Category: भारत

  • जेबी लोकतंत्र की विरासत अब धराशायी

    जेबी लोकतंत्र की विरासत अब धराशायी


    - भरतचन्द्र नायक
    भारतीय लोकतंत्र की महिमा निराली है। यहां दशकों तक एक राजनैतिक दल ने आजादी के जंग में कामयाबी का श्रेय भी लूटा और राजनैतिक एकाधिकार भी जमाया। तब निर्वाचित सरकारे लोकतंत्र के नाम पर भंग भी की जाती रही और समय आने पर आया राम गया राम का खेल भी गुजरात और हरियाणा में खेलते हुए राजनैतिक कुशलता का ढोल भी पीटा गया। दिवंगत नेता भजनलाल का उल्लेख खूब हुआ और एक शब्दावली भी गढ़ी गयी लेकिन बलिहारी देश के मतदाताओं की जिन्होंने मुफलिस और मजलूम माने जाने पर भी करिश्मा कर दिखाया। उक्त पार्टी के एकाधिकार का दंभ खंडित किया। विकल्प भी पैदा किया। लोकशाही का मर्म सिखाते हुए फकीरों को बादशाह का रूतबा बख्श दिया। अब वही एकाधिकार वाले बादशाह तोहमत लगा रहे कि उनकी विरासत छीन कर बेइन्साफी की गयी है। जिस निजाम पर पक्षधरता का इल्जाम चस्पा होता रहा। वे ही अब चीख रहे है। उनका आरोप है कि लोकतंत्र को सरेआम लूटा जा रहा है।

    चारों तरफ नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जुगलबंदी के चर्चे है। राज्यसभा के चुनाव की सरगर्मी जारी है। उसके 6 माह बाद गुजरात के चुनाव है। इसी दरम्यान बिहार में जनता दल यू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिश कुमार ने महागठबंधन से दूरी बनाकर एनडीए का साथ पकड़ लिया। चारों तरफ कोहराम मचा। राहुल गांधी ने इसे महागठबंधन के साथ विश्वासघात बताया वहीं लालूप्रसाद यादव ने कहा कि यह जनता दल यू और कांग्रेस को मिले जनादेश का अपमान है। उपरी तौर पर उनकी आपत्ति सही भी लगती है, लेकिन नीतिश कुमार समर्थकों का यह कहना कि जनादेश जरूर जनता दल यू और कांग्रेस को ही मिला था और इस पर कायम रहना नैतिक जिम्मेदारी बनती थी लेकिन जनादेश के साथ बिहार के अवाम में यह भावना भी थी कि नीतिश कुमार की सरकार साफ सुथरा प्रशासन देगी और उनकी गठबंधन सरकार भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टाॅलरेंस की प्रतिबद्धता पर खरी उतरेगी। लिहाजा जब नीतिश बाबू ने देखा कि न तो लालू परिवार भ्रष्टाचार का स्पष्टीकरण देना चाहता है और न भ्रष्टाचार पर प्रायश्चित करने का साहस दिखा रहा है तो वे भ्रष्टचारी शासन को ढोते रहकर कलंक के भागी क्यों बनतें लेकिन लालू प्रसाद यादव ने सत्ता पलट बर्दाश्त करने के बजाए नीतिश कुमार के खिलाफ अभिलेखागार से एक आरोप भी खोद निकाला और लेकर घूमते फिर रहे है।

    बात यही समाप्त नहीं होती बौखलाहट में नित नए आरोप लगाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को घेरने की जुर्रत की जा रही है लेकिन राहुल बाबा और गुलाम नवी आजाद इस बात को गंवारा करने को तैयार नही है कि यदि राज्यसभा चुनाव की बेला में विधायक पाला बदल रहे है तो पूरी सरकार के दल बदल करने का शिल्प तो कांग्रेस की ही देन है जिसने आया राम गया राम को शह देकर सरकारे पलटी और एकाधिकार को मजबूत किया। फिर आमजन चुनाव की आहट में विधायक आ जा रहे है तो स्यापा की क्या बात है। विधायकों के इस्तीफा देकर दूसरे दल में शामिल होने के पीछे पार्षदों द्वारा अपनी विफलता, संगठन की अप्रासंगिकता पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। मां बेटा की पार्टी ने तो राज्यों के संगठन पर गौर करना छोड़ दिया। वरिष्ठ नेता बेकद्री से संगठन से विरक्त हो गए। जो डूबते जहाज से निकलकर राजनैतिक वैतरणी पार करना चाहते है वे ठौर देख रहे है। इसमें प्रधानमंत्री को लपेटना अमित शाह को घसीटने के बजाए कांग्रेस का श्रेष्ठ वर्ग आत्म परीक्षण करने का साहस क्यों नहीं दिखाता। चूक सरासर कांग्रेस की है जो प्रांतीय संगठनों को कबीलाई जंग में जाता देखकर भी तटस्थ दर्शक बनकर रह गया है। इसी तरह उत्तर प्रदेश में यदि राजनैतिक दलों से पलायन हो रहा है तो दलीय विफलता के अलावा क्या कहा जा सकता है, लेकिन मजे की बात है कि किं कत्र्तव्यं विमूढ़ समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव इस पलायन को भाजपा का राजनैतिक भ्रष्टाचार और बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख वहन मायावती इसे सत्ता की भूख बताकर हकीकत से मुंह मोड़ रही है।

    आज हकीकत को अवसरवादिता के पैमाने पर देखना राजनैतिक दलों की फितरत बन गयी है। यदि ऐसा न होता तो कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पं. बंगाल में हो रही जातीय हिंसा और केरल की वामपंथी सरकार की शह पर राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं के कत्ल के मामलों पर गौर करते और निंदा करते लेकिन उनका नजरिया वास्तविकता से भिन्न है और वे मोदी सरकार पर असहिष्णुता का इल्जाम लगा रहे है। आखिर वे जनता की आंखों में धूल झौंककर दलीय समर्थन खोने पर क्यों आमादा बने हुए है। ऐसे में एक विद्वान का यह कथन मौंजू है कि कल्पना शक्ति नाॅलेज से अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि नालेज की तो सीमा होती है लेकिन कल्पना असीम है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष इसके धनी है और राजनीति की घिसी पिटी फितरते छोड़कर कल्पनाशीलता से जनता का मन मोह रहे है। कल्पना में विश्व समाया हुआ है। इसी के बल पर नरेन्द्र मोदी ने हताश मुल्क में सकारात्मक पर्यावरण रचा, उसे अमली जामा पहनाने का प्रयास किया। जनता का भरोसा जीता और भगवा परचम लहराया है। विपक्ष अरण्यरोदन करता फिर रहा है।

    इस परिप्रेक्ष्य में जनता दल यू के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता शरद यादव भी नीतिश कुमार से अप्रसन्न चल रहे है। वास्तव में उनकी नाराजगी के चर्चा उनकी प्रासंगिकता को नया रूप देने में सहायक हो सकती है और पुनर्वास का सिलसिला आगे बढ़ सकता है। राजनीति में तनिक भी रूचि लेने वालें इस बात पर अकस्मात दांतों तले अंगुली तो दबा लेते है कि एक जहाज का पंछी असुरक्षा के कारण दूसरे जहाज पर जा रहा है इसमें कोई अनुचित अवैध गोरखधंधा हो सकता है लेकिन जब वह याद करता है कि यह गोरखधंधा न तो नया और न इसकी अवैधता से आज विपक्ष अछूता है। उन्होंने सत्ता में रहकर कभी गौर नहीं किया है। अलबत्ता पूरी सरकार के पाला बदल लेने पर अपनी पीठ थपथपायी है। घोड़ा की मंडी का रिवाज तो उन्होंने ही आरंभ किया जो आज इस पर टीका टिप्पणी करते हुए यथार्थ से मुंह चुरा रहे है।

    जिस तरह से उत्तर प्रदेश में विधान परिषद के सदस्यों ने पलायन किया और गुजरात में विधायकों ने कांग्रेस से किनारा किया है उससे अगस्त में होने जा रहे राज्यसभा के चुनाव के परिणाम अप्रत्याशित हो सकते है और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल की राज्यसभा पहंुचने का रास्ता कंटकाकीर्ण बन सकता है। जहां तक राज्यसभा में एनडीए के वर्चस्व बढ़ने का सवाल है उसे 123 सदस्यों की गिनती पूरी करना है जिसके समीप पहंुचकर उसने अल्पमत की लक्ष्मण रेखा को पार करने का कौशल दिखा दिया है। बुजुर्गो का कहना है कि संकट अकेला नहीं आता उसके साथ कई परेशानियां भी आती है। कमोवेश यही हालात देश में सबसे बड़े राजनैतिक दल कांग्रेस और उन क्षेत्रीय दलों की है जो वंश परंपरा और अपनी पारिवारिक विरासत के मत से नहीं उबर पाए है। इसमें कोई शक नहीं कि गुजरात जहां विधानसभा चुनाव सन्निकट है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का गृह प्रदेश है, इसलिए गुजरात के चुनाव उनकी प्रतिष्ठा से जुड़े है। कांग्रेस में कद्दावर नेता रहे और वरिष्ठता का दर्जा हासिल करने वाले शंकर सिंह वाघेला का कांग्रेस से इस्तीफा और प्रदेश कांग्रेस संगठन में बिखराव कांग्रेस की विफलता है वही भाजपा के लिए वरदान साबित भी है। हर विफलता के पीछे सबब खोजना जरूरी समझा जाता है लेकिन सियासी दलों को यह मंजूर नहीं कि साहसपूर्वक कहे कि जनता ने उन्हें ठुकरा दिया। इसलिए वह ठीकरा तो फोड़ता है और जनता क्षणिक भ्रमित हो जाती है।

  • चर्चा से भी पीछे नहीं हटेगा हिंदुस्तान

    चर्चा से भी पीछे नहीं हटेगा हिंदुस्तान

    – भरतचन्द्र नायक
    अपने हितों की हिफाजत की प्रतिबद्धता सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का बोध करती है। चीनी आक्रमण का दौर, साठ के दशक में जब संसद में चीन द्वारा उत्तरी सीमा में किये गये अतिक्रमण की चिन्ता व्यक्त की गई, तपाक से तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने कहा कि हिमालय का बर्फीला पठार है जहाॅ घास तक पैदा नहीं होती। कांग्रेस का लोकसभा और राज्यसभा में अंकबल भारी होने से बात आई-गई हो गई। लौह पुरूष तत्कालीन स्वराष्ट्र मंत्री सरदार पटैल ने इस पर गंभीर चिन्ता जताने के लिये पं. नेहरू को पत्र लिखा और चीन द्वारा विश्वासघात किये जाने की आशंका व्यक्त की उसे भी अनसुना कर दिया गया। हितों की हिफाजत की बात पर गौर करें कि अमेरिका और सोबियत रूस चाहते थे कि भारत जैसा लोकतांत्रिक देश संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद का सदस्य बने। तत्कालीन अमेरिकी विदेश सचिव दिल्ली आये और प्रस्ताव पर गौर करने को कहा लेकिन इंटरनेशनल फेम और लीडरशिप के नशे में पं. नेहरू ने कहा कि चीन को ही सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बना दिया जाये। न चाहते हुए भी विश्व शक्तियां बेमन से चीन के सिर पर सेहरा बांधने को विवश हो गयी। इतिहास का दौर बदला और चीन आज विश्व मंच पर भारत के हर प्रस्ताव को वीटो करके कूड़ादान में फेकने की हिमाकत कर रहा है। यह बात सच है कि राजनीति में रीटेक नहीं होता, सिनेमा में होता है। लम्हों ने खता की और सदियों ने सजा पाई हमारी नियति बनी।

    विडंबना यह है कि आज जब दुनिया के भारत सहित चौदह देश चीन की विस्तारवादी नीति से परेशान हैं और भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने सीना तान कर कहा कि चीन के विस्तारवाद को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा, भूटान की सीमा की सुरक्षा में भारतीय फौज आख से आख मिलाकर मुंहतोड़ जवाब दे रही है। पं. नेहरू की वंश परम्परा, विरासत के उत्तराधिकारी कांग्रेस उपाध्यक्ष श्री राहुल गांधी लुके-छिपे ढंग से चीन के दिल्ली स्थित दूतावास से गोपनीय चर्चा करते हैं। आखिर ऐसे नाजुक दौर में इस मुलाकात को कांग्रेस की कौन सी सियासत कहा जायेगा। पं. नेहरू ने भारत के हितों के विपरीत जो नासमझी की भारत, तिब्बत और भूटान की मुश्किलें बढ़ाई क्या राहुल जी उसके लिये ही चीन के राजदूत को बधाई देने पहुंचे थे। यह वास्तव में राष्ट्रीय चिन्ता का विषय है। कांग्रेस से इसकी कैफियत लेने का हर राष्ट्रवादी नागरिक को हक है।

    राष्ट्रीय अखण्डता के हित में भारत के रक्षामंत्री श्री अरूण जेटली ने चीन के भूटान क्षेत्र के डोकलाम से हटने की भारत को दी गई चेतावनी का माकूल जवाब दिया है कि यह 2017 का भारत है। 1962 के भारत की त्रासद याद दिलाने की जरूरत नहीं है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने दृढ़तापूर्वक मौन स्वीकृति से सेना को मोर्चें पर स्वतंत्रतापूर्वक राष्ट्र रक्षा में हर कदम बढ़ाने की स्वायत्तता देकर देश प्रहरियों का मनोबल बढ़ाया है। हथियारों की नली नीची है लेकिन बंदूकों की नली ऊंची करना परिस्थिति पर निर्भर है। दिल्ली से आदेश की जरूरत नहीं है। किसी मुल्क का यह जज्बा उसकी रक्षा करने और आत्मसम्मान बढ़ाने का सबसे बड़ा प्रोत्साहन है। जीत सत्य की और हौसले की होती है। आज विश्व जनमत भारत के पीछे चट्टान की तरह खड़ा है और समझ चुका है कि जिस मुल्क की विदेश नीति ही विस्तारवाद बन चुकी है उसके सामने आत्मसम्मान के साथ अड़ जाना ही नैतिकता और विकल्प है।

    पूर्व विदेश मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवन्त सिन्हा जो 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटलजी के साथ बीजिंग गये थे, बताते हैं कि सीमा विवाद पर हुई चर्चा में तय हुआ था कि सेटिल्ड पाॅपुलेशन को विस्थापित नहीं किया जायेगा और वहां चीन अपना दावा नहीं करेगा। लेकिन चीन के लिए समझौता और संधियां तभी तक मान्य होती हैं जब तक कि उनके माफिक बैठती हैं। कमोवेश यहीं दुष्प्रवृत्ति पाकित्सान ने दिखाई है। ये बात अलग है कि जिस तरह विश्व जनमत पर पाकिस्तान द्वारा जम्मूकश्मीर विवाद का पाकिस्तान द्वारा किये गये अंतर्राष्ट्रीयकरण का कोई प्रभाव नहीं रह गया है उसी तरह चीन के दावों की कलई खुलते दुनिया ने देख लिया है और भारत के डोकलाम में अड़ जाने और बार-बार चीन केा अतीत के समझौते की याद दिलाने पर विश्व जनमत भरोसा कर भारत की सच्चाई के पक्ष में स्वर मुखरित करने लगा है। बीजिंग सरकार, चीनी मीडिया ने अलग आक्रामक खबरें प्लांट करने का अनवरत सिलसिला अख्तियार किया है, लेकिन भारत टस से मस नहीं हुआ है। कदाचित आजादी के बाद इतना फोलादी तेवर श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने पहली बार दिखाया जो चीन के लिए अप्रत्याशित है। उसने महसूस किया होगा कि भारत साॅॅफ्ट टारगेट नहीं रह गया है। सामरिक तैयारी में भारत का इरादा स्पष्ट है, लेकिन भारत के तेवरों में वह आक्रामकता नहीं है। उल्टे चीन युद्धोन्माद दिखाने में चरम पर है। भारत ने चीन की सेना की बढ़ती संख्या को देखते हुए सैनिकों की संख्या बढ़ायी है लेकिन स्पष्ट रूप से बंदूकों की नली नीची है क्योंकि चीन की उकसाउ कार्यवाही के बाद भी भारत शांति और मैत्री का पक्षधर है।

    भारत के राजनयिक मानते हैं कि डोकलाम की सुरक्षा भारत की प्रतिबद्धता है जो उसे इतना सख्त कदम उठाने के लिए विवश करती है। डोकलाम, भूटान का क्षेत्र है और भारत उसकी सुरक्षा के लिए नैतिक और भारत भूटान के बीच संधि के पालन के लिए बाध्य है।

    इस मामले में दो बाते उभर कर आती हैं कि चीन भरोसे मंद देश नहीं है। उसका अतीत का इतिहास इस बात की पुष्टि करता है। फिर भी आज जैसी संवेदनशील, विस्फोटक स्थिति केसे उत्पन्न हुई इसका कारण खोजने पर तथ्य उभरकर आते हैं कि पूर्ववर्ती सरकारें चीन के प्रपंच की शिकार हुईं और दूरदर्शिता के अभाव में चीन के छल का शिकार हुई। चीन और भारत के बीच तिब्बत एक स्वायत्तशासी देश तिब्बत बफर स्टेट का काम करता था, लेकिन चीन की नजर थी और चीन ने तिब्बत को हड़पने का हथकंडा अपनाया। तिब्बत की भारत से जो अपेक्षा थी उसके विपरीत तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू चीन के पंचशील सिद्धांतों पर फिदा रहे और उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय दायित्व का निर्वाह करने से परहेज किया। चीन को शह मिली जबकि लौह पुरूष सरदार पटैल ने बार-बार इस गलत कदम के प्रति पं. नेहरू को आगाह किया।

    यदि ऐतिहासिक तथ्यों पर भरोसा करें तो तिब्बत का भी चीन के अधिकांश भाग पर प्रभुत्व था। बाद में चीन ने शक्ति प्रयोग कर अल्पकाल के लिए तिब्बत के मुख्य भाग पर कब्जा कर लिया था लेकिन बाद में तिब्बतियों ने आजादी हासिल कर ली थी। समय ने करवट ली 1949 में चीन ने तिब्बत को अपने अधीन करने की जब कोशिश की थी चीन इतना सशक्त नहीं था और भारत तिब्बतियों की गुहार पर ध्यान देता, सहयोग करता तो यह नौबत नहीं आती। भारत और चीन के बीच बफर स्टेट रहने से सीमा इस तरह विवाद का विषय नहीं बनती। लेकिन चीन को बेलगाम करके पं. नेहरू ने संकट की नींव डाल दी। पंचशील पर मुग्ध बने रहे। 1962 में चीन के हाथों भारत की पराजय भारत के इतिहास में ऐसी त्रासद घटना बनी कि भारत का साहस चूक गया चीन मनमानी करता रहा और हालत यह हुई कि उसका दावा भारत के पूर्वोत्तर में अरूणाचल प्रदेश और पश्चिमोत्तर में लद्दाख तक पसर गया।

    प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार चीन के नहले पर सीमा सुरक्षा की दृढ़ता बताकर दहला मारा है। तिब्बत के धर्मगुरू दलाई लामा को अरूणाचल प्रदेश के तवांगसक जाने की अनुमति देकर चीन को ठेंगा बता दिया है। चीन की धमकियों के बावजूद एनडीए सरकार ने बता दिया है कि चीन जिस तरह सीमा की मनमानी व्याख्या करता है बर्दाश्त नहीं है। दोनों देशों के बीच समझौंता है। उसका पालन करना होगा। बात मेज पर बैठकर तय की जा सकती है। भारत की विदेश नीति पहली बार पं. नेहरू द्वारा प्रवत्र्तित नीति की छाया से मुक्त हुई है। देश के जनमत ने भारत के इस प्रत्याशित और दृढ़तापूर्व अख्तियार किये गये साहसिक रूख की सराहना की है और सभी वर्गों, राजनैतिक दलों ने समर्थन किया है। मजे की बात यह है कि चीनी मीडिया जहाॅ वार भांगरिक करता है वहीं चीन का थिक टेंक चीनी रणनीतिकारों को भारत के बढ़ते प्रगतिशील कदमों से आगाह भी करता है और बताता है कि भारत एक उभरती हुई शक्ति है। कदाचित चीन भारत की बढ़ती शक्ति को पचा नहीं पा रहा है। एक ओर चीन ने पाक अधिकृत कश्मीर में बन बेल्ट, वन रूट कारीडोर बना कर पाकिसतान केा शह देकर भारत को चुनौती दी और आतंकवादियों की नकेल कसने के भारत के कदमों को थामने की कोशिश की है, वहीं भारत को उलझाए रखना चाहता है। बावजूद इसके कि चीन समझता है कि भारत उसके लिए प्रमुख बाजार है। चीन की अर्थव्यवस्था भारत से चार-पांच गुना समृद्ध है। लेकिन चीन में विकास के कदम थम गये हैं। उत्पादन चरम पर पहुंच गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या चीन भारत जैसा बाजार के दरवाजे बंद करने का जोखिम उठा सकता है। दूसरी बात यह है कि हाल के समुद्री अभ्यास में भारत के अमेरिका और जापान ने भाग लेकर चीन की ईर्ष्या की आग में घी डालने का काम किया है। चीन समझ गया है भारत ने श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में मुल्क की हिफाजत करना सीख लिया है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भावना ही राष्ट्र की हिफाजत करने की प्रतिबद्धता देती है। जज्बा, जुनून और हिम्मत उपहार में नहीं मिलती यह स्वयं स्फूर्ति पैदा होती है। पं. नेहरू ने तो चीनी सेना द्वारा भारतीय भूमि पर अतिक्रमण को उसर जमीन कहकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रति अपनी लाचारी व्यक्त कर दी थी लेकिन श्री नरेंद्र मोदी सरकार ने एक साथ दो फैसले लिये हैं। आकस्मिकता से निपटने के लिए जहाॅ फौज को स्वायत्तता दे दी है, वहीं समझौता का दरवाजा खुला रखने के लिए राजनयिक रास्ता भी खुला रखा है। चीन के रक्षा मंत्री की उकसाऊ चेतावनी पर न चीन को धमकियाॅ दी हैं और चीन के आक्रामक तेवरों के सामने घुटने टेके हैं। तथापि भारत हर हाल में परिस्थिति और चुनौती से निपटने के लिए दृढ़ता से मौके की नजाकत पर नजर रखे है।

  • चीन से संवाद सुधारे भारत का मीडिया

    चीन से संवाद सुधारे भारत का मीडिया

    Indian army soldiers are seen after a snowfall at the India-China trade route at Nathu-La, 55 km (34 miles) north of Gangtok, capital of India’s northeastern state of Sikkim, January 17, 2009. The Nathu-La mountain pass, known as the old silk route, lies at an altitude of 14,200 ft. bordering between India and China and is covered with snow throughout the year. Picture taken January 17, 2009. REUTERS/Rupak De Chowdhuri (INDIA) – RTR23J4L

    भारतीय सीमा पर चीन की अमर्यादित और आक्रामक गतिविधियां नयी नहीं हैं, लेकिन सिक्किम सेक्टर में हाल की घटना चौकानेवाली है. पिछले कई वर्षों से चीन भारतीय सीमा में घुसपैठ करता रहा है. अरुणाचल प्रदेश, (जिसे चीन दक्षिण तिब्बत का नाम देता रहा है), के अलावा लद्दाख और हाल ही में उत्तरांचल में भी उसने घुसपैठ की कोशिश की है. सिक्किम से लगी भारत-चीन सीमा पर इस हरकत से चीन का चरित्र और चाल दोनों साफ हो गये है.

    बीते 16 जून को चीन की सेना पीपल्स लिबरेशन आर्मी भूटान के डोकलम एरिया में घुस आयी और उसने वहां एक रोड बनाने की कोशिश की. भूटान की शाही सेना ने चीनी सैनिकों को रोकने की कोशिश की, परंतु उसे भारी मुश्किलों का सामना करना पडा. सीमा के पास तैनात भारतीय सैनिकों ने भी उन्हें रोकने की कोशिश की. 20 जून को भूटान ने अपने नयी दिल्ली स्थित दूतवास से चीन को आधिकारिक तौर पर अपनी नाराजगी जाहिर कर दी. भूटान ने पहले ही साफ कर दिया है कि चीन ने उसकी सीमा में घुसपैठ कर के 1988 और 1998 में दोनों देशों के बीच हुए समझौते का उल्लंघन किया है. गौरतलब है कि चीन और भूटान में कूटनीतिक संबंध नहीं है, लेकिन दोनों देश सीमा विवाद सुलझाने के प्रयास में लगे हैं.

    उधर उल्टा चोर कोतवाल को डांटे कि कहावत को चरितार्थ करते हुए चीन के विदेश मंत्रालय ने भारत पर ही आरोप जड़ दिया कि भारतीय सेना ने सिक्किम सेक्टर पर सीमा का उल्लंघन कर चीन में घुसपैठ की. जवाब में भारतीय विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक वक्तव्य में साफ तौर पर कहा कि चीनी सेना की इन गतिविधियों से वह चिंतित है और रोड बनाने की चीनी मंश से यथापूर्वस्थिति में बड़ा परिवर्तन आयेगा, जिससे भारत की सुरक्षा पर गंभीर और दूरगामी परिणाम होंगे. इस मसले पर भारत और चीन के विदेश मंत्रालयों के बीच बातचीत जारी है. 20 जून को नाथू-ला में हुई बॉर्डर मीटिंग में भी इस बारे में बातचीत हुई थी.

