Month: October 2026

  • प्रजातंत्र के खतरों को सताई लोकतंत्र की चिंता

    प्रजातंत्र के खतरों को सताई लोकतंत्र की चिंता

    भारत का विपक्ष ये नैरेटिव गढ़ने का प्रयास कर रहा है कि केन्द्र की मोदी सरकार दिल्ली में आहूत प्रदर्शन को हतोत्साहित करके अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने का प्रयास कर रही है।ये वही विपक्ष है जो दिन रात सोशल मीडिया पर अपनी गलीज अभिव्यक्ति उगलता फिरता है।लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सत्ता में रहने पर व्यवस्था की मर्यादा याद आती है और विपक्ष में आते ही उसी व्यवस्था पर तानाशाही के आरोप लगने लगते हैं। दिल्ली में 10 अक्टूबर को प्रस्तावित सीजेपी और अन्य संगठनों के प्रदर्शन को लेकर छिड़ी बहस इसी राजनीतिक दोहरेपन की परीक्षा है। राहुल गांधी और विपक्षी दलों का आरोप है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बहाने मताधिकार छीना जा रहा है। दूसरी ओर, सरकार और भाजपा का तर्क है कि निष्पक्ष चुनाव के लिए मतदाता सूची का शुद्धिकरण आवश्यक है। सवाल यह है कि लोकतंत्र की रक्षा कौन कर रहा है और उसके नाम पर राजनीतिक लाभ कौन तलाश रहा है?पुलिस वाली को जिस तरह से छूते हुए राहुल गांधी का फोटो वायरल हुआ है उसने भी वंशवादी बुराई को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।

    अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है। सरकार की आलोचना करना, चुनाव आयोग से सवाल पूछना और सड़कों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। ये बात संविधान निर्माताओं ने लगभग आठ दशक पहले सोची थी। तब न तो आम जन के पास फोन थे न टीवी रेडियो अखबार जैसे सुव्यवस्थित संचार के साधन थे। मुगलों के बाद अंग्रेजों की गुलामी से बाहर निकलने के लिए छटपटाते देश के सामने केवल भीड़ जुटाकर प्रदर्शन करने का एकमात्र विकल्प था । ये भीड़ इसलिए जुटाई जाती थी कि सरकारों के पास प्रदर्शनकारियों को गिरफतार करने की क्षमता ही नहीं थी। ऐसे में ब्रितानी हुकूमत के हाथ पैर फूल जाते थे और वह जनता की बात मानने को विवश हो जाती थी। आज ऐसी कोई परिस्थिति नहीं है। देश की किसी सरकार की इतनी कूबत नहीं है कि वह जन भावनाओं को रौंद सके और अपनी मनमानी करती रहे। इसके बावजूद विपक्ष यही रोना रो रहा है कि सरकार उन्हें प्रदर्शन ही नहीं करने दे रही है। राजधानी को अस्तव्यस्त करने वाले षड़यंत्रकारियों के प्रदर्शन से आम नागरिकों को बचाने के लिए दिल्ली सरकार ने जिस तरह से सार्वजनिक परिवहन का दुरुपयोग रोकने की पहल दिखाई है उससे तिलचट्टे तो खफा हैं हीं साथ में कांग्रेस के युवराज के समर्थक भी खासे परेशान हैं।

    राहुल गांधी का ‘वोट चोरी’ संबंधी आरोप राजनीतिक रूप से गंभीर है, लेकिन उसकी पुष्टि के लिए ठोस प्रमाण जरूरी हैं। भाजपा की ओर से कहा गया है कि लगभग 13 करोड़ नामों को अंतिम रूप से मतदाता सूची से हटाया नहीं गया, बल्कि पुनरीक्षण में मृत, अनुपस्थित, स्थानांतरित या दोहरी प्रविष्टियों के रूप में चिह्नित किया गया है। पार्टी ने नए युवा मतदाताओं के नाम जोड़ने का भी हवाला दिया है। इन दावों की स्वतंत्र जांच और निर्वाचन आयोग के पारदर्शी आंकड़े ही सच्चाई स्पष्ट कर सकते हैं।

    यदि सूची में फर्जी या दोहरे नाम हैं तो उन्हें हटाना जरूरी है; लेकिन यदि किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हटता है तो उसे बहाल करना भी उतना ही जरूरी है। विपक्ष को प्रत्येक कथित गड़बड़ी का दस्तावेजी प्रमाण देना चाहिए और निर्वाचन आयोग को प्रत्येक वैध शिकायत का जवाब। चुनाव आयोग की निष्पक्षता केवल उसके दावों से नहीं, उसकी पारदर्शिता और जवाबदेही से सिद्ध होगी। भाजपा के लिए भी यही कसौटी है।विपक्ष का कहना है कि कई नाम वैध पाए गए और उन्हें बाद में शामिल भी कर लिया गया तो उन्हें हटाया ही क्यों था। जबकि हकीकत ये है कि ये नाम तथ्यात्मक आधार प्रस्तुत करने के बाद जोड़े गए हैं । यदि वे मतदाता पहले ही अपनी जानकारी मुहैया करा देते तो उनके नाम काटे ही नहीं जाते।

