बैंकों के हजारों करोड़ दबाए बैठे लोग नहीं चाहते दबंग नौकरशाही

भोपाल,23 जनवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटऱ)। बैंकों की रकम दबाकर बैठा मीडिया माफिया हो या जमीनों पर कब्जा जमाने वाला भू माफिया,आपराधिक वारदातों में संलग्न दबंग, सरकारी योजनाओं को गड़प जाने वाले राजनेता और ठेकेदार कोई नहीं चाहता कि उनके विरुद्ध लंबित शिकायतें सुनी जाएं और उनका निराकरण हो। यही वजह  है कि जब मुख्य सचिव अनुराग जैन ने कलेक्टरों, पुलिस अधीक्षकों और राजस्व अधिकारियों को शिकायतों का निराकरण करने की नसीहत दी तो माफिया ताकतों के टुकड़खोरों ने बात का बतंगड़ बना दिया। सहज संवाद की घटना को इस तरह प्रस्तुत किया गया मानों मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव कलेक्टरों को चोर कहना चाहते हैं। सरकार के मीडिया सलाहकारों ने इस मुद्दे पर खंडन जारी करवाकर तथ्य सामने रखे तो खबर का वैसा ही मंडन हो गया जैसा कि पहले से अपेक्षित था।

               जनता के हित में उठी एक आवाज को कुचलने में जुटी माफिया ताकतें बार बार ये स्थापित करने का प्रयास कर रहीं हैं कि मानों सीएस ने नौकरशाही की मैली कुचैली तस्वीर को स्वीकार करके हथियार डाल दिए हों। कुछ नादान कलम घिस्सू ,जनहित की इस ललकार को  सीएस की चूक बताने में जुट गए हैं। शासन की ओर से कहा जा रहा है कि खबर को तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत किया गया है पर कोई मानने को राजी नहीं है। अब इसे अनपढ़ प्रदेश नहीं तो क्या कहा जाए जो जनहित में उठी आवाज के विरोध में अपनी खुशी तलाश रहा है। सभी जानते हैं कि शिवराज सिंह चौहान ने सुशासन के नाम पर लगभग दो दशकों तक जिस नौकर शाही को अपने सिर पर बिठाकर रखा वह आज बेलगाम हो चुकी है। कहीं राजनेताओं ने नौकरशाही को अपने दरवाजे बंधा कुत्ता बना दिया है कहीं संघ के नाम पर अफसरों के हाथ बांध दिए गए हैं। विपक्ष तो पहले से उन मुद्दों पर राजनीति करता रहा है जो समाज को सुधारने के बजाए बांटने का काम करते हैं।

              कांग्रेस के नेता जीतू पटवारी ने सीएस की आवाज को मुख्यमंत्री और सरकार की असफलता दर्शाने के लिए प्रेस वार्ता तक बुला डाली। उनका कहना है कि सीएस ने जाने अनजाने में एक सच्चाई उजागर कर दी है। वे शासन के पक्ष पर गौर करने को राजी नहीं हैं कि मुख्य सचिव ने जो नहीं कहा उसे खबर बनाने की शैतानी कौन कर रहा है और क्यों कर रहा है। अखबारों की सुर्खियां बटोरने के लिए कांग्रेस के नेता इस गंभीर मुद्दे पर हंसी ठिठोली करने में जुट गए हैं। अन्य विपक्षी दलों की तो कोई आवाज ही नहीं है। उनका प्रदेश हित की  राजनीति से कोई वास्ता भी नहीं है। कांग्रेस के जो नेता राज्य में ठेकेदारी करके अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं वे भी नहीं चाहते कि नागरिकों की शिकायतों का निराकरण हो जाए । क्योंकि इससे सत्ता माफिया की जुगलबंदी की उनकी पोल भी खुल सकती है।  जो सत्ता माफिया कांग्रेस के शासनकाल में अपने डैने पसार चुका था वही आज अपने सहयोगियों के साथ भाजपा सरकार के सुशासन को पंगु बनाए हुए हैं। वह चाहता भी नहीं कि किसी तरह का सुशासन स्थापित हो।