    यहां एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि 2012 में भारत और चीन के बीच यह सहमति हुई थी कि दोनों देशों की सीमा के वे छोर, जो किसी तीसरे देश से भी लगे हैं (त्रिबंधीय छोर), उन पर किसी भी तरह का यथापूर्वस्थिति को बदलने का समझौता या कोई अन्य गतिविधि तीनों देशों के बीच बहस-मुबाहिसे के बाद ही होगी. जाहिर है, चीन ने इस समझौते का उल्लंघन किया है.

    सीमा पर की गयी इन गतिविधियों से यह साफ हो गया है कि भारत के जापान और अमेरिका से घनिष्ठ होते संबंधों से चीन घबरा रहा है. प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा और उसकी सफलता ने चीन को और अधीर कर दिया है. गौरतलब है कि चीन के वन बेल्ट वन रोड प्रोग्राम पर श्रीलंका और जर्मनी तथा जापान ने भी भारत का समर्थन किया है. वन बेल्ट वन रोड पकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से गुजरेगा, जो कि भारत की संप्रभुता का हनन है. भारत इसका पुरजोर विरोध करता रहा है. इसीलिए मई में हुई बेल्ट रोड फोरम मीटिंग में भी भारत ने शिरकत नहीं की थी.

    आज भारत की बढ़ती शक्ति, तेजी से विकास करती अर्थ्व्यवस्था, और जापान, अमेरिका, जर्मनी, नीदरलैंड, फ्रांस, दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों और अफ्रीका से भारत की बढ़ती नजदीकियां चीन के लिए परेशानी का सबब हैं. परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत क विरोध, संयुक्त राष्ट्र में आतंकवाद विरोधी मसौदे का विरोध, चीन-पकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीइसी) सभी इस ओर इशारा करते हैं कि चीन भारत को दक्षिण एशिया में रोक कर रखने की नीति पर अभी भी काम कर रहा है और भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठने नहीं देना चाहता.
    यह दीगर बात है कि चीन के पाकिस्तान को छोड़ कर हर देश के साथ सीमा विवाद और आक्रामक रवैये ने जापान और वियतनाम जैसे कई देशों को भारत की समस्या समझने, और भारत का साथ देने को प्रेरित किया है.

    हैरान कर देनेवाले एक वक्तव्य में चीन के विदेश मंत्रालय ने सीमा विवाद पर भारत को 1962 को सबक के तौर पर याद करने का मशविरा भी दे डाला. हालांकि, भारत की तरफ से कहा गया कि 1962 का भारत और 2017 के भारत में जमीन आसमान का अंतर है, लेकिन चीन के इस कथन और उसकी सीमा पर हरकतें एक बड़े सवाल की और इशारा करती है: क्या भारत चीन की सीमा पर दी गयी चुनौती का मुकाबला कर सकता है?

    भारत अब भी चीन से सैन्य तैयारी और साजो-सामान के मामले में पीछे है, और इन दोनों ही मसलों पर तुरंत और बड़े पैमाने पर काम करने की जरूरत है. दूसरी बड़ी चुनौती है पाकिस्तान-चीन के सामरिक संबंधों को टक्कर कैसे दी जाये? इन दोनों चुनौतियों को मद्देनजर रखते हुए, भारत को अपने रक्षा और सामरिक संबंधों का विस्तार करना होगा. साथ ही, रक्षा संबंधी नयी और उम्दा तक्नीक की जल्द ही खरीद भी करनी होगी.

    डाॅ राहुल मिश्र
    सामरिक मामलों के जानकार

  • कैसे भुला दें मुखर्जी का बलिदान

    कैसे भुला दें मुखर्जी का बलिदान

    (6 जुलाई जन्मदिवस)
    …..- भरतचन्द्र नायक
    लम्हों ने खता की है सदियों ने सजा पायी। आजादी के बाद देश में गठित पहली राष्ट्रीय सरकार के अंतद्र्वंद का ही दुष्परिणाम है कि आज कश्मीर की मनोरमवादियां रक्तरंजित हो रही है। काश राष्ट्रीय सरकार में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आव्हान पर शामिल होने वाले उस दूरदर्शी, दार्शनिक राजनेता डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की चेतावनी पर तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने ध्यान दिया होता किंतु सेकुलरवाद के पुरोधा बनने की चाहत में जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा और धारा 370 ईजाद करके न केवल भारत को लहुलुहान करने का साजो सामान दीर्घजीवी बना दिया अपितु भारत के अभिन्न अंग जम्मू कश्मीर में अलगाववाद के बीज बो दिए गए। पं. नेहरू से मतभेद उभरने और मंत्रिपद से इस्तीफा देने का वाजिब कारण यही था कि डाॅ. मुखर्जी ने कहा था कि पाकिस्तान से विस्थापित शरणार्थी जितनी भूमि छोड़कर आए है उतनी भूमि पाकिस्तान से ली जाए। तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल सहमत थे लेकिन पं. नेहरू ने बात अनसुनी कर दी। डाॅ. मुखर्जी की पहल पर आधा पंजाब ओर आधा बंगाल बच गया। डाॅ. मुखर्जी ने विभाजित भारत के पाकिस्तान से इतना भूभाग बचा कर सच्चे राष्ट्रवाद का सबूत दिया। उनके इस्तीफा का आगाज उन्होंने संसद में देकर किया और जनसंघ गठित कर धर्म, जाति, नस्ल का विचार किए बिना सभी के लिए जनसंघ के द्वार खोलकर राष्ट्रवादियों पर साम्प्रदायिकता का आरोप लगाने वालों के लिए माकूल जवाब दिया।

    डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर को भारत की मुख्यधारा में जोड़ने के लिये अनुच्छेद 370 का प्रखर विरोध किया। जम्मू-कश्मीर में प्रवेश के लिये परमिट प्रणाली को डाॅ मुखर्जी ने देश की अखंडता में बाधक बताया और इसके विरोध में जब बिना प्रवेश परमिट के जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने का आन्दोलन किया तत्कालीन प्रधानमंत्री पं.नेहरू तब के जम्मू कश्मीर के प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला के तुष्टीकरण पर आत्म मुग्ध थे। इस साजिश में शेख अब्दुल्ला को किसकी शह थी यह बताना अब व्यर्थ है। लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं कि उन्हें जानबूझकर ऐसी जगह हिरासत में लिया गया जहाॅं भारतीय संविधान, सर्वोच्च न्यायालय, देश का संवैधानिक हस्तक्षेप बेअसर था। देश की अखंडता के लिए प्रतिबद्धता के लिए रात में डाॅ- मुखर्जी के प्राण चले गये। तब न तो डाॅ.मुखर्जी को उपचार की सुविधा हासिल हुई और न न्यायिक समीक्षा का अवसर मिला। डाॅ.मुखर्जी की मौत ने भारतीय उपमहाद्वीप को झकझोर दिया। पं नेहरू ने अपने संवदेना संदेश में डाॅ मुखर्जी की माताजी योग माया देवी से उनकी इच्छा के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने डाॅ मुखर्जी की मेडीकल हत्या पर दुख व्यक्त करते हुए न्यायिक जांच की मांग की थी। जो कभी पूरी नहीं हुई। कुछ ही हफ्तों में डाॅ.मुखर्जी के बलिदान के बाद जम्मू-कश्मीर में प्रवेश परमिट की प्रणाली को समाप्त कर दिया गया। वहाॅं अलग संविधान, अलग निशान और अलग प्रधान की व्यवस्था को बदल दिया गया। फिर भी डाॅ.मुखर्जी की धारा 370 को समाप्त किये जाने की माग को तुष्टीकरण की बलिबेदी पर चढ़ा दिया गया।

    जम्मू-कश्मीर को लहूलुहान करने में धर्म निरपेक्षता के छदम् ने कम नुकसान नहीं पहुंचाया है। कांग्रेस जिस रास्ते पर चली वह वास्तव में डाॅ.मुखर्जी के बलिदान का अपमान है। पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ.मनमोहन सिंह जम्मू-कश्मीर को स्वायत्तता देने की बात कह कर भारत की सवा अरब जनता के हितों के साथ खिलवाड़ किया। सरहदों के बाहर बुने ये जाल में फंसना हमारी नियति बनी है। आजादी के बाद पाकिस्तान के फौजियों ने कबालियों के वेश में जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण किया उसके पहले जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरी सिंह अपनी रियासत का भारत में विलय कर चुके थे। इसी तरह की अन्य रियासतों को पाकिस्तान में विलय की आजादी मिली थी। फिर पाकिस्तान किस आधार पर जम्मू-कश्मीर के विलय पर प्रश्न उठाता है। इस मर्म की हमने अनदेखी की। उसका खामियाजा आज तक भुगतने के लिये भारत अभिषप्त है। कबायलियों के हमले का भारतीय फौज ने माकूल जबाव दिया। पाकिस्तान के फौजियों को खदेड़ा और छटी का दूध याद दिलाया। लेकिन हम तुष्टीकरण के अलंवरदार जम्मू कश्मीर को शेख अब्दुल्ला के मन के माफिक जीती हुई जमीन छोड़ते चले गये। जो कसर बाकी थी वह उनके कुल दीपक डाॅ फारूख अब्दुल्ला ने स्वायत्तता दिये जाने का बिल लाकरपूरी कर दी। कांग्रेस इस बिल पर अपनी पुष्टि की मोहर लगाकर विश्व को अपनी धर्म निरपेक्षता का सबूत देने की खातिर देश का मुकुट भारत विरोधी देश को तश्तरी में भेंट करने के लिये आतुर रही थी। जो जनविरोध के कारण नहीं हो सका।

    कांग्रेस जम्मू कश्मीर में पीडीपी की कठपुतली बनकर आतंकवादियों के प्रति नरमी बरती रही। जिस स्वायत्तता को पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह भरोसा परोस रहे थे। उसकी शकल क्या होती? यह जानकर सिइस पैदा हो जाती है। वे 1953 की उस व्यवस्था को बहाल करना चाहते थे, जिसके लिये डाॅ. मुखर्जी ने प्राण गवाएं। हजारों लोगांे ने अपना खून बहाया और लाखों कश्मीरी अपने घर छोड़कर अपने ही देश में शरणार्थी बनकर नारकीय जिन्दगी बसर कर रहे हैं। आटोनामी दिये जाने की कमेटी मेें कर्णसिंह की अपनी भूमिका रही है। उन्हें आज देश को समझाना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर को स्वायत्तता दिये जाने से देश की अखंडता का कौन सा लक्ष्य पूरा होना था। पहले ही दो बटे पांच धरती पाक अधिकृत कश्मीर के नाम पर हमसे छिन चुकी है। उसे पाक अधिकृत कश्मीर कहा जाता है। जम्मू-कश्मीर रिसेटिलमेन्ट एक्ट को जीवित करके विभाजन के समय जम्मू-कश्मीर से पाकिस्तान जा चुके लोगों को पुनः जम्मू-कश्मीर लौटने की दावत तत्कालीन पीडीपी सरकार ने दी थी। कश्मीर घाटी से आतंकवादी हमलों से परेशान होकर पलायन कर चुके दो लाख कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थी बन चुके हैं। उनके लौटकर अपने घरों मंे आबाद करने में किसी ने कोई उत्सुकता दिखायी। भारतीय जनसंघ की मांग पर गौर नहीं किया गया। अलबत्ता पूर्व प्रधानमंत्री ने अलगाववादियों के बीच धर्म निरपेक्ष छवि चमकाने के लिये स्वायत्तता देने का राग अलापा। देश की अखंड़ता, जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाने के लिये अपने प्राण न्यौछावर करने वालों के बलिदान का मजाक उड़ाया गया है। त्रिशंकु विधानसभा का गठन होने पर भाजपा ने पीडीपी से हाथ मिलाकर जम्मू कश्मीर में लोकतंत्र को कायम रखा है। जम्मू कश्मीर के बीच भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास किया है। राज्य सरकार ने अलगाववाद से युवा पीढी को आगाह किया है। युवकों को सुरक्षा बल में प्रवेश देकर रोजगार दिया जा रहा है। कश्मीरी नवजवानों को सेवा में प्राथमिकता दी जा रही है।

    वोटो के लिये जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वालों की मंशा को बेनकाब किये जाने की जरूरत हैै। यही डाॅ. मुखर्जी के लिये सच्ची श्रद्धाजंलि होगी। धर्म निरपेक्षता के छदम की अब देश को कितनी कीमत चुकाना पडेगी इसका अंदाजा तो स्वायत्तता की मांग उठाने वाली पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस को लग जाना चाहिए था। यदि जम्मू-कश्मीर को स्वायत्तता दी गयी होती तो 1953 की स्थिति बहाल हो जाती। अनुच्छेद 370 तो स्थायी हो जाता। स्वायत्तता दिए जाने से भारत का कोई नागरिक जम्मू-कश्मीर का नागरिक कभी नहीं हो सकेगा। एक तरह से जम्मू-कश्मीर में भारत सरकार का नियंत्रण एक दम समाप्त हो जाता यहाॅं तक कि यदि कभी विदेशी आक्रमण जम्मू-कश्मीर की सरहदों पर होता है तो केन्द्र सरकार वहाॅं आपात काल तक घोषित करने में सक्षम नहीं होती। सैद्धांतिक रूप से सुरक्षा, दूरसंचार विदेशी मामलों में भारत का दखल रहेगा, लेकिन नियंत्रण नहीं होगा। सर्वोच्च न्यायालय, निर्वाचन आयोग, नियंत्रक महालेखा परीक्षक की भूमिका जम्मू-कश्मीर में समाप्त हो जायेगी। जिस प्रवेश परमिट प्रणाली को समाप्त करने के लिये डाॅ.श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने प्राणों की आहुति दी उसकी बहाली स्वायत्तता दिये जाने का खास मकसद रहा है। कांग्रेस हमेशा यह कहती रही कि साम्प्रदायिक आधार पर देश का विखंडन नहीं होने देगे, लेकिन देश का बटवारा साम्प्रदायिक आधार पर कराया। जम्मू-कश्मीर को स्वायत्तता का मतलब समझकर इस खतरे से आवाम को आगाह करना ही उस महामना डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। जम्मू कश्मीर की जनता ने जान हथेली पर रखकर विधानसभा और लोकसभा के चुनावों का सामना किया। अलगाववादियों को अप्रासंगिक बना दिया।

    आज जो अशांति है वह चंद जिलों तक सीमित है, लेकिन वोटों की खातिर अपने को सेकुलरवादी बताने के चक्कर में राजनैतिक दल देश की अखंडता के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। पीडीपी के साथ गठबंधन करने के पीछे एक बड़ा लक्ष्य रहा है कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की सरकार का गठन कर सीमांत प्रदेश का सांस्कृतिक वैभव लौटाया जाए। अपने घरों से बेघर हुए लाखों कश्मीरी पंडितों की घर वापसी हो, लेकिन इसे विफल करने के पीछे पाकिस्तान का नापाक इरादा है और प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान के इरादे को विश्व बिरादरी में बेनकाब करने में सफलता पायी है। जम्मू कश्मीर से आतंकवाद और अलगाववाद दफन हो। जम्मू कश्मीर के उस अवाम को सुकून मिले जिसने भारत में विलय के बाद लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भाग लेकर लोकशाही को बरकरार रखा है। डाॅ. मुखर्जी ने जीवन पर्यन्त इसके लिए संघर्ष किया। उनके बलिदान के कारण ही जम्मू कश्मीर आज भारत का अभिन्न अंग है। मुठ्ठी भर अलगाववादी जिसे आजादी का संघर्ष बता रहे है उसे दुनिया समझ गयी है। पाकिस्तान का अलग थलग पड़ जाना इसका सबूत है।

  • कांग्रेस के गुलाम की फ्री स्पीच

    कांग्रेस के गुलाम की फ्री स्पीच


    कांग्रेस के शासनकाल में एनडीटीवी को जिस दरियादिली से बढ़ावा दिया गया उसके चलते यह चैनल खुलकर एकपक्षीय समाचारों का प्रवक्ता बन गया था। उस दिन तो हद हो गई जब उसकी एक बदतमीज टीवी एंकर ने आमंत्रित अतिथि के रूप में बुलाए गए भाजपा के प्रवक्ता के ऊपर टीवी स्क्रीन पर ही शो छोड़कर चले जाने का दबाव बनाया। बदतमीजी की इस पराकाष्ठा की रोकथाम को अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया जाने लगता इसलिए सरकार खामोश रही। वो तो भला हो सीबीआई का जिसने आर्थिक अनियमितता को उजागर करते हुए चैनल की असलियत जनता के सामने ला दी।अब चैनल के पत्रकार इसे मीडिया पर हमला बता रहे हैं । देश के खिलाफ गद्दारी करने वाले राजनेताओं और पत्रकारों को सावधान हो जाना चाहिए अब वे मुगालते में न रहें, उनकी आवारागर्दी पर भी अंकुश लगाया जा सकता है। प्रस्तुत है इण्डिया टीवी चैनल के पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की रपट–

    लो हो गया फ्री स्पीच पर अब तक का सबसे बड़ा हमला।एनडीटीवी के खिलाफ सीबीआई ने एफआईआर दर्ज कर ली। हालांकि शिकायतकर्ता सरकार नही है। कोई सरकारी एजेंसी भी नही है। एनडीटीवी का ही एक शेयरहोल्डर है। एनडीटीवी ने आईसीआईसीआई बैंक से 350 करोड़ का लोन लिया था। उस वक़्त एनडीटीवी के पास महज 74 करोड़ की सम्पत्ति थी। मगर कांग्रेस राज में फ्री स्पीच के इस सबसे बड़े कथित मसीहा की धमक का आलम ये था कि 74 करोड़ की सम्पत्ति की कीमत पर 350 करोड़ का लोन हासिल कर लिया गया। वो भी तब जब एनडीटीवी के शेयर औंधे मुंह गिर चुके थे। उनका भाव 438 रुपया प्रति शेयर से गिरकर 156 रुपये प्रति शेयर पर आ चुका था। ऐसी कंपनी को इतना भारी भरकम लोन! फिर इस लोन का एक बड़ा हिस्सा प्रणव रॉय और राधिका रॉय के पर्सनल खातों में डाइवर्ट कर दिया गया। ये एक और बड़ा कारनामा किया इन फ्री स्पीच वालों ने। इस लोन के एवज में ब्याज की 48 करोड़ की रकम बनती थी। मामला इस बात का है कि एनडीटीवी इसे भी पी गया। इसी मामले में सीबीआई की बैंकिंग फ्रॉड डिवीज़न ने एनडीटीवी के मालिक प्रणव रॉय, उनकी पत्नी राधिका रॉय और होल्डिंग कंपनी आरआरपीआर प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है।

    हालांकि सीबीआई की बैंकिंग फ्रॉड डिवीज़न ने इसके पहले भी ब्याज की रकम हड़प कर जाने के न जाने कितने मामलों में एफआईआर दर्ज की है। मगर “फ्री स्पीच” पर कभी भी इस तरह का कोई हमला नही हुआ। यहां तक कि बैंकों के करोड़ों हड़प कर जाने वाले माल्या ने भी फ्री स्पीच पर हमले का आरोप नही लगाया। ट्विटर के प्लेटफार्म से ही सही, माल्या की फ्री स्पीच दनादन जारी है। दिक्कत ये है कि एनडीटीवी ने अपनी ईमानदारी का कथित सर्टिफिकेट खुद ही जारी किया हुआ है। और इसके चारों कोनों पर वामपंथ की गली हुई प्लास्टिक से बाइंडिंग भी कर दी है। इस सर्टिफिकेट के चारों ओर ‘सेकुलरिज्म’ के नंगे तार झूलते रहते हैं। छूने की सोचना भी मत। चेतावनी अलिखित है, मगर बिल्कुल स्पष्ट है। लालू यादव भी चारा घोटाले से लेकर हज़ार करोड़ की बेनामी सम्पत्ति के मामले में सेकुलरिज्म के ऐसे ही कवच का इस्तेमाल कर चुके हैं और करे जा रहे हैं।

    इसी एनडीटीवी के रवीश पांडेय (सिगरेट के पैकेट पर लिखी चेतावनी वाले रूल के मुताबिक-रवीश कुमार) के सगे बड़े भाई एक दलित लड़की को प्रताड़ित करने और सेक्स रैकेट चलाने के मामले में महीनों से फरार चल रहे हैं। मगर इस फ्री स्पीच और अभिव्यक्ति की आज़ादी को तब काठ मार गया था जब इसी चैनल पर ब्रजेश पांडेय की खबर बिना ताबूत के ही दफन कर दी गई। देश के तमाम चैनलों और अखबारों में बिहार कांग्रेस के उपाध्यक्ष रहे ब्रजेश पांडेय (रवीश पांडेय के भाई) की खबरें प्रमुखता से चलीं और छपीं मगर अभिव्यक्ति की आज़ादी के इस सबसे बड़े कथित झंडाबरदार ने उस पीड़ित दलित लड़की की आवाज़ कुचल दी। भाई का मामला जो था। दिल्ली की किस मार्किट में बिकते हैं, इतने मजबूत मुखौटे? टेंडर भर निकल जाए तो ठेकेदारों में होड़ लग जाएगी! रवीश पांडेय को शायद पता होगा इस मार्केट का?

    अब एनडीटीवी पर एक और मामला जांच में सामने आया है। विदेशों में 33 ‘पेपर कंपनियां’ बनाई। 1100 करोड़ रुपए उगाहे और फिर सारी कंपनियां dissolve कर दीं। पेपर कंपनियां यानि वे जो सिर्फ कागजों पर चलती हैं। ये 1100 करोड़ रुपए भी उन अज्ञात लोगों ने दिए जो ब्रिटिश वर्जिनिया आइलैंड और केमन आइलैंड जैसे टैक्स हैवेन देशों या यूं कह लें कि काली कमाई के अड्डों से तालुक रखते हैं। ये सारी जानकारी घरेलू एजेंसियों से छुपा ली गई। न इनकम टैक्स को खबर हुई और न ही कॉरपोरेट अफेयर्स मिनिस्ट्री को। हो गए चुपचाप करोड़ों पार।

    सिलसिला है ये। एक दो नही कई-कई मामले। हिंदुस्तान टाइम्स में छपी रिपोर्ट पर यकीन करें तो एयरसेल मैक्सिस डील से लेकर एयरइंडिया की प्लेन खरीद तक। हर जगह एनडीटीवी। मलाईदार कमाई के हर रास्ते पर। मुहर दर मुहर।

    मगर नही। मामला फ्री स्पीच का है। मामला कथित ईमानदार पत्रकारिता के इकलौते ठेकेदार का है। मामला सेक्युलर और वामपंथी सोच के झण्डाबरदार का है। सो सारे गुनाह माफ। सारी एजेंसियां “संघी”। खिलाफ आवाज़ उठाने वाले सारे लोग “कम्युनल”। देश का लोकतंत्र “खतरे” में। फ्री स्पीच “कोमा” में। उफ़, शाम के 7.30 हो गए। अब यहीं खत्म करता हूँ। कुछ ज़रूरी काम निपटा लूं। कुछ देर बाद “काली स्क्रीन” भी देखनी होगी 😊

    साभार पोस्ट अभिषेक उपाध्याय इण्डिया टीवी चैनल
    Abhishek Upadhyay

  • नर्मदा को बचाना सरकार का सराहनीय कार्यःमोदी

    नर्मदा को बचाना सरकार का सराहनीय कार्यःमोदी

    अमरकंटक : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज मध्य प्रदेश के अमरकंटक में कहा कि मां नर्मदा ने सालों से लोगों को जीवन दिया है, लेकिन अब वक्त आ गया है कि हम मां नर्मदा को बचाएं. उन्होंने यह बात आज नमामि देवी नर्मदे सेवा यात्रा के समापन समारोह में कही है.

    पीएम मोदी आज इस कार्यक्रम में शामिल होने अमरकंटक पहुंचे और उन्होंने नर्मदा के उद्गम स्थल मंदिर की पूजा भी की. पूजा करने के बाद जनता को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि मां नर्मदा हिमालय या बर्फीले पहाड़ों से नहीं निकली है, यह पौधों से निकली है, इसे बचाने के लिए हमें ज्यादा से ज्यादा पेड़-पौधे लगाने होंगे.

    पीएम मोदी ने कहा कि नदियों के प्रति हमें अपना दायित्व निभाना होगा. उन्होंने कहा, ‘मां नर्मदा ने बरसों से हमारे पूर्वजों को बचाया है, अब हमें मां नर्मदा को बचाना है. हमने मां नर्मदा की परवाह नहीं की, बल्कि अपनी परवाह की है, लेकिन अब हमें मां की परवाह करना है.’

    उन्होंने कहा कि देश के नक्शे में कई नदियां दिखती है, लेकिन हकीकत में वो नदियां दिखाई नहीं देती हैं, सारी नदियां सूख चुकी हैं, लेकिन अगर उन्हें बचाना है तो ज्यादा से ज्यादा पौधे लगाने होंगे.

    पीएम मोदी ने नमामि देवी नर्मदे सेवा यात्रा पर बात करते हुए कहा, ‘मध्य प्रदेश की सरकार ने सराहनीय काम किया है. 25 लाख से ज्यादा लोगों ने नर्मदा को बचाने का संकल्प लिया. जनसमर्थन के बिना कोई भी अभियान सफल नहीं हो सकता है.’

  • शिवसेना और बीजेपी का गठबंधन टूटा

    शिवसेना और बीजेपी का गठबंधन टूटा


    मुंबई: महाराष्‍ट्र में शिवसेना और बीजेपी का गठबंधन टूट गया है. बीएमसी चुनाव में सीट बंटवारे को लेकर पिछले कई दिनों से जारी बातचीत में दोनों पार्टियां किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकीं.

    शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने खुद गठबंधन के टूटने के विषय में बताते हुए कहा कि अब भविष्‍य में महाराष्‍ट्र में दोनों पार्टियों के बीच कोई गठबंधन नहीं होगा. उद्धव ने कहा कि बीजेपी ने हमारे घर में घुसकर हमें तंग किया और हमारे 25 साल बर्बाद हो गए.

    उन्‍होंने कहा कि अब जंग शुरू हो गई है. हालांकि उद्धव ठाकरे ने यह भी कहा कि वर्तमान गठबंधन फिलहाल बना रहेगा. सबसे महत्वपूर्ण बृहन्मुंबई नगर निगम में गठबंधन के लिए भाजपा और शिवसेना के बीच बातचीत पिछले कुछ दिन में गतिरोध के दौर से गुजर रही थी.

    ठाकरे ने गुरुवार शाम पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा, ‘मैं अकेले लड़ने के लिए तैयार हूं. शिवसैनिक अकेले मुकाबले के लिए तैयार हैं. मैं अपने साथ मजबूत सिपाही चाहता हूं जिनमें सामने से हमला करने का साहस हो, पीछे से नहीं. एक बार मैंने फैसला कर लिया तो मैं नहीं चाहता कि इस पर कोई सवाल खड़ा करे.’

    उद्धव ने कहा, ‘मैं पार्टी की आगामी रणनीति का ऐलान कर रहा हूं. आप साथ आओगे? मैं अंगारों पर चलूंगा, आप चलोगे? मुझे गद्दार नहीं चाहिए. आप मजबूती से खड़े रहें. मैं सामनेवाले के दांत गिरा दूंगा. अगर आप मुझे साथ दे रहे हो तो मैं ऐलान कर रहा हूं, आज के बाद, भविष्य में, शिवसेना अकेली महाराष्ट्र में भगवा लहराएगी. अब के बाद मैं गठबंधन के लिए किसी के दरवाजे पर कटोरा ले कर नहीं जाऊंगा. जो कुछ होगा वो मेरे शिवसैनिकों का, शिवसेना प्रमुख का, हमारा होगा. किसी की भीख नहीं. इसकी की शुरुआत के रूप में महानगर पालिका और जिला परिषद के आगामी चुनाव में कहीं भी हम गठबंधन नहीं करेंगे. मेरा शिवसैनिक शिवसेना के साथ गद्दारी नहीं करेगा. अब लड़ाई शुरू हो चुकी है.’

    बृहन्मुंबई नगर निगम के साथ नासिक, पुणे, कोल्हापुर और नागपुर नगर निगमों के लिए चुनाव 21 फरवरी को होना है.

    शिवसेना का यह फैसला राष्‍ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) प्रमुख शरद पवार का नाम पद्म पुरस्‍कारों की सूची में आने के एक दिन बाद आया है. शरद पवार को पद्मविभूषण से सम्‍मानित किया गया है.

    इससे पहले अनिश्चितताओं के बीच 23 जनवरी को शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने बीएमसी चुनावों के लिए अपनी पार्टी का घोषणा पत्र जारी कर दिया था. ठाकरे ने कहा था कि घोषणा पत्र पार्टी द्वारा स्वतंत्र रूप से जारी किया जा रहा है क्योंकि यह शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे की जयंती है. उन्होंने कहा था, ‘23 जनवरी शिवसैनिकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण दिन है और हम इस दिन मुंबई के लोगों के प्रति वचनबद्ध हैं. इसलिए, हमने आज अपना घोषणा पत्र जारी करने का फैसला किया.’ बीएमसी चुनाव 21 फरवरी को होने वाले हैं.

    दोनों पार्टियों के बीच लंबे समय से चल रही बातचीत के बावजूद उनके बीच समझौता नहीं हो सका. दोनों पार्टियां अपने-अपने लिए बड़ी संख्या में सीटों की मांग पर अड़ी रहीं. जहां भाजपा 227 सदस्यीय परिषद में 100 से अधिक सीटों पर दावा करती रही, वहीं शिवसेना अपने सहयोगी दल की मांगों के आगे झुकने को तैयार नहीं थी.

  • किसने बांटा  हिन्दुस्तान को

    किसने बांटा हिन्दुस्तान को

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    आप सोच रहे होंगे कि ‘सत्ता के हस्तांतरण की संधि’ ये क्या है ? आज पढ़िए सत्ता के हस्तांतरण की संधि ( Transfer of Power Agreement ) अर्थात भारत की स्वतंत्रता की संधि. ये इतनी भयावह संधि है कि यदि आप अंग्रेजों द्वारा सन 1615 से लेकर 1857 तक किये गए सभी 565 संधियों अथवा कहें कि षडयंत्र को जोड़ देंगे तो उस से भी अधिक भीषण और भयावह संधि है ये. 14 अगस्त 1947 की रात्रि को जो कुछ हुआ था वो वास्तव में स्वतंत्रता नहीं आई थी अपितु ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर का एग्रीमेंट हुआ था पंडित नेहरु और लोर्ड माउन्ट बेटन के बीच में.Transfer of Power और Independence ये दो अलग विषय हैं.स्वतंत्रता और सत्ता का हस्तांतरण ये दो अलग विषय हैं एवं सत्ता का हस्तांतरण कैसे होता है ? आप देखते होंगे क़ि एक पार्टी की सरकार है, वो चुनाव में पराजित जाये, दूसरी पार्टी की सरकार आती है तो दूसरी पार्टी का प्रधानमन्त्री जब शपथ ग्रहण करता है, तो वो शपथ ग्रहण करने के तुरंत पश्चात एक रजिस्टर पर हस्ताक्षर करता है, आप लोगों में से बहुतों ने देखा होगा, तो जिस रजिस्टर पर आने वाला प्रधानमन्त्री हस्ताक्षर करता है, उसी रजिस्टर को ‘ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर’ की बुक कहते हैं तथा उस पर हस्ताक्षर के पश्चात पुराना प्रधानमन्त्री नए प्रधानमन्त्री को सत्ता सौंप देता है एवं पुराना प्रधानमंत्री निकल कर बाहर चला जाता है.यही नाटक हुआ था 14 अगस्त 1947 की रात्रि को 12 बजे.लार्ड माउन्ट बेटन ने अपनी सत्ता पंडित नेहरु के हाथ में सौंपी थी, और हमने कह दिया कि स्वराज्य आ गया | कैसा स्वराज्य और काहे का स्वराज्य ? अंग्रेजो के लिए स्वराज्य का अर्थ क्या था ? और हमारे लिए स्वराज्य का आशय क्या था ? ये भी समझ लीजिये | अंग्रेज कहते थे क़ि हमने स्वराज्य दिया, अर्थात अंग्रेजों ने अपना राज आपको सौंपा है जिससे कि आप लोग कुछ दिन इसे चला लो जब आवश्यकता पड़ेगी तो हम पुनः आ जायेंगे | ये अंग्रेजो की व्याख्या (interpretation) थी एवं भारतीय लोगों की व्याख्या क्या थी कि हमने स्वराज्य ले लिया तथा इस संधि के अनुसार ही भारत के दो टुकड़े किये गए एवं भारत और पाकिस्तान नामक दो Dominion States बनाये गए हैं | ये Dominion State का अर्थ हिंदी में होता है एक बड़े राज्य के अधीन एक छोटा राज्य, ये शाब्दिक अर्थ है और भारत के सन्दर्भ में इसका वास्तविक अर्थ भी यही है. अंग्रेजी में इसका एक अर्थ है “One of the self-governing nations in the British Commonwealth” तथा दूसरा “Dominance or power through legal authority “| Dominion State और Independent Nation में जमीन आसमान का अंतर होता है | मतलब सीधा है क़ि हम (भारत और पाकिस्तान) आज भी अंग्रेजों के अधीन ही हैं. दुःख तो ये होता है कि उस समय के सत्ता के लालची लोगों ने बिना सोचे समझे अथवा आप कह सकते हैं क़ि पूरी मानसिक जागृत अवस्था में इस संधि को मान लिया अथवा कहें सब कुछ समझ कर ये सब स्वीकार कर लिया एवं ये जो तथाकथित स्वतंत्रता प्राप्त हुई इसका कानून अंग्रेजों के संसद में बनाया गया और इसका नाम रखा गया Indian Independence Act अर्थात भारत के स्वतंत्रता का कानून तथा ऐसे कपट पूर्ण और धूर्तता से यदि इस देश को स्वतंत्रता मिली हो तो वो स्वतंत्रता, स्वतंत्रता है कहाँ ? और इसीलिए गाँधी जी (महात्मा गाँधी) 14 अगस्त 1947 की रात को दिल्ली में नहीं आये थे. वो नोआखाली में थे और कोंग्रेस के बड़े नेता गाँधी जी को बुलाने के लिए गए थेकि बापू चलिए आप.गाँधी जी ने मना कर दिया था. क्यों ? गाँधी जी कहते थे कि मै मानता नहीं कि कोई स्वतंत्रता मिल रही है एवं गाँधी जी ने स्पष्ट कह दिया था कि ये स्वतंत्रता नहीं आ रही है सत्ता के हस्तांतरण का समझौता हो रहा है और गाँधी जी ने नोआखाली से प्रेस विज्ञप्ति जारी की थी | उस प्रेस स्टेटमेंट के पहले ही वाक्य में गाँधी जी ने ये कहाकि मैं भारत के उन करोड़ों लोगों को ये सन्देश देना चाहता हूँ कि ये जो तथाकथित स्वतंत्रता (So Called Freedom) आ रही है ये मै नहीं लाया | ये सत्ता के लालची लोग सत्ता के हस्तांतरण के चक्कर में फंस कर लाये है | मै मानता नहीं कि इस देश में कोई आजादी आई है | और 14 अगस्त 1947 की रात को गाँधी जी दिल्ली में नहीं थे नोआखाली में थे | माने भारत की राजनीति का सबसे बड़ा पुरोधा जिसने हिन्दुस्तान की आज़ादी की लड़ाई की नीव रखी हो वो आदमी 14 अगस्त 1947 की रात को दिल्ली में मौजूद नहीं था | क्यों ? इसका अर्थ है कि गाँधी जी इससे सहमत नहीं थे | (नोआखाली के दंगे तो एक बहाना था वास्तव में बात तो ये सत्ता का हस्तांतरण ही थी) और 14 अगस्त 1947 की रात्रि को जो कुछ हुआ है वो स्वतंत्रता नहीं आई …. ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर का एग्रीमेंट लागू हुआ था पंडित नेहरु और अंग्रेजी सरकार के बीच में. अब शर्तों की बात करता हूँ , सब का उल्लेख करना तो संभव नहीं है परन्तु कुछ महत्वपूर्ण शर्तों की उल्लेख अवश्य करूंगा जिसे एक आम भारतीय जानता है और उनसे परिचित है ……………०१) इस संधि की शर्तों के अनुसार हम आज भी अंग्रेजों के अधीन ही हैं. वो एक शब्द आप सब सुनते हैं न Commonwealth nations अभी कुछ दिन पहले दिल्ली में Commonwealth Games हुए थे आप सब को याद होगा ही और उसी में बहुत बड़ा घोटाला भी हुआ है | ये Commonwealth का अर्थ होता है ‘समान संपत्ति’. किसकी समान सम्पति ? ब्रिटेन की रानी की समान सम्पति. आप जानते हैं ब्रिटेन की महारानी हमारे भारत की भी महारानी है और वो आज भी भारत की नागरिक है और हमारे जैसे 71 देशों की महारानी है वो. Commonwealth में 71 देश हैं और इन सभी 71 देशों में जाने के लिए ब्रिटेन की महारानी को वीजा की आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि वो अपने ही देश में जा रही है परन्तु भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को ब्रिटेन में जाने के लिए वीजा की आवश्यकता होती है क्योंकि वो दूसरे देश में जा रहे हैं अर्थात इसका अर्थ निकालें तो ये हुआ कि या तो ब्रिटेन की महारानी भारत की नागरिक है अथवा फिर भारत आज भी ब्रिटेन का उपनिवेश है इसलिए ब्रिटेन की रानी को पासपोर्ट और वीजा की आवश्यकता नहीं होती है यदि दोनों बाते सही हैं तो 15 अगस्त 1947 को हमारी स्वतंत्रता की बात कही जाती है वो मिथ्या है एवं Commonwealth Nations में हमारी एंट्री जो है वो एक Dominion State के रूप में है ना क़ि Independent Nation के रूप में. इस देश में प्रोटोकोल है क़ि जब भी नए राष्ट्रपति बनेंगे तो 21 तोपों की सलामी दी जाएगी उसके अतिरिक्त किसी को भी नहीं. परन्तु ब्रिटेन की महारानी आती है तो उनको भी 21 तोपों की सलामी दी जाती है, इसका क्या अर्थ है? और पिछली बार ब्रिटेन की महारानी यहाँ आयी थी तो एक निमंत्रण पत्र छपा था और उस निमंत्रण पत्र में ऊपर जो नाम था वो ब्रिटेन की महारानी का था और उसके नीचे भारत के राष्ट्रपति का नाम था अर्थात हमारे देश का राष्ट्रपति देश का प्रथम नागरिक नहीं है. ये है राजनितिक दासता, हम कैसे मानें क़ि हम एक स्वतंत्र देश में रह रहे हैं. एक शब्द आप सुनते होंगे High Commission ये अंग्रेजों का एक दास देश दुसरे दास देश के यहाँ खोलता है परन्तु इसे Embassy नहीं कहा जाता. एक मानसिक दासता का उदाहरण भी देखिये ……. हमारे यहाँ के समाचार पत्रों में आप देखते होंगे क़ि कैसे शब्द प्रयोग होते हैं – (ब्रिटेन की महारानी नहीं) महारानी एलिज़ाबेथ, (ब्रिटेन के प्रिन्स चार्ल्स नहीं) प्रिन्स चार्ल्स , (ब्रिटेन की प्रिंसेस नहीं) प्रिंसेस डायना (अब तो वो हैं नहीं), अब तो एक और प्रिन्स विलियम भी आ गए है |०२) भारत का नाम INDIA रहेगा और पूरे संसार में भारत का नाम इंडिया प्रचारित किया जायेगा तथा सारे सरकारी दस्तावेजों में इसे इंडिया के ही नाम से संबोधित किया जायेगा. हमारे व आपके लिए ये भारत है परन्तु दस्तावेजों में ये इंडिया है | संविधान के प्रस्तावना में ये लिखा गया है “India that is Bharat ” जब क़ि होना ये चाहिए था “Bharat that was India ” परन्तु दुर्भाग्य इस महान देश का क़ि ये भारत के स्थान पर इंडिया हो गया. ये इसी संधि के शर्तों में से एक है. अब हम भारत के लोग जो इंडिया कहते हैं वो कहीं से भी भारत नहीं है. कुछ दिन पहले मैं एक लेख पढ़ रहा था अब किसका था याद नहीं आ रहा है उसमे उस व्यक्ति ने बताया था कि इंडिया का नाम बदल के भारत कर दिया जाये तो इस देश में आश्चर्यजनक बदलाव आ जायेगा तथा ये विश्व की बड़ी शक्ति बन जायेगा अब उस व्यक्ति की बात में कितनी सत्यता है मैं नहीं जानता, परन्तु भारत जब तक भारत था तब तक तो संसार में सबसे आगे था और ये जब से इंडिया हुआ है तब से पीछे, पीछे और पीछे ही होता जा रहा है |०३) भारत की संसद में वन्दे मातरम नहीं गाया जायेगा अगले 50 वर्षों तक अर्थात 1997 तक. 1997 में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने इस समस्या को उठाया तब जाकर पहली बार इस तथाकथित स्वतंत्र देश की संसद में वन्देमातरम गाया गया | 50 वर्षों तक नहीं गाया गया क्योंकि ये भी इसी संधि की शर्तों में से एक है और वन्देमातरम को लेकर मुसलमानों में जो भ्रम फैलाया गया वो अंग्रेजों के दिशानिर्देश पर ही हुआ था. इस गीत में कुछ भी ऐसा आपत्तिजनक नहीं है जो मुसलमानों के मन को ठेस पहुचाये.
    ०४) इस संधि की शर्तों के अनुसार सुभाष चन्द्र बोस को जीवित अथवा मृत अंग्रेजों के हवाले करना था. यही कारण रहा क़ि सुभाष चन्द्र बोस अपने देश के लिए लापता रहे और कहाँ मर खप गए ये आज तक किसी को ज्ञात नहीं है. समय समय पर कई अफवाहें फैली परन्तु सुभाष चन्द्र बोस का पता नहीं लगा और ना ही किसी ने उनको ढूँढने में रूचि दिखाई. अर्थात भारत का एक महान स्वतंत्रता सेनानी (जो वास्तव में भारत के ‘राष्ट्रपिता’ थे, गाँधी जी तो ‘प्लांट’ किये हुए राष्ट्रपिता थे, ये भी देश का दुर्भाग्य ही था) अपने ही देश के लिए बेगाने हो गए. सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिंद फौज बनाई थी ये तो आप सब लोगों को ज्ञात होगा ही परन्तु महत्वपूर्ण बात ये है क़ि ये 1942 में आज़ाद हिंद फ़ौज बनाई गयी थी और उसी समय द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था और सुभाष चन्द्र बोस ने इस काम में जर्मन और जापानी लोगों से सहायता ली थी जो कि अंग्रेजों के शत्रु थे और इस आजाद हिंद फौज ने अंग्रेजों को सबसे अधिक हानि पहुंचाई थी और जर्मनी के हिटलर और इंग्लैंड के एटली और चर्चिल के व्यक्तिगत विवादों के कारण से ये द्वितीय विश्वयुद्ध हुआ था और दोनों देश एक दूसरे के कट्टर शत्रु थे. एक शत्रु देश की सहायता से सुभाष चन्द्र बोस ने अंग्रेजों के नाकों चने चबवा दिए थे | एक तो अंग्रेज उधर विश्वयुद्ध में लगे थे दूसरी ओर उन्हंश भारत में भी सुभाष चन्द्र बोस के कारण से कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा था | इसलिए वे सुभाष चन्द्र बोस के शत्रु थे |
    ०५) इस संधि की शर्तों के अनुसार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकुल्लाह, रामप्रसाद विस्मिल जैसे लोग आतंकवादी थे और यही हमारे syllabus में पढाया जाता था बहुत दिनों तक तथा अभी कुछ समय पहले तक ICSE बोर्ड के किताबों में भगत सिंह को आतंकवादी ही बताया जा रहा था, वो तो भला हो कुछ लोगों का जिन्होंने नयायालय में एक केस किया और अदालत ने इसे हटाने का आदेश दिया है (ये समाचार मैंने इन्टरनेट पर ही अभी कुछ दिन पहले देखा था) |
    ०६) आप भारत के सभी बड़े रेलवे स्टेशन पर एक पुस्तक की दुकान देखते होंगे “व्हीलर बुक स्टोर” वो इसी संधि के नियमों के अनुसार है. ये व्हीलर कौन था ? ये व्हीलर सबसे बड़ा अत्याचारी था. इसने इस देश की हजारों माँ, बहन और बेटियों के साथ बलात्कार किया था. इसने किसानों पर सबसे अधिक गोलियां चलवाई थी. 1857 की क्रांति के पश्चात कानपुर के निकट बिठुर में व्हीलर व नील नामक दो अंग्रजों ने यहाँ के सभी 24 हजार लोगों को हत्या करवा दी थी चाहे वो गोदी का बच्चा हो अथवा मरणासन्न स्थिति में पड़ा कोई वृद्ध. इस व्हीलर के नाम से इंग्लैंड में एक एजेंसी प्रारंभ हुई थी तथा वही भारत में आ गयी. भारत स्वतंत्र हुआ तो ये समाप्त होना चाहिए था, नहीं तो कम से कम नाम में ही परिवर्तन कर देते. परन्तु वो परिवर्तित नहीं किया गया क्योंकि ये इस संधि में है
    ०७) इस संधि की शर्तों के अनुसार अंग्रेज देश छोड़ के चले जायेंगे परन्तु इस देश में कोई भी नियम चाहे वो किसी क्षेत्र में हो परिवर्तित नहीं जायेगा | इसलिए आज भी इस देश में 34735 नियम वैसे के वैसे चल रहे हैं जैसे अंग्रेजों के समय चलता था | Indian Police Act, Indian Civil Services Act (अब इसका नाम है Indian Civil Administrative Act), Indian Penal Code (Ireland में भी IPC चलता है और Ireland में जहाँ “I” का अर्थ Irish है वहीँ भारत के IPC में “I” का अर्थ Indian है शेष सब के सब कंटेंट एक ही है, कोमा और फुल स्टॉप का भी अंतर नहीं है) Indian Citizenship Act, Indian Advocates Act, Indian Education Act, Land Acquisition Act, Criminal Procedure Act, Indian Evidence Act, Indian Income Tax Act, Indian Forest Act, Indian Agricultural Price Commission Act सब के सब आज भी वैसे ही चल रहे हैं बिना फुल स्टॉप और कोमा बदले हुए |
    ०८) इस संधि के अनुसार अंग्रेजों द्वारा बनाये गए भवन जैसे के तैसे रखे जायेंगे. नगर का नाम, सड़क का नाम सब के सब वैसे ही रखे जायेंगे. आज देश का संसद भवन, सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, राष्ट्रपति भवन कितने नाम गिनाऊँ सब के सब वैसे ही खड़े हैं और हमें मुंह चिढ़ा रहे हैं. लार्ड डलहौजी के नाम पर डलहौजी नगर है , वास्को डी गामा नामक शहर है (वैसे वो पुर्तगाली था ) रिपन रोड, कर्जन रोड, मेयो रोड, बेंटिक रोड, (पटना में) फ्रेजर रोड, बेली रोड, ऐसे हजारों भवन और रोड हैं, सब के सब वैसे के वैसे ही हैं. आप भी अपने नगर में देखिएगा वहां भी कोई न कोई भवन, सड़क उन लोगों के नाम से होंगे | हमारे गुजरात में एक नगर है सूरत, इस सूरत में एक बिल्डिंग है उसका नाम है कूपर विला. अंग्रेजों को जब जहाँगीर ने व्यापार का लाइसेंस दिया था तो सबसे पहले वो सूरत में आये थे और सूरत में उन्होंने इस बिल्डिंग का निर्माण किया था | ये दासता का पहला अध्याय आज तक सूरत शहर में खड़ा है |
    ०९) हमारे यहाँ शिक्षा व्यवस्था अंग्रेजों की है क्योंकि ये इस संधि में लिखा है और हास्यप्रद ये है क़ि अंग्रेजों ने हमारे यहाँ एक शिक्षा व्यवस्था दी और अपने यहाँ अलग प्रकार की शिक्षा व्यवस्था रखी है | हमारे यहाँ शिक्षा में डिग्री का महत्व है और उनके यहाँ ठीक विपरीत है. मेरे पास ज्ञान है और मैं कोई अविष्कार करता हूँ तो भारत में पूछा जायेगा क़ि तुम्हारे पास कौन सी डिग्री है ? यदि नहीं है तो मेरे अविष्कार और ज्ञान का कोई महत्व नहीं है. इसके विपरीत उनके यहाँ ऐसा कदापि नहीं है आप यदि कोई अविष्कार करते हैं और आपके पास ज्ञान है परन्तु कोई डिग्री नहीं हैं तो कोई बात नहीं आपको प्रोत्साहित किया जायेगा. नोबेल पुरस्कार पाने के लिए आपको डिग्री की आवश्यकता नहीं होती है. हमारे शिक्षा तंत्र को अंग्रेजों ने डिग्री में बांध दिया था जो आज भी वैसे के वैसा ही चल रहा है. ये जो 30 नंबर का पास मार्क्स आप देखते हैं वो उसी शिक्षा व्यवस्था की देन है, अर्थात आप भले ही 70 नंबर में फेल है परन्तु 30 नंबर लाये है तो पास हैं, ऐसे शिक्षा तंत्र से क्या उत्पन्न हो रहे हैं वो सब आपके सामने ही है और यही अंग्रेज चाहते थे. आप देखते होंगे क़ि हमारे देश में एक विषय चलता है जिसका नाम है अन्थ्रोपोलोग्य.| जानते है इसमें क्या पढाया जाता है ? इसमें दास लोगों क़ि मानसिक अवस्था के बारे में पढाया जाता है और ये अंग्रेजों ने ही इस देश में प्रारंभ किया था और आज स्वतंत्रता के 64 वर्षों के पश्चात भी ये इस देश के विश्वविद्यालयों में पढाया जाता है और यहाँ तक क़ि सिविल सर्विस की परीक्षा में भी ये चलता है |
    १०) इस संधि की शर्तों के अनुसार हमारे देश में आयुर्वेद को कोई सहयोग नहीं दिया जायेगा अर्थात हमारे देश की विद्या हमारे ही देश में समाप्त हो जाये ये षडंत्र किया गया. आयुर्वेद को अंग्रेजों ने नष्ट करने का भरसक प्रयास किया था परन्तु ऐसा कर नहीं पाए. संसार में जितने भी पैथी हैं उनमे ये होता है क़ि पहले आप रोगग्रस्त हों तो आपका इलाज होगा परन्तु आयुर्वेद एक ऐसी विद्या है जिसमे कहा जाता है क़ि आप रोगग्रस्त ही मत पड़िए | आपको मैं एक सच्ची घटना बताता हूँ, जोर्ज वाशिंगटन जो क़ि अमेरिका का पहला राष्ट्रपति था वो दिसम्बर 1799 में रोग शैय्या पर पड़ा और जब उसका बुखार ठीक नहीं हो रहा था तो उसके डाक्टरों ने कहा क़ि इनके शरीर का रक्त दूषित हो गया है जब इसको निकाला जायेगा तो ये बुखार ठीक होगा और उसके दोनों हाथों क़ि नसें डाक्टरों ने काट दी और रक्त निकल जाने के कारण से जोर्ज वाशिंगटन का देहांत हो गया. ये घटना 1799 की है और 1780 में एक अंग्रेज भारत आया था और यहाँ से प्लास्टिक सर्जरी सीख कर गया था अर्थात कहने आशय ये है क़ि हमारे देश का चिकित्सा विज्ञान कितना विकसित था उस समय और ये सब आयुर्वेद के कारण से था और उसी आयुर्वेद को आज हमारी सरकार ने हाशिये पर पंहुचा दिया है |
    ११) इस संधि के अनुसार हमारे देश में गुरुकुल संस्कृति को कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जायेगा. हमारे देश के समृद्धि और यहाँ उपस्थित उच्च तकनीक के कारण ये गुरुकुल ही थे और अंग्रेजों ने सबसे पहले इस देश की गुरुकुल परंपरा को ही तोडा था, मैं यहाँ लार्ड मेकॉले की एक उक्ति को यहाँ बताना चाहूँगा जो उसने 2 फ़रवरी 1835 को ब्रिटिश संसद में दिया था, उसने कहा था ““I have traveled across the length and breadth of India and have not seen one person who is a beggar, who is a thief, such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such caliber, that I do not think we would ever conquer this country, unless we break the very backbone of this nation, which is her spiritual and cultural heritage, and, therefore, I propose that we replace her old and ancient education system, her culture, for if the Indians think that all that is foreign and English is good and greater than their own, they will lose their self esteem, their native culture and they will become what we want them, a truly dominated nation”. गुरुकुल का अर्थ हम लोग केवल वेद, पुराण,उपनिषद ही समझते हैं जो कि हमारी मूर्खता है यदि आज की भाषा में कहूं तो ये गुरुकुल जो होते थे वो सब के सब Higher Learning Institute हुआ करते थे.
    १२) इस संधि में एक और विशेष बात है, इसमें कहा गया है क़ि यदि हमारे देश के (भारत के) न्यायालय में कोई ऐसा केस आ जाये जिसके निर्णय के लिए कोई कानून न हो इस देश में या उसके निर्णय को लेकर संविधान में भी कोई जानकारी न हो तो साफ़ साफ़ संधि में लिखा गया है क़ि वो सारे केसों का निर्णय अंग्रेजों की न्याय पद्धति के आदर्शों के आधार पर ही होगा, भारतीय न्याय पद्धति का आदर्श उसमें लागू नहीं होगा. कितनी लज्जास्पद स्थिति है ये क़ि हमें अभी भी अंग्रेजों का ही अनुसरण करना होगा.
    १३) भारत में स्वतंत्रता की लड़ाई हुई तो वो ईस्ट इंडिया कम्पनी के विरूद्ध था और संधि की गणनानुसार ईस्ट इंडिया कम्पनी को भारत छोड़ कर जाना था और वो चली भी गयी परन्तु इस संधि में ये भी है क़ि ईस्ट इंडिया कम्पनी तो जाएगी भारत से पर शेष 126 विदेशी कंपनियां भारत में रहेंगी और भारत सरकार उनको पूरा संरक्षण देगी और उसी का परिणाम है क़ि ब्रुक बोंड, लिप्टन, बाटा, हिंदुस्तान लीवर (अब हिंदुस्तान यूनिलीवर) जैसी 126 कंपनियां स्वतंत्रता के पश्चात भी इस देश में बची रह गयी और लूटती रही और आज भी वो सब लूट रही है.|
    १४) अंग्रेजी का स्थान अंग्रेजों के जाने के बाद वैसे ही रहेगा भारत में जैसा क़ि अभी (1946 में) है और ये भी इसी संधि का भाग है. आप देखिये क़ि हमारे देश में, संसद में, न्यायपालिका में, कार्यालयों में हर कहीं अंग्रेजी, अंग्रेजी और अंग्रेजी है जब क़ि इस देश में 99% लोगों को अंग्रेजी नहीं आती है तथा उन 1% लोगों को देखो क़ि उन्हें मालूम ही नहीं रहता है क़ि उनको पढना क्या है और uno में जा कर भारत के स्थान पर पुर्तगाल का भाषण पढ़ जाते हैं |
    १५) आप में से बहुत लोगों को स्मरण होगा क़ि हमारे देश में स्वतंत्रता के 50 साल के पश्चात तक संसद में वार्षिक बजट संध्या को 5:00 बजे पेश किया जाता था | जानते है क्यों ? क्योंकि जब हमारे देश में संध्या के 5:00 बजते हैं तो लन्दन में सुबह के 11:30 बजते हैं और अंग्रेज अपनी सुविधा से उनको सुन सके और उस बजट की समीक्षा कर सके | इतनी दासता में रहा है ये देश. ये भी इसी संधि का भाग है |
    १६) 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ हुआ तो अंग्रेजों ने भारत में राशन कार्ड का सिस्टम बनाया क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध में अंग्रेजों को अनाज की आवश्यकता थी और वे ये अनाज भारत से चाहते थे. इसीलिए उन्होंने यहाँ जनवितरण प्रणाली और राशन कार्ड प्रारंभ किया. वो प्रणाली आज भी लागू है इस देश में क्योंकि वो इस संधि में है और इस राशन कार्ड को पहचान पत्र के रूप में इस्तेमाल उसी समय प्रारंभ किया गया और वो आज भी जारी है. जिनके पास राशन कार्ड होता था उन्हें ही वोट देने का अधिकार होता था. आज भी देखिये राशन कार्ड ही मुख्य पहचान पत्र है इस देश में.
    १७) अंग्रेजों के आने के पहले इस देश में गायों को काटने का कोई कत्लखाना नहीं था. मुगलों के समय तो ये कानून था क़ि कोई यदि गाय को काट दे तो उसका हाथ काट दिया जाता था. अंग्रेज यहाँ आये तो उन्होंने पहली बार कलकत्ता में गाय काटने का कत्लखाना प्रारंभ किया, पहला मदिरालय प्रारंभ किया, पहला वेश्यालय प्रारंभ किया और इस देश में जहाँ जहाँ अंग्रेजों की छावनी हुआ करती थी वहां वहां वेश्याघर बनाये गए, वहां वहां मदिरालय खुला, वहां वहां गाय के काटने के लिए कत्लखाना खुला | ऐसे पूरे देश में 355 छावनियां थी उन अंग्रेजों की. अब ये सब क्यों बनाये गए थे ये आप सब सरलता से समझ सकते हैं | अंग्रेजों के जाने के पश्चात ये सब समाप्त हो जाना चाहिए था परन्तु नहीं हुआ क्योंक़ि ये भी इसी संधि में है.
    १८) हमारे देश में जो संसदीय लोकतंत्र है वो वास्तव में अंग्रेजों का वेस्टमिन्स्टर सिस्टम है | ये अंग्रेजो के इंग्लैंड की संसदीय प्रणाली है. ये कहीं से भी न संसदीय है और ना ही लोकतान्त्रिक है. परन्तु इस देश में वही सिस्टम है क्योंकि वो इस संधि में कहा गया है.
    ऐसी हजारों शर्तें हैं. मैंने अभी जितना आवश्यक समझा उतना लिखा है. सारांश यही है क़ि इस देश में जो कुछ भी अभी चल रहा है वो सब अंग्रेजों का है हमारा कुछ नहीं है.| अब आप के मन में ये प्रश्न उठ रहा होगा क़ि पहले के राजाओं को तो अंग्रेजी नहीं आती थी तो वो भयावह संधियों (षडयंत्र) के जाल में फँस कर अपना राज्य गवां बैठे परन्तु स्वतंत्रता के समय वाले नेताओं को तो अच्छी अंग्रेजी आती थी फिर वो कैसे इन संधियों के जाल में फँस गए. इसका कारण थोडा भिन्न है क्योंकि स्वतंत्रता के समय वाले नेता अंग्रेजों को अपना आदर्श मानते थे इसलिए उन्होंने जानबूझ कर ये संधि की थी. वो मानते थे क़ि अंग्रेजों से बढियां कोई नहीं है इस संसार में. भारत की स्वतंत्रता के समय के नेताओं के भाषण आप पढेंगे तो आप पाएंगे क़ि वो केवल देखने में ही भारतीय थे पर मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे. वे कहते थे क़ि सारा आदर्श है तो अंग्रेजों में, आदर्श शिक्षा व्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श अर्थव्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श चिकित्सा व्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श कृषि व्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श न्याय व्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श कानून व्यवस्था है तो अंग्रेजों की | हमारे स्वतंत्रता के समय के नेताओं को अंग्रेजों से बड़ा आदर्श कोई दिखता नहीं था और वे ताल ठोक ठोक कर कहते थे क़ि हमें भारत अंग्रेजों जैसा बनाना है | अंग्रेज हमें जिस मार्ग पर चलाएंगे उसी मार्ग पर हम चलेंगे. इसीलिए वे ऐसी मूर्खतापूर्ण संधियों में फंसे. यदि आप अभी तक उन्हें देशभक्त मान रहे थे तो ये भ्रम मन से निकाल दीजिये तथा आप यदि समझ रहे हैं क़ि वो abc पार्टी के नेता बढ़िया नहीं थे अथवा हैं तो xyz पार्टी के नेता भी दूध के धुले नहीं हैं. आप किसी को भी बढ़िया मत समझिएगा क्योंक़ि स्वतंत्रता के पश्चात के इन 64 सालों में सब ने चाहे वो राष्ट्रीय पार्टी हो अथवा प्रादेशिक पार्टी, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता का स्वाद तो सबो ने चखा ही है |

