।वह विकास पुरुष है वह दंडाधिकारी है वह जिले का सुपर बॉस है। वह किसी को भी मुअतिल कर सकता है।वह आज का महाराजा है।उसके काम के घण्टे तय नही है,कोई उससे उसके काम का हिसाब नही मांग सकता है।फिर भी वह सिविल सर्वेंट है।उसका सुपर बॉस राज्य का मुख्य सचिव है जो अपनी बिरादरी का सर्वोच्च सरंक्षणदाता है।मायावती को छोड़कर भारत मे किसी शख्स ने कभी भी इस महाराजा के वर्चस्व को चुनौती नही दी।आईएएस ब्रह्म ज्ञानी है उनकी मेधा स्वयंसिद्ध है वह जिस जगह खड़ा हो जाता है उस क्षेत्र का हुलिया बदल देता है वह कभी कलेक्टर के रूप में विकास के नए आयाम स्थापित करता है जिसकी गवाही नीति आयोग के आभासी जिलों की संख्या दे ही रहे है।आईएसएस कभी बिजली कम्पनी के सीएमडी के रूप में भारत को ऊर्जीकरत कर देता है,कभी वह लोकस्वास्थ्य, कभी मेडिकल एजुकेशन, संचार,उधोग,सिविल एवियेशन,विज्ञान,स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा, पीएचई, जल संसाधन ,नगर विकास,जनसम्पर्क से लेकर शासन के हर क्षेत्र को अपनी प्रतिभा से अलंकृत करता रहता है।जब इतनी प्रतिभा किसी एक हाड़मांस में घनीभूत हो तब आपके पास उसकी अद्वितीय श्रेष्ठता को अधिमान्यता देने का कोई अन्य विकल्प शेष ही नही रह जाता है।
    सवाल यह भी है कि एक व्यक्ति के रूप में इस वर्ग के इस अवतार को आखिर विकसित किसने किया है?हमारी व्यवस्था में विधायिका ,कार्यपालिका, और न्यायपालिका का स्पष्ट विभाजन है लेकिन यहां चर्चिल की भविष्यवाणी ने फलित होकर सब कुछ अस्त व्यस्त कर दिया है शक्ति पृथक्करण का राजनीतिक सिद्धान्त तिरोहित हो चुका है कतिपय कमजोर चरित्र के लोगों ने सरकार के तीनों अंगो को अपनी अंतर्निहित भूमिका से भटका दिया है।सत्ता के लिये असुरक्षा की मार से पीड़ित नेताओं ने कभी इस तरफ सोचा ही नही की वह अपने सत्ता सुख को बचाने के लिये किस तरह उस व्यवस्था के दास बनते चले जा रहे है जो उनके सार्वजनिक अनुभवों से अधीनस्थ अमले के रूप में काम करने के लिये प्रावधित है।इस असुरक्षा की ग्रन्थि ने ही आज भारत की लोकशाही को बाबूशाही में बदल दिया है और मोहित बुंदस असल में इसी बाबूशाही के प्रतिनिधि भर है।ऐसा नही है कि इस बिरादरी में सभी एक जैसे है कुछ अफसर अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय करने का प्रयास करते है।मप्र में एक मुख्य सचिव के समकक्ष अफसर है जो जिस विभाग में रहते है उसमें ढल कर काम करते है।कुछ कलेक्टर के रूप में भी संवेदनशीलता दिखाते है लेकिन ऐसे अफसरों की संख्या बहुत ही कम है।
    प्रशासन के स्तर पर जिलाधिकारी को इस योग्य माना जाता है कि वह अपने अधीनस्थ अधिकारियों पर नियंत्रण में सक्षम है लेकिन 70 साल के अनुभव बताते है कि जिलों में ऐसा नही हुआ है।मप्र में हर मंगलवार जिला मुख्यालय पर जनसुनवाई होती है वहाँ औसतन दो तीन सौ लोग सुदूर गांवों से अपनी फरियाद लेकर कलेक्टर के पास आते है इसका मतलब अधीनस्थ अमला जनता की सुनवाई नही कर रहा है।अफसरशाही की संवेदनशीलता को खारिज करने के लिये हजारों मामले सामने रखे जा सकते है।जाहिर है देश मे इस वर्ग की उपयोगिता और योगदान पर विचार करने का समय आ गया है।क्या भर्ती के समय सेवा करने का जो जबाब अभ्यर्थियों द्वारा दिया जाता है वह सेवा में आने के बाद किसी औपनिवेशिक विशेषाधिकार को स्थापित कर देता है?अनुभव तो इसकी तस्दीक करते ही है।इसलिये समय आ गया है कि हम इस आईएसएस सिस्टम और इसकी भागीदारी पर खुले मन से पुनर्विचार करें।गांधी जी का एक प्रसंग यहां उदधृत किया जाना चाहिये।अहमदाबाद में अपने एक परिचित के बेटे नानालाल के आईसीएस में सिलेक्ट होने पर आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि सिविल सेवक भारत का भला नही कर सकते है।यह एक बुराई है।आज गांधी की 150 वी जन्मजयंती बर्ष में उनके विचारों के आलोक में आईएएस सिस्टम पर विचार किया जाना चाहिये।
    मौजूदा केंद्र सरकार ने निजी क्षेत्र के पेशेवर लोगों को लैटरल एंट्री के जरिये सीधे आईएएस के समकक्ष भर्ती का प्रयोग किया है इसे नए भारत मे समय की मांग कहा जा सकता है।
    तब तक सर्वशक्तिमान,सर्वाधिक प्रतिभाशाली, सर्वाधिक बुद्धिमान और कानून के रखवालों के अधीन आनन्द लीजिये।
    यह अलग बात है कि शिवपुरी जिले के एक कलेक्टर साहब को प्रधानमंत्री आवास योजना की बुनियादी गाइडलाइंस नही पता है वे आजकल एक दूसरे जिले में कलेक्टर है। सीधी भर्ती से इनकी पोजिशन भारत बर्ष में अंडर 30 थी।
    मान्यता यही है की कलेक्टर कभी गलती नही करते है उनसे ज्यादा किसी को कुछ नही आता है।इसीलिए मोहित बुंदस सभी विधायकों को घण्टे भर बाहर खड़ा रखते है।भले ही विधायक का स्थान प्रोटोकॉल में मुख्य सचिव से ऊपर है।

  • सब्सिडी के बाद भी बिजली संकट चिंताजनक बोले कमलनाथ

    सब्सिडी के बाद भी बिजली संकट चिंताजनक बोले कमलनाथ

    मुख्यमंत्री की म.प्र. यूनाइटेड फोरम फॉर पावर इंप्लाईज एवं इंजीनियर्स एसोसिएशन के प्रतिनिधि-मंडल से चर्चा 

    भोपाल,25 जून(प्रेस सूचना केन्द्र)। मुख्यमंत्री कमल नाथ ने कहा है कि विद्युत उपभोक्ताओं की समस्याओं के समाधान से ही विद्युतकर्मियों की दिक्कतों का हल संभव है। विद्युतकर्मी बिजली उपभोक्ताओं को निरंतर और गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ उपलब्ध करवाएँ। सरकार उनके हितों का पूरा संरक्षण करेगी। श्री नाथ आज मंत्रालय में मध्यप्रदेश यूनाइटेड फोरम फॉर पावर इंप्लाईज एवं इंजीनियर्स एसोसिएशन के प्रतिनिधि मंडल से चर्चा कर रहे थे।

