Month: May 2026

  • बुलियन बाजार गिरा देगी मोदी की सोना न खरीदने की अपील

    बुलियन बाजार गिरा देगी मोदी की सोना न खरीदने की अपील


    भारत में सोना केवल एक धातु नहीं है; यह सामाजिक प्रतिष्ठा, पारिवारिक सुरक्षा, स्त्रीधन, ग्रामीण बचत और सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है। ऐसे में प्रधानमंत्री Narendra Modi ने लोगों से एक वर्ष तक सोना खरीदने से बचने की अपील की है। उनकी इस अपील ने देश भर में व्यापक बहस छेड़ दी है। मीडिया, अर्थशास्त्रियों, कारोबारी जगत और आम नागरिकों के बीच यह प्रश्न तेजी से उभरा है कि आखिर सरकार को ऐसा सार्वजनिक आग्रह क्यों करना पड़ा। क्या यह केवल एक सावधानीपूर्ण आर्थिक सलाह है, या फिर यह किसी गहरे आर्थिक दबाव का संकेत है?

    प्रधानमंत्री की अपील का तात्कालिक संदर्भ पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, तेल कीमतों में उछाल और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहे दबाव से जुड़ा माना जा रहा है। विभिन्न आर्थिक रिपोर्टों के अनुसार भारत हर वर्ष 700-800 टन तक सोना आयात करता है और अपनी जरूरत का 90 प्रतिशत से अधिक सोना विदेशों से खरीदता है। यह आयात बिल भारत के कुल आयात में बहुत बड़ा हिस्सा रखता है। दूसरी ओर भारत कच्चे तेल के लिए भी भारी आयात-निर्भर देश है। जब तेल और सोना दोनों महंगे होते हैं, तब डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर पड़ता है। इसी पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री ने लोगों से ईंधन, विदेशी यात्राओं और सोने की खरीद में संयम बरतने का आग्रह किया। वित्त वर्ष 2025-26 (FY26) में भारत के कुल आयात बिल में सोने की हिस्सेदारी लगभग 9% तक पहुँच गई है, जो कच्चे तेल के बाद दूसरी सबसे बड़ी आयातित वस्तुओं में से एक है। 2025-26 में सोने का आयात रिकॉर्ड 72 बिलियन अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुँच गया

    आर्थिक दृष्टि से देखें तो सरकार का वास्तविक संदेश “सोना मत खरीदिए” से अधिक “विदेशी मुद्रा बचाइए” का है। भारत का चालू खाता घाटा तब बढ़ता है जब आयात निर्यात से कहीं अधिक हो जाते हैं। सोना ऐसा आयात है जिसे आवश्यक नहीं बल्कि विवेकाधीन आयात माना जाता है। यदि नागरिक सोने की खरीद घटाते हैं, तो डॉलर की मांग कम हो सकती है, जिससे रुपये पर दबाव घटेगा और विदेशी मुद्रा भंडार को राहत मिलेगी। यही कारण है कि कई आर्थिक विश्लेषकों ने प्रधानमंत्री के वक्तव्य को “आर्थिक राष्ट्रवाद” और “संकट-प्रबंधन” के मिश्रण के रूप में देखा है।

    इस अपील के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक आयाम अधिक जटिल हैं। भारत में सोना निवेश से अधिक भावनात्मक संपत्ति है। विवाह, त्योहार और पारिवारिक सुरक्षा की अवधारणा उससे जुड़ी हुई है। ग्रामीण भारत में आज भी बड़ी संख्या में लोग बैंकिंग व्यवस्था की तुलना में सोने को अधिक भरोसेमंद मानते हैं। इसलिए ज्वैलरी उद्योग और स्वर्णकार संगठनों ने यह तर्क दिया कि आम नागरिकों और छोटे कारोबारियों से “त्याग” की अपेक्षा करना एकतरफा बोझ डालने जैसा है। कुछ व्यापारिक संगठनों ने कहा कि यदि सोने की खरीद घटती है, तो लाखों कारीगरों, छोटे जौहरियों और पारंपरिक उद्योगों की आजीविका प्रभावित होगी।

