-आलोक सिंघई-
मध्यप्रदेश को अक्सर “भारत का हृदय” कहा जाता है — और आर्थिक संकेतक बताते हैं कि यह राज्य अब सचमुच भारत के विकास-मानचित्र पर एक अहम स्थान लेता जा रहा है। वर्ष 2024–25 में राज्य का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) लगभग 15.03 लाख करोड़ रुपए तक पहुँच गया है, जो 11.05 प्रतिशत की प्रभावशाली वृद्धि दर्शाता है। यह दर राष्ट्रीय औसत से बेहतर है और राज्य की आर्थिक गतिशीलता का संकेत देती है। राज्य की प्रति व्यक्ति आय भी बढ़कर लगभग 1.52 लाख रुपए तक पहुँची है। हालांकि यह वृद्धि उत्साहजनक है, फिर भी यह महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक जैसे अग्रणी राज्यों से कम है।
मध्यप्रदेश की अर्थव्यवस्था अब केवल खेती पर निर्भर नहीं है। सोयाबीन, गेहूँ और तिलहन के उत्पादन प्रेोसेसिंग में अग्रणी होने के साथ, राज्य ने अब औद्योगिक निवेश और निर्यात में भी उल्लेखनीय प्रगति की है। वर्ष 2024–25 में राज्य की निर्यात रैंकिंग 15वें से सुधरकर ग्यारहवें स्थान पर पहुँच गई है। इंदौर, भोपाल, पीथमपुर और मंडीदीप जैसे औद्योगिक क्षेत्र अब तकनीक, इंजीनियरिंग और फार्मा उत्पादों के नए केंद्र बन रहे हैं। राज्य ने पिछले वर्ष ढाई हजार करोड़ रुपयों से अधिक के तकनीकी निवेशों को आकर्षित किया है। यही वजह है कि राज्य अब धीरे-धीरे एक “डिजिटल पावरहाउस” के रूप में उभर रहा है।
विकास के इन सकारात्मक संकेतों के बावजूद, सामाजिक क्षेत्र अभी भी मध्यप्रदेश की कमजोर कड़ी है। राज्य की साक्षरता दर लगभग सत्तर फीसदी है, जो राष्ट्रीय औसत से कम है। स्कूलों में इंटरनेट कनेक्टिविटी सिर्फ पैंतीस प्रतिशत तक सीमित है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों से प्रतिभाओं की प्राप्ति कठिन बनी हुई है। जो ग्रामीण अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देना चाहते हैं उन्हें इसकी मंहगी कीमत चुकाकर बच्चों को बड़े शहरों में भेजना पड़ता है।
स्वास्थ्य के पैमाने पर भी राज्य कठिन संकटों से जूझ रहा है। भारी धनराशि खर्च करने के बावजूद कार्यकुशल आबादी का सवास्थ्य चिंताजनक बना हुआ है। शिशु मृत्यु दर लगभग 43 प्रति 1000 जन्म है, और ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों की उपलब्धता सीमित है। मानव विकास सूचकांक (HDI)0.611 के आसपास है, जो भारत के कई अन्य राज्यों से नीचे है।
यदि कोई क्षेत्र है जिसमें मध्यप्रदेश ने राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाया है, तो वह है स्वच्छता और आधारभूत ढाँचे का विकास। इंदौर लगातार सातवीं बार भारत का सबसे स्वच्छ शहर घोषित हुआ है। बिजली, सड़क, और ग्रामीण कनेक्टिविटी के क्षेत्र में पिछले दशक में उल्लेखनीय सुधार हुए हैं। राज्य ने वर्ष 2024–25 में 1.01 लाख मिलियन यूनिट बिजली ट्रांसमिट कर नया रिकॉर्ड बनाया।
राज्य सरकार ने लाड़ली बहना योजना,मुख्यमंत्री उद्यम क्रांति योजना और कृषि निवेश प्रोत्साहन कार्यक्रमों के ज़रिए सामाजिक व आर्थिक समावेशन को बढ़ावा देने का प्रयास किया है इसके बावजूद बेरोज़गारी, महिला सुरक्षा और भ्रष्टाचार जैसी समस्याएँ अब भी जनता के बीच चिंता का कारण हैं।
अन्य राज्यों से तुलना
| संकेतक | मध्यप्रदेश | गुजरात | महाराष्ट्र | कर्नाटक | उत्तरप्रदेश |
|---|---|---|---|---|---|
| GSDP वृद्धि दर (2024–25) | 11.05% | 9.3% | 8.1% | 9.8% | 9.1% |
| प्रति व्यक्ति आय (₹) | 1.52 लाख | 2.74 लाख | 2.85 लाख | 2.65 लाख | 1.45 लाख |
| साक्षरता दर (%) | 70 | 79 | 82 | 76 | 68 |
| HDI | 0.611 | 0.682 | 0.696 | 0.685 | 0.613 |
*स्रोत: NITI Aayog, आर्थिक सर्वेक्षण 2024–25, Free Press Journal, Times of India, ET Government Reports
मध्यप्रदेश आज एक तेजी से बढ़ता, परंतु चुनौतियों से जूझता राज्य है। जहाँ आर्थिक प्रगति ने एक ठोस आधार तैयार किया है, वहीं शिक्षा, स्वास्थ्य और मानव विकास को मजबूत किए बिना “सफल राज्य” की उपाधि अधूरी रहेगी। संक्षेप में कहा जाए तो — मध्यप्रदेश अब भारत का “उभरता हुआ विकासशील राज्य” है, पर वास्तविक सफलता की मंज़िल तक पहुँचने के लिए सामाजिक विकास पर केंद्रित नई रफ्तार की जरूरत है।
- शिक्षा और डिजिटल पहुँच में तेज़ निवेश के माध्यम से हर स्कूल तक इंटरनेट व स्मार्ट क्लास की पहुंच आज की अनिवार्य पहल बन गई है।
- ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं का सशक्तीकरण करने के लिए हमें अपने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर और उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी।
- कृषि से उद्योग तक वैल्यू-चेन विकसित करना होगी ताकि किसानों की आय स्थायी रूप से बढ़ाई जा सके और उन्हें सरकारी मदद की बाट न जोहनी पड़े।
- महिला सुरक्षा व कौशल विकास कार्यक्रमों को वास्तविक परिणामों तक पहुँचाना होगा। लाड़ली बहना योजना का लाभ हर महिला तक न तो पहुंच पा रहा है और न ही ये संभव होगा। महिलाएं आर्थिक विकास की चेन का हिस्सा बनें तभी इन लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है।
- नवाचार और स्टार्टअप निवेश के लिए विशेष औद्योगिक ज़ोन बनाना होंगे जो नव उद्यमियों को सहारा देकर उत्पादन बढ़ाने में सहयोगी साबित हो। कल्याणकारी राज्य की कहानियां बहुत सुनी सुनाई जा चुकी हैं। अब तो चुनौतीपूर्ण नतीजे लाने की प्रतिस्पर्धा ही एमपी को सिरमौर बना सकती है।

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