    अवैध घुसपैठ राष्ट्रीय सुरक्षा, संसाधनों और नागरिकता से जुड़ा गंभीर विषय है। किसी समुदाय या राजनीतिक विरोधी को बिना प्रमाण घुसपैठिया घोषित करना सरकार का भी मकसद नहीं है। पहचान, नागरिकता और मताधिकार से जुड़े निर्णय कानून और उचित प्रक्रिया के अनुसार ही तो किए जाएंगे। इसी प्रकार विदेशों में जमा कथित काले धन या भारत से अवैध रूप से बाहर भेजी गई संपत्ति पर सवाल उठाना उचित है किसी दल या नेता पर आरोप लगाने के लिए जांच, वित्तीय अभिलेख और विश्वसनीय साक्ष्य चाहिए। सरकार ने इसीलिए तो अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की लेकिन जांच की प्रक्रिया जारी है। भारत में शासन करने वालों ने आजादी के बाद से लगभग पचास विदेशी मुल्कों में भारत से लूटा धन निवेश कर रखा है।उसी के आने वाला ब्याज देश की सत्ता को अस्थिर करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। अदालतों ने तो इस संबंध में प्रमाण सुन समझ लिए हैं लेकिन ये जानकारी आज तक पब्लिक डोमेन में नहीं आई है। यही वजह है कि देश की आबादी खासतौर से युवाओं के बड़े वर्ग को लगता है कि सरकार तानाशाही से उनकी आवाज को कुचलने का प्रयास कर रही है।

    सीजेपी के नेता अभिजीत दिपके ने रेल सेवाओं और मेट्रो स्टेशनों पर प्रतिबंधों को लेकर केंद्र पर कटाक्ष किया है। कांग्रेस भी इन कदमों को लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बता रही है। मगर प्रश्न यह है कि प्रदर्शनकारियों की राजनीतिक लड़ाई में दफ्तर जाने वाले कर्मचारी, अस्पताल पहुंचने वाले मरीज, विद्यार्थी और रोज कमाकर खाने वाले नागरिक क्यों परेशान हों? सार्वजनिक परिवहन को बाधित करने या संभावित भीड़ को रोकने के लिए पूरे शहर की आवाजाही सीमित करने का औचित्य देश के आम लोगों को भी समझना होगा।

    दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा कारणों से प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी और व्यापक प्रतिबंधों की तैयारी की है। सर्वोच्च न्यायालय के कुछ जज भी मेट्रो और रेल सेवाओं पर व्यापक रोक को लेकर सवाल उठा रहे हैं। पिछले आंदोलनों से सबक लेकर दिल्ली सरकार नागरिकों की सुविधाओं के साथ सुरक्षा को लेकर भी चिंतित है। यही वजह है कि उसने दिल्ली के आम परिवहन को नहीं रोका है।बाहर से दिल्ली आने वाले सार्वजनिक परिवहन को नियंत्रित किया जा रहा है। दिल्ली सरकार का ये कदम निश्चित रूप से सराहनीय है। आज जब गांव में बैठे व्यक्ति को प्रधानमंत्री और सरकार तक अपनी बात पहुंचाने के लिए तमाम संसाधन उपलब्ध हैं तब दिल्ली में भीड़ जुटाकर किसके इशारे पर और किसे डराने का प्रयास किया जा रहा है।

    भाजपा प्रवक्ता प्रदीप भंडारी का एसआईआर के समर्थन में दिया गया तर्क सरकार के फैसले का समर्थन करता है। राहुल गांधी के लिए केवल ‘वोट चोरी’ का नारा पर्याप्त नहीं; उन्हें प्रमाण सामने रखने होंगे। सीजेपी और दूसरे प्रदर्शनकारी संगठनों को शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार की आड़ लेने के बजाए आम जनता की कठिनाइयों के प्रति संवेदनशील रहना सीखना पड़ेगा। किसी भी दल की आलोचना को राष्ट्रविरोध और हर प्रशासनिक कार्रवाई को तानाशाही बताना लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है।

    लोकतंत्र किसी एक पार्टी की जागीर नहीं, बल्कि संविधान से संचालित सार्वजनिक व्यवस्था है। उसकी रक्षा न अंधसमर्थन से होगी, न अंधविरोध से। सरकार तो संयम और पारदर्शिता दिखा रही है पर विपक्ष को भी प्रमाण और जिम्मेदारी का भाव रखना होगा।दिल्ली में जमा अराजक भीड़ को ठोकना न पड़े इसके लिए सरकार यदि उन्हें अनुमति नहीं दे रही है तो ये उचित ही है। जनता को नारों से अधिक तथ्यों पर गौर करने की जरूरत है। लोकतंत्र की चिंता में दुबला होने का अभिनय छोड़कर यदि सभी पक्ष अपने आचरण की समीक्षा करें, तभी प्रजातंत्र का वास्तविक खतरा कम होगा।

