गोविंद राजपूत पर हमला करके खुद घिरे भूपेन्द्र सिंह


पूर्व परिवहन मंत्री रहे विधायक भूपेन्द्र सिंह दांगी अब खुद सफाई देते घूम रहे हैं कि उन्होंने सदन में मालथौन के जिस गोविंद सिंह राजपूत पर आदिवासियों की जमीनें हड़पने का आरोप लगाया है वे खाद्य मंत्री गोविंद सिंह राजपूत नहीं हैं। आदिवासियों की जमीनें हड़पने का कार्य तो मालथौन में कथित आतंक का प्रतीक बने गोविंद सिंह राजपूत पिता श्री बलवंत सिंह राजपूत ने किया है। विधानसभा में उन्होंने अपना पूरा भाषण कुछ इस तरह दिया कि लोगों को महसूस हुआ कि वे खाद्य मंत्री के बारे में बात कह रहे हैं। सदन से बाहर हालांकि उन्होंने अपनी सफाई दी लेकिन तब तक सदन की लॉबी में बैठे पत्रकार बाहर जा चुके थे। यही वजह थी कि कई समाचार माध्यमों ने भूपेन्द्र सिंह के आरोपों को खाद्य मंत्री गोविंद सिंह राजपूत पर लगाया गया आक्षेप ही मानकर समाचार रिपोर्ट फाईल कर दी ।


ये कूटनीति कुछ महाभारत के उस प्रसंग की ही तरह थी जिसमें भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर के माध्यम से संदेश प्रसारित करवाया था जिसमें युधिष्ठिर कहते सुने गए कि अश्वथामा हतो हतः…..इसके बाद की लाईन युद्ध के नगाड़ों के स्वर में नहीं सुनी जा सकी जिसमें उन्होंने विशालकाय हाथी अश्वथामा के बारे में कहा था ….नरो व कुंजरो वा । इस तरह की राजनीतिक चाल चलकर भूपेन्द्र सिंह ने अपने चिर प्रतिद्वंदी गोविंद राजपूत को बदनाम करने का दांव खेला था। उनका यह दांव एक तरह से उलटा पड़ा।


कहा जाता है मुद्दई लाख बुरा चाहे क्या होता है वही होता है जो मंजूर ए खुदा होता है। कहीं तीर और कहीं निशाना की तर्ज पर उठाए इस मुद्दे पर भूपेन्द्र सिंह ने जो सफाई दी उससे गोविंद राजपूत पर लगे तमाम आरोप खंडित होते मालूम पड़ रहे हैं जिन्हें विपक्ष में बैठे कांग्रेसी भी लंबे समय से लगाते रहे हैं। पिछले चुनावों में जब कांग्रेस की कमलनाथ सरकार सत्ता में आई थी तब ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक गोविंद सिंह राजपूत और इमरती देवी ने विद्रोह को स्वर देने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। इमरती देवी चुनाव हार जाने की वजह से परिदृश्य से बाहर हो गईं लेकिन गोविंद राजपूत तभी से विपक्ष के निशाने पर बने हुए हैं।


भूपेन्द्र सिंह अपने छात्र जीवन से गोविंद राजपूत के प्रतिद्वंदी रहे हैं। तबके गोविंद और आज के खाद्य मंत्री में बड़ा अंतर आ चुका है। अपने भाई हीरा सिंह राजपूत और क्षत्रियों के खानदानी हुनर के बलबूते गोविंद राजपूत हमेशा सत्ता के नजदीक बने रहे हैं। उनके समर्थक भी लोकतांत्रिक सत्ता का संचालन करने के हुनर में माहिर हो चुके हैं। यही वजह है कि वे लगातार सत्ता में बने हुए हैं और भूपेन्द्र सिंह जैसे उनके प्रतिद्वंदी अब अपनी राजनीतिक पारी समेटते नजर आने लगे हैं।


