Month: January 2026

  • शीश कटा लेंगे पर भोपाल चेंबर आफ कामर्स को जेबी संस्था नहीं बनने देंगेःतेजकुल पाल सिंह पाली

    शीश कटा लेंगे पर भोपाल चेंबर आफ कामर्स को जेबी संस्था नहीं बनने देंगेःतेजकुल पाल सिंह पाली


    भोपाल,30 जनवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। भोपाल के व्यापारियों का प्रतिष्ठापूर्ण नेतृत्व कर रहे प्रगतिशील पैनल के अध्यक्ष तेजकुल पाल सिंह पाली ने कहा है कि यदि वक्त आया तो वे शीश कटाना मंजूर करेंगे पर भोपाल चेंबर आफ कामर्स को कभी किसी नेता या कार्पोरेट घरानों की जेबी संस्था नहीं बनने देंगे। व्यापारियों का कहना है कि पाली का पिछला कार्यकाल उपलब्धियों के भरा पूरा रहा है। उन्होंने चुनाव न कराए जाने पर तीन साल नौ महीने बाद केवल इसलिए इस्तीफा दिया था कि संस्था के चुनाव निष्पक्ष रूप से कराए जा सकें। प्रतिद्वंदी के रूप में चुनाव लड़ रहे कांग्रेस के पूर्व कोषाध्यक्ष गोविंद गोयल ने पिछले सात सालों से खुद को Confedration of MP for Industry, Service & Trade (COMPIST) का स्वयंभू अध्यक्ष घोषित कर रखा है और संस्था के चुनाव तक नहीं कराए हैं।यह मुद्दा इस चुनाव में व्यापारियों को डराने वाला साबित हो रहा है।


    एक फरवरी रविवार को होने जा रहे भोपाल चेंबर आफ कामर्स के चुनावों में जो अंदरूनी कहानियां रिसकर बाहर आ रहीं हैं उनसे व्यापारियों के बीच नेतृत्व की खींचतान को लेकर खासी सरगर्मी देखी जा रही है। व्यापारियों का कहना है कि चुनाव को जातिगत गोलबंदी में धकेलने वाले कार्पोरेट के षड़यंत्र की पोल खुल चुकी है। खुद को पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के प्रतिनिधि के तौर पर प्रस्तुत करने वाले गोविंद गोयल को हराने के लिए व्यापारियों ने पहले मतदान फिर जलपान का नारा दिया है। कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में आकाश गोयल और उनके सहयोगियों ने जिस तरह अनाप शनाप पैसा खर्च करके संस्था को लगभग खरीदने की पेशकश की उससे भी व्यापारियों के बीच संदेह का माहौल गहरा गया है।

    गोविंद गोयलः कम्पिस्ट के चुनाव न कराकर खुद को स्वयंभू अध्यक्ष बनाना पड़ा भारी.


    सूत्र बताते हैं कि प्रगतिशील पैनल से उपाध्यक्ष पद का चुनाव लड़ रहे ट्रांसपोर्ट व्यवसायी कमल पंजवानी इस चुनाव में गेम चेंजर साबित हो रहे हैं। चेंबर के अध्यक्ष पद पर जब व्यापारियों ने आकाश गोयल के नाम पर असहमति जताई तो वे कमल पंजवानी को निर्विरोध अध्यक्ष के रूप में स्वीकार करने राजी हो गए थे। इस नाम पर गोविंद गोयल ने असहमति जता दी और अपना नामांकन भर दिया। यही वजह थी कि तेजकुल पाल सिंह पाली ने संस्था पर मंडराते काले बादलों का पटाक्षेप करने के लिए मैदान संभाल लिया।


    तेजकुल पाल सिंह पाली का नाम सामने आते ही भाजपा समर्थित व्यापारी भी प्रगतिशील पैनल के समर्थन में आ गए और चुनाव रोचक मोड़ पर पहुंच गया। इस चुनाव में सक्रिय भागीदारी निभा रहे व्यापारियों का कहना है कि वे चाहते हैं संस्था उनकी समस्याओं को सुलझाने के लिए सीना चौड़ा करके चले। पाली का पिछला कार्यकाल गौरवपूर्ण रहा है और किसी नेता के पिट्ठू को वे अपना प्रतिनिधि स्वीकार नहीं कर सकते। संस्था को अपनी स्थापना के बाद से पहली बार पाली जैसा दबंग नेतृत्व मिला इसलिए वे दुबारा उन्हें अध्यक्ष के रूप में देखना चाहते हैं।


    प्रगतिशील पैनल से ही महामंत्री पद का चुनाव लड़ रहे समाजसेवी ललित तांतेड़ का कहना है कि राजधानी के व्यापारी पहले कभी इतने सक्रिय नहीं रहते थे। चंद जेबी नेता मिलकर सरकार से अपने हित में सौदेबाजी कर लेते थे। इससे न तो व्यापारिक गतिविधियों को विस्तार मिलता था और न ही व्यापारियों के हितों की रक्षा हो पाती थी। ऐसे में तेजकुल पाल सिंह पाली जी ने राजधानी के सक्रिय और ईमानदार व्यापारियों को मिलाकर संस्था को नेतृत्व प्रदान करने की पहल की है जिसका व्यापार जगत में स्वागत किया जा रहा है। एक फरवरी को होने जा रहे चुनावों में व्यापारियों के इस भाव पर मुहर भी लग जाएगी।

