गुजरातियों का घंटा बजाने निकले कैलाश की छाती पर क्यों मच रहा तांडव

-आलोक सिंघई-

      “मालव धरती धीर गंभीर, डग डग रोटी पग पग नीर” (Malav dharti dheer gambhir, dag dag roti pag pag neer) यह कहावत मालवा क्षेत्र की उपजाऊ, समृद्ध और जल-संपन्न भूमि का वर्णन करती है, जिसका अर्थ है कि यह धरती बहुत उपजाऊ है जहाँ हर कदम पर रोटी (अनाज) और हर पग पर पानी (जल) उपलब्ध है ।पहली बार दुनिया को पता चला कि सफाई के तमगे जीतते इंदौर का पानी अब पूरी तरह जहरीला हो चुका है। इतना कि उसने लगभग दो दर्जन लोगों की बलि ले ली। वैसे तो शहर के भागीरथपुरा में दो सौ से अधिक लोग गंभीर स्तर पर बीमार पड़े लेकिन हजारों लोगों का मन आज भी घिन से भरा हुआ है जिन्हें स्थानीय निकाय और जन प्रतिनिधियों की लापरवाही की वजह से मलमूत्र भरा पानी पीने को मजबूर होना पड़ा। इस घटना के बावजूद खुद को शहर का भाग्यविधाता समझने का दंभ भरने वालों का दिल नहीं पसीजा। इन मौतों के बाद हाल ही में उनके परिवार की एक शादी का समारोह जितने बड़े पैमाने पर मनाया गया उससे पता चलता है कि वहां के जन प्रतिनिधि अब एक अलग ही नशे में मदमस्त घूम रहे हैं।

     कांग्रेस के राजकुमार राहुल गांधी सत्रह जनवरी को इंदौर आ रहे हैं। उनकी कांग्रेस इस घटना पर इसी दिन पूरे प्रदेश में भी विरोध प्रदर्शन करेगी। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा की राजनीति और स्थानीय नेताओं की अकुशलता की वजह से लोगों को अपने परिजनों का बिछोह सहना पड़ रहा है। दरअसल इंदौर की इस घटना से न केवल मालवा बल्कि पूरे प्रदेश और देश के लोगों का मन विक्षोभ से भरा हुआ है। यही वजह है कि कांग्रेस जैसे समयातीत हो चले राजनीतिक दल के नेता भी अंगड़ाई लेने लगे हैं। कुछ दिनों पहले मध्यप्रदेश का बंटाढ़ार करने में निपुण दिग्विजय सिंह ने भी एक अखबार में आलेख के माध्यम से भाजपा की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की थी। इस टसुए बहाते लेख के माध्यम से दिग्विजय ने गुजरातियों पर निशाना साधा था।उनका कहना था कि राज्य की पंचायतों तक में गुजरातियों को जो ठेके दिए गए उनसे राज्य की स्थिति बिगड़ी है। कई गुजराती ठेकेदार तो बगैर काम किए भुगतान लेकर रफूचक्कर हो गए। उन्होंने भाजपा के जिन नेताओं से जुड़े ठेकेदारों को पेटी कांट्रेक्ट दिए उन्होंने भी काम नहीं किया। इस वजह से राज्य और इंदौर की ये दुर्दशा हुई है।

कवि दुष्यंत कुमार की साए में धूप की कुछ लाईनें आज ज्यादा प्रासंगिक हो रहीं हैं। कि

कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं,गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं।

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं

     शहरी नियोजन की विफलता को दर्शाने के लिए दिग्विजय ने जो लेख लिखा वह वास्तव में एक गहरी और अंदरूनी राजनीति का प्रकटीकरण बताया जा रहा है। पिछले लगभग ढाई दशकों से दिग्विजय सिंह मंदड़िए की तरह दांव खेल रहे हैं। शतरंज के पांसे फेंकते चुन्नू मुन्नू ने जिस तरह भाजपा की सत्ता में अपने महल खड़े किए उससे मध्यप्रदेश की राजनीति को आसानी से समझा जा सकता है। महापौर रहते हुए कैलाश विजयवर्गीय पर जिस पेंशन घोटाले का आरोप लगा था उसे अदालत ने सत्रह सालों बाद इसलिए खारिज कर दिया क्योंकि सरकार ने इस मामले में अभियोजन की स्वीकृति ही नहीं दी।

