खरगोन,22 अप्रैल(अनिल सारसर)। खरगोन पुलिस अधीक्षक सिद्धार्थ चौधरी को गोली मारने वाले को गिरफ्तार कर लिया गया है। डीआईजी तिलक सिंह ने बताया कि आरोपी मोहसीन उर्फ वसीम को पुलिस ने कसरावद क्षेत्र से पकड़ा है।
डीआईजी तिलक सिंह ने बताया कि आरोपी खरगोन के संजय नगर का रहने वाला है। उसी ने रामनवमी के दौरान जुलूस के दौरान एसपी चौधरी पर गोली चलाई थी, जिसे सायबर सेल की टीम ने कसरावद क्षेत्र से गिरफ्तार कर लिया है। मोहसीन आदतन अपराधी है, उस पर पहले से चार प्रकरण दर्ज हैं, जिसमें आर्म्स एक्ट समेत मारपीट के प्रकरण हैं। आरोपी मोहसीन से पूछताछ की जा रही। पुलिस तलवार चलाने वाले आरोपी की तलाश कर रही है। 10 अप्रैल को खरगोन हिंसा में 50 लोग से ज्यादा घायल हुए थे। घायलों में एसपी सहित 6 पुलिस के जवान भी शामिल थे।
अब तक 159 आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी खरगोन उपद्रव के फरार 106 फरार आरोपियों पर 10-10 हजार रुपये का इनाम घोषित किया गया है। कमांडेंट अंकित जायसवाल ने बताया है कि रामनवमी जुलूस हिंसा के मामले में अब तक 159 आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है।
इब्रीश खान मौत मामले में 5 आरोपियों पर केस दर्ज खरगोन उपद्रव में युवक इब्रीश उर्फ सद्दाम खान की मौत के मामले में पुलिस ने 5 आरोपियों पर केस दर्ज किया है। 5 में से 2 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका हैं वहीं, 3 आरोपी अब भी फरार हैं। पकड़े गए एक आरोपी पर एनएसए लगाया है। अब तक खरगोन हिंसा मामले में पुलिस तीन आरोपियों पर एनएसए लगा चुकी है।
सुबह 8 से शाम 5 बजे तक की ढील खरगोन में हालात लगभग सामान्य हो चुके हैं। प्रशासन भी अब सख्ती में ढील बढ़ा रहा है। कलेक्टर के आदेश के मुताबिक शनिवार को खरगोन में सुबह 8 से शाम 5 बजे तक की ढील दी जा रही है। इस दौरान सभी तरह की दुकानें खोली जा सकेंगी।
अपर कलेक्टर ने अधिकारियों के अवकाश किए प्रतिबंधित शहर में निर्मित विषम परिस्थितियों को चलते कोई भी जिलाधिकारी बिना सक्षम अधिकारी की अनुमति के बगैर मुख्यालय छोड़कर अवकाश पर नहीं जा पाएंगे। इस संबंध में अपर कलेक्टर एसएस मुजाल्दा ने आदेश जारी किए हैं।
मध्यप्रदेश में सामुदायिक भागीदारी से वन प्रबंधन, संरक्षण एवं सुधार की दिशा में वन समितियों के माध्यम से शानदार काम किया गया है जो पूरे देश में अनूठा है। इन वन समितियों से जुड़े परिवार आर्थिक रूप से भी सशक्त हुए हैं।
वन समितियों के उल्लेखनीय कामसतना की ग्राम वन समिति गोदीन ने गोंड जनजाति की महिलाओं को सॉफ्ट टॉय बनाने का प्रशिक्षण ग्रीन इंडिया मिशन में दिया है। इसी प्रकार सीधी वन मंडल की ग्राम वन समिति बम्हनमरा ने बिगड़े वन क्षेत्र में काम करना शुरू किया और अवैध कटाई, चराई, अतिक्रमण से जंगलों की सुरक्षा की। समिति को महुआ फूल, गुल्ली, अचार, जलाऊ लकड़ी मिल रही है।