  • बैंकों के हजारों करोड़ दबाए बैठे लोग नहीं चाहते दबंग नौकरशाही

    बैंकों के हजारों करोड़ दबाए बैठे लोग नहीं चाहते दबंग नौकरशाही

    भोपाल,23 जनवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटऱ)। बैंकों की रकम दबाकर बैठा मीडिया माफिया हो या जमीनों पर कब्जा जमाने वाला भू माफिया,आपराधिक वारदातों में संलग्न दबंग, सरकारी योजनाओं को गड़प जाने वाले राजनेता और ठेकेदार कोई नहीं चाहता कि उनके विरुद्ध लंबित शिकायतें सुनी जाएं और उनका निराकरण हो। यही वजह  है कि जब मुख्य सचिव अनुराग जैन ने कलेक्टरों, पुलिस अधीक्षकों और राजस्व अधिकारियों को शिकायतों का निराकरण करने की नसीहत दी तो माफिया ताकतों के टुकड़खोरों ने बात का बतंगड़ बना दिया। सहज संवाद की घटना को इस तरह प्रस्तुत किया गया मानों मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव कलेक्टरों को चोर कहना चाहते हैं। सरकार के मीडिया सलाहकारों ने इस मुद्दे पर खंडन जारी करवाकर तथ्य सामने रखे तो खबर का वैसा ही मंडन हो गया जैसा कि पहले से अपेक्षित था।

                   जनता के हित में उठी एक आवाज को कुचलने में जुटी माफिया ताकतें बार बार ये स्थापित करने का प्रयास कर रहीं हैं कि मानों सीएस ने नौकरशाही की मैली कुचैली तस्वीर को स्वीकार करके हथियार डाल दिए हों। कुछ नादान कलम घिस्सू ,जनहित की इस ललकार को  सीएस की चूक बताने में जुट गए हैं। शासन की ओर से कहा जा रहा है कि खबर को तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत किया गया है पर कोई मानने को राजी नहीं है। अब इसे अनपढ़ प्रदेश नहीं तो क्या कहा जाए जो जनहित में उठी आवाज के विरोध में अपनी खुशी तलाश रहा है। सभी जानते हैं कि शिवराज सिंह चौहान ने सुशासन के नाम पर लगभग दो दशकों तक जिस नौकर शाही को अपने सिर पर बिठाकर रखा वह आज बेलगाम हो चुकी है। कहीं राजनेताओं ने नौकरशाही को अपने दरवाजे बंधा कुत्ता बना दिया है कहीं संघ के नाम पर अफसरों के हाथ बांध दिए गए हैं। विपक्ष तो पहले से उन मुद्दों पर राजनीति करता रहा है जो समाज को सुधारने के बजाए बांटने का काम करते हैं।

                  कांग्रेस के नेता जीतू पटवारी ने सीएस की आवाज को मुख्यमंत्री और सरकार की असफलता दर्शाने के लिए प्रेस वार्ता तक बुला डाली। उनका कहना है कि सीएस ने जाने अनजाने में एक सच्चाई उजागर कर दी है। वे शासन के पक्ष पर गौर करने को राजी नहीं हैं कि मुख्य सचिव ने जो नहीं कहा उसे खबर बनाने की शैतानी कौन कर रहा है और क्यों कर रहा है। अखबारों की सुर्खियां बटोरने के लिए कांग्रेस के नेता इस गंभीर मुद्दे पर हंसी ठिठोली करने में जुट गए हैं। अन्य विपक्षी दलों की तो कोई आवाज ही नहीं है। उनका प्रदेश हित की  राजनीति से कोई वास्ता भी नहीं है। कांग्रेस के जो नेता राज्य में ठेकेदारी करके अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं वे भी नहीं चाहते कि नागरिकों की शिकायतों का निराकरण हो जाए । क्योंकि इससे सत्ता माफिया की जुगलबंदी की उनकी पोल भी खुल सकती है।  जो सत्ता माफिया कांग्रेस के शासनकाल में अपने डैने पसार चुका था वही आज अपने सहयोगियों के साथ भाजपा सरकार के सुशासन को पंगु बनाए हुए हैं। वह चाहता भी नहीं कि किसी तरह का सुशासन स्थापित हो।

               अटल बिहारी सुशासन संस्थान के जिन विशेषज्ञों ने बार बार सलाह देकर सरकारी तंत्र को जवाबदेह बनाने की सलाह दी वह भी इस घटना पर मुंह सिले हुए बैठे है। ये आनलाईन कांफ्रेंस पांच मुद्दों पर केन्द्रित थी। इनमें सुशासन, कानून व्यवस्था, कृषि,स्वास्थ्य और नगरीय प्रशासन जैसे जनहित से जुड़े विषय शामिल थे। जिन अतिक्रमण के मुद्दों पर जनता ने सीएम हेल्पलाईन पर शिकायतें की हैं उन्हें दबंगों ने अफसरों के सहारे पेंडिंग करवा दिया है। समय सीमा में निराकरण न होने की वजह से आम नागरिक परेशान हैं और बार बार कई स्तरों पर अपनी बातें उठाते रहते हैं। कानून व्यवस्था के मुद्दों को अपराधियों ने पुलिस प्रशासन से सांठ गांठ करके डंप करवा रखा है। कृषि विभाग का तो पूरा अमला नदारद है। खाद वितरण जैसे सरल विषय पर सरकारी अमले ने किसानों को धोबी का कुतका बना रखा है। स्वास्थ्य के लिए सरकारी अस्पतालों पर हजारों करोड़ रुपए खर्च होने के बावजूद जनता को निजी और कार्पोरेट अस्पतालों में लुटने को मजबूर होना पड़ रहा है। नगर पालिकाएं हों या नगर निगम सभी में अफसरों ने अपने कान और आंख बंद कर रखे हैं। वे सीएम हेल्पलाईन की शिकायतों को दबाव डालकर बंद करा देते हैं या एक दूसरे की ओर भेजकर टल्ले खिलाते रहते हैं।