    मुख्यमंत्री श्री नाथ ने कहा कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में विद्युत उपभोक्ताओं को निर्बाध बिजली मिले, जिससे वे संतुष्ट हों और विद्युत विभाग की खराब छवि में सुधार आए। इसके लिए सभी विद्युत वितरण कंपनी के कर्मचारी समर्पण भावना से काम करें। मुख्यमंत्री ने कहा कि आज सभी विद्युतकर्मियों को आत्म-चिंतन करने की आवश्यकता है। विद्युत उपभोक्ताओं के हित संरक्षण के साथ विद्युतकर्मियों की परेशानी दूर करने के लिए सरकार हर वह निर्णय लेगी, जो प्रदेश में विद्युत वितरण की व्यवस्था को सुदृढ़ बनाएगा।

    विद्युत उपभोक्ताओं की संतुष्टि सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता

    मुख्यमंत्री ने कहा कि बिजली की अघोषित कटौती और विद्युत वितरण व्यवस्था सुचारु न होने के कारण सरकार को नागरिकों की सबसे ज्यादा आलोचना का शिकार होना पड़ा है। उन्होंने कहा कि जरूरत इस बात की है कि विद्युत विभाग अपनी छवि सुधारने के लिए काम-काज में व्यापक सुधार लाए। मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारी सबसे बड़ी चिंता यह है कि प्रदेश में विद्युत व्यवस्था स्थाई रूप से सुदृढ़ बने। इसके लिए हमें दीर्घकालीन उपायों पर विचार करना होगा। उन्होंने कहा उपभोक्ताओं की संतुष्टि सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसके साथ कोई भी समझौता नहीं किया जाएगा।

    उच्च गुणवत्ता के विद्युत उपकरण ही खरीदें

    मुख्यमंत्री श्री नाथ ने कहा कि हमें माँग और आपूर्ति के बीच में सामंजस्य लाना होगा। ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन में हो रहे घाटे को कम करने की दिशा में भी ठोस कदम उठाने होंगे। विद्युत चोरी पर सख्ती के साथ अंकुश लगाना होगा। श्री नाथ ने कहा कि उच्च गुणवत्ता के उपकरण ही खरीदे जाएँ। इसके लिए निगरानी आधारित व्यवस्था बनानी होगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि आज सरकार सब्सिडी की बड़ी राशि विद्युत मंडल को दे रही है। उसके बाद भी कृषि और गैर कृषि क्षेत्रों में विद्युत व्यवस्था को लेकर असंतोष है, यह चिंता का विषय है। मुख्यमंत्री ने ऊर्जा के गैर पारंपरिक स्रोत पर भी विचार करने को कहा। इससे सस्ती बिजली का उत्पादन होगा और सरकार पर पड़ने वाले वित्तीय भार में भी कमी आएगी।

    मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ ने एसोसिएशन के सभी अधिकारियों-कर्मचारियों से कहा कि वे प्रदेश में विद्युत वितरण में सुधार लाने, ट्राँसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन को कम करने और उच्च गुणवत्ता के उपकरण क्रय करने के संबंध में एक समग्र योजना बना कर दें। मुख्यमंत्री ने कहा कि वे एसोसिएशन से सतत् संवाद के लिए उपलब्ध है। जब भी आवश्यकता हो, वे उनसे मिल सकते हैं।

    बैठक में मुख्य सचिव श्री एस.आर. मोहंती और अपर मुख्य सचिव ऊर्जा श्री आई.सी.पी. केशरी उपस्थित थे।

  • कमलनाथ सरकार को दलालों ने घेरा

    कमलनाथ सरकार को दलालों ने घेरा

    राज्य मंत्रालय में रोज सुबह से देर शाम तक इसी तरह आगंतुकों का जमघट लगा रहता है। दलालों और सुरक्षा कर्मियों के बीच आए दिन बहसें होती रहती हैं।

    आगामी लोकसभा चुनावों के लिए राजनैतिक जमावट में जुटी कमलनाथ सरकार न चाहते हुए भी दलालों से घिर गई है। मुख्यमंत्री कमलनाथ जगह जगह वित्तीय कुप्रबंधन को रोकने के उपाय करते नजर आ रहे हैं जबकि कांग्रेस संगठन से जुड़े पदाधिकारी अपने लाव लश्कर समेत सत्ता की मलाई सूंतने में जुट गए हैं। सरकार के महत्वपूर्ण विभागों को खंगालने के लिए उन्होंने भाजपा शासनकाल के दलालों को भी अपने खेमे में शामिल कर लिया है। सबसे बड़ी बात तो ये है कि पिछले पंद्रह सालों के भाजपा शासनकाल में सुशासन की जो कवायद की गई थी वो अब ताक पर धर दी गई है और मंत्रालय के गलियारे दलालों की दौड़भाग से गुलजार हो चले हैं। एक मलाईदार विभाग के मंत्री के विशेष सहायक इतनी जल्दी में हैं कि उन्होंने पूरे प्रदेश के अफसरों को धमकाकर वसूलियां शुरु कर दीं हैं। लोगों ने भी उनकी डिमांड के फोन टेप कर लिये हैं और उचित समय का इंतजार कर रहे हैं।

    ऐसा नहीं कि मुख्यमंत्री कमलनाथ इस सच से अनजान हैं। उनके खबरची लगातार ये फीडबैक दे रहे हैं। इसके बावजूद मुख्यमंत्री सचिवालय से वेट एंड वाच की सलाह ही दी जा रही है। इसकी वजह कांग्रेस संगठन का बिखरा स्वरूप है। अलग अलग धड़ों में बंटी कांग्रेस के तमाम नेतागण और उऩके समर्थक लंबे समय से कह रहे हैं कि पिछले पंद्रह सालों से वे सत्ता की मलाई खाने से वंचित रहे हैं। ऐसे में उन्हें अगला आम चुनाव भी लड़ना है। जनता के बीच दौड़ भाग के लिए रसद पानी का इंतजाम करने के लिए उन्हें भी अवसर चाहिए। इसलिए मंत्रालय के दरवाजे कांग्रेस समर्थकों के लिए खोल दिए गए हैं। रोज सुबह से मंत्रालय के गलियारों में दौड़ भाग करते कांग्रेस समर्थकों की भीड़ देखी जा सकती है। इनके साथ आने वाले दलाल बाजार से आवेदन बनाकर लाते हैं और मंत्रियों के स्टाफ से नोटशीट बनवाकर आदेश जारी करवाने में जुट जाते हैं।

    लंबे समय से सत्ता की गुंडागर्दी भूल चुके अफसरों के लिए ये एक नया अनुभव साबित हो रहा है। एक कमाऊ विभाग के प्रमुख को पिछले दिनों बड़ी कड़वी हकीकत से रूबरू होना पड़ा। उन्होंने जब मंत्री के दफ्तर से धड़ाधड़ आ रही नोटशीट डंप करना शुरु कर दिया तो मंत्री के समर्थकों ने उन्हों फोन पर गरियाना शुरु कर दिया। कुछ समर्थकों ने तो अफसर की माता बहिनों की सलामती की दुआ करते हुए कहा कि अब अच्छे से समझ लो ये कांग्रेस की सरकार है। यहां ना नुकुर की तो हम कांग्रेसी अपने नेताओं को भी नहीं छोड़ते,अफसरों की बिसात ही क्या है। अफसर को ये प्रेम भरा प्रस्ताव जल्दी समझ में आ गया और सारी नोटशीट एक ही झटके में आदेश बन गईं।

