Month: April 2026

  • कांग्रेस की हांडी चढ़े भी तो कैसे

    कांग्रेस की हांडी चढ़े भी तो कैसे


    भारत की जनता अब कांग्रेस के नेताओं और प्रवक्ताओं की बदजुबानी झेलने तैयार नहीं है। कांग्रेस कुमार राहुल गांधी ने जिस अंदाज में ऊल जलूल बयानबाजी शुरु की उसी रौ को उनके कार्यकर्ताओं ने भी अपना लिया। शिव खेड़ा के बयान के बाद असम पुलिस ने जो छापामारी की उससे चिचियाते कांग्रेस नेताओं ने इसे राजनैतिक विद्वेष से की गई कार्रवाई बताना शुरु कर दिया था। इसी को लेकर शिव खेड़ा सुप्रीम कोर्ट भी दौड़े पर वहां उन्हें निराशा हाथ लगी।


    इस मामले में जब विषय सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, तो अदालत ने प्रथम दृष्टया पुलिस की कार्रवाई को गलत नहीं माना। इसका सीधा अर्थ यह नहीं है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर दिया गया है, बल्कि यह कि संविधान के तहत दी गई स्वतंत्रता पूर्णतः निरंकुश नहीं है। अनुच्छेद 19(1)(a) के साथ-साथ अनुच्छेद 19(2) भी लागू होते हैं, जो राज्य को सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टता और राष्ट्रीय एकता के हित में सीमाएं तय करने का अधिकार देते हैं।


    यहां मध्यप्रदेश में कांग्रेस के प्रवक्ता के.के.मिश्रा ने भी राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव के फैसले को निशाना बनाकर पत्रकारों को उकसाने का प्रयास किया। सरकार ने तो इस विषय पर असम की तरह कोई प्रतिक्रिया नहीं दी लेकिन पत्रकारों ने इस दांव को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। इसकी वजह साफ थी कि मंत्रालय के गलियारों में घूमने वाले पत्रकार आला अफसर की सख्त और नियमों का पालन करने वाली शैली से पहले ही अवगत थे। उन्हें मालूम था कि राजस्व जैसे जिम्मेदार महकमे को संभालते हुए लिए वे प्रदेश हित को हमेशा सर्वोपरि रखते रहे हैं। कोई लाग लपेट, प्रलोभन या चमचागिरी उन्हें प्रभावित नहीं करती है।


    यही वजह है कि लगभग दो हफ्ते पहले जब कांग्रेस प्रवक्ता के.के.मिश्रा ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि पीएस महोदय ने लावारिस लाशों के अंतिम संस्कार के नाम पर एनजीओ चलाने वाले पत्रकार को धक्के मारकर अपने कमरे से बाहर निकाल दिया। इस पर कुछेक पत्रकारों को लगा कि ये तो पत्रकारों का अपमान हुआ है। के.के.मिश्रा की कांग्रेस से सहानुभूति रखने वाले कतिपय पत्रकारों ने भी सुर में सुर मिलाकर कहा कि हम ईंट से ईंट बजा देंगे।उस वक्त कांग्रेस के सेनानियों को लगा कि शायद अब पत्रकार भड़क उठेंगे और पीएस महोदय के विरुद्ध हमला बोल देंगे। आज लगभग दो हफ्ते बीत जाने के बाद भी कहीं कोई सुगबुगाहट सुनाई नहीं दी है। सरकार ने तो इस घटना को लगभग अनसुना कर दिया। प्रशासनिक तबके ने इसे खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे जानकर मुंह फेर लिया। पत्रकारों ने आपस में पूछताछ की और उन्हीं पत्रकार महोदय को दर किनार कर दिया।


    पत्रकारों ने जब तहकीकात की तो पता चला कि एनजीओ चलाने वालों ने जेल पहाड़ी की बेशकीमती जमीन पर अतिक्रमण करके बड़ा भवन बना लिया है। इस पूरी तरह अवैध निर्माण को दिखाकर कई बैंकों ,सांसद,नेताओं और अफसरों से अच्छा खासा चंदा वसूला जाता है। लगभग चार एंबुलेंस जुटा ली हैं जो समाजसेवा का वजन बढ़ाने में इस्तेमाल होती हैं। हालांकि उनका इस्तेमाल लगभग न के बराबर होता है। इसकी वजह है कि नगर निगम भोपाल ने अपनी निःशुल्क शव वाहन सेवा चला रखी है। कई अन्य धार्मिक संस्थाएं भी शव वाहन उपलब्ध कराती हैं। फोन लगाकर बुलाई जाने वाली एंबुलेंस सेवा भी उपलब्ध है । राजधानी में आपातकालीन सेवाएं इतनी ज्यादा हो गईं हैं कि इन गाड़ियों की जरूरत ही नहीं पड़ती है।

    शवों की चीरफाड़ करने वाले कंपाऊंडर से भेलकर्मी बनकर रिटायर हुए इन समाजसेवी महोदय की वरिष्ठता को देखकर और अंतिम संस्कारों की कहानियों को सुनकर जनसंपर्क महकमा भी उनकी सेवा कर देता है। उन्हें श्रद्धानिधि के रूप में पेंशन भी मिलती है और एनजीओ के विशेषांक के नाम पर विज्ञापन भी मिलता है। कई अन्य अखबारों और संस्थाओं के नाम पर भी वे चंदा और विज्ञापन वसूल लेते हैं। उनके बेटे नामी बिल्डर हैं और अफसरों नेताओं के साथ मिलकर बेशकीमती जमीनों की खरीद फरोख्त भी करते रहते हैं। कुछ पत्रकारों को खुश करके वे अपनी समाजसेवा की शान में वाहवाही भी लिखवा लेते हैं।