बालाघाट की ग्राम समिति अचानकपुर ने बाँस-रोपण क्षेत्र में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की। बाँस के दोहन से समिति को एक लाख रूपये का शुद्ध मुनाफा हुआ। वन मंडल सीधी की ग्राम वन समिति ने वन विहीन पहाड़ी में काम करना शुरू किया और अपने परिश्रम से इसे सघन सागौन वन में बदल दिया। समिति को सागौन की बल्लियों से आर्थिक लाभ भी हुआ। वन मंडल पश्चिम मंडला की ग्राम वन समिति मनेरी ने वन विहीन पहाड़ी को हरा-भरा बना दिया। इसी प्रकार अन्य समितियाँ भी अपने-अपने क्षेत्रों में सरकार के सहयोग से शानदार काम कर रही हैं।
प्रदेश का वनक्षेत्र 94 हजार 689 वर्ग किलोमीटर है जो अन्य राज्यों की तुलना में सर्वाधिक है। यह देश के कुल वन क्षेत्र का 12.3% है। प्रदेश के 79 लाख 70 हजार हेक्टेयर वन क्षेत्र के प्रबंधन में जन-भागीदारी के लिये 15 हजार 608 गाँवों में वन समितियाँ काम कर रही हैं। पिछले एक दशक में 1552 गाँवों में वन समितियों ने 4 लाख 31 हजार हेक्टेयर वन क्षेत्र में सुधार किया है। जब पूरी दुनिया में वनों पर खतरा मंडरा रहा है, ऐसे समय इन समितियों ने वन विभाग के साथ मिलकर शानदार काम किया है।
राज्य लघु वनोपज सहकारी संघ, वनोपज संग्रह करने वाले परिवारों को उचित मूल्य दिलाने के उद्देश्य से काम कर रहा है। संघ के नवाचारी उपायों से तेंदूपत्ता संग्राहकों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आया है। तेंदूपत्ता सीजन में 2021 कोविड-19 के कारण लॉक-डाउन के बाद भी तेंदूपत्ता संग्रहण कराकर दूरदराज के क्षेत्रों में रह रहे जनजातीय परिवारों को 415 करोड़ रूपये का पारिश्रमिक दिलाया गया और 192 करोड़ का लाभांश भी वितरित किया गया।
पुरानी नीति में 70 फीसदी लाभांश संग्राहकों को बोनस के रूप में दिया जाता था। साथ ही 15% राशि संग्राहकों के सामाजिक एवं आर्थिक कल्याण के लिए और 15% राशि वन क्षेत्रों में लघु वन उपज देने वाली प्रजातियों के संरक्षण एवं विकास पर खर्च की जाती थी। अब “पेसा अधिनियम” की भावना के अनुसार तेंदूपत्ता के व्यापार से होने वाले लाभ का 75% संग्राहकों को, 10% राशि संग्राहकों के सामाजिक-आर्थिक कल्याण के लिए और 10% राशि वन क्षेत्रों में लघु वनोपज प्रजातियों के संरक्षण तथा 5 प्रतिशत ग्राम सभाओं को दी जाएगी।
वन विभाग द्वारा नए संकल्प में राष्ट्रीय उद्यानों में पर्यटकों के प्रवेश से मिलने वाली राशि का 33% वन समितियों को देने का प्रावधान किया गया है । समितियों को आवंटित क्षेत्र में ईको पर्यटन का कार्य संचालित करने के लिए सशक्त किया गया है। इससे होने वाली आय वन समिति को मिलेगी। इससे स्थानीय युवाओं को आर्थिक गतिविधियाँ शुरू करने के अवसर मिलेंगे।
वन समितियों का माइक्रो प्लान
प्रदेश के एक तिहाई गाँव वन क्षेत्रों के अंदर या उसके आसपास बसे हैं। वहाँ के निवासियों की आजीविका वनों पर आधारित है।
आत्म-निर्भर मध्यप्रदेश में इस साल के आखिर तक 5 हजार वन समितियों का माइक्रो प्लान तैयार करने का लक्ष्य है। इससे रोजगार के अवसर मिलेंगे। साथ ही ग्राम समुदाय अपनी आवश्यकता की वनोपज का उत्पादन कर अपने पैरों पर खड़े हो सकेंगे।
लाभांश में वृद्धि