            ऐसे हालात में यदि कोई मुख्य सचिव, अपने मातहतों को मुख्यमंत्री का भय दिखाकर लाईन पर लाना चाह रहा है तो मध्यप्रदेश का कथित मुख्यधारा का मीडिया इसे उपहास का विषय बनाने में जुट गया है। घरों में मां अपने बच्चों को पिता की नाराजगी का भय दिखाकर अच्छा नागरिक बनाने का प्रयास करती है। क्या इसे माता पिता के बीच दुश्मनी की तरह प्रस्तुत किया जाने लगेगा। राज्य का लगभग पैंतालीस फीसदी बजट खा जाने वाली नौकरशाही यदि जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरेगी तो निश्चित रूप से जन आक्रोश बढ़ेगा । जनता का असंतोष सरकार पर भी भारी पड़ेगा । सरकार और नौकरशाही के हित में यदि मुख्य सचिव उसे शिकायतों के निवारण की जिम्मेदारी पूरा करने की नसीहत दे रहे हैं तो वे कौन लोग हैं जो इसे आरोप प्रत्यारोप या विवाद का विषय बनाना चाहते हैं।

            सत्ता रूढ़ भाजपा को इस मुद्दे पर गंभीर रूप से चिंतन करना चाहिए। सरकार को असफल बनाने में जुटे माफिया को नसीहत देने के लिए सरकार को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तरह सख्त फैसले लेने होंगे। माफिया की कमर तोड़े बगैर यदि सरकार इस मुद्दे को दबाने का प्रयास करेगी तो आने वाला भविष्य भाजपा को एक असफल पार्टी के रूप में ही याद करेगा।

  • खेती के हालात समझें तो बदल पाएंगे किसान का भाग्य

    खेती के हालात समझें तो बदल पाएंगे किसान का भाग्य


    Dr. Neeta Singh
    President
    Centre for Resources Development Studies
    Mob: 94250 09125
    Email: crdsbpl@gmail.com
    neetasingh20012@gmail.com

    आपने कभी सोचा है कि मध्य प्रदेश (एमपी) कृषि व्यवसाय की दुनिया में अपने लिए कैसे जगह बना रहा है, यदि हां तो आप एक उपहार के लिए तैयार हैं। राज्य के विशाल मैदान, विविध जलवायु और एक ऐसी सरकार जो पूरी तरह से डिजिटल और टिकाऊ खेती पर जोर दे रही है, ऐसी चर्चा पैदा कर रही है जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है। आइए कहानी, चुनौतियों, उज्ज्वल बिंदुओं और मध्य प्रदेश में कृषि उद्यमों का भविष्य क्या है, के बारे में एक दोस्ताना सैर करें।
    भारतीय कृषि में एमपी क्यों मायने रखता है?
    मध्य प्रदेश को अक्सर “मध्य भारत की रोटी की टोकरी” कहा जाता है, और अच्छे कारण के लिए। 15 मिलियन हेक्टेयर से अधिक भूमि पर खेती के साथ, राज्य भारत के कुल खाद्यान्न उत्पादन में लगभग 15% का योगदान देता है। हाल के वर्षों में, ध्यान केवल अधिक उत्पादन से हटकर बेहतर उच्च मूल्य वाली फसलें पैदा करने पर केंद्रित हो गया है, बागवानी और पशुपालन इस कार्य में अग्रणी हैं। राज्य का लक्ष्य कृषि से अपने सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) को दोगुना करना है, एक ऐसा लक्ष्य जो नीति और निजी क्षेत्र दोनों को उत्साहित कर रहा है।
    भौगोलिक लाभ – मध्य प्रदेश में 15 मिलियन हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि है, जो इसे कृषि योग्य क्षेत्र के मामले में दूसरा सबसे बड़ा राज्य बनाती है।
    फसल विविधता – यह गेहूं, चावल, दालें, सोयाबीन, मक्का और बागवानी फसलों (आम, अमरूद, टमाटर, आदि) की एक विस्तृत श्रृंखला का उत्पादन करती है।
    राष्ट्रीय उत्पादन में योगदान – भारत के कुल खाद्यान्न उत्पादन का लगभग 15% और देश के बागवानी उत्पादन का 10% मध्य प्रदेश से आता है।
    नीति फोकस – राज्य ने सार्वजनिक क्षेत्र के निवेश और निजी क्षेत्र के हित को आगे बढ़ाते हुए 2027 तक अपने कृषि जीएसडीपी को दोगुना करने का लक्ष्य रखा है।

    प्रमुख विकास चालक
    1.उच्च मूल्य वाली फसलें और बागवानी
    किसान पारंपरिक गेहूं और चावल की जगह सोयाबीन, दालें, मक्का और कई तरह के फल और सब्जियां उगा रहे हैं। उदाहरण के लिए, इंदौर डिवीजन में दालों और मक्के की खेती में ज़बरदस्त बढ़ोतरी देखी गई है, अनुकूल मौसम और बेहतर बाज़ार कीमतों के कारण एक ही सीज़न में मक्के की खेती का रकबा 50% से ज़्यादा बढ़ गया है। यह विविधीकरण न केवल किसानों की आय बढ़ाता है बल्कि मानसून पर निर्भर फसलों पर निर्भरता भी कम करता है।
    रकबे में बदलाव – पिछले पांच सालों में, इंदौर डिवीजन में मक्के की खेती का रकबा 50% से ज़्यादा बढ़ा है, जबकि सोयाबीन का रकबा स्थिर हो गया है क्योंकि किसान बेहतर कीमतों की तलाश में हैं।
    बागवानी में तेज़ी – मालवा क्षेत्र में आम के बाग और छत्तीसगढ़ सीमावर्ती इलाकों में टमाटर की खेती लगभग 12% CAGR की दर से बढ़ी है, जिसे राज्य के “मध्य प्रदेश बागवानी मिशन” से समर्थन मिला है।
    वैल्यू एडिशन – उत्पादन क्षेत्रों के पास छोटे पैमाने की प्रोसेसिंग यूनिट (जैसे, टमाटर प्यूरी, आम का गूदा) उभर रही हैं, जिससे फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान (वर्तमान में फलों के लिए लगभग 15%) में कमी आ रही है।