    बरसों से चलती आ रही इस व्यवस्था की मजबूती देखकर उन्होंने जिला प्रशासन से जमीन आबंटन की फाईल भी चलवा ली। कलेक्टर और संभागायुक्त कार्यालय से भी फाईल चली जो मंत्रालय पहुंच गई। फाईल जब प्रमुख सचिव महोदय के कमरे में पहुंची तो पीछे से आदरणीय भी पहुंच गए। उन्होंने नाराजगी भरे लहजे में कहा कि इतना लंबा समय हो गया है और मेरी जमीन का आबंटन नहीं हो पाया है। इस पर आला अफसर ने ये कहते हुए फाईल लौटा दी कि वह करोड़ों रुपये मूल्य वाली बेशकीमती जमीन किसी अन्य शासकीय सेवा के लिए आरक्षित है । समाज की गैर जिम्मेदारियों और आपराधिक वारदातों की वजह से कथित तौर पर लावारिस लाशें मिलती हैं। हम इसे संस्थागत रूप देकर सामाजिक स्वीकृति नहीं दे सकते। ये आपराधिक षड़यंत्र है और इसका सख्ती से इलाज होना चाहिए। शासन इसके लिए मुफ्त में जमीन क्यों देगा।लाशों के अंतिम संस्कार के लिए कई प्रकल्प मौजूद हैं। सरकार भी इस पर खासी राशि खर्च करती है ।


    साहब का तमतमाया रुख देखकर एनजीओ संचालक के होश उड़ गए। तब उन्होंने पैंतरा बदला कि आप मेरी उम्र का तक लिहाज नहीं कर रहे हैं। इस पर अफसर महोदय ने कहा कि आप आदर से बैठिए हम अभी चाय भी पिलाते हैं। वहां से तो चाय पीकर वे वापस आ गए पर अपनी नाराजगी उन्होंने कई जगह साझा की। उन्होंने कहना शुरु कर दिया कि अफसर महोदय ने तो उनकी फाईल फेंक दी और कहा कि लावारिस लाशों के लिए सरकार जमीन थोड़ी बांटती फिरेगी।
    इस घटना की गूंज उन सभी लोगों के बीच हुई जिनके प्रस्ताव शासन से रिजेक्ट होकर वापस लौट चुके हैं। उनमें से कुछ लोगों ने कांग्रेस के खेमें में जाकर ये कहानी सुनाई। सत्ता पक्ष में घुसपैठ जमाए बैठे भू माफिया ने भी इस कहानी में नमक मिर्च लगाकर हवा दी। नतीजा के.के.मिश्रा के बयान के रूप में सामने आया।


    मध्यप्रदेश के इतिहास में लंबे समय बाद ऐसा कार्यकाल आया है जब प्रशासनिक मशीनरी को खैराती प्रदेश की छवि से बाहर निकलकर आत्म निर्भर प्रदेश के रूप में खड़ा करने के लिए निर्देशित किया गया है। खुद मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव अपनी राजनीतिक जरूरतों के लिए अफसरों को टोकने और प्रभावित करने से बचते हैं। भाजपा के लंबे शासनकाल के बावजूद मध्यप्रदेश की आर्थिक स्थिति कई चुनौतियों से घिर गई है। उमा भारती की भाजपा तो पंच ज जैसे आत्मनिर्भर सिद्धांत को लेकर सत्ता में आई थी। ये विचार चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला से निकला हुआ था। उनके बाद आए बाबूलाल गौर हों या शिवराज सिंह चौहान दोनों ने विकास की चमक दमक को जमीन पर उतारने के लिए भरपूर कर्ज लिया। बीच में आई कांग्रेस की कमलनाथ सरकार इंस्पेक्टर राज वापस ले आई और उस दौरान प्रशासन इतना बेलगाम हो गया कि हर सरकारी पद मंहगी कीमतों में बिकने लगा।


    अब जबकि प्रदेश लगभग साढ़े चार लाख करोड़ के कर्ज में डूबा हुआ है तब सरकार और शासन सभी को अनियंत्रित अर्थव्यवस्था की आहट सुनाई देने लगी है। वैश्विक चुनौतियों ने इन हालात को और गंभीर बना दिया है। सरकारी कर्मचारियों के मन में भी संदेह के बादल इस तरह घुमड़ रहे हैं कि वे पूछते हैं कि आगे हम लोगों का वेतन भी मिल पाएगा या नहीं ।ऐसे हालात में एक आला अफसर की सख्ती को निशाना बनाकर कांग्रेस के नेतागण अपनी खोखली और गैर जिम्मेदार सोच को ही उजागर कर रहे हैं। कांग्रेस के नेतागण अपनी हताशा में कभी प्रेस पर गोदी मीडिया का लेबल चिपकाने का प्रयास करते हैं कभी पत्रकारिता की आड़ में पल रहे भू माफिया को आगे करके सरकार और शासन को बदनाम करने की कोशिशें करते हैं। अपनी असफलताओं के लंबे दौर के बाद भी कांग्रेस के नेतागण ये मानने राजी नहीं हैं कि काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती।

  • अब आधी आबादी को मिलेगा फैसले लेने का हक

    अब आधी आबादी को मिलेगा फैसले लेने का हक

    नारी शक्ति वंदन अधिनियम:

    मध्यप्रदेश विधानसभा में नारी शक्ति वंदन अधिनियम को पारित कर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार ने केवल एक विधायी पहल नहीं की, बल्कि उस व्यापक राष्ट्रीय एजेंडे को मजबूती दी है जिसमें भारत की आधी आबादी को आर्थिक और राजनीतिक रूप से निर्णायक भूमिका में लाने की परिकल्पना की गई है। यह अधिनियम महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने का प्रावधान रखता है और लोकतंत्र की संरचना में एक ऐसा बदलाव प्रस्तावित करता है, जो आने वाले समय में सत्ता और समाज दोनों के चरित्र को प्रभावित कर सकता है।


    भारतीय सामाजिक ढांचे की एक पुरानी सच्चाई यह रही है कि एक व्यक्ति कमाता है और कई लोग उसी आय पर निर्भर रहते हैं। इस व्यवस्था ने न केवल परिवारों की आर्थिक क्षमता को सीमित किया, बल्कि देश की उत्पादकता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाला। यदि महिलाओं को बड़े पैमाने पर कार्यबल और निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में शामिल किया जाता है, तो यह केवल सामाजिक न्याय नहीं बल्कि आर्थिक विकास का भी प्रश्न बन जाता है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम इसी सोच को संस्थागत रूप देने का प्रयास करता है।


