आसान हुई खुद को श्रेष्ठि बताने वाले कर चोरों की छानबीन

देश में आयकर देने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यह बदलाव केवल सरकारी राजस्व के लिए महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इस बात का संकेत भी है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा अब औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से जुड़ रहा है। वित्त वर्ष 2020-21 में 6.72 करोड़ आयकर रिटर्न दाखिल हुए थे, जो वित्त वर्ष 2024-25 में बढ़कर 9.19 करोड़ हो गए। यानी पांच वर्षों में रिटर्न दाखिल करने वालों की संख्या लगभग 36 प्रतिशत बढ़ी है। वित्त वर्ष 2013-14 में व्यक्तिगत आयकर रिटर्न की संख्या 3.91 करोड़ थी। इस दृष्टि से देखें तो एक दशक से कुछ अधिक समय में आयकर रिटर्न दाखिल करने वालों की संख्या दोगुने से भी अधिक हो गई है।सरकार ने काले धन को देश की अर्थव्यवस्था में लाने के लिए आयकर विभाग में कुशल लोगों की भर्तियां करने का अभियान चला रखा है,जाहिर है कि आने वाले समय में देश की आय को और भी ज्यादा उत्पादक कार्यों में लगाए जाने की प्रवृत्ति को बढ़ाया जा सकेगा।

करदाताओं की बढ़ती संख्या के साथ प्रत्यक्ष कर संग्रह में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वित्त वर्ष 2024-25 के शुरुआती आंकड़ों में 17 जून 2024 तक सकल प्रत्यक्ष कर संग्रह 5.16 लाख करोड़ रुपये था, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 4.22 लाख करोड़ रुपये से 22.19 प्रतिशत अधिक था। इसी अवधि में शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह 4.63 लाख करोड़ रुपये रहा, जिसमें व्यक्तिगत आयकर और प्रतिभूति लेनदेन कर का हिस्सा 2.81 लाख करोड़ रुपये था। अग्रिम कर संग्रह भी 27.34 प्रतिशत बढ़कर 1.49 लाख करोड़ रुपये पहुंचा था।

वित्त वर्ष 2024-25 के पूरे सरकारी खातों में केंद्र को शुद्ध कर राजस्व के रूप में लगभग 24.99 लाख करोड़ रुपये प्राप्त हुए। इससे स्पष्ट है कि कर संग्रह सरकार की विकास योजनाओं, राज्यों को करों के हस्तांतरण, बुनियादी ढांचे और सामाजिक योजनाओं के वित्तपोषण का सबसे महत्वपूर्ण आधार है।

लेकिन इन उपलब्धियों के बावजूद आयकर व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि देश की वास्तविक आर्थिक गतिविधि और घोषित कर योग्य आय के बीच मौजूद अंतर को किस प्रकार कम किया जाए। करदाताओं की संख्या बढ़ना अच्छी बात है, लेकिन केवल रिटर्न की संख्या बढ़ना पर्याप्त नहीं है। सवाल यह है कि जिन लोगों की वास्तविक आय कर योग्य सीमा में आती है, क्या वे सभी अपनी पूरी आय घोषित कर रहे हैं?

आयकर चोरी का स्वरूप भी अब बदल चुका है। पहले नकद लेन-देन और आय छिपाना इसके प्रमुख माध्यम माने जाते थे। अब फर्जी खर्च दिखाना, गलत कटौती और छूट का दावा करना, कारोबार का वास्तविक टर्नओवर कम बताना, फर्जी बिल और कागजी कंपनियों का इस्तेमाल करना, बेनामी संपत्ति रखना तथा अलग-अलग खातों और संस्थाओं के माध्यम से वास्तविक आय को विभाजित करना इसके आधुनिक तरीके हो सकते हैं। विदेशों में रखी संपत्ति और वित्तीय खातों की जानकारी भी कर प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण हो गई है।

इसलिए आयकर विभाग की भूमिका केवल रिटर्न की जांच करने वाले विभाग की नहीं रह सकती। उसे आधुनिक डेटा-आधारित कर प्रशासन में बदलना होगा। आज सरकार के पास आयकर रिटर्न के साथ-साथ टीडीएस, जीएसटी, बैंकिंग लेन-देन, प्रतिभूति बाजार, संपत्ति खरीद-बिक्री और अन्य वित्तीय गतिविधियों से जुड़ी बड़ी मात्रा में जानकारी उपलब्ध है। Annual Information Statement यानी AIS और Project Insight जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से विभाग डेटा एनालिटिक्स का इस्तेमाल कर रहा है। प्री-फिल्ड रिटर्न की व्यवस्था ने भी अनुपालन को आसान बनाया है।

अब आवश्यकता इस व्यवस्था को और अधिक वैज्ञानिक बनाने की है। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति की घोषित वार्षिक आय 10 लाख रुपये है, लेकिन उसके नाम पर करोड़ों रुपये की संपत्ति खरीद, बड़े निवेश, अत्यधिक वित्तीय लेन-देन या अन्य असामान्य गतिविधियां दिखाई देती हैं, तो सिस्टम को ऐसे मामले को स्वतः जोखिम श्रेणी में डालना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं कि हर ऐसे व्यक्ति को कर-चोर मान लिया जाए। पहले उसे अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर मिले और उसके बाद ही जांच आगे बढ़े। इससे ईमानदार करदाता भी सुरक्षित रहेगा और वास्तविक कर-चोरी पकड़ना भी आसान होगा।