    सत्ता बदलते ही प्रशासन में आई इस तब्दीली से अफसर हक्के बक्के हैं वे मुख्यमंत्री से शिकायत नहीं कर सकते क्योंकि पद संभालते ही उन्होंने साफ कह दिया था कि किसी भी कार्यकर्ता का काम अटकना नहीं चाहिए। यदि मेरे पास शिकायत आएगी तो मैं उसे बख्शूंगा नहीं। अब ऐसे में भला कांग्रेस के शेरों पर लगाम लगाने का साहस भला कौन कर सकता है। लगभग अराजकता के दौर में प्रवेश कर चुकी प्रशासनिक व्यवस्था को देखकर अफसरों ने भी वेट एंड वाच की ही शैली अख्तियार कर ली है। एक आला अफसर ने कहा कि हम तो प्रदेश हित को ध्यान में रखकर व्यवस्था बनाने की कोशिश कर रहे थे। अब जब सरकार ही नहीं चाहती कि नियमों और कानूनों का पालन हो तो हम क्या कर सकते हैं।

    अटल बिहारी वाजपेयी इंस्टीट्यूट आफ गुड गवर्नेंस एंड पालिसी एनालिसिस के प्रशासन प्रबंधक ग्रुप केप्टन एचपी शर्मा कहते हैं कि कोई भी सरकार बदलती है तो प्रशासन उसकी नीतियों के साथ कदमताल करने की कोशिश करता है।धीरे धीरे जब सरकार और अफसरों की कार्यशैली में साम्य स्थापित हो जाता है तो प्रशासनिक व्यवस्था आकार ले लेती है। पिछली सरकार लंबे समय तक रही ऐसे में जाहिर है कि सरकार और अफसरों ने एक दूसरे की प्राथमिकताओं को समझ लिया था। अब नई सरकार के सामने चुनावी चुनौतियां भी हैं ऐसे में प्रशासन की शैली को स्थिर होने में थोड़ा वक्त लग सकता है।

    दरअसल पिछली भाजपा सरकार ने तो कार्यकर्ताओं को हितग्राहियों की सूची में शामिल कर दिया था। तबादलों और पोस्टिंग के लिए भाजपा संगठन की राय जरूर ली जाती थी लेकिन प्रशासनिक प्रक्रिया मंत्रिमंडल के सदस्य ही पूरी करते थे। इससे जहां विकेन्द्रित भ्रष्टाचार पर लगाम लग जाती थी वहीं प्रशासनिक आधार पर कसावट लाने में भी भाजपा सरकार सफल थी। यही वजह है कि खनिज, वाणिज्यकर, आबकारी, जैसे आय बढ़ाने वाले विभागों से सरकार ने खासा वित्त जुटाया जिससे उसे विकास कार्यों के लिए पर्याप्त धनराशि मिलती रही थी।

    मुख्यमंत्री कमलनाथ प्रदेश के वित्तीय प्रबंधन में कसावट लाकर विकास योजनाओं के लिए धन की व्यवस्था करने की बात कहते रहे हैं। उन्होंने मीडिया का बजट रोककर दो टूक कह दिया है कि मुझे अपनी छवि चमकाने की जरूरत नहीं है। हालांकि ये बात भी सही है कि दो लाख करोड़ के बजट में मीडिया पर खर्च की जाने वाली धनराशि सौ करोड़ भी नहीं होती है। जबकि सड़कों, फ्लाईओवर और अन्य योजनाओं पर खर्च की जाने वाली धनराशि हजारों करोड़ की होती है। इसके बावजूद मीडिया पर प्रहार करने से जनता को ये संदेश देने में सफलता मिल रही है कि सरकार वित्तीय प्रबंधन सुधार रही है।

    कांग्रेस के विभिन्न गुटों के बीच सत्ता की मलाई लूटने की जो होड़ इन दिनों पावर गेलरी में देखी जा रही है उससे तो साफ समझ में आता है कि कमलनाथ सरकार आगे चलकर गंभीर वित्तीय संकट का सामना करने की तैयारी कर रही है। आज जब प्रदेश के विकास के लिए संसाधन जुटाने की जरूरत है तब तबादलों और पोस्टिंग के धंधे को फलने फूलने का अवसर देकर नई सरकार अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है। जब सरकार के विभाग अपने वित्तीय लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पाएंगे तो वह अपनी नोटशीट पर कर्ज लेने की हैसियत भी खो देगी। प्रदेश के नागरिकों को निश्चित रूप से गहरे वित्तीय संकट का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा।

  • सत्ता हमारी साध्य नहीं कहने वाले कुशाभाऊ ठाकरे

    सत्ता हमारी साध्य नहीं कहने वाले कुशाभाऊ ठाकरे



    भरत चंद नायक-

    भुवन भास्कर भी संध्या को अस्ताचल पहुंचकर विश्राम करते हैं, लेकिन कुछ ऐसे व्यक्तित्व के धनी लोग भी होते हैं जो अपने जीवन की संध्या में लोक कल्याण की भावना से अपने ध्येय की पूर्ति में जुटे रहते है। अपने-अपने परिवार और संगे संबंधियों से अनासक्त होकर जीवन पथ पर चलते रहते हैं। जीवन में विश्राम उनके लिए विलासिता के समान होते हैं। ऐसे समर्पण भाव से जीने वालों के लिए समाज और देश ही परिवार बन जाता है। भारतीय जनता पार्टी की स्थापना से लेकर 1980 में भारतीय जनता पार्टी के गठन के साक्षी बने पितृ पुरूष कुशाभाऊ ठाकरे एक ऐसे ही महापुरूष हुए जिन्होंने अपना जीवन पुष्प राष्ट्रवाद के पोषण के लिए मातृभूमि की बलिवेदी पर आर्पित कर दिया।

    कहते है कि अपनों के लिए तो संसार जीता है जो दूसरों के लिए जीते है उनका जीवन धन्य है। मध्यप्रदेश में कुशाभाऊ ठाकरे राष्ट्रवाद के प्रवर्तन और भारतीय जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी के गठन और विस्तार के प्रतीक पुरूष रहे लेकिन इस विकास यात्रा में सत्ता प्राप्ति से बढकर उनका ध्येय राष्ट्रनिष्ठ कार्यकर्ताओं का निर्माण करना रहा। कार्यकर्ता निर्माण की उनमें अद्धुत क्षमता थी। उन्हें कार्यकर्ता की क्षमता, उसके बौद्धिक स्तर की पहचान थी जिसका श्रेय उनका कार्यकर्ताओं से तादात्म्य स्थापित करने की कला को है। प्रदेश के लाखों कार्यकर्ताओं को उन्होंने संवारा। हर कार्य के लिए कार्यकर्ता और हर कार्यकर्ता को दायित्व उनकी कार्य संस्कृति थी। अविराम कार्यकर्ताओं के बीच रहना। कार्यकर्ताओं की सुनना और उन्हें संतुष्ट करना उनकी दिन चर्या थी। इससे उनके संपर्क में आने वाला अजनबी व्यक्ति भी उनका मुरीद हो जाता था। देखा गया कि कुछ लोग उनके संपर्क में आते और विचारधारा से असहमत हो जाते थे। उनकी असहमति का वे सम्मान करते हुए कहते थे कि सतत संवाद और संपर्क में वही असहमत व्यक्ति आने वाले दिनों में कार्यकर्ता बनेगा और उसका सहयोग हमें मतदाता के रूप में मिलने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता है।