    दिलचस्प बात यह है कि बाजार ने इस अपील को केवल घरेलू आर्थिक संदेश के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक संकट की चेतावनी के रूप में भी पढ़ा। पश्चिम एशिया में संघर्ष, होर्मुज जलडमरूमध्य पर अनिश्चितता और तेल आपूर्ति पर खतरे ने भारत जैसी आयात-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं की चिंता बढ़ा दी है। यदि तेल महंगा होता है, तो परिवहन, खाद्य, उर्वरक और विनिर्माण लागत सब बढ़ते हैं। इसका सीधा असर महंगाई पर पड़ता है। ऐसी स्थिति में सरकार गैर-जरूरी आयातों को सीमित कर विदेशी मुद्रा की रक्षा करना चाहती है।

    वैश्विक राजनीति के स्तर पर भी यह अपील महत्वपूर्ण संकेत देती है। यह दर्शाती है कि आज की दुनिया में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते; उनका असर ऊर्जा बाजार, मुद्रा विनिमय, व्यापार संतुलन और घरेलू उपभोग तक फैलता है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा या सबसे बड़े देशों में से एक स्वर्ण उपभोक्ता है। यदि भारत में सोने की मांग घटती है, तो उसका असर अंतरराष्ट्रीय बुलियन बाजार पर पड़ सकता है।

    भारत में सोने के नियंत्रण (Gold Control) के नियम मुख्य रूप से जवाहरलाल नेहरू की सरकार के कार्यकाल के दौरान, 1962 में लाए गए थे। तत्कालीन वित्त मंत्री मोरारजी देसाई 1968 में इसे आधिकारिक रूप से लाए। हालांकि इसके शुरुआती नियम 9 जनवरी 1963 को ‘डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स’ (Defense of India Rules) के तहत लागू किए गए थे।इंदिरा गांधी सरकार ने 1960 के दशक के अंत में गंभीर विदेशी मुद्रा संकट और सोने की तस्करी को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए, जिसके तहत 1968 में गोल्ड कंट्रोल एक्ट (Gold Control Act,1968) को कड़ाई से लागू किया गया। इस कानून ने आम लोगों द्वारा सोने की छड़ें या सिक्के रखने पर रोक लगा दी । लोगों को अपने पास मौजूद पुराने सोने (छड़/सिक्के) को आभूषणों में बदलने और उनकी घोषणा (declaration) अधिकारियों के सामने करना अनिवार्य था। सुनारों को 14 कैरेट से अधिक शुद्धता के गहने बनाने पर पाबंदी थी।सुनारों के लिए लाइसेंस लेना अनिवार्य कर दिया गया और वे बहुत कम मात्रा में सोना रख सकते थे।1968 का गोल्ड कंट्रोल एक्ट अपने उद्देश्यों को पूरा करने में काफी हद तक विफल रहा और इसके विपरीत प्रभाव पड़े । सोने की भारी मांग के कारण अवैध तस्करी (Smuggling) बहुत बढ़ गई। सख्त नियमों के कारण, ग्रामीण और छोटे सुनारों का व्यवसाय ठप हो गया, जिससे उन्हें भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। लोगों को अपनी संपत्ति (सोना) रखने पर सरकारी छापे और जब्ती का डर सताने लगा, जिससे काफी नाराजगी पैदा हुई। 22 वर्षों तक लागू रहने के बाद, यह पाया गया कि यह कानून सोने की खपत को कम करने या विदेशी मुद्रा बचाने में नाकाम रहा। इस कानून के नकारात्मक परिणामों के कारण, इसे अंततः 1990 में निरस्त (Repeal) कर दिया गया।

    अंततः यह कहना उचित होगा कि यह अपील केवल सोना खरीदने के विरुद्ध अभियान नहीं है। यह उस बदलती वैश्विक व्यवस्था का संकेत है जिसमें आर्थिक सुरक्षा, विदेशी मुद्रा प्रबंधन और उपभोक्ता व्यवहार राष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा बनते जा रहे हैं। भारत फिलहाल किसी तत्काल आर्थिक आपदा के मुहाने पर खड़ा दिखाई नहीं देता, लेकिन सरकार यह संदेश अवश्य देना चाहती है कि आने वाला समय अधिक अनिश्चित और महंगा हो सकता है। ऐसे में “संयम” को आर्थिक देशभक्ति की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है।

