-आलोक सिंघई-
अमेरिकी प्रतिबंधों से तिलमिलाई सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने आत्मनिर्भर भारत का नारा छेड़ दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं अनुरोध कर रहे हैं कि लोग भारत में बना माल ही खरीदें ताकि स्थानीय बाजार को बल मिले। अब तक की कांग्रेस की सरकारें हों या फिर मोदी जी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार सभी धड़ल्ले से विदेशी माल और पूंजी के सहारे विकास का ढोल पीटते रहे हैं। नरेन्द्र मोदी की पृष्ठभूमि गुजरात रही है इसलिए वे एमके गांधी के स्वराज आंदोलन को करीब से जानते रहे हैं। वह आंदोलन अंग्रेजी हुकूमत को हिला देने वाला बताया गया था। कम से कम भारतीय इतिहासकारों ने तो आजादी के बाद से ही गांधी नेहरू और कांग्रेस के आंदोलनों को आजादी दिलाने वाला आंदोलन बताया है। ये विचार उन्होंने देश के मन मस्तिष्क में इतने गहरे तक जमा दिया है कि लोग इससे अलग कुछ सोचना ही नहीं चाहते। यदि उनके इस मानस से अलग कुछ भी कहा जाए तो वे भड़क उठते हैं। जबकि हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। ब्रिटिश साम्राज्य ने सीधे तौर पर लगभग 56 देशों को शासित किया और इनमें से कई देशों को स्वतंत्रता प्राप्त हुई, जिससे आज दुनिया के लगभग 60 संप्रभु देश ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र हुए देशों के दायरे में आते हैं। इन 56 देशों में से एक देश भारत भी था । शेष पचपन देशों में न गांधी थे न नेहरू न उनकी कांग्रेस इसके बाद भी उन्हें आजादी मिली।
दरअसल द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जनजागरण का जो माहौल बना उसमें किसी दूसरे देश पर शासन करना कठिन हो गया था। अमेरिका में स्वतंत्रता के जिन मूल्यों की पैरवी की जा रही थी उसने अंग्रेजों के कारनामों को खूब बदनाम किया। रूस में जारशाही का पतन सन 1917 में हुआ था, जब रूस की फरवरी क्रांति ने जार निकोलस द्वितीय के शासन को समाप्त कर दिया और एक अंतरिम सरकार की स्थापना हुई। ऐसे माहौल में अंग्रेजों को महसूस हो गया था कि वे अब ज्यादा लंबे समय तक अपने उपनिवेशों को गुलाम बनाकर नहीं रख सकते। भारत में अंग्रेजी शासक 1885 में स्थापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के माध्यम से विभिन्न रियासतों के बीच अपना शासन चला रहे थे। जब उन्हें लगा कि उन्हें शासन छोड़ना पड़ेगा तो उन्होंने अपने संरक्षण वाले औद्योगिक घरानों के सहयोग से एमके गांधी के चलाए आंदोलनों को अपना मूक समर्थन देना शुरु कर दिया।
बंगाल में नील किसानों का आंदोलन 1859 से चल रहा था। गांधी जी को 1917-18 में चंपारन सत्याग्रह में भाग लेने का अवसर मिला। इस आंदोलन ने गांधी को विदेशी कपड़ो के धंधे की बारीकियां समझने का अवसर मिला। नतीजतन गांधीजी ने विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार का आंदोलन शुरु किया। उन्होंने 1921 में वस्त्रों की होली जलाकर कपड़े के धंधे की ओर देश का ध्यान आकर्षित किया। इस समय तक अंग्रेज बचाव की मुद्रा में आ चुके थे। वे गांधी के आंदोलनों को अंदर से समर्थन देकर भारत में अपने नियंत्रण वाली सत्ता के उदय की भूमिका जमा रहे थे। पहले स्वाधीनता संग्राम 1857 के बाद से 90 सालों तक अंग्रेजों पर छुटपुट हमले जारी रहे। त्रिपुरी अधिवेशन में 1939 में सुभाष चंद्र बोस ने गांधीजी समर्थित पट्टाभि सीतारमैय्या को हराकर कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष का चुनाव जीत लिया था । इसके बावजूद उन्हें अंग्रेजों के समर्थन वाले गांधीजी के असहयोग की वजह से अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देना पड़ा। इससे क्षुब्ध सुभाष चंद्र बोस ने 1941 में सिंगापुर से अंग्रेजों के विरुद्ध आजादी के संग्राम की घोषणा कर दी । उन्होंने1943 में आजाद हिंद सरकार का गठन करके ग्यारह देशों से मान्यता भी हासिल कर ली थी।