  • छोटे अखबारों पर जिंदा रहने का संकट

    छोटे अखबारों पर जिंदा रहने का संकट

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    नई दिल्ली । सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने नई विज्ञापन नीति जारी की है। इस विज्ञापन नीति के लागू हो जाने के बाद देश के ८० से ९० फीसदी लघु एवं मध्यम श्रेणी के भाषाई समाचार पत्र विज्ञापन के अभाव में बंद हो जाएंगे। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने जो नई अंकीय व्यवस्था लागू की है। उसके बाद लघु एवं मध्यम समाचार पत्रों को केन्द्र एवं राज्य सरकारों के विज्ञापन मिलना संभव ही नहीं होगा। डीएवीपी ने जो नई नीति जारी की है उसमें अंकों के आधार पर समाचार पत्रों को विज्ञापन सूची में वरीयता क्रम में विज्ञापन देने के लिए चयन करने की बात कही गई है। सूचना प्रसारण मंत्रालय के डीएव्हीपी द्वारा दिनांक १५ जून को जो पत्र जारी किया गया है उसमें एबीसी और आरएनआई का प्रमाण पत्र २५ हजार प्रसार संख्या से अधिक वाले समाचार पत्रों के लिए अनिवार्य किया गया है । इसके लिए २५ अंक रखे गए हैं । इसी तरह कर्मचारियों की पीएफ अंशदान पर २० अंक रखे गए हैं । समाचार पत्र की पृष्ठ संख्या के आधार पर २० अंक निर्धारित किए गए हैं। समाचार पत्र द्वारा जिन ३ एजेंसियों के लिए १५ अंक निर्धारित किए गए हैं। स्वयं की प्रिंटिंग प्रेस होने पर १० अंक और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की प्रसार संख्या के आधार पर फीस जमा करने पर १० अंक दिए गए हैं । इस तरह १०० अंक का वर्गीकरण किया गया है, जो वर्तमान में ९० फीसदी लघु एवं मध्यम समाचार पत्र पूरा नहीं कर सकते हैं।
    इस नई विज्ञापन नीति के लागू होने के बाद बड़े राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक समाचार पत्रों को ही अब केन्द्र एवं राज्य सरकारों के विज्ञापन जारी हो सकेंगे। लघु एवं मध्यम श्रेणी के समाचार पत्र डीएवीपी की विज्ञापन सूची से या तो बाहर हो जाएंगे या उन्हें साल में १५ अगस्त २६ जनवरी के ही विज्ञापन मिल पाएंगे। सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा विज्ञापन नीति २०१६ के अनुसार २५ हजार से ऊपर प्रसार संख्या वाले समाचार पत्रों को ३० जून तक नई विज्ञापन नीति के अनुरूप ऑनलाइन जानकारी भरने को कहा गया है। इस पत्र में यह भी कहा गया है कि जिन समाचार पत्रों को ४५ अंक से कम प्राप्त होंगे, उन समाचार पत्रों को विज्ञापन सूची से पृथक किया जा सकता है। नई विज्ञापन नीति में डीएवीपी देश के ९० फीसदी भाषाई समाचार पत्र डीएवीपी की विज्ञापन सूची से बाहर हो जाएंगे।

    -अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आघात
    वेंâद्र एवं राज्य सरकारें विज्ञापन के बल पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को पूरी तरह नियंत्रित कर पाने में सफल हुई हैं। अब यही प्रयोग िंप्रट मीडिया पर लागू किया गया है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा जो नई विज्ञापन नीति जारी की गई है। उसके लागू होने के बाद देशभर के राष्ट्रीय स्तर के करीब एक दर्जन समाचार-पत्र तथा प्रादेशिक स्तर के लगभग १०० समाचार पत्र ही अब वेंâद्र सरकार के विज्ञापनों पर प्राथमिकता से हक अधिकार रख पाएंगे। डीएवीपी व्यवसायिक दृाqष्ट को अपनाते हुए केवल उन्हीं समाचार पत्रों को विज्ञापन जारी करेगी जिनकी पृष्ठ संख्या काफी ज्यादा है और काफी बड़े समाचार पत्र हैं। उन्हें ही विज्ञापन जारी करेगी। सरकार की इस नीति से भाषाई अखबार जो बड़े पैमाने पर विभिन्न प्रदेशों से भाषा के आधार पर कई दशकों से प्रसारित हो रहे हैं और उनका जनमानस में बहुत बड़ा असर है। अब इनको विज्ञापन मिलना संभव नहीं होगा ।

    -डीएवीपी को आधार मानती है देश की सभी राज्य सरकारें
    डीएवीपी के रेट को आधार मानकर राज्यों में उन्हीं समाचार पत्रों को विज्ञापन प्राथमिकता से जारी करते हैं जो डीएवीपी की सूची में दर्ज है । उनके रेट डीएवीपी ने मान्य किए हैं। नई नीति में देश के ९० फीसदी लघु एवं मध्यम श्रेणी के समाचार पत्र अब सूची से बाहर हो जाएंगे। इस ाqस्थति में उन्हें राज्य सरकारों के विज्ञापन भी नहीं मिल पाएंगे ।

    -सुनियोजित षड्यंत्र
    सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा २०१६ में जारी की गई है। नीति में षड्यंत्र की बू आ रही है। समाचार पत्र संचालकों के अनुसार इसमें मात्र तीन समाचार एजेंसी को मान्यता दी है। जबकि पिछले १० वर्षों में भाषाई एजेंसियां बड़े पैमाने पर काम कर रही हैं। उनकी सेवाएं हजारों समाचार पत्र ले रहे हैं। उन्हें नई नीति में अनदेखा किया गया है।
    ६००० से ७५००० की प्रसार संख्या वाले समाचार पत्रों के लिए अभी तक सीए (चार्टर्ड एकाउन्टेंट) का प्रमाण पत्र लेना अनिवार्य था। नई नीति में २५००० से ७५००० तक के समाचार पत्रों को एबीसी अथवा आरएनआई से प्रसार संख्या प्रमाणित कराने की अनिवार्यता रखी गई है। मात्र १५ दिनों के अंदर यह प्रमाण पत्र प्राप्त कर पाना किसी भी समाचार पत्र के लिए संभव नहीं है । एबीसी और आरएनआई के लिए भी हजारों समाचार पत्रों की प्रसार संख्या का ऑडिट कर पाना संभव भी नहीं है। नई व्यवस्था में जान-बूझकर इस तरीके के प्रावधान रखे गए हैं जो लघु एवं मध्यम समाचार पत्रों द्वारा न तो पूरे किए जा सकते हैं ना ही उन पर लागू होते हैं । ऐसी ाqस्थति में नए नियमों में २५००० से ७५००० संख्या वाले समाचार पत्रों को २५ से ३० अंक मिलना भी संभव नहीं होगा। डीएवीपी ने न्यूनतम ४५ अंक अनिवार्य किया है। लघु एवं मध्यम समाचार पत्रों द्वारा इस नीति का व्यापक विरोध किया जा रहा है। समाचार एजेंसी को कई प्रादेशिक संगठनों एवं समाचार पत्र संचालकों द्वारा बताया गया है कि यह नीति स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति पर अभी तक का सबसे बड़ा आघात माना जा सकता है। कई समाचार पत्र मालिकों ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि बड़े-बड़े कारपोरेट घरानों का यह एक बहुत बड़ा षडयंत्र है। जिस तरह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर विज्ञापन देकर सरकारों ने अपना नियंत्रण कर लिया है। उसी तरह अब िंप्रट मीडिया को नियंत्रित करने भाषाई अखबारों को समाप्त करने का षड्यंत्र रचा गया है । जिसका भारी विरोध समाचार पत्र संचालक कर रहे हैं । इस नीति के लागू होने से देश के लगभग १ लाख पत्रकारों के बेरोजगार होने की संभावना बन गई है।

  • डीएवीपी की नीति में संशोधन क्यों ?

    डीएवीपी की नीति में संशोधन क्यों ?

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    – डॉ. मयंक चतुर्वेदी
    विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) की विज्ञापन नीति में पहले भारत सरकार की ओर से देश की तीन बड़ी संवाद समितियों को वरीयता दी गई थी, साथ में सभी समाचार पत्र-पत्रिकाओं से कहा गया था कि इन तीन में से किसी एक की सेवाएं लेना अनिवार्य है। जैसे ही यह निर्देश डीएवीपी की वेबसाइट पर आए, देशभर में जैसे तमाम अखबारों ने विरोध करना शुरू कर दिया। यह विरोध बहुत हद तक इस बात के लिए भी था कि क्‍यों समाचार पत्रों के लिए सरकार की इस विज्ञापन एजेंसी ने अंक आधारित नियम निर्धारित किए हैं। इन नियमों के अनुसार प्रसार संख्‍या के लिए एबीसी या आरएनआई प्रमाण पत्र होने पर 25 अंक, समाचार एजेंसी की सेवा पर 15 अंक, भविष्‍य निधि कार्यालय में सभी कर्मचारियों का पंजीयन होने पर 20 अंक, प्रेस कॉन्‍सिल की वार्ष‍िक सदस्‍यता लेने के बाद 10 अंक, स्‍वयं की प्रेस होने पर 10 अंक और समाचार पत्रों के पृष्‍ठों की संख्‍या के आधार पर अधिकतम 20 से लेकर निम्‍नतम 12 अंक तक दिए जाएंगे।

    इस नई विज्ञापन नीति के आने के बाद से जैसे ज्‍यादातर अखबारों को जो अब तक स्‍वयं नियमों की अनदेखी करते आ रहे थे, लगा कि सरकार ने उन पर सेंसरशिप लागू कर दी है। इन छोटे-मध्यम श्रेणी के अधिकतम अखबारों के साथ कुछ एजेंसियों को भी पेट में दर्द हुआ, जिन्‍हें अपने लिए इस नीति में लाभ नहीं दिख रहा था। बाकायदा विरोध-प्रदर्शन का दौर शुरू हो गया । एक क्षेत्रीय समाचार एजेंसी ने तो इसमें सभी हदें पार कर दीं । वह अपने खर्चे पर छोटे-मंझोले अखबार मालिकों को दिल्‍ली ले गई और अपनी ओर से कई दिनों तक विरोध प्रदर्शन करवाया।

    यहां प्रश्‍न यह है कि सरकार को इस नीति को लाने की जरूरत क्‍यों आन पड़ी ? क्‍या सरकार को यह नहीं पता था कि अखबारों से उसकी सीधेतौर पर ठन जाएगी । यह तय था कि जिस मोदी सरकार के बारे में कल तक ये अखबार गुणगान करने में पीछे नहीं थे, देश में इस नई विज्ञापन नीति के लागू होते ही समाचार पत्र सीधे सरकार के विरोध में खड़े हो सकते हैं। वास्‍तव में यदि इन सभी का उत्‍तर कुछ होगा तो वह हां में ही होगा। क्‍योंकि सरकार, सरकार होती है, उसके संसाधन अपार हैं और उसे ज्ञान देने वालों की भी कोई कमी नहीं होती, इसके बाद यह जानकर कि आने वाले दिनों में नई विज्ञापन नीति के लागू होते ही सबसे पहले सरकार का विरोध होगा, यह नीति डीएवीपी ने लागू की।

    देखा जाए तो जिन लोगों को ये नहीं समझ आ रहा है कि क्‍यों सरकार ने आ बैल मुझे मार वाली कहावत को अपनी इस नीति के कारण चरितार्थ किया, तो उन्‍हें ये समझ लेना चाहिए कि सरकार इस रास्‍ते पर चलकर देश के उन तमाम कर्मचारियों का भला करना चाहती थी, जो किसी न किसी अखबार के दफ्तर में वर्षों से काम तो कर रहे हैं लेकिन उनका पीएफ नहीं कटता। जीवन के उत्‍तरार्ध में जीवन यापन के लिए कहीं कोई भविष्‍य नि‍धि सुरक्षित नहीं है। वस्‍तुत: सरकार इस नियम के माध्‍यम से देश के ऐसे कई लाख कर्मचारियों का भविष्‍य सुरक्षित करना चाह रही थी। इसी प्रकार समाचार एजेंसियों की अनिवार्यता को लेकर कहा जा सकता है। अक्‍सर देखा गया है कि वेब मीडिया के आ जाने के बाद से कई अखबार अपने समाचार पत्र में खबरों की पूर्ति इनसे सीधे कर लेते हैं। इन खबरों के निर्माण में जो श्रम, समय और धन उस संस्‍था का लगा है, उसका पारिश्रमिक चुकाए बगैर समाचारों का उपयोग जैसे इन दिनों रिवाज सा बन गया था। एक तरफ दूसरे के कंटेंट को बिना उसकी अनुमति के उपयोग करना अपराध माना जाता है तो दूसरी ओर मीडिया जगत में ऐसा होना आम बात हो गई थी।

    वास्‍तव में एजेंसी के माध्‍यम से सरकार की कोशिश यही थी कि सभी अखबार नियमानुसार समाचार प्राप्‍त करें और उन खबरों के एवज में कुछ न कुछ भुगतान करें, जैसा कि दुनिया के तमाम देशों में होता है । लेकिन इसका देशभर के कई अखबारों ने विरोध किया । आश्‍चर्य की बात उसमें यह है कि यह विरोध एक समाचार एजेंसी पर आकर टिक गया था। यहां कोई भी पीटीआई या यूएनआई का विरोध नहीं कर रहा था, विरोध करने वालों के पेट में दर्द था तो वह हिन्‍दुस्‍थान समाचार को लेकर था। इस एजेंसी को लेकर यही बातें आम थी कि यह एक विशेष विचारधारा की एजेंसी है। यहां समाचार नहीं विचारधारा मिलेगी और इन्‍हीं के लोगों की सरकार है इसलिए उन्‍होंने इस एजेंसी को डीएवीपी में मान्‍यता दी है। यानि की पैसा भी देना पड़ेगा और समाचार भी नहीं मिलेंगे, लेकिन क्‍या यह पूरा सत्‍य था ? जो हिन्‍दुस्‍थान समाचार की कार्यप्रणाली से पहले से परिचित रहे हैं वे जानते हैं कि इस संवाद समिति का सत्‍य क्‍या है। एक क्षेत्रीय न्‍यूज एजेंसी से जुड़े समाचार पत्र एवं अन्‍य लोग जैसा कि कई लोगों से चर्चा के दौरान पता चला कि नाम लेकर हिन्‍दुस्‍थान समाचार का खुला विरोध कर रहे थे। कम से कम उन्‍हें पहले इसके इतिहास की जानकारी कर लेनी चाहिए थी ।

    हिन्‍दुस्‍थान समाचार 1948 से देश में कार्यरत है। पीटीआई को जब देश के प्रथम गृहमंत्री सरदार पटेल ने विधिवत शुरू किया था, उसके पहले ही यह संवाद समिति मुंबई से अपना कार्य अंग्रेजी के साथ भारतीय भाषाओं में आरंभ कर चुकी थी। यह आज भी देश में सबसे ज्‍यादा भारतीय भाषाओं में समाचार देने वाली बहुभाषी न्‍यूज एजेंसी है। इस एजेंसी के खाते में कई उपलब्‍धियां दर्ज हैं। यह हिन्‍दी और भारतीय भाषाओं में सबसे पहले दूरमुद्रक टेलीप्रिंटर निर्माण कराने वाली संवाद समिति है। चीन का आक्रमण हो या अन्‍य विदेशी घुसपैठ से लेकर देश की ग्रामीण जन से जुड़ी बातें यदि किसी एजेंसी ने सबसे ज्‍यादा और पहले देश के आमजन से जुड़ी सूचनाएं सार्वजनिक की हैं तो यही वह एजेंसी है। आज भी इस संवाद समिति का अपना संवाददाताओं का एक अखिल भारतीय और व्‍यापक नेटवर्क है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरू से लेकर श्रीमती इंदिरा गांधी के समय तक हिंदुस्‍थान समाचार को केंद्र व राज्‍य सरकारों द्वारा लगातार न्‍यूज एजेंसी के रूप मान्‍यता दी जाती रही है। यहां तक कि कई कांग्रेसी एवं अन्‍य विचारधाराओं वाले नेता समय-समय पर इससे जुड़े रहे। मध्‍यप्रदेश कांग्रेस के अध्‍यक्ष अरुण यादव के पिता स्‍व. सुभाष यादव भी कभी हिंदुस्‍थान समाचार बहुभाषी सहकारी संवाद समिति के अध्‍यक्ष रह चुके हैं। संवाददाताओं के स्‍तर पर भी देखें तो किसी पत्रकार की अपनी विचारधारा कुछ भी रही हो, यदि उसमें पत्रकारिता के गुण हैं और वह मीडिया के स्‍वधर्म को जानता है, तो बिना यह जाने कि वह किस विचारधारा से संबद्ध है, हिंदुस्‍थान समाचार ने उसे अपने यहां बतौर संवाददाता से लेकर केंद्र प्रमुख एवं अन्‍य महत्‍वपूर्ण जिम्‍मेदारियां सौंपने में संकोच या भेदभाव नहीं किया।

