संविधान दिवस पर देश में खूब चर्चाएं हो रहीं हैं। राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू के अभिभाषण पर विपक्ष के कई नेता उछल पड़े हैं। समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्दों के तिरोहित होने की संभावना पर वे बौखलाए घूम रहे हैं.कांग्रेस के नेता गण सवाल उठा रहे हैं कि क्या देश के आम नागरिकों को न्याय और स्वतंत्रता मिल पा रही है। यदि नहीं तो संविधान के आगे झुकने से क्या होने वाला है। संविधान दिवस मनाकर सरकार आम नागरिकों के दिलों में दायित्वबोध जगाने का प्रयास कर रही है। विपक्ष सरकार के कार्य को कटघरे में खड़ा कर रहा है । ये वही विपक्ष है जिसने लगभग सात दशकों तक देश पर शासन किया है। इसके बावजूद संविधान की उपयोगिता पर वह आज सवाल उठा रहा है। संविधान को अपना उल्लू सीधा करने का उपकरण बनाकर एक बड़े वर्ग ने इसे विकास की राह में सबसे बड़ा अडंगा बनाकर रख दिया है। उन लोगों का प्रयास रहता है कि वह अपने गैरकानूनी कार्यों को संविधान सम्मत बताने के लिए तरह तरह के शिगूफे छोड़ें और संविधान की इबारतों का उल्लेख करके सब तक न्याय और विकास का लाभ न पहुंचने दें।देश में कभी राजतंत्र और जमींदारी प्रथा शोषण का माध्यम बनी हुई थी। तब भी मलाईदार तबका विकास का लाभ सभी तक नहीं पहुंचने देता था। आज लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी कमोबेश वही हालात बने हुए हैं। जिन्हें लोकतंत्र का लाभ मिल रहा है वे दूसरों से इसकी सहभागिता की राह में रोड़ा बन गए हैं। अफसरशाही इस शोषण कारी व्यवस्था की सबसे बड़ी खलनायक बनकर उभरी है। देश और राज्य के संसाधनों का लगभग अस्सी फीसदी हिस्सा गड़प कर जाने वाली नौकरशाही लोकतंत्र में जनता की सहभागिता रोकने में जुटी हुई है। नौकरशाही अपने दायित्व का निर्वहन तो करती नहीं और यदि कोई व्यक्ति या संस्था जनसहभागिता के आधार पर कोई प्रयास करता है तो उसमें अडंगा जरूर लगा देती है। जिस सहकारिता को जनता के विकास की सीढ़ी माना जाता रहा है उसमें भी लोकसेवक ही प्रावधानों की परिभाषा को तोड़ मरोड़कर अडंगा लगाकर खड़े हो जाते हैं।यदि कोई व्यक्ति सहकार भाव से संस्था बनाने पहुंचे तो तरह तरह के कुतर्क देकर यहां के अफसर ही अडंगा लगान लगते है। जिस सहकारिता को जन भागीदारी का ढांचा समझा जाता है उसमें भी नियम कानूनों का जाल बिछाकर वे सहकारी आंदोलन में पलीता लगा देते हैं। यही वजह है कि आज तक देश में सहकारिता आंदोलन का प्रसार नहीं हो पाया है। भारत में एक भी सार्वजनिक या निजी बैंक नहीं डूबा है ,लेकिन जितने भी बैंक डूबे हैं वे सभी सहकारी हैं। यदि नियम कानूनों का पुख्ता जाल मौजूद है तो फिर क्यों सहकारी संस्थाएं धराशायी हो जाती हैं।आडिट की पुख्ता दीवार होने के बावजूद माफिया ताकतें कैसे जन धन को गड़प करने में सफल हो जाती हैं। इस बात पर कानून का पुलिंदा लेकर चलने वाले अफसर मौन हो जाते हैं। निजी क्षेत्र के प्रतिष्ठान हों या कार्पोरेट क्षेत्र की कंपनियां , वे सभी अपने टारगेट पा लेते हैं लेकिन सहकारी संस्थाएं ढप हो जाती हैं। जब तक कोई सख्त प्रशासक बदमाशों से पंगा लेकर सहकारी संस्था को संभाले रहता है तब तक तो वह संस्था चलती रहती है जैसे ही वह हटता है उसके सहयोगी ही संस्था को खा जाते हैं। प्रशासनिक तंत्र में मौजूद अफसर भी संविधान की दुहाई देकर जनता को इधर उधर दौडाते रहते