Month: December 2020

  • घेरकर और घुसकर मारने वाला योद्धा बालाजी बाजीराव पेशवा

    घेरकर और घुसकर मारने वाला योद्धा बालाजी बाजीराव पेशवा

    बाजीराव मस्तानी फिल्म ने भारत के इस वीर योद्धा को एक बार फिर समझने का अवसर दिया है.

    -आलोक सिंघई-

    देश पर आक्रमण करने वाले लुटेरों से संग्राम का शंखनाद और उन पर फतह भारत भूमि के कण कण की विशेष पहचान है। इतिहास गवाह है कि जब जब विदेशी आक्रांताओं ने इसे हथियाने की जुर्रत की है उन्हें अंततः पराजित होकर भागना पड़ा है। अंग्रेजों, फ्रांसीसियों, पुर्तगालियों, मुगलों,अफगानों,यूनानियों के बीच से अनेक आक्रांता तरह तरह के रूप धरकर हिंदुस्तान आते रहे लेकिन हिंदुत्व की सहिष्णु परंपरा के बीच उन्हें या तो लौट जाना पड़ा या फिर यहीं की संस्कृति में ढलकर समाहित हो जाना पड़ा है। जब भारत की तरुणाई किसी शासक की असलियत जान जाती है तो फिर वह उसकी विदाई के लिए अपनी जान भी दांव पर लगा देती है। ऐसे ही एक बहादुर की कहानियां आज भी तरुणाई की रगों में चेतना का संचार कर देती है। वह वीर योद्धा था बालाजी बाजीराव प्रथम। बरसों तक इस वीर योद्धा की चेतना को षड़यंत्र पूर्वक मुगल शासकों की ऐतिहासिक गाथाओं के बीच दबाकर रखा गया। कोशिश की गई कि हिंदुत्व का तेज कहीं मुगल वंशजों को नाराज न कर दे।इसके पीछे वोट की वह राजनीति थी जो सत्ता पाने के लिए अनिवार्य मानी जाती थी। इसके बावजूद सूर्य का प्रताप, बादलों की ओट हमेशा के लिए तो नहीं ढांप सकती। अंततः इस वीर योद्धा की यशोगाथा एक बार फिर देश की चेतना को एकसूत्र में बांधने की सुरलहरियां लेकर सामने आ गई है।

    बालाजी बाजीराव पेशवा प्रथम को भले ही उनके ही परिजनों के आपसी द्वेष से जूझना पड़ा हो पर केवल बहादुरी और इंसानियत को अपना धर्म मानने वाले इस रणबांकुरे की सच्चाई अंततः सामने आ ही गई। उनकी बहादुर जीवन संगिनी यवन सुंदरी मस्तानी की प्रेमकथाओं ने आज की नई पीढ़ी को बेचैन कर दिया है। युवा मन ये सोचने को मजबूर है कि आखिर क्यों इस अविजित योद्धा को अपनी पारिवारिक कलह का दंश झेलना पडा।देश के वे क्या हालात थे जब इस तूफानी योद्धा की विजय यात्रा पर लू जैसे सामान्य रोग ने असमय ही विराम लगा दिया।

    हिंदुत्व की आधारशिला कहे जाने वाले ज्योतिष शास्त्र में ऐसे नक्षत्रों की जीवनयात्रा समझने के लिए भरपूर प्रकाश डाला गया है। इस पैमाने पर सहज ही समझा जा सकता है कि बालाजी बाजीराव पेशवा जैसे योद्धा को यदि अपने ही राजघराने या अपने ही देशज शासकों का सहयोग मिला होता तो भारत का इतिहास चीनी राजवंशों से कहीं बेहतर मुकाम छू चुका होता। अंग्रेजों ने भारत की चेतना को कुंठित करने का जो षड़यंत्र रचा आजादी के बाद के शासकों ने उसे जारी रखकर अंग्रेजों के नमक का कर्ज भरपूर चुकाया। अंग्रेजों की इसी रणनीति की वजह से पौंड की यात्रा तो बदस्तूर जारी रही लेकिन भारतीय रुपए की दुर्गति निरंतर जारी रही। आज जब नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा भारतीय मुद्रा के खिलाफ रचे गए जिन षड़यंत्रों को पलटने का प्रयास कर रही है तब बाजीराव बल्लाल जैसे योद्धा के संदेश को नए संदर्भों में तरोताजा करना जरूरी हो गया है।