    डीएवीपी ने हिन्‍दुस्‍थान समाचार को केवल इसलिए ही अपनी सूची में नहीं डाल लिया होगा कि इसकी विशेष विचारधारा से नजदीकियां होने की चर्चाएं आम हैं। सभी को यह समझना ही चाहिए कि समाचार में कैसा विचार ? क्‍यों कि एक समाचार तो समाचार ही होता है, और देश, दुनिया के समाचार देना प्रत्‍येक संवाद समिति का रोजमर्रा का कार्य है। वास्‍तव में विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय ने पीटीआई, यूएनआई के साथ हिन्‍दुस्‍थान समाचार को इसलिए अपनी सूची में लिया क्‍योंकि यह एजेंसी प्रिंट के लिए दी जाने वाली समाचार सामग्री में सबसे ज्‍यादा क्षेत्रीय खबरों को नियमित प्रसारित करती है और वह भी कई भाषाओं में । यह भी सरकार के समय-समय पर निर्धारित किए गए नियमों का पालन करती है, मजीठिया वेतन आयोग की अनुशंसाओं के अनुसार अपने कर्मचारियों को वेतन देती है और नियमित कर्मचारियों का पीएफ काटने से लेकर अन्‍य निर्धारित मापदंडों को पूरा करती है।

    ऐसे में क्‍या उन तमाम समाचार एजेंसियों को अपने गिरेबान में नहीं झांकना चाहिए जो अपने कर्मचारियों के हित में न तो किसी वेज बोर्ड की अनुशंसाओं को लागू करती हैं और न ही सभी को कर्मचारी भविष्‍य नि‍धि का लाभ देती हैं।

    देखा जाए तो विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) को आज अखबारों की तरह ही यह तय कर देना चाहिए कि न्‍यूज एजेंसी के लिए हमारे यहां सूची में पंजीकृत होने के लिए क्‍या नियम होने चाहिए, जिनकी कि पूर्ति की जाना अपरिहार्य रहे। डीएवीपी ने अभी हाल ही में इस मामले को लेकर ‘ मुद्रित माध्‍यमों के लिए भारत शासन की विज्ञापन नीति-2016 में संशोधन’ किया है, उसमें उसने लिखा है कि समाचार पत्र पीआईबी एवं प्रेस कॉन्‍सिल ऑफ इंडिया से मान्‍यता प्राप्‍त किसी भी न्‍यूज एजेंसी के ग्राहक बन सकते हैं। यहां सीधा प्रश्‍न विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) से आज क्‍यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि आपने यह जो नया निर्देश निकाला है, विरोध इसका नहीं, लेकिन क्‍या उन्‍होंने उन तमाम संवाद एजेंसियों का निरीक्षण करा लिया है जो अब इस निर्देश के नाम पर अखबारों को अपनी सदस्‍यता देंगे। क्‍या यह तमाम एजेंसियां समय-समय पर पत्रकारों के हित में बनाए गए भारत सरकार नियमों और आयोगों के निर्देशों का पालन कर रही हैं। इन्‍होंने अपने यहां क्‍या मजीठिया बेज बोर्ड के नियमों का अक्षरक्ष: पालन किया है। यदि पीटीआई और यूएनआई के साथ हिन्‍दुस्‍थान समाचार केंद्र सरकार के सभी नियमों का पालन करती है, तो क्‍यों नहीं अन्‍य संवाद समितियों को भी उन नियमों को स्‍वीकार करना चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं कर रहीं तो उन्‍हें किस आधार पर विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) अपनी सूची में शामिल करने के लिए तैयार हो गया ?

  • गांधी को संघ ने नहीं माराः राहुल गांधी

    गांधी को संघ ने नहीं माराः राहुल गांधी

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    नई दिल्ली.राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को गरियाने के चक्कर में राहुल गांधी अपने ही बुने जाल में उलझ गए हैं। मानहानि के मुकदमे से बचने के चक्कर में वे अदालत के सामने अपने ही बयान से पलट गए और कहा कि उन्होंने संघ को कभी महात्मा गांधी की हत्या का दोषी नहीं बताया । राहुल गांधी की इस हरकत से एक बार फिर कांग्रेस को अपनी भद पिटवाना पड़ी है।

    गांधी की हत्या के लिए संघ को ज़िम्मेदार बताने पर सुप्रीम कोर्ट में दायर किए गए मानहानि केस में राहुल गांधी ने बुधवार को कहा कि उन्होंने इसके लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को एक संगठन के तौर पर कभी जिम्मेदार नहीं बताया है.

    कांग्रेस उपाध्यक्ष के वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में मुंबई हाई कोर्ट के समक्ष दायर किए गए राहुल गांधी के हलफनामे का हवाला दिया. इस हलफनामे के मुताबिक राहुल ने RSS के कुछ लोगों पर गांधी की हत्या करने का आरोप लगाया था न कि संगठन को महात्मा का हत्यारा बताया था.

    इस मामले में अगली सुनवाई 1 सितंबर होगी. सिब्बल ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि गांधी ने आरएसएस संस्थान को गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया था, बल्कि सिर्फ जुड़े लोगों के लिए कहा था.

    राहुल की ओर से कहा गया कि जिस संघ कार्यकर्ता ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है, उसने उनके बयान की गलत व्याख्या की है. कोर्ट ने याचिकाकर्ता से इस संबंझ में अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए कहा है.

    पिछले महीने राहुल ने इस मुद्दे पर माफी मांगने से इंकार कर दिया था. जिसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें फटकार भी लगाई थी.

    इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राहुल गांधी को एक संगठन की ‘सार्वजनिक रूप से निंदा’ नहीं करनी चाहिए थी और अगर उन्होंने खेद नहीं जताया तो उन्हें मानहानि मामले में मुकदमे का सामना करना पड़ेगा.

    न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति आर. एफ. नरीमन की पीठ ने राहुल के भाषण पर सवाल उठाए और आश्चर्य जताया था कि उन्होंने गलत ऐतिहासिक तथ्य का उद्धरण देकर भाषण क्यों दिया.

    गौरतलब है कि साल 2014 में महाराष्ट्र के ठाणे में एक जनसभा को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा था कि RSS के लोगों ने गांधी जी की हत्या कर दी थी और आज उनके लोग (बीजेपी) उनकी बात करते हैं.

    संघ की भिवंडी इकाई के सचिव राजेश कुंटे ने 2014 में गांधी की हत्या का आरोप कथित रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगाने के संबंध में राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि का मामला दाखिल किया गया था.

    कुंटे ने आरोप लगाया था कि राहुल गांधी ने सोनाले में 6 मार्च 2014 को एक चुनावी रैली में कहा था कि संघ ने गांधी जी की हत्या की. इसके बाद राहुल गांधी के खिलाफ शिकायत दर्ज की गई थी. 2015 में गांधी ने सुप्रीम कोर्ट से उनके खिलाफ क्रिमिनल केस को खत्म करने की मांग की थी.

  • अदालतें बोलती रहें दही हांडी तो फूटेगी

    अदालतें बोलती रहें दही हांडी तो फूटेगी

    दही हांडी उत्सव तो जोर शोर से मनेगा.
    दही हांडी उत्सव तो जोर शोर से मनेगा.

    चल समारोह के बीच इक्कीस स्थानों पर फूटेगी दही हांडी

    भोपाल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। दही हांडी उत्सव पर सख्ती के मुंबई हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाने से भले ही इंकार कर दिया हो पर मध्यप्रदेश के गोविंदा इसके बावजूद श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का त्यौहार धूमधाम से मनाने की तैयारी कर रहे हैं। राजधानी में हरिहर महोत्सव धार्मिक एवं सामाजिक संस्था समिति ने चल समारोह के साथ इक्कीस स्थानों पर दही हांडी फोड़ने का आयोजन किया है। इस तरह की कई अन्य संस्थाएं शहर भर में सैकड़ों स्थानों पर दही हांडी फोड़ने का आयोजन धूमधाम से कर रहीं हैं। दही हांडी उत्सवों में भाग लेने वाले गोविंदा सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सहमत नहीं हैं,उनका कहना है कि हिंदु त्यौहारों को षड़यंत्र पूर्वक निशाना बनाया जा रहा है।

    हिंदू त्यौहारों की परंपराओं में नया रंग भरने में जुटे समाजसेवी प्रमोद नेमा का कहना है कि पिछले कुछ सालों से हिंदू त्यौहारों पर तरह तरह के सवाल उठाने और रोक लगाने की प्रवृत्तियां बढ़ती जा रहीं हैं। लोग इन मुद्दों पर अदालतों में वाद दायर कर देते हैं और अदालतें भारतीय समाज की पृष्ठभूमि पर गौर किए बगैर फतवानुमा फैसले जारी कर देती है। उन्होंने कहा कि दही हांडी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अठारह साल से कम उम्र के बच्चों को इस उत्सव में भाग न लेने दिया जाए। जबकि उमंगों और उत्साह से भरे माहौल में गोविंदाओं के उम्र के प्रमाणपत्र नहीं जांचे जा सकते। श्री नेमा ने कहा कि इस आयोजन में पूरा ध्यान रखा जाता है कि गोविंदाओं को चोट न लगे। इसलिए दही हांडी भी कम ऊंचाई पर ही लटकाई जाती है, इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट त्यौहार के अवसर पर रोक लगाकर लोगों को नाराजगी के लिए प्रेरित कर रहा है। उन्होंने कहा कि दही हांडी का उत्सव युवाओं में जोश भरने वाला होता है। इसके लिए बच्चे और युवा अखाड़ों में कसरत करते हैं। सामूहिक भाईचारा पैदा करने वाले इस आयोजन को रोकना कतई उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि अदालती फैसलों से हिंदुओं के प्रति नकारात्मक माहौल बनाने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने की पहल अदालतों को ही करनी होगी।

    श्री नेमा ने कहा कि भोपाल में दुर्गा उत्सव के समय झांकियों को ठंडा करने के लिए प्रेमपुरा घाट तय किया जा चुका है। वहां झांकियां विसर्जित करने से तालाब का पर्यावरण किसी भी तरह खराब नहीं होता है इसके बावजूद प्लास्टर आफ पेरिस की मूर्तियां और उनके रंगों पर रोक लगाने की मुहिम चलाई जा रही है। जब उन मूर्तियों का विसर्जन तालाब में होना ही नहीं है तो फिर किस तरह पर्यावरण प्रभावित हो जाएगा। उन्होंने कहा कि हम भी इसी शहर में रहते हैं और शहर का पर्यावरण न बिगड़े ये हम भी चाहते हैं। इसके बावजूद नेशनल ग्रीन टिब्यूनल जैसी संस्थाएं बेवजह हस्तक्षेप करती रहती हैं।

    आज आयोजित पत्रकार वार्ता में आयोजन के संयोजक डॉ.अतुल कौशल, संयोजक मनोज राठौर, और समिति के अध्यक्ष संजय सिसोदिया ने बताया कि शोभायात्रा का पूरा मार्ग मथुरा वृंदावन की तर्ज पर सजाया जाएगा। 25 अगस्त गुरुवार को श्री जी मंदिर लखेरापुरा तिलकोत्सव और आरती के बाद भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी। इस दौरान 21 प्रमुख चौराहों पर ग्वाल टोलियां मटकी फोड़ने और मक्खन लूटने का अद्भुत प्रदर्शन करेंगी।

    शोभायात्रा में चार घोड़े वाले रथ में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन की झांकी, शंकर पार्वती का तांडव, नृत्य करती झांकी, भगवान विष्णु की झांकी, लड्डू गोपाल की पालकी, राधाकृष्ण मयूर झांकी के साथ ही धार्मिक कथाओं पर आधारित झांकियां आकर्षण का केन्द्र रहेंगी।

    भगवान श्री जी की शोभायात्रा में विभिन्न झांकियों के साथ उज्जैन, कुरावर, नरसिंहगढ़, और भोपाल की बैंड पार्टियों की धुनों पर गरबा करते कलाकार, बुरहानपुर की धमाल ढोल पार्टी और नाशा पार्टी, दुल दुल घोड़ी, डीजे के साथ इस्कान समूह के भक्तगण मंजीरे और मृदंग पर हरे रामा हरे कृष्णा के कीर्तन से भक्तिरस की गंगा बहाते हुए चलेंगे।

    शोभायात्रा में बुंदेलखंड सागर और मंडला जिलों के लोक व आदिवासी नृत्य की मंडलियों के साथ मुखौटा नृत्य, मोर नृत्य, राजस्थानी नृत्य, फायर डांस, गरबा नृत्य आकर्षण का केन्द्र रहेंगे। शोभायात्रा मार्ग पर पड़ने वाले चौराहों पर दूध दही मक्खन से भरी मटकियां लगाई जाएंगी। जिन्हें बालकृष्ण और उनके सखा फोड़ते हुए चलेंगे। अनेकों स्थानों पर स्वागत द्वार बनाए जाएंगे। माताएं और बहनें भगवान श्री जी की पूजा अर्चना और पुष्पवर्षा कर शोभायात्रा का स्वागत करेंगी।

  • भारत बुलंद बनेगाःप्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

    भारत बुलंद बनेगाःप्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

    प्रधानमंत्री नरेद्रमोदी ने लाल किले की प्राचीर से कहा दुनिया मानवता की संस्कृति और आतंकवाद में फर्क को महसूस करे।
    प्रधानमंत्री नरेद्रमोदी ने लाल किले की प्राचीर से कहा दुनिया मानवता की संस्कृति और आतंकवाद में फर्क को महसूस करे।

    स्वतंत्रता दिवस 2016 के अवसर पर प्रधानमंत्री के भाषण का मूल पाठ

    मेरे प्‍यारे देशवासियों,

    आजादी के इस पावन पर्व पर सवा सौ करोड़ देशवासियों को, विश्‍व में फैले हुए सभी भारतीयों को लाल किले की प्राचीर से बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं।

    आजादी का यह पर्व, 70वां वर्ष एक नया संकल्‍प, नई उमंग, नई ऊर्जा, राष्‍ट्र को नई ऊंचाईयों पर ले जाने का संकल्‍प पर्व है। आज हम जो आजादी की सांस ले रहे हैं, उसके पीछे लक्ष्याव्धि महापुरूषों का बलिदान है, त्‍याग और तपस्‍या की गाथा है। जवानी में फांसी के फंदे को चूमने वाले वीरों की याद आती है। महात्‍मा गांधी, सरदार पटेल, पंडित नेहरू अनगिनत महापुरूष, जिन्‍होंने देश की आजादी के लिए अविरत संघर्ष किया और उसी का नतीजा है कि आज हमें स्‍वराज में आजादी की सांस लेने का सौभाग्‍य प्राप्‍त हुआ है।

    भारत एक चिर पुरातन राष्‍ट्र है। हजारों साल का इतिहास है, हजारों साल की सांस्‍कृतिक विरासत है। वेद से विवेकानंद तक, उपनिषद् से उपग्रह तक, सुदर्शन चक्रधारी मोहन से ले करके चरखाधारी मोहन तक, महाभारत के भीम से ले करके भीमराव तक, एक हमारी लम्‍बी इतिहास की यात्रा है, विरासत है। अनेक उतार-चढ़ाव इस धरती ने देखें हैं। अनेक पीढि़यों ने संघर्ष किया है। अनेक पीढि़यों ने मानवजाति को महामूल्‍य देने के लिए तपस्‍याएं की है।

    भारत की उम्र 70 साल नहीं है, लेकिन गुलामी के कालखंड के बाद हमने जो आजादी पाई, एक नई व्‍यवस्‍था के तहत हमने देश को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। यह यात्रा 70 साल की है। सरदार वल्‍लभ भाई पटेल ने देश को एक किया, अब हम सबका दायित्‍व है देश को श्रेष्‍ठ बनाए। एक भारत, श्रेष्‍ठ भारत का सपना पूरा करने का हम लोगों को निरंतर प्रयास करना चाहिए।

    भाइयों-बहनों स्‍वराज ऐसे नहीं मिला है। जुल्‍म बेशुमार थे, लेकिन संकल्‍प अडिग थे। हर हिंदुस्‍तानी आजादी के आंदोलन का सिपाही था। हरेक का जज्‍बा था, देश आजाद हो। हो सकता है हर किसी को बलिदान का सौभाग्‍य न मिला हो, हो सकता है हर किसी को जेल जाने का सौभाग्‍य न मिला हो, लेकिन हर हिंदुस्‍तानी संकल्‍पबद्ध था। महात्‍मा जी का नेतृत्‍व था, सशस्त्र क्रान्तिकारियों के बलिदान की प्रेरणा थी और तब जाकर के स्वराज प्राप्त हुआ है। लेकिन अब स्वराज्य (Self-Governance) को सुराज (Good-Governance) में बदलना, ये सवा सौ करोड़ देशवासियों का संकल्प है। अगर स्वराज बलिदान के बिना नहीं मिला है, तो सुराज भी त्याग के बिना, पुरुषार्थ के बिना, पराक्रम के बिना, समर्पण के बिना, अनुशासन के बिना संभव नहीं होता है और इसलिए सवा सौ करोड़ देशवासियों के सुराज (Good-Governance) के संकल्प को आगे बढ़ाने के लिए अपनी-अपनी विशेष जिम्मवारियों की ओर प्रतिबद्धता से आगे बढ़ना होगा।

    पंचायत हो या Parliament हो, ग्राम प्रधान हो या प्रधानमंत्री हो, हर किसी को, हर Democratic Institution को सुराज्य (Good-Governance) की ओर आगे बढ़ने के लिए अपनी जिम्मेवारियों को निभाना होगा, अपनी जिम्मेवारियों को परिपूर्ण करना होगा और तब जा करके भारत सुराज के सपने को पाने में और अधिक देर नहीं करेगा।

    ये बात सही है देश के सामने समस्याएं अनेक हैं, लेकिन ये हम न भूलें कि अगर समस्याएं हैं तो इस देश के पास सामर्थ्य भी है और जब हम सामर्थ्य की शक्ति को लेकर के चलते हैं, तो समस्याओं से समाधान के रास्ते भी मिल जाते हैं। और इसलिए भाइयों-बहनों, भारत के पास अगर लाखों समस्याएं हैं तो सवा सौ करोड़ मस्तिष्क भी हैं जो समस्याओं का समाधान करने का सामर्थ्य भी रखते हैं।

    भाइयों-बहनों, एक समय था, हमारे यहां सरकारें आक्षेपों से घिरी रहती थीं, लेकिन अब वक्त बदल चुका है। आज सरकार आक्षेपों से घिरी नहीं है, लेकिन अपेक्षाओं से घिरी हुई है। और जब अपेक्षाओं से घिरी रहती है तब, ये इस बात का संकेत होता है कि जब आशा हो, भरोसा हो, उसी की कोख से अपेक्षाएं जन्म लेती हैं और अपेक्षाएं सुराज की ओर जाने की गति को तेज करती हैं, नए प्राण पूरती हैं और संकल्पों की पूर्ति नित्य, निरंतर होती रहती है। इसलिए मेरे भाइयों-बहनों हम लोगों के लिए इस सुराज की यात्रा.. आज जब मैं लालकिले की प्राचीर से आपसे बात कर रहा हूं तो बहुत स्वाभाविक है कि सरकार क्या कर रही है, देश के लिए क्या हो रहा है, देश के लिए क्या होना चाहिए, इन बातों की चर्चा होना बड़ा स्वाभाविक है। मैं भी बहुत बड़ा लंबा सरकार का कार्यकाज का हिसाब आपके सामने रख सकता हूं, बहुत सारी बातें आपके सामने प्रस्तुत कर सकता हूं।

    दो साल के कार्यकाल में अनगिनत Initiatives, अनगिनत काम लेकिन अगर उसका ब्यौरा देने जाऊंगा मैं, तो पता नहीं हफ्ते भर मुझे लालकिले की प्राचीर से बोलते रहना पड़ेगा।

    और इसलिए मैं उस मोह के बजाए आज, कार्य की नहीं, इस सरकार की कार्य-संस्कृति के प्रति आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। कभी-कभी कार्य का तो लेखा-जोखा करना सरल होता है, लेकिन कार्य-संस्कृति को, जब तक गहराई में न जाएं, जानना, समझना, पहचानना सामान्य मानव के लिए सरल नहीं होता है।

    और इसलिए मेरे प्यारे भाइयों-बहनों, मेरे प्यारे देशवासियों, आज मैं सिर्फ नीति की नहीं, नीयत की भी और निर्णय की भी बात कर रहा हूं। भाइयों-बहनों, सिर्फ दिशा नहीं, एक व्यापक दृष्टिकोण का मसला है। सिर्फ रूपरेखा नहीं, ये रूपांतर का संकल्‍प है। ये लोक आकांक्षा, लोकतंत्र और लोकसमर्थन की त्रिवेणी धारा है। ये मति भी है ये सहमति भी है, ये गति भी है और प्रगति का अहसास भी है।

    और इसलिए मेरे प्‍यारे देशवासियों, मैं आज जब सुराज्य की बात करता हूं तब सुराज का सीधा-सीधा मतलब है- हमारे देश के सामान्‍य से सामान्‍य मानव के जीवन में बदलाव लाना है। सुराज का मतलब है शासन सामान्‍य मानव के प्रति संवेदनशील हो, जिम्‍मेवार हो, और जन सामान्‍य के प्रति समर्पित हो। और तब जा करके Good Governance पर बल देना होता है, हर किसी के दायित्‍व को टटोलते रहना पड़ता है, responsibility और accountability ये उसकी जड़ में होनी चाहिए, वहीं से रस-कस प्राप्‍त होना चाहिए। और इसलिए भाइयो-बहनों, शासन संवेदनशील होना चाहिए।

    हमें याद है, कि वो भी एक दिन थे जब किसी बड़े अस्‍पताल में जाना हो तो कितने दिनों तक इंतजार करना पड़ता था। AIIMS में लोग आते थे, दो-दो, तीन-तीन दिन बिताते थे, तब जा करके कब उनको जांचा-परखा जाएगा उसका तय होता था। आज उन सारी व्‍यवस्‍थाओं को हम बदल पाएं हैं। Online registration होता है, Online डॉक्‍टर की appointment मिलती है, तय समय पर patient आए तो उसका काम शुरू हो जाता है। इतना ही नहीं, उसके सारे medical records भी उसको Online उपलब्‍ध होते हैं। और हम इसको आरोग्‍य के क्षेत्र में देशव्‍यापी culture के रूप में विकसित करना चाहते हैं। आज सरकार के बड़े-बड़े 40 से अधिक अस्‍पतालों में इस व्‍यवस्‍था को किया है लेकिन इसका मूलमंत्र शासन संवेदनशील होना चाहिए। भाइयो-बहनों, शासन उत्‍तरदायी होना चाहिए। अगर शासन उत्‍तरदायी नहीं होता है, तो जन सामान्‍य की समस्‍याएं ऐसे की ऐसे लटकी रहती हैं। बदलाव कैसे आता है, technology तो है, लेकिन एक समय था rail tickets…हिन्‍दुस्‍तान के सामान्‍य मानव को rail tickets से संबंध आता है, रेल से संबंध आता है, गरीबों का संबंध आता है। पहले आधुनिक technology से एक मिनट में सिर्फ दो हजार tickets निकल पाते थे, और वो भी जो उस जमाने में जिसने देखा होगा, वो चक्‍कर घूमता रहता था, पता नहीं कब website खुलेगी। आज मुझे संतोष के साथ कहना है कि आज एक मिनट में 15 हजार रेल टिकट मिलना संभव हो गया है।

    एक Responsible Government सामान्‍य मानव की आवश्‍यकता और अपेक्षाओं के लिए किस प्रकार के कदम उठाती है, सरकार में जवाबदेही होनी चाहिए।

    सारे देश में एक वर्ग है, खास करके मध्‍यम वर्ग, उच्‍च-मध्‍यम वर्ग, उसको जब मिलो, कभी-कभी वो पुलिस से ज्‍यादा Income Tax वालों से परेशान हुआ करता है। ये स्थिति मुझे बदलनी है और मैं लगा हूं, बदल के रहूंगा। लेकिन एक समय था, जब सामान्‍य ईमानदार नागरिक अपना income-tax में पैसा देता था और बेचारा carefully दो रुपए ज्‍यादा ही दे देता था। उसको लगता था भई पीछे से कोई तकलीफ न हो। लेकिन एक बार सरकारी खजाने में धन आ गया तो refund लेने के लिए उसको चने चबाने पड़ते थे, सिफारिश लगानी पड़ती थी और महीनों तक नागरिक के हक का पैसा सरकारी खजाने से जाने में टालमटोल हुआ करता था। आज हमने online-refund देने की व्‍यवस्‍था की। हफ्ते-दो हफ्ते में, तीन हफ्तों में आज refund मिलना शुरू हो गया। जो आज मुझे टीवी पर सुनते होंगे, उनको भी यह बात ध्‍यान में आती होगी, हां भाई, मेरा refund तो सीधा-सीधा मुझे.. मैंने कोई application नहीं की, आ गया। तो यह उत्‍तरदायी, जवाबदेही ये सारे जो प्रयास होते हैं, उनका परिणाम है।