  • सोमनाथ मंदिर निर्माण का चंदा जुटाने के लिए चलेगा अभियान

    सोमनाथ मंदिर निर्माण का चंदा जुटाने के लिए चलेगा अभियान

    भोपाल, 11 मई (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में मंत्रि-परिषद की बैठक मंत्रालय में सम्पन्न हुईं। मंत्रि-परिषद द्वारा प्रदेश के समग्र विकास और जन-कल्याण की दिशा में कई ऐतिहासिक निर्णय लिए गए। प्रदेश में बुनियादी ढांचे के सुदृढ़ीकरण, स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार, सिंचाई सुविधाओं और सामाजिक सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए विभिन्न विकास कार्यों और योजनाओं के लिए 29 हजार 540 करोड़ रुपये से अधिक की वित्तीय स्वीकृति प्रदान की है। सोमनाथ मंदिर निर्माण में योगदान के लिए एमपी के व्यापारियों को भी आयकर में छूट का लाभ मिलेगा। सरकार की ओर से निधि समर्पण अभियान की तरह कार्यक्रम चलाए जाएंगे जिसनें विभिन्न प्रतिष्ठानों को चंदा देने के लिए प्रेरित किया जाएगा।राज्य कैबिनेट की बैठक में लिए गए निर्णयों के बारे में लघु और मध्यम उद्योग मंत्री चेतन काश्यप ने आज यह जानकारी दी।

    सरकार ने लोक वित्त पोषित कार्यक्रमों एवं योजनाओं के परीक्षण और अनुमोदन के लिए 15 हजार 598 करोड़ रुपये और शहरी व नगरीय मार्गों के कायाकल्प तथा सुदृढ़ीकरण के लिए 6,900 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। सामाजिक सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिये गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले वृद्धजनों की पेंशन के लिए 6 हजार 116 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। इसके अतिरिक्त चिकित्सा क्षेत्र के विस्तार के लिए बुदनी में एमबीबीएस, नर्सिंग और पैरामेडिकल कॉलेज की स्थापना के लिए 763.40 करोड़ रुपये की पुनरीक्षित प्रशासकीय स्वीकृति दी गई। साथ ही जिले की खुमानसिंह शिवाजी जलाशय सिंचाई परियोजना के लिए 163.95 करोड़ रुपये की स्वीकृति के साथ ही राज्य मंत्रियों के स्वेच्छानुदान की राशि को बढ़ाकर 25 हजार रुपये करने का निर्णय लिया गया हैं। इसके साथ ही सड़क निर्माण कार्यों को गति देने के लिए 10 करोड़ से कम लागत के डामरीकरण कार्यों में मूल्य समायोजन और MPRDC अंतर्गत EPC तथा HAM परियोजनाओं में मासिक दर समायोजन की भी स्वीकृति दी गई है।


    मंत्रि-परिषद ने वित्त विभाग अंतर्गत लोक वित्त पोषित कार्यक्रमों, योजनाओं एवं परियोजनाओं के परीक्षण तथा प्रशासकीय अनुमोदन की प्रक्रिया से संबंधित योजना को 16 वें केन्द्रीय वित्त आयोग की अवधि (01 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031) तक योजनाओं के संचालन की निरंतरता के लिए कुल 15,598.27 करोड़ रूपये की स्वीकृति दी गई है।


    स्वीकृति अनुसार कोषालयों की स्थापना के लिए 683.50 करोड़ रूपये, लंबित देनदारियों के भुगतान से सम्बंधित योजना के लिए 13,818.32 करोड़ रूपये के साथ लेखा प्रशिक्षण शालाओं की स्थापना, विभागीय परिसंपत्तियों का संधारण, म.प्र. आंतरिक लेखा परीक्षण प्रकोष्ठ, निर्देशन एवं प्रशासन, संभागीय कार्यालयों की स्थापना और सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी परियोजनाएँ एवं कार्य के लिए 1,096.45 करोड़ रूपये की स्वीकृति दी गई है।


    मंत्रि-परिषद ने लोक निर्माण विभाग अंतर्गत शहरी एवं नगरीय मार्गों के नव निर्माण और उन्नयन सहित सड़कों के सुदृढ़ीकरण से संबंधित योजनाओं को सोलहवें वित्त आयोग की अवधि (1 अप्रैल, 2026 से 31 मार्च 2031) तक निरंतर संचालन के लिए 6 हजार 900 करोड़ रूपये की स्वीकृति दी है। स्वीकृति अनुसार शहरी एवं नगरीय मार्गों के नव निर्माण और उन्नयन के लिए 2,100 करोड़ रूपये और सड़कों के सुदृढ़ीकरण के लिए 4,800 करोड़ रूपये की स्वीकृति प्रदान की है।