    तेज दिमाग और कठोर कर्म की प्रतिमूर्ति बालाजी बाजीराव पेशवा दरअसल भारतीय प्रज्ञा की विशिष्ट पहचान रहे। जब दिसंबर 1737 में सिरोंज होते हुए भोपाल पहुंचे बाजीराव ने निजाम की मुगल सेना को चारों ओर से घेर लिया,उसकी रसद काट दी लगातार युद्धों से विशाल मुगल सेना को लाचार कर दिया तब 6 जनवरी 1738 को सीहोर के दोराहा में निजाम ने शाही मुहर लगाकर बाजीराव को मालवा,नर्मदा और चंबल तक का इलाका सौंपा और पचास लाख रुपए भेंट किए। इस युद्ध के बाद बाजीराव पेशवा का नाम पूरे हिंदुस्तान में स्थापित हो गया।समाजसेवी रवि चतुर्वेदी बताते हैं कई देशी विदेशी इतिहासकारों ने तब उन्हें लायन ऑफ इंडिया की उपाधि से विभूषित किया था। बाजीराव ने बीस वर्ष की उम्र में ये तय किया था कि जो विदेशी आक्रांता जहां से आए हैं उन्हें वापस वहीं तक खदेड़ना है। इस लक्ष्य को पाने में वे बड़ी हद तक सफल भी हुए। इसके बाद उन्होंने भारतीय संस्कृति के अनुरूप हिंदुस्तान गढ़ने का अभियान चलाया जो समय समय पर आज भी प्रकट होता रहता है।

    भारतीय स्वाधीनता संग्राम की कहानियों को ही भारतीय इतिहास साबित करने वाले षड़यंत्रकारियों ने 1720 से 1740 तक देश की अस्मिता स्थापित करने वाले पेशवा सरदार बाजीराव प्रथम के तेज को भुला देने की कोशिशें कीं। वामपंथी राजनेता जानते थे कि यदि हिंदुस्तान बाजीराव पेशवा की राह पर चल पड़ा तो विदेशी आक्रांताओं के उन वंशजों को हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ेगी जिन्हें लूटे हुए धन पर गुरछर्रे उड़ाने की लत लग चुकी है। यही वजह थी कि उन्होंने श्रीमती इंदिरा गांधी की मदद से धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्द को संविधान में डलवा दिया। उनका प्रयास था कि सर्वधर्म समभाव जैसे संभ्रांत शब्द के सहारे वे अन्याय के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को कुचलने में सफल हो सकते हैं। विशाल भारत की जनता अपने हक की आवाज बुलंद न कर सके इसके लिए उन्होंने गरीब नवाज की विचारधारा को कौमी सद्भाव की चाशनी में लपेटकर परोसा। वास्तव में ये गरीबी को संरक्षित करने का ऐसा षड़यंत्र था जिसने भारत को कर्ज आधारित इकानामी बना दिया। वो तो भला हो विश्व बैंक और एशियन डेवलपमेंट बैंक जैसी सूदखोर संस्थाओं का जिन्हें अपनी मूल राशि डूबती नजर आई और उसने आर्थिक सुधारों के नाम पर अपने प्रशिक्षित शासकों को सत्तासीन कराया। दस सालों तक डॉ.मनमोहन सिंह के रूप में देश को ऐसा शासक मिला जिसने कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को जमीनी दिशा दिखाई। इसके बावजूद खैराती लोकतंत्र को आत्मनिर्भर देश में बदलना उनके बस में नहीं था। कांग्रेसी तो आज तक इन आर्थिक सुधारों के खिलाफ जूते खोलकर पीछे पड़े हैं।