      इस मामले में कांग्रेस के नेता के के मिश्रा का आरोप है कि कैलाश विजयवर्गीय ने महापौर बनने के बाद परिषद की पहली बैठक में ही संकल्प पारित करवा लिया कि पेंशनधारियों को नंदानगर सहकारी साख संस्था के माध्यम से भुगतान किया जाएगा। इसके बाद अपात्र लोगों को जमकर पेंशन का भुगतान किया गया। जांच में घोटाले की रकम 33 करोड़ से ज्यादा आंकी गई थी। मिश्रा ने कोर्ट में एक परिवाद दायर कर तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय, महापौर परिषद यानि एमआईसी के तत्कालीन सदस्य रमेश मेंदोला, पूर्व महापौर उमाशशि शर्मा, तत्कालीन सभापति और अब सांसद शंकर लालवानी, तत्कालीन निगमायुक्त संजय शुक्ला समेत 14 लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी, अमानत में खयानत, कूट रचना का आरोप लगाते हुए इन पर आपराधिक प्रकरण चलाने की मांग की थी।

       इसके बाद इंदौर जिस तरह राजनेताओं के धन उलीचने का अड्डा बना उसने तो पूरे इंदौर को ही लुटेरा बना दिया। इंदौर के चमकते विकास की अंतर्कथा ये साबित करती है कि जैसा राजा हो प्रजा वैसी ही हो जाती है। इसे समझने के लिए वहां के अस्पतालों की कहानिया हीं काफी हैं। छह आठ महीने पहले मेडीकल कालेज के सामने स्थित एक अस्पताल में जब मरीज के परिजनों ने देखा कि उन्हें थमाए गए बिल में एक ही खर्च कई बार दुहराया गया है तो उन्होंने अस्पताल के मालिक से बात की। इसके साथ ही उन्होंने स्थानीय मंत्रीजी से भी निवेदन किया कि अस्पताल बेवजह वसूली जा रही इस राशि का बिल संशोधित कर ले। मंत्रीजी के कार्यालय से अस्पताल प्रबंधक को फोन भी किया गया। इस पर प्रबंधक ने मरीज के परिजनों को दो टूक इंकार करते हुए कहा कि चुनाव से पहले मंत्रीजी उनसे पचपन लाख रुपए का चंदा ले चुके हैं। ऐसे में यदि वे मरीजों से भरपाई नहीं करेंगे तो फिर उन्हें अस्पताल बंद करना पड़ेगा।

         यही स्थिति वहां के तमाम कारोबारियों की  हो गई है। इंदौर में पदस्थ रहे पुलिस के एक बड़े अधिकारी का कहना है कि अब ये शहर एक दूसरे पर टोपी धरने में महारथ हासिल कर चुका है। एक नागरिक का बेशकीमती प्लाट नेता नगरी के एक गुंडे ने हथिया लिया। जब वह बिल्डर मंत्रीजी के सामने पहुंचा तो उन्होंने अपने दरबार में गुंडे की पेशी करवाई। गुंडा पूरी तैयारी से दस्तावेज लेकर पहुंचा और उसने कहा कि प्लाट तो उसी का है, भैया बेवजह उस पर दावा जता रहे हैं। हूबहू कागज देखकर बिल्डर चकरा गया। नेताजी ने उसे समझाया कि आपस में समझ लो। बड़ी अनुनय विनय के बाद बिल्डर ने अपना ही प्लाट दो करोड़ रुपये की अड़ीबाजी चुकाकर वापस पाया।

