Month: November 2025

  • फार्मासिस्टों के डिजिटल पंजीयन से विदेशों में भी मिलने लगीं नौकरियां

    फार्मासिस्टों के डिजिटल पंजीयन से विदेशों में भी मिलने लगीं नौकरियां


    भोपाल,30 नवंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर) मध्यप्रदेश फार्मेसी काऊंसिल ने जबसे पंजीयन का सारा रिकार्ड आनलाईन करना शुरु कर दिया है तबसे देश के विभिन्न संस्थानों के साथ साथ विदेशी दवा कारोबार में भी राज्य के फार्मासिस्टों को रोजगार आसानी से मिलने लगा है।किसी भी फार्मासिस्ट के पंजीयन रिकार्ड को पूरी दुनिया में आनलाईन देखा जा सकता है और उसके दावे की सत्यता परखी जा सकती है। इस डिजिटलाईजेशन के अभियान से नकली पंजीयन प्रमाण पत्रों पर नौकरी और कारोबार कर रहे लोगों में हड़कंप मच गया है और वे इस अभियान को रोकने के लिए तरह तरह के जतन करते देखे जा रहे हैं।


    हाल ही में एक कथित फार्मासिस्ट ने जिस तरह काऊंसिल के दफ्तर में हंगामा मचाया और पुलिस ने उसकी शिकायत पर एफआईआर दर्ज की उससे इस समस्या को आसानी से समझा जा सकता है। वह छात्र अपने हंगामे को सही ठहराने के लिए बाकायदा गवाह भी साथ लेकर आया था हालांकि परिषद की ओर से दर्ज कराई गई प्राथमिकी में सारी स्थिति स्पष्ट की गई है और छात्र की आपराधिक हरकत को उजागर किया गया है।


    जबकि तथ्यों को देखा जाए तो पिछले पाँच महीनों में परिषद् ने 4416 नए फार्मासिस्टों के पंजीकरण सफलतापूर्वक किए हैं । लगभग 8,000 आवेदन-पत्रों के साथ प्रस्तुत दस्तावेजों की जांच आदि की प्रोसेसिंग की गई है। इस अवधि में कई महत्त्वपूर्ण सुविधाएँ जोड़ी गई हैं, जिनमें डिजिलॉकर एकीकरण, डोमिसाइल सत्यापन के साथ समग्र आईडी एकीकरण शामिल हैं। इससे पंजीयन की प्रक्रिया गलतियों से मुक्त हो गई है। अब पंजीयन के लिए किसी छात्र या फार्मासिस्ट को काउंसिल के दफ्तर आने की जरूरत ही नहीं रही है।


    इन बदलावों से काउंसिल अब एक से डेढ़ महीने में नए रजिस्ट्रेशन जारी कर पा रही है। जब तक ये प्रक्रिया चलती रहती है तब तक पोर्टल पर आवेदन की स्थिति आसानी से देखी जा सकती है। अब तक 99% बी.फार्मा पंजीकरण और सभी संभव/सत्यापन योग्य शासकीय विश्वविद्यालयों के डी.फार्मा पंजीकरण पूरे कर लिए गए हैं।
    जिन आवेदनों को प्रोसेसिंग के बाद पंजीकृत किया गया है उनमें लगभग 2000 आवेदन पुरानी प्रक्रिया के हैं जिनमें 2022/2024 के आवेदन मुख्यतः निजी विश्वविद्यालयों से संबंधित हैं । इनमें से अधिकतर आवेदनों का महाविद्यालयों से सत्यापन प्राप्त नहीं हुआ है। महाविद्यालयों से संपर्क करके ये पंजीयन भी जारी किए जा रहे हैं।


    प्राप्त आधिकारिक जानकारी के अनुसार परिषद ने 2023 में कुल 2889 पंजीयन जारी किए थे। 2024 में 2297 पंजीयन किए गए। जनवरी से मई 2025 तक 970,जून से नवंबर 2025 में जब पूरा ढांचा तैयार हो गया और पूर्णकालिक रजिस्ट्रार की तैनाती हो गई तो 4416 फार्मासिस्टों के पंजीयन प्रमाण पत्र जारी किए गए हैं। पिछले 5 महीनों में, परिषद ने एक वर्ष में होने वाले कार्य से लगभग दो–तीन गुना अधिक पंजीकरण जारी किए हैं।इस अवधि में कुल 8,000+ आवेदन प्रोसेस किए गए। जिसकी जानकारी आवेदक के लॉगिन पर भेजी जा चुकी है।
    डिजिटल सुधार और तेज सेवा

    • DigiLocker, Domicile, Samagra ID एकीकरण
    • आवेदन ट्रैकिंग व कारण-आधारित स्टेटस पोर्टल पर उपलब्ध है
    • अब नए पंजीकरण 1–1.5 माह में जारी किए जा रहे हैं
    • आवेदकों को काउंसिल आने की आवश्यकता समाप्त की गई
      वर्तमान पेंडेंसी — कारण व स्थिति
    • 99% बी.फार्मा और सभी सत्यापन योग्य सरकारी विश्वविद्यालयों के डी.फार्मा पंजीकरण पूर्ण किए गए हैं।
    • वर्तमान में लगभग 2000 आवेदन पुरानी प्रक्रिया के हैं जिनमें 2022/2024 के आवेदन मुख्यतः निजी विश्वविद्यालयों से संबंधित हैं और जिनके लिए महाविद्यालयों से सत्यापन प्राप्त नहीं हुआ है। इनको भी सत्यापन प्राप्ति अनुसार क्लियर किया जा रहा है।

    • परिषद ने विगत 1 वर्ष में दलालों के माध्यम से पंजीयन कराने की परंपरा समाप्त करने में सफलता पाई है। ऑफलाइन हस्तक्षेप पर जीरो टॉलरेंस पालिसी लागू की है। इससे नाराज दलालों में भारी असंतोष है और वे काऊंसिल के बारे में आधारहीन बातें फैलाकर छात्रों को भड़काने का प्रयास कर रहे हैं। जब फर्जी पंजीयन नहीं हो पा रहे हैं तो दलालों ने कई सामाजिक संगठनों के पदाधिकारियों को भी गुमराह करके अफवाहें फैलाना जारी कर दिया है। जबकि थोड़े ही दिनों में राज्य में एक पारदर्शी और सरल डिजिटल पंजीयन स्तर हासिल किया जा रहा है।