    1. पशुधन और मत्स्य पालन
      पशुधन क्षेत्र 13% (वास्तविक रूप से) और मत्स्य पालन 15% की प्रभावशाली दर से बढ़ रहा है। बलराम तालाब योजना और अन्य जल निकाय परियोजनाओं के साथ, MP ने लाखों हेक्टेयर सिंचित भूमि जोड़ी है, जिससे पहले के सूखे इलाके फलते-फूलते मछली फार्म और डेयरी हब में बदल गए हैं।
      पशुधन विकास – यह क्षेत्र डेयरी सहकारी समितियों और “बलराम तालाब योजना” द्वारा संचालित होकर सालाना लगभग 13% (वास्तविक रूप से) की दर से विस्तार कर रहा है, जिसने मछली पालन के लिए 2 मिलियन हेक्टेयर से ज़्यादा जल निकाय बनाए हैं।
      मत्स्य पालन की क्षमता – वार्षिक मछली उत्पादन 1 मिलियन टन से ज़्यादा हो गया है, जिसमें कार्प और पंगासियस पर ध्यान केंद्रित किया गया है। राज्य का लक्ष्य 2028 तक 2 मिलियन टन तक पहुंचना है।
      महिलाओं की भागीदारी – 30% से ज़्यादा पशुधन से संबंधित उद्यम महिलाओं के स्वामित्व या प्रबंधन में हैं, खासकर “मध्य प्रदेश महिला डेयरी विकास कार्यक्रम” में।
    2. डिजिटलीकरण और बाज़ार सुधार
      राज्य का ई-अनुज्ञा प्लेटफॉर्म और आने वाला एग्री स्टैक मंडी संचालन को सुव्यवस्थित कर रहे हैं, किसानों को वास्तविक समय में कीमतों की जानकारी दे रहे हैं और बिचौलियों को कम कर रहे हैं। ये उपकरण “डिजिटल मंडी” विज़न की दिशा में एक बड़ा कदम हैं जो उत्पादकों को राज्य के अंदर और बाहर दोनों जगह सीधे खरीदारों से जोड़ सकता है।
      ई-अनुज्ञा प्लेटफॉर्म – एक एकीकृत डिजिटल बाज़ार जो > 150 वस्तुओं के लिए वास्तविक समय में कीमतों की जानकारी प्रदान करता है, जिससे ≈ 3 मिलियन किसानों को लाभ होता है।
      एग्री स्टैक और GIS मैपिंग – भूमि उपयोग योजना, मिट्टी स्वास्थ्य निगरानी और लक्षित सब्सिडी वितरण में मदद करता है।
      कोल्ड चेन विस्तार – राज्य ने पिछले तीन वर्षों में ≈ 1,200 मीट्रिक टन रेफ्रिजरेटेड भंडारण क्षमता जोड़ी है, जिससे खराब होने वाली वस्तुओं के खराब होने में कमी आई है।
    3. सरकारी योजनाओं की भरमार
      मुख्य मंडी किसान कल्याण योजना (इनपुट के लिए वित्तीय सहायता) से लेकर भावांतर भुगतान योजना (कीमत में कमी का भुगतान) तक, MP ऐसी कई योजनाएँ शुरू कर रहा है जो खेती के जोखिम को कम करती हैं और आधुनिक तरीकों को प्रोत्साहित करती हैं। मृदा स्वास्थ्य कार्ड, सूक्ष्म सिंचाई सब्सिडी, और कृषि ऋण समाधान के तहत ब्याज मुक्त ऋण भी इस पैकेज का हिस्सा हैं।
      मुख्य मंडी किसान कल्याण योजना – बीज, उर्वरक और मशीनरी के लिए सीधी वित्तीय सहायता।
      भावांतर भुगतान योजना – चुनिंदा फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी देती है, जिससे किसानों को बाज़ार की अस्थिरता से बचाया जा सके।
      मृदा स्वास्थ्य कार्ड और सूक्ष्म सिंचाई सब्सिडी – संतुलित उर्वरक उपयोग और जल बचत प्रौद्योगिकियों को प्रोत्साहित करती है; पात्र खेतों में इसका उपयोग बढ़कर ≈ 45% हो गया है।
      कृषि ऋण समाधान – छोटे पैमाने के कृषि उद्यमों के लिए ₹5 लाख तक का ब्याज मुक्त ऋण।
      सफलता की कहानियाँ जो प्रेरित करती हैं
    4. भोपाल में मशरूम का जादू – बायोकेमिस्ट्री ग्रेजुएट डॉ. बसु ने एक खाली कमरे में सिर्फ 50 मशरूम बैग से शुरुआत की। आज, उनका इंडोर फार्म हर महीने लगभग ₹5 लाख कमाता है, और वह दर्जनों महिलाओं को इस मॉडल को दोहराने की ट्रेनिंग दे रही हैं, जिससे एक साधारण फंगस का प्रयोग ₹60 लाख से ज़्यादा के एंटरप्राइज में बदल गया है।
    5. इंदौर में दालों और मक्के में उछाल – सांवेर के लखन पटेल जैसे किसानों ने अच्छे मार्केट संकेतों और अच्छी पैदावार के कारण अपनी कई एकड़ ज़मीन पर मक्का उगाना शुरू कर दिया है। नतीजा? मक्के की खेती के रकबे में 50% की बढ़ोतरी और क्षेत्रीय खाद्य सुरक्षा में एक खास सुधार।
    6. महिलाओं के नेतृत्व वाली वैल्यू चेन – मध्य प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के ज़रिए, महिलाओं के सेल्फ हेल्प ग्रुप को सामुदायिक संस्थानों से जोड़ा जा रहा है, जिससे उन्हें पारंपरिक खेती से मार्केट-ओरिएंटेड कृषि उद्यमों की ओर बढ़ने में मदद मिल रही है। ये पहल ग्रामीण महिलाओं के लिए एजेंसी, गतिशीलता और आय बढ़ा रही हैं।
      बची हुई चुनौतियाँ
      इतनी तेज़ी के बावजूद, MP का कृषि क्षेत्र चुनौतियों से मुक्त नहीं है:
    7. सोयाबीन की कीमतों में उतार-चढ़ाव – सोयाबीन एक प्रमुख फसल बनी हुई है, लेकिन वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव इसे कई छोटे किसानों के लिए जोखिम भरा सौदा बना देता है। सोयाबीन की कीमतों में सालाना ± 20% का उतार-चढ़ाव होता है, जिससे छोटे किसानों के कैश फ्लो पर असर पड़ता है।
    8. मार्केटिंग उदारीकरण – जबकि ई-मंडियां आशाजनक हैं, फिर भी कई किसान टूटी हुई सप्लाई चेन और कोल्ड स्टोरेज तक सीमित पहुंच से जूझ रहे हैं। ई-मंडियों के बावजूद, कई किसान अभी भी सीमित परिवहन और भंडारण के कारण स्थानीय व्यापारियों पर निर्भर हैं।
    9. विस्तार सेवाएँ – कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs) की मांग उनके स्टाफ से कहीं ज़्यादा है, जिससे नवीनतम तकनीक को खेतों तक पहुंचाने में बाधा आती है। विस्तार सेवाओं में कमी – KVKs (कृषि विज्ञान केंद्र) केवल लगभग 30% किसान आबादी को सेवा देते हैं, जिससे कई लोग नवीनतम कृषि सलाह से वंचित रह जाते हैं।
    10. क्रेडिट की कमी – हालांकि योजनाएं मौजूद हैं, लेकिन औपचारिक क्रेडिट की पहुंच कुल कृषि क्रेडिट ज़रूरतों के लगभग 45% तक ही है।
      भविष्य कैसा दिखता है
      अगर मौजूदा ट्रेंड जारी रहा, तो MP भारत में टिकाऊ, ज़्यादा ग्रोथ वाली खेती के लिए एक मॉडल बन सकता है। राज्य का कन्वर्जेंस पर ज़ोर—KVKs, ATMA, और राज्य के एक्सटेंशन वर्कर्स को एक साथ लाना—हर साल हर ज़िले में कम से कम 5,000 किसानों तक एडवांस्ड टेक्नोलॉजी पहुँचाने का लक्ष्य रखता है। इसमें एग्रो फॉरेस्ट्री, प्रिसिशन फार्मिंग, और AI आधारित उपज के पूर्वानुमान को भी जोड़ दें, तो आपके पास मज़बूत, मुनाफ़े वाली खेती का नुस्खा तैयार है।
      टेक्नोलॉजी का कन्वर्जेंस – राज्य ने KVKs, ATMA (एग्रीकल्चरल टेक्नोलॉजी मैनेजमेंट एजेंसी), और AI आधारित उपज के पूर्वानुमान को इंटीग्रेट करके हर साल हर ज़िले में 5,000 किसानों तक प्रिसिशन एग्रीकल्चर टूल्स पहुँचाने की योजना बनाई है।
      एग्रो फॉरेस्ट्री पर ज़ोर – मिट्टी की सेहत सुधारने और कार्बन क्रेडिट जेनरेट करने के लिए पेड़ वाली फसलों के तहत अतिरिक्त 2 मिलियन हेक्टेयर ज़मीन को टारगेट करना।
      प्राइवेट सेक्टर के साथ पार्टनरशिप – ड्रोन आधारित स्प्रेइंग, मिट्टी की नमी के सेंसर, और मार्केट लिंकेज प्लेटफॉर्म के लिए एग्रीटेक स्टार्टअप के साथ नए सहयोग।
      सस्टेनेबिलिटी पर फोकस – खेती को क्लाइमेट रेज़िलिएंट बनाने के लिए पानी बचाने वाली फसलों (जैसे, बाजरा) और रिन्यूएबल एनर्जी से चलने वाली खेती पर ज़ोर।
      नए एग्री एंटरप्रेन्योर्स के लिए संदेश साफ़ है: ज़मीन उपजाऊ है, नीतियां सहायक हैं, और बाज़ार भूखा है। चाहे वह मशरूम का वेंचर हो, हाई वैल्यू वाला बागवानी प्रोजेक्ट हो, या टेक इनेबल्ड सप्लाई चेन हो, MP एक ऐसा खेल का मैदान देता है जहाँ आइडिया जल्दी से असर में बदल सकते हैं।
      निष्कर्ष:
      मध्य प्रदेश सिर्फ़ फसलें नहीं उगा रहा है—यह एग्री एंटरप्राइज़ का एक बिल्कुल नया इकोसिस्टम तैयार कर रहा है। डिजिटल टूल्स, सरकारी मदद, और इनोवेटिव किसानों की लहर के साथ, राज्य अपने खेतों को सचमुच दौलत पैदा करने वाले इंजन में बदलने की राह पर है। MP का एग्री एंटरप्राइज़ लैंडस्केप तेज़ी से बदल रहा है, जो हाई वैल्यू फसलों, पशुधन की ग्रोथ, डिजिटल मार्केटप्लेस, और सहायक नीतियों से प्रेरित है। हालांकि चुनौतियाँ बनी हुई हैं, टेक्नोलॉजी का कन्वर्जेंस और मज़बूत सरकारी समर्थन राज्य को टिकाऊ, मुनाफ़े वाली खेती के लिए एक राष्ट्रीय मॉडल बनने की स्थिति में लाता है। अगर आप इसमें उतरने की सोच रहे हैं, तो यही सही समय है!
      स्रोत:
    11. किस्मत के खेत: मध्य प्रदेश में उद्यम के रूप में कृषि… minutespedia.in
    12. अनुकूल मौसम के कारण इंदौर संभाग के किसान दालों और मक्के की खेती की ओर रुख कर रहे हैं… टाइम्स ऑफ इंडिया
    13. मध्य प्रदेश के कृषि मुनाफे में परिवर्तनकारी रुझान: 2020 से 2023 तक का एक व्यापक विश्लेषण… mpkonnect.com
    14. NRLM के सामुदायिक संस्थानों के माध्यम से SHG महिलाओं के नेतृत्व में वैल्यू चेन बनाना… imagogg.org
    15. भोपाल की महिला ने 50 मशरूम बैग को 60 लाख रुपये के वेंचर में बदला और स्थानीय महिलाओं को कमाने के लिए प्रशिक्षित किया… thebetterindia.com
    16. सतत कृषि विकास के मध्य प्रदेश मॉडल का पालन करें… arunanchaltimes.in
  • प्रेस इंफार्मेशन सेंटर पहुंचे मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल

    प्रेस इंफार्मेशन सेंटर पहुंचे मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल

    भोपाल,15 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल आज अचानक प्रेस इंफार्मेशन सेंटर के दफ्तर पहुंचे। उन्होंने यहां जनसंवेदना कल्याण फाउंडेशन के संस्थापक अध्यक्ष श्री राधेश्याम अग्रवाल के 80वें जन्मदिवस के मौके पर उन्हें बधाई दी।


    इस अवसर पर प्रेस इंफार्मेशन सेंटर के अध्यक्ष आलोक सिंघई, पत्रकार उदयभानु सिंह, और जय जनतंत्र सागर के संपादक डाक्टर रवीन्द्र सिलाकारी ने भी श्री अग्रवाल को जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं। श्री आशीष अग्रवाल ने राधेश्याम जी को शाल और पुष्पगुच्छ भेंट कर उनके दीर्घायु जीवन की कामना की। उन्होंने श्री अग्रवाल से केक कटवाकर जन्मदिन उल्लास पूर्वक मनाया।


    भाजपा नेता आशीष अग्रवाल ने कहा कि “श्री राधेश्याम जी का जीवन मानव सेवा, संवेदना और निस्वार्थ समाजसेवा का जीवंत उदाहरण है। जनसंवेदना संस्था ने पिछले दो दशकों से निराश्रित और लावारिस व्यक्तियों के अंतिम संस्कार का जो कार्य किया वह समाज के लिए प्रेरणा देने वाला है।”


    इस अवसर पर जनसंवेदना परिवार के सदस्यों एवं शुभचिंतकों ने भी भावपूर्ण वातावरण में जन्मदिवस मनाया और सेवा संकल्प को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।

  • गुजरातियों का घंटा बजाने निकले कैलाश की छाती पर क्यों मच रहा तांडव

    गुजरातियों का घंटा बजाने निकले कैलाश की छाती पर क्यों मच रहा तांडव

    -आलोक सिंघई-

          “मालव धरती धीर गंभीर, डग डग रोटी पग पग नीर” (Malav dharti dheer gambhir, dag dag roti pag pag neer) यह कहावत मालवा क्षेत्र की उपजाऊ, समृद्ध और जल-संपन्न भूमि का वर्णन करती है, जिसका अर्थ है कि यह धरती बहुत उपजाऊ है जहाँ हर कदम पर रोटी (अनाज) और हर पग पर पानी (जल) उपलब्ध है ।पहली बार दुनिया को पता चला कि सफाई के तमगे जीतते इंदौर का पानी अब पूरी तरह जहरीला हो चुका है। इतना कि उसने लगभग दो दर्जन लोगों की बलि ले ली। वैसे तो शहर के भागीरथपुरा में दो सौ से अधिक लोग गंभीर स्तर पर बीमार पड़े लेकिन हजारों लोगों का मन आज भी घिन से भरा हुआ है जिन्हें स्थानीय निकाय और जन प्रतिनिधियों की लापरवाही की वजह से मलमूत्र भरा पानी पीने को मजबूर होना पड़ा। इस घटना के बावजूद खुद को शहर का भाग्यविधाता समझने का दंभ भरने वालों का दिल नहीं पसीजा। इन मौतों के बाद हाल ही में उनके परिवार की एक शादी का समारोह जितने बड़े पैमाने पर मनाया गया उससे पता चलता है कि वहां के जन प्रतिनिधि अब एक अलग ही नशे में मदमस्त घूम रहे हैं।

         कांग्रेस के राजकुमार राहुल गांधी सत्रह जनवरी को इंदौर आ रहे हैं। उनकी कांग्रेस इस घटना पर इसी दिन पूरे प्रदेश में भी विरोध प्रदर्शन करेगी। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा की राजनीति और स्थानीय नेताओं की अकुशलता की वजह से लोगों को अपने परिजनों का बिछोह सहना पड़ रहा है। दरअसल इंदौर की इस घटना से न केवल मालवा बल्कि पूरे प्रदेश और देश के लोगों का मन विक्षोभ से भरा हुआ है। यही वजह है कि कांग्रेस जैसे समयातीत हो चले राजनीतिक दल के नेता भी अंगड़ाई लेने लगे हैं। कुछ दिनों पहले मध्यप्रदेश का बंटाढ़ार करने में निपुण दिग्विजय सिंह ने भी एक अखबार में आलेख के माध्यम से भाजपा की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की थी। इस टसुए बहाते लेख के माध्यम से दिग्विजय ने गुजरातियों पर निशाना साधा था।उनका कहना था कि राज्य की पंचायतों तक में गुजरातियों को जो ठेके दिए गए उनसे राज्य की स्थिति बिगड़ी है। कई गुजराती ठेकेदार तो बगैर काम किए भुगतान लेकर रफूचक्कर हो गए। उन्होंने भाजपा के जिन नेताओं से जुड़े ठेकेदारों को पेटी कांट्रेक्ट दिए उन्होंने भी काम नहीं किया। इस वजह से राज्य और इंदौर की ये दुर्दशा हुई है।