    मंत्रि-परिषद ने सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग की राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (एन.एस.ए.पी.) अंतर्गत इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना के 1 अप्रैल 2026 से आगामी 5 वर्षों तक निरंतर संचालन के लिए 6115.99 करोड़ रूपये की स्वीकृति दी गई है। इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना 15 अगस्त 1995 से प्रभावशील है। योजना का क्रियान्वयन राज्य सरकार द्वारा किया जाता है। योजनान्तर्गत गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के वृद्धजनों को उनकी पात्रतानुसार 600 रूपये प्रतिमाह पेंशन राशि का भुगतान किया जाता है।

    मंत्रि-परिषद द्वारा सीहोर के बुदनी में एमबीबीएस, नर्सिंग और पैरामेडिकल महाविद्यालय की स्थापना के लिए 714.91 करोड़ रूपये के स्थान पर 763.40 करोड़ रूपये की पुनरीक्षित प्रशासकीय स्वीकृति दी गई है। स्वीकृति अनुसार बुदनी में 100 एम.बी.बी.एस. सीट प्रवेश क्षमता के नवीन चिकित्सा महाविद्यालय तथा 500 सीटर संबद्ध अस्पताल स्थापित किया जाएगा। साथ ही नर्सिग पाठ्यक्रमों के लिए 60 सीट प्रवेश क्षमता के नर्सिंग महाविद्यालय और पैरामेडिकल पाठ्क्रमों के लिए 60 सीट प्रवेश क्षमता के पैरामेडिकल महाविद्यालय की स्थापना भी की जायेगी।


    मंत्रि-परिषद द्वारा नीमच जिले की खुमानसिंह शिवाजी जलाशय (ठिकरिया तालाब) सूक्ष्म सिंचाई परियोजना के लिए लागत राशि 163.95 करोड़ रूपये की प्रशासकीय स्वीकृति दी गई है। इससे नीमच की नीमच तहसील के 22 ग्रामों की कुल 5,200 हैक्टेयर भूमि में सिंचाई सुविधा उपलब्ध होगी।


    मंत्रि-परिषद द्वारा राज्य मंत्रियों व्दारा दिए जाने वाले स्वेच्छानुदान की राशि में किसी एक प्रकरण के लिए वर्तमान में निर्धारित सीमा राशि 16,000 रूपये को बढ़ाकर 25,000 रुपये किए जाने की स्वीकृति प्रदान की गई है।

    मंत्रि-परिषद द्वारा उच्च न्यायालय, म.प्र. जबलपुर में गेट क्रमांक 4 और 5 के सामने मल्टीलेवल वाहन पार्किंग ब्लाक कम बार ऑफिस के निर्माण की लागत राशि 94 करोड़ 16 लाख रूपये की योजना के प्रस्ताव को विभागीय सूचकांक की गणना से मुक्त रखे जाने की स्वीकृति दी गई है।


    मंत्रि-परिषद ने प्रदेश में सड़क निर्माण कार्यों को गति देने के लिए 10 करोड़ से कम लागत के डामरीकरण कार्यों में मूल्य समायोजन को स्वीकृति दी है। निर्णय अनुसार लोक निर्माण विभाग के अंतर्गत 10 करोड़ रुपये से कम लागत वाले डामरीकृत मार्गों के निर्माण, नवीनीकरण और संधारण कार्यों के अनुबंधों में अब मूल्य समायोजन का लाभ दिया जाएगा। इसके लिए एक विशिष्ट फॉर्मूला [V = Q(W_f – W_o)] निर्धारित किया गया है, जिससे डामर की बढ़ी हुई दरों का बोझ संविदाकारों पर नहीं पड़ेगा। इससे छोटे और मध्यम स्तर के ठेकेदारों को बड़ी राहत मिलेगी और कार्य समय-सीमा में पूर्ण हो सकेंगे। वैश्विक स्तर पर डामर (बिटुमेन) की कीमतों में हो रही अप्रत्याशित वृद्धि को देखते हुए ठेकेदारों को मूल्य समायोजन का लाभ देने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है।