    मध्यप्रदेश और कई अन्य राज्यों में पहले ही लाड़ली बहना सरीखी योजनाएं लाकर भारतीय जनता पार्टी ने महिलाओं को विकास की मुख्य धारा में लाने का प्रयास किया था। ये योजनाएं सफलता पूर्वक चलती जा रही हैं। मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव ने सदन में भी संकल्प दुहराया है कि उनकी सरकार महिलाओं को दी जाने वाली राशि बढ़ाकर छह हजार रुपए तक कर देगी। जबकि राज्य सरकार के पास आर्थिक संसाधन पर्याप्त नहीं हैं। जाहिर है कि सरकार अपनी इस निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ाना चाहती है जो वस्तुस्थिति स्वयं देखकर फैसला कर पाएंगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्र की भाजपा सरकार ने इस विधेयक का जो हश्र ऊंचे सदनों में देखा उसके बाद अब उनकी पार्टी ने राज्यों से एक तरह जन जागरण का ही प्रयास शुरु कर दिया है। सदन में प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने परिसीमन को मुद्दा बनाकर बहिर्गमन कर दिया और प्रस्ताव पारित नहीं किया इससे ये संदेश निचले स्तर तक चला गया है कि कांग्रेस आजादी के बाद से महिलाओं को सत्ता में संवैधानिक भागीदारी देने में अडंगा लगाती रही है। छुटपुट महिला नेतृत्व को अपनी उपलब्धियां बताते हुए कांग्रेस ने जो बात सदन में रखी उसका खमियाजा उसे आगामी चुनावी राजनीति में उठाना पड़ सकता है।
    स्थानीय निकायों—पंचायतों और नगरपालिकाओं—में महिलाओं को आरक्षण का अनुभव पहले ही सकारात्मक संकेत दे चुका है। अनेक महिला जनप्रतिनिधियों ने प्रशासनिक दक्षता और जनसरोकारों के प्रति संवेदनशीलता का परिचय दिया है। लेकिन विधायिका के उच्च स्तर पर उनकी भागीदारी अब तक सीमित रही है। ऐसे में यह अधिनियम महिलाओं को नीति-निर्माण की अग्रिम पंक्ति में लाने का अवसर प्रदान करता है, जिससे शासन की प्राथमिकताओं में भी संतुलन आने की उम्मीद की जा सकती है।


    राजनीतिक दृष्टि से यह कदम सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के लिए भी महत्वपूर्ण है, जो लंबे समय से महिला सशक्तिकरण को अपने प्रमुख एजेंडे के रूप में प्रस्तुत करती रही है। यह पहल महिला मतदाताओं के बीच उसकी पकड़ को मजबूत कर सकती है। हालांकि, विपक्ष—विशेषकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस—इसे राजनीतिक लाभ के नजरिए से देखता है और इसके क्रियान्वयन को लेकर गंभीर सवाल उठा रहा है।


    यहीं से इस अधिनियम की सबसे जटिल और विवादास्पद परत सामने आती है—परिसीमन का प्रावधान। सरकार ने महिला आरक्षण को आगामी जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन से जोड़ दिया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि आरक्षण तत्काल लागू नहीं होगा, बल्कि निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण के बाद ही प्रभावी होगा। यही कारण है कि यह नीति जितनी ऐतिहासिक कही जा रही है, उतनी ही राजनीतिक बहस का केंद्र भी बन गई है।


    कांग्रेस का तर्क है कि महिलाओं को उनका अधिकार देने के लिए परिसीमन का इंतजार करना अनावश्यक है। यदि सरकार की मंशा स्पष्ट है, तो वर्तमान सीटों पर ही 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जा सकता है। विपक्ष इसे “विलंबित न्याय” के रूप में देखता है और आशंका जताता है कि यह प्रावधान महिलाओं को तत्काल लाभ से वंचित कर सकता है।


    इसके विपरीत, भाजपा इस निर्णय को दीर्घकालिक और रणनीतिक दृष्टि से उचित ठहराती है। उसका कहना है कि परिसीमन के बाद संसद और विधानसभाओं की सीटों में वृद्धि संभावित है। ऐसे में यदि आरक्षण उस समय लागू किया जाता है, तो महिलाओं को न केवल प्रतिशत के आधार पर बल्कि वास्तविक संख्या में भी अधिक प्रतिनिधित्व मिलेगा। यह तर्क अधिनियम को केवल प्रतीकात्मक न रखकर व्यापक प्रभाव वाला बनाने की कोशिश के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।


    हालांकि, इस पूरे विमर्श में सबसे बड़ा प्रश्न समय-सीमा का है। भारत में आखिरी परिसीमन 2002 में हुआ था और उसके बाद 2026 तक इस पर रोक रही है। यदि नई जनगणना और परिसीमन में देरी होती है, तो महिला आरक्षण भी स्वतः टलता जाएगा। ऐसे में यह आशंका निराधार नहीं है कि यह ऐतिहासिक पहल कागजों तक सीमित रह सकती है, जब तक कि इसे समयबद्ध तरीके से लागू न किया जाए।
    परिसीमन का एक और आयाम क्षेत्रीय संतुलन से जुड़ा है। नई जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण कुछ राज्यों को अधिक प्रतिनिधित्व देगा, तो कुछ को अपेक्षाकृत कम। ऐसे में महिला आरक्षण इस व्यापक राजनीतिक पुनर्संरचना का हिस्सा बन जाएगा, जहां लैंगिक समानता के साथ-साथ संघीय संतुलन का प्रश्न भी जुड़ जाएगा।


    इन तमाम बहसों के बीच यह भी स्वीकार करना होगा कि केवल आरक्षण ही महिलाओं के वास्तविक सशक्तिकरण की गारंटी नहीं है। शिक्षा, राजनीतिक प्रशिक्षण और सामाजिक स्वीकृति जैसे कारक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। कई बार ‘प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व’ की समस्या सामने आती है, जिसे दूर किए बिना इस पहल के उद्देश्य अधूरे रह सकते हैं।


    अंततः, नारी शक्ति वंदन अधिनियम को भारत की विकास यात्रा के एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखा जाना चाहिए। यह आधी आबादी को केवल अधिकार देने की नहीं, बल्कि उन्हें देश की आर्थिक और राजनीतिक शक्ति का सक्रिय भागीदार बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। अब यह सरकार और व्यवस्था पर निर्भर करेगा कि वह परिसीमन जैसी प्रक्रियाओं को कितनी गंभीरता और गति से पूरा करती है, ताकि यह ऐतिहासिक पहल अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त कर सके और भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी बना सके।