    कुशाभाऊ ठाकरे अपने से असहमति होने वालों को विशेष तरजीह देते और कभी गांठ नहीं बांधते थे, जिससे हर विरोधकर्ता व्यक्ति उनका विश्वास भाजन बन जाता था। उन्होंने जो कार्य संस्कृति और पद्धति विरासत में छोडी यदि उसका अनुगमन किया जाता तो वास्तव में पार्टी संगठन में गुट नहीं गट बनते। कार्यकर्ता किसी व्यक्ति के प्रति नहीं संगठन के प्रति उत्तरदायी रहता। इस दिशा में आज स्थिति विचारणीय है। हम पितृपुरूष के जीवन आदर्शो के प्रति गंभीर रहेंगे तो वास्तव में संगठन का यह दावा सोलह आना सही साबित होगा कि भाजपा के लिए सत्ता साध्य नहीं। सत्ता समाज में सुखद परिवर्तन लाने का साधन मात्र है। यही ठाकरे जी का जीवन दर्शन था।

    संगठन और पार्टी के विकास की दिशा में ठाकरे जी के योगदान को कुछ पृष्ठों में समेटना वास्तव में असंभव है। लेकिन यथार्थ यही है कि जब डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी पं. नेहरू के मंत्रिमंडल में रहते हुए राष्ट्रवाद के प्रवर्तन के बजाए तुष्टीकरण देखकर आहत हुए उन्होंने श्री गुरूजी से परामर्श कर राष्ट्रवाद को समर्पित दल भारतीय जनसंघ की स्थापना का बीडा उठाया। देशव्यापी संगठन और दल के गठन के लिए कार्यकर्ताओं की खोज खबर आरंभ हुई। पं. दीनदयाल, नानाजी देशमुख, दत्तोपंत ठेंगडी जैसे चुनिंदा कार्यकर्ताओं का चयन किया गया। मध्य भारत क्षेत्र के लिए कुशाभाऊ ठाकरे धुरी मान लिए गए। कुशाभाऊ ठाकरे एक थैला लिए, पैरो में टायर की चप्पल पहनकर निकल पडे। उन्होंने मध्य भारत क्षेत्र की लंबाई चैड़ाई कुछ इस तरह नापी कि गांव गांव में जनसंघ की पहचान बनी। किसानों, छोटे मोटे उद्यम में लगे लोगों मजदूरों और युवा वर्ग को अपनेपन का अहसास हुआ। संगठन शिल्प में निष्णात ठाकरेजी के समर्पण भाव ने जन जन में विश्वास पैदा किया। दिन भर यात्रा और संध्या रात्रि में जन जन की चैपाल में सुख दुख की बातों के बीच उन्होंने राष्ट्रवाद का अलख जगाया। तत्कालीन सरकार की जनविरोधी नीतियों का प्रखरता से विरोध किया और जनता की जागरूकता का विकास किया। फलस्वरूप मध्यप्रदेश में कांग्रेस का एकाधिकार समाप्ति की ओर बढा। सहयोगी दलों में संवाद ने सेतु का काम किया। पहली बार कांग्रेस से सत्ता छीनकर संविद सरकार बनाने में उनका अप्रतिम योगदान रहा लेकिन सरकार चले जाने से तत्कालीन भारतीय जनसंघ की भूमिका का इतिहास बदला हो ऐसा नहीं हुआ है।

    5 मार्च 1990 में मध्यप्रदेश की पहली भारतीय जनता पार्टी की सरकार का गठन हुआ। तब भारतीय जनता पार्टी प्रदेश में दो तिहाई बहुमत से सत्ता पर काबिज हुई थी। कुशाभाऊ ठाकरे सत्ता साकेत से दूर संगठन में तल्लीन रहे। उन्होंने तत्कालीन सरकार को राष्ट्रवाद की पटरी से नहीं उतरने दिया लेकिन इस दरम्यान वे सत्ता साकेत से दूर तथापि एक रेफरी की तरह व्हिसिल ब्लोवर बने रहे। यह भारतीय जनता पार्टी और पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ की पुण्याई थी कि राज्यों में सरकारे बनी। अयोध्या में ढांचा गिराए जाने पर आए राजनैतिक झंडावात में भारतीय जनता पार्टी की सरकार कुर्बान हो गयी। लेकिन नीति और नीयत जब साफ होती है तो नैतिक साहस बड़े बड़े किले ध्वस्त हो जाते है। कुशाभाऊ ठाकरे को मध्यप्रदेश संगठन से प्रथक राष्ट्रीय जिम्मेदारी सौंप दी गयी। लेकिन कुशाभाऊ ठाकरे ने जिस शिशु संगठन का संगोपन किया उसका मोह नहीं छोड़ पाए और मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी और उनके कार्यकर्ताओं से संबंध विच्छेद नहीं हुआ। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में तत्कालीन एनडीए की अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार के दौर में कुशाभाऊ ठाकरे ने सत्ता से दूर रहते हुए अम्पायर की भूमि का भली प्रकार बिना रागद्वेष निर्वाह किया। शरीर से दुर्बल हो जाने के बावजूद उनकी मनस्थिति हमेशा जीवंत रही और उन्होंने मध्यप्रदेश संगठन और कार्यकर्ताओं का विस्मरण नहीं किया। उनकी रूग्णावस्था में कार्यकर्ता उन्हें देखने जब दिल्ली पहुंचे वे सभी की खैर ख्वाह लेते रहे और पूरी व्यवस्था करते थे।

    कुशाभाऊ ठाकरे ने भारतीय जनता पार्टी के स्थापना दिवस पर कहा था कि जनसंघ के रूप में राजनैतिक यात्रा आरंभ करते हुए हमारी कुछ प्रतिबद्धताएं थी। राष्ट्र की एकता, प्रजातांत्रिक मूल्यों पर आधारित राजनीति और भारत को एक शक्तिशाली देश बनाना। जनसंघ छोटा दल था लेकिन कमजोर नहीं था। हमारी कोशिश प्रेशर ग्रुप बनाने की रही थी। देश की प्रमुख पार्टी न होने के बाद भी हमारी साख और इकबाल था कि बिना हमें विश्वास में लिए देश की राजनीति पर विचार संभव नहीं था। ध्येय लेकर बढे है। देश की सुरक्षा की चिंता, राष्ट्रीय अस्मिता को जिंदा रखना था और होगा। भारतीय जन संघ और भारतीय जनता पार्टी की आगे बढ़ने का कारण हमारे कार्यकर्ताओं ने भारत की आत्मा से संवाद किया है। जनता की तलित भावनाओं को समझा है उनसे तादात्म्य स्थापित किया है। आत्मा को छूने के साथ हमने अपना लक्ष्य सामने रखा है। हम राज्यों में केन्द्र में सरकार में रहे, न रहे जनता के मर्म को समझना है और उससे एकाकार होना है। जनता का विश्वास ही पूंजी है इसे ईमान की तरह संरक्षित रखना है। तो पार्टी जनमानस पर हमेशा शासन करती रहेगी। कर्तव्यबोध की चुनौती को खुले मन से स्वीकार करे और सशक्त भारत का लक्ष्य पूरा करेंगे। उनकी ध्येय निष्ठा आने वाली पीढी के लिए दीप स्तंभ का कार्य करेगी।