इन हालात में चलाए गए गांधी जी के स्वदेशी आंदोलन को अंग्रेज केवल इसलिए समर्थन दे रहे थे क्योंकि वे भारत में अपनी पिट्ठू सरकार का गठन करना चाहते थे। यही वजह थी कि भले ही 1947 में अंग्रेजों ने नेहरू के साथ ट्रांसफर आफ पावर एग्रीमेंट कर लिया लेकिन भारतीय बाजार पर उन्होंने अपना नियंत्रण नहीं छोड़ा। 1947 में अंग्रेजों का भारतीय कपड़ा उद्योग में बहुत गहरा और विनाशकारी हस्तक्षेप था, जिसके कारण पारंपरिक हथकरघा उद्योग लगभग नष्ट हो गया और भारतीय कारीगरों को भारी नुकसान हुआ। अंग्रेजों ने कच्चे माल के रूप में सस्ते कपास का निर्यात किया और ब्रिटेन में उत्पादित सस्ते, मशीन-निर्मित कपड़े भारत में ऊंची कीमतों पर बेचे, जिससे भारतीय बाजार पट गए और पारंपरिक भारतीय वस्त्र उद्योग दम तोड़ गया। आजादी के बाद स्वदेशी का नारा खादी आंदोलन तक ही सीमित रह गया। खादी और ग्रामोद्योग बोर्ड के नारे तले कांग्रेस ने देश को कपड़ा निर्माण में आत्मनिर्भर नहीं होने दिया।
कांग्रेस के विभाजन के बाद जब 1971 में श्रीमती इंदिरागांधी सत्ता में लौटी तो उन्होंने रिलायंस के धीरूभाई अंबानी को देश के बाजार में पोलिएस्टर कपड़ा उतारने का काम दे दिया। इसके बाद भारतीय कपास की खेती का भट्टा बैठ गया और वह कपास की गठाने निर्यात करने का कार्य बदस्तूर जारी रहा । इन दिनों नरेन्द्र मोदी धार में कपड़ा उद्योग की आधारशिला रख रहे हैं तब इतिहास की इन बातों पर गौर करना जरूरी हो गया है। इसके पहले तक की तमाम राजनीतिक दलों की सरकारों ने भारत में विदेशी पूंजी की घुसपैठ रोकने को कोई कोशिश नहीं की बल्कि वे अधिकाधिक कर्ज लेकर शासन करने की नीति पर ही चलते रहे। लगभग दो दशकों तक मध्यप्रदेश में भाजपा की शिवराज सिंह चौहान सरकार भी पुरानी सत्ता लाबी की ही पिट्टू सरकार बनकर काम करती रही। कर्ज लेकर खैरात बांटने का जो अभियान उन्होंने चलाया उससे उन्हें भरपूर लोकप्रियता हासिल हुई। कर्ज से बिजली सड़क और पानी के प्रोजेक्ट पूरे करने के लिए उन्होंने धड़ाधड़ कर्ज लिया और जाते हुए वे प्रदेश पर तीन लाख अस्सी हजार करोड़ रुपयों का भारी भरकम कर्ज छोड़कर गए। इस कर्ज पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर हर साल राज्य को लगभग चालीस हजार करोड़ रुपयों का ब्याज अदा करना पड़ता है। भला इतनी मोटी कमाई को सूदखोर देश और कंपनियां कैसे बंद होने दे सकती हैं।
आज की डाक्टर मोहन यादव सरकार के लिए खैरात बांटने की अब तक चली आ रही नीतियों के विपरीत काम करने पर कुर्सी जाने का भय है और वे भले ही हिचक के साथ ही सही पर वही नीति दुहराते चले जा रहे हैं। ऐसे में जब भारतीय जनता पार्टी स्वदेशी का नारा बुलंद कर रही है तब उसके आंदोलन की खोखली आवाज कितने दूर तक जाएगी इसका अनुमान अभी नहीं लगाया जा सकता। सरकारी नौकरियां बेचने का जो अभियान कांग्रेस ने शुरु किया था उसे शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने खूब हवा दी। कांग्रेस की तरह लूटो और भागो की नीति पर अमल करते हुए शिवराज सिंह काजल की इस कोठरी से अपनी स्याह तस्वीर लेकर सुरक्षित बाहर निकल चुके हैं।
नरेन्द्र मोदी का स्वदेशी माल खरीदने का अनुरोध अमेरिकी प्रतिबंधों की मार की वजह से सामने आ सका है। आज इसे मेक इन इंडिया का विस्तार भले ही कहा जा रहा है पर मध्यप्रदेश में दो दशकों तक भारतीय जनता पार्टी की सरकारों ने स्वदेशी के मुद्दों पर क्या किया है इसका आकलन सहजता से किया जा सकता है।नानाजी देशमुख ने अपने सहयोगियों के साथ चित्रकूट में स्वदेशी के जो अनुसंधान किए और पूरी थीसिस तैयार की उसे भाजपा की उमा भारती सरकार ने पूरी शिद्दत से लागू करना शुरु किया था। इससे सूदखोर देशो में बेचैनी फैल गई और उन्होंने अरबों रुपयों का कर्ज बांटकर अपने पिट्ठू अखबारों के माध्यम से आंदोलन चलाकर उमा भारती की सरकार गिराई और अंततः उन्हें सत्ता से बाहर ही भेज दिया। आज वह आंदोलन चलाने वाले जिस समाचार पत्र पर लगभग पैंतीस हजार करोड़ रुपयों का कर्ज है वह इस मौजूदा स्वदेशी आंदोलन को भरपूर हवा देने में जुटा हुआ है।
स्वदेशी का नारा देते घूम रहे भाजपा के चिंतकों, संगठन कर्मियों और राजनेताओं को अपने गिरेबान में झांककर पहले अपने पूर्वजों की गलत नीतियों में सुधार करना होगा। अब कार्पोरेट सेक्टर खड़े करके देशज पूंजी से उद्योगों की स्थापना करना सरल हो गया है। ऐसे में स्वदेशी आंदोलन करने से पहले भाजपा के नेताओं को स्वदेशी पूंजी, स्वदेशी प्रबंधन और स्वदेशी बाजार की मजबूती के लिए कार्य करना होगा। यदि वे ये नहीं कर पाए तो इस स्वदेशी आंदोलन का हश्र भी गांधीजी के स्वदेशी आंदोलन की तरह ही होगा। विदेशी पूंजी से आत्मनिर्भर भारत नहीं बनाया जा सकता।

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