कैसे मिले दिमागी नक्सलियों से मुक्ति

स्वतंत्र भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न केवल यह नहीं है कि गरीबी कितनी कम हुई, बल्कि यह भी है कि देश के नागरिक कितनी तेजी से समृद्ध हो रहे हैं। किसी भी राष्ट्र की सफलता का अंतिम पैमाना यह नहीं हो सकता कि उसने गरीबों की संख्या को किसी सीमा तक बनाए रखा या गरीबों को कुछ सुविधाएं उपलब्ध करा दीं। असली सफलता तब होगी, जब गरीब परिवार स्थायी रूप से गरीबी से बाहर निकलकर सम्मानजनक और संपन्न जीवन जीने लगें।

यही वह बिंदु है जहां आज भारत की विकास-यात्रा के सामने एक वैचारिक संघर्ष दिखाई देता है। एक विचारधारा विकास को मुख्यतः पुनर्वितरण, सब्सिडी और संरक्षण के चश्मे से देखती रही है। दूसरी सोच का आग्रह है कि देश की संपत्ति का आकार इतना बड़ा किया जाए कि अवसरों, रोजगार, उद्यम और आय के नए स्रोत लगातार पैदा हों। पहली सोच पूछती है कि उपलब्ध संसाधनों को कैसे बांटा जाए; दूसरी पूछती है कि संसाधनों और संपदा को कई गुना कैसे बढ़ाया जाए। भारत जैसे विशाल और युवा देश के लिए दूसरा प्रश्न अधिक निर्णायक है।

गरीब को गरीब बनाए रखना किसी भी अर्थ में सामाजिक न्याय नहीं हो सकता। सामाजिक न्याय का अर्थ यह होना चाहिए कि गरीब व्यक्ति को ऐसी शिक्षा, पूंजी, तकनीक, रोजगार और उद्यम का अवसर मिले जिससे वह अपनी आर्थिक स्थिति बदल सके। यदि कोई व्यवस्था लगातार गरीबी को एक स्थायी राजनीतिक पहचान में बदल देती है, तो वह अंततः गरीब को सशक्त नहीं बल्कि निर्भर बनाती है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकास मॉडल की एक प्रमुख विशेषता यही है कि उसमें बुनियादी सुविधाओं के विस्तार के साथ-साथ आर्थिक गतिविधियों, बुनियादी ढांचे, विनिर्माण, उद्यमिता, डिजिटल अर्थव्यवस्था और निवेश को महत्व दिया गया है। इसका उद्देश्य अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ाना है। लेकिन इस मॉडल की सफलता केवल बड़े आंकड़ों से तय नहीं होगी। इसकी असली परीक्षा यह है कि विकास का लाभ कितने व्यापक स्तर पर आय और अवसर में बदलता है।

यहीं तथाकथित “दिमागी नक्सल” वाली बहस को भी समझने की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री यदि उन वैचारिक शक्तियों की ओर संकेत करते हैं जो हर बड़े बुनियादी ढांचे, उद्योग, निजी निवेश या बाजार आधारित गतिविधि को संदेह की दृष्टि से देखती हैं, तो यह बहस गंभीर है। विकास परियोजनाओं पर सवाल उठाना लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन हर परियोजना को केवल इसलिए खारिज कर देना कि उससे पूंजी, उद्योग या आर्थिक विस्तार जुड़ा है, विकास की प्रक्रिया को बाधित कर सकता है।

प्रधानमंत्री के लाल किले के भाषण का मर्म आम लोग समझ सकें इसके लिए हमें व्यापक सामाजिक विमर्श खड़ा करना होगा। किसी भी विकास-विरोधी तर्क को “नक्सली” कह देना समाधान नहीं हो सकता। लोकतंत्र में पर्यावरणविद्, किसान संगठन, श्रमिक संगठन, सामाजिक कार्यकर्ता और विपक्षी दल सरकार की परियोजनाओं पर सवाल उठा सकते हैं। सरकार का दायित्व है कि वह प्रमाण, आंकड़ों और पारदर्शिता के साथ जवाब दे। असहमति और हिंसक उग्रवाद को एक ही श्रेणी में रखना लोकतांत्रिक विमर्श को नुकसान पहुंचाएगा।