  • ट्रकों में ओवरलोडिंग बंद पर चेकपोस्ट पर छानबीन शुरु

    ट्रकों में ओवरलोडिंग बंद पर चेकपोस्ट पर छानबीन शुरु

    भोपाल,25 अप्रैल,(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्यप्रदेश में परिवहन नाकों (चेकपोस्ट) को दोबारा शुरू करने के फैसले ने एक बार फिर सड़क परिवहन व्यवस्था को बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। राज्य सरकार इसे नियमों के बेहतर पालन, राजस्व में वृद्धि और अवैध गतिविधियों पर अंकुश लगाने की दिशा में जरूरी कदम बता रही है, लेकिन ट्रांसपोर्टरों के बीच इस निर्णय को लेकर गहरी चिंता और असंतोष देखने को मिल रहा है।

    दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में चेकपोस्ट व्यवस्था को समाप्त कर परिवहन प्रणाली को अधिक डिजिटल और पारदर्शी बनाने की कोशिश की गई थी। ऑनलाइन परमिट, ई-वे बिल और हाल ही में लागू किए गए व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (VLTD) जैसे उपायों के जरिए वाहनों की निगरानी को आधुनिक स्वरूप दिया गया। ट्रांसपोर्टरों का मानना है कि इन व्यवस्थाओं के बाद ओवरलोडिंग और नियमों के उल्लंघन में काफी कमी आई है। ऐसे में चेकपोस्ट की वापसी उन्हें पुराने ढर्रे की ओर लौटने जैसा प्रतीत हो रही है।

    परिवहन सचिव मनीष सिंह और परिवहन आयुक्त उमेश जोगा को दिए गए ज्ञापन में भोपाल के ट्रक आपरेटरों का कहना है कि जब तकनीकी माध्यमों से हर वाहन की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है, तब भौतिक चेकपोस्ट की जरूरत समझ से परे है। उनका यह भी आरोप है कि चेकपोस्ट व्यवस्था पहले भी देरी, अनावश्यक रोक-टोक और भ्रष्टाचार के कारण बदनाम रही है। लंबी कतारों में फंसे ट्रक न केवल समय की बर्बादी का कारण बनते हैं, बल्कि इससे माल की समय पर डिलीवरी भी प्रभावित होती है, जिसका सीधा असर व्यापार और उद्योग पर पड़ता है।

    दूसरी ओर, परिवहन विभाग का तर्क है कि केवल डिजिटल सिस्टम पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। विभाग के अधिकारियों का कहना है कि कई बार तकनीकी खामियों, डेटा में हेरफेर या नेटवर्क समस्याओं के कारण नियमों का उल्लंघन पकड़ में नहीं आ पाता। ऐसे में चेकपोस्ट एक अतिरिक्त सुरक्षा परत के रूप में काम करते हैं, जिससे ओवरलोडिंग, बिना परमिट संचालन और टैक्स चोरी जैसे मामलों पर प्रभावी नियंत्रण रखा जा सकता है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच आर्थिक पहलू भी महत्वपूर्ण है। पहले से ही बढ़ती लागत, ईंधन की कीमतों और नई तकनीकी अनिवार्यताओं के कारण ट्रांसपोर्टर दबाव में हैं। VLTD जैसे उपकरणों पर अतिरिक्त खर्च और उनके रखरखाव की लागत ने उनकी परेशानियों को और बढ़ा दिया है। ऐसे में चेकपोस्ट पर संभावित देरी और अनौपचारिक खर्च की आशंका उन्हें और चिंतित कर रही है।

    विशेषज्ञ मानते हैं कि यह विवाद केवल चेकपोस्ट की वापसी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक असंतुलन को दर्शाता है, जो नीति निर्माण और जमीनी हकीकत के बीच मौजूद है। जहां सरकार एक सुदृढ़ और नियंत्रित परिवहन तंत्र स्थापित करना चाहती है, वहीं ट्रांसपोर्टर व्यावहारिक कठिनाइयों और आर्थिक दबावों को सामने रख रहे हैं।

    स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए यह आवश्यक हो गया है कि सरकार और ट्रांसपोर्टर आपसी संवाद के माध्यम से समाधान तलाशें। यदि चेकपोस्ट व्यवस्था को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ते हुए पारदर्शी और समयबद्ध बनाया जाए, तो संभव है कि दोनों पक्षों की चिंताओं का संतुलन स्थापित किया जा सके।

    फिलहाल, परिवहन नाकों की वापसी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सुधार के प्रयास तभी सफल होंगे, जब वे जमीनी स्तर पर व्यावहारिक और सभी हितधारकों के लिए स्वीकार्य हों। मध्यप्रदेश की परिवहन व्यवस्था एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां लिए गए फैसले आने वाले समय में इसके भविष्य की दिशा तय करेंगे।

  • पुलिस को ठेंगा बताते प्रीतम लोधी का इलाज कौन करेगा

    पुलिस को ठेंगा बताते प्रीतम लोधी का इलाज कौन करेगा

    भोपाल, 23 अप्रैल(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्यप्रदेश की राजनीति में हालिया घटनाक्रम ने एक बार फिर सत्ता, पुलिस और प्रशासन के रिश्तों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। शिवपुरी जिले की पिछोर सीट से विधायक प्रीतम लोधी से जुड़ा विवाद केवल एक व्यक्तिगत बयानबाजी या दुर्घटना का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह राज्य में राजनीतिक प्रभाव, प्रशासनिक स्वतंत्रता और कानून के राज की वास्तविक स्थिति को उजागर करने वाला प्रकरण बन चुका है।
    घटना की पृष्ठभूमि में एक सड़क हादसा है, जिसमें विधायक के पुत्र की थार गाड़ी से पांच लोग घायल हुए। इस मामले में पुलिस कार्रवाई शुरू हुई, लेकिन इसके तुरंत बाद जिस तरह विधायक ने खुले मंच से पुलिस अधिकारी को धमकी दी—यह घटना प्रशासनिक तंत्र की गरिमा पर सीधा प्रहार मानी गई।

    पुलिस की गरिमा पर प्रहार मानी गई प्रीतम लोधी और उनके बेटे की बदमिजाजी.


