Month: July 2022

  • कोरोना की बूस्टर डोज जरूर लगवाएं बोले स्वास्थ्य मंत्री डॉ.प्रभुराम चौधरी

    कोरोना की बूस्टर डोज जरूर लगवाएं बोले स्वास्थ्य मंत्री डॉ.प्रभुराम चौधरी

    भोपाल, 21 जुलाई( प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. प्रभुराम चौधरी ने कहा कि सभी पात्र व्यक्ति कोविड टीके की प्रिकॉशन (बूस्टर) डोज अवश्य लगवायें। कोविड वैक्सीन अमृत महोत्सव में कोविड-19 प्रिकॉशन डोज 18 वर्ष से अधिक आयु के सभी पात्र व्यक्तियों को नि:शुल्क लगाया जा रहा है। स्वास्थ्य मंत्री डॉ. चौधरी आज होटल अशोक लेक व्यू के ओपन थियेटर में ड्राइव इन वैक्सीनेशन का शुभारंभ कर रहे थे।

    स्वास्थ्य मंत्री डॉ. चौधरी ने कहा कि एम.पी. टूरिज्म, यूनीसेफ और एनएचएम द्वारा ड्राइव इन वैक्सीनेशन का नवाचार किया गया है। इसके लिये अशोक लेक व्यू होटल के ओपन थियेटर परिसर में टीकाकरण केन्द्र बनाया गया है। यहाँ पर कोई भी पात्र व्यक्ति वाहन ड्राइव करते हुए टीकाकरण केन्द्र में पहुँच कर वाहन में बैठे-बैठे कोविड-19 प्रिकॉशन डोज लगवा सकता है। यह सुविधा दिव्यांग और वृद्धजन के लिये आसानी से टीका लगवाने में मददगार है। स्वास्थ्य मंत्री डॉ. चौधरी ने कहा कि इस नवाचार से पहले टीकाकरण अभियान में 50 हजार से अधिक व्यक्तियों को कोविड-19 के टीके लगाये गये।

    स्वास्थ्य मंत्री डॉ. चौधरी ने कहा कि कोविड टीका बहुत महत्वपूर्ण है। टीकाकरण के बाद आई तीसरी लहर में कोविड टीका ने सुरक्षा प्रदान की और जिन्हें कोरोना हुआ, उनमें से बहुत कम को अस्पताल जाना पड़ा। स्वास्थ्य मंत्री डॉ. चौधरी ने सभी नागरिकों से अपील की है कि कोरोना की प्रिकॉशन डोज अवश्य लगवायें। डायरेक्टर एनएचएम (टीकाकरण) डॉ. संतोष शुक्ला, जनरल मैनेजर एम.पी. टूरिज्म श्री के.आर. साद, श्री एस.पी. सिंह, संचार विशेषज्ञ यूनिसेफ मध्यप्रदेश श्री अनिल गुलाटी और डॉ. वंदना भाटिया उपस्थित थीं।

  • द्रौपदी मुर्मू की विजय को सुनहरा बनाएगी सिन्हा की हार

    द्रौपदी मुर्मू की विजय को सुनहरा बनाएगी सिन्हा की हार

    के. विक्रम राव

    नौकरशाही से राजनीति में प्रविष्ट हुये यशवंत सिन्हा को यदि कुछ भी लाज—लिहाज हो तो राष्ट्रपति चुनाव से हट जायें। हजारीबाग में अपने व्यवसाय को देखें। व्यापार बढ़ायें, ज्यादा मुनाफा कमायें। राजनीति में हनीमून पर दोबारा आये हैं। अब पूरा हो गया। क्योंकि जनसेवा तो राजनीति में अब चन्द निस्वार्थ जन के लिये ही रह गयी है। यशवंत सिन्हा को इसी जुलाई 1 को ही नाम वापस ले लेना चाहिये था, जब उनकी प्रस्ताविका कुमारी ममता बनर्जी ने कहा था : ”भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रपति पद हेतु राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू को चुनावी मैदान में उतारने से पहले विपक्ष के साथ चर्चा की होती तो विपक्षी दल उनका समर्थन करने पर विचार कर सकते थे।” उन्होंने यह भी कहा कि ”मुर्मू के पास 18 जुलाई होने वाले राष्ट्रपति चुनाव जीतने की बेहतर संभावना है, क्योंकि महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन के बाद एनडीए की स्थिति मजबूत हुयी है।”