    कवि दुष्यंत कुमार की साए में धूप की कुछ लाईनें आज ज्यादा प्रासंगिक हो रहीं हैं। कि

    कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं,गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं।

    अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं

         शहरी नियोजन की विफलता को दर्शाने के लिए दिग्विजय ने जो लेख लिखा वह वास्तव में एक गहरी और अंदरूनी राजनीति का प्रकटीकरण बताया जा रहा है। पिछले लगभग ढाई दशकों से दिग्विजय सिंह मंदड़िए की तरह दांव खेल रहे हैं। शतरंज के पांसे फेंकते चुन्नू मुन्नू ने जिस तरह भाजपा की सत्ता में अपने महल खड़े किए उससे मध्यप्रदेश की राजनीति को आसानी से समझा जा सकता है। महापौर रहते हुए कैलाश विजयवर्गीय पर जिस पेंशन घोटाले का आरोप लगा था उसे अदालत ने सत्रह सालों बाद इसलिए खारिज कर दिया क्योंकि सरकार ने इस मामले में अभियोजन की स्वीकृति ही नहीं दी।

          इस मामले में कांग्रेस के नेता के के मिश्रा का आरोप है कि कैलाश विजयवर्गीय ने महापौर बनने के बाद परिषद की पहली बैठक में ही संकल्प पारित करवा लिया कि पेंशनधारियों को नंदानगर सहकारी साख संस्था के माध्यम से भुगतान किया जाएगा। इसके बाद अपात्र लोगों को जमकर पेंशन का भुगतान किया गया। जांच में घोटाले की रकम 33 करोड़ से ज्यादा आंकी गई थी। मिश्रा ने कोर्ट में एक परिवाद दायर कर तत्कालीन महापौर कैलाश विजयवर्गीय, महापौर परिषद यानि एमआईसी के तत्कालीन सदस्य रमेश मेंदोला, पूर्व महापौर उमाशशि शर्मा, तत्कालीन सभापति और अब सांसद शंकर लालवानी, तत्कालीन निगमायुक्त संजय शुक्ला समेत 14 लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी, अमानत में खयानत, कूट रचना का आरोप लगाते हुए इन पर आपराधिक प्रकरण चलाने की मांग की थी।

           इसके बाद इंदौर जिस तरह राजनेताओं के धन उलीचने का अड्डा बना उसने तो पूरे इंदौर को ही लुटेरा बना दिया। इंदौर के चमकते विकास की अंतर्कथा ये साबित करती है कि जैसा राजा हो प्रजा वैसी ही हो जाती है। इसे समझने के लिए वहां के अस्पतालों की कहानिया हीं काफी हैं। छह आठ महीने पहले मेडीकल कालेज के सामने स्थित एक अस्पताल में जब मरीज के परिजनों ने देखा कि उन्हें थमाए गए बिल में एक ही खर्च कई बार दुहराया गया है तो उन्होंने अस्पताल के मालिक से बात की। इसके साथ ही उन्होंने स्थानीय मंत्रीजी से भी निवेदन किया कि अस्पताल बेवजह वसूली जा रही इस राशि का बिल संशोधित कर ले। मंत्रीजी के कार्यालय से अस्पताल प्रबंधक को फोन भी किया गया। इस पर प्रबंधक ने मरीज के परिजनों को दो टूक इंकार करते हुए कहा कि चुनाव से पहले मंत्रीजी उनसे पचपन लाख रुपए का चंदा ले चुके हैं। ऐसे में यदि वे मरीजों से भरपाई नहीं करेंगे तो फिर उन्हें अस्पताल बंद करना पड़ेगा।

             यही स्थिति वहां के तमाम कारोबारियों की  हो गई है। इंदौर में पदस्थ रहे पुलिस के एक बड़े अधिकारी का कहना है कि अब ये शहर एक दूसरे पर टोपी धरने में महारथ हासिल कर चुका है। एक नागरिक का बेशकीमती प्लाट नेता नगरी के एक गुंडे ने हथिया लिया। जब वह बिल्डर मंत्रीजी के सामने पहुंचा तो उन्होंने अपने दरबार में गुंडे की पेशी करवाई। गुंडा पूरी तैयारी से दस्तावेज लेकर पहुंचा और उसने कहा कि प्लाट तो उसी का है, भैया बेवजह उस पर दावा जता रहे हैं। हूबहू कागज देखकर बिल्डर चकरा गया। नेताजी ने उसे समझाया कि आपस में समझ लो। बड़ी अनुनय विनय के बाद बिल्डर ने अपना ही प्लाट दो करोड़ रुपये की अड़ीबाजी चुकाकर वापस पाया।

           ये घटनाएं तो आज आम हैं। घर घर में ये विष फैल चुका है। बहनें भाई की संपत्ति पर अड़ी बाजी कर रहीं हैं। कोई ससुराल का जेवर हड़पकर भाग रही है कोई रिश्तेदारों को अच्छे इलाज का प्रलोभन दिखाकर उनकी संपत्तियां लुटवा रहा है। लड़के लड़कियां चमक दमक के फेर में टोपी पहिनते पहिनाते दिख रहे हैं। लगभग ढाई दशकों में भोला भाला इंदौर बिल्कुल बदल गया है। एक नया ही शैतान वहां के जेहन में बैठ गया है। जो इंदौर कभी उत्पादक था वह आज शातिर कारोबारी माफिया बन चुका है।