    • मध्यप्रदेश राज्य फार्मेसी परिषद के पदाधिकारियों का कहना है कि वह सभी आवेदकों के लिए तेज, पारदर्शी, डिजिटल,सटीक और ब्रोकर रहित सेवा उपलब्ध कराने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
  • जातिगत वैमनस्य के देशद्रोही बिंब का वध जरूरी

    जातिगत वैमनस्य के देशद्रोही बिंब का वध जरूरी


    आईएएस संतोष वर्मा के रूप में इस बार फिर विदेशी ताकतों ने भारतीय समाज में फूट डालने का डायनामाईट लगाया है।ब्राह्म्ण की बेटी के दान और संबंध बनाने जैसी ओछी भाषा का इस्तेमाल करके वर्मा ने देश पर कमर के नीचे वार किया है। अस्सी के दशक में दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएसफोर) बनाकर बसपा सुप्रीमो कांसीराम ने जब तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार का नारा दिया तो देश की समग्र चेतना ये सुनकर अवाक रह गई थी। भारतीय समाज में फूट के बीज डालने के लिए उन्होंने एक और नारा दिया था ब्राह्मण , ठाकुर , बनिया छोड़, बाकी सब हैं डीएस4″ ये तबका दौर था जब भारत में जनता पार्टी सरकार की असफलता के बाद एक बार फिर श्रीमती इंदिरा गांधी सत्ता में आ चुकी थीं। कांसीराम पंजाब के रोपड़ जिले के एक गांव के सिख धर्म में परिवर्तित हुए चमार समुदाय से आते थे। बीएससी करने के बाद वे पुणे की गोलाबारूद फैक्टरी में तकनीकी सुपरवाईजर बन गए थे। जनता पार्टी की सरकार को अपदस्थ करने के लिए जो विदेशी ताकतें भारत में सक्रिय थीं वे भारत के सैन्य क्षेत्र में फूट डालने का भी प्रयास कर रहीं थीं। तब उन्होंने कांसीराम को अपना औजार बनाया जो भारत की जातिवादी व्यवस्था के खिलाफ मुखर रहते थे और नौकरी छोड़ चुके थे । उनकी पकड़ सैन्य फैक्टरी के बड़े समुदाय पर पहले से बनी हुई थी। कांसीराम ने महात्मा गांधी का बताया बहुसंख्यक हरिजन वादी ब्रह्मास्त्र चलाया था । वे अच्छी तरह जानते थे कि इस उपेक्षित समुदाय को आसानी से बरगलाया जा सकता है। बाद में उन्होंने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की ताकत पाने के लिए बहुजन समाज पार्टी बनाई और सत्ता की ऊंचाईयों तक जा पहुंचे। ये विदेशी पटकथा खूब सुपर हिट हुई और 1989 में वीपीसिंह की सरकार के रूप में अपने क्लाईमेक्स पर भी पहुंची। तब भी भारत पर राज करने वाली विदेशियों की ख्वाहिशें परवान चढ़ रहीं थी।कांसीराम ने भी सरकारी अफसरों से चंदा उगाही के लिए दलित कार्ड खेला था। कांसीराम के निधन के बाद ये खुमार थोड़ा मद्धिम पड़ा लेकिन तब भी आरक्षण के नाम पर दलित वर्ग की सामाजिक गुंडागर्दी जारी रही । तब से आज तक जातिवादी समानता के नाम पर सर्वधर्म के टैक्स के सहारे आरक्षण की मीठी गोली बांटी जा रही है। हालांकि आज देश में कथित जातिवादी भेदभाव की झलक तक नहीं मिलती है। राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने 30 जनवरी 1990 को नाराज दलितों को साधने के लिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 लागू किया था। कांग्रेस ये कानून अपने खिसकते दलित वोट बैंक को बचाने के लिए डरकर लाई थी इसलिए इस कानून को लागू करने का बहुत शोर मचाया गया । आगे चलकर ये कानून सामाजिक भेदभाव और अत्याचार की मिसाल बनकर सामने आया। इस हथियार का प्रयोग सभी जातियों ने किया। किसी से दुश्मनी भुनाना हो तो किसी दलित से शिकायत करवा दो , उसे आसानी से निपटाया जा सकता था। कांसीराम का वो हथकंडा आज की संतोष वर्मा वाली पीढ़ी भी सफलता पूर्वक इस्तेमाल कर रही है। देश की मोदी सरकार ने सबका साथ सबका विकास का नारा देकर देश को सकल घरेलू उत्पाद के पैमाने पर चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था के सोपान पर ला खड़ा किया है । आगे बढ़ने की इस लडाई को कमजोर करने के लिए एक बार फिर बासी कढ़ी में उबाल लाने का प्रयास किया जा रहा है।
    संतोष वर्मा (IAS) ने अपाक्स अधिकारियों के सम्मेलन में 23 नवंबर 2025 को आयोजित सार्वजनिक सभा में ये आपत्तिजनक बयान दिया है। उन्होंने कहा कि मैं आईएएस बन गया हूं तो मेरे बेटो को क्रीमी लेयर मानकर आरक्षण का लाभ भले नहीं मिले, लेकिन असली उद्देश्य तो तब पूरा होगा जब तक उसे कोई ब्राह्मण अपनी बेटी दान कर दे या वह उससे संबंध बना ले। जब तक समाज में रोटी बेटी का संबंध शुरु न हो जाए तब आरक्षण का लाभ मिलते रहना चाहिए। वर्मा ने कहा कि हमें भी अब बदले की भावना से काम करना होगा। हमारी लड़ाई विचारधारा से है जब तक हम इसका मूल नष्ट नहीं कर देते तब तक हमें अपनी कमाई का छटवा हिस्सा इस लड़ाई के लिए खर्च करना होगा।
    उनकी इस टिप्पणी को कई समुदायों और सामाजिक संगठनों ने “जात-पात, ब्राह्मण विरोधी, अपमानजनक और महिलाओं के खिलाफ मानवीय गरिमा को ठेस पहुँचाने वाला” बताते हुए कड़ी निंदा की है। वे इस विवाद को देश पर हमला मान रहे हैं।पूर्व आईएएस श्रीमती वीणा घाणेकर कहती हैं कि ये कार्यपालिका की निर्धारित सीमाओं का उल्लंघन है इसलिए अनुशासनहीन वर्मा को बर्खास्त किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि ऐसा बयान सामाजिक एकता, सहिष्णुता और समानता की नींव को ही कमजोर कर देता है। भारत एक बहु-जातीय, बहु-संस्कृतिक देश है, यहां जाति-आधारित भेदभाव और पूर्वाग्रहों से संघर्षों का इतिहास रहा है। ऐसी टिप्पणी, जिसमें एक जाति-विशेष के खिलाफ अपमान और सामान्यीकरण हो, सामाजिक सौहार्द्र को भंग करती है।
    जब कोई उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी आईएएस, सार्वजनिक मंच से ऐसे भेदभावपूर्ण वाक्य बोलता है, तो यह संदेश जाता है कि जात-पात का विभाजन, भेदभाव और अपमान का विचार सरकारी संरक्षण में फल फूल रहा है। इसीलिए इसे “देश की आत्मा” – सामाजिक सद्भाव, भाईचारा, समान नागरिकता पर हमला माना जाना चाहिए।
    बयान में “कन्या-दान” शब्द का प्रयोग कर ब्राह्मण बेटियों को “दान की वस्तु” बना देना, महिलाओं के साथ सिर्फ उनके परिवार या जाति के आधार पर पूरे देश में असम्मान की भावना जगाता है। यह बयान न सिर्फ संवाद-स्वतंत्रता की सीमाओं को पार करता है, बल्कि उन नैतिक और संवैधानिक मूल्यों पर हमला है, जिनके आधार पर दूसरा-पक्ष समानता, सम्मान, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ खड़ा हुआ है।भारतीय परिवेश में बेटी मान का प्रतीक है जिस पर हमला करने की चेष्ठा हर नजरिए से अस्वीकार्य है। जब कोई अधिकारी जात-पात, आरक्षण, सामाजिक असमानता जैसे संवेदनशील विषयों पर ऐसे विवादित और उत्तेजक बयान देता है, तो यह सरकार, प्रशासन और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अनादर है। जाहिर है कि ये देश की स्थिरता और सार्वभौमिक अधिकारों पर हमला है। इस तरह के बयान लोगों में कट्टरता, द्वेष, अविश्वास और सामजिक दरारें पैदा कर सकते हैं । खासकर जब जातीय भावना और सम्मान का प्रश्न जुड़ा हो। इतिहास में देखा गया है कि ऐसे वक्तव्यों से सामाजिक अशांति, सांप्रदायिक विभाजन और हिंसा जैसी स्थितियां पैदा होती हैं।
    वर्तमान विवाद मात्र पहली घटना नहीं है संतोष वर्मा का नाम कई पुराने आरोपों से भी जुड़ा हुआ है। उनके ऊपर पहले यह आरोप था कि उन्होंने जज के हस्ताक्षर की नकल कर फर्जी दस्तावेज बनाये थे, ताकि प्रमोशन हासिल कर सकें। साथ ही, उनके खिलाफ यौन शोषण और धोखाधड़ी के मामलों की भी शिकायतें रही हैं जिनका सिलसिला अभी भी सवालों के घेरे में है। इस पृष्ठ­भूमि में, उनका यह नया जात-विरोधी और महिलाओं को वस्तु की तरह दिखाने वाला बयान, उनकी विश्वसनीयता, नैतिकता, और संवैधानिक भूमिकाओं पर गहरा सवाल खड़ा करता है। अगर ऐसे व्यक्ति जिनका इतिहास भ्रष्टाचार व धोखाधड़ी के आरोपों से जुड़ा रहा है यदि वे संवेदनशील पदों पर बने रहेंगे तो आम जनता का विश्वास पूरे सिस्टम से उठ जाएगा। जाहिर है कि देश को ऐसे प्रयासों का पुरजोर विरोध करके विदेशी षडयंत्र को बगैर किसी परिणाम की चिंता किए कुचलना होगा।