  • सफल संवाद के लिए विचार के नए मुखौटों को पहचानें

    सफल संवाद के लिए विचार के नए मुखौटों को पहचानें



    स्व.भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यान 2018 के मंथन से निकला पत्रकारिता का ताजा फार्मूला
    भोपाल,4 मार्च,(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।पत्रकारिता विचार यात्रा से बाजार यात्रा तक विषय पर आयोजित स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यान 2018 में मीडिया के असमंजस पर कुछ नायाब फार्मूले सामने आए हैं। व्याख्यान माला में भाग लेने वाले विद्वानों और पत्रकारों का मानना है कि जबसे देश ने पूंजीवाद की राह पकड़ी है तबसे जनसंचार के साधन समाजोन्मुख रास्ता भूल चले हैं। समाज केन्द्रित पत्रकारिता के बगैर सफल संवाद संभव नहीं है इसलिए पत्रकारों को पूंजीवादी दौर में उभरे विचार के नए मुखौटों को पहचानना सीखना होगा। मीडिया संस्थानों की बुराई किए बगैर यदि हम मर्यादाओं का पालन करेंगे तो हमारा सफल संवाद समाज को भी स्वीकार्य होगा।
    डॉ.सर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के प्राध्यापक स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया की स्मृति में ये लगातार छटवां सफल आयोजन था। इस आयोजन में मुख्य अतिथि के रूप में मध्यप्रदेश शासन के राजस्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता, दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक प्रकाश दुबे, नईदिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार ने पत्रकारिता विचार यात्रा से बाजार यात्रा तक विषय पर आयोजित व्याख्यान में अपने अपने नजरिए से पत्रकारिता के संवाद को सार्थक बनाने के रास्ते सुझाए। अध्यक्षीय उद्बोधन में माधव राव सप्रे संग्रहालय के स्थापक पद्मश्री विजय दत्त श्रीधर ने विषय का प्रवर्तन किया।

    इस अवसर पर दैनिक भास्कर ग्वालियर के पत्रकार अनिल पटैरिया को उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए ग्यारह हजार रुपए के स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया स्मृति पत्रकारिता सम्मान से अलंकृत किया गया। उन्हें राजस्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने शाल श्रीफल भेंटकर प्रशस्ति पत्र भी दिया गया। आयोजकों ने सभी आमंत्रित वक्ताओं को स्मृति चिन्ह और तुलसी के पौधे देकर सम्मानित किया। मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण के साथ आयोजन का विधिवत शुभारंभ हुआ। अतिथियों ने स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया के चित्र पर माल्यार्पण भी किया। स्वागत भाषण वरिष्ठ पत्रकार शिव अनुराग पटैरिया ने दिया। कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए समिति की ओर से जनसंपर्क अधिकारी अशोक मनवानी ने अतिथिओं और आगंतुकों के प्रति आभार प्रकट किया। आयोजन के उपरांत अनौपचारिक सत्र भी आयोजित किया गया जिसमें वक्ताओं ने श्रोताओं की जिज्ञासाओं का समाधान किया। सहभोज का आयोजन भी किया गया।

    अध्यक्षीय उद्बोधन में पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि आत्मआलोचना के नाम पर हम लोग आत्म निंदा में जुट जाते हैं। बाजार और पत्रकारिता के रिश्ते चिंताजनक नहीं हैं। पत्रकार यदि सूझबूझ से लिखेंगे तो उन्हें कभी मालिकों की ओर से तनाव नहीं झेलना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि गायत्री परिवार के (हम सुधरेंगे जग सुधरेगा ) नीतिवाक्य की रोशनी में हमें आगे बढ़ते रहना होगा।

    विषय का तकनीकी विश्लेषण करते हुए वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार ने कहा कि सागर में पत्रकारिता के प्रशिक्षण के दौरान हम सभी सहपाठियों को स्व.देवलिया जी का स्नेह मिला। उनके ही मार्गदर्शन पर हमने दिल्ली में अपनी जमीन तलाशी। उन्होंने कहा कि आज के जनसंचार में भावनात्मक अपीलें की जाती हैं जिनमें नीतियां दफन हो जाती हैं। लोकतंत्र में चुनाव जीतना ही अंतिम लक्ष्य हो गया है। आज के राजनेताओं ने जनता के मुद्दों के समाधान खोजना बंद कर दिया है। जबसे बाजारवाद की स्वीकार्यता बढ़ी है और साम्यवाद का अंत हुआ है तबसे मीडिया प्रोपेगंडा करने लगा है। ये मॉडल सत्ताधीशों को भी मुफीद पड़ता है और धनपशुओं के लिए भी भरपूर नतीजे लाने वाला है। यही वजह है कि आज बाजार स्वयं एक विचार बन गया है। उसने कई पुराने विचारों की जगह ले ली है। मीडिया में विचारों का यही फंडामेंटलिज्म(कट्टरपंथ) हावी हो गया है। इसलिए जो लोग कहते हैं कि आज का मीडिया विचार हीन हो गया है मैं उसका खंडन करता हूं। आज तो फेसबुक और गूगल जैसे सोशल मीडिया भी बाजार को नियंत्रित कर रहे हैं। दरअसल मीडिया ने अपने मुखौटे बदल लिए हैं और इन बदले मुखौटे में छिपे मीडिया के नियंताओं की पहचान जरूरी हो गई है। इसे पहचाने बगैर हम मीडिया को जनता के करीब नहीं ले जा सकते।

    दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक प्रकाश दुबे ने कहा कि स्वर्गीय देवलिया जी ने गुरु द्रोणाचार्य की तरह शिष्य तो बनाए पर उन्होंने कभी एकलव्य की तरह शिष्यों से उनका अंगूठा नहीं मांगा। उनके पास आसपास की घटनाओं की सटीक जानकारी होती थी। यूनीवार्ता के प्रतिनिधि रहते हुए उन्होंने समाज से गहरा नाता बना लिया था। उन्होंने कहा कि आज बाजार की ताकतें और सत्ता का दबाव बेशक मीडिया को नियंत्रित कर रहा है लेकिन ये समाचार संस्थान कभी नहीं चला सकते। यदि ऐसा होता तो देश पर एकछत्र राज्य करने वाली कांग्रेस और उसका गांधी परिवार नेशनल हेराल्ड समूह को भी चला सकती थी। उन्होंने कहा कि तमाम दावों के बावजूद प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया का दबदबा बढ़ता चला गया है।