    इसके अतिरिक्त मंत्रि-परिषद ने मध्यप्रदेश सड़क विकास निगम के अंतर्गत संचालित EPC (Engineering, Procurement, and Construction) और HAM (Hybrid Annuity Model) परियोजनाओं में ‘Schedule-G’ और ‘Schedule-H’ के तहत मूल्य समायोजन की गणना त्रैमासिक के स्थान पर भारत सरकार के MoRTH (सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय) के नियमों के अनुसार मासिक आधार पर करने की स्वीकृति दी है।
    वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में भारी उछाल आया है, जिससे डामर की दरों में 20 से 30 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। इस कारण कई निर्माण कार्य प्रभावित हो रहे थे। मंत्रि-परिषद द्वारा दी गई यह राहत 1 मई 2026 से 30 जून 2026 तक की अवधि में क्रय किए गए बिटुमेन (डामर) के लिए लागू होगी।

  • एमपी के नए अभ्युदय में जुटे डॉ.मोहन यादव

    एमपी के नए अभ्युदय में जुटे डॉ.मोहन यादव

    • चैतन्‍य कुमार काश्‍यप

    भोपाल 09 मई(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री डॉ. मोहन यादव उच्‍च शिक्षित, जमीन से जुड़े संवेदनशील, ऊर्जावान, ओजस्‍वी और बहुआयामी व्‍यक्तित्‍व वाले सहृदयी जननेता हैं। शिक्षाविद् और राजनीतिज्ञ होने के साथ साहित्‍य और इतिहास में उनकी गहन रूचि है। संघर्षशील और दृढ़निश्‍चयी होना उनका स्‍वाभाविक गुण है। उनके मुख्‍यमंत्रित्‍व कार्यकाल में अनेक क्रांतिकारी कदम उठाये गये है, जिनके कारण मध्‍यप्रदेश चहुँमुखी विकास के पथ पर तीव्रगति से अग्रसर होते हुए मुख्‍यमंत्री के अभ्‍युदय मध्‍यप्रदेश के सपने को साकार कर रहा है।

    यशस्वी मुख्यमंत्री डॉ. यादव के 61वें जन्‍मदिन पर मेरी शुभच्‍छाएं है कि वे मध्‍यप्रदेश को विकसित और देश का अग्रणी राज्‍य बनाने में सफल हो। उनका कार्यकाल इतिहास के पन्‍नों में स्‍वर्ण अक्षरों में अंकित हो।

    उज्‍जैन के साधारण परिवार में जन्‍मे डॉ. मोहन यादव अपने परिश्रम के बलबूते छात्र राजनीति से होते हुए प्रदेश की सत्‍ता के शीर्ष तक पहुँचे है। शीर्ष पर रहते हुए भी वैचारिक जड़ों से जुड़े रहकर वे तकनीकी और प्रगतिशील सुधारों के पैरोकार बने हुए हैं। जनहितैषी और विकासोन्‍मुखी कार्यों से जहां वे अपनी लकीर को लम्‍बी कर रहे हैं, वहीं भाजपा की प्रतिबद्धताओं को धरातल पर उतारकर पार्टी लाइन को भी आगे बढ़ा रहे हैं।

    मुख्‍यमंत्री डॉ. यादव का फोकस प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के 2047 तक आत्‍मनिर्भर, समृद्ध और विकसित भारत बनाने के संकल्‍प को सिद्ध करने में मध्‍यप्रदेश का अधिकाधिक योगदान देने पर केन्द्रित है। इसके लिए उन्‍होंने विकसित मध्‍यप्रदेश का 2047 विजन डॉक्‍युमेंट तैयार किया है। इसमें कृषि, उद्योग, एमएसएमई, सिंचाई, ऊर्जा, शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य और पर्यटन को बढ़ावा देकर प्रदेश के बहुआयामी विकास को पंख देने पर जोर है। इन्‍हीं लक्ष्‍यों की प्राप्ति के लिए उन्‍होंने वर्ष 2025 को उद्योग एवं रोजगार और वर्ष 2026 को कृषि वर्ष घोषित किया है।

    उद्योग वर्ष में भोपाल में ग्‍लोबल इनवेस्‍टर्स समिट (GIS) आयोजित कर 30.70 लाख करोड़ रूपयों से ज्‍यादा के निवेश प्रस्‍ताव प्राप्‍त किए जिनमें से 8.57 लाख करोड़ रूपयों से ज्‍यादा के प्रस्‍ताव धरातल पर उतर चुके हैं। इसी समिट में प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी से 18 नई नीतियों का लोकार्पण कराया गया। इनमें एमएसएमई विकास नीति, स्‍टार्ट-अप नीति और औद्योगिक भूमि तथा भवन आवंटन प्रबंधन नियम भी शामिल है। इन नीतियों के क्रियान्‍वयन से प्रदेश में औद्योगिक गतिविधियां बढ़ी हैं और बड़े निवेशक आकर्षित हो रहे हैं।

    सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम श्रेणी के उद्यमियों को प्रोत्‍साहित करने तथा उद्योगों को बड़े शहरों की अपेक्षा संभाग, जिला और तहसील स्तर पर ले जाने के उद्देश्‍य से मुख्‍यमंत्री डॉ. यादव ने प्रदेश में रीजनल इन्‍डस्‍ट्री कॉन्क्लेव के आयोजन का नवाचार किया, जिसमें आशातीत सफलता प्राप्‍त हुई। इन कॉन्क्लेव की शुरूआत उज्‍जैन से हुई। जबलपुर, ग्‍वालियर, सागर, रीवा और नर्मदापुरम सहित कुल सात RIC हुईं। इनके अलावा रतलाम में रीजनल इन्‍डस्‍ट्री स्किल एण्‍ड एम्‍पलायमेंट कॉनक्‍लेव (RISE) का सफल आयोजन हुआ। मुख्‍यमंत्री जी ने देश-विदेश के अनेक प्रमुख शहरों में जाकर उद्योगपतियों और निवेशकों से सीधे संवाद किया। उन्‍होंने अनेक शहरों में ‘रोड-शो’ भी किए। मुख्‍यमंत्री का विजन है कि विकास केवल किसी विशेष क्षेत्र तक सीमित न रहकर समपूर्ण प्रदेश का संतुलित और समग्र विकास होना चाहिए। मुख्‍यमंत्री के ये कार्य दर्शातें हैं कि वे स्‍वयं औद्योगिक विकास के लिए दिन-रात समर्पित है और प्राण-पण से जुटे हुए हैं।

    मुख्‍यमंत्री डॉ. यादव की मंशानुरूप एमएसएमई भू-आवंटन प्रक्रिया को ऑनलाइन माध्‍यम से फेसलेस की गई है। साथ ही एमएसएमई को प्रोत्‍साहन राशि वितरण को भी ऑनलाइन किया गया है। विगत 2 वर्षों में 4065 इकाइयों को ऑनलाइन माध्‍यम से 2780.44 करोड़ की वित्‍तीय सहायता प्रदान की गई। वर्ष 2019 से लंबित देयताओं का संपूर्ण भुगतान कर दिया गया है। इससे उद्यमियों में उत्‍साह जनक वातावरण निर्मित हुआ है, जो छोटे उद्यमियों को आगे बढ़ने के लिये प्रोत्‍साहित कर रहा है। मुख्‍यमंत्री के मार्गदर्शन में एमएसएमई विभाग नए-नए नवाचारों के साथ उन्‍नति के नए सोपान रच रहा है। प्रदेश में 120 नए औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने का लक्ष्‍य हैं। प्रदेश 81 विधानसभा क्षेत्रों में भी औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने का काम किया जा रहा हैं। विभाग द्वारा प्रथम बार गोविंदपुरा भोपाल में फ्लेटेड इंडस्ट्रियल पार्क का विकास किया जा रहा है।

    इसके साथ ही प्रदेश में 19300 एकड़ भूमि में 48 औद्योगिक पार्क विकसित किए जा रहे है। इनमें पीएम मित्र टेक्‍स्‍टाइल पार्क-धार, मेडिकल डिवाइस पार्क-उज्‍जैन, मेगा लेदर फुटवेयर क्‍लस्‍टर-मुरैना, नवकरणीय ऊर्जा उपकरण विनिर्माण क्षेत्र मोहासा बाबई-नर्मदापुरम और रतलाम का मेगा इंडस्ट्रियल पार्क विकसित करने जैसी राष्‍ट्रीय महत्‍व की परियोजनाएं शामिल है। ये परियोजनाएं प्रदेश को विकास की नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगी।

