जब सेना हस्तक्षेप नहीं करती तो सवाल क्यों- कर्नल डॉ गिरिजेश सक्सेना


भोपाल,14 अगस्त(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। भारतीय लोकतंत्र ने सेना को जो दायित्व सौंपा है उसे वह पूरी जिम्मेदारी से निभा रही है। सेना किसी भी आंतरिक मामले में बगैर बुलाए हस्तक्षेप नहीं करती है। ऐसे में सेना के आपरेशंस पर सवाल खड़े करके हमें अपनी रणनीति उजागर करने पर मजबूर क्यों किया जाता है। सेना के पूर्व अफसरों एयर वाइस मार्शल डॉ प्रमोद श्रीवास्तव, कर्नल राजीव सूद, बिग्रेडियर आर विनायक,और कैप्टन नेवी विनोद बक्शी ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए ये बैचेनी व्यक्त की। इस कार्यक्रम का संयोजन कर्नल डॉ.गिरिजेश सक्सेना ने किया था। आयोजन की संकल्पना दुष्यन्त कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय की निदेशक करुणा राजुरकर की थी।संचालन डॉ विशाखा राजुरकर ने किया एवं आभार दुष्यन्त कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय के अध्यक्ष रामराव वामनकर ने व्यक्त किया।
कार्यक्रम का शुभारम्भ करते हुए डॉ गिरिजेश ने अपने बीज वक्तव्य में कहा। मानव जीवन की शुरुआत ही युद्ध से हुई और उसका पहला युद्ध भोजन के लिये था। जैसे – जैसे सभ्यताओं का विकास और विस्तार हुआ युद्ध के स्वरूप बदलते गये पर युद्ध सदैव ही स्वार्थ की सिद्धि के लिये हुए हैं। उन्होंने कहा कि आज़ादी के बाद सेना को जो भी मिशन दिया गया उसने बखूबी पूरा किया और कभी कोई सवाल नहीं किया । इसके बावजूद बालाकोट स्ट्राइक,पुलवामा और पहलगाम हमले के बाद विपक्ष ने सेना से जो सवाल किये उससे सेना का मनोबल तोड़ने की कोशिश हुई है । अच्छी बात यह कि वर्तमान केन्द्र सरकार ने पहलगाम घटना के बाद सेना को स्वतंत्र रूप से काम करने का मौका दिया । यही वजह थी कि देश की तीनों सेनाओं ने तैयारी के साथ ऑपरेशन सिन्दूर को अंजाम दिया।
इस अवसर पर कर्नल राजीव सूद ने कहा कि ऑपरेशन सिन्दूर का उद्देश्य पाकिस्तान स्थित आतंकवादी ठिकानों को नष्ट करना था। पाकिस्तान से लड़ना या पीओ के लेना इसका उद्देश्य नहीं था। उन्होंने बताया मध्य रात्रि में ये अभियान शुरू हुआ और मात्र 25 मिनट में सेना ने अपना टारगेट भेद दिया । बाद में पाकिस्तान ने हम पर ड्रोन हमले करने की कोशिश की जिन्हें सेना ने आसमान में ही नष्ट कर दिया । इस आपरेशन की सफलता में हमारे वैज्ञानिकों ने बड़ी भूमिका निभाई थी।
बिग्रेडियर आर विनायक ने अपने 36 साल के अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि भारतीय सेना कभी हारी नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश सेना की ओर से पांच लाख सैनिक लड़े और द्वितीय विश्व युद्ध में हमारे साठ हजार सैनिकों में से छब्बीस हजार शहीद हुए। उन्होंने बासठ,पैंसठ, इकहत्तर के युद्ध कारगिल और आपरेशन सिन्दूर के संदर्भ में भारतीय सैनिकों के साहस और पराक्रम का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि हम कभी भी हमलावर नहीं रहे केवल बचाव की कार्रवाई की ,इसकी हमें बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ी।
इस अवसर पर समुद्री सुरंग विशेषज्ञ कैप्टन विनोद बख्शी ने बताया सेना में शामिल होने के बाद संविधान की रक्षा की शपथ लेनी होती है। उन्होंने बताया कि नेवी की सेवा में चार- चार महीने दिन – रात का पता नहीं चलता।परिवार से भी कोई सम्पर्क नहीं रहता। उन्होंने 1983 में बागमति नदी में डूबीं ट्रेन का जिक्र करते हुए बताया कि जब मैंअस्सी फीट की गहराई में डूबे ट्रेन के डिब्बे से लाश निकालता था तो मेरी रूह कांप जाती थी।
कार्यक्रम के अंत में एयर वाइस मार्शल डॉ प्रमोद श्रीवास्तव ने अनेक सवाल भी उठाये । उन्होंने कहा कि सेना में सेवा देने के बाद जब हम सेवानिवृत होते हैं तो अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है । छोटे – छोटे कामों के लिये रिश्वत देनी पड़ती है तो हमें शर्म आती है। उन्होंने कहा कि फौजी में जुनून होता है और उसे कोई लालच नहीं होता ।
इस अवसर पर प्रश्नकाल का दौर भी हुआ जिसमें श्रोताओं की जिज्ञासाओं का समाधान भी मंच ने किया गया।

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