            भागीरथ पुरा की घटना भी इसी जहरीली राजनीति और काले धन की हवस की भेंट चढ़ा है। अपना दामन छुड़ा रहे भाजपा के नेताओं ने अपने जिस बंटाढार सरगना से गुजराती लाबी पर सवालिया निशान लगवाया है वह केवल आधा सच है। ये बात सही है कि गुजरात से आए कुछ ठेकेदारों ने शिवराज सिंह चौहान की पिलपिली सरकार को ठगी का पप्पू बना रखा था। शहरी नवीनीकरण के नाम पर आई योजनाओं में खुलेआम खा खा खैया का खेल खेला गया। लेकिन इससे भागीरथपुरा का अभिशाप नहीं ढांका जा सकता है।सबसे ज्यादा राजस्व उपार्जन करने वाला इंदौर नगर निगम अपनी जल मल व्यवस्था को चलाने के लिए खुद सक्षम है। उस पर किसी केन्द्रीय योजनाओं की लूट का कोई असर क्यों पड़ना चाहिए था। दरअसल योजनाओं की इस लूट में सहयोगी बने भाजपा के नेताओं को जरा भी फिक्र नहीं थी कि उनके शहर की पाईप लाईनें सड़ चुकी हैं। उन्हें बदला भी जाना चाहिए। तेज आबादी का बोझ झेलते शहर में नई पाईप लाईनें भी विकसित की जानी थी। वे तो बस उन कागजी योजनाओं में अपना हिस्सा लेकर खिसक लिए । नृशंस लापरवाही पर सवालों के जवाब में घंटा बताते नेताओं को देखकर भविष्य की राजनीति की दिशा आसानी से समझी जा सकती है।

             जबसे कैलाश जी को पश्चिम बंगाल का प्रभार दिया गया और भारी संसाधन झोंकने के बाद ममता दीदी का प्रसाद खाने वाले वामपंथियों ने वहां भाजपा की दाल नहीं गलने दी तबसे भाजपा में कई स्तरीय चिंतन चलता रहा है। इस बार एक लाबी कह रही थी कि पिछले अनुभवों का लाभ लेने के लिए कैलाश जी को दुबारा उस मोर्चे पर भेजा जाए। इस जमावट को करीब से देख रहे उनके विरोधियों ने कलकत्ता के उन उद्योगपतियों से चंदा वसूली के प्रमाण हाईकमान के समक्ष रख दिए कि जिन्हें केन्द्र ने युद्ध में सहयोग के लिए तैनात किया था। जाहिर है कि भाजपा हाईकमान अपनी इस गलती को दुबारा कैसे दुहरा सकता था। इस बीच भागीरथ पुरा हो गया और अपनी गलती को छुपाने के लिए गुजरातियों पर ठीकरा फोड़ने की नादानी भी सामने आ गई। इस एपीसोड के बाद भाजपा के कई अन्य नेताओं को आशा की किरणें दिखने लगी हैं और वे अपने कुर्ते पजामे पर कलफ लगवाने में जुट गए हैं। रही सही कसर पूरी करने के लिए कांग्रेसियों ने भी खम ठोक दिया है।

  • फोरेंसिक साक्ष्यों ने दंड की प्रक्रिया ज्यादा सटीक बनाईःकैलाश मकवाना

    फोरेंसिक साक्ष्यों ने दंड की प्रक्रिया ज्यादा सटीक बनाईःकैलाश मकवाना


    भोपाल09 जनवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Indian Evidence Act, 2023) और भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita – BNS),ने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) को और भी ज्यादा सटीक बना दिया है। इससे अपराधियों को दंड दिलाना सरल हुआ है। यही वजह है कि अपराध की रोकथाम में पुलिस की पहल कानून के लिए ज्यादा उपयोगी हो गई है।मध्यप्रदेश में अपराधियों को दंड दिलाने के मामलों को देखकर कानून की सटीकता आसानी से समझी जा सकती है। नव वर्ष मिलन समारोह में पत्रकारों से अनौपचारिक चर्चा करते हुए पुलिस महानिदेशक कैलाश मकवाना ने कानून व्यवस्था के कई पहलुओं पर प्रकाश डाला।


    श्री मकवाना ने कहा कि मध्यप्रदेश की पुलिस अपनी सामाजिक जिम्मेदारी के मानदंडों पर खरी साबित हुई है। हमने पुलिसिया अत्याचार को रोका है लेकिन अपराध पर लगाम लगाने में सफलता पाई है। अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारियों के बीच राज्य की पुलिस आम जनता के ज्यादा करीब पहुंची है। समाज के बीच से ही पुलिस के अधिकारी आते हैं और अपने अपने नजरिए से अपराध की रोकथाम के नवाचार करते हैं।


    उन्होंने बताया कि हमने जनता से लूटा गया माल वापस दिलाने में बड़ी कामयाबी पाई है। मोबाईल या वाहन चोरी की बरामदगी पहले की तुलना में ज्यादा सरल हुई है। नई पीढ़ी के पुलिस कर्मियों ने पुलिस की कई बुराईयां दूर की हैं। इसके बावजूद हमें अभी बहुत प्रयास करने हैं। हमने पुलिस सुधार का पूरा खाका बनाया है। हर पीढ़ी के नए अधिकारी आकर इसमें कुछ न कुछ सुधार करते जाते हैं। यही कड़ी हमें ज्यादा कारगर बना रही है। मैंने स्वयं अपने कार्यकाल में इस निरंतरता को बनाए रखने का प्रयास किया है। निश्चित तौर पर भविष्य में भी पुलिस की यही गरिमा बनी रहेगी।