           अटल बिहारी सुशासन संस्थान के जिन विशेषज्ञों ने बार बार सलाह देकर सरकारी तंत्र को जवाबदेह बनाने की सलाह दी वह भी इस घटना पर मुंह सिले हुए बैठे है। ये आनलाईन कांफ्रेंस पांच मुद्दों पर केन्द्रित थी। इनमें सुशासन, कानून व्यवस्था, कृषि,स्वास्थ्य और नगरीय प्रशासन जैसे जनहित से जुड़े विषय शामिल थे। जिन अतिक्रमण के मुद्दों पर जनता ने सीएम हेल्पलाईन पर शिकायतें की हैं उन्हें दबंगों ने अफसरों के सहारे पेंडिंग करवा दिया है। समय सीमा में निराकरण न होने की वजह से आम नागरिक परेशान हैं और बार बार कई स्तरों पर अपनी बातें उठाते रहते हैं। कानून व्यवस्था के मुद्दों को अपराधियों ने पुलिस प्रशासन से सांठ गांठ करके डंप करवा रखा है। कृषि विभाग का तो पूरा अमला नदारद है। खाद वितरण जैसे सरल विषय पर सरकारी अमले ने किसानों को धोबी का कुतका बना रखा है। स्वास्थ्य के लिए सरकारी अस्पतालों पर हजारों करोड़ रुपए खर्च होने के बावजूद जनता को निजी और कार्पोरेट अस्पतालों में लुटने को मजबूर होना पड़ रहा है। नगर पालिकाएं हों या नगर निगम सभी में अफसरों ने अपने कान और आंख बंद कर रखे हैं। वे सीएम हेल्पलाईन की शिकायतों को दबाव डालकर बंद करा देते हैं या एक दूसरे की ओर भेजकर टल्ले खिलाते रहते हैं।

        ऐसे हालात में यदि कोई मुख्य सचिव, अपने मातहतों को मुख्यमंत्री का भय दिखाकर लाईन पर लाना चाह रहा है तो मध्यप्रदेश का कथित मुख्यधारा का मीडिया इसे उपहास का विषय बनाने में जुट गया है। घरों में मां अपने बच्चों को पिता की नाराजगी का भय दिखाकर अच्छा नागरिक बनाने का प्रयास करती है। क्या इसे माता पिता के बीच दुश्मनी की तरह प्रस्तुत किया जाने लगेगा। राज्य का लगभग पैंतालीस फीसदी बजट खा जाने वाली नौकरशाही यदि जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरेगी तो निश्चित रूप से जन आक्रोश बढ़ेगा । जनता का असंतोष सरकार पर भी भारी पड़ेगा । सरकार और नौकरशाही के हित में यदि मुख्य सचिव उसे शिकायतों के निवारण की जिम्मेदारी पूरा करने की नसीहत दे रहे हैं तो वे कौन लोग हैं जो इसे आरोप प्रत्यारोप या विवाद का विषय बनाना चाहते हैं।

        सत्ता रूढ़ भाजपा को इस मुद्दे पर गंभीर रूप से चिंतन करना चाहिए। सरकार को असफल बनाने में जुटे माफिया को नसीहत देने के लिए सरकार को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तरह सख्त फैसले लेने होंगे। माफिया की कमर तोड़े बगैर यदि सरकार इस मुद्दे को दबाने का प्रयास करेगी तो आने वाला भविष्य भाजपा को एक असफल पार्टी के रूप में ही याद करेगा।

Comments

One response to “बैंकों के हजारों करोड़ दबाए बैठे लोग नहीं चाहते दबंग नौकरशाही”

  1. Ramesh Pilot

    उत्तम सारस्वत साधना श्रम
    सटीक विश्लेषण
    साधुवाद है
    मप्र में sheopur जिले से हूं

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