    इस प्रकरण का सबसे चिंताजनक पक्ष यह रहा कि एक जनप्रतिनिधि की ओर से न केवल पुलिस की कार्यवाही पर सवाल उठाए गए, बल्कि सार्वजनिक रूप से दबाव बनाने की कोशिश भी की गई। “घर को गोबर से भर देने” जैसी भाषा ने राजनीतिक संवाद की गिरती मर्यादा को उजागर किया।
    यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या पुलिस वास्तव में दबाव में थी या यह केवल धारणा का संकट है। रिपोर्टों में यह सामने आया कि प्रारंभिक स्तर पर पुलिस द्वारा कार्रवाई में हिचकिचाहट की बात भी उठी, खासकर आरोपी के नाम दर्ज करने को लेकर। हालांकि बाद में एफआईआर दर्ज हुई, लेकिन शुरुआती प्रतिक्रिया ने यह संकेत जरूर दिया कि राजनीतिक प्रभाव का मनोवैज्ञानिक दबाव प्रशासन पर मौजूद रहता है।
    मध्यप्रदेश में पिछले कुछ समय में जनप्रतिनिधियों द्वारा अधिकारियों को धमकाने या अपमानित करने की कई घटनाएं सामने आई हैं। यह प्रवृत्ति बताती है कि समस्या केवल एक व्यक्ति या एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यापक राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बनती जा रही है।
    विवाद बढ़ने के बाद पार्टी ने विधायक को कारण बताओ नोटिस जारी किया और तीन दिन में जवाब मांगा। यह कदम संगठनात्मक अनुशासन का संकेत अवश्य देता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पर्याप्त है? राजनीतिक दलों द्वारा नोटिस जारी करना अक्सर “डैमेज कंट्रोल” के रूप में देखा जाता है। जब तक ऐसे मामलों में ठोस और उदाहरणात्मक कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह धारणा बनी रहती है कि सत्ता पक्ष अपने नेताओं को वास्तविक दंड से बचाता है और केवल औपचारिक कार्रवाई करता है।

    प्रीतम लोधी के बेटे के घमंड का इलाज फिर कौन करेगा.


    इस मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि आईपीएस एसोसिएशन और कर्मचारी संगठनों ने खुलकर नाराजगी जताई और कार्रवाई की मांग की। आईपीएस एसोसिएशन के अध्यक्ष और एडीजी चंचल शेखर ने क्षोभ व्यक्त करते हुए प्रीतम लोधी के बयानों की निंदा की है । यह संकेत है कि प्रशासनिक ढांचे के भीतर भी इस प्रकार के राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर असंतोष गहराता जा रहा है। जब पुलिस बल का मनोबल प्रभावित होता है, तो उसका सीधा असर कानून-व्यवस्था पर पड़ता है। अधिकारी यदि स्वयं को असुरक्षित या दबाव में महसूस करते हैं, तो निष्पक्ष कार्रवाई कठिन हो जाती है।
    अक्सर ऐसी परिस्थितियों में “यूपी मॉडल” की चर्चा होती है, जिसका आशय सख्त और त्वरित पुलिस कार्रवाई से है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि किसी भी राज्य में कानून का शासन केवल कठोरता से नहीं, बल्कि संस्थागत संतुलन से चलता है। यदि पुलिस को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त कर दिया जाए और उसे विधिक ढांचे के भीतर स्वतंत्रता दी जाए, तो अलग से किसी “मॉडल” की आवश्यकता नहीं पड़ती। समस्या मॉडल की नहीं, राजनीतिक इच्छाशक्ति की है।मध्यप्रदेश में इसी राजनीतिक दबाव से पुलिस को मुक्त करने के लिए कुछ बड़े शहरों में पुलिस कमिश्नर प्रणाली भी शुरु की गई थी। इसके बावजूद पुलिस का समूचा ढांचा सरकार के साथ केवल कदमताल करता नजर आ रहा है।
    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सामने यह एक महत्वपूर्ण परीक्षा है। यदि सत्ता पक्ष के विधायक ही कानून की सीमाओं को चुनौती देते नजर आएं, तो सरकार की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी केवल प्रशासन चलाना नहीं, बल्कि अपने दल के जनप्रतिनिधियों के आचरण को नियंत्रित करना भी है। यदि यह नियंत्रण कमजोर पड़ता है, तो प्रशासनिक तंत्र को “अतिरिक्त सक्रियता” दिखानी पड़ती है—जो लोकतांत्रिक संतुलन के लिए हमेशा स्वस्थ संकेत नहीं होता।
    प्रीतम लोधी प्रकरण केवल एक विवाद नहीं, बल्कि एक संकेत है—उस दिशा का जिसमें राजनीति और प्रशासन के संबंध विकसित हो रहे हैं। यदि समय रहते इस प्रवृत्ति पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो यह कानून के राज को कमजोर कर सकता है। इसलिए समाधान किसी एक कठोर कार्रवाई में नहीं, बल्कि तीन स्तरों पर है—राजनीतिक दलों की वास्तविक अनुशासनात्मक प्रतिबद्धता, पुलिस की संस्थागत स्वतंत्रता, और शासन की स्पष्ट जवाबदेही। अन्यथा, ऐसे विवाद आते रहेंगे, नोटिस जारी होते रहेंगे, और जनता के मन में यह सवाल बना रहेगा कि कानून वास्तव में किसके लिए है। फिलहाल तो सवाल यही है कि कांग्रेस के केपी सिंह जैसे कुख्यात नेता को किनारे करके उभरे प्रीतम सिंह लोधी और उनके बेटे के विरुद्ध पुलिस क्या कार्रवाई करती है। उनके आपराधिक मामलों की सूची बड़ी लंबी है लेकिन पुलिस के आला अफसरों की नेताओं से जुगलबंदी जनता को न्याय दिलाने के मार्ग में बाधक बनती नजर आ रही है।

