होशंगाबाद और राज्य के कई अन्य स्थानों से आए कथित किसानों ने आज दिन भर भोपाल की सड़कों पर तांडव मचाया। यातायात व्यवस्था गड़बड़ा गई। स्कूलों की छुट्टी कर दी गई। सरकार के मंत्रियों से लेकर आला अफसरों तक सभी तनावग्रस्त रहे। दिल्ली में काकरोच जनता पार्टी के धरने से बचाव की मुद्रा में आई भाजपा के लिए ये मुद्दा नया तनाव का कारण बन गया। काकरोच जनता पार्टी के कुछ लड़के भी इस आंदोलन में शामिल हो गए और उन्होंने भाजपा सरकार को घेरने का प्रयास किया। आंदोलन को सफल बनाने के लिए किसानों ने केन्द्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के घर का घेराव करके सरकार को ज्ञापन दिया। मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव राजधानी में नहीं थे इसलिए सरकार ने किसानों के प्रतिनिधियों को मंत्रालय बुलाया और उनकी समस्याओं पर चर्चा की।
दरअसल इस समस्या की वजह वाहवाही लूटने में सिद्धहस्त शिवराज सिंह चौहान सरकार रही है। उनके तत्कालीन कृषि मंत्री कमल पटेल ने गर्मियों में खाली पड़े खेतों में मूंग की साठ दिनों में पकने वाली फसलों की बुआई की प्रेरणा देकर कृषि उत्पादन बढ़ाने का प्रयास किया था। किसानों की वाहवाही लूटने के लिए शिवराज सिंह ने किसानों की मूंग समर्थन मूल्य पर खरीदने और बोनस देने की घोषणा भी की थी। कुछ समय तो ये खरीदी होती रही लेकिन बाद में सरकार एक नई समस्या में घिर गई। शिवराज सिंह सरकार ने जिस तरह कर्ज लेकर नई नई योजनाएं चालू कीं उससे उनकी सरकार को वाहवाही तो खूब मिली पर कर्ज के पहाड़ ने सरकार की कमर तोड़ दी। मूंग खरीदना सरकार के लिए सिरदर्द बन गया। एक ओर तो वह रबी की फसलों का गेहूं और चना खरीदकर पहले ही कर्ज के जाल में फंसी हुई थी। मूंग खरीदी ने उसे कर्ज के दलदल में गहरे तक पहुंचा दिया। सबसे बड़ी बात तो ये कि मूंग के खरीददार ही नहीं थे। घरों में अरहर की दाल खाई जाती है जबकि मूंग की खपत लगभग न के बराबर होती है। सरकार ने इसे अपनी राशन की दुकानों से भी आम लोगों को उपलब्ध कराना शुरु कर दिया इसके बावजूद उसे लेवाल नहीं मिले। गोदामों सड़ रही मूंग को सुरक्षित रखने के लिए सरकार को आज भी गोदामों पर भारी रकम खर्च करनी पड़ रही है। हालत ये हो गई है कि सरकार पर गोदामों का किराया बढ़ता जा रहा है और वह उसे चुकाने में भी अक्षम है।
न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर मूंग खरीदी और अन्य मांगों को लेकर किए जा रहे किसान आंदोलन को लेकर सरकार ने चार मंत्रियों की एक उच्च स्तरीय समिति गठित की है। खुद मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि उनकी सरकार किसानों के हितों की रक्षा करने के लिए संकल्पबद्ध है। इसके बावजूद किसानों की मांगों का निराकरण आनन फानन में किया जाना संभव नहीं है। किसान कह रहे हैं कि सरकार गर्मियों मे उत्पादित शत प्रतिशत मूंग खरीदे। एक चौथाई माल खरीदने का फार्मूला उन्हें मंजूर नहीं है। खरीदी के लिए किसान की बायोमेट्रिक जांच की अनिवार्यता भी समाप्त की जाए। खाद वितरण की ई टोकन वाली व्यवस्था बंद की जाए। हर मौसम में दस घंटे बिजली दी जाए। किसानों की इन मांगों को लेकर कृषि मंत्री एदल सिंह कंसाना ने केन्द्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर मूंग खरीदी का लक्ष्य 4.54 लाख टन से बढ़ाकर 8.06 लाख टन करने का अनुरोध किया है। राज्य सरकार की ओर से गठित मंत्रियों की समिति में शामिल कृषि मंत्री एदल सिंह कंसाना, सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग, पी डब्ल्यूडी मंत्री राकेश सिंह, और कृष्णा गौर लगातार किसान प्रतिनिधियों से चर्चा कर रहे हैं पर अभी तक कोई फार्मूला नहीं निकल पाया है। किसानों की इस खरीदी के लिए सरकार को खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग के माध्यम से कर्ज लेना पड़ेगा ।खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री गोविंद राजपूत किसानों का सामना करने के लिए तैयार नहीं हैं। इसकी वजह ये है कि उनके कार्यकाल में किसानों को फसल खरीदी ,खाद बीज वितरण और तमाम व्यवस्थाओं को लेकर चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।कृषि मंत्री एदल सिंह कंसाना और खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री गोविंद राजपूत दोनों कांग्रेस से भाजपा में आए थे और अभी तक राज्य के किसानों से संवाद स्थापित नहीं कर पाए हैं। मध्य प्रदेश राज्य नागरिक आपूर्ति निगम (NAN) पर पहले से ही लगभग ₹62,944.71 करोड़ (करीब 63,000 करोड़ रुपये) का भारी-भरकम बैंक कर्ज है। विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार इस कर्ज पर सरकार को प्रतिदिन करोड़ों रुपये का ब्याज भी चुकाना पड़ रहा है। हाल ही में सामने आई CAG (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) की रिपोर्ट के अनुसार, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग से जुड़े करीब ₹2,181 करोड़ के उपयोगिता प्रमाण-पत्र (Utilization Certificates) भी लंबित/बकाया हैं। ऐसे में सरकार को नया कर्ज मिलना एक बड़ी चुनौती है। राज्य पर पहले से ही लगभग पांच लाख करोड़ रुपओं का भारी भरकम कर्ज है और उसे हर महीने अपने कर्मचारियों के वेतन भुगतान पर भी कर्ज लेना पड़ रहा है। यही वजह है कि किसान आंदोलन के चलते सरकार को अपने वादे पूरे करने और प्रशासनिक आय व्यय को संतुलित करने की नई चुनौती सामने आ गई है।
यह आंदोलन केवल फसल बेचने का विवाद नहीं है। इसके पीछे किसानों की आय, सरकारी खरीद व्यवस्था, कृषि विपणन, वित्तीय अनुशासन और राजनीतिक विश्वास जैसे कई प्रश्न जुड़े हुए हैं। दूसरी ओर सरकार भी यह तर्क दे रही है कि खरीद प्रक्रिया नियमों के अनुसार संचालित होती है, संसाधनों की सीमाएं हैं और समाधान के लिए केंद्र सरकार से भी समन्वय आवश्यक है। ऐसे में यह विवाद किसान और सरकार के बीच संवाद तथा भरोसे की परीक्षा बन गया है।
मध्यप्रदेश देश के प्रमुख दलहन उत्पादक राज्यों में शामिल है। राज्य के अनेक जिलों में किसानों ने इस वर्ष बड़े पैमाने पर मूंग की खेती की। किसानों को विश्वास था कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर पर्याप्त खरीदी होगी और उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य मिलेगा। लेकिन खरीद की मात्रा, पंजीकरण, स्लॉट, गुणवत्ता परीक्षण तथा सीमित खरीद जैसे मुद्दों को लेकर असंतोष बढ़ता गया। किसानों का कहना है कि यदि सरकार घोषित समर्थन मूल्य पर पूरी खरीद नहीं करेगी तो उन्हें खुले बाजार में कम कीमत पर उपज बेचनी पड़ेगी, जिससे उनकी लागत भी नहीं निकल पाएगी।
इसी असंतोष ने धीरे-धीरे आंदोलन का रूप ले लिया। विभिन्न किसान संगठनों ने प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से भोपाल कूच किया। राजधानी में प्रदर्शन, धरना और मुख्यमंत्री निवास की ओर मार्च की कोशिश ने पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक महत्व दे दिया। प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बैरिकेडिंग, पुलिस बल और यातायात प्रतिबंधों का सहारा लिया। इससे एक ओर आम नागरिकों को असुविधा हुई तो दूसरी ओर आंदोलन को व्यापक मीडिया कवरेज मिला।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल आंदोलन को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि किसानों के विश्वास को बनाए रखना है। पिछले कुछ वर्षों में मध्यप्रदेश सरकार ने कृषि क्षेत्र में अनेक योजनाओं का विस्तार किया है। सिंचाई, फसल बीमा, कृषि यंत्रीकरण, प्राकृतिक खेती और समर्थन मूल्य पर खरीदी जैसे विषयों पर सरकार लगातार अपनी उपलब्धियां गिनाती रही है। ऐसे में यदि मूंग उत्पादक किसान ही असंतुष्ट दिखाई देते हैं तो विपक्ष को सरकार पर हमला करने का अवसर मिलना स्वाभाविक है।