  • फार्मासिस्ट ने काऊंसिल के गार्ड का सिर फोड़ा तो लड़कों ने तबियत से धुन दिया

    फार्मासिस्ट ने काऊंसिल के गार्ड का सिर फोड़ा तो लड़कों ने तबियत से धुन दिया


    भोपाल,28 नवंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्यप्रदेश फार्मेसी काऊंसिल के कार्यालय में आज उस समय अफरातफरी मच गई जब इंदौर से आए एक कथित फार्मासिस्ट ने अपना पंजीयन कराने का दबाव बनाने के लिए वहां पदस्थ गार्ड का सिर फोड़ दिया। उसने रजिस्ट्रार और कर्मचारियों को भी धमकाया और गाली गलौच की। इसकी सूचना जब पुलिस को मिली तो पुलिस भी घटना स्थल पर पहुंच गई लेकिन तब तक अपना पंजीयन कराने आए कुछ लड़कों ने आरोपी को घसीटकर तबियत से धुन दिया। पुलिस ने गार्ड और आरोपी की शिकायत पर एफआईआर दर्ज की है। सरकारी कार्य में अड़चन करने की शिकायत भी दर्ज की गई है।


    प्राप्त जानकारी के अनुसार घटना आज पूर्वान्ह लगभग 11 बजे की है। खुद को इंदौर का फार्मेसी छात्र बताने वाला तुषार नाम का एक युवक वहां पदस्थ गार्ड से अंदर प्रवेश के लिए जिद कर रहा था। गार्ड ने उसे रोका तो उसने गार्ड से मारपीट शुरु कर दी। इससे गार्ड का सिर फट गया और उससे खून निकलने लगा। इसे देखकर वहां मौजूद छात्रों और कर्मचारियों ने भागते हुए इस आरोपी को पकड़ लिया और मन लगाकर धुन दिया। इस बीच पुलिस भी पहुंच गई और सूचना मिलते ही मध्यप्रदेश फार्मेसी काऊंसिल के अध्यक्ष संजय जैन भी पहुंच गए और उन्होंने बीच बचाव करके आरोपी को पुलिस के हवाले करवाया।