  • एकात्म मानवतावाद का पूंजीवादी मॉडल ही कर पाएगा अंत्योदय

    एकात्म मानवतावाद का पूंजीवादी मॉडल ही कर पाएगा अंत्योदय


    -आलोक सिंघई –
    भारतीय जनता पार्टी (BJP) के स्थापना दिवस पर जब पार्टी दिग्गजों के भाषणों में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानवतावाद’ और ‘अंत्योदय’ की गूंज सुनाई देती है, तब देश का आम नागरिक विकास के नए प्रतिमानों के बीच एक अजीब सा विरोधाभास भी महसूस करता है। भाजपा का स्थापना दिवस महज एक औपचारिकता नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर होना चाहिए कि क्या आज का आर्थिक ढांचा सचमुच एकात्म मानववाद की कसौटी पर खरा उतर रहा है? यह बात अब छिपी नहीं है कि पार्टी की ओर से प्रचारित ‘विकास मॉडल’ पूंजीवाद का ही एक देशी स्वरूप है—जिसे अक्सर ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ या ‘मित्र पूंजीवाद’ के चश्मे से देखा जा रहा है। जब हम न्यू वर्ल्ड ऑर्डर की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं, तो एकात्म मानवतावाद का सैद्धांतिक चोला उतारकर भारतीय पूंजीवाद को नए सिरे से परिभाषित करना होगा।
    पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानवतावाद के माध्यम से एक ऐसे समाज की कल्पना की थी, जहाँ व्यक्ति और समाज के बीच सामंजस्य हो, और विकास की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति (अंत्योदय) को उसका हक मिले। उनका दर्शन व्यक्तिवाद और समाजवाद दोनों के बीच का एक वैकल्पिक मार्ग था। लेकिन, पिछले एक दशक में जिस तरह के आर्थिक सुधार हुए हैं, वे पूंजी के केंद्रीकरण को बढ़ावा देते प्रतीत होते हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) का निजीकरण, कॉर्पोरेट घरानों को दी जा रही रियायतें, और असंगठित क्षेत्र की दुर्दशा, यह दर्शाती है कि ‘अंत्योदय’ अब केवल एक राजनीतिक नारा बनकर रह गया है, जबकि ‘अमीरोदय’ वास्तविक एजेंडा बन चुका है। यह एकात्म मानवतावाद की मूल भावना के विपरीत है, जो शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के एकीकृत कार्यक्रम की बात करती है।
    भारतीय जनता पार्टी का दावा रहा है कि वह पश्चिमी अवधारणाओं से इतर एक विशुद्ध भारतीय आर्थिक मॉडल अपनाएगी। लेकिन वास्तविकता यह है कि आज का भारतीय पूंजीवाद वैश्वीकरण के उन दोषों को अपना चुका है, जिससे बचने की सलाह दीनदयाल जी ने दी थी। यह सच है कि 2014 के बाद देश में आधारभूत संरचना (Infrastructure) का अभूतपूर्व विकास हुआ है, डिजिटल इंडिया ने क्रांति ला दी है, लेकिन इस चमक-धमक के पीछे लघु, सूक्ष्म और मध्यम उद्यमों (MSME) की खामोश मौत भी छिपी है। जब देश की अर्थव्यवस्था में चंद बड़े कॉर्पोरेट समूह का एकाधिकार बढ़ता है, तो वह अंत्योदय की अवधारणा को सीधे चुनौती देता है। कई मायनों में पूंजी के उत्पादन के लिए ये मॉडल बेजोड़ है। इससे उत्पादित पूंजी ही समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन में खुशियों की दीपावली ला सकती है। ऐसे में केवल चुनावी जीत के लिए हम सच्चाई को स्वीकार करने का साहस न करें ये उचित नहीं है।
    न्यू वर्ल्ड ऑर्डर के इस दौर में, जहाँ तकनीकी वर्चस्व और संसाधन-आधारित युद्ध (Resource War) आम बात हो गई है, भारत को एक ऐसे आर्थिक मॉडल की आवश्यकता है जो समावेशी (Inclusive) हो। भाजपा के दिग्गजों को यह विचार करना होगा कि जब तक छोटे उद्यमी, किसान और मजदूर आर्थिक विकास के केंद्र में नहीं होंगे, तब तक विकसित भारत का सपना अधूरा रहेगा। यदि हम वास्तव में एकात्म मानवतावाद के प्रति प्रतिबद्ध हैं, तो पूंजीवाद के देशी संस्करण—’मित्र पूंजीवाद’—से बाहर निकलकर ऐसे मॉडल को अपनाना होगा, जो आर्थिक असमानता को कम करे, न कि बढ़ाए। आजादी के लगभग आठ दशकों बाद भी हमारे लोग यदि गैस सिलेंडर,पेट्रोल डीजल की कतार में लगने को मजबूर हैं तो क्या हमें अपने विकास मॉडल पर पुर्नविचार नहीं करना चाहिए।
    अब समय आ गया है कि बीजेपी अपनी विचारधारा को नए सिरे से अपडेट करे। 1980 के दशक के चश्मे से 2026 की आर्थिक चुनौतियों का सामना नहीं किया जा सकता। विचारधारा को वैचारिक जकड़न से निकालकर युगानुकूल (समय के अनुरूप) बनाना होगा। इसका मतलब यह नहीं है कि हम पूंजी निर्माण को रोक दें, बल्कि इसका अर्थ यह है कि पूंजी का उपयोग जन-कल्याण के लिए हो, न कि केवल कुछ हाथों में उसे केंद्रित करने के लिए। अंत्योदय का अर्थ है- समाज के अंतिम व्यक्ति को सशक्त बनाना, न कि उसे सरकार या कॉर्पोरेट की दया पर छोड़ देना।
    अंततः, भाजपा को यह तय करना होगा कि वह दीनदयाल उपाध्याय की वैचारिक विरासत को केवल प्रतीकों (Symbols) के रूप में याद रखेगी या उसे आर्थिक नीतियों (Policies) में उतारेगी। यदि न्यू वर्ल्ड ऑर्डर में भारत को एक महाशक्ति के रूप में स्थापित होना है, तो उसे ‘भारतीय पूंजीवाद’ को ‘मानवीय पूंजीवाद’ में बदलना होगा। एकात्म मानवतावाद का चोला उतारकर जब हम वास्तविकता की ज़मीन पर ‘समावेशी विकास’ का नया प्रतिमान गढ़ेंगे, तभी सही मायने में अंत्योदय का संकल्प पूरा होगा।