    नरेन्द्र मोदी के रूप में जब देश को ऐसा बेखौफ शासक मिला है जो विकास के नाम पर लूट के भौंडे षड़यंत्रों को बेनकाब करने में जुटा है तब बालाजी बाजीराव की चेतना एक नए रूप में उभरकर सामने आई है। मध्यभारत में बालाजी बाजीराव ने जिस सिंधिया परिवार को देश की पहचान स्थापित करने की जवाबदारी सौंपी थी उस परिवार के कुलदीपक ज्योतिरादित्य सिंधिया ने एक बार फिर देशविरोधी षड़यंत्रों के खिलाफ संघर्ष का शंखनाद किया है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए लूट की इबारत लिखने वाले कमलनाथ जैसे षड़यंत्रकारी को सत्ताच्युत करवाकर सिंधिया ने हिंदुत्व आधारित सशक्त भारत को बुलंद करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। कृषि में आर्थिक सुधारों के माध्यम से नरेन्द्र मोदी यदि भारत को आत्मनिर्भर बनाने का अभियान चलाए हुए हैं तो मध्यप्रदेश एक बार फिर बालाजी बाजीराव बल्लाल की पेशवाई का अधूरा स्वप्न साकार कर रहा है। इस अधूरे स्वप्न को साकार करके ही मजबूत भारत और सुखी भारत की स्थापना की जा सकेगी।

  • किसान को मुनाफा खोरों से आजाद करने की पहल

    किसान को मुनाफा खोरों से आजाद करने की पहल


    संकलन और संशोधन – गिरधारी भार्गव

    कभी सोचा है-??- किसानों का “धन्धा” क्यों बांधा गया था…
    सही क्या और गलत क्या -??-
    क्या किसानों का “तीन अध्यादेश” के विरुद्ध आंदोलन उचित – है भी या नहीं ?
    सन् 1960-70 के आसपास देश में कांग्रेसी सरकार ने एक कानून पास किया जिसका नाम था – “Apmc act” …
    इस एक्ट में यह प्रावधान किया गया कि किसान अपनी उपज केवल सरकार द्वारा तय स्थान अर्थात सरकारी मंडी में ही बेच सकता है।
    इस मंडी के बाहर किसान अपनी उपज नहीं बेच सकता। और इस मंडी में कृषि उपज की खरीद भी वो ही व्यक्ति कर सकता था जो Apmc act में registered हो, दूसरा नहीं।
    इन registered person को देशी भाषा में कहते हैं – “आढ़तिया” यानि “commission agent”…
    इस सारी व्यवस्था के पीछे कुतर्क यह दिया गया कि व्यापारी किसानों को लूटता है इस लिये सारी कृषि उपज की खरीद बिक्री -“सरकारी ईमानदार अफसरों” के सामने हो।
    जिससे “सरकारी ईमानदार अफसरों” को भी कुछ “हिस्सा पानी” मिलें।