वन समितियों को दिए जाने वाले लाभांश में वृद्धि की गई है। पहले जिला स्तर पर शुद्ध लाभ की राशि का 20 फीसदी मिलता था, जिसकी वजह से राशि का वितरण केवल कुछ ही जिलों में हो पाता था। अधिकांश समितियाँ लाभ से वंचित रह जाती थी। नए संकल्प के अनुसार प्रत्येक समिति को उसके क्षेत्र में से किए गए दोहन से प्राप्त राजस्व का 20 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा। पहले काष्ठ एवं बाँस का 50 करोड़ रूपए तक का लाभांश वितरण होता था। अब लगभग 160 करोड़ प्रति वर्ष हो रहा है।
ग्राम सभाओं को सौंपा अधिकार
वन समितियों के गठन एवं पुनर्गठन करने का अधिकार अब ग्राम सभाओं को सौंपा गया है। वन समिति की कार्यकारिणी में महिलाओं एवं कमजोर वर्गों के लोगों को शामिल करने की व्यवस्था भी की गई है। प्रदेश में अनेक प्रकार की वनोपज का उत्पादन होता है। इसमें महुआ, तेंदूपत्ता, हर्रा, बहेड़ा, आंवला और चिरौंजी प्रमुख है। पेसा कानून की भावना के अनुरूप ग्राम सभाओं को लघु वनोपजों का पूरा अधिकार सौंपा गया है।
मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में ऐसे निर्णय लिये गये हैं, जो वन समितियों से जुड़े संग्राहक परिवारों के लिये परिवर्तनकारी साबित हुए हैं। वन समितियों को भरपूर आर्थिक लाभ हुआ है। उदाहरण के लिये 32 वनोपजों का समर्थन मूल्य निर्धारित करने से करीब 17 लाख परिवारों को लाभ हुआ है। तेंदूपत्ता व्यापार के शुद्ध लाभ का 70 प्रतिशत के स्थान पर 75 प्रतिशत देने से 17 लाख परिवारों को लाभ हुआ है।
तेंदूपत्ता संग्रहण दर में वृद्धि
तेंदूपत्ता संग्रहण दर में लगातार वृद्धि की गई है। इसी के अनुपात में पारिश्रमिक और बोनस का भुगतान भी किया गया है। तेंदूपत्ता संग्रहण दर वर्ष 2005 में प्रति मानक बोरा ₹400 थी, जो अब बढ़कर 2500 सौ रूपये प्रति मानक बोरा हो गई है। पारिश्रमिक का भुगतान वर्ष 2005 में ₹67 करोड़ रूपये होता था, जो वर्ष 2021 में बढ़कर 415 करोड़ रूपये हो गया है। संग्राहकों के बच्चों के लिए एकलव्य शिक्षा योजना पिछले ग्यारह साल से चल रही है, जिससे अब तक 1712 बच्चों को शिक्षा के लिये 2 करोड़ एक लाख रूपये की राशि उपलब्ध कराई गई है।
खरगोन में पुलिस अधीक्षक सिद्धार्थ चौधरी जब दंगाईयों को तलवारबाजी से रोक रहे थे तो किसी दंगाई ने उन पर गोली चला दी। ये तो संयोग ही था कि गोली उनके पैर में लगी। चौधरी मध्यप्रदेश पुलिस के एक जांबाज अफसर हैं। सहृदयता और कर्तव्यनिष्ठा उनमें कूट कूटकर भरी है। ऐसे बेशकीमती अफसर के खिलाफ यदि प्रदेश का ही कोई नौजवान नफरत का खेल खेलने लगे तो निश्चित रूप से ये चिंता की बात है। ये न केवल पुलिस बल्कि समूचे प्रशासनिक तंत्र और सरकार के लिए भी खतरे की घंटी है। आप इसे जातीय उन्माद, आतंकवाद, नक्सलवाद या धर्मांधता कहकर खारिज नहीं कर सकते। आप इसे बहके हुए युवाओं की गलती कहकर दबा भी नहीं सकते। यदि इस घटना से प्रदेश ने मुंह चुराने की कोशिश की तो निश्चित तौर पर हम भविष्य में किसी बड़ी घटना को फलित होने का अवसर प्रदान कर रहे हैं।