    उत्तर प्रदेश जो राष्ट्रीय राजनीति का ध्रुव केन्द्र है में यशवंत सिन्हा के लिये धूमधाम से अखिलेश यादव ने समर्थन जुटाया। पर दरार पड़ गयी। चचा शिवपाल के शब्दों में भतीजा अपरिपक्व हैं। मगर नासमझी इस कदर ? ओमप्रकाश राजभर को न बैठक में बुलाया। न उनसे सिन्हा के लिये समर्थन मांगा। खिसियाये राजभर योगी आदित्यनाथ के घर पर डिनर खाने चले गये। वहां द्रौपदी मुर्मू के लिये सभी अपने वोट की घोषणा कर रहे थे। वहीं शिवपाल सिंह भी वादा कर आये। शिवपाल समाजवादी पार्टी के कुछ और वोट काट सकते हैं। उन्होंने ने कहा कि ”मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राष्ट्रपति चुनाव में राजग प्रत्याशी द्रौपदी मुर्मू के पक्ष में वोट मांगा है। लिहाजा मैं मुर्मू को ही वोट करूंगा।” श्री यादव ने यहां कहा, ”मैंने पहले ही कहा था, राष्ट्रपति चुनाव में जो प्रत्याशी मुझसे वोट मांगेगा, मैं उसके पक्ष में वोट करुंगा। योगी आदित्यनाथ ने मुझसे (द्रौपदी मुर्मू के लिये) वोट देने को कहा था और मैंने फैसला किया है कि मैं उन्हें वोट दूंगा।” जयंत चौधरी बच गये। सपा मुखिया के साथ रह गये। मगर क्या फर्क डाल पायेंगे ?

    सिलसिलेवार अन्य राज्यों पर गौर करें। अन्नाद्रमुक और अन्य सहयोगी दल एनडीए की प्रत्याशी द्रौपदी मुर्मू का समर्थन करेंगे। मुर्मू ने अन्नाद्रमुक नेताओं—के. पलानीस्वामी और ओ. पन्नीरसेल्वम, तमिल मनीला कांग्रेस के अध्यक्ष जी. के. वासन, पट्टाली मक्कल काचि (पीएमके) के अध्यक्ष डॉ. अंबुमणि रामदास से मुलाकात की। सभी ने उनके प्रति समर्थन व्यक्त किया। वहीं शिरोमणी अकाली दल (शिअद) ने भी कहा कि वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की उम्मीदवार का समर्थन करेगा। शिअद ने मुर्मू का समर्थन करने का फैसला किया है। पार्टी का मानना है कि वह अल्पसंख्यकों, शोषित और पिछड़े वर्गों के साथ—साथ महिलाओं की प्रतीक है। देश में गरीब व आदिवासी वर्गों के प्रतीक के रुप में उभरी हैं। यही वजह है कि पार्टी राष्ट्रपति चुनाव में उनका समर्थन करेगी। ”सिख समुदाय पर अत्याचारों के कारण हम कांग्रेस के साथ कभी नहीं जायेंगे।”

    पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कह चुकीं हैं कि ”यदि एनडीए की ओर से पहले द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी के बारे में बता दिया जात तो हम भी राजी हो जाते और सर्वसम्मति से उन्हें चुना जा सकता था। ममता बनर्जी ने द्रौपदी मुर्मू की जीत की संभावनाएं ज्यादा होने की बात भी स्वीकार की।”

    बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजग उम्मीदवार के बारे में कहा, ”हम लोगों को पूरा भरोसा है कि मुर्मू भारी बहुमत से जीतेंगी। यह बहुत खुशी की बात है कि एक आदिवासी महिला देश के सर्वोच्च पद के लिये उम्मीदवार है।” मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का झारखण्ड मुक्ति मोर्चा अब द्रौपदी को वोट देगा जिससे गठबंधन सहयोगी कांग्रेसी पार्टी को शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी।

    बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने स्पष्ट किया कि सिर्फ अनुसूचित जनजाति की महिला होने के कारण ही उनकी पार्टी ने द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति चुनाव के लिये समर्थन देने का ऐलान किया है। उनका एक ही विधायक है।

    प्रतिद्वंदी यशवंत सिन्हा ने द्रौपदी पर तनिक शकुनि के अंदाज में विवाद उठा दिया। वे बोले कि ”यह महिला प्रत्याशी रबर स्टांप राष्ट्रपति बनेगी।” सिन्हा की घोषणा है कि वे खुद राष्ट्रपति चुने गये तो ”केवल संविधान के प्रति उत्तरदायी रहूंगा।” हालांकि भारत का संविधान गत 70 वर्षों में 108 बार संशोधित हो चुका है। तुलना में अमेरिका का संविधान गत सवा दो सौ वर्षों में केवल 25 बार संशोधित हुआ। जब 1975 में एमर्जेंसी इंदिरा गांधी ने थोपी थी तो जनाब यशवंत सिन्हाजी कलक्टरी कर रहे थे। सरकारी अफसर थे उस शासन के जो भ्रष्टाचार—विरोधी संघर्ष में जननायकों को जेल में कैद कर रही थी। तब उन्हीं के परिवारजन लोकनायक जयप्रकाश नारायण भी इंदिरा गांधी की जेल में नजरबंद थे। बाद में इन्हीं जेपी की सिफारिश पर प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने सिन्हा पर कृपादृष्टि दर्शायी थी। यही सिन्हाजी अब आदिवासी गरीब विधवा द्रौपदी मुर्मू से बेहिचक वचन मांग रहे है कि वे ”नाममात्र” की राष्ट्रपति नहीं रहेंगी। खामोश नहीं रहा करेंगी। मगर जब दस साल मनमोहन सिंह गूंगे रहे, सोनिया की धौंस के चलती रही, तब?

    अब जानिये अगर सिन्हा स्वयं राष्ट्रपति बन गये (मुंगेरी लाल के सपने जैसा) तो यशवंतजी क्या—क्या कर देंगे? वे केन्द्रीय संस्थाओं द्वारा विपक्ष को तंग करना बंद करा देंगे। नीक है, सब इसे स्वीकारते हैं। सांप्रदायिकता को रोकेंगे? दुरुस्त है। राज्य सरकारों को डगमायेंगे नहीं। यह भी वाजिब है। मगर इंदिरा गांधी काल का यही सरकारी (84—वर्षीय) नौकर चालीस साल के दौरान तो ”जी हुजूरी” भर करता रहा। कैसा कर्तव्य निभाया?

    यशवंत सिन्हा को बैठ जाने के आग्रह के लिये तर्क है, वे कभी भी गंभीर चुनौती देने वाले, प्रत्याशी नहीं रहे। विपक्ष की चौथी पसंद रहे। शरद पवार चतुर थे। हार की प्रतीती हो गयी थी। पलायन कर गये। अधिक फजीहत से बचने के पूर्व यशवंत सिन्हा को संतुष्ट होना चाहिये कि उन्हें आशातीत प्राप्ति तो हो गयी। हशिए पर पड़े इस राजनेता को फोकट में देशव्यापी मीडिया पब्लिसिटी मिल गयी। बड़े—बड़े राजनेताओं से भेंट हो गयी जो अब उनके समर्थक बन बैठे। बिन रकम खर्चे सिन्हा लाभ पा गये। विपुल चुनावी बजट पा गये। फ्री भारत दर्शन करने का मौका मिल गया। अब उनके राजनीति करने में कुछ ही वर्ष रह गये है। वानप्रस्थ खत्म हो गया। संन्यास का वक्त दस साल पूर्व ही आ गया था। अभी भी देर नहीं है कि सिन्हा साहब रिटायमेंट की घोषणा के लिये। इसमें राष्ट्रहित है। उनका यश भी बना रहेगा।