हैं। जब अतिक्रमण और स्वामित्व को लेकर संवैधानिक प्रावधान मौजूद हैं तो फिर राजस्व विभाग के अफसर अपना दायित्व निर्वहन न करके लोगों को अदालतों की ओर क्यों ठेल देते हैं। यदि हर समस्या का समाधान अदालती फीस चुकाकर ही प्राप्त करना है तो फिर इस अफसरशाही की जरूरत ही क्या है। राज्य के मुख्य सचिव अनुराग जैन कहते हैं कि यदि जिलों की समस्याएं राज्य स्तर तक पहुंची उनके समाधान नहीं किए गए तो अफसरों पर कार्रवाई की जाएगी। समस्या तो ये है कि कार्रवाई करेगा कौन। यदि अकुशल अफसरों को दंड दिया जाए तो अदालतें उन्हें राहत देने सामने आ जाती हैं। विधायिका में बैठे गैर जिम्मेदार नेतागण इस कार्रवाई में अडंगा बनकर सामने आ जाते हैं.। कर्मचारी संगठन मिलकर उस भ्रष्ट या अकुशल कर्मचारी को बचाने लगते हैं। इसके विपरीत यदि कोई अफसर अपने दायित्व का निर्वहन ठीक तरह से करे तो उसे तरह तरह के फर्जी मामलों में फंसाकर दंडित किया जाता है। तब भी इसी संविधान को हथियार बनाकर इस्तेमाल किया जाता है। हमें सोचना होगा कि हम संविधान बचाने के लिए जी रहे हैं या फिर संविधान को हमें लोक कल्याण के लिए उपयोग करना है। यदि कोई व्यक्ति किसी निर्धारित फार्मेट में अपनी पीड़ा प्रस्तुत नहीं करता है या फिर वह किसी सामाजिक दवाब में पीछे हटने को मजबूर है तो क्या ये जवाबदारी लोकसेवकों की नहीं है कि वे समस्या का समाधान करने की पहल स्वयं करें। यदि कोई अकुशल नागरिक मिलकर सहकारिता के माध्यम से पूंजी उत्पादन करना चाहते हैं तो अफसरशाही उनका मार्गदर्शन करे और देश के लिए पूंजी निर्माण की राह प्रशस्त करे। समाजवाद के नारे लगाना हो या धर्मनिरपेक्षता की लोरियां सुनाना इन सबके बीच क्या हम आम नागरिक की पीड़ा को अनसुना करते रहेंगे। आखिर हम किस समाजवाद की बात कर रहे हैं। क्या इंसानियत का धर्म किसी भी पाखंडी धर्म के सामने रद्दी की टोकरी में फेंक दिया जाएगा। जिस तरह मुगल शासक अपनी अय्याशी की वजह से भुला दिए गए। अंग्रेज अपनी दमनकारी नीतियों की वजह से भगा दिए गए। जमींदार अपनी शोषण कारी नीतियों की वजह से विदा कर दिए गए। उसी तरह ये लोकतंत्र भी अपनी गैर जिम्मेदारी और पाखंडी लोकसेवा के कारण जल्दी ही विदा कर दिया जाएगा। प्रशासनिक नाकामियों की इसी वजह से आज देश में कार्पोरेट सेक्टर का बड़ा तंत्र खड़ा हो चुका है। सरकारी क्षेत्र तो अब केवल लोकतंत्र के नाम पर कचरा ढोने वाली व्यवस्था बनकर रह गई है। यदि अफसरशाही ने अब भी अपने गिरेबान में नहीं झांका। नेता नगरी ने रिश्वत देकर सत्ता पाने की अपनी नीति जारी रखी तो जाहिर है कि लोग अपनी राह खुद तलाश लेंगे। जिस लोकतंत्र को आज सर्वश्रेष्ठ शासनशैली माना जाता है वह देखते ही देखते अजायबघर की वस्तु बनकर रह जाएगी। इसके लिए गैर जिम्मेदार अफसरों को सख्ती से विदा करना होगा और तंत्र से बाहर करना होगा तभी लोकतंत्र की भावना को बचाया जा सकता है। शायद संविधान दिवस मनाने का आशय भी यही है।
Month: November 2024
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संविधान को जनता का रोड़ा बनाने वालों को दंडित कौन करेगा
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सहकारी मत्स्य पालन से बढ़ेगा एक्सपोर्ट