    श्री जैन ने पुलिस को दी सूचना में कहा है कि काऊंसिल में आनलाईन पंजीयन का कार्य होता है। एमपी आनलाईन के फार्म को भरने और सभी दस्तावेज भरने पर जांच के बाद स्वतः ही पंजीयन हो जाता है। इसके लिए किसी को काऊंसिल के दफ्तर आने की जरूरत नहीं होती है। इसके बावजूद हर दिन लगभग पचास अभ्यर्थी अपना आवेदन जमा कराने के लिए काऊंसिल आते हैं। इसके लिए काऊंसिल ने गार्ड की व्यवस्था की है जो एक एक करके अभ्यर्थियों को अंदर जाने देता है। उन्होंने पंजीयन के इस कार्य में आवश्यक सुरक्षा बल उपलब्ध कराने की मांग की है।


    गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में फार्मासिस्टों के पंजीयन का कार्य लंबे समय से अव्यवस्था के दौर से गुजर रहा है। वर्तमान में काऊंसिल ने इस कार्य के लिए आनलाईन आवेदन जमा करने की व्यवस्था की है। इसके बावजूद कुछ अड़ीबाज फर्जी दस्तावेजों के आधार पर पंजीयन कराने का प्रयास करते हैं। काऊंसिल ने मेडीकल स्टोरों के पंजीयन की प्रक्रिया में जीवन प्रमाण पत्र देने के निर्देश जारी किए हैं। इससे प्रदेश भर के वे मेडीकल संचालक नाराज हैं जिनके संचालक बरसों पहले ही स्वर्गवासी हो चुके हैं। इसके बावजूद उनके नाम पर फर्जी मेडीकल स्टोर चलाए जा रहे हैं। यही वजह है कि नए नियमों से नाराज फार्मासिस्ट काऊंसिल पर दवाब बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

    प्राप्त जानकारी के अनुसार पुलिस ने काऊंसिल के कर्मचारी गोपाल सिंह यादव की शिकायत पर आरोपी फार्मासिस्ट के विरुद्ध शासकीय कार्य में बाधा पहुंचाने की शिकायत दर्ज की है। गार्ड जितेन्द्र बैरागी की हालत खतरे से बाहर बताई गई है।

  • जनसंपर्क माफिया में कोहराम

    जनसंपर्क माफिया में कोहराम


    लगातार शिकायतों और पत्रकारों के विरोध दर्ज कराए जाने के बाद मध्यप्रदेश शासन ने जनसंपर्क संचालनालय में नर्मदापुरम संभाग के उपायुक्त(राजस्व) गणेश कुमार जायसवाल को अपरसंचालक के पद पर भेजा है। राज्य प्रशासनिक सेवा के 2012 बैच के इस युवा अधिकारी की पदस्थापना से जनसंपर्क विभाग के खासतौर पर अधिकारी वर्ग में बैचेनी की लहर दौड़ गई है। पहली बार वे शासन के निर्णय के खिलाफ एकजुट होकर कलमबंद हड़ताल पर उतर आए हैं। जनसंपर्क कमिश्नर दीपक सक्सेना से चर्चा के दौरान विभाग के अधिकारियों का तर्क था कि वे बरसों से इस विभाग में सरकार की छवि सुधारने का काम करते हैं इसके बावजूद सरकार ने एक राजस्व विभाग के एक जूनियर अधिकारी को भेजकर हमारा अपमान किया है। हमें प्रमोशन भी वक्त पर नहीं मिलते हैं और रात दिन हम सरकार की छवि सुधारने में जुटे रहते हैं। इसके बावजूद सरकार ने बाहिरी व्यक्ति को भेजकर हम पर अविश्वास जताया है जो अपमानजनक है। इस संबंध में सामान्य प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय कुमार शुक्ल से अभी बात नहीं हो पाई है लेकिन जो जानकारियां छनकर बाहर आ रहीं हैं उनके मुताबिक सरकार ने आधिकारिक फीड बैक के आधार पर ही राजस्व विभाग के अधिकारी की नियुक्ति की है। यही नहीं विभाग के अपर मुख्य सचिव पद पर भारतीय प्रशासनिक सेवा के 1993 बैच के वरिष्ठ आईएएस अनुपम राजन को शासन की ओर से जवाबदारी सौंपी गई है। मुख्य सचिव अनुराग जैन के इस फैसले पर तो कोई सवाल नहीं उठाया जा रहा है लेकिन सामान्य प्रशासन विभाग के फैसले पर अधिकारियों का विरोध सबको चौंका रहा है। अधिकारियों के इस विरोध प्रदर्शन में विभाग के कर्मचारियों ने भी कलमबंद हड़ताल को समर्थन दिया है लेकिन वे अंदरूनी तौर पर खामोश हैं। विज्ञापन माफिया ने इस कलमबंद हड़ताल में जनसंपर्क संवर्ग के अधिकारियों को समेट लिया है। उनके माध्यम से वे सरकार पर दबाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं। इस विरोध प्रदर्शन में कुछ पत्रकार संगठन भी कूद पड़े हैं। दरअसल में कुछ सालों से जनसंपर्क विभाग ने ऐसे गठरियों पत्रकार संगठन खड़े कर दिये हैं जिन्हें साथ लेकर विभाग के अधिकारी अपने फैसले लेते रहे हैं। खबरों के फैसले तो वे स्वयं ले लेते हैं लेकिन विज्ञापन के फैसलों में पत्रकार संगठनों को भी अपने साथ खड़ा कर लिया जाता है। इस गठजोड़ में शामिल माफिया शख्सियतें विभाग के माध्यम से लगभग आठ सौ करोड़ रुपयों से अधिक की राशि गड़प जाती हैं। पहली बार शासन ने विज्ञापन के नाम पर बजट की लूटपाट के इस धंधे पर लगाम कसने का प्रयास किया है। जाहिर है राजस्व विभाग का प्रशासनिक अधिकारी आयव्यय के सभी रिकार्ड पर भी निगरानी करेगा इससे जनसंपर्क विभाग के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों को अपने काले कारनामों की कलई खुल जाने का भय लग रहा है। पत्रकारों की आड में दलाली करने वाले जिन कथित पत्रकारों ने इस घोटाले में लाभ उठाना अपना जन्मसिद्ध अधिकार बना रखा है वे भी इस फैसले से बौखलाए हुए हैं। केन्द्रीय स्तर पर प्रेस सेवा पोर्टल के माध्यम से भारत सरकार ने मीडिया को व्यवस्थित करने का अभियान चला रखा है। इससे पत्रकारों को काफी कठिनाई हो रही है। जबकि राज्य स्तर पर जनसंपर्क विभाग के अधिकारियों की प्रशासनिक अकुशलता की वजह से पत्रकारों के लिए आबंटित की जाने वाली राशि गैर पत्रकारों के पास पहुंच रही है। सत्तारूढ़ दल की सिफारिशों पर भी इस राशि का बड़ा हिस्सा साईफन कर लिया जाता है। ऐसे में पत्रकार वंचित रह जाते हैं और कलंक की कालिख उनके माथे पड़ जाती है। शासन की जवाबदारी है कि वह वास्तविक पत्रकारों को संवाद की भूमिका निभाने के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए । वह अपना दायित्व निभाने के लिए जब फैसले ले रही है तो माफिया ताकतें इस फैसले को रोकने में जुट गईं हैं। ऊटपटांग के तर्क देकर वे इसे अपमान का कारण बता रहे हैं ।मध्यप्रदेश सरकार के वित्तीय संसाधनों पर ही जनसंपर्क विभाग के अधिकारियों कर्मचारियों को वेतन मिलता है और उन्हीं संसाधनों से राज्य प्रशासनिक सेवा के अन्य संवर्ग के अधिकारियों को वेतन मिलता है। इन सभी की जिम्मेदारी है कि वे प्रदेश की बेहतरी के लिए कार्य करें।ऐसे में राजस्व विभाग के वित्तीय प्रबंधन में कुशल अधिकारी की पदस्थापना स्वागत योग्य फैसला है। शासन को यदि अपने प्रशासनिक सुधारों पर जन समर्थन चाहिए तो उसे पत्रकारों की आड़ में पनप चुके विज्ञापन माफिया को उखाड़ फेंकना होगा तभी शासन और सरकार जनता की ओर से दिए गए अपने दायित्वों का निर्वहन सही तरीके से कर पाएंगे । फिलहाल शासन को अपने फैसले पर अडिग रहना होगा और माफिया की गीदड़ भभकियों को नजरंदाज करना होगा। वैसे भी सरकार की छवि बनाने बिगाड़ने का कार्य सोशल मीडिया संभाल चुका है। दलालों को बाहर किया जाएगा तो इसका सर्वत्र स्वागत किया जाएगा।