  • सुप्रीम कोर्ट ने वोटर की जांच सही पाई तो रोकिए नेताओं की लंपटता

    सुप्रीम कोर्ट ने वोटर की जांच सही पाई तो रोकिए नेताओं की लंपटता

    भारत में लोकतंत्र की ताकत केवल इस बात में नहीं है कि हर पांच साल में चुनाव हो जाएं, बल्कि इसकी असली ताकत इस बात में है कि चुनाव में वोट डालने वाले व्यक्ति की पात्रता पर भरोसा किया जा सके। मतदाता सूची लोकतंत्र की वह बुनियादी दस्तावेज है जिसके आधार पर सरकारें बनती हैं, नीतियां तय होती हैं और सत्ता का हस्तांतरण होता है। इसलिए मतदाता सूची में एक भी अपात्र नाम रहना जितना गंभीर प्रश्न है, उतना ही गंभीर प्रश्न किसी पात्र नागरिक का नाम हट जाना भी है। इसी संतुलन को सामने रखकर विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision—SIR को देखना चाहिए।

    SIR को लेकर देश में जिस तरह का राजनीतिक संघर्ष खड़ा किया गया है, उसमें मूल सवाल कहीं पीछे छूटता दिखाई देता है। सवाल यह है कि क्या भारत की मतदाता सूची हमेशा के लिए बिना किसी गहन जांच के चलती रहे या समय-समय पर उसकी व्यापक समीक्षा हो? यदि वर्षों से मतदाता सूचियों में मृत्यु, स्थानांतरण, दोहरे पंजीकरण, गलत पते और पात्रता से जुड़ी विसंगतियां जमा होती रही हैं तो उनका निराकरण कौन करेगा? निर्वाचन आयोग का संवैधानिक दायित्व ही चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची की विश्वसनीयता सुनिश्चित करना है।देश में चल रही सभी योजनाओं की समीक्षा भी तो इसी आधार पर की जा रही है कि संसाधनों का उचित उपयोग करके सभी जरूरत मंदों को समर्थन दिया जा सके।

    बिहार में SIR शुरू करते समय निर्वाचन आयोग ने साफ कहा था कि इसका उद्देश्य सभी पात्र नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल करना और अपात्र व्यक्तियों को सूची से बाहर करना है। आयोग ने इसे संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 21 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र में रखा। 2003 के बाद बिहार में दो दशक से अधिक समय तक नियमित संक्षिप्त पुनरीक्षण होते रहे, लेकिन वैसा व्यापक गहन पुनरीक्षण नहीं हुआ था।

    यहीं से इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। मतदाता सूची की शुचिता किसी राजनीतिक दल की सुविधा का विषय नहीं हो सकती। यदि किसी सूची में मृत व्यक्ति का नाम है, एक ही व्यक्ति के नाम कई जगह दर्ज हैं, कोई व्यक्ति स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुका है या ऐसा व्यक्ति मतदाता के रूप में दर्ज है जिसकी पात्रता पर गंभीर सवाल है, तो उसकी जांच लोकतंत्र के विरुद्ध नहीं, लोकतंत्र के पक्ष में है।

    सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 को बिहार SIR की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखते हुए इस बहस को काफी हद तक स्पष्ट कर दिया। अदालत ने माना कि SIR का उद्देश्य स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए विश्वसनीय मतदाता सूची तैयार करना है। अदालत ने यह भी माना कि निर्वाचन आयोग मतदाता के रूप में पंजीकरण की पात्रता के लिए नागरिकता की सीमित जांच कर सकता है। साथ ही अदालत ने यह महत्वपूर्ण सीमा भी तय की कि निर्वाचन आयोग की यह जांच नागरिकता पर अंतिम फैसला नहीं है। जहां नागरिकता का प्रश्न निर्णायक हो, वहां मामला सक्षम प्राधिकारी के पास जाएगा और संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर मिलेगा।

    यानी SIR को लेकर यह कहना कि निर्वाचन आयोग किसी व्यक्ति की नागरिकता पर अंतिम न्यायिक फैसला कर रहा है, सही नहीं है। लेकिन यह कहना भी सही नहीं होगा कि आयोग को मतदाता सूची में शामिल व्यक्ति की पात्रता की जांच करने का कोई अधिकार ही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों के बीच की संवैधानिक सीमा को स्पष्ट कर दिया है।

    इसके बाद SIR का देशव्यापी विस्तार हुआ। मई 2026 में निर्वाचन आयोग ने तीसरे चरण के तहत 16 राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों में प्रक्रिया आगे बढ़ाने की घोषणा की। आयोग के अनुसार इस चरण में 3.94 लाख से अधिक बूथ लेवल अधिकारी घर-घर जाकर लगभग 36.73 करोड़ मतदाताओं से संबंधित प्रक्रिया में शामिल होने वाले थे और राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंटों को भी इसमें भागीदारी का अवसर दिया गया।