    साहित्य में यश का रंग सफेद, धवल कहा गया है। कवि भूषण ने कहा था कि छत्रपति शिवाजी के अपार यश से तीनों लोकों में सफेदी छा गयी। तब इन्द्र अपने सफेद हाथी ऐरावत को तलाशते रहे। खुद ऐरावत गोरे इन्द्र को खोजता रहा। अत: सारी गोरी चीजें और गोरे लोग खो गये। अब यशवंत को भी यश की तरह गोरे बने रहना चाहिये। पराजय की कालिमा से बचें।

    K. Vikram Rao

    Mobile -9415000909

    E-mail –k.vikramrao@gmail.com

  • नारी शक्ति के सम्मान की प्रतीक द्रौपदी मुर्मू

    नारी शक्ति के सम्मान की प्रतीक द्रौपदी मुर्मू

    -नेहा बग्गा-

    देश में हम आजादी के 75 वर्ष मना रहे हैं और इस अमृत महोत्सव में एनडीए की राष्ट्रपति उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के चयन से पूरे देश में खुशी का माहौल है। मध्यप्रदेश ही नहीं,  जनजाति समाज ही नहीं अपितु पुरे देश को आज गर्व की अनुभूति हो रही है। देश के इतिहास में यह पहली बार होगा जब कोई पूर्व पार्षद राष्ट्रपति बनने के बेहद करीब पहुंच गया है। राष्ट्रपति प्रत्याशी के रूप में द्रौपदी मुर्मू के चयन ने भले ही उन लोगों को चौंका दिया हो, जो राष्ट्रपति पद को एक विशेष दायरे में सीमित करके देखते हैं। लेकिन भाजपा संसदीय दल का यह निर्णय वास्तव में जनजातियों और महिलाओं के सशक्तीकरण की दिशा में भाजपा की नीतियों का ही प्रतिबिंब है। 
    ओडिशा में जन्मी द्रौपदी मुर्मू ने भुवनेश्वर स्थित रमादेवी महिला कॉलेज से स्नातक की डिग्री (बीए) हासिल की। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत बतौर शिक्षक के रूप में की,  फिर वह राजनीति में आ गईं। साल 1997 में पार्षद के रूप में मुर्मू ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की। इसके 3 साल बाद 2000 में पहली बार विधायक बनीं और फिर भाजपा-बीजेडी सरकार में दो बार मंत्री भी रहीं। बाद में मुर्मू झारखंड की राज्यपाल बनीं और इस प्रदेश की पहली महिला राज्यपाल भी बनीं। यही नहीं वह देश के किसी भी प्रदेश की राज्यपाल बनने वाली देश की पहली आदिवासी महिला नेता भी हैं। ओडिशा के मयूरभंज जिले से ताल्लुक रखने वाली द्रौपदी मुर्मू झारखंड की पहली महिला आदिवासी राज्यपाल बनीं और सबसे लंबे समय तक इस पद पर रहीं। झारखंड की राज्यपाल रहते हुए पक्ष और विपक्ष दोनों ही उनकी कार्यशैली के मुरीद रहे। उन्होंने ओडिशा के सर्वोत्तम विधायक को दिया जाने वाला नीलकंठ पुरस्कार भी हासिल किया है। इस पद से रिटायर होने के बाद ओडिशा के मयूरभंज जिले के रायरंगपुर में रह रही हैं। द्रौपदी मुर्मू अपनी साफ छवि और बेबाक फैसलों के लिए जानी जाती हैं। इनकी निजी जिंदगी भले ही त्रासदियों से भरी रही हो, लेकिन देश के इस सबसे बड़े पद पर उनका नामांकन होना ये साबित करता है कि वह मुश्किल हालातों से निपटना बखूबी जानती हैं।