  • एमपी में नशे के नेटवर्क पर बरपा पुलिस का कहर

    एमपी में नशे के नेटवर्क पर बरपा पुलिस का कहर


    डीजीपी कैलाश मकवाणा के निर्देश पर प्रदेशभर में नशे के विरुद्धप्रभावी कार्रवाई


    भोपाल 6 अप्रैल(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। पुलिस महानिदेशक कैलाश मकवाणा ने 01 अप्रैल से प्रदेशभर में विशेष अभियान संचालित कर मादक पदार्थों की तस्करी पर प्रभावी नियंत्रण के लिए सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं। इसी क्रम में बीते पांच दिनों में विभिन्न जिलों की पुलिस द्वारा समन्वित कार्रवाई करते हुए लगभग 1 करोड़ 22 लाख रुपये से अधिक मूल्य के मादक पदार्थ जप्त किए गए हैं।
    जिले में मादक पदार्थों के विरुद्ध कार्रवाई को आर्थिक स्तर तक प्रभावी बनाते हुए पुलिस द्वारा बड़ी वैधानिक कार्यवाही की गई है। थाना कालूखेड़ा क्षेत्र में अवैध ड्रग्स फैक्ट्री संचालित करने वाले आरोपियों की पहचान कर उनके द्वारा अर्जित अवैध संपत्तियों का विस्तृत विश्लेषण किया गया। इसके पश्चात एनडीपीएस एक्ट के तहत प्रकरण दर्ज कर तस्कर और विदेशी मुद्रा हेरफेर करने वाले (संपत्ति की ज़ब्ती) अधिनियम,(The Smugglers and Foreign Exchange Manipulators (Forfeiture of Property) Act, 1976 ) SAFEMAके तहत लगभग 16 करोड़ 16 लाख रुपये मूल्य की संपत्ति फ्रीज करने के आदेश जारी किए गए। यह कार्रवाई न केवल तस्करों के आर्थिक तंत्र को कमजोर करने की दिशा में महत्वपूर्ण है, बल्कि प्रदेश में मादक पदार्थों के अवैध कारोबार के विरुद्ध कड़ा संदेश भी देती है।
    नीमच
    जिले में नशा विरोधी अभियान के तहत तीन अलग-अलग प्रकरणों में लगभग 62 लाख रुपये मूल्य की 500 ग्राम एमडीएमए, 2 किलो 140 ग्राम अफीम एवं 67 किलो 200 ग्राम डोडाचूराजप्त किया गया। इस दौरान चार अंतरराज्यीय तस्करों को गिरफ्तार किया गया। पुलिस चौकी नयागांव, थाना जीरन एवं थाना सिंगोली की संयुक्त कार्रवाई में वाहन चेकिंग एवं मुखबिर सूचना के आधार पर यह कार्यवाही की गई।
    आगर मालवा
    कोतवाली पुलिस द्वारा नाकाबंदी कर एक कार से 148 ग्राम एमडी ड्रग्स जब्‍त की गई, जिसकी वाहन एवं अन्य सामग्री सहित कीमत लगभग 25 लाख 30 हजार रुपये आंकी गई है। इस कार्रवाई में दो आरोपियों को गिरफ्तार किया गया हैं।
    शिवपुरी
    थाना करैरा पुलिस द्वारा 52 ग्राम स्मैक (कीमत लगभग 10 लाख 40 हजार रुपये) के साथ आरोपी को गिरफ्तार किया गया। इसके अतिरिक्त थाना अमोला पुलिस ने भी 15 ग्राम स्मैक (कीमत लगभग 3 लाख रुपये) जप्त कर आरोपी को गिरफ्तार किया है।
    उज्जैन
    भाटपचलाना थाना पुलिस ने 1किलो84 ग्राम गांजा (कीमत लगभग 68 हजार रुपये) के साथ आरोपी को गिरफ्तार किया गया। वहीं एक अन्य बड़ी कार्रवाई में एमडीएमए ड्रग्स बनाने वाले अंतरराज्यीय नेटवर्क का भंडाफोड़ कर भारी मात्रा में केमिकल और नगदी सहित 8 लाख 50हजार रूपए की संपत्ति जब्त की है।
    इंदौर
    क्राइम ब्रांच इंदौर ने कार्रवाई करते हुए एक महिला सहित 4 आरोपियों को गिरफ्तार कर उनके कब्जे से 24.08 ग्राम एमडी ड्रग्स, कार एवं मोबाइल सहित लगभग 5 लाख रुपये की संपत्ति जब्‍त की है।
    मंदसौर
    थाना शामगढ़ पुलिस ने 1 किलो 245 ग्राम अवैध अफीम (कीमत लगभग 2 लाख 49 हजार रुपये) के साथ 3 आरोपियों को गिरफ्तार किया है।
    गुना
    बजरंगगढ़ थाना क्षेत्र में कार्रवाई करते हुए 1लाख50 हजार रुपये के लगभग 17.294 किलोग्राम100 गांजे के पौधे जप्तकर आरोपी को गिरफ्तार किया।
    उज्जैन
    थाना बड़नगर पुलिस ने 36.58 ग्राम एमडी ड्रग्स (कीमत लगभग 1 लाख रुपये) के साथ एक आरोपी को गिरफ्तार किया गया। आरोपी ने मादक पदार्थ रतलाम से लाकर बेचने की बात स्वीकार की है।
    नर्मदापुरम
    थाना इटारसी पुलिस ने 1 लाख रुपयेका 6 किलो 76 ग्राम गांजा जप्त कर आरोपी को गिरफ्तार किया है।
    खरगोन
    सनावद पुलिस ने 13.41 ग्राम ब्राउन शुगर (कीमत लगभग 1.30 लाख रुपये), मोटरसाइकिल एवं मोबाइल फोन जप्त कर तीन तस्करों को गिरफ्तार किया गया।
    छिंदवाड़ा
    थाना कुण्डीपुरा पुलिस ने 1 किलो492ग्राम गांजा (कीमत लगभग 20 हजार रुपये) जप्त कर आरोपी को गिरफ्तार किया गया।
    वहीं कोतवाली पुलिस ने प्रतिबंधित इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट के 34 नग (कीमत लगभग 68 हजार रुपये) जप्त कर आरोपी के विरुद्ध प्रकरण दर्ज किया है।
    बैतूल में अंतरराज्यीय गांजा सप्लायर गिरफ्तार
    जिले में कोतवाली पुलिस द्वारा सतत विवेचना के दौरान गांजा तस्करी के एक अंतरराज्यीय नेटवर्क का खुलासा किया गया। पूर्व में दो आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने तकनीकी एवं मुखबिर तंत्र के आधार पर मुख्य आरोपी को चिन्हित किया। कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार किया गया, जो उड़ीसा से गांजा लाकर जिले में सप्लाई करता था। पूछताछ में आरोपी ने बताया कि वह सब्जी परिवहन के बहाने उड़ीसा जाता था और वापसी में गांजा लाकर स्थानीय स्तर पर बेचता था। पुलिस द्वारा अब इस नेटवर्क के अन्य सदस्यों की तलाश कर आगे की कार्रवाई की जा रही है।
    मध्यप्रदेश पुलिस द्वारा की जा रही इन सतत एवं प्रभावी कार्यवाहियों से स्पष्ट है कि प्रदेश में मादक पदार्थों के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई गई है। पुलिस मुख्यालय ने सभी जिलों को निर्देशित किया है कि न केवल तस्करों की गिरफ्तारी सुनिश्चित की जाए, बल्कि उनके नेटवर्क, वित्तीय स्रोत एवं अवैध संपत्तियों पर भी सख्त कार्रवाई की जाए।