    धार के पीएम मित्र टेक्‍स्‍टाइल पार्क, महेश्‍वर, चंदेरी और बुरहानपुर के वस्‍त्र उद्योगों से ‘म.प्र. को कॉटन केपिटल ऑफ इंडिया’ का दर्जा प्राप्‍त हुआ है। प्रधानमंत्री ने आशा व्‍यक्‍त की है कि मध्‍यप्रदेश भारत के औद्योगिक और आर्थिक भविष्‍य का आधार स्‍तंभ बनेगा।

    मुख्‍यमंत्री डॉ. यादव का मानना है कि कृषि की उन्‍नति के बिना विकास का सपना अधूरा है। प्रदेश की आर्थिक समृद्धि में कृषि क्षेत्र का बड़ा योगदान है। इसी को दृष्टिगत रखते हुए वर्ष 2026 को कृषक कल्याण वर्ष घोषित किया गया है। किसानों की आय दो गुनी करने के लक्ष्‍य की पूर्ति की दिशा में उन्‍हें समर्थन मूल्‍य पर बोनस दिया जा रहा है। भावान्‍तर योजना का नवाचार भी इसी दृष्टि से किया गया, जिसका अनुसरण अन्‍य राज्‍य भी कर रहे हैं।

    प्राचीनकाल से ही भारत में यह किंवदंती प्रचलित थी कि पारस पत्‍थर के स्‍पर्श से लोहा सोना हो जाता था। मुख्‍यमंत्री का मानना है कि वर्तमान समय में पारस पत्‍थर का काम पानी करता है, जब वह सूखे खेतों पर पहुँचता है तो फसलें लहलहाने लगती है। मुख्‍यमंत्री ने हर खेत को पानी पहुँचाने का संकल्‍प लिया है। इस संकल्‍प की सिद्धि के लिए उन्‍होंने केन-बेतवा और पार्वती-काली सिंध-चबंल तथा ताप्‍ती बेसिन मेगा रीचार्ज जैसी महत्‍वाकांक्षी अंतर्राज्‍यीय नदी जोड़ो परियोजनाओं को उत्‍तरप्रदेश, राजस्‍थान और महाराष्‍ट्र सरकारों के साथ मिलकर धरातल पर उतारने का काम शुरू किया है।

    आकर्षक राहत प्रदान कर कृषि पर आधारित उद्योगों को प्रोत्‍साहित किया जा रहा है, जिससे किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्‍य मिल सके और स्‍थानीय युवाओं को रोजगार प्राप्‍त हो सके। औद्योगिक क्षेत्र से जुड़ी परियोजनाओं के पूर्ण होने पर मध्‍यप्रदेश उन्‍नति के शिखर पर पहुँचकर आत्‍मनिर्भर, विकसित और समृद्धशाली भारत के निर्माण में अद्वितीय और अमूल्‍य योगदान देने में सफल होगा और प्रगति के पथ का आधार स्‍तंभ बनेगा।

     (लेखक- मध्‍यप्रदेश सरकार के एमएसएमई मंत्री है।)

  • मध्यप्रदेश में अब मधुमेह का आधुनिक उपचार संभव

    मध्यप्रदेश में अब मधुमेह का आधुनिक उपचार संभव


    भोपाल, 06 अप्रैल(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, मध्यप्रदेश ने राज्य में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को सशक्त बनाने के उद्देश्य से सनोफी इंडिया लिमिटेड के साथ एक महत्वपूर्ण एमओयू किया है। इस साझेदारी का उद्देश्य मधुमेह जैसे गैर-संचारी रोगों के प्रति जागरूकता बढ़ाना, उनकी शीघ्र पहचान और उपचार को प्रोत्साहित करना और दुर्लभ रोगों से पीड़ित मरीजों को बेहतर सहयोग प्रदान करना है। एमओयू पर मिशन डायरेक्टर, एनएचएम मध्यप्रदेश डॉ. सलोनी सिडाना और मैनेजिंग डायरेक्टर, सनोफी इंडिया लिमिटेड श्री दीपक अरोड़ा द्वारा हस्ताक्षर किए गए। इस दौरान अपर मुख्य सचिव लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा श्री अशोक बर्णवाल, आयुक्त श्री धनराजू एस सहित विभागीय वरिष्ठ अधिकारी एवं संस्था के प्रतिनिधि उपस्थित थे।