दरअसल भूपेन्द्र सिंह दांगी ने भी अपनी लंबी राजनीतिक पारी में सत्ता का भरपूर आचमन किया है। कभी एक छोटी से कथित पारिवारिक मालगुजारी से शुरु उनकी राजनीतिक यात्रा आज अरबों के साम्राज्य तक पहुंच गई है। जब वे परिवहन मंत्री थे तब भी उन्होंने कांग्रेस के समय काल से चली आ रही परंपराओं को जारी रखा था। मध्यप्रदेश की स्थापना से लेकर पिछली सरकार तक परिवहन को सत्ता दुहने का साधन माना जाता रहा है। विदेशी कर्ज चुकाने की चुनौतियों ने आज बेशक इस काली कमाई पर अंकुश लगाने की मजबूरी को जन्म दिया है। इसके बावजूद परिवहन विभाग का अमला आज भी समानांतर जांच चौकियां बनाकर अपने आकाओं को खुश करने मेंजुटा हुआ है।


परिवहन आरक्षक सौरभ शर्मा के ठिकानों से बरामद नकदी, सोना और अन्य बेनामी संपत्तियों को लेकर कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार भी गोविंद राजपूत को घेरने का प्रयास करते हैं । इसका नतीजा ये होता है कि समूची भाजपा गोविंद राजपूत के पक्ष में आकर खड़ी हो जाती है और परिवहन घोटाले की फाईल ठंडे बस्ते में पहुंच जाती है। ऐसा ही कुछ इस बार हुआ जब भूपेन्द्र दांगी के भाषण के बाद पूरा सरकारी तंत्र स्पष्टीकरण देने में जुट गया कि मालथौन वाले गोविंद सिंह राजपूत हमारे खाद्य मंत्री नहीं हैं।


जाहिर सी बात है कि खाद्य मंत्री को लेकर विपक्ष और पार्टी के ही कुछ पुराने भाजपाई जिस तरह से लामबंद होते जा रहे हैं गोविंद राजपूत की ताकत उतनी ही ज्यादा बढ़ती जा रही है। भूपेन्द्र सिंह ने आदिवासियों की जमीनें छिनने का बवंडर खड़ा करके खुद को बड़ा जनसेवक बताने की जो चेष्ठा की उसने उन्हें ही सरकार के निशाने पर ला खड़ा किया है। जबसे वे मंत्री पद से हटाए गए हैं तभी से बार बार वे अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का जतन करते रहे हैं। जिस तरह से उन्होंने विधानसभा के अपने भाषण पर सफाई दी उससे उनकी बचाव की मुद्रा भी यही कुछ बयान कर रही है।


दरअसल भाजपा ने सत्ता की आड़ में अपना घर भरने वाले नेताओं को घर बिठाने का जो अभियान चला ऱखा है उसकी वजह से कई नेताओं को अपना भविष्य खतरे में नजर आने लगा है। वे जब तक सत्ता के शेर पर सवार हैं तब तक तो उनकी कहानी चलती रहेगी लेकिन जैसे ही वे सत्ता से दूर होंगे उनकी काली कमाई का साम्राज्य धूल धूसरित कर दिया जाएगा। भोपाल का मछली साम्राज्य इसकी जीती जागती मिसाल है।


भूपेन्द्र सिंह अपने विधानसभा क्षेत्र में खडे़ गोविंद राजपूत मालथौन जैसे उस दिग्गज प्रतिद्वंदी को समेटने का प्रयास कर रहे हैं। जिसने अपनी भतीजी रक्षा राजपूत को कांग्रेस से टिकिट दिलवाकर भूपेन्द्र सिंह के सामने कड़ी राजनैतिक चुनौती खड़ी कर दी थी। भूपेन्द्र सिंह भले ही मालथौन के गोविंद सिंह राजपूत को भाजपा में लाए हों लेकिन तभी से वे उसे समाप्त करने की मुहिम भी चलाए हुए हैं। उसके बेटे का कथित अनाज घोटाला उजागर करने के बाद तो उनके लिए खुरई और मालथौन में अपने विरुद्ध बड़ी राजनीतिक ताकत खड़ी होती नजर आ रही है। अपने प्रतिद्वंदियों को वे समाप्त करने का जितना प्रयास कर रहे हैं उतना खुद ही दलदल में फंसते देखे जा रहे हैं।

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