कश्मीर में आजादी के बाद से नेहरू के वंशजों ने कांग्रेस के बैनर तले जो खून की होली खेली उसने कश्मीर की तरुणाई को बरसों पीछे धकेल दिया था। हजारों युवाओं ने अपनी जान गंवाई और महिलाओं का सुहाग उजड़ गया। अलगाववादियों के हौसले इतने बुलंद हो गए थे कि वे सशस्त्र सेना पर हमला करने से भी नही चूकते थे। सैनिक कैम्पों पर बम फेंकना या सैनिकों को झांपड़ मार देना वहां आम बात थी। सैनिकों की मजबूरी ये थी कि वे बगैर आदेश के गोली नहीं चला सकते थे। सेना के ही कई अफसर ऐसे मामलों में कोर्ट मार्शल को अपनी ही सेना के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल करते थे। वजह साफ थी कि तत्कालीन सत्ताधीशों के चरण चूमकर वे प्रमोशन पाते रहते थे। जब मौजूदा राष्ट्रवादी सरकार ने कश्मीर की समस्या को समाधान के अंजाम तक पहुंचाने का फैसला कर लिया तब जाकर कश्मीर को देश की मुख्यधारा में लाने का ख्वाब साकार हो सका है।
जब सेना का रुतबा धूल धूसरित कर दिया गया था तब असम के एक मेजर ने अलगाववादियों को सबक सिखाने का नायाब तरीका ढूंढ़ निकाला। उपचुनाव के दौरान चार पांच सौ लोगों की भीड़ ने सेना की टुकड़ी को घेर लिया और पथराव करने लगे। इस बीच सेना के कंपनी कमांडर लीतुल गोगोई ने एक उपद्रवी को पकड़ा और सेना की जीप के बोनट पर बांध दिया। उस जीप के पीछे चल रही बख्तरबंद गाड़ी से चेतावनी दी जा रही थी कि उपद्रवियों का यही हाल होगा। उसे नौ गांवों में इसी तरह घुमाया गया। चुनाव कराने गई टीम को सकुशल बाहर निकाल लाने वाले इस उपाय की दुनिया भर में तारीफ की गई। तत्कालीन मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला ने इसे अत्याचार बताकर सैन्य अफसर पर कोर्ट आफ इंक्वायरी कराने का दबाव बनाया। हालांकि जांच में अफसर को बेकसूर करार दिया गया। इस तरह के उपाय समाज में दंगा भड़काने वालों के विरुद्ध किए जाते हैं तो भले ही इनकी निंदा की जाए पर ये अपरिहार्य होते हैं। खरगोन में दंगा भड़काने वालों के बीच से भी अफसर पर गोली चलाने वाले शख्श को खोज निकालना और उसे सरे चौराहे गोली मारकर दंडित करना जरूरी हो गया है। दरअसल कानून को अपने घर की मुर्गी मानने का मुगालता एक दिन में ही नहीं पनपा है। बरसों से सरकारी अफसरों और पुलिस के लोगों ने जिस तरह से शोषकों और अत्याचारियों को पनाह देने का सोच अपना रखा है उसकी सजा सिद्धार्थ चौधरी जैसे युवा अफसरों को भुगतनी पड़ रही है। आज के युवा अफसरों ने भले ही कोई अपराध नहीं किया हो लेकिन बरसों से एसडीएम कार्यालयों, तहसीलियों,पुलिस थानों में चंदा वसूली का खुला खेल चल रहा है उसके कारण प्रशासनिक न्याय तंत्र का खौफ खत्म हो गया है। सरकारी नौकरियों में अफसरों को वेतन और पेंशन मिलने के बावजूद कई अफसर चंदा वसूली को ही अपनी मुख्य ड्यूटी समझते हैं। उनके पास जानकारी तो होती है कि किसी आपराधिक घटना के पीछे मास्टर माइंड कौन है लेकिन वे उनके गिरेबान पर हाथ नहीं डालते। यही वजह है कि जब ये संरक्षित अपराधी पुलिस या कानून पर ही हाथ डालने लगते हैं तो हाहाकार मच जाता है। खरगोन में उपद्रव फैलाने वालों पर अंकुश लगाने के लिए सरकार ने सख्त आपरेशन चलाया है लेकिन उपद्रवियों के घर तोड़ देने और उन्हें जेलों में भर देने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता है. धार्मिक पाखंडों की आड़ में पल रहे इस अपराध बोध को सार्वजनिक मंचों पर दंडित करने की जरूरत है। दमोह के कुंडलपुर में लाखों करोड़ों रुपयों की दानराशि हड़पने का ख्वाब देखने वाले चंद ठगों ने जब पंचकल्याणक महोत्सव के दौरान बखेड़ा खड़ा करने और पदाधिकारियों से मारपीट करने का जो प्रयास किया उसे लेकर पुलिस ने कुछ लोगों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की। चंद लोग तो पुलिस की निगाह में आ गए लेकिन युवाओं को भड़काकर मारपीट के लिए उकसाने वाले कुछ असली अपराधी पुलिस के रिकार्ड में नहीं दर्ज हो पाए। आज वही अपराधी नए नए षड़यंत्र रचने का काम कर रहे हैं। पुलिस का मुखबिर तंत्र इतना ढीला है कि न तो वो उन्हें उजागर कर पा रहा है न ही उन्हें दंडित करके भविष्य के खतरों की सुरक्षा का प्रबंध कर पा रहा है। एक अपराधी ने तो अपने निवास पर बैठक बुलाकर कमेटी के तख्तापलट की साजिश भी रची लेकिन पुलिस इसे महज राजनीतिक दांव पेंच मान रही है। जबकि आरोपियों के विरुद्ध तीर्थ क्षेत्र में ठगी करने का इतिहास पहले से उजागर है। अब यदि ऐसे अपराधियों पर समय रहते कोई अंकुश नहीं लगाया जाएगा तो जाहिर है कि भविष्य में किसी बड़ी घटना की संभावना खारिज नहीं की जा सकती। ऐसा नहीं कि इन असामाजिक तत्वों के विरुद्ध कार्रवाई के लिए पुलिस को किसी अपराध के घटित होने का इंतजार करना पड़े। अपराधियों की खोज और उन्हें निरंतर नसीहत देने का काम पुलिस की जवाबदारी में पहले से ही शामिल है। इसके लिए तीन दशकों पहले पत्रकारों के नेटवर्क को पुलिस के साथ जोड़ा गया था लेकिन चंद आपराधिक तत्वों ने पत्रकारों के इस नेटवर्क में अपराधियों को भर दिया। नतीजतन हालात वही ढाक के तीन पात होकर रह गए।
खरगोन में सिद्धार्थ चौधरी पर हमले ने एक बार फिर पुलिस और प्रशासन को सावधान किया है। कमलनाथ जैसे भौंदू राजनेता ने तो अपनी राजनीति को चमकाने के लिए पत्रकारों को खलनायक बताने का अभियान चला दिया था। मौजूदा शिवराज सिंह चौहान की सरकार समाज के सूचना तंत्र को संवारने के बजाए उसे कचराघर बनाने का काम करती रही है। पिछले विधानसभा चुनावों में शिवराज सरकार की शर्मनाक हार के बावजूद सूचना तंत्र का महत्व भाजपा के कर्णधार नहीं समझ सके । अब जबकि प्रदेश गहरे आर्थिक संकटों से जूझ रहा है। कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है। विकास योजनाओं के लिए पूंजी जुटाना टेढ़ी खीर हो गया है तब जरूरी है कि सामाजिक विद्वेष फैलाने वाले ठगों की पहचान करके उन्हें निर्मूल किया जाए। पूंजी का सफल निर्माण तभी संभव है जब शासन तंत्र के एक हाथ में योजनाओं का खाका हो और दूसरे हाथ में दंड का शमशीर,तभी मध्यप्रदेश को आधुनिक भारत का सफल प्रदेश बनाया जा सकता है।