लगातार शिकायतों और पत्रकारों के विरोध दर्ज कराए जाने के बाद मध्यप्रदेश शासन ने जनसंपर्क संचालनालय में नर्मदापुरम संभाग के उपायुक्त(राजस्व) गणेश कुमार जायसवाल को अपरसंचालक के पद पर भेजा है। राज्य प्रशासनिक सेवा के 2012 बैच के इस युवा अधिकारी की पदस्थापना से जनसंपर्क विभाग के खासतौर पर अधिकारी वर्ग में बैचेनी की लहर दौड़ गई है। पहली बार वे शासन के निर्णय के खिलाफ एकजुट होकर कलमबंद हड़ताल पर उतर आए हैं। जनसंपर्क कमिश्नर दीपक सक्सेना से चर्चा के दौरान विभाग के अधिकारियों का तर्क था कि वे बरसों से इस विभाग में सरकार की छवि सुधारने का काम करते हैं इसके बावजूद सरकार ने एक राजस्व विभाग के एक जूनियर अधिकारी को भेजकर हमारा अपमान किया है। हमें प्रमोशन भी वक्त पर नहीं मिलते हैं और रात दिन हम सरकार की छवि सुधारने में जुटे रहते हैं। इसके बावजूद सरकार ने बाहिरी व्यक्ति को भेजकर हम पर अविश्वास जताया है जो अपमानजनक है। इस संबंध में सामान्य प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय कुमार शुक्ल से अभी बात नहीं हो पाई है लेकिन जो जानकारियां छनकर बाहर आ रहीं हैं उनके मुताबिक सरकार ने आधिकारिक फीड बैक के आधार पर ही राजस्व विभाग के अधिकारी की नियुक्ति की है। यही नहीं विभाग के अपर मुख्य सचिव पद पर भारतीय प्रशासनिक सेवा के 1993 बैच के वरिष्ठ आईएएस अनुपम राजन को शासन की ओर से जवाबदारी सौंपी गई है। मुख्य सचिव अनुराग जैन के इस फैसले पर तो कोई सवाल नहीं उठाया जा रहा है लेकिन सामान्य प्रशासन विभाग के फैसले पर अधिकारियों का विरोध सबको चौंका रहा है। अधिकारियों के इस विरोध प्रदर्शन में विभाग के कर्मचारियों ने भी कलमबंद हड़ताल को समर्थन दिया है लेकिन वे अंदरूनी तौर पर खामोश हैं। विज्ञापन माफिया ने इस कलमबंद हड़ताल में जनसंपर्क संवर्ग के अधिकारियों को समेट लिया है। उनके माध्यम से वे सरकार पर दबाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं। इस विरोध प्रदर्शन में कुछ पत्रकार संगठन भी कूद पड़े हैं। दरअसल में कुछ सालों से जनसंपर्क विभाग ने ऐसे गठरियों पत्रकार संगठन खड़े कर दिये हैं जिन्हें साथ लेकर विभाग के अधिकारी अपने फैसले लेते रहे हैं। खबरों के फैसले तो वे स्वयं ले लेते हैं लेकिन विज्ञापन के फैसलों में पत्रकार संगठनों को भी अपने साथ खड़ा कर लिया जाता है। इस गठजोड़ में शामिल माफिया शख्सियतें विभाग के माध्यम से लगभग आठ सौ करोड़ रुपयों से अधिक की राशि गड़प जाती हैं। पहली बार शासन ने विज्ञापन के नाम पर बजट की लूटपाट के इस धंधे पर लगाम कसने का प्रयास किया है। जाहिर है राजस्व विभाग का प्रशासनिक अधिकारी आयव्यय के सभी रिकार्ड पर भी निगरानी करेगा इससे जनसंपर्क विभाग के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों को अपने काले कारनामों की कलई खुल जाने का भय लग रहा है। पत्रकारों की आड में दलाली करने वाले जिन कथित पत्रकारों ने इस घोटाले में लाभ उठाना अपना जन्मसिद्ध अधिकार बना रखा है वे भी इस फैसले से बौखलाए हुए हैं। केन्द्रीय स्तर पर प्रेस सेवा पोर्टल के माध्यम से भारत सरकार ने मीडिया को व्यवस्थित करने का अभियान चला रखा है। इससे पत्रकारों को काफी कठिनाई हो रही है। जबकि राज्य स्तर पर जनसंपर्क विभाग के अधिकारियों की प्रशासनिक अकुशलता की वजह से पत्रकारों के लिए आबंटित की जाने वाली राशि गैर पत्रकारों के पास पहुंच रही है। सत्तारूढ़ दल की सिफारिशों पर भी इस राशि का बड़ा हिस्सा साईफन कर लिया जाता है। ऐसे में पत्रकार वंचित रह जाते हैं और कलंक की कालिख उनके माथे पड़ जाती है। शासन की जवाबदारी है कि वह वास्तविक पत्रकारों को संवाद की भूमिका निभाने के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए । वह अपना दायित्व निभाने के लिए जब फैसले ले रही है तो माफिया ताकतें इस फैसले को रोकने में जुट गईं हैं। ऊटपटांग के तर्क देकर वे इसे अपमान का कारण बता रहे हैं ।मध्यप्रदेश सरकार के वित्तीय संसाधनों पर ही जनसंपर्क विभाग के अधिकारियों कर्मचारियों को वेतन मिलता है और उन्हीं संसाधनों से राज्य प्रशासनिक सेवा के अन्य संवर्ग के अधिकारियों को वेतन मिलता है। इन सभी की जिम्मेदारी है कि वे प्रदेश की बेहतरी के लिए कार्य करें।ऐसे में राजस्व विभाग के वित्तीय प्रबंधन में कुशल अधिकारी की पदस्थापना स्वागत योग्य फैसला है। शासन को यदि अपने प्रशासनिक सुधारों पर जन समर्थन चाहिए तो उसे पत्रकारों की आड़ में पनप चुके विज्ञापन माफिया को उखाड़ फेंकना होगा तभी शासन और सरकार जनता की ओर से दिए गए अपने दायित्वों का निर्वहन सही तरीके से कर पाएंगे । फिलहाल शासन को अपने फैसले पर अडिग रहना होगा और माफिया की गीदड़ भभकियों को नजरंदाज करना होगा। वैसे भी सरकार की छवि बनाने बिगाड़ने का कार्य सोशल मीडिया संभाल चुका है। दलालों को बाहर किया जाएगा तो इसका सर्वत्र स्वागत किया जाएगा।
जनसंपर्क माफिया में कोहराम

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