    इस तथ्य का महत्व इसलिए है क्योंकि SIR को केवल निर्वाचन आयोग की बंद कमरे की कवायद बताना वास्तविक प्रक्रिया को छोटा करके देखना होगा। राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की भागीदारी, घर-घर सत्यापन, दावों और आपत्तियों की व्यवस्था और न्यायिक समीक्षा—ये सभी लोकतांत्रिक सुरक्षा-तंत्र का हिस्सा हैं।

    यही वह बिंदु है जहां राहुल गांधी और कांग्रेस के मौजूदा विरोध की आलोचना जरूरी हो जाती है। विपक्ष को किसी भी चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाने, आंकड़े मांगने, शिकायत करने और अदालत जाने का पूरा अधिकार है। लेकिन यदि किसी प्रक्रिया की वैधानिकता को लेकर सर्वोच्च न्यायालय अपना फैसला दे चुका है, तब लोकतांत्रिक राजनीति की जिम्मेदारी यह होनी चाहिए कि वह फैसले के भीतर उपलब्ध उपचारों और पारदर्शिता के रास्तों का इस्तेमाल करे। केवल यह मांग करना कि प्रक्रिया ही रोक दी जाए, तब तक न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता जब तक उसके विरुद्ध ठोस और प्रमाणित कानूनी आधार सामने न रखा जाए।

    7 अक्टूबर 2026 को राहुल गांधी और विपक्षी सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन किया और उनके इस्तीफे की मांग की। प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी सहित कई नेताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया। विपक्ष SIR और मतदाता सूची में बदलावों को लेकर गंभीर आरोप लगा रहा है, जबकि निर्वाचन आयोग इन आरोपों को स्वीकार नहीं करता।

    यहां एक दूसरा संवैधानिक प्रश्न भी सामने आता है—क्या किसी संवैधानिक संस्था के फैसले से असहमति का समाधान सड़क पर संस्था के काम को रोकने में है या संस्थागत जांच और न्यायिक प्रक्रिया में? लोकतंत्र में विरोध जरूरी है, लेकिन संस्थाओं को काम करने से रोकना लोकतांत्रिक अधिकार की अंतिम सीमा नहीं हो सकता।

    ज्ञानेश कुमार के संदर्भ में भी इसी संतुलन की जरूरत है। उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच होनी चाहिए तो वह निष्पक्ष रूप से होनी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने 5 अक्टूबर 2026 को उन्हें अंतरिम रूप से निलंबित करने से इनकार करते हुए निर्वाचन आयोग से संबंधित रिकॉर्ड मांगे हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल समाचार रिपोर्टों के आधार पर अंतरिम आदेश नहीं दिया जा सकता और यदि रिकॉर्ड से कानून का उल्लंघन सामने आता है तो उसके परिणाम होंगे।

    इस आदेश का अर्थ किसी व्यक्ति को क्लीन चिट देना नहीं है। इसका अर्थ इतना है कि संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज पर आरोपों का परीक्षण प्रमाण, रिकॉर्ड और कानून के आधार पर होना चाहिए। यही न्यायपालिका की ताकत है और यही लोकतंत्र की खूबसूरती भी।

    देश में मतदाता सूची को लेकर एक और भ्रम दूर करना आवश्यक है। SIR का मतलब यह नहीं कि हर हटाया गया नाम विदेशी नागरिक का नाम है। नाम हटने के कई कारण हो सकते हैं—मृत्यु, स्थायी स्थानांतरण, दोहरा पंजीकरण, गलत विवरण या पात्रता से जुड़ी समस्या। इसलिए किसी भी बड़े आंकड़े को सीधे “घुसपैठियों की संख्या” घोषित करना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन इसी के साथ यह तर्क भी स्वीकार नहीं किया जा सकता कि मतदाता सूची में किसी अपात्र व्यक्ति के नाम की जांच ही न हो।

    भारत की सबसे बड़ी संवैधानिक उपलब्धि यही है कि यहां राजनीतिक विरोध का जवाब राजनीतिक या प्रशासनिक हिंसा नहीं, कानून देता है। सरकार के खिलाफ आंदोलन हो सकते हैं, विपक्ष सरकार की आलोचना कर सकता है, अदालत में चुनौती दी जा सकती है, मीडिया सवाल पूछ सकता है। इसलिए मतदाता सूची की शुद्धता के सवाल को नस्लीय संघर्ष, राजनीतिक नरसंहार या किसी दूसरे देश की दमनकारी व्यवस्था से जोड़ना भी भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की प्रकृति को गलत ढंग से पेश करना होगा। भारत में असहमति के लिए संवैधानिक रास्ते खुले हैं।