  • पेट्रोलियम जमाखोरों पर सख्त कार्रवाई करेंः अनुराग जैन

    पेट्रोलियम जमाखोरों पर सख्त कार्रवाई करेंः अनुराग जैन

    मुख्य सचिव ने बैठक में कलेक्टर्स को दिए निर्देश


    भोपाल 2 अप्रैल(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। संपूर्ण प्रदेश में एलपीजी सहित अन्य पेट्रोलियम पदार्थ पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है । किसी भी जिले में इनकी कोई कमी नहीं है।इसके बावजूद यदि कोई व्यक्ति या व्यापारी इनकी जमाखोरी करता है तो उसके विरुद्द सख्त कार्रवाई की जाए। मुख्य सचिव अनुराग जैन ने पेट्रोलियम पदार्थों की सुगम उपलब्धता के लिए प्रदेश में किए जा रहे प्रयासों पर संतोष व्यक्त करते हुए कलेक्टर्स से कहा है कि वे प्रतिदिन मानीटरिंग करें और जमाखोरी के साथ कालाबाजारी की शिकायतों पर त्वरित तथा सख्त कार्यवाही करें। मुख्य सचिव श्री जैन ने गुरूवार को मंत्रालय में वरिष्ठ अधिकारियों और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से कलेक्टर्स के साथ जिलों में पेट्रोलियम पदार्थों की उपलब्धता की समीक्षा की। बैठक में तय किया गया कि राज्य स्तर और जिला स्तर पर पेट्रोलियम पदार्थों की उपलब्धता पर प्रतिदिन रिव्यू होगा।
    मुख्य सचिव श्री जैन ने पीएनजी लाइन वाले जिलों में अधिकाधिक घरेलू कलेक्शन देने के लिए संबंधित एजेंसियों को जिला प्रशासन से नियमित समन्वय करने के साथ ही कलेक्टर्स को निर्देश दिए हैं कि वे एजेंसियों को वर्क फोर्स उपलब्ध करवाएं। उन्होंने कहा कि उपभोक्ताओं के बीच पीएनजी की विशेषताओं का प्रचार-प्रसार करें, जिससे अगले 3 महीने की समय-सीमा मे उन क्षेत्रों में अधिकतम घरों तक पाइप से गैस पहुंच सके। बैठक में विगत एक माह में पेट्रोलियम पदार्थों की उपलब्धता और आपूर्ति की समीक्षा की गई। पेट्रोल पंप तथा गैस एजेंसियों पर अब लाइन आदि समाप्त होने के साथ पैनिक बुकिंग बंद होने पर संतोष व्यक्त किया गया।
    मुख्य सचिव श्री जैन ने निर्देश दिए कि वैकल्पिक ऊर्जा का उपयोग बढ़ाने के लिए व्यापक प्रचार-प्रसार सुनिश्चित करें। मुख्य सचिव श्री जैन ने गैस की पर्याप्त उपलब्धता और निरंतर आपूर्ति पर संतोष व्यक्त किया। उन्होंने घरों में पीएनजी कनेक्शन की समीक्षा की और निर्देश दिए कि पाइप लाइन की क्षमता अनुरूप घरेलू कनेक्शन करें। कनेक्शन जो बंद हो गए हैं, उन्हें भी पुन: प्रारंभ करें। उन्होंने इन एजेंसियों के लिए विभागों से 24 घंटे में अनापत्ति प्रमाण-पत्र आदि जारी करने के साथ ही कालोनियों में कनेक्शन के लिए शिविर लगाने के निर्देश दिए।
    मुख्य सचिव श्री जैन ने प्रदेश में एलपीजी की जमाखोरी और कालाबाजारी करने वालों के विरूद्ध की गई कार्यवाही की समीक्षा की। उन्होंने कलेक्टर्स को निर्देश दिए कि आवश्यक वस्तु अधिनियम के लागू करने के साथ भारी अर्थदंड और एजेंसियों पर आवश्यक होने पर निलंबन की कार्रवाई की जाए। उन्होंने कहा कि एजेंसियाँ कई बार मुनाफे के लिए अपने कर्मियों से भी कालाबाजारी करवाती है। बैठक में बताया गया कि प्रदेश में अब तक 3029 गैस सिलेंडर जब्त किए गए हैं। 2759 छापे मारे गए हैं। दोषियों के विरूद्ध 11 एफआईआर भी दर्ज की गई हैं।
    बैठक में बताया गया कि प्रदेश में पेट्रोल एवं डीजल की पर्याप्त उपलब्धता है और ऑयल कंपनी के डिपो से निरंतर आपूर्ति जारी है। जिलों में गैस पाईप लाईन बिछाने के सभी आर.ओ.यू आवेदनों को आवेदन प्रस्तुत करने के 24 कार्यकारी घंटो के अंदर डीम्ड सीजीडी अनुमति प्रदान करने के आदेश अनुसार कार्यवाही की जा रही हैं।
    राज्य शासन को अतिरिक्त 10% एलपीजी आवंटन प्राप्त हो चुका है। 27 मार्च 2026 को भारत सरकार द्वारा कॉमर्शियल एलपीजी का अतिरिक्त 20% आवंटन उद्योरग जैसे-स्टील, ऑटोमोबाईल, टेक्सटाइल, डाई, केमिकल्स, प्लास्टिक्स आदि के लिए किया गया है और उद्योगों को कॉमर्शियल गैस सप्लाई उक्त अनुसार की जा रही है।
    बैठक में बताया गया कि केंद्र सरकार द्वारा प्रदेश को केरोसीन आवंटन और एवं प्रत्येक जिले में 2 पेट्रोल पंपों का आंकलन प्रक्रियाधीन है। विभाग द्वारा केरोसीन वितरण के दिशा निर्देश जारी किए गए हैं। केरोसीन का वितरण मांग के आधार पर होगा। इस दौरान वरिष्ठ अधिकारी और आयल कंपनी के प्रतिनिधि उपस्थित थे।