इस पूरे विवाद का एक प्रशासनिक पक्ष भी है। समर्थन मूल्य पर खरीद केवल राज्य सरकार का विषय नहीं है। कई मामलों में केंद्र सरकार की नीतियां, खरीद की स्वीकृत मात्रा, भंडारण क्षमता, बजटीय प्रावधान और विपणन संस्थाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। इसलिए समाधान के लिए राज्य और केंद्र के बीच समन्वय आवश्यक होता है। यदि खरीद लक्ष्य सीमित है तो किसानों को उसकी जानकारी समय पर मिलनी चाहिए और यदि लक्ष्य बढ़ाने की आवश्यकता है तो उसके लिए शीघ्र निर्णय होना चाहिए।
आर्थिक दृष्टि से भी यह मुद्दा अत्यंत संवेदनशील है। किसान अपनी उपज बेचकर ही अगली फसल की तैयारी करता है। यदि भुगतान में देरी हो या समर्थन मूल्य पर बिक्री न हो सके तो उसके सामने बीज, उर्वरक, सिंचाई और श्रम की व्यवस्था करना कठिन हो जाता है। नकदी की कमी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करती है। इसलिए मूंग खरीदी का प्रश्न केवल एक फसल तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले कृषि चक्र पर भी उसका प्रभाव पड़ सकता है।
हालांकि सरकार का पक्ष भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। राज्य सरकार का कहना है कि वह किसान प्रतिनिधियों से लगातार चर्चा कर रही है, अधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए गए हैं और केंद्र सरकार से भी खरीद की सीमा बढ़ाने का आग्रह किया गया है। सरकार का दावा है कि उसका उद्देश्य किसानों को अधिकतम राहत देना है, लेकिन प्रशासनिक और वित्तीय प्रक्रियाओं का पालन भी आवश्यक है। यदि यह दावा व्यवहार में प्रभावी ढंग से दिखाई देता है तो आंदोलन की तीव्रता स्वतः कम हो सकती है।
यह भी ध्यान रखना होगा कि कृषि बाजार केवल सरकारी खरीद पर निर्भर नहीं रह सकता। दीर्घकाल में दलहन प्रसंस्करण उद्योग, निर्यात, भंडारण, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) और निजी बाजार की प्रतिस्पर्धा को मजबूत किए बिना ऐसी समस्याएं बार-बार सामने आती रहेंगी। यदि किसानों को सरकारी खरीद के अतिरिक्त मजबूत बाजार विकल्प मिलें तो समर्थन मूल्य पर दबाव भी कम होगा और आय के नए अवसर भी बनेंगे।
अंततः मूंग खरीदी का यह विवाद केवल एक मौसमी आंदोलन नहीं है। यह मध्यप्रदेश की कृषि व्यवस्था, सरकारी खरीद प्रणाली और किसानों के भरोसे की कसौटी बन गया है। सरकार के लिए यह अवसर भी है कि वह प्रभावी संवाद, पारदर्शी खरीद व्यवस्था और त्वरित निर्णय क्षमता का परिचय देकर किसानों का विश्वास और मजबूत करे। दूसरी ओर किसान संगठनों के लिए भी यह आवश्यक है कि वे अपनी मांगों को तथ्यपरक और रचनात्मक संवाद के माध्यम से आगे बढ़ाएं।
यदि इस पूरे घटनाक्रम से कोई सबसे बड़ा संदेश निकलता है तो वह यही है कि कृषि केवल उत्पादन का विषय नहीं है, बल्कि विश्वास का भी विषय है। जब किसान को अपनी उपज का उचित मूल्य समय पर मिलता है, तभी सरकार की कृषि नीति सफल मानी जाती है। इसलिए मूंग खरीदी पर उत्पन्न यह विवाद जितनी जल्दी संवाद और सहमति से सुलझेगा, उतना ही प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था और राजनीतिक स्थिरता के लिए बेहतर होगा।

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