    वास्तविक चुनौती यह है कि SIR निष्पक्ष भी दिखाई दे और निष्पक्ष हो भी। पात्र मतदाता का नाम किसी कीमत पर नहीं कटना चाहिए। जिस व्यक्ति का नाम हटाया जाए, उसे कारण पता होना चाहिए और उसे दावा तथा आपत्ति का अवसर मिलना चाहिए। नागरिकता से संबंधित संदेह हो तो सक्षम कानूनी प्राधिकारी की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। राजनीतिक दलों को भी अपने बूथ स्तर के प्रतिनिधियों के जरिए सूची की जांच करनी चाहिए। निर्वाचन आयोग को हर चरण में आंकड़े और प्रक्रिया सार्वजनिक करके अपने ऊपर उठने वाले संदेहों का जवाब देना चाहिए।यही वह रास्ता है जो SIR को किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष की कार्रवाई बनने से रोक सकता है।

    सरकार के निर्णय का समर्थन करने का सबसे मजबूत आधार यह नहीं है कि सरकार ने फैसला लिया है, बल्कि यह है कि मतदाता सूची की विश्वसनीयता लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है। निर्वाचन आयोग ने संवैधानिक अधिकार के आधार पर प्रक्रिया शुरू की, सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में इसकी वैधता को स्वीकार किया और अब देश के सामने चुनौती यह है कि इस प्रक्रिया को पारदर्शिता, सावधानी और कानूनी सुरक्षा के साथ पूरा किया जाए।

    राहुल गांधी या कोई भी विपक्षी नेता यदि SIR की किसी खास प्रक्रिया में गड़बड़ी का प्रमाण सामने रखते हैं तो उसकी जांच होनी चाहिए। यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से काटा गया है तो उसे वापस जोड़ा जाना चाहिए। यदि किसी अधिकारी ने कानून का उल्लंघन किया है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन केवल इसलिए कि व्यापक मतदाता पुनरीक्षण से राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं, पूरी प्रक्रिया को रोक देना लोकतांत्रिक दृष्टि से अधिक गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है।

    आखिर चुनाव किसी दल की निजी संपत्ति नहीं हैं। न भाजपा की, न कांग्रेस की और न किसी अन्य राजनीतिक दल की। चुनाव भारत के नागरिक का अधिकार हैं। इसलिए मतदाता सूची भी राजनीतिक दलों की सुविधा के हिसाब से नहीं, नागरिक की पात्रता और संविधान के हिसाब से बननी चाहिए।

    SIR का अंतिम मूल्यांकन इसी कसौटी पर होना चाहिए—क्या उसने पात्र नागरिक को सुरक्षित रखा, अपात्र नामों की पहचान की, प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया और हर वास्तविक शिकायत के लिए न्याय का रास्ता खुला रखा? यदि जवाब हां है तो SIR लोकतंत्र को कमजोर करने वाली प्रक्रिया नहीं, लोकतंत्र की नींव मजबूत करने वाली प्रक्रिया है।

    और ज्ञानेश कुमार के मामले में भी यही कसौटी लागू होनी चाहिए। न उन्हें आरोपों से परे मान लेना उचित है, न आरोप लगते ही दोषी घोषित कर देना। निर्वाचन आयोग संवैधानिक संस्था है और उसके प्रमुख के खिलाफ आरोप भी संवैधानिक और न्यायिक प्रक्रिया में ही परखे जाने चाहिए।

    भारत को आज सबसे अधिक जरूरत इसी राजनीतिक परिपक्वता की है—मतदाता सूची साफ हो, पात्र मतदाता सुरक्षित रहे, अपात्र नाम हटें, निर्वाचन आयोग जवाबदेह रहे और न्यायपालिका अंतिम संवैधानिक प्रहरी की भूमिका निभाती रहे। लोकतंत्र में इससे बेहतर सुरक्षा-कवच और क्या हो सकता है?

  •  मन में करुणा और दया हो तभी आती है क्षमा:आचार्य समय सागर जी

     मन में करुणा और दया हो तभी आती है क्षमा:आचार्य समय सागर जी

    भोपाल 06 अक्टूबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्यप्रदेश विधानसभा परिसर में आज मंगलवार को अनोखी धर्मसभा के बीच आचार्य श्री 108 समयसागर जी महाराज और उनके संघ के सभी साधुओं की उपस्थिति में सामूहिक क्षमावाणी महोत्सव का आयोजन किया गया। इस अवसर पर विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्री चेतन काश्यप,विधायक भगवानदास सबनानी,पूर्व वित्तमंत्री जयंत मलैया,महापौर मालती राय, राहुल कोठारी,  सहित प्रदेश के अनेक जनप्रतिनिधि और गणमान्य लोग मौजूद रहे।