वास्तविक चुनौती इससे कहीं बड़ी है। भारत को ऐसी विकास व्यवस्था बनानी है जिसमें पूंजी निर्माण और सामाजिक न्याय एक-दूसरे के विरोधी न दिखाई दें। बड़े उद्योगों की आवश्यकता है, लेकिन छोटे उद्यमों की भी। विदेशी निवेश की आवश्यकता है, लेकिन घरेलू उद्यमिता की भी। आधुनिक शहर चाहिए, लेकिन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करना होगा। संपत्ति निर्माण जरूरी है, लेकिन संपत्ति के अवसरों तक व्यापक पहुंच भी जरूरी है।

यहीं “अमीरी बढ़ाने” की अवधारणा को सही अर्थ में समझना होगा। इसका मतलब कुछ लोगों को और अमीर बनाना नहीं, बल्कि पूरे समाज की उत्पादक क्षमता बढ़ाना होना चाहिए। यदि आर्थिक वृद्धि रोजगार नहीं बनाती, यदि उत्पादकता नहीं बढ़ती, यदि छोटे उद्यम प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाते और यदि शिक्षा तथा कौशल कमजोर रहते हैं, तो केवल GDP बढ़ना पर्याप्त नहीं होगा।

भारत की राजनीतिक व्यवस्था की समस्या यह है कि चुनावी राजनीति अक्सर दीर्घकालीन संपत्ति निर्माण की तुलना में तात्कालिक लाभ को प्राथमिकता देती है। मुफ्त सुविधाएं तत्काल राजनीतिक लाभ दे सकती हैं, जबकि बेहतर स्कूल, बेहतर न्याय व्यवस्था, औद्योगिक गलियारे, कौशल विकास और प्रशासनिक सुधार का परिणाम वर्षों बाद दिखाई देता है। इसलिए राजनीतिक नेतृत्व के लिए दीर्घकालीन विकास की कीमत चुकाना आसान नहीं होता।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सीमा भी इसी लोकतांत्रिक वास्तविकता से जुड़ी है। वे चाहे जितनी तेजी से आर्थिक परिवर्तन की कल्पना करें, भारत की संस्थाएं, संघीय ढांचा, न्यायिक प्रक्रिया, राजनीतिक विरोध और सामाजिक विविधता उन्हें लगातार समझौते करने के लिए बाध्य करते हैं। प्रधानमंत्री के पास राजनीतिक शक्ति है, लेकिन वे लोकतंत्र की संस्थागत सीमाओं से बाहर जाकर परिवर्तन नहीं ला सकते।

इसलिए भारत की अगली लड़ाई किसी एक विचारधारा को पराजित करने की नहीं, बल्कि उस मानसिकता को बदलने की है जो गरीबी को स्थायी स्थिति मानती है। गरीब को संरक्षण की जरूरत हो सकती है, लेकिन उसका अंतिम लक्ष्य संरक्षण में बने रहना नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर होकर समृद्ध होना होना चाहिए।

गरीबी का सम्मान गरीब व्यक्ति का सम्मान है; गरीबी को स्थायी बनाना गरीब का सम्मान नहीं। भारत को ऐसी राजनीति और ऐसी प्रशासनिक संस्कृति चाहिए जो गरीबों की संख्या और निर्भरता दोनों घटाए तथा संपन्न, उत्पादक और अवसर-संपन्न नागरिकों की संख्या बढ़ाए।

अगर भारत को विकसित राष्ट्र बनना है तो सवाल यह नहीं होना चाहिए कि गरीबी को कैसे सुरक्षित रखा जाए। सवाल यह होना चाहिए कि हर भारतीय को गरीबी से बाहर निकलकर समृद्धि की दौड़ में शामिल होने का अवसर कैसे दिया जाए। यही विकास की सबसे बड़ी कसौटी है और आने वाले वर्षों में भारतीय लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा भी।

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