भोपाल,23 जून(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड-यूसीसी) पर देश में जैसे ही चर्चा तेज होती है, विरोध के स्वर भी मुखर हो जाते हैं। कुछ राजनीतिक दल, धार्मिक संगठन और स्वयंभू समुदाय प्रतिनिधि इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर आघात बताने लगते हैं। विडंबना यह है कि जिस विषय पर व्यापक सामाजिक विमर्श होना चाहिए, उसी पर चर्चा को संदेह, भय और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के घेरे में डाल दिया जाता है। प्रश्न यह है कि आखिर समान नागरिक संहिता पर चिंतन और बहस से कट्टरपंथी तत्व इतने असहज क्यों दिखाई देते हैं?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करने का निर्देश दिया गया है। संविधान सभा में भी इस विषय पर गंभीर चर्चा हुई थी। संविधान निर्माताओं का उद्देश्य यह था कि एक आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्र में नागरिक अधिकार धर्म के आधार पर अलग-अलग न हों। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और संपत्ति जैसे नागरिक मामलों में सभी नागरिकों के लिए समान कानूनी व्यवस्था हो।
इसके बावजूद जब-जब यूसीसी का मुद्दा सामने आया, तब-तब विरोध के स्वर उभरे। कुछ मुस्लिम संगठनों और धार्मिक नेताओं ने इसे अल्पसंख्यकों की धार्मिक पहचान के लिए खतरा बताया। वर्षों से मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े संगठनों का यह तर्क रहा है कि व्यक्तिगत कानून धार्मिक स्वतंत्रता का हिस्सा हैं और उनमें हस्तक्षेप संविधान की भावना के विपरीत होगा। कुछ नेताओं ने यह तक कहा कि “समान नागरिक संहिता भारत की विविधता को कमजोर कर देगी।”
हालांकि विरोध करने वालों के इन तर्कों का दूसरा पक्ष भी है। यदि यूसीसी केवल नागरिक कानूनों तक सीमित है और धार्मिक पूजा-पद्धति, आस्था तथा धार्मिक परंपराओं को प्रभावित नहीं करता, तो फिर इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला कैसे माना जा सकता है? यही वह प्रश्न है जिसका स्पष्ट उत्तर विरोधी पक्ष प्रायः नहीं दे पाता।
विरोध का एक प्रमुख कारण सामाजिक सुधारों के प्रति कट्टरपंथी दृष्टिकोण भी है। इतिहास गवाह है कि जब-जब समाज में सुधार की कोशिश हुई, तब-तब परंपरा के नाम पर उसका विरोध हुआ। सती प्रथा का उन्मूलन हो, बाल विवाह पर रोक हो या महिलाओं को संपत्ति में अधिकार देने का प्रश्न—हर सुधार के सामने कट्टरपंथी ताकतें खड़ी दिखाई दीं। तीन तलाक का मामला भी इसका उदाहरण है। जब केंद्र सरकार ने तीन तलाक को अवैध घोषित किया, तब अनेक संगठनों ने इसका विरोध किया था। लेकिन बाद में बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाओं ने इसे अपने अधिकारों की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
सर्वोच्च न्यायालय ने भी अनेक मामलों में समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर टिप्पणी की है। शाहबानो प्रकरण में न्यायालय ने कहा था कि समान नागरिक संहिता राष्ट्रीय एकता और समानता को बढ़ावा देने में सहायक होगी। बाद के कई निर्णयों में भी न्यायपालिका ने यह संकेत दिया कि अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के कारण समान नागरिक अधिकारों की अवधारणा प्रभावित होती है।
कट्टरपंथी संगठनों की सबसे बड़ी चिंता वास्तव में धार्मिक पहचान से अधिक सामाजिक नियंत्रण को लेकर दिखाई देती है। जब किसी समुदाय के भीतर महिलाओं, बच्चों या कमजोर वर्गों को अधिक अधिकार मिलने की संभावना बनती है, तब पारंपरिक नेतृत्व की भूमिका सीमित होने लगती है। यही कारण है कि सुधारवादी प्रस्तावों का सबसे अधिक विरोध उन्हीं वर्गों से आता है, जिनका प्रभाव मौजूदा व्यवस्थाओं पर आधारित होता है।
यूसीसी के विरोध में कुछ राजनीतिक दलों ने भी बयान दिए हैं। उनका कहना है कि भारत की सांस्कृतिक विविधता को एक कानून में नहीं बांधा जा सकता। यह तर्क पहली नजर में आकर्षक लगता है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या विविधता का अर्थ नागरिक अधिकारों में भिन्नता होना चाहिए? भारत में आपराधिक कानून, कर कानून और संवैधानिक अधिकार सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होते हैं। फिर नागरिक मामलों में समानता को लेकर इतनी आशंका क्यों व्यक्त की जाती है?
दरअसल, यूसीसी का विरोध कई बार राजनीतिक गणित से भी प्रेरित दिखाई देता है। वोट बैंक की राजनीति ने दशकों तक इस विषय पर खुली बहस को प्रभावित किया। कई राजनीतिक दलों ने संवेदनशील मुद्दा मानकर इससे दूरी बनाए रखी। परिणामस्वरूप संविधान का एक महत्वपूर्ण निर्देश लंबे समय तक केवल बहस का विषय बनकर रह गया।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि समान नागरिक संहिता का समर्थन केवल किसी एक राजनीतिक विचारधारा तक सीमित नहीं है। अनेक महिला अधिकार संगठनों, सामाजिक सुधारकों और संवैधानिक विशेषज्ञों ने समय-समय पर इसकी आवश्यकता बताई है। उनका मानना है कि कानून के समक्ष समानता तभी संभव है, जब नागरिक अधिकार धर्म के आधार पर अलग-अलग न हों।
निस्संदेह, यूसीसी पर मतभेद हो सकते हैं। लोकतंत्र में असहमति का सम्मान होना चाहिए। लेकिन किसी विषय पर चर्चा शुरू होते ही उसे धार्मिक खतरे का नाम देना स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा नहीं है। यदि प्रस्ताव में कमियां हैं तो उन पर तर्कसंगत बहस होनी चाहिए, सुझाव दिए जाने चाहिए और व्यापक सहमति बनाने का प्रयास होना चाहिए। किंतु चर्चा से ही डरना और लोगों को भयभीत करना लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है।
आज भारत एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति है। ऐसे समय में नागरिकों के अधिकारों, महिलाओं की समानता और न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था पर गंभीर विचार आवश्यक है। समान नागरिक संहिता का उद्देश्य किसी धर्म को कमजोर करना नहीं, बल्कि संविधान में निहित समानता के सिद्धांत को मजबूत करना है। धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराएं अपने स्थान पर सुरक्षित रह सकती हैं, जबकि नागरिक कानून सभी के लिए समान हो सकते हैं।
अतः यह कहा जा सकता है कि समान नागरिक संहिता पर सबसे अधिक असहजता उन शक्तियों में दिखाई देती है, जिनकी राजनीति या सामाजिक पकड़ अलग-अलग पहचान आधारित व्यवस्थाओं पर निर्भर है। खुली बहस, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक न्याय की कसौटी पर यदि इस विषय का मूल्यांकन किया जाए, तो भय और भ्रम के बजाय तथ्य और तर्क सामने आएंगे। लोकतंत्र की शक्ति भी इसी में है कि वह कठिन विषयों पर संवाद से समाधान खोजे, न कि संवाद से ही परहेज करे।

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