     कुंडल पुर के बड़े बाबा और आचार्य विद्या सागर महाराज के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ शुरू हुए आयोजन में प्रदेश के मुख्य मंत्री विधान सभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने आचार्य श्री को शास्त्र भेट किए। डॉक्टरअंजुल दहाले और नीरू नांदगांवकर ने नृत्य के माध्यम से मंगलाचरण की भावपूर्ण प्रस्तुति दी।  जनप्रतिनिधियों ने आचार्यश्री को श्रीफल भेंट कर आशीर्वाद लिया।

    मुख्य मंत्री मोहन यादव ने आचार्यश्री की वंदना करने के बाद धर्मसभा के बीच कहा कि ये हमारा सौभाग्य है जो लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर में गुरुवर के आने से दिवाली और होली जैसे त्यौहार एक साथ मनाए जा रहे हैं। मैं सरकार की ओर से उनका ससंघ स्वागत वंदन करता हूं। विधानसभा में इससे पहले आचार्य श्री विद्या सागर महाराज के चरण भी पड़ चुके हैं। ये सुखद संयोग है कि कल प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के सेवाकाल के 25 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। माननीय प्रधान मंत्री ने अपने राजनैतिक जीवन में जीव दया और अहिंसा को आधार माना। शासन के मुखिया होने के नाते कई बार कठोर निर्णय भी लेने पड़ते हैं। मैं अपने ऐसे कर्मों के लिए भी सभी बांधवों से क्षमा मांगता हूं। क्षमा पर्व व्यक्ति के अंतर मन को मजबूत बनाता है। अहंकार का नाश कर क्षमा जीवन में सरलता सहजता लाती है।

     विधान सभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा धर्म के बिना जीवन अधूरा है। धर्म प्रकृति को देखा जाए तो जैन सिद्धांत त्याग, कठोरता,और समर्पण से सराबोर है।ये भावना सभी आमजन  के लिए भी अनुकरणीय है। लोग भिंड मुरैना को डकैत ग्रस्त इलाके के रूप में जानते रहे हैं।असलियत इस छवि से बिल्कुल अलग है। भिंड मुरैना में भी प्राचीन मंदिरों और आध्यात्मिक क्रियाओं माहौल रहा है। हम सभी का सौभाग्य है कि भारत भूमि संतों ऋषियों की तपस्या की भूमि रही है। संतो के आशीर्वाद ने इस भूमि को सोने की चिड़िया बनाया।आज ये देश एक बार फिर विश्व का नेतृत्व करने के लिए तैयार है। उन्होंने आचार्य श्री से कहा इस लोक तंत्र के मंदिर में पक्ष भी है और विपक्ष भी है। ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि सभी में सकारात्मकता और देश भक्ति की भावना रहे।हम सभी का ये लोक भी सुधरे और परलोक भी संवर जाए।

    आचार्य श्री समय सागर महाराज ने कहा जैन धर्म जाति वाद का धर्म नहीं है यहां वैराग्य और जीव दया की भावना से अहिंसा की उपासना की जाती है। अहिंसा व्यक्ति विशेष का नहीं मानव मात्र का वैश्विक धर्म है। प्रत्येक जीव सुख शांति चाहता है। क्षमा धर्म की उपासना के बिना सुख शांति नहीं रह सकती। आचार्य श्री विद्यासागरजी  ने हमेशा भारत से मांस निर्यात का विरोध किया। सरकारों ने उनकी बात को सुना और उस पर बड़ी हद तक अमल भी किया। आचार्य श्री ने कहा रिश्तों में विचारों के अंतर से क्रोध की अग्नि जलती हे इसे हम क्षमा रूपी नीर से बुझा सकते हैं। इसमें संयम की औषधि का भी लेप जरूरी है। आत्मानुशासन के बिना विश्व पर शासन करना कठिन है। राम कृष्ण, गौतम, नानक ने भी अहिंसा को आधार मान कर विश्व कल्याण की भावना का संदेश दिया।लोकतंत्र के मंदिर में भी हमारी यही भावना है कि सभी लोग अहिंसा का महत्व समझें और अपना जीवन सुखी बनाएं।

    स्वागत अध्यक्ष अखिलेंद्र जैन ने बताया आचार्य श्री की अगवानी विधान सभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने स्वयं अपने सभी अधिकारियों के साथ की।  आयोजन में मौजूद श्रद्धालु जय हिंद जय जिनेंद्र के जयकारे लगा रहे थे। आयोजन समिति के प्रमुख अध्यक्ष पंकज  सुपारी मुख्य संयोजक मनोज बांगा समाज सेवी मनोज प्रधान स्वागत अध्यक्ष अखिलेंद्र जैन ने मुख्य मंत्री विधान सभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर का सम्मान किया।