भोपाल, (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर) भारत सरकार ने देश में सहकारी आंदोलन को मजबूत करने और अगले पांच वर्षों में देश के कवर न किए गए पंचायत/गांव में नई बहुउद्देशीय पीएसीएस या प्राथमिक डेयरी/मत्स्य सहकारी समितियों की स्थापना करके जमीनी स्तर तक अपनी पहुंच को मबजूब बनाने के लिए योजना को मंजूरी दी है। पंद्रह फरवरी 2023 को लिए गए फैसले के माध्यम से भारत सरकार के मत्स्य विभाग की निम्नलिखित योजनाओं सहित विभिन्न भारत सरकार की योजनाओं का तालमेल करके मत्स्य पालन को बढावा देने की प्रक्रिया शुरु की है।
- प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना (पीएमएमएसवाई) – पीएमएमएसवाई का उद्देश्य मछली उत्पादन, उत्पादकता, गुणवत्ता, प्रौद्योगिकी, कटाई के बाद के बुनियादी ढांचे और प्रबंधन, आधुनिकीकरण और मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने में बड़े अंतर को दूर करना है। इस योजना के तहत, लाभार्थी कुल परियोजना लागत/इकाई लागत के 40% से 60% तक की वित्तीय सहायता के लिए पात्र हैं।
- II. मत्स्य पालन और जलीय कृषि अवसंरचना कोष (एफआईडीएफ) – एफआईडीएफ का उद्देश्य समुद्री और अंतर्देशीय मत्स्य पालन क्षेत्र दोनों में ढांचागत सुविधाएं बनाना है। इस योजना में बर्फ संयंत्रों का निर्माण, कोल्ड स्टोरेज का विकास, मछली परिवहन और कोल्ड चेन नेटवर्क अवसंरचना, ब्रूड बैंकों की स्थापना, हैचरी का विकास, मछली प्रसंस्करण इकाइयाँ, मछली चारा मिलों/संयंत्रों और आधुनिक मछली बाजारों का विकास शामिल है। एफआईडीएफ के तहत परियोजनाएं उपर्युक्त अवसंरचना सुविधाओं के विकास के लिए प्रति वर्ष 3% की ब्याज सब्सिडी के लिए पात्र हैं।
मत्स्य पालन एवं अन्य सहकारी समितियों सहित नई प्राथमिक सहकारी समितियों की स्थापना की यह योजना एनसीडीसी द्वारा राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड), राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी), राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड (एनएफडीबी), राष्ट्रीय स्तरीय सहकारी संघों और राज्य सरकारों के सहयोग से कार्यान्वित की जा रही है।
इसके अलावा, एनसीडीसी ने भारत के तटीय राज्यों अर्थात् आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, गोवा, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और ओडिशा में मत्स्य कृषक उत्पादक संगठनों (एफपीपीओ) के रूप में विकास के लिए 910 प्राथमिक मत्स्य सहकारी समितियों का चयन किया है और सहकारी क्षेत्र में 70 नए एफएफपीओ पंजीकृत किए हैं। एनसीडीसी ने 44 गहरे समुद्र में चलने वाले ट्रॉलरों की खरीद के लिए महाराष्ट्र सरकार और गुजरात की सहकारी समिति को वित्तीय सहायता भी प्रदान की है।

सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग ने राज्य की आय बढ़ाने के लिए केन्द्रीय योजनाएं लागू करने पर जोर दिया है। उपरोक्त कदम मछली उत्पादन में लगे सीमांत मछुआरों सहित छोटे और सीमांत किसानों को अपेक्षित फॉरवर्ड और बैकवर्ड लिंकेज, कौशल विकास, प्रसंस्करण और कोल्ड चेन अवसंरचना सुविधाएं प्रदान करेंगे, जिससे उन्हें अपनी आय बढ़ाने में मदद मिलेगी। अभिसरण के लिए पहचानी गई योजनाओं के तहत लाभ उठाकर, सीमांत मछुआरे विभिन्न मत्स्य पालन और जलीय कृषि से संबंधित बुनियादी सुविधाओं का आधुनिकीकरण/उन्नयन और स्थापना करने में सक्षम होंगे, जिससे उन्हें अपनी उत्पादकता में सुधार करने में मदद मिलेगी।
यह बात सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में कही।