  • किसानों को ज्यादा पावर के सोलर पंप देगी सरकार

    किसानों को ज्यादा पावर के सोलर पंप देगी सरकार


    मुख्यमंत्री डॉ. यादव की अध्यक्षता में मंत्रि-परिषद के निर्णय


    भोपाल, 18 नवंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर) मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में मंत्रि-परिषद की बैठक मंगलवार को मंत्रालय में सम्पन्न हुई। मंत्रि-परिषद द्वारा प्रधानमंत्री कृषक मित्र सूर्य योजना में सिंचाई के लिये सोलर पम्प स्थापना की योजना में संशोधन की स्वीकृति प्रदान की गयी है। संशोधन अनुसार कृषकों को स्वीकृत सोलर पम्प स्थापना क्षमता से एक क्षमता अधिक तक का विकल्प प्रदाय किया जायेगा। अब 3 एच.पी. के अस्थाई विद्युत कनेक्शनधारियों को 5 एच.पी. और 5 एच.पी. के अस्थाई विद्युत कनेक्शनधारियों को 7.5 एच.पी. का सोलर पंप प्रदाय करने का विकल्प दिया जाएगा।

    योजना के प्रथम चरण में अस्थायी विद्युत कनेक्शन संयोजन वाले किसानों अथवा अविद्युतीकृत किसानों को सोलर पम्प का लाभ दिया जाएगा। योजना अनुसार 7.5 एचपी क्षमता तक का सोलर पम्प पम्प लगाने के लिए अस्थाई विद्युत कनेक्शन धारी कृषक का अंश 10% रहेगा। शासन द्वारा 90% की सब्सिडी दी जाएगी।
    उल्लेखनीय है कि भारत सरकार की कुसुम-ब योजना को प्रदेश में “प्रधानमंत्री कृषक मित्र सूर्य योजना” नाम से 24 जनवरी 2025 से लागू किया गया है। इसका क्रियान्वयन राज्य में मध्यप्रदेश ऊर्जा विकास निगम द्वारा किया जा रहा है। इस निर्णय से सोलर पंप की स्थापना से विद्युत पंपों को विद्युत प्रदाय के लिए राज्य सरकार पर अनुदान के भार को सीमित किया जा सकेगा एवं विद्युत वितरण कम्पनियों की वितरण हानियों को कम किया जा सकेगा।
    मंत्रि-परिषद मिशन वात्सल्य योजना अंतर्गत गैर संस्थागत सेवा योजना यथा स्पॉन्सरशिप, फॉस्टर केयर, आफ्टर केयर को आगामी 5 वर्षों तक प्रदेश के समस्त जिलों में संचालित करने की स्वीकृति दी गयी है। योजना के तहत पात्र बच्चे को 4 हजार रुपये प्रति माह की आर्थिक सहायता दी जायगी। इसके साथ ही 18 वर्ष की आयु पूरी होने पर बाल देखभाल संस्थान छोड़ने वाले बच्चों को ऑफटर केयर के माध्यम से रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण से जोड़कर आर्थिक रूप से सशक्त बनाया जायेगा। योजना के तहत विधवा, तलाकशुदा और परित्यक्त माता के बच्चे, अनाथ एवं विस्तारित परिवार के साथ निवासरत बच्चे, असाध्य बीमारी से पीड़ित माता-पिता के बच्चे, बच्चे की शारीरिक और आर्थिक रूप से देखभाल करने में असमर्थ माता पिता के बच्चे, किशोर न्याय अधिनियम 2015 के अनुसार देख रेख और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चे (बेघर, प्राकृतिक आपदा से पीड़ित, बाल श्रमिक, बाल वेश्यावृति के शिकार, एड्स पीड़ित, बाल भिक्षुक, सड़क पर रहने वाले, घर से भागे, निर्योग्यत वाले, लापता, शोषण और दुर्व्यवहार के शिकार श्रेणी के बच्चे) लाभान्वित होंगे।
    मिशन वात्सल्य योजना क्रियान्वयन के लिए कुल 1,022 करोड़ 40 लाख रुपये का व्यय होगा। इसमें राज्यांश 408 करोड़ 96 लाख रुपये और केंद्रांश 613 करोड़ 44 लाख रुपये होगा। इससे प्रदेश के 33 हजार 346 बच्चे लाभान्वित होंगे। यदि योजना अन्तर्गत निर्धारित स्वीकृत अवधि में भारत सरकार द्वारा योजना मापदण्डों में कोई परिवर्तन किए जाते है तो उक्त अवधि में परिवर्तित मापदण्ड प्रभावशील होंगे।
    मंत्रि-परिषद द्वारा प्रदेश के 12 जिलों भोपाल, इन्दौर, नरसिंहपुर, मण्डलेश्वर (खरगौन), बालाघाट, गुना, भिण्ड, सीहोर, अमरकंटक (अनूपपुर), पन्ना, श्योपुर एवं शुजालपुर (शाजापुर) में 50 बिस्तरीय आयुष चिकित्सलयों एवं बड़वानी जिले में 30 बिस्तरीय चिकित्सालय के संचालन के लिए 373 पद एवं 806 मानव संसाधन सेवाएं ऑन कॉल की स्वीकृति प्रदान की गई है। स्वीकृत नवीन पदों में प्रथम श्रेणी के 52 पद, द्वितीय श्रेणी के 91 और तृतीय श्रेणी के 230 पद शामिल है। नियमित पदों पर वार्षिक वित्तीय भार 25 करोड़ 57 लाख रूपये आयेगा। इसके साथ ही स्वीकृत मानव संसाधन सेवाओं मे द्वितीय श्रेणी के 91, तृतीय श्रेणी के 117 और चतुर्थ श्रेणी के 598 पद शामिल है। मानव सेवाओं का प्रबंधन भारत सरकार के राष्ट्रीय आयुष मिशन से किया जायेगा।