    शासन में सुराज के लिए पारदर्शिता को बल देना उतना ही महत्‍वपूर्ण है। आप जानते हैं! आज समाज में पहले से एक विश्‍वव्‍यापी संपर्क संबंध धीरे-धीरे सहज बनता जा रहा है। मध्‍यम वर्ग के व्‍यक्‍ति अपना पासपोर्ट हो…पहला जमाना था साल में करीब 40 लाख – 50 लाख पासपोर्ट के लिए अर्जियां आती थी। आजकल दो-दो करोड़ लोग पासपोर्ट के लिए apply करते हैं। भाइयों-बहनों, पहले पासपोर्ट पाने में अगर सिफारिश नहीं है, तो चार-छह महीने तो यूं ही जांच-पड़ताल में चले जाते थे। हमने उस स्‍थिति को बदला और आज मैं गर्व से कह सकता हूं कि करीब हफ्ते-दो हफ्ते में नागरिकों के हक में जो पासपोर्ट है, उसको पहुंचा दिया जाता है और पारदर्शिता, कोई सिफारिश की जरूरत नहीं, कोई टालमटोल की जरूरत नहीं। आज मैं कह सकता हूं कि सिर्फ 2015-16 में पौने दो करोड़ पासपोर्ट, इतने कम समय में देने का, हमने काम किया है।

    सुराज में, शासन में दक्षता भी होनी चाहिए, efficiency होनी चाहिए और इसलिए हमारे यहां पहले किसी company को अपना कोई कारखाना लगाना है, कारोबार करना है तो apply करते है। सिर्फ registration का काम था, वो देश के लिए कुछ करना चाहता था। लेकिन छह-छह महीने तो यूं ही निकल जाते थे। भाइयो-बहनों अगर दक्षता लाई जाए तो उसी सरकार, वो ही नियम, वो ही मुलाजिम, वो ही company registration का काम, आज 24 घंटे में करने के लिए सज्ज हो गए हैं और कर रहे हैं। अकेले पिछली जुलाई में 900 से ज्‍यादा ऐसे Registration का काम उन्‍होंने कर दिया।

    भाइयो-बहनों सुराज के लिए सुशासन भी जरूरी है। Good governance भी जरूरी है और उस Good governance के लिए हमने जो कदम उठाए….मैंने पिछली बार यहां लाल किले से कहा था कि हम Group ‘c’ और Group ‘d’ सरकार के इन पदों को इंटरव्‍यू से बाहर कर देंगे। Merit के आधार पर उसको Job मिल जाएगा। हमने करीब-करीब 9,000 पद ऐसे खोज कर निकाले हैं और जिसमें हजारों-लाखों लोगों की भर्ती होनी है। अब इन 9,000 पदों पर कोई इंटरव्‍यू प्रक्रिया नहीं होगी। मेरे नौजवानों को इंटरव्‍यू देने के लिए खर्चा नहीं करना पड़ेगा, जाना नहीं पड़ेगा, सिफारिश की जरूरत नहीं पड़ेगी। भ्रष्‍टाचार और दलालों के लिए रास्‍ते बंद हो जाएंगे और इस काम को लागू कर दिया गया है।

    भाइयो-बहनों, देश….एक समय था कि सरकार कोई योजना घोषित करे, सिर्फ इतना बता दे कि ये करेंगे। तो सामान्‍य मानव संतुष्‍ट हो जाता था। उसको लगता था चलिए अब होगा कुछ। एक समय आया जब योजना का drawing आए नहीं, तब तक लोग अपेक्षा करते थे भई बताओ, plan बताओ। फिर समय आया कि जरा बजट बताओ? लोग मांगते थे। आज 70 साल में देश का मन भी बदला है, वो योजनाओं की घोषणा से संतुष्‍ट नहीं होता है, plan दिखाने से संतुष्‍ट नहीं होता है, उसको budget provision कर दिया तो वो मानने को तैयार नहीं है। वो तब मानता है, जब धरती पर चीजें उतरती हैं, तब मानता है और धरती पर हम पुरानी रफ्तार से चीजों को नहीं उतार सकते। हमें अपनी काम की रफ्तार को तेज करना पड़ेगा, गति को और आगे बढ़ाना पड़ेगा, तब जा करके हम कहते हैं।

    हमारे देश में ग्रामीण सड़क…हर गांव के नागरिक की अपेक्षा रहती है कि उसको एक पक्‍की सड़क मिले। काम बहुत बड़ा है, अटल बिहारी वाजपेयी जी ने विशेष ध्‍यान दे करके इसको शुरु किया था। और बाद में भी सरकार ने इसको continue किया, आगे बढ़ाया। हमने उसमें गति देने का प्रयास किया है। पहले एक दिन में 70-75 किलोमीटर का ग्रामीण सड़क का काम हुआ करता था, आज उस रफ्तार को तेज करके हम प्रतिदिन 100 किलोमीटर की ओर ले गए हैं। ये गति आने वाले दिनों में सामान्‍य मानव की अपेक्षाओं को पूर्ण करेंगी।

    हमारे देश में ऊर्जा और उसमें भी Renewable Energy इस पर हमारा बल है। एक समय था, जो हमारे देश में इतने सालों में आजादी के बाद wind energy में काम हुआ, पवन ऊर्जा में काम हुआ, पिछले एक साल के भीतर-भीतर करीब-करीब 40 प्रतिशत उसमें हमने वृद्धि की है, ये है उसकी गति का मायना। Solar Energy…पूरा विश्‍व Solar Energy की ओर बल दे रहा है। हमने 116% बढ़ोत्‍तरी की है। ये बहुत बड़ा, ये incremental change नहीं है, ये बहुत बड़ा high-jump है। हम चीजों को उसके quantum की दृष्टि से हम आगे बढ़ाना चाहते हैं। हमारे देश में हमारी सरकार बनने के पहले अगर ऊर्जा का उत्‍पादन है, तो ऊर्जा पहुंचाने के लिए transmission line भी चाहिए और अच्‍छी transmission line की व्‍यवस्‍था चाहिए। हमारी सरकार बनने के पहले के दो साल, हमारे पूर्व के दो साल, एक दिन में, एक साल में करीब 30-35 हजार कि.मी. Transmission line डाली जाती थी। आज मुझे संतोष के साथ कहना है कि आज ये काम करीब-करीब 50 हजार किलोमीटर. हमने पहुंचाया है। ये गति बढ़ाने का काम किया है। अगर पिछले 10 साल का Rail line commissioning की बात है और commissioning का मतलब होता है, ट्रेन चलने योग्‍य हो जाना, सारे trial पूरे हो जाना। पहले, 10 साल 1500 किलोमीटर का हिसाब था और आज मुझे दो साल में 3500 किलोमीटर का काम करने में हम सफल हुए है। ये गति को हम आगे बढ़ा रहे हैं।

    भाइयों-बहनों आज आधार कार्ड को सरकारी योजनाओं के साथ जोड़ करके direct benefit के लिए जो भी leakages उसको रोक करके, काम करने पर हम बल दे रहे हैं। पहले की सरकार में, सरकारी योजनाओं को आधार से जोड़ने में करीब 4 करोड़ लोगों को जोड़ा जा पाया था। आज मुझे संतोष के साथ कहना है कि 4 करोड़ पर काम वहां हुआ था, आज हमने 70 करोड़ नागरिकों को आधार और सरकारी योजनाओं के साथ जोड़ने का काम पूरा कर दिया है और जो बाकी हैं उनको भी पूरा करने का काम चल रहा है।

    हमारे यहां मध्‍यम वर्ग का मानव हो, सामान्‍य मानवी हो उसको आज जैसे कार घर में हो उसको प्रतिष्ठा का विषय माना जाता है। एक वक्‍त था कि घर में गैस का चूल्हा हो तो उसको एक standard माना जाता था समाज में एक status के रुप में माना जाता था। देश आजाद होने के 60 साल के दरम्यान, ये रसोई गैस करीब 14 करोड़ लोगों को 60 साल में मिला था। भाइयों-बहनों, मुझे बड़ा संतोष है कि एक तरफ 60 साल में 14 करोड़ रसोई गैस के connections और हमने 60 सप्ताह में चार करोड़ नए लोगों को रसोई गैस के connections दिए। कहां 60 साल के 14 करोड़ और कहां 60 सप्ताह के 4 करोड़। ये गति है जो सामान्य मानव की जिन्दगी में Quality of Life में आज बदलाव लाने के लिए संभव हुआ है।

    हमने कानूनों के जंजालों की सफाई का भी काम आरंभ किया है। कानूनों का बोझ सरकार को भी, न्यायपालिका के लिए भी और नागरिक के लिए भी उलझनें पैदा करता रहता था। हमनें खोजबीन करके करीब 1700 ऐसे कानून निकाले हैं। पौने 1200 करीब already Parliament के द्वारा उसको निरस्त कर दिये हैं और बाकियों को भी निरस्त करने कि दिशा में जाकर के उस सफाई अभियान को भी हम चलाना चाहते हैं।

    भाइयों-बहनों, कभी-कभी देश में एक स्वभाव बन गया था कि ये काम तो हो सकता है, ये काम तो नहीं हो सकता है। भई अभी तो नहीं होगा, कभी होगा तो पता नहीं। निराशा ये हमारा मिजाज बनता जा रहा था। इसको Breakthrough करना, शासन में ऊर्जा भरना और जब कोई सिद्धि दिखती है, तो उत्साह भी बढ़ता है, ऊर्जा भी बढ़ती है, संकल्प भी बड़ा Sharp हो जाता है और परिणाम भी निकट नजर आने लग जाते हैं।

    भाइयों-बहनों, जब हमनें प्रधानमंत्री जनधन योजना, एक प्रकार से असम्भव काम था, असंभव काम था। इतने सालों से बैंक थी, सरकारें थीं, राष्ट्रीयकरण हो चुका था लेकिन सामान्य व्यक्ति देश की अर्थव्यवस्था मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बन पाता था। भाइयों-बहनों, 21 करोड़ परिवारों को, 21 करोड़ नागरिकों को जनधन योजना में जोड़करके असंभव, संभव हुआ और ये असंभव को संभव ये सरकार के खजाने में, ये सरकार की Credit का विषय नहीं है, ये सवा सौ करोड़ देशवासियों ने किया है और इसलिए मैं इस काम को करने के लिए मेरे सवा सौ करोड़ देशवासियों का नमन करता हूं।

    आज हिन्दुस्तान के गांवों में नारी गौरव का अभियान…उसका एक महत्वपूर्ण पहलू है। खुले में शौच बंद होना चाहिए, गांव में Toilet बनना चाहिए। पहली बार जब मुझे लालकिले की प्राचीर से आप सबके दर्शन करने का सौभाग्य मिला था। उस दिन मैंने अपनी भावना को व्यक्त किया था कि मेरा देश ऐसे कैसे हो सकता है। आज मैं कह सकता हूं कि इतने कम समय में हिन्दुस्तान के गांवों में दो करोड़ से ज्यादा शौचालय बन चुके हैं। 70 हजार से अधिक गांव आज खुले में शौच जाने की परम्परा से मुक्त हो चुके हैं। सामान्य जीवन में बदलाव लाने की दिशा में हम काम कर रहे हैं।

    इसी लालकिले की प्राचीर से मैंने पिछले साल कहा था कि एक हजार दिन में हम उन 18 हजार गांवों में जहां बिजली नहीं पहुंची है…आजादी के 70 साल होने जा रहे हैं, उन्होंने अब तक बिजली नहीं देखी है। 18वीं शताब्दी में जीने के लिए वो मजबूर हुआ करते थे। हमने बीड़ा उठाया कि अब असंभव को संभव करने का संकल्प किया। और आज मुझे खुशी के साथ कहना है, हजार दिन में अभी तो आधे भी नहीं हुए हैं, आधे से भी काफी दूर है, उसके बाद भी 18 हजार गांवों में से दस हजार गांवों में आज बिजली पहुंच गई है। और मुझे बताया गया कि उनमें से कई गांव हैं, जो आज पहली बार टीवी पर ये भारत की आजादी के जश्न को वहां बैठे-बैठे देख रहे हैं। मैं उन गांवों को भी आज यहां से विशेष शुभकामनाएं देता हूं।

    भाइयों-बहनों, आपको हैरानी होगी। दिल्ली से सिर्फ तीन घंटे की दूरी पर हम यात्रा करें, तो तीन घंटे लगेंगे, दिल्ली से तीन घंटे की दूरी पर हाथरस इलाके में एक गांव नगला-फटेला। ये नगला-फटेला, तीन घंटे लगते हैं पहुंचने में, तीन घंटे। लेकिन बिजली को पहुंचने में 70 साल लग गए मेरे भाइयों-बहनों 70 साल लग गए और इसलिए हम उन कामों पर, हम किस कार्य-संस्‍कृति से काम कर रहे हैं, इसका मैं परिचय करा रहा हूं।

    भाइयों-बहनों, LED बल्‍ब विज्ञान में अनुसंधान करने वालों ने हर नागरिक की भलाई के लिए उसको विकसित किया। लेकिन भारत में साढ़े तीन सौ रुपये में LED बल्‍ब बिकता था। कौन खरीदेगा? और सरकार को भी लगता था कि भई ठीक है, यह तो हो गया तो हो गया, कोई काम करता होगा, बात ऐसे नहीं चलती। अगर LED बल्‍ब से हिंदुस्‍तान के सामान्‍य जीवन में बदलाव लाया जा सकता है, पर्यावरण में बदलाव लाया जा सकता है, भारत की अर्थव्‍यवस्‍था में सुधार लाया जा सकता है, तो फिर सरकार को उसमें कोशिश करनी चाहिए। सरकार का स्‍वभाव रहता है, जहां टांग न अड़ानी चाहिए, वहां अड़ा देता है और जहां अड़ानी चाहिए वहाँ नहीं अड़ाता, भाग जाता है। यह स्थिति, यह कार्य-संस्‍कृति बदलने का हमने प्रयास किया है और इसलिए साढ़े तीन सौ रुपये में बिकने वाला बल्‍ब, सरकारी intervention का परिणाम यह हुआ कि आज हम 50 रुपये में वो बल्‍ब बांट रहे हैं। कहां साढ़े तीन सौ और कहां पचास! मैं यह पूछना नहीं चाहता हूं कि यह रूपये कहां जाते थे, लेकिन 13 करोड़ बल्‍ब अब तक बांटे गए हैं। हमारे देश की राजनीति लोकरंजक बन गई है, लोकरंजक अर्थनीति ही बन चुकी है। अगर सरकारी खजाने से उसको हर बल्‍ब के पीछे तीन सौ रुपया दिया गया होता, तो वाह-वाही होती कि यह अच्‍छा प्रधानमंत्री है, हमारी जेब में तीन सौ रुपया डाल दिया। लेकिन हमने 50 रुपये में बल्‍ब दे करके उसके हजारों रुपये बचाने में मदद की है। 13 करोड़ बल्‍ब बंट चुके हैं। 77 करोड़ बल्‍ब बांटने का संकल्‍प है। और मैं आज देशवासियों को कहना चाहता हूं कि आप भी अपने घर में LED बल्‍ब लगाइये, सालभर का ढ़ाई सौ, तीन सौ, पांच सौ रुपया बचाइये और देश की ऊर्जा बचाइये, देश के पर्यावरण को बचाइये। जिस समय 77 करोड़ LED बल्‍ब लग जाएंगे, हिंदुस्‍तान की 20 हजार मेगावाट बिजली बच जाएगी और जब 20 हजार मेगावाट बिजली बचेगी, मतलब करीब-करीब सवा लाख करोड़ रुपया बच जाएगा। भाइयों-बहनों आप अपने घर में एक LED बल्‍ब लगा करके, देश के सवा लाख करोड़ रूपये बचा सकते हैं। 20 हजार मेगावट बिजली बचा करके, हम Global warming के खिलाफ लड़ाई लड़ सकते हैं। हम देश के पर्यावरण की रक्षा के प्रयासों में बहुत बड़ा योगदान दे सकते हैं और यह सामान्‍य मानव दे सकता है और इसलिए भाइयों-बहनों हमने उस दिशा में काम किया है।

    असंभव से संभव काम आपको मालूम है! हम ऊर्जा पर, Petroleum product पर, विश्‍व के अन्‍य देशों पर निर्भर हैं। और इसके कारण लम्‍बे काल के agreement हुए हैं, ताकि हमें लम्‍बे अरसे तक निश्चित दाम से चीजें मिलती रहीं। Qatar के साथ, गैस का हमारा agreement 2024 तक का है। लेकिन दाम इतने है कि हमें भारत की अर्थव्‍यवस्‍था के लिए महंगा पड़ रहा है। हमारी विदेश नीति के संबंधों का परिणाम यह आया कि Qatar के साथ फिर बात की, जो agreement हो चुका था, जो Qatar का हक था 2024 तक हम उस भाव से गैस लेने के लिए बंधे हुए थे, हमने उनसे वार्ता की और मैं आज संतोष के साथ कहता हूं, असंभव भी संभव हो गया और उन्‍होंने अपने दाम को re-negotiate किया और हिंदुस्‍तान के खजाने से 20 हजार करोड़ रुपया बच जाएगा। 20 हजार करोड़ रुपया वो लेने के हकदार थे, लेकिन हमारे संबंधों का रूप बड़ा है, हमारी नीतियों का स्‍वरूप बड़ा है कि जिसके कारण हम उसको कर पाए हैं।

    चाबहार का port जो मध्‍य एशिया के साथ जोड़ने की एक अहम कड़ी है सब सरकारों में लगातार बातें होती रहीं, पुन: प्रयास होते रहे। आज मुझे असंभव कार्य को संभव करते देख संतोष हो रहा, जब ईरान, अफ़गनिस्‍तान और हिंदुस्‍तान मिल करके चाबहार port के निर्माण के लिए कदम उठाने की दिशा में नवकर योजना के साथ आगे बढ़ते हैं तब असंभव काम संभव हो जाता है।

    मेरे भाइयों-बहनों, एक बात जिसको इस समय मैं आपसे कहना चाहूंगा, जो सामान्य मानव से जुड़ी हुई है, वो है महंगाई। ये बात सही है कि पहले की सरकार में Inflation rate 10 प्रतिशत को भी पार कर गया था। हमारे लगातार कदमों के कारण Inflation rate हमने 6 percent से ऊपर जाने नहीं दिया है। इतना ही नहीं अभी तो हमने रिजर्व बैंक के साथ समझौता किया है कि 4% two -plus(+2)- minus(-2) के साथ, Inflation को control करने की दिशा में रिजर्व बैंक कदम उठाए। Inflation और Growth के balance की जो चर्चाएं होती थी, उस से ऊपर उठकर के आगे आने की दिशा में काम करे लेकिन इसके बावजूद भी, 2 साल देश में अकाल रहा, सब्जियों के दाम पर अकाल का प्रभाव तुरंत होता है, मार्केट की कमी का प्रभाव होता है। उसके कारण कुछ दिक्कतें जरूर आईं। 2 साल के अकाल के कारण दाल के उत्पादन की गिरावट भी चिंता का विषय़ बना। लेकिन भाइयों-बहनों, इसके बावजूद भी अगर जिस प्रकार से पहले महंगाई बढ़ती थी अगर उसी रफ्तार से बढ़ी होती, तो पता नहीं मेरे देश के गरीब का क्या होता, इसको रोकने में हमने भरपूर कोशिश की है लेकिन फिर भी, ये सरकार अपेक्षाओं से घिरी सरकार है। आप की मेरे देशवासियों, अपेक्षाएं स्वाभाविक हैं लेकिन मैं उस दिशा में प्रयत्न करने में कोई कोताही बरतने नहीं दूंगा। जितना प्रयास मुझसे होगा, मैं करता रहूंगा और गरीब की थाली को महंगी नहीं होने दूंगा।

    मेरे प्यारे भाइयों-बहनों, ये देश गुरू गोबिंद सिंह जी की 350वीं जयंती मनाने की तैयारी कर रहा है। देश के लिए बलिदान की गाथा, सिक्ख गुरुओं की परंपरा, ये देश कैसे भूल सकता है और जब गुरू गोबिंद सिंह जी की 350वीं जयंती हम मना रहे हैं तब, गुरू गोबिंद सिंह जी ने एक बात बड़े अच्छे ढंग से कही थी, गुरू गोबिंद सिंह जी कहते थे जिस हाथ ने कभी सेवा न की हो, जिस हाथ में कभी कोई काम न हुआ हो, जो हाथ मजदूरी से मजबूत न हुए हो, जिन हाथों को काम करते-करते, हाथ में गाठें न बन गई हों, उस हाथ को मैं पवित्र हाथ कैसे मान सकता हूं, ये गुरू गोबिंद सिंह जी कहते थे। आज जब गुरु गोबिंद सिंह जी की 350वीं जयंती हम मना रहे हैं तब, मैं मेरे किसानों को याद करता हूं, उनसे बढ़कर पवित्र हाथ किसका हो सकता है? उससे बढ़कर पवित्र हृदय किसका हो सकता है? उसके बिना पवित्र मकसद किसका हो सकता है? मैं मेरे किसान भाइयों को 2 साल के अकाल के बावजूद भी, देश के अन्न के भंडार भरने के लिए उन्होंने जो निरंतर प्रयास किया, उसके लिए मैं उनका अभिनंदन करता हूं।

    सूखे की स्थिति बदली, इस बार वर्षा अच्छी हो रही है, कहीं-कहीं पर अधिक वर्षा के कारण तकलीफ भी हुई है। जिन राज्यों को, जिन नागरिकों को तकलीफ हुई है, भारत सरकार संकट के समय पूरी तरह उनके साथ है। लेकिन मेरे किसान भाइयों को आज मैं विशेष रूप से अभिनंदन करना चाहता हूं, जब हमारे देश में दलहन की कमी महसूस कर रहे हैं, हमारा किसान दूसरे crop पर चला गया था, लेकिन जहां भारत के सामान्य मानव की दाल की मांग बढ़ी, आज मुझे संतोष के साथ कहना है कि इस बार बुआई में मेरे किसानों ने दाल की बुआई डेढ़ गुना कर दी है, दाल के संकट को मिटाने के लिए, उससे रास्ता खोजने में मेरा किसान आगे आया है। और मैं किसान का अभिनंदन करता हूं हमने दाल के लिए MSP तय किया है। हमने दाल के लिए बोनस निकाला है। हमने दाल के द्वारा उसको purchase करने की व्‍यवस्‍था का सुप्रबंधन किया है। और इसलिए अब किसान को दाल के लिए भी हम प्रोत्‍साहित कर रहे हैं और उसका लाभ भी बहुत बड़ा होगा।

    भाइयो-बहनों, मैं जब कार्य-संस्‍कृति की बात कर रहा था, तो ये बात साफ है कि हम चीजों को टुकड़ों में नहीं देखते हैं। हम चीजों को एक समग्रता में देखते हैं, integrated देखते हैं, और integrated चीजों के तहत, सिर्फ agriculture ले लीजिए, हमने किस प्रकार से ऐसी कार्य-संस्‍कृति को विकसित किया है, जिसकी एक पूरी chain कितना बड़ा परिणाम दे सकती है।

    हमने सबसे पहले ध्‍यान केन्द्रित किया इस धरती माता की तबीयत के लिए, जमीन की सेहत के लिए, Soil Health Card, macro-nutrition, micro-nutrition की चिन्‍ता और किसान को ये समझाया कि तुम्‍हारी जमीन में ये कमी है, ये अच्‍छाइयां हैं, तुम्‍हारी जमीन इस फसल के लिए योग्‍य है, इस फसल के लिए योग्‍य नहीं है। और किसानों ने धीरे-धीरे Soil Health Card के जरिए अपना plan करना शुरू किया और जिन-जिन लोगों ने plan किया है वो मुझे बताते हैं कि साहब हमारा खर्चा करीब-करीब 25% कम हो रहा है। और हमारे उत्‍पादन में 30% वृद्धि नजर आ रही है। अभी ये संख्‍या कम है लेकिन आने वाले दिनों में जैसे-जैसे बात पहुंचेगी, ये बात आगे बढ़ेगी। किसान को जमीन है, अगर उसको पानी मिल जाए, तो मेरे देश के किसान की ताकत है, वो मिट्टी में से सोना पैदा कर सकता है। ये ताकत मेरे देश के किसान में है और इसलिए हमने जल प्रबंधन पर बल दिया है, जल सींचन पर बल दिया है, जल संरक्षण पर बल दिया है। एक-एक बूंद का उपयोग किसान के काम कैसे आए, पानी काम महात्‍मय कैसे बढ़े, per drop-more crop, Micro-irrigation इसको हम बल दे रहे हैं। 90 से ज्‍यादा सिंचाई की योजनाएं आधी-अधूरी ठप्‍प पड़ी थीं, हमने बीड़ा उठाया है सबसे पहले उन योजनाओं को पूरा करेंगे। और लाखों धरती को सींचन का लाभ मिले, उस दिशा में काम करेंगे। हमने किसान की input-cost कम करने के लिए, क्योंकि किसान को आजकल बिजली की भी जरूरत पड़ती है, पानी चाहिए तो बिजली चाहिए, बिजली महंगी पड़ती है, हमने solar pump की ओर बड़ा काम उठाया है, बड़ी मात्रा में उठाया है, उसके कारण किसान का input-cost कम होने वाला है, recurring expense कम होने वाला है, और solar pump घर में होने के कारण बिजली भी अपनी, सूरज भी अपना, खेत भी अपना, खलिहान भी अपना। मेरा किसान खुदहाल-खुशहाल भी होगा। अब तक 77 हजार solar pump बांटने में हमने सफलता पाई है।