इसी प्रकार ऐसे लोगों और संस्थाओं पर भी कार्रवाई आवश्यक है जो कर चोरी के लिए पूरा तंत्र तैयार करते हैं। फर्जी कटौती, नकली दस्तावेज, फर्जी बिल या गलत रिटर्न तैयार करने वाले बिचौलिये और संगठित नेटवर्क कर-चोरी को बढ़ावा देते हैं। केवल अंतिम करदाता पर कार्रवाई करके इस समस्या को समाप्त नहीं किया जा सकता। जिस व्यक्ति ने जानबूझकर गलत जानकारी दी और जिसने उसे गलत जानकारी देने का रास्ता उपलब्ध कराया, दोनों की भूमिका अलग-अलग जांची जानी चाहिए।

कर प्रशासन में एक और बड़ा सुधार यह होना चाहिए कि ईमानदार और कम जोखिम वाले करदाताओं को बार-बार जांच और नोटिस से परेशान न किया जाए। दूसरी ओर बड़े और असामान्य वित्तीय अंतर वाले मामलों की जांच अधिक गहराई से हो। कर विभाग के सीमित अधिकारियों और संसाधनों का उपयोग वास्तविक जोखिम वाले मामलों पर होना चाहिए।

फेसलेस असेसमेंट इस दिशा में महत्वपूर्ण सुधार है। 2019 में शुरू हुई फेसलेस ई-असेसमेंट व्यवस्था ने करदाता और आकलन अधिकारी के बीच प्रत्यक्ष संपर्क को कम किया है और प्रक्रिया को डिजिटल बनाया है। लेकिन तकनीक के साथ जवाबदेही भी जरूरी है। यदि किसी करदाता को नोटिस मिलता है तो उसे यह स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए कि विभाग ने कौन-सी सूचना के आधार पर सवाल उठाया है, उसे जवाब देने के लिए पर्याप्त अवसर मिले और अपील की प्रक्रिया सरल तथा समयबद्ध हो।

आयकर व्यवस्था में सुधार का एक महत्वपूर्ण पक्ष कानून को सरल बनाना भी है। नया आयकर कानून लागू होने के बाद सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि कानून की भाषा और प्रक्रियाएं वास्तव में आम करदाता के लिए कितनी सरल बनती हैं। कर कानून जितना जटिल होगा, करदाता उतना ही अधिक सलाहकारों और मध्यस्थों पर निर्भर रहेगा। सरल कानून का अर्थ केवल धाराओं की संख्या कम करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें सामान्य नागरिक अपनी आय, कटौती और कर देनदारी को बिना अत्यधिक तकनीकी सहायता के समझ सके।

कर चोरी रोकने के लिए नकदी आधारित अर्थव्यवस्था को लगातार सीमित करना भी जरूरी है। डिजिटल भुगतान और बैंकिंग व्यवस्था के विस्तार ने सरकार को वित्तीय गतिविधियों की बेहतर तस्वीर उपलब्ध कराई है। लेकिन छोटे कारोबारियों और नकद अर्थव्यवस्था से जुड़े क्षेत्रों को अचानक अपराधी की तरह देखने के बजाय उन्हें औपचारिक अर्थव्यवस्था में आने के लिए प्रोत्साहन देना अधिक प्रभावी होगा। अनुपालन जितना सरल और कम खर्चीला होगा, स्वैच्छिक कर भुगतान उतना ही बढ़ेगा।

सबसे महत्वपूर्ण सुधार करदाता और सरकार के बीच विश्वास का होना है। ईमानदारी से कर देने वाले नागरिक को यह महसूस होना चाहिए कि उसकी जानकारी सुरक्षित है, उसे अनावश्यक परेशान नहीं किया जाएगा और उसकी शिकायत का समय पर समाधान होगा। दूसरी ओर जानबूझकर आय छिपाने वाले बड़े करदाताओं, फर्जी लेन-देन करने वालों और संगठित कर-चोरी के नेटवर्क के प्रति व्यवस्था को कठोर होना चाहिए।

भारत में आयकर रिटर्न की संख्या 9 करोड़ से ऊपर पहुंच चुकी है। यह केवल एक आंकड़ा नहीं बल्कि बदलते भारत की आर्थिक तस्वीर है। अब चुनौती यह नहीं है कि अधिक से अधिक लोगों को किसी तरह कर-जाल में लाया जाए। चुनौती यह है कि जो व्यक्ति कानून के अनुसार कर देने योग्य है, वह अपनी वास्तविक आय घोषित करे; जो ईमानदारी से कर देता है उसे सुविधा मिले और जो जानबूझकर सार्वजनिक राजस्व को नुकसान पहुंचाता है, उसके लिए बच निकलने की गुंजाइश लगातार कम होती जाए।

कर संग्रह बढ़ना देश की आर्थिक शक्ति का संकेत है, लेकिन कर-न्याय उससे भी बड़ा लक्ष्य है। आने वाले समय में भारत की आयकर व्यवस्था की सफलता इस बात से मापी जानी चाहिए कि वह कितनी कम लागत में कितनी अधिक वास्तविक आय को कर-जाल में ला पाती है, ईमानदार करदाता को कितना कम परेशान करती है और संगठित कर-चोरी पर कितनी प्रभावी चोट करती है। यही वह संतुलन है जो भारत को व्यापक कर आधार, मजबूत राजस्व और अधिक न्यायपूर्ण आर्थिक व्यवस्था की ओर ले जा सकता है।

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