    मंत्रि-परिषद द्वारा मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद्के वैज्ञानिकों/अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भर्ती एवं सेवा शर्तें नियम 2025 का अनुमोदन प्रदान किया गया।विज्ञान, तकनीकी, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार के क्षेत्र में वर्तमान समय में हो रहे अनुप्रयोगों के दृष्टिगत् प्रदेश में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् की गतिविधियों में सुदूर संवेदन उपयोग केन्द्र, ग्रामीण प्रौद्योगिकी उपयोग केन्द्र, मौसम परिवर्तन अनुसंधान केन्द्र, अंतरिक्ष विज्ञान अनुसंधान केन्द्र एवं उन्नत शोध एवं उपकरण सुविधा केन्द्र कार्यरत् है, के लिए उत्कृष्ट वैज्ञानिकों की आवश्यकता बनी रहती है।
    निर्णय अनुसार मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद में गैर वैज्ञानिक संवर्ग के लिए, सेवा संरचना एवं भर्ती नियमों को अंगीकृत किया गया है। वैज्ञानिक संवर्ग के लिए चूंकि केडर का प्रावधान नहीं होने एवं वैज्ञानिक संवर्ग के पदों को भविष्य में होने वाले वैज्ञानिक, तकनीकी, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार के क्षेत्र में हो रहे अनुसंधानों के हुए मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद में वैज्ञानिक संवर्ग के केडर का उन्नयन किया जायेगा। इससे वैज्ञानिक अनुसंधान एवं नवाचार के लिए योग्य वैज्ञानिकों की सेवाएं प्रदेश को प्राप्त हो सकेगी। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा 11 मई, 2015 द्वारा मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद में नवीन पदों की भर्ती पर लगाई गई रोक हटाये जाने का निर्णय लिया गया है। प्रदेश में वैज्ञानिक एवं तकनीकी क्षेत्र में वैज्ञानिक, प्रौद्योगिकी एवं तकनीकी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् नोडल एजेन्सी के रूप में कार्यरत है।
    मंत्रि-परिषद द्वारा मेडिको लीगल संस्थान के अधिकारियों को पुनरीक्षित वेतनमान (सातवां वेतनमान) का वास्तविक लाभ लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा विभाग के संवर्ग के समान 1 जनवरी 2016 से प्रदान करने की स्वीकृति दी गई है। शासन के समस्त विभागों में पुनरीक्षित वेतनमान (सातवां वेतनमान) का वास्तविक लाभ 1 जनवरी 2016 से प्रदान किया गया है। उसी अनुक्रम में मेडिको लीगल संस्थान के अधिकारियों को भी लाभ दिए जाने का निर्णय लिया गया है। लाभ दिये जाने पर एरियर राशि का अनुमानित वित्तीय भार 93 लाख रुपये आएगा।
    मंत्रि-परिषद द्वारा प्रदेश में क्रियान्वित सोशल इम्पैक्ट बॉन्ड (एसआईबी) योजना में संशोधन किये जाने की स्वीकृति प्रदान की गयी है। स्वीकृति अनुसार आयुक्त, संस्थागत वित्त को राज्य स्तरीय स्टीयरिंग समिति का सदस्य सचिव के रूप में नामित किया गया है। योजनान्तर्गत 100 करोड़ रूपये का बजट प्रावधान सामाजिक न्याय विभाग के स्थान पर वित्त विभाग के बीसीओ, आयुक्त संस्थागत वित्त में किया गया है। साथ ही तकनीकी एजेंसी के चयन के लिए परियोजना क्रियान्वयन विभाग को अधिकृत किया गया है। योजना के क्रियान्वयन के लिए प्रशासनिक विभाग वित्त विभाग को बनाया गया है
    मंत्रि-परिषद द्वारा लिए गए निर्णय अनुसार नवगठित जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, आगर-मालवा के लिये कुल 9 नवीन पदों का सृजन किए जाने की स्वीकृति प्रदान की गयी। इसमें सचिव का 1 पद, जिला विधिक सहायता अधिकारी का 1 पद, सहायक ग्रेड-2 का 1 पद, सहायक ग्रेड-3 के 2 पद, आदेश तामीलकर्ता के 2 पद और भृत्य के 2 पद स्वीकृत किये गए है। इन पदों पर वार्षिक वित्तीय भार 59 लाख 42 हजार रूपये आयेगा। मंत्रि-परिषद की बैठक वंदे मातरम गायन के साथ शुरू हुई।