    भाइयो-बहनों, मैं मेरे देश के वैज्ञानिकों को भी बधाई देना चाहता हूं। जमीन, पानी, solar pump, साथ के साथ अच्‍छे बीज की भी जरूरत होती है, अच्‍छे seeds की जरूरत होती है। भारत की वायु को, प्रकृति के अनुकूल हमारे देश के वैज्ञानिकों ने 131 से ज्‍यादा नए कृषि के योग्‍य बीज तैयार किए हैं, जो हमारे प्रति हेक्‍टेयर उत्‍पादन को बढ़ाने की क्षमता रखते हैं। उसके अंदर जो values हैं, उस values में भी बढ़ोतरी हो रही है। मैं इन वैज्ञानिकों को भी बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

    किसान को यूरिया चाहिए, खाद चाहिए। एक जमाना था खाद को पाने के लिए black-marketing होता था, एक जमाना था खाद पाने के लिए पुलिस लाठीचार्ज करती थी, एक जमाना था कि इंसान खाद के अभाव में अपनी आंखों के सामने बर्बाद होता हुआ अपनी फसल देख रहा था। भाइयो-बहनों, खाद की कमी, ये बीते हुए दिनों का विषय बन गए, इतिहास के गर्त में चला गया। आज हमने खाद की कमी, सबसे ज्‍यादा खाद का उत्‍पादन करने में हम सफल हुए हैं।

    भाइयो-बहनों, इस खाद के उत्‍पादन के कारण किसानों को आवश्‍यकता के अनुसार समय पर खाद मिलने की संभावना।

    उसी प्रकार से हमने फसल बीमा योजना बनाई है, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना। किसान को जमीन से ले करके उत्‍पादित चीजों तक उसकी रक्षा करना। पहली बार कम से कम प्रीमियम से अधिक से अधिक, वो भी गारंटी के साथ फसल बीमा योजना देने का काम, भाइयो-बहनों हमने किया है। हमने फसल के उत्‍पादन को 15 लाख टन अन्‍न के संरक्षण के लिए नए गोदामों का निर्माण किया है।

    हमारे देश में किसान का भला तब होगा, जब हम Value additionकी तरफ जाएंगे और Value addition की ओर जाने के लिए,हमने पहली बार food processing को विशेष रूप से बल दिया है। 100% Foreign Direct Investment को हमने प्रोत्‍साहित किया है जिसके कारण कृषि आधारित उद्योगों को बल मिलेगा और कृषि आधारित उद्योगों को जब बल मिलेगा, तो मेरे भाइयो-बहनों मुझे विश्‍वास है कि हमारे किसान को और जो मेरा सपना है, कि 2022 में किसान की income को double करना है,ये चीजें हैं जिसके द्वारा ये संभव होने वाला है और उसके लिए हमने एक के बाद एक कदम उठाए हैं।

    भाइयो-बहनों, हमारे देश में एक परंपरा बन गई। सरकारों ने अपनी पहचान बनाने के लिए तो बहुत कुछ किया है और हमारे देश का जिस प्रकार का स्‍वभाव है, एकाध लोकरंजक काम कर दो, एकाध लोक लुभावना काम कर दो, सरकारी खजाने को खाली कर दो, सरकार की एक पहचान बनाने की परंपरा रही है। भाइयो-बहनों, मैंने अपने आप को इस मोह से दूर रखने का भरपूर प्रयास किया है और इसलिए एक total transformation, transparency के साथ transformation. Reform, Perform, Transform उस मंत्र को लेकर के हमने एक के बाद एक चीजें और हर range में, हर range में करने का हमने प्रयास किया है।

    भाइयो-बहनों हमें सरकार की पहचान बनाने से ज्‍यादा मेरे हिन्‍दुस्‍तान की पहचान कैसी बने, उस पर बल है। दल की पहचान बने या न बने, देश की पहचान बननी चाहिए। देश की पहचान बनेगी तो आने वाली सदियों तक,हमारी आने वाली पीढ़ियों तक उसका लाभ होने वाला है और इसलिए हमने सरकार की पहचान को प्राथमिकता नहीं दी है, देश की पहचान को प्राथमिकता दी है।

    आज हम रेलवे में, आप देखते होंगे कि हमारे काम की range क्‍या है। एक तरफ रेल में हम Bio-toilet की भी चर्चा करते हैं तो दूसरी तरफ Bullet train को भी लाने का सपना देखते है। हम एक तरफ किसान के लिए Soil Health Card की चर्चा करते हैं, तो दूसरी तरफ हम satellite और space technology की दिशा में भी आगे बढ़ना चाहते हैं। हम Stand-up India की बात करते हैं तो हम Start-up India के लिए और कदम उठाते हैं। हम symbolism की जगह पर substance पर बल दे रहे हैं। हम isolated development की जगह पर integrated development की ओर बल दे रहे हैं। हम entitlement से छोड़कर के empowerment पर ध्‍यान दे रहे हैं और जब भी देश empower होता है तो मेरे भाइयो-बहनों, हमारे देश में नई योजनाएं घोषित करने से सरकारें पहचान बन जाती है। लेकिन पुरानी योजनाएं, वो ऐसे लुढ़क जाती है। सरकारें continuity होती हैं। अगर पहले की सरकारों ने भी कोई काम किया है। तो देश का भला इसमें है कि उसकी कुछ कमियां जरूर दूर करें, लेकिन उस काम को आगे बढ़ाना चाहिए। ये आपकी सरकार का, हम नहीं करेंगे, हम तो हमारी सरकार का करेंगे, ये अहंकार लोकतंत्र में नहीं चलता है और इसलिए हमने सर झुकाकर के पुरानी सरकारों के काम को भी उतनी ही तव्‍वजो दी है और ये हमारी कार्य-संस्‍कृति का परिचायक है क्‍योंकि देश, देश अखंड, अविरत व्‍यवस्‍था है और उस व्‍यवस्‍था को हम चलाना चाहते हैं और उसी के तहत मैं एक प्रगति कार्यक्रम चलाता हूं और खुद review करता हूं, खुद बैठता हूं। आपको हैरानी होगी कि साढ़े सात लाख करोड़ रुपए के करीब-करीब 118 project, वो किसी न किसी सरकार ने कभी प्रारंभ किए थे, सोचा था, योजना बनाई थी, ऐसे लटके पड़े थे। उनको मैंने बाहर निकाला, मैंने कहा पूरा करें। इतने रुपए बर्बाद हुए, और जोड़कर के काम को पूरा करो। आज वो काम पूरे हो रहे हैं।

    हमने एक project monitoring group बनाया, जिसको मैंने अलग से कहा कि जरा देखिए ऐसे कौन से काम थे जो किसी समय शुरू हुए। कोई 20 साल पहले, कोई 25 साल पहले, कोई 30 साल पहले, कोई 15 साल पहले लटके पड़े थे। आज जो लोग उस इलाके में रहते है उनको पता है। करीब-करीब 10 लाख करोड़ रुपयों के 270 प्रोजेक्‍ट ऐसे हमने identify किए जो किसी सरकार ने शिलान्‍यास किया होगा, किसी ने 1000-2000 हजार करोड़ रुपया लगा दिया होगा। लेकिन बाद में वो मिट्टी में मिलता चला जा रहा था उसको हमने फिर से काम करने के लिए, उस अटकी हुई योजनाओं को…भाइयों-बहनों, योजनाओं का अटकाना, योजनाओं का delayed होना, रुपयों की बर्बादी होना एक प्रकार से criminal negligence है और उससे हमने पार करने का प्रयास किया है।

    भाइयों-बहनों Railway project की मंजूरियां दो-दो साल लगते थे। train जा रही है ऊपर bridge बनाना है, दोनों तरफ रास्‍ते बन चुके हैं। दो-दो साल लग जाते थे। भाइयों-बहनों आज वो काम तीन महीना-चार महीना, ज्‍यादा से ज्‍यादा छ: महीने में प्रोजेक्‍ट को मंजूरी देने की गति हम ले आये हैं।

    भाइयों-बहनों हम कितना ही काम करें, कितनी ही योजनाएं बनाएं। लेकिन सरकार सुशासन के लिए last man delivery, आखिरी इंसान को उसका लाभ कैसे मिलता है, उस पर ध्‍यान देना होता है। भाइयों-बहनों जब नीति साफ हो, नीयत स्‍पष्‍ट रुप से हो, साफ नीति, स्‍पष्‍ट नीति, साफ नीयत, स्‍पष्‍ट नियत होती है, तब निर्णय करने का जज्‍बा भी कुछ और होता है और इसलिए निर्णय बेझिझक हो सकते हैं।

    हमारी सरकार स्‍पष्‍ट नीतियों के कारण, साफ नियत के कारण, बेझिझक निर्णय करके, बेझिझक निर्णय करके चीजों को आगे बढ़ाने में और last man delivery पर बल दे रही है।

    हमने देखा है, अगर उत्‍तर प्रदेश के अखबार देखोगे, हर वर्ष गन्‍ना किसानों का बकाया, ये हर बार चर्चा में रहता था। sugar mill ये नहीं करती, राज्‍य सरकार ये नहीं करती, गन्‍ना किसान को ये परेशानी है। हजारों करोड़ रुपयों का बकाया था, हजारों करोड़ रुपए का। हमने इसके पीछे योजनाएं बनाई, पीछे लग गए, last man delivery किसान के घर तक पैसा पहुंचना चाहिए। पुराना जो बकाया था हजारों करोड़ बकाया था। भाइयों-बहनों, आज मैं बड़े संतोष के साथ कहता हूं 99.5% पुराना बकाया चुकता कर दिया गया है। ये बहुत सालों के बाद पहली बार हुआ है। इस बार का जो गन्‍ने का व्‍यापार हुआ, गन्‍ना खरीदा गया, आज मैं कह सकता हूं संतोष के साथ, अब तक करीब-करीब 95% किसानों को गन्‍ने का दाम चुका दिया गया है और 5% भी बचा हुआ होगा,तो आने वाले दिनों में जरूर चूक जाएगा ऐसा मुझे विश्‍वास है।

    भाइयों-बहनों, LPG के Gas connection गरीब परिवारों को देने का हमने बीड़ा उठाया है। उज्‍ज्‍वला योजना के तहत, मेरी गरीब मां को चूल्‍हे के धूएं से मुक्ति दिलाने का अभियान बहुत तेजी से चलाया है। 5 करोड़ गरीब परिवारों को जब गैस का चूल्‍हा पहुंचेगा और तीन साल में करने का बीड़ा उठाया, काम चल रहा है। करीब-करीब 50 लाख तक हम पहुंच चुके हैं और वो भी सिर्फ पिछले 100 दिन के अंदरये काम कर दिया है। आप कल्‍पना कर सकते हैं, हो सकता है। तीन साल के पहले भी इस काम को हम पूरा कर लें last man delivery उस पर हम बल देना चाहते हैं।

    हमारी post office, information technology, whatsapp, messages, online, e-mail इनके कारण धीरे-धीरे post irrelevant हो रहा था, डाकघर हमारा। जो हमारी एक पहचान है। हमने इन डाकघरों को पुनर्जीवित, पुर्नताकतवर बनाने का, डाकघर गरीब और छोटे व्‍यक्ति से जुड़ा रहता है। सरकार का प्रतिनिधि अगर कोई हिन्‍दुस्‍तान के सामान्‍य मानव से प्‍यार से जुड़ा हुआ होता है तो वो डाकिया होता है। डाकिये को हर कोई प्‍यार करता है, डाकिया हर किसी को प्‍यार करता है।

    लेकिन उस डाकिया की तरफ हमारा कभी ध्‍यान नहीं जाता है। हमने हमारे post offices को payment bank में convert करने की दिशा में कदम उठाया है। ये payment bank बनने से एक साथ देश के गांवों तक बैंकों का जाल बिछेगा,जन-धन account का लाभ मिलेगा और सामान्‍य मानव MNREGA का पैसा भी अब आधार के द्वारा उसके खाते में जा रहा है, corruption कम हो रहा है।

    भाइयों-बहनों, हमारे देश में जो भी PSUबनते हैं वो PSU या तो गड्ढे में जाने के लिए बनते हैं, या तो लुढ़क जाने के लिए बनते हैं, या ताले लगने के लिए बनते हैं या फिर बेचने के लिए बनते हैं। ये उसका इतिहास रहा है। हमने एक नई कार्य संस्कृति लाने का प्रयास किया है। और आज मैं पहली बार संतोष के साथ कहता हूं जो Air India पूरी तरह बदनाम हुआ करता था। पिछले साल हम Air India को, उसके Operation को Operational Profit में लाने सफल हुए हैं। BSNL, सारी दुनिया की Telecom कंपनियां कमा रही हैं,BSNL गड्ढे में जा रहा था। पहली बार BSNL को Operational Profit में लाने में हमें सफलता मिली है।Shipping Corporation of India ये कभी फायदे में आएगा कि नहीं मानते नहीं थे। आज Shipping Corporation of Indiaफायदे में आया है।

    एक जमाना था बिजली का कारखाना अगले हफ्ते चलेगा कि नहीं चलेगा। कोयला आएगा कि नहीं आएगा। कितने बिजली के कारखाने कोयले के अभाव में बंद पड़े यही खबरें हुआ करती थीं। आज कोयला बिजली के कारखाने के दरवाजे पर खड़ा हुआ है। महीनों तक जितनी चाहिए उसके दरवाजे पर आकर के खड़ा हुआ है। भाइयों-बहनों इस काम को हमने किया है। आपने देखा होगा।

    कभी-कभी हमारे देश में, बड़े-बड़े Corruption की चर्चाएं तो होती हैं। लेकिन Corruptions समाज में निचले स्तर तक गरीब आदमी को इस प्रकार से लूटता रहा है, इस प्रकार से पैसे बर्बाद होते रहे हैं,ये मैंने भलीभांति देखा है। हमने आधार कार्ड को आधार नम्बर को सरकारी योजनाओं से जोड़ा और सरकारी योजना से जुड़ने के कारण, भाइयों-बहनों एक समय था जब हम ये देखते थे कि विधवा Pension हो, scholarship हो, दिव्यांगों के लिए कोई व्यवस्था हो, minority के लिए कोई व्यवस्था हो। सरकारी खजाने से पैसे जाते थे। लाभार्थियों की सूची भी आती थी। लेकिन जब हमनें जरा गहराई से देखा तो हमारे ध्यान में आया कि जिनका जन्म भी नहीं हुआ है, इस दुनिया में जिसने जन्म नहीं लिया, ऐसे लोग भी सूची में हैं। और इस प्रकार की योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं। ये बिचौलिये अरबों-खरबों रुपया निकाल देते थे और कभी किसी का ध्यान नहीं जाता था। इस आधार व्यवस्था के तहत हमनें ऐसे सारे बिचौलियों को बाहर किया। पैसा direct किया और अनुभव आया कि करोड़ों लोग ऐसे मिले हैं कि जो हैं ही नहीं लेकिन रुपये जाते थे। अरबों-खरबों रुपये जाते थे। अब वो तो बंद हुआ पैसे बच गए लेकिन हमनें कहा जो जरूरतमंद बेचारे बाहर रह गए थे, उनको ढूंढ-ढूंढ करके लाओ और ये बचे हुए पैसे, उनके खजाने में जाने चाहिए, जो अपने हक के लिए लड़ना चाहते हैं। Last man delivery उस दिशा में हमने काम किया है और आज उसको हमने पहुंचाया है।

    Transparency का बल, कोयले का Corruption कौन नहीं जानता है। आज कोयले की नीलामी कोई आरोप नहीं, दाग नहीं और हिन्दुस्तान में राज्यों को आने वाले दिनों में जैसे-जैसे कोयला निकलता जाएगा लाखों रुपयों की कमाई होती जाएगी।

    Spectrum की नीलामी एक जमाना था, आक्षेपों के घेरे में फंसी पड़ी थी। हमनें onlineउसका auction किया और आज देश का खजाना भी भरा, स्वस्थ Competition भी हुई और उसके कारण देश का लाभ हुआ।

    भाइयों-बहनों,आजका विश्व एक Global Economy के युग से गुजर रहा है। आज हर देश Inter Connected है, Inter dependent है। आर्थिक विषयों से पूरा विश्व एक प्रकार से किसी न किसी रूप से जुड़ा हुआ है। हम हमारे देश में कितनी ही प्रगति करें। लेकिन इसके साथ-साथ हमें वैश्विक Economy को ध्यान में रखते हुए, Global arena को ध्यान में रखते हुए, हमारे देश को भी वैश्विक मानकों में खरा उतारना पड़ेगा, उसकी बराबरी से लाना पड़ेगा। तब जाकर के हम Relevant रहेंगे, तब जाकर के हम अपना योगदान दे पाएंगे और तब जाकर के वक्त आने पर हम विश्व की अर्थव्यवस्था का नेतृत्व भी कर पाएंगे। और इसलिए हमें अपने आपको हर पल सज्ज करना पड़ेगा। अगर अपने आप को सज्ज करना है तो वैश्विक मानकों के साथ हमें ताल मिलाना होगा। पिछले दिनों आपने देखा होगा world Bank हो, IMF हो, World Economic Forum हो, Credit-Rating Agencies हो, दुनिया में जितनी प्रकार की संस्‍थाएं हैं सबने भारत की प्रगति को सराहा है। भारत के एक के बाद एक निर्णयों के कारण कानूनी सुधार, व्‍यवस्‍था में सुधार, approach में बदलाव इन चीज को दुनिया बराबर देख रही है। Ease of doing business, हमने बहुत तेजी से हमारा ranking में सुधार किया है …निवेश के मामले में Foreign Direct Investment के मामले में हमारे देश में आज दुनिया के अंदर अगर सबसे पसंदीदा कोई देश है तो हिंदुस्‍तान बन गया है। विकास दर में देश की बड़ी-बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था को भी हमने Growth rate की दुनिया में, GDP में हमने पीछे छोड़ दिया है।

    भाइयों-बहनों, United Nation की एक संस्‍था ने अभी अनुमान लगाया है कि भारत आने वाले दो साल में क्या होगा? उन्‍होंने अनुमान लगाया है कि जो भारत, आज इस अर्थव्‍यवस्‍था के दायरे में दसवें नम्‍बर पर खड़ा है, उन्‍होंने UN के Institute ने कहा है कि दो साल के भीतर-भीतर यह दसवें नंबर से तीसरे नंबर पर आ जाएंगे। भाइयों-बहनों, वैश्‍विक मानकों में logistic support, infrastructure इन सारी बातों का भी आज लेखा-जोखा होता है। दुनिया के समृद्ध देशों के साथ तुलना होती है। भाइयों-बहनों,World Economic Forum में भारत के इस logistic support के संबंध में,infrastructure के संबंध में analysis करके कहा है पहले से भारत 19 rank ऊपर चला आया है और भारत बहुत तेजीसेऊपर आगे बढ़ रहा है।

    भाइयों-बहनों, हमारे देश में जिस प्रकार से हम एक वैश्विक संदर्भ में भी एक गतिशील और predictable अर्थव्‍यवस्‍था को ले करके आगे बढ़ रहे हैं।अभी-अभी जो GST का जो कानून पास हुआ, वो भी उसमें एक ताकत देने वाला काम हुआ है और वो सभी दल उसके लिए अभिनंदन के अधिकारी हैं।

    भाइयों-बहनों एक अभियान के संदर्भ में मैंने यही से चर्चा की थी। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ हम कोई काम टुकड़ों में नहीं करते हैं। हमारा एक integrated approach होता है और ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ में हमने जो initiative लिए हैं, उसमें अभी भी मुझे समाज के सहयोग की आवश्यकता है। एक-एक मां-बाप को सजग होने की आवश्‍यकता है। हम बेटियों का सम्‍मान बढ़ाएं, बेटियों की सुरक्षा करें, सरकार की योजनाओं का लाभ लें। हमने सुकन्‍या समृद्धि योजना से करोड़ों परिवारों को जोड़ा है। जो बेटी बड़ी होगी तो उसकी गांरटी ले लेता है, हमने महिलाओं को लाभ हो, उस प्रकार की बीमा योजनाओं को सबसे ज्‍यादा बल दिया है। उसके कारण इनको फायदा होने वाला है। हमने इंद्रधनुष टीकाकरण की योजना, क्‍यों‍कि माताओं, बहनों को एक आर्थिक सशक्‍तीकरण, और एक health की भी सशक्‍तीकरण अगर यह दो काम कर लिए, शिक्षित कर लिया, आप मान कर चलिए घर में एक महिला भी अगर शिक्षित है, शारीरिक रूप से सशक्‍त है, आर्थिक रूप से स्‍वतंत्र हैं, एक महिला गरीब से गरीब परिवार को भी गरीबी से बाहर निकालने की ताकत रखती है। और इसलिए गरीबी के खिलाफ लड़ाई लड़ने में महिलाओं का सशक्‍तीकरण, महिलाओं का स्‍वास्‍थ्‍य, महिलाओं की आर्थिक सम्‍पन्‍नता, शारीरिक सम्‍पन्‍नता उस पर बल दे करके हम काम कर रहे हैं और इसलिए मेरे भाइयों-बहनों मुद्रा योजना, मुझे खुशी हुई मुद्रा योजना का लाभ साढ़े तीन करोड़ से ज्‍यादा परिवारों ने लिया और उसमें अधिकतम नये लोग थे, जो बैंक केदरवाजें पर पहुंचे। उसमें भी 80% करीब-करीब SC, ST, OBC के थेऔर उसमें भी बैंक में, मुद्रा बैंक में लोन लेने वाली 80% महिलाएं हैं। ये महिलाएं कैसे आर्थिक विकास में योगदान करेंगी। इसकी ओर आप ध्‍यान देते हैं।

    भाइयों-बहनों पिछले हफ्ते हमने निर्णय किया, जो हमारी माताएं-बहनें आज विकास यात्रा में भागीदार बनी हैं, लेकिन प्रसूति के बाद उसको छुट्टी चाहिए। पहले वो छुट्टी कम मिलती थी। अब हमने ये छुट्टी 26 हफ्ते की कर दी है, ताकि मां अपने बेटे का लालन- पालन कर सके।

    हमारे यहां बुनकर, Textile में काम करने वाले लोग, इनको, जो धागा बनाते हैं, धागे का लच्छा बनाते हैं। पहले उनको 100 रुपए मिलता था, हमने उसको 190 रुपए कर दिया ताकि मेरी वो मां, मेरी वो बहन, जो तार बनाने का काम करती हैं, उसको एक ताकत मिलेगी। जो सिल्क के काम में लगी हुई माताएं-बहनें हैं, जो बुनकर लगे हैं, उनके दाम में हमने 50 रुपये प्रति मीटर बढ़ा दिया और ये फैसला किया कि ये 50 रुपया व्यापारी को नहीं जाएगा, दलाल को नहीं जाएगा, बिचौलियों को नहीं जाएगा, जिस बुनकर ने उस सिल्क पर काम किया है, प्रति मीटर 50 रुपए सीधा उसके खाते में आधार के द्वारा जमा हो जाएंगे, मेरा बुनकर सशक्त बनेगा। उस दिशा में हमने ये योजनाएं है और उस योजनाओं का प्रभाव छोड़ रहा है।

    मेरे प्यारे देशवासियों, जब रेल को देखते हैं, डाकघर को देखते हैं तो हमें भारत की एकता भी नजर आती है। हम जितना ज्यादा भारत को जोड़ने वाले प्रकल्पों को आगे बढ़ाएंगे, हमारी व्यवस्थाओं में बदलाव लाएंगे, देश की एकता को बल देगा।और इसलिए हमने किसानों के लिए मंडी e-NAM की योजना की है। आज किसान अपना माल online हिंदुस्तान की किसी भी मंडी में बेच सकता है। अब वो मजबूर नहीं होगा कि अपने खेत से 10 किलोमीटर की दूरी की मंडी पर मजबूरन माल देना पड़े, सस्ते में देना पड़े और उसकी मेहनत की कमाई न हो। अब देशभर में e-NAM के द्वारा एक ही प्रकार की मंडी का Network खड़ा हो रहा है।

    GST के द्वारा Taxation का एक प्रकार से एक समानता का, समान व्यवस्था का परिणाम आने वाला है। जो भारत जोड़ने का भी एक काम करेगा।

    हमने बिजली में, आपको हैरानी होगी, एक इलाके में बिजली रहती थी कोई लेना वाला नहीं था और दूसरा इलाका बिजली के लिए तड़पता था, अंधेरे में जीता था, कारखाने बंद हो जाते थे और उसको बदलाव लाने के लिए One Nation-One Grid-One Price उसमें हमने सफलता पाई है और बहुत तेजी से जो कभी गर्मी में 10 रुपया यूनिट का दाम देना पड़ता था। मैं पिछले दिनों तेलंगाना गया था, उस दिन 1 रुपया 10 पैसे दाम था जो कभी 10 रुपया हुआ करता था ये One Price का परिणाम देश को जोड़ने के लिए काम होता है।

    हमारे देश का मजदूर एक जगह पर काम करता है, एक-दो साल के बाद नौकरी बदलता है, EPF में उसका पैसा कटता है लेकिन पैसा Transfer नहीं होता था और आपको हैरानी होगी, जब मैं सरकार में आया मेरे देश के मजदूरों को 27 हजार करोड़ रुपया EPF में पड़े थे कोई गरी‍ब – मजदूर लेने वाला नहीं था क्योंकि उसको इसकी पद्धति नहीं थी।