    भारतीय जनता पार्टी ने सदैव सबका साथ सबका विकास और सबके प्रयासों के साथ समाज के वंचित पीड़ित शोषित वर्गों को प्रतिनिधित्व दिलवाने के लिए अनेकों काम किए हैं और योजनाएं चलाई हैं। चाहे विधायिका और मंत्रिमंडलों में महिलाओं, पिछड़ों और आदिवासियों की संख्या की बात हो, या फिर 26 जनवरी की परेड हो, भाजपा की नीतियां सरकार के निर्णयों से छलकती रही हैं। बीते वर्षों में आदिवासियों और महिलाओं के हितों में भाजपा की केंद्र और राज्य सरकारों ने जो निर्णय लिए हैं, जो काम किए हैं, वो अभूतपूर्व हैं। पार्टी के इन निर्णयों और कामों में मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार की अग्रणी भूमिका रही है। लाड़ली लक्ष्मी योजना से लेकर भगवान बिरसा मुंडा के जन्मदिवस को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने के निर्णय तक पूरे देश के लिए अनुकरणीय रहे हैं। 
    मध्यप्रदेश देश का पहला ऐसा राज्य है, जहां निकाय व स्थानीय पंचायत के चुनाव में महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए 50% का आरक्षण दिया और आज जब हम चुनावी मैदान में है तो यह देखने को मिलता है कि महिलाएं लगभग 80% के आसपास आज चुनावी रण में है। यह समाज और प्रदेश के लिए अत्यंत सौभाग्य का विषय है की ग्रहणी से लेकर फाइटर जेट तक मध्य प्रदेश की बेटियां लगातार अपने पंख फैला रही हैं। मध्यप्रदेश से पिछले दिनों राज्यसभा की दोनों सीटों पर दो महिला प्रत्याशियों को निर्विरोध चयन कर सर्वोच्च सदन राज्यसभा में भेजा गया है। जिसमें सुमित्रा वाल्मिकी देश की पहली वाल्मिकी समाज से आने वाली सांसद बनी,  वहीं पिछड़ा वर्ग से कविता पाटीदार को राज्यसभा भेजा गया। यह मध्यप्रदेश में महिला सशक्तीकरण के लिए किए जा रहे प्रयासों का ही नतीजा है कि आज 42 लाख लाडली लक्ष्मी मध्यप्रदेश में हैं और बेटी और बेटों का अनुपात जो पहले 1000 बेटों पर 912 था अब 970 हो गया है। 
    चाहे महिला सशक्तीकरण हो या जनजातीय अस्मिता के गौरव को पुनर्स्थापित करना हो इस दिशा में जितने कार्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में पिछले 8 सालों में हुए हैं वो पहले कभी नहीं हुए। द्रौपदी मुर्मू जी को राष्ट्रपति प्रत्याशी नामांकित किए जाने का ये निर्णय मोदी जी के महिला व जनजातीय कल्याण के उसी अटूट संकल्प का प्रतिबिंब है। द्रौपदी मुर्मू ने अभी तक अपने सभी दायित्वों को बहुत अच्छे से निभाया है चाहे वह शिक्षक का हो,  संगठन का हो, जनप्रतिनिधि का या फिर राज्यपाल का। आशा की जानी चाहिए कि देश के सर्वोच्च पद पर पदस्थ होकर वे इस भूमिका में भी नए कीर्तिमान बनाएंगी। 
    -लेखक भारतीय जनता पार्टी की प्रवक्ता हैं |