    कार्यक्रम में श्री दिगंबर जैन पंचायत कमेटी ट्रस्ट के अध्यक्ष पंकज जैन सुपारी, विद्योदय वर्धिनी चातुर्मास समिति के मुख्य संयोजक मनोज जैन बांगा,स्वागत अध्यक्ष अखिलेन्द्र जैन, एमपीनगर मंदिर निर्माण कमेटी के देवेन्द्र जैन(रुचि),राकेश जैन ओएसडी,हेमलता कोठारी,मप्र हाऊसिंग बोर्ड के अध्यक्ष ओम जैन,समेत अन्य गणमान्य अतिथि भी उपस्थित थे। स्वागत भाषण पंकज जैन ओर आभार मनोज बांगा ने व्यक्त किया संचालन पूर्व प्रशासनिक अधिकारी नितिन नांदगांवकर ने किया।

  • रिटायर्ड आईएएस राकेश अग्रवाल की हत्या किस उद्योगपति ने कराई

    रिटायर्ड आईएएस राकेश अग्रवाल की हत्या किस उद्योगपति ने कराई

    भोपाल 05 अक्टूबर (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर) सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी राकेश अग्रवाल की हत्या की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, मामला केवल लूट के लिए हत्या तक सीमित नहीं दिखाई दे रहा है। पुलिस की प्राथमिक जांच में केयरटेकर वरुण कुमार मुख्य संदेही है और वारदात के बाद उसके लगातार ठिकाने बदलने, मृतक का मोबाइल आगरा में मिलने, घर में गैस फैलाने की कोशिश और अग्रवाल से जुड़े करीब पांच करोड़ रुपये के पुराने वित्तीय विवादों ने जांच के कई रास्ते खोल दिए हैं।उनकी नौकरी के दौरान उन्होंने जिन प्रोजेक्ट पर काम किया उनसे जुड़े लोगों से भी जानकारी बटोरी जा रही है। हालांकि हत्या का अंतिम मकसद अभी पुलिस ने स्पष्ट नहीं किया है।

    30 सितंबर की रात सूरज नगर स्थित घर में राकेश अग्रवाल की हत्या हुई। प्रारंभिक पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार धारदार सर्जिकल ब्लेड से उनका गला काटा गया। घटनास्थल पर संघर्ष के स्पष्ट निशान नहीं मिले। पुलिस का अनुमान है कि वारदात उस समय हुई जब अग्रवाल सो रहे थे। हत्या के बाद घर की अलमारियों के ताले टूटे मिले। परिवार की ओर से सोने की चेन, अंगूठियां, महंगी घड़ियां, नकदी और मोबाइल सहित सामान गायब होने की जानकारी दी गई। इसी आधार पर पुलिस ने हत्या के साथ लूट/डकैती के कोण से भी जांच शुरू की।

    घटना के बाद सबसे महत्वपूर्ण सुराग केयरटेकर वरुण कुमार का गायब होना है। वह हत्या से करीब तीन दिन पहले ही एक निजी एजेंसी के माध्यम से अग्रवाल के घर काम पर आया था। वारदात के बाद वह घर से निकला और सीसीटीवी फुटेज में बैग के साथ दिखाई दिया। पुलिस ने उसके भागने का रूट तैयार किया है। ताजा जांच में उसकी गतिविधियां आगरा और फिर मथुरा-वृंदावन क्षेत्र तक पहुंची हैं। 5 अक्टूबर को पुलिस ने उसकी तलाश के लिए 50 हजार रुपये का इनाम घोषित किया और मध्यप्रदेश सहित पांच राज्यों में टीमें लगाई हैं।

    वरुण के भागने के दौरान मृतक का मोबाइल भी उसके साथ था। मोबाइल बाद में आगरा में मिला। वहां जिस युवक के पास फोन मिला, उसने पुलिस को बताया कि उसे मोबाइल रास्ते में पड़ा मिला था। पुलिस यह पता लगा रही है कि फोन वरुण से उस युवक तक कैसे पहुंचा। एक जांच कोण यह भी है कि वरुण ने फोन बेच दिया हो या किसी परिचित को दे दिया हो। मोबाइल की तकनीकी जानकारी और वरुण के पुराने नंबरों की गतिविधियों से उसके भागने की कड़ियां जोड़ी जा रही हैं।

    हत्या के बाद घर में गैस फैलने की घटना ने भी जांच को महत्वपूर्ण दिशा दी है। पुलिस के अनुसार रसोई में गैस सिलेंडर की पाइप लाइन अलग की गई थी और गैस हवा में फैल रही थी। पास में गर्म इलेक्ट्रिक प्रेस रखे जाने की बात भी जांच में सामने आई है। पुलिस को आशंका है कि हत्या के बाद घर में आग लगाकर साक्ष्य नष्ट करने की कोशिश की गई। यह बिंदु इस बात की जांच को महत्वपूर्ण बनाता है कि वारदात के बाद आरोपी केवल भागना चाहता था या घटनास्थल के सबूत मिटाने की भी योजना थी।