  • आयुर्वेद को गौर से देख रहा संसारःनिर्मला भूरिया

    आयुर्वेद को गौर से देख रहा संसारःनिर्मला भूरिया

    भोपाल 17 नवंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। महिला एवं बाल विकास मंत्री सुश्री निर्मला भूरिया ने कहा कि आयुर्वेद केवल चिकित्सा पद्धति नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान, संस्कृति और विज्ञान का समन्वित स्वरूप है, जिसे आधुनिक स्वास्थ्य प्रणाली में समाहित करना समय की महती आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद के सिद्धांतों का उन्नयन और उनका व्यापक एकीकरण आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य, पोषण और समग्र विकास के लिये जरूरी है। मंत्री सुश्री भूरिया रविवार को सैम ग्लोबल यूनिवर्सिटी भोपाल में आयोजित “सु-संतति 2.0” संगोष्ठी को संबोधित कर रही थीं।
    मंत्री सुश्री भूरिया ने प्राचीन ज्ञान और विज्ञान के माध्यम से सुजनन विज्ञान की विरासत को आगे बढ़ाना” विषयक संगोष्ठी की सराहना करते हुए कहा कि यह आयोजन समयानुकूल और भविष्य की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि महिला एवं बाल विकास विभाग प्रदेश की लगभग 75 प्रतिशत जनसंख्या तक पोषण, स्वास्थ्य और सामाजिक मुद्दों पर कार्य कर रहा है, जो इसे सबसे प्रभावी जनहितकारी विभाग बनाता है। उन्होंने कहा कि कमजोर और एनीमिक मां, कुपोषित बच्चों को जन्म देती है, जिससे उनका संपूर्ण जीवन जोखिम में रहता है। वहीं कुपोषण का दुष्चक्र देश की प्रगति में भी बाधक बनता है। मंत्री सुश्री भूरिया ने कहा कि भारतीय संस्कृति में वर्णित गर्भसंस्कार की अवधारणा विज्ञानसम्मत एवं व्यवहारिक है, जिसमें संतुलित आहार, सकारात्मक विचार और जीवनशैली गर्भस्थ शिशु के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
    मंत्री सुश्री भूरिया ने कहा कि कोविड काल ने यह सिद्ध कर दिया कि आयुर्वेद, योग और प्राचीन उपचार पद्धतियां आज भी उतनी ही प्रभावी हैं जितनी सदियों पहले थीं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में लोगों ने घरेलू आयुर्वेदिक उपायों से अपने स्वास्थ्य को सुरक्षित रखा। इसी कारण आज के युग में आयुर्वेद को उन्नत कर स्वास्थ्य व्यवस्था में शामिल करना अनिवार्य हो गया है। उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा योग को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा आयुष विभाग के माध्यम से आयुर्वेद को जन-जन तक पहुंचाने के प्रयासों का भी उल्लेख किया।
    मंत्री सुश्री भूरिया ने कहा कि आयुर्वेद पर उनकी आस्था ही थी कि उन्होंने अपनी विधानसभा और जिला स्तर पर कुपोषण निवारण का बड़ा अभियान ‘मोटी आई’ शुरू किया। इसमें बच्चों को आयुर्वेदिक तेल से मालिश, आयुर्वेदिक उपचार और पौष्टिक आहार उपलब्ध कराया गया। जिले में 1950 चिन्हित बच्चों में से 1800 से अधिक बच्चे कुपोषण मुक्त हो गए। उन्होंने बताया कि इस नवाचार के लिए जिले की कलेक्टर को प्रधानमंत्री उत्कृष्टता पुरस्कार भी मिला है।
    मंत्री सुश्री भूरिया ने कहा कि आयुर्वेद को विश्वपटल पर प्रमुख स्थान दिलाने के लिए जरूरी है कि आयुर्वेदिक औषधियों पर विस्तृत शोध हो, क्लीनिकल ट्रायल हों और इनके परिणाम प्रमाण-आधारित रूप में दुनिया के सामने आएं। उन्होंने सुझाव दिया कि नई पीढ़ी के चिकित्सकों को आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के मध्य तालमेल स्थापित करने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, ताकि मरीज को दोनों प्रणालियों का लाभ एक साथ मिल सके।
    मंत्री सुश्री भूरिया ने केंद्र और मध्यप्रदेश सरकार के आयुष क्षेत्र में किये जा रहे कार्यों पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि प्रदेश ने खुशीलाल आयुर्वेदिक संस्थान को अंतरराष्ट्रीय स्तर का स्वरूप दिया है, जहाँ देश-विदेश से लोग आयुर्वेदिक उपचार और जीवनशैली आधारित थेरेपी के लिए आते हैं। आयुर्वेद हमारी सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विरासत है, जिसे आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर भारत वैश्विक मंच पर एक नया, संतुलित और टिकाऊ स्वास्थ्य मॉडल प्रस्तुत कर सकता है।
    इस अवसर पर मंत्री सुश्री भूरिया ने सैम ग्लोबल यूनिवर्सिटी की चांसलर प्रीति सलूजा, चेयरमैन डॉ. हरप्रीत सिंह और वाइस चेयरमैन इंजीनियर अभिराज द्वारा आयुर्वेद और प्राचीन भारतीय ज्ञान की दिशा में किये गये इस प्रयास की सराहना की। उन्होंने कहा की भविष्य में भी ऐसे विषयों पर राष्ट्रीय स्तर के आयोजन होते रहेंगे।