       ये घटनाएं तो आज आम हैं। घर घर में ये विष फैल चुका है। बहनें भाई की संपत्ति पर अड़ी बाजी कर रहीं हैं। कोई ससुराल का जेवर हड़पकर भाग रही है कोई रिश्तेदारों को अच्छे इलाज का प्रलोभन दिखाकर उनकी संपत्तियां लुटवा रहा है। लड़के लड़कियां चमक दमक के फेर में टोपी पहिनते पहिनाते दिख रहे हैं। लगभग ढाई दशकों में भोला भाला इंदौर बिल्कुल बदल गया है। एक नया ही शैतान वहां के जेहन में बैठ गया है। जो इंदौर कभी उत्पादक था वह आज शातिर कारोबारी माफिया बन चुका है।

        भागीरथ पुरा की घटना भी इसी जहरीली राजनीति और काले धन की हवस की भेंट चढ़ा है। अपना दामन छुड़ा रहे भाजपा के नेताओं ने अपने जिस बंटाढार सरगना से गुजराती लाबी पर सवालिया निशान लगवाया है वह केवल आधा सच है। ये बात सही है कि गुजरात से आए कुछ ठेकेदारों ने शिवराज सिंह चौहान की पिलपिली सरकार को ठगी का पप्पू बना रखा था। शहरी नवीनीकरण के नाम पर आई योजनाओं में खुलेआम खा खा खैया का खेल खेला गया। लेकिन इससे भागीरथपुरा का अभिशाप नहीं ढांका जा सकता है।सबसे ज्यादा राजस्व उपार्जन करने वाला इंदौर नगर निगम अपनी जल मल व्यवस्था को चलाने के लिए खुद सक्षम है। उस पर किसी केन्द्रीय योजनाओं की लूट का कोई असर क्यों पड़ना चाहिए था। दरअसल योजनाओं की इस लूट में सहयोगी बने भाजपा के नेताओं को जरा भी फिक्र नहीं थी कि उनके शहर की पाईप लाईनें सड़ चुकी हैं। उन्हें बदला भी जाना चाहिए। तेज आबादी का बोझ झेलते शहर में नई पाईप लाईनें भी विकसित की जानी थी। वे तो बस उन कागजी योजनाओं में अपना हिस्सा लेकर खिसक लिए । नृशंस लापरवाही पर सवालों के जवाब में घंटा बताते नेताओं को देखकर भविष्य की राजनीति की दिशा आसानी से समझी जा सकती है।

         जबसे कैलाश जी को पश्चिम बंगाल का प्रभार दिया गया और भारी संसाधन झोंकने के बाद ममता दीदी का प्रसाद खाने वाले वामपंथियों ने वहां भाजपा की दाल नहीं गलने दी तबसे भाजपा में कई स्तरीय चिंतन चलता रहा है। इस बार एक लाबी कह रही थी कि पिछले अनुभवों का लाभ लेने के लिए कैलाश जी को दुबारा उस मोर्चे पर भेजा जाए। इस जमावट को करीब से देख रहे उनके विरोधियों ने कलकत्ता के उन उद्योगपतियों से चंदा वसूली के प्रमाण हाईकमान के समक्ष रख दिए कि जिन्हें केन्द्र ने युद्ध में सहयोग के लिए तैनात किया था। जाहिर है कि भाजपा हाईकमान अपनी इस गलती को दुबारा कैसे दुहरा सकता था। इस बीच भागीरथ पुरा हो गया और अपनी गलती को छुपाने के लिए गुजरातियों पर ठीकरा फोड़ने की नादानी भी सामने आ गई। इस एपीसोड के बाद भाजपा के कई अन्य नेताओं को आशा की किरणें दिखने लगी हैं और वे अपने कुर्ते पजामे पर कलफ लगवाने में जुट गए हैं। रही सही कसर पूरी करने के लिए कांग्रेसियों ने भी खम ठोक दिया है।

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