    जांच का एक दूसरा और महत्वपूर्ण सिरा अग्रवाल से जुड़े पुराने आर्थिक विवादों तक पहुंचा है। पुलिस को करीब पांच करोड़ रुपये से जुड़े दो मामलों की जानकारी मिली है। इनमें एक मामला करीब एक करोड़ रुपये का है, जिसमें गुरुग्राम निवासी अजीत पाटनी के खिलाफ अग्रवाल ने शिकायत की थी। आरोप था कि कंपनी में निवेश और बेहतर रिटर्न का भरोसा देकर उनसे रकम ली गई। दूसरा मामला करीब चार करोड़ रुपये की कथित धोखाधड़ी से जुड़ा बताया गया है, जिसमें अवधेश दुबे का नाम सामने आया है। दोनों मामले न्यायिक प्रक्रिया में बताए जा रहे हैं। पुलिस अब इन मामलों के दस्तावेज, वित्तीय लेनदेन और संबंधित लोगों से अग्रवाल के संपर्क की जांच कर रही है।

    इन आर्थिक विवादों को लेकर फिलहाल पुलिस ने हत्या से कोई सीधा संबंध स्थापित नहीं किया है। लेकिन जांच में इनका सामने आना महत्वपूर्ण है। पुलिस पिछले एक वर्ष के दौरान अग्रवाल के संपर्कों, फोन रिकॉर्ड, वित्तीय लेनदेन और निवेश संबंधी गतिविधियों की भी पड़ताल कर रही है। यही जांच यह स्पष्ट कर सकती है कि इन पुराने विवादों का हत्या से कोई संबंध था या वे केवल अलग-अलग मामले थे।

    जांच में सुपारी या पहले से योजना बनाकर हत्या किए जाने की संभावना की भी चर्चा हुई है। इसका आधार यह है कि वरुण को घर के अंदर की व्यवस्था और अग्रवाल की दिनचर्या की जानकारी बहुत कम समय में हो गई थी तथा हत्या के बाद उसने सामान लेकर भागने और कथित तौर पर साक्ष्य नष्ट करने का प्रयास किया। कुछ रिपोर्टों में पुलिस के हवाले से यह भी कहा गया है कि उसके आने से पहले घर की रेकी की गई थी या हत्या की योजना पहले से हो सकती थी। हालांकि इस कोण की पुष्टि अभी नहीं हुई है और पुलिस ने किसी कथित सहयोगी या सुपारी देने वाले व्यक्ति का नाम सार्वजनिक नहीं किया है।

    एक और महत्वपूर्ण सवाल केयरटेकर एजेंसी की भूमिका का है। वरुण को वर्मा होम हेल्थ केयर एजेंसी के माध्यम से काम पर भेजा गया था। जांच में एजेंसी के संचालन, वरुण के दस्तावेज और उसके पुलिस सत्यापन की प्रक्रिया की पड़ताल की जा रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार एजेंसी के पास वरुण का आधार, पैन और चरित्र प्रमाणपत्र था, लेकिन पंजाब के नाभा थाने से जारी चरित्र प्रमाणपत्र की वैधता 1 मई 2025 को समाप्त हो चुकी थी और भोपाल में नया पुलिस सत्यापन नहीं कराया गया था। एजेंसी के संचालन और पंजीयन को लेकर भी सवाल उठे हैं।

    पुलिस अब तक परिवार, घरेलू सहायकों, ड्राइवरों, माली, सफाईकर्मियों और अन्य लोगों सहित करीब 15 व्यक्तियों के बयान दर्ज कर चुकी है। वरुण के पिता, बहन और परिचितों से भी पूछताछ की गई है। पुलिस उसके पुराने मोबाइल नंबरों और डिजिटल संपर्कों को खंगाल रही है। ताजा जांच में यह भी सामने आया है कि उसके पुराने मोबाइल नंबर दोबारा सक्रिय हुए हैं, जिससे पुलिस उसके संपर्कों और संभावित मददगारों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है।

    इस हत्याकांड में अभी कई सवालों के जवाब बाकी हैं। क्या हत्या का उद्देश्य केवल लूट था? क्या आर्थिक विवादों का इससे कोई संबंध है? क्या वरुण ने अकेले वारदात की या किसी की मदद ली? आगरा में मिला मोबाइल वहां तक कैसे पहुंचा? गैस छोड़ने का उद्देश्य वास्तव में साक्ष्य मिटाना था या कोई दूसरा कारण था? और सबसे महत्वपूर्ण, वरुण को अग्रवाल के घर भेजने से पहले उसका सत्यापन किस स्तर पर हुआ था?

    फिलहाल पुलिस की तलाश वरुण कुमार पर केंद्रित है। उसकी गिरफ्तारी और पूछताछ के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि सूरज नगर की इस वारदात के पीछे लूट, व्यक्तिगत विवाद, पहले से रची गई योजना या किसी अन्य कारण की भूमिका थी। पांच करोड़ रुपये के पुराने वित्तीय विवाद और केयरटेकर की संदिग्ध गतिविधियां जांच के महत्वपूर्ण बिंदु जरूर बन गई हैं, लेकिन इनके बीच संबंध स्थापित होना अभी बाकी है।