    हमने इस समस्या का समाधान करने के लिए एक Universal Account Number दिया हमारे मजदूरों को और उसके कारण अब उसके पैसे वो जहां जाएगा EPF का fund transfer होगा। मजदूर जब retire होगा तो उसके रुपए उसके हाथ जाएंगे, किसी सरकारी खजाने में सड़ते नहीं पड़े रहेंगे, उस काम को हमने किया है।

    चाहे भारतमाला हो, चाहे सेतूभारतम हो, चाहे Bharat Net हो ऐसे अनेक प्रकल्पों को हमने बल दिया है। इन सारे प्रकल्पों का हमारा उल्लेख भारत को जोड़ने की दिशा में भी हो, भारत के आर्थिक विकास की दिशा में भी हो, उस दिशा में काम कर रहे हैं।

    भाइयों-बहनों ये वर्ष अनेक प्रकार के महत्व का है। देश दक्षिण के संत श्रीमान रामानुजाचार्य जी की1000वीं जयंती मना रहा है, देश महात्मा गांधी के गुरू श्रीमद राजचंद्र जी जिनकी 150वीं जयंती मना रहा है, देश गुरू गोबिंद सिंह जी के 350वीं साल की जयंती मना रहा है, देश पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की शताब्दी का वर्ष मना रहा है। आज जब मैं रामानुजाचार्य जी को याद करता हूं तो एक बात मैं कहना चाहता हूं, हजार साल पहले, आज जब सामाजिक तनाव देखते हैं तो रामानुजाचार्य जी संत पुरुष, उन्होंने देश को क्या संदेश दिया था। रामानुजाचार्य जी कहते थे भगवान के सभी भक्‍तों को,भेदभाव और ऊंच-नीच का ख्‍याल किए बिना सेवा करो। उम्र-जाति के कारणों की वजह से किसी का भी अनादर मत करो, हर किसी का सम्‍मान करो। जो बात गांधी ने कही, जो बात अम्‍बेडकर ने कही, जो बात रामानुजाचार्य ने कही, जो भगवान बुद्ध ने कही, जो हमारे शास्‍त्रों ने कही, जो हमारे सभी आचार्य-महंतों, गुरूओं ने शिक्षको, ने कही वो है हमारी सामाजिक एकता की। समाज अगर टूटता है, साम्राज्‍य बिखर, ऊंच-नीच में बंट जाता है, स्‍पृश-अस्‍पृश में बंट जाता है तो भाइयो-बहनों वो समाज कभी टिक नहीं सकता है। बुराइयां हैं, सदियों पुरानी बुराइयां हैं, लेकिन बुराइयां अगर पुरानी हैं तो उपचार भी जरा ज्‍यादा कठोरता से करने पड़ेंगे, ज्‍यादा संवेदनशीलता से करने पड़ेंगे। होती है, चलती है, से सामाजिक समस्‍याओं का समाधान नहीं हो पाएगा, और ये दायित्‍व सवा सौ करोड़ देशवासियों का है। सरकारों ने समाज ने मिल करके समाज में जो टकराव की स्थितियां पैदा होती हैं, उसमें से हमें निकलना होगा।

    और भइयों-बहनों हम सबको, हम सबको सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ना होगा। हमने सबने अपने व्‍यवहार से सामाजिक बुराइयों से ऊपर उठना होगा, हर नागरिक को उठना पड़ेगा, और तभी जा करके हमसशक्‍त हिन्‍दुस्‍तान बना सकते हैं। सशक्‍त हिन्‍दुस्‍तान, सशक्‍त समाज के बिना नहीं बन सकता है। सिर्फ आर्थिक प्रगति सशक्‍त हिन्‍दुस्‍तान की गारंटी नहीं है, सशक्‍त समाज, सशक्‍त हिन्‍दुस्‍तान की गारंटी है और सशक्‍त समाज बनता है सामाजिक न्‍याय के अधिष्‍ठान पर। सामाजिक न्‍याय के अधिष्‍ठान पर ही सशक्‍त समाज निर्माण होता है और इसलिए हमारा सबका दायित्‍व है कि सामाजिक न्‍याय पर हम बल दें। दलित हो, पीड़ित हो, शोषित हो, वंचित हो, मेरे आदिवासी भाई हों, ग्रामवासी हों या शहरवासी हो, पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़ हो, छोटा हो या बड़ा हो, सवा सौ करोड़ देशवासी हमारा परिवार है, हम सबने मिलकर के देश को आगे बढ़ाना है और उसी दिशा में हमें काम करना होगा।

    भाइयो-बहनों, आज पूरे विश्‍व का ध्‍यान भारत की उस बात पर जाता है कि भारत एक युवा देश है। Eight hundred million , 65 प्रतिशत जनसंख्‍या, जिस देश के पास 35 साल से कम उम्र की हो, वो देश अपनी युवा शक्ति के द्वारा क्‍या कुछ नहीं कर सकता है। और इसलिए मेरे भाइयों-बहनों, युवाओं को अवसर मिले, युवाओं को रोजगार मिेले, ये हमारे लिए समय की मांग है।

    आज जब हम पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय जी की जन्‍मशती की ओर आगे बढ़ रहे हैं तब, पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय जी कह रहे थे, जो महात्मा गांधी के भी विचार थे कि ‘आखिरी मानव का कल्‍याण’। पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय अंत्‍योदय के विचार को ले करके चले। आखिरी छोर के इन्‍सान के कल्‍याण, ये पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय जी की political philosophy का केंद्रवर्ती विचार था। आखिरी व्‍यक्ति के विचार में वो कहते थे, हर नौजवान को शिक्षा उपलब्‍ध होनी चाहिए, हर नौजवान के हाथ में हुनर होना चाहिए, हर नौजवान को अपने सपने साकार करने के लिए अवसर होना चाहिए। पंडित दीनदयाल जी के उन सपनों को पूरा करने के लिए देश के eight hundred million युवाओं के आशा-आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए हमने अनेक initiativesलिए हैं। जिस प्रकार से सड़क बढ़ रही है, देश में सबसे ज्‍यादा गाडि़यों का उत्‍पादन हो रहा है, देश में ज्‍यादा, सबसे ज्‍यादा Software निर्यात हो रहा है, देश में 50 से ज्‍यादा नई मोबाइल की फैक्ट्रियां लगी हैं, ये सारी बातें नौजवानों के लिए अवसर देती हैं। अगर दो करोड़ door toilet बनते हैं, तो उसने किसी न किसी को रोजगार दिया है। कहीं से सीमेंट लिया है, कहीं से लोहा लिया है, कहीं से लकड़ी का काम हुआ है। काम का व्‍याप जितना बढ़ेगा, रोजगार की संभावनाएं बढ़ेंगी, आज हमने उस दिशा में बल दिया है।

    उसी प्रकार से कोटि-कोटि युवकों के हाथ में हुनर हो। Skill development को mission के रूप में काम कर रहे हैं। हमने एक ऐसा कानून बदला। दिखने में बहुत छोटा है Model Shop and Establishment Act हमने राज्‍यों को advisory भेजी है कि क्‍या कारण है कि बड़े-बड़े mall तो 365 दिन चले, रात को 12 बजे तक चले, लेकिन गांव में एक छोटा-सा दुकान चलाने वाले को शाम के बाद दुकान बंद करनी पड़े? हर गरीब से गरीब व्‍यक्‍ति भी दुकान चलाता है, उसको 365 दिन मौका देना चाहिए। क्‍या कारण है कि हमारी बहनों को रात को काम करने का अवसर न दिया जाए? हमने कानूनन व्‍यवस्‍था की है कि रात को भी हमारी बहनें काम पर जा सकती हैं। उनकी सुरक्षा और व्‍यवस्‍था का प्रबंध होना चाहिए लेकिन काम का अवसर मिलना चाहिए। ये चीजें हैं जो रोजगार बढ़ाने वाली चीजें हैं और भाइयों-बहनों हमारी इस दिशा में कोशिश है कि हम करने के लिए तैयार हैं।

    भाइयो-बहनों, हम वो इंसान है, ये वो सरकार है, हम चीजों को टालने में विश्‍वास नहीं करते हैं। हम टालना नहीं, टकराना जानते हैं और इसलिए जब तक हम समस्‍याओं को सामने होकर के भिड़ते नहीं हैं, नहीं होता है। हमारे देश में, मेरे देश के लिए जीने-मरने वाले सेना के जवान, आज जब हम आजादी का जश्‍न मनाते हैं, कोई मेरा जवान सीमा पर गोलियों को झेलने के लिए तैयार खड़ा होगा, कोई बंकरों में बैठा होगा, कोई कभी रक्षाबंधन पर अपनी बहन को भी नहीं मिल पाता होगा। फौज में, सेना में कितने जवान काम कर रहे हैं। आजादी के बाद 33 हजार से ज्‍यादा, हमारे पुलिस के जवानों का बलिदान हुआ। हम क्‍यों भूल जाए उनको? हम उनको कैसे भूल सकते हैं। यही तो लोग हैं जिनके कारण हम सुख-चैन की जिन्‍दगी जी सकते हैं। इसलिए यह पर्व उनको भी नमन करने का है और कई वर्षों से ‘One Rank-One Pension’ का मसला लटका पड़ा था। हम टालने वालों में से नहीं, हम टकराने वालों में से हैं। हमने उसको पूरा किया, ‘One Rank-One Pension’. हर हिन्‍दुस्‍तान के फौजी के घर में खुशहाली पहुंचा दी, इस काम को किया।

    हमारे देश के लोगों की भावना थी कि नेताजी सुभाष बाबू की फाइलें, लोगों के सामने खुलें। आज मैं सर झुकाकर के कहता हूं कि जो काम असंभव था, टालने में, टाला जा रहा था, जो भी होगा हमने उन फाइलों को खोलने का निर्णय कर दिया। परिवार को बुलाकर के फाइलें रख दी और वो निरंतर प्रक्रिया आज भी जारी है। दुनिया के देशों को भी मैंने कहा है कि आपके यहां जो फाइलें है, आप उसको खोलिए, दीजिए। हिन्‍दुस्‍तान को सुभाष बाबू और भारत के इतिहास को जानने का हक है। उस दिशा में हमने काम किया।

    बांग्‍लादेश, जिस दिन हिन्‍दुस्‍तान का विभाजन हुआ तब से लेकर के सीमा विवाद चले हैं। बांग्‍लादेश बना, तब से हमारा सीमा विवाद चला है। कई दशक चले गए। भाइयों-बहनों सभी दलों ने मिलकर के भारत-बांग्‍लादेश की सीमा विवाद का निपटारा कर दिया। संविधान में भी हमने बल दे दिया।

    भाइयो-बहनों, मध्‍यम वर्ग का व्‍यक्‍ति अपना मकान बनाना चाहता है, फ्लैट लेना चाहता है लेकिन बिल्‍डरों की जमात, वो बड़ा अच्‍छा printed booklet दिखाते हैं। वो भी बेचारा उसमें जुड़ जाता है। उसे technical knowledge तो होती नहीं, पैसे देता रहता है। समय के अंदर मकान नहीं मिलता है। जो कहा गया वो मकान नहीं मिलता है। मध्‍यम वर्ग के व्यक्‍ति के जीवन में एक बार ही तो मकान बना होता है। पूरी पूंजी लगा देता है। भाइयो-बहनों, हमने Real estate bill लाकर के नकेल डाल दी है, ताकि मध्‍यम वर्ग का परिवार जो भी व्‍यक्‍ति अपना घर बनाना चाहता होगा, आज उसको कोई रुकावट नहीं आएगी। इन कामों को करने की दिशा में हमने काम किया है।

    भाइयों-बहनों, मैंने पहले ही कहा श्रीमद राजचंद्र जी, जिनकी 150वीं जयंती है। महात्‍मा गांधी उन्‍हें अपना गुरु मानते थे और श्रीमद राजचंद्र जी के साथ जब वो साउथ अफ्रीका में थे, तब भी श्रीमद राजचंद्र जी के साथ पत्र व्‍यवहार करते थे। एक पत्र में श्रीमद राजचंद्र जी ने गांधी जी के साथ हिंसा और अहिंसा की चर्चा की थी और राजचंद्र जी कह रहे थे कि जिस समय हिंसा का अस्‍तित्‍व रहा है, उसी समय से अहिंसा का भी सिद्धांत आया है। दोनों में अहम ये है कि हम किसे महत्‍व देते है या फिर इनमें किसका उपयोग मानव हित में हो रहा है।

    भाइयो-बहनों, हिंसा-अहिंसा की चर्चा हमारे देश में बहुत स्‍वाभाविक है।मानवता हमारी रगों में है। हम एक महान विराट संस्कृति के लोग हैं। ये देश विविधताओं से भरा हुआ है, रंग-रूप से भरा हुआ है। ये भारत मां का गुलदस्ता ऐसा है, जिसमें हर प्रकार की खुशबू है, हर प्रकार के रंग हैं, हर प्रकार के सपने हैं। भाइयों-बहनों, विविधता की एकता, ये हमारी सबसे बड़ी ताकत है, एकता का मंत्र हमारी जड़ों से जुड़ा हुआ है। भाइयों-बहनों, जिस देश की 100 से ज्यादा भाषाएं हों, सैंकड़ों बोलियां हों, अनगिनत पहनाव हों, अनगिनत जीवन पद्धतियों हों, उसके बाद भी ये देश सदियों से एक रहा है, उसका मूल कारण हमारी सांस्कृतिक विरासत है। हम सम्मान देना जानते हैं, हम सत्कार करना जानते हैं, हम समावेश करना जानते हैं इस महान परंपरा को लेकर के हम चले हैं और इसलिए हिंसा और अत्याचार का हमारे देश में कोई स्थान नहीं है। अगर भारत के लोकतंत्र को मजबूत बनाना है, भारत के सपनों को पूरा करना है तो हमारे लिए हिंसा का मार्ग कभी कामयाब नहीं होगा।

    आज कहीं, जंगलों में माओवाद के नाम पर, सीमा पर उग्रवाद के नाम पर, पहाड़ों में आतंकवाद के नाम पर, कंधे पर बंदूक लेकर के निर्दोषों को मारने का खेल चला जा रहा है। त्राहि-त्राहि हो गया, ये धरती माता रक्त से रंजित होती गई हैं, लेकिन इस आतंकवाद के रास्ते पर जाने वालों ने कुछ नहीं पाया है। मैं उन नौजवानों को कहना चाहता हूं। ये देश हिंसा को कभी सहन नहीं करेगा, ये देश आतंकवाद को कभी सहन नहीं करेगा, ये देश आतंकवाद के सामने कभी झुकेगा नहीं, माओवाद के सामने कभी झुका नहीं। लेकिन मैं उन नौजवानों को कहता हूं अभी भी समय है, लौट आइए, अपने मां-बाप के सपनों की ओर देखिए, अपने मां-बाप की आशा-आकांक्षाओं की ओर देखिए, मुख्यधारा में आइए, एक सुख-चैन की जिंदगी जिए। हिंसा का रास्ता कभी किसी का भला नहीं करता है।

    भाइयों-बहनों, हम जब विदेश नीति की बातें करते हैं, मैं उसका लंबा-चौड़ा जिक्र करना नहीं चाहता हूं, लेकिन जिस दिन हमने शपथ लिया था, सार्क देशों के नेताओं को बुलाया था, हमारा संदेश साफ था कि हम सभी देश, अड़ोस-पड़ोस के हम सभी देश, हम सबकी एक सबसे बड़ी common चुनौती है गरीबी। आओ हम मिलकर के गरीबी से लड़ें, अपनों से लड़ाई लड़के तबाह तो हो चुके हैं, लेकिन अगर गरीबी से लड़ेंगे, तो हम तबाही से निकलकर समृद्धि की ओर चल पड़ेंगे और इसलिए मैं सभी पड़ोसियों को गरीबी से लड़ने का निमंत्रण देता हूं। हमारे देश के नागरिकों को, हर देश के नागरिकों को गरीबी से मुक्ति दिलाना- इससे बड़ी कोई आजादी नहीं हो सकती। हमारे कोई भी पड़ोसी देश का नागरिक जब गरीबी से आजाद होगा, तब हिंदुस्तान कितनी खुशी का अनुभव करेगा, जब हमारे पड़ोसी देश का गरीब, गरीबी से आजादी पाता हो।

    भाइयों-बहनों, मानवता की प्रेरणा से पले-बड़े लोग कैसे होते हैं और आतंकवाद को पुरस्‍कार देने वाले लोग कैसे होते हैं। मैं विश्व के सामने दो चित्र रखना चाहता हूं, दो घटनाएं उनके सामने रखना चाहता हूं और मैं विश्व को कहता हूं, मानवता में विश्वास रखने वाले लोगों को कहता हूं कि जरा तराजू से तौलकर के देखिए वो एक घटना जब पेशावर में आतंकवादियों ने निर्दोष बच्चों को मौत के घाट उतार दिया, घटना पेशावर में हुई थी, घटना आतंकवादी थी, निर्दोष-निर्दोष बालकों का रक्त बहाया गया था। ज्ञान के मंदिर को रक्त रंजित कर दिया था, निर्दोष बच्चों को मार दिया गया था।

    ये हिन्दुस्तान संसद की आँखों में आंसू थे। भारत का हर स्कूल रो रहा था। भारत का हर बच्चा पेशावर के बच्चों की मौत से सदमा अनुभव कर रहा था। उसकी आँखों से आंसू सूखते नहीं थे। आतंकवाद से मरने वाला पेशावर का बच्चा भी हमें दर्द देता था, दुख देता था। ये है हमारी मानवता से पली बड़ी संस्कृति की प्रेरणा, यही है हमारी मानवता, लेकिन और तरफ़ देख लीजिये कि जब आतंकवादियों को Glorify करने का काम हो रहा था। जहां आतंकवादी घटना में निर्दोष लोग मारे जाएं तो जश्न मनाए जाते हैं। ये कैसा आतंकवाद से प्रेरित जीवन है। कैसे आतंकवाद से प्रेरित सरकारों की रचनाएं हैं। ये दो भेद दुनिया भली भांति समझ लेगी। इतना मेरे लिए काफी है।

    मैं आज लालकिले की प्राचीर से कुछ लोगों का विशेष अभिनन्दन और आभार व्यक्त करना चाहता हूं। पिछले कुछ दिनों से बलूचिस्तान के लोगों ने, Gilgit के लोगों ने, पाक Occupied कश्मीर के लोगों ने, वहां के नागरिकों ने जिस प्रकार से मुझे बहुत-बहुत धन्यवाद दिया है, जिस प्रकार से मेरा आभार व्यक्त किया है, मेरे प्रति उन्होंने जो सद्भावना जताई है, दूर-दूर बैठे हुए लोग जिस धरती को मैंने देखा नहीं है, जिन लोगों के विषय में मेरी कभी मुलाकात नहीं हुई है, लेकिन ऐसे दूर सुदूर बैठे हुए लोग हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री को अभिनन्दन करते हैं, उसका आदर करते हैं, तो मेरे सवा सौ करोड़ देशवासियों का आदर है, वो मेरे सवा सौ करोड़ देशवासियों का सम्मान है। और इसलिए ये सम्मान का भाव, धन्यवाद का भाव करने वाले बलूचिस्तान के लोगों का, Gilgit के लोगों का, पाक के कब्जे वाले कश्मीर के लोगों का मैं आज तहे दिल से आभार व्यक्त करना चाहता हूँ।

    भाइयों-बहनों, आज जब हम आजादी के 70 साल मना रहे हैं तब देश में स्वतंत्रता सैनिकों का बड़ा योगदान रहा है। इन स्वतंत्र सैनिकों का योगदान रहा है तो। आज मैं इन सभी मेरे श्रद्धेय स्वतंत्रता सैनिक परिवारजनों को, जो उनको सम्मान राशि मिलती है, जो पेंशन मिलती है। उस पेंशन में बीस प्रतिशत की वृद्धि करने का सरकार निर्णय कर रही है। जिस स्वतंत्रता सेनानी को अगर पहले 25 हजार मिलते थे, तो अब उसको 30 हजार रुपये मिलेंगे। और हमारे इन स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और बलिदान को एक छोटा-सा, एक मेरा पूजा अर्चन का प्रयास है।

    भाइयों–बहनों, हमारे देश के आजादी कि इतिहास की बातें होती हैं, तो कुछ लोगों की चर्चा तो बहुत होती है। कुछ लोगों की आवश्यकता से भी अधिक होती हैं। लेकिन आजादी में जंगलों में रहने वाले हमारे आदिवासियों का योगदान अप्रतिम था। वो जंगलों में रहते थे। बिरसा मुंडा का नाम तो शायद हमारे कानों में पड़ता है। लेकिन शायद कोई आदिवासी जिला ऐसा नहीं होगा कि 1857 से लेकर के आजादी आने तक आदिवासियों ने जंग न की हों बलिदान न दिया हो। आजादी क्या होती है? गुलामी के खिलाफ जंग क्या होता है? उन्होंने अपने बलिदान से बता दिया था। लेकिन हमारी आने वाली पीढ़ियों को इस इतिहास से उतना परिचय नहीं है। सरकार की इच्छा है, योजना है। आने वाले दिनों में उन राज्यों में इन स्वतंत्र सेनानी जो आदिवासी थे। जंगलों में रहते थे। अंग्रेजों से जूझते थे। झुकने को तैयार नहीं थे। उनके पूरे इतिहास को समावेश करते हुए, इन वीर आदिवासियों को याद करते हुए एक स्थायी रूप से Museum बनाने के लिए जहां-जहां राज्य के अंदर कोई एकाध जगह हो सकती है जहां सबको समेट करके बड़ा Museum बनाया जा सकता है। और ऐसे अलग-अलग राज्यों में Museum बनाने की दिशा में सरकार काम करेगी, ताकि आने वाली पीढ़ियों को हमारे देश के लिए मर मिटने में आदिवासी कितने आगे थे, उसका लाभ मिलेगा।

    भाइयों-बहनों, महंगाई में कुछ चीजों की चर्चाएं तो बहुत होती हैं, लेकिन हम अनुभव कर रहे हैं कि गरीब के घर में अगर बीमारी आ जाए, तो उसकी पूरी अर्थ रचना समाप्‍त हो जाती है। बेटी की शादी तक रूक जाती है। बच्‍चों की पढ़ाई तक अटक जाती है, कभी शाम को खाना भी नहीं मिलता है। आरोग्‍य सेवाएं महंगी होती जा रही हैं और इसलिए मैं आज लाल किले की प्राचीर से गरीबी की रेखा के नीचे जीने वाले मेरे इन परिवारों के आरोग्‍य के लिए सरकार एक अहम कदम उठाने जा रही है। हम यह योजना ले करके आए हैं कि आने वाले दिनों में ऐसे किसी गरीब परिवार को आरोग्‍य की सेवाओं का लाभ लेना है, तो वर्ष में एक लाख रुपये तक का खर्च भारत सरकार उठाएगी, ताकि मेरे गरीब भाइयों को, इन आरोग्‍य की सेवाओं के कारण वंचित रहना न पड़े। उनके सारे सपने चूर-चूर न हो जाएं।

    और इसलिए मेरे प्‍यारे भाइयों-बहनों आजादी के इस पावन पर्व में एक नया संकल्‍प, नई ऊर्जा, नया उमंग ले करके आओ हम चल पड़ें। हमारे लिए जिन्‍होंने आजादी के लिए बलिदान दिया, उनसे प्रेरणा पा करके, आजादी के लिए जीने वालों के लिए प्रेरणा पा करके, देश के लिए मरने का मौका तो नहीं मिल रहा है, लेकिन देश के लिए जीने का मौका जरूर मिल रहा है। हम देश के लिए जी करके दिखाए, देश के लिए कुछ करके दिखाए, अपने दायित्‍वों को भी निभाएं, औरों को दायित्‍व के लिए प्रेरित भी करे। एक समाज, एक सपना, एक संकल्‍प, एक दिशा, एक मंजिल इस बात को ले करके हम आगे बढ़ें। इसी एक भावना के साथ मैं फिर एक बार महापुरूषों को नमन करते हुए जल, थल, नभ में हमारी रक्षा के लिए जान की बाजी लगाने वाले, हमारे पुलिस के नौजवान, 33 हजार शाहदतों को नमन करते हुए, मैं देश के भविष्‍य की ओर सपनों को देखते हुए, अपने आप को समर्पित करते हुए आज लाल किले की प्राचीर से आप सबको पूरी ताकत के साथ मेरे साथ बोलने के लिए कहा रहा हूं भारत माता की जय..

    आवाज दुनिया के हर कोने में जानी चाहिए –

    भारत माता की जय, भारत की जय।

    वंदे मातरम, वंदे मातरम, वंदे मातरम।

    जय हिंद, जय हिंद, जिय हिंद।

    बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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  • आनलाईन लीक हुई सुल्तान

    आनलाईन लीक हुई सुल्तान

    salman-sultan मुंबई(फिल्मसिटी न्यूज)।खबरें आ रही हैं कि ताजा रिलीज हुई सलमान खान की ‘सुल्तान’ ऑनलाइन लीक हो गई। कहा जा रहा है कि सुल्तान रिलीज से ठीक एक दिन पहले ही लीक हुई है। साइबर क्राइम एक्सपर्ट दीप शंकर के मुताबिक फिल्म की कॉपी डार्कनेट पर मौजूद है और जल्द ही यह टॉरेंट पर भी उपलब्ध होगी। (more…)