    एमडी, एनएचएम डॉ. सिडाना ने कहा कि यह पहल विशेष रूप से दूरस्थ और वंचित क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच को मजबूत करेगी। उन्होंने बताया कि मोबाइल मेडिकल यूनिट्स के माध्यम से लोगों को उनके क्षेत्र में ही निःशुल्क जांच, उपचार और डॉक्टरों से टेली-परामर्श की सुविधा मिलेगी। साथ ही मधुमेह एवं अन्य गैर-संचारी रोगों के लिए जागरूकता, प्रारंभिक जोखिम पहचान और रेफरल सेवाओं को सुदृढ़ किया जाएगा। उन्होंने कहा कि दुर्लभ रोगों के लिए शीघ्र पहचान, निःशुल्क जांच और बेहतर उपचार व्यवस्था विकसित की जाएगी, जिससे मरीजों को समय पर उचित देखभाल मिल सके। उन्होंने यह भी कहा कि स्कूल स्तर पर बच्चों को स्वास्थ्य, पोषण और जीवनशैली से संबंधित सही जानकारी देना अत्यंत आवश्यक है, ताकि वे स्वयं स्वस्थ आदतें अपनाने के साथ अपने परिवार और समुदाय में भी जागरूकता फैला सकें। मैनेजिंग डायरेक्टर, सनोफी इंडिया श्री अरोड़ा ने भारत में बढ़ते एनसीडी के दृष्टिगत शीघ्र पहचान की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि सनोफी स्वास्थ्य प्रणाली को सशक्त बनाने और मरीजों के बेहतर परिणाम सुनिश्चित करने के लिए इस तरह की साझेदारियों के प्रति प्रतिबद्ध है।


    यह साझेदारी राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए कई प्रमुख क्षेत्रों में कार्य करेगी। इसके तहत दुर्लभ रोगों के निदान और उपचार व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाएगा, जिसमें स्वास्थ्यकर्मियों का प्रशिक्षण, उन्नत तकनीकों के माध्यम से शीघ्र पहचान तथा चयनित बीमारियों की निःशुल्क जांच की सुविधा चिन्हित संस्थानों में उपलब्ध कराई जाएगी। साथ ही मधुमेह एवं अन्य एनसीडी के लिए प्रारंभिक जोखिम पहचान, जागरूकता अभियान और रेफरल सेवाओं को मजबूत किया जाएगा, जिसमें राज्यभर में तकनीकी सहयोग भी प्रदान किया जाएगा। स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंतर्गत “किड्स एंड डायबिटीज इन स्कूल्स (KiDS)” जैसे अभियानों के माध्यम से विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं अभिभावकों को स्वस्थ जीवनशैली, पोषण और रोगों की रोकथाम के प्रति जागरूक किया जाएगा। इसके अतिरिक्त डॉक्टरों, नर्सों, पैरामेडिकल स्टाफ एवं सामुदायिक कार्यकर्ताओं के लिए क्षमता निर्माण के तहत संरचित प्रशिक्षण कार्यक्रम और तकनीकी सत्र आयोजित किए जाएंगे।


    एमओयू के तहत सिंगरौली, बालाघाट और अनूपपुर जिलों में मोबाइल मेडिकल यूनिट्स की तैनाती की जाएगी, जिससे दूरस्थ एवं वंचित क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंच सकेंगी। इन यूनिट्स के माध्यम से मधुमेह, उच्च रक्तचाप और मुख कैंसर जैसी बीमारियों की निःशुल्क जांच और उपचार की सुविधा उपलब्ध होगी। प्रत्येक यूनिट में प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी तैनात रहेंगे तथा डॉक्टरों से टेली-कंसल्टेशन की सुविधा भी प्रदान की जाएगी। प्रारंभिक चरण में यह सेवा इन तीन जिलों में शुरू की जाएगी और आवश्यकता अनुसार अन्य जिलों में भी विस्तार किया जाएगा।