    श्री प्रकाश दुबे ने यूनियन कार्बाइड गैस कांड की घटना के माध्यम से बताया कि जब अमेरिकी राष्ट्रपति के दबाव मे देश की सत्ता ने अपने मुख्यमंत्री को बाकायदा फोन करके दबाव डाला था। राज्य सरकार ने इसके बाद अपने प्रिय अधिकारी के संरक्षण में यूका के अपराधी वारेन एंडरसन को देश से बाहर भेजने में बडी भूमिका निभाई थी,तब भी एक छोटे से अखबार के पत्रकार राजकुमार केसवानी ने अपने अखबार में खबर छापकर यूनियन कार्बाइड को झुकने पर मजबूर कर दिया था। विश्व जनमत के कारण आज तक यूनियन कार्बाइड उस मुकदमे को बंद नहीं करा सकी है। अखबार की ताकत अपार है इसलिए बाजार कितना भी आततायी क्यों न हो जाए हम उससे डरने वाले नहीं हैं।

    मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित राजस्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने कहा कि आज बाजार के साथ साथ विचार, सत्ताधीशों और धनपशुओं सभी की मर्यादाएं टूट रहीं हैं। बाजार के आशय अनेक स्थानों पर बदलते रहते हैं। इसलिए बाजार किसी विचार को दबा सके ये अब संभव नहीं है। सोशल मीडिया की ताकत आज इतनी बढ़ गई है कि समर्थक या विरोधी विचारों की अभिव्यक्ति किसी न किसी तरह हो ही जाती है। ये हमें तय करना है कि हम लोगों के विश्वास की रक्षा कैसे करें। हम मर्यादाओं का पालन करेंगे तो विचार की रक्षा भी होगी और पाठक तक उसकी यात्रा भी निर्बाध रूप से संभव हो सकेगी।

    व्याख्यान माला के अंत में सर्वश्री शंभुदयाल गुरु, विनय द्विवेदी, आरएस अग्रवाल, अनिल सौमित्र, और कई अन्य आगंतुकों ने वक्ताओं से सवाल पूछे। समाधान करने की जवाबदारी मुकेश कुमार और प्रकाश दुबे दोनों ने संभाली। मुकेश कुमार ने कहा कि जिस तरह तेल, आटा, मिठाई में मिलावट हमें मंजूर नहीं। हम उसका विरोध करते हैं। उसी प्रकार हमें मीडिया में मिलावट का भी विरोध करना होगा। जो मीडिया लोकतंत्र के खिलाफ ही खडा़ हो जाए उसे हम गोदी मीडिया कहकर पीछे न लौट आएं उसे सुधारने के लिए भी आगे आएं।

    प्रकाश दुबे ने कहा कि हम अपनी भूमिका उस मोची के समान मानते हैं जिसे फटा जूता ही नजर आता है। वह उसे सुधारने का जतन भी करता है। इसलिए हम अपनी भूमिका निभाते रहें तो विचार की यात्रा को सार्थक बना सकेंगे।

    कार्यक्रम के आरंभ में स्वागत उद्बोधन में शिव अनुराग पटैरिया ने कहा कि स्वर्गीय देवलिया जी की उंगली पकड़कर हमने आदर्श पत्रकारिता शुरु की थी। आज यदि हम उन आदर्शों की बात करें तो बदले हालात में उन्हें अप्रासंगिक समझा जाएगा। आयोजन का ये अनुष्ठान हमने जबसे प्रारंभ किया है तबसे सभी मित्रों और सहयोगियों का योगदान हमें मिलता रहा है।

  • मुझे मेरी बन्डी मिल गईः संत हिरदाराम जी

    मुझे मेरी बन्डी मिल गईः संत हिरदाराम जी

    – सुरेश आवतरामानी –

    परमहंस संत हिरदाराम साहिब जी का 112 वां अवतरण दिवस 21 सितम्बर 2017 को है । इस शुभ अवसर पर अनायास संत जी से जुड़ी एक घटना का स्मरण हो आया है । वर्ष 1999 में आन्ध्र प्रदेश और ओड़ीसा के तटवर्तीय इलाकों में भयानक तूफान और मूसलाधार बारिश हुई थी फलस्वरूप समुद्र ने अपना तट छोड़ दिया था और उसका पानी रिहायशी इलाको में घुस आया था । इस प्रलयंकारी तबाही से बड़ी संख्यां में तटवर्ती इलाको के लोग काल क गाल में समा गये थे । हजारों की संख्या में पशु और पक्षी मर गये थे । चैतरफा विनाशकारी दृश्य फैला हुआ था । केन्द्र और राज्य सरकार अपने स्तर पर तो लोगों की मदद के लिये काम कर रही थीं, लेकिन वे प्रयत्न किंचित अपर्याप्त दिख रहे थे । बहुत सी स्वयंसेवी संस्थाएं भी इस प्राकृतिक आपदा की स्थिति से लोगों को उबारने के लिये प्रयत्नशील थीं ।

    उन दिनों मध्यप्रदेश में डाॅ. भाई महावीर राज्यपाल थे । एक दिन प्रातः महामहिम राज्यपाल ने राजभवन में मुझे बुलाकर परमहंस संत हिरदाराम साहिब जी के दर्शन करने की इच्छा प्रकट की तथा कहा कि कुटिया फोन करके संत जी से भेेंट का समय निर्धारित करवाएं । उन दिनों मैं महामहिम राज्यपाल के प्रेस अधिकारी के पद पर सेवारत था । राज्यपाल की आज्ञा के अनुसार मैंने सिद्ध भाऊ जी को फोन पर राज्यपाल की इच्छा से उन्हें अवगत कराया । सिद्ध भाऊ ने संत जी से आज्ञा लेकर अगले ही दिन प्रातः 9 बजे महामहिम राज्यपाल को कुटिया लेकर आने की बात कही । डाॅ. भाई महावीर और उनकी धर्मपत्नि श्रीमति कृष्णा कुमारी तथा उनके परिजन निर्धारित समय पर कुटिया पहुंचे । प्रोटोकाॅल की दृष्टि से कुटिया में राज्यपाल और उनके परिवार के लिये कुर्सियां लगायी गयी थी । सामने तानो के (स्टूल नुमा) एक छब्बे पर परम्परा अनुसार संत जी का आसन लगाया गया था। लेकिन महामहिम राज्यपाल ने उस समय दाहिनी टांग में साइटिका का असह्य दर्द होने के बावजूद भी संत जी के सामने जमीन पर बैठना पसंद किया । राज्यपाल से आग्रह के बाद भी उन्होनें कुर्सी पर बैठने के लिये विनम्रता पूर्वक इन्कार कर दिया । संत जी उस समय एक फटी हुई बंडी पहने हुए थे तथा नीचे एक अंगोछा बांधे हुए थे । महामहिम राज्यपाल के लिये यह एक आश्चर्यजनक प्रसंग था कि इतने बड़े सिद्ध पुरूष के तन पर कपड़े तक फटे हुए हैं । डाॅ. भाई महावीर ने संत जी से आग्रह किया कि वे उन्हें एक नई बंडी सिलवाकर देना चाहते हैं । राज्यपाल से यह सुनने पर संत जी थोड़ा मुस्कराए और कहा कि वे उनकी बंडी स्वीकार करेंगें पर उसके पहले उनकी एक शर्त है । संत हिरदाराम जी ने राज्यपाल से कहा कि ओड़ीसा और आन्ध्रप्रदेश के तटवर्ती इलाकों में प्रलयंकारी बाढ़ से हजारों की संख्या में लोग काल कवलित हो गये हैं । जो दुधमुहें बच्चे बच गये हैं, उनको पीने के लिये दूध तक भी उपलब्ध नहीं है । यूनीसेफ ने मिल्क पाउडर अहमदाबाद हवाई अड्डे पर पहुंचा दिया है लेकिन सामान का परिवहन करने वाला विमान तत्काल उपलब्ध न होने के कारण वह दूध भी भुवनेश्वर नहीं पहुंच पा रहा है । इसी प्रकार विवेकानन्द केन्द्र की दिल्ली शाखा के स्वयं सेवकों ने बड़ी संख्या में तम्बू और अन्य राहत सामग्री दिल्ली स्टेशन तक पहुंचा दी है। लेकिन दिल्ली स्टेशन पर खाली मालगाड़ी का प्रबंध न होने के कारण उस सामग्री का परिवहन भी नहीं हो पा रहा है । संत जी ने डाॅ. भाई महावीर को कहा कि यथासमय यह सामग्री यदि जरूरतमंदों को उपलब्ध नहीं होगी तो उन्हें किसी प्रकार की राहत नहीं मिल सकेगी । संत जी ने राज्यपाल से यह अपेक्षा की कि वे शासन और प्रशासन के शीर्ष स्तर पर अपने अच्छे संबंधों का उपयोग करते हुए अहमदाबाद विमान तल पर माल ढुलाई विमान और दिल्ली रेल्वे स्टेशन पर एक खाली माल गाड़ी का प्रबंध करवायें ।