  • बैलेंसशीट के मुनाफे में जन भागीदारी से ही सफल होगा मध्यप्रदेश

    बैलेंसशीट के मुनाफे में जन भागीदारी से ही सफल होगा मध्यप्रदेश

    -आलोक सिंघई-

    मध्यप्रदेश को अक्सर “भारत का हृदय” कहा जाता है — और आर्थिक संकेतक बताते हैं कि यह राज्य अब सचमुच भारत के विकास-मानचित्र पर एक अहम स्थान लेता जा रहा है। वर्ष 2024–25 में राज्य का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) लगभग 15.03 लाख करोड़ रुपए तक पहुँच गया है, जो 11.05 प्रतिशत की प्रभावशाली वृद्धि दर्शाता है। यह दर राष्ट्रीय औसत से बेहतर है और राज्य की आर्थिक गतिशीलता का संकेत देती है। राज्य की प्रति व्यक्ति आय भी बढ़कर लगभग 1.52 लाख रुपए तक पहुँची है। हालांकि यह वृद्धि उत्साहजनक है, फिर भी यह महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक जैसे अग्रणी राज्यों से कम है।
    मध्यप्रदेश की अर्थव्यवस्था अब केवल खेती पर निर्भर नहीं है। सोयाबीन, गेहूँ और तिलहन के उत्पादन प्रेोसेसिंग में अग्रणी होने के साथ, राज्य ने अब औद्योगिक निवेश और निर्यात में भी उल्लेखनीय प्रगति की है। वर्ष 2024–25 में राज्य की निर्यात रैंकिंग 15वें से सुधरकर ग्यारहवें स्थान पर पहुँच गई है। इंदौर, भोपाल, पीथमपुर और मंडीदीप जैसे औद्योगिक क्षेत्र अब तकनीक, इंजीनियरिंग और फार्मा उत्पादों के नए केंद्र बन रहे हैं। राज्य ने पिछले वर्ष ढाई हजार करोड़ रुपयों से अधिक के तकनीकी निवेशों को आकर्षित किया है। यही वजह है कि राज्य अब धीरे-धीरे एक “डिजिटल पावरहाउस” के रूप में उभर रहा है।
    विकास के इन सकारात्मक संकेतों के बावजूद, सामाजिक क्षेत्र अभी भी मध्यप्रदेश की कमजोर कड़ी है। राज्य की साक्षरता दर लगभग सत्तर फीसदी है, जो राष्ट्रीय औसत से कम है। स्कूलों में इंटरनेट कनेक्टिविटी सिर्फ पैंतीस प्रतिशत तक सीमित है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों से प्रतिभाओं की प्राप्ति कठिन बनी हुई है। जो ग्रामीण अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देना चाहते हैं उन्हें इसकी मंहगी कीमत चुकाकर बच्चों को बड़े शहरों में भेजना पड़ता है।
    स्वास्थ्य के पैमाने पर भी राज्य कठिन संकटों से जूझ रहा है। भारी धनराशि खर्च करने के बावजूद कार्यकुशल आबादी का सवास्थ्य चिंताजनक बना हुआ है। शिशु मृत्यु दर लगभग 43 प्रति 1000 जन्म है, और ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों की उपलब्धता सीमित है। मानव विकास सूचकांक (HDI)0.611 के आसपास है, जो भारत के कई अन्य राज्यों से नीचे है।
    यदि कोई क्षेत्र है जिसमें मध्यप्रदेश ने राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाया है, तो वह है स्वच्छता और आधारभूत ढाँचे का विकास। इंदौर लगातार सातवीं बार भारत का सबसे स्वच्छ शहर घोषित हुआ है। बिजली, सड़क, और ग्रामीण कनेक्टिविटी के क्षेत्र में पिछले दशक में उल्लेखनीय सुधार हुए हैं। राज्य ने वर्ष 2024–25 में 1.01 लाख मिलियन यूनिट बिजली ट्रांसमिट कर नया रिकॉर्ड बनाया।
    राज्य सरकार ने लाड़ली बहना योजना,मुख्यमंत्री उद्यम क्रांति योजना और कृषि निवेश प्रोत्साहन कार्यक्रमों के ज़रिए सामाजिक व आर्थिक समावेशन को बढ़ावा देने का प्रयास किया है इसके बावजूद बेरोज़गारी, महिला सुरक्षा और भ्रष्टाचार जैसी समस्याएँ अब भी जनता के बीच चिंता का कारण हैं।
    अन्य राज्यों से तुलना

    संकेतकमध्यप्रदेशगुजरातमहाराष्ट्रकर्नाटकउत्तरप्रदेश
    GSDP वृद्धि दर (2024–25)11.05%9.3%8.1%9.8%9.1%
    प्रति व्यक्ति आय (₹)1.52 लाख2.74 लाख2.85 लाख2.65 लाख1.45 लाख
    साक्षरता दर (%)7079827668
    HDI0.6110.6820.6960.6850.613

    *स्रोत: NITI Aayog, आर्थिक सर्वेक्षण 2024–25, Free Press Journal, Times of India, ET Government Reports
    मध्यप्रदेश आज एक तेजी से बढ़ता, परंतु चुनौतियों से जूझता राज्य है। जहाँ आर्थिक प्रगति ने एक ठोस आधार तैयार किया है, वहीं शिक्षा, स्वास्थ्य और मानव विकास को मजबूत किए बिना “सफल राज्य” की उपाधि अधूरी रहेगी। संक्षेप में कहा जाए तो — मध्यप्रदेश अब भारत का “उभरता हुआ विकासशील राज्य” है, पर वास्तविक सफलता की मंज़िल तक पहुँचने के लिए सामाजिक विकास पर केंद्रित नई रफ्तार की जरूरत है।

    1. शिक्षा और डिजिटल पहुँच में तेज़ निवेश के माध्यम से हर स्कूल तक इंटरनेट व स्मार्ट क्लास की पहुंच आज की अनिवार्य पहल बन गई है।
    2. ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं का सशक्तीकरण करने के लिए हमें अपने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर और उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी।
    3. कृषि से उद्योग तक वैल्यू-चेन विकसित करना होगी ताकि किसानों की आय स्थायी रूप से बढ़ाई जा सके और उन्हें सरकारी मदद की बाट न जोहनी पड़े।
    4. महिला सुरक्षा व कौशल विकास कार्यक्रमों को वास्तविक परिणामों तक पहुँचाना होगा। लाड़ली बहना योजना का लाभ हर महिला तक न तो पहुंच पा रहा है और न ही ये संभव होगा। महिलाएं आर्थिक विकास की चेन का हिस्सा बनें तभी इन लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है।
    5. नवाचार और स्टार्टअप निवेश के लिए विशेष औद्योगिक ज़ोन बनाना होंगे जो नव उद्यमियों को सहारा देकर उत्पादन बढ़ाने में सहयोगी साबित हो। कल्याणकारी राज्य की कहानियां बहुत सुनी सुनाई जा चुकी हैं। अब तो चुनौतीपूर्ण नतीजे लाने की प्रतिस्पर्धा ही एमपी को सिरमौर बना सकती है।