    संत जी के दर्शन के बाद राज्यपाल, राजभवन वापस लौट आये और उन्होंने अविलम्ब तत्कालीन रेल मंत्री और नागरिक उड्डयन मंत्री से फोन पर बात की । दोपहर में अनकरीब 3 बजे सिद्ध भाऊ जी का गर्वनर साहब को एक फोन मिला, जिसमें सिद्ध भाऊ जी ने डाॅ. भाई महावीर को संत जी का संदेश दिया । भाऊ जी ने राज्यपाल को बताया कि संत जी ने कहा है कि उन्हें राज्यपाल की बन्डी मिल गयी है । वस्तुतः राज्यपाल द्वारा केन्द्रीय मंत्रियों से टेलीफोन पर बात करने के तुरंत बाद अहमदाबाद में एक कारगो विमान तथा दिल्ली स्टेशन पर एक खाली गाड़ी उपलब्ध करा दी गई थी और उनमें राहत सामग्री और मिल्क पाउडर आदि का लदान भी शुरू हो गया था । डाॅ. भाई महावीर को संत जी का यह विस्मयकारी संदेश मिलने पर वे अवाक रह गये । कुछ देर बाद उन्होंने कहा कि करने वाले तो स्वयं संत जी ही थे, इस प्रसंग में व्यर्थ में ही उनका नाम हो रहा है । डाॅ. भाई महावीर ने कहा कि आज के युग मे भी हमारे समाज में ऐसे महापुरूष विद्यमान हैं जिनके बल पर यह संसार चल रहा है ।

    संत की सीख

    यह बात वर्ष 2002 की है। उन दिनों डाॅ. भाई महावीर मध्यप्रदेश के राज्यपाल थे। वे महीने में कम से कम एक बार परमहंस संत हिरदाराम साहिब जी के दर्शन के लिए बैरागढ़ स्थित कुटिया में आया करते थे। डाॅ. भाई महावीर का राज्यपाल पद का कार्यकाल लगभग समाप्त होने वाला था। यह बात उन्होंने परमहंस संत हिरदाराम साहिब जी को बताई। इस पर संत जी ने तत्कालीन राज्यपाल को कहा कि इससे क्या फर्क पड़ता है कि आप गवर्नर रहें या न रहें, सेवा और सिमरन तो कहीं भी किया जा सकता है। इस बात पर डाॅ. भाई महावीर ने संत हिरदाराम जी को बताया कि वे राज्यपाल बनने के पहले दिल्ली के डी.ए.वी. स्कूल के प्राचार्य थे और उन्होंने अपना लगभग पूरा जीवन अध्यापन कार्य में बिताया है। इस पर संत हिरदाराम साहिब जी ने उन्हें कहा कि विद्यादान बहुत बड़ा काम है। राज्यपाल पद से निवृत्त के बाद भी आप पुनः विद्यादान के क्षेत्र में सेवा कर सकते हैं।

    इस पर डाॅ. भाई महावीर ने परमहंस संत हिरदाराम साहिब जी को बताया कि उनके स्वर्गीय पिता भाई परमानन्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। अंग्रेजों ने उन्हें क्रान्तिकारी गतिविधियों में लिप्त होने के कारण फांसी की सजा सुनाई थी लेकिन महात्मा गांधी और एनी बीसेन्ट के प्रयासों से बाद में अंग्रेजों ने उनकी सजा फांसी से बदलकर काले पानी में बदल दी थी। अंडमान निकोबार स्थित सेल्युलर जेल में आज भी भाई परमानन्द के कारावास काल के स्मृति अवषेष रखे हुए हैं। डाॅ. भाई महावीर ने संत हिरदाराम साहिब को बताया कि वे गुरू तेग बहादुर के समकालीन भाई मतिदास और भाई जतिदास के तेरहवें वंशज हैं। औरंगजेब द्वारा हिन्दुओं के सामुहिक धर्मान्तरण के लिए चलाई गई मुहिम में औरंगजेब ने दिल्ली के शीशगंज गुरूद्वारे के पास भाई मतिदास और भाई जतिदास को आरे से चिर वाकर मरवा डाला था।

    संत हिरदाराम साहिब जी डाॅ. भाई महावीर के इतने बड़े बलिदानी कुनबे के वंशज होने के संबंध में जानकारी मिलने पर वे एकदम मौन हो गए। परमहंस संत हिरदाराम साहिब जी को गुरू वाणी में अगाध श्रद्धा थी। दसों गुरूओं की श्रंखला में गुरू तेग बहादुर के समकालीन सहयोगी होने की बात सुनकर संत हिरदाराम साहिब जी अभीभूत हो गए और काफी देर तक आँखें मूंद कर गुरूओं का स्मरण करने लगे। डाॅ. भाई महावीर ने संत हिरदाराम साहिब जी को यह भी बताया कि वे दिल्ली में कड़कड़डूमा क्षेत्र में अपने स्वर्गीय पिता देवता तुल्य भाई परमानन्द की स्मृति में एक विद्यालय खोलना चाहते हैं। सरकार ने उन्हें इस प्रयोजन के लिए लगभग पौने दो एकड़ जमीन भी दे दी है। इस जमीन पर विद्यालय भवन निर्माण के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी ने षिलान्यास भी कर दिया है लेकिन धनाभाव के कारण वे उस विद्यालय भवन का निर्माण नहीं करवा पा रहे हैं। डाॅ. भाई महावीर के मुंह से यह बात सुनते ही संत हिरदाराम साहिब जी ने कहा कि किसी शुभ काम में धन की कमी आड़े नहीं आनी चाहिए। तब डाॅ. भाई महावीर ने उन्हें कहा कि वैसे तो विद्यालय का पूरा प्रोजेक्ट लगभग चार करोड़ रूपए का है, लेकिन उसके प्रथम चरण में कक्षा एक से बारहवीं तक की कक्षाओं का निर्माण करवाने पर लगभग एक करोड़ रूपए खर्च होगा। संत हिरदाराम साहिब जी ने यह सुनते ही श्रद्धेय सिद्ध भाऊ जी की तरफ देखते हुए उन्हें कहा कि वे विदेषों में अप्रवासी भारतीयों को डाॅ. भाई महावीर की पारिवारिक पृष्ठभूमि तथा समाज और देश के लिए उनके योगदान का उल्लेख करते हुए जानकारी भेजें तथा विद्यालय भवन निर्माण करवाने के लिए अपेक्षित धन का प्रबंध करने के प्रयास करें। संत जी द्वारा इतना भर कह देने के बाद उनके सेवाभावी शिष्य सक्रिय हो गए और बहुत थोड़े दिनों में विद्यालय भवन के प्रथम चरण के लिए अपेक्षित धनराशि का संग्रहण हो गया और बहुत ही जल्दी दिल्ली के कड़कड़डूमा क्षेत्र में यह विद्यालय भवन बनकर तैयार भी हो गया। इस बीच डाॅ. भाई महावीर मध्यप्रदेष के राज्यपाल पद से भी निवृत्त हो गए थे।

    कुछ महीनों बाद डाॅ. भाई महावीर पुनः परमहंस संत हिरदाराम साहिब जी के दर्शन के लिए कुटिया पधारे। संत जी ने डाॅ. भाई महावीर से कहा कि वे विद्यार्थियों की प्रातःकालीन प्रार्थना सभा में स्वयं उपस्थित रहा करें तथा उन्हें प्रतिदिन शाला आने के पहले अपने माता-पिता के चरणस्पर्श करके विद्यालय आने की सीख देवें। डाॅ. भाई महावीर ने बाद में ऐसा ही किया। वे प्रतिदिन अपने दिल्ली स्थित निवास न्यू राजेन्द्र नगर से कड़कड़डूमा स्थित स्कूल जाने लगे और प्रार्थना सभा में बालकों को अपने माता-पिता के चरणस्पर्ष करने के बाद स्कूल आने की सीख देने लगे। इस विद्यालय के बालकों ने जब ऐसा करने शुरु किया तो दिल्ली के उस मध्यम वर्गीय परिवारों के इलाके के अभिभावकोें ने अपने बच्चों के इस व्यवहार को महानगरीय संस्कृति और जीवन शैली से विपरीत कुछ बदला हुआ पाया। मध्यम वर्गीय परिवार के ये अभिभावक समझने लगे कि इस विद्यालय में आधुनिक शिक्षा के साथ ही उदात्त भारतीय जीवन मूल्यों की षिक्षा भी दी जा रही है। विद्यार्थियों के इस बदले हुए सकारात्मक आचरण से उनके माता-पिता बहुत प्रभावित होने लगे और बहुत ही जल्दी यह विद्यालय आस-पड़ोस के अन्य क्षेत्रों में काफी लोकप्रिय हो गया। उसका नतीजा यह निकला कि इस विद्यालय ने एक वर्ष के अन्दर ही अपनी पूर्ण क्षमता दो हजार विद्यार्थियों के प्रवेश की पूरी कर ली ।

    परमहंस संत हिरदाराम जी द्वारा अपने जीवनकाल में बैरागढ, भोपाल में शुरु किए गए मिठी गोविन्दराम स्कूल के बालकों को भी प्रतिदिन अपने माता-पिता के चरणस्पर्श करने के बाद विद्यालय आने की सीख दी जाती है। कुछ दिनों के बाद संत हिरदाराम साहिब जी ने डाॅ. भाई महावीर से जानकारी चाही कि क्या उन्हें विद्यालय संचालन के लिए और अधिक धन की आवश्यकता है? इस पर उन्होंने संत जी के सम्मुख हाथ जोड़ लिए और कहा कि आपके द्वारा दी गई सीख पर अमल करने का यह परिणाम निकला है कि अब हमारे स्कूल में प्रवेश के बहुत सारे इच्छुक विद्यार्थियों को वापस लौटाने की नौबत आने लगी है। उन्होंने बताया कि यह स्कूल अपनी क्षमता से भी अधिक भर गया है और अब स्कूल प्रबंधन को धन की कोई कमी नहीं है। स्कूल की भावी योजनाएं वे स्कूल द्वारा ही अर्जित राशि से कार्यान्वित कर सकते हैं। डाॅ. भाई महावीर ने कहा कि संतों की सीख सदा सुखकारी और कल्याणकारी होती है। (आलेख-सुरेश आवतरामानी)

    पक्षियों को दाना-पानी

    दान करने से धन बढ़ता है परंतु दान भी पात्र व्यक्ति के पास जाए तो उसका लाभ है, अपात्र व्यक्ति को दिया हुआ दान भी निरर्थक है। वनों की कटाई तथा सरोवरों के सूख जाने के कारण पक्षियों की अनेक प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। पशु-पक्षी भूख, प्यास और उष्मा के दुष्प्रभाव से मर रहे हैं। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हो रही जीव हत्या के लिए मनुष्य ही जिम्मेदार है। पक्षी अपना पूरा जीवन जी सकें इसके लिए मनुष्य को ही पहल करनी होगी। प्रत्येक परिवार में यदि बच्चे प्रतिदिन घर की छत पर एक सकोरा पानी तथा थोड़ा अन्न रखें तो उनके अंतर्मन से निकलने वाले आषीर्वाद उन बच्चों के जीवन को ही बदलने का सामथ्र्य रखते हैं। जैसे मूल्यहीन वस्तु अनुपयोगी मानी जाती है वैसे मूल्यहीन जीवन का भी कोई उद्देश्य नहीं होता। जो बच्चे बचपन से पक्षियों को दाना-पानी देते हैं उनके बाल हृदय में करूणा के भाव उत्पन्न होते हैं। आज कल प्रायः यह दिखता है कि संवेदनशीलता की कमी के कारण लोग सड़क पर पड़े घायल व्यक्ति की मदद के बजाय मुंह मोड़ कर चले जाते हैं। जिस हृदय में दर्द नहीं है वह किसी आत्मीय जन की पीड़ा हरने में भी कितना काम आएगा।
    जीवन जीने का अधिकार मनुष्यों के साथ ही पषु-पक्षियों को भी है। मनुष्य तो अपने इस अधिकार की रक्षा पशु-पक्षियों का जीवन लेकर भी करता है। परन्तु ये मूक जीव अपने जीवन की रक्षा भी नहीं कर पाते। ऐसे में हमारे परिवारों के सुसंस्कृत बच्चे यदि पक्षियों के संरक्षण का बीड़ा उठा लें तो वे न केवल एक प्रजाति को विलुप्त होने से बचा लेंगे बल्कि अपना लोक-परलोक भी सवार लेंगे। हमारी पुरातन परम्पराओं में यह सिखाया गया है कि ‘‘पर हित सरस धरम नहीं भाई‘‘ अथवा ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः‘‘। इन उदात्त जीवन मूल्यों और संस्कारों से ही न केवल मानव मात्र बल्कि इस ब्रह्माण्ड के जैविक संसार का भी हित निहित है। दान को गुप्त रखने की बात कही गई है। गुप्त दान का प्रभाव मनुष्य के जीवन को सुखमय करने का सामर्थ्य रखता है। पक्षी मूक होते हैं, उनकी क्षुद्धा को तृप्त करने के लिए किया गया दान भी गुप्त ही रहता है। पक्षियों को किया गया दान भी मनुष्य के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।