    इस एक्ट आने के बाद किसानों का शोषण कई गुना बढ़ गया। इस एक्ट के कारण हुआ क्या कृषि उपज की खरीदारी करनें वालों की गिनती बहुत सीमित हो गई।
    किसान की उपज के मात्र 10 – 20 या 50 लोग ही ग्राहक होते है। ये ही चन्द लोग मिल कर किसान की उपज के भाव तय करते हैं।
    मजे कि बात ये है कि :— फिर रोते भी किसान ही है कि :—
    इस महगाई के दौर में – किसान को अपनी उपज की सही कीमत नही मिल है।
    जब खरीददार ही – “संगठित और सीमित संख्या में” – होंगे तो – सही कीमत कैसे मिलेगी – ??-
    यह मार्केट का नियम है कि अगर अपने producer का शोषण रोकना है तो आपको ऐसी व्यवस्था करनी पड़ेगी जिसमें – “खरीददार” buyer की गिनती unlimited हो।
    जब खरीददार ज्यादा होंगे तभी तो – किसी भी माल की कीमत बढ़ेगी।
    लेकिन वर्तमान में चल रही मण्डी व्यवस्था में तो – किसान की उपज के मात्र 10-20 या 50 लोग ही ग्राहक होते हैं।
    Apmc act से हुआ क्या कि अगर किसी retailer ने, किसी उपभोक्ता ने,
    किसी छोटे या बड़े manufacturer ने, या किसी बाहर के trader ने किसी मंडी से सामान खरीदना होता है तो वह किसान से सीधा नहीं खरीद सकता उसे आढ़तियों से ही समान खरीदना पड़ता है।
    इसमें आढ़तियों की होगी चाँदी ही चाँदी और किसान और उपभोक्ता दोनों रगड़ा गया।
    जब मंडी में किसान अपनी वर्ष भर की मेहनत को मंडी में लाता है तो buyer यानि आढ़तिये आपस में मिल जाते हैं और बहुत ही कम कीमत पर किसान की फसल खरीद लेते हैं।
    याद रहे :- बाद में यही फसल ऊँचे दाम पर उपभोक्ता को उपलब्ध होती थी।
    यह सारा गोरख धंधा ईमानदार अफसरों की नाक के नीचे होता है।
    एक टुकड़ा मंडी बोर्ड के अफसरों को डाल दिया जाता है।
    मंडी बोर्ड का “चेयरमैन” को लोकल MLA मोटी रिश्वत देकर नियुक्ति होता है। एक हड्डी राजनेताओं के हिस्से भी आती है। यह सारी लूट खसोट Apmc act की आड़ में हो रही है।
    दूसरा सरकार ने Apmc act की आड़ में कई तरह के टैक्स और commission किसान पर थोप दिए।
    जैसे कि :- किसान को भी अपनी फसल “कृषि उपज मंडी” में बेचने पर 3%, मार्किट फीस ,
    3% rural development fund और 2.5 commission ठोंक दिया गया।
    मजदूरी आदि मिलाकर यह फालतू खर्च 10% के आसपास हो जाता है। कई राज्यों में यह खर्च 20% तक पहुंच जाता है। यह सारा खर्च किसान पर पड़ता है।
    बाकी मंडी में फसल का transportation, रखरखाव का खर्च अलग पड़ता है।


    मंडियों में फसल की चोरी, कम तौलना, आम बात है। कई बार फसल कई दिनों तक नहीं बिकती किसान को खुद फसल की निगरानी करनी पड़ती है। एक बार फसल मंडी में आ गई तो किसान को वह “बिचोलियों” द्वारा तय की गयी कीमत पर,
    यानि – औने पौने दाम पर बेचनी ही पड़ती है।
    क्योंकि कई राज्यों में किसान अपने राज्य की दूसरी मंडी में अपनी फसल नहीं लेकर जा सकता । दूसरे राज्य की मंडी में फसल बेचना Apmc act के तहत गैर कानूनी है।
    Apmc act सारी कृषि उपज पर लागू होता है चाहे वह सब्ज़ी हो ,फल हो या अनाज हो। तभी हिमाचल में 10 रुपये किलो बिकने वाला सेब उपभोक्ता तक पहुँचते पहुँचते 100 रुपए किलो हो जाता है।


    आढ़तियों का आपस में मिलकर किसानो को लूटने का दृश्य बड़ा आम है। जो आढ़तिए किसानों को उचित दाम दिलाने का प्रयास करते हैं वे भी घाटे में नहीं रहते।इसके बावजूद किसानों की लूट होती रहती है। जिस फसल का retail में दाम 500 रुपये क्विंटल होता है, सारे आढ़तिये मिलकर उसका दाम 200 से बढ़ने नहीं देते।


    मोदी सरकार द्वारा किसानों की हालत सुधारने के लिये तीन अध्यादेश लाए गये हैं।
    जिसमें निम्नलिखित सुधार किए गए हैं :-
    1. अब किसान मंडी के बाहर भी अपनी फसल बेच सकता है और मंडी के अंदर भी ।
    2. किसान का सामान कोई भी व्यक्ति संस्था खरीद सकती है जिसके पास पैन कार्ड हो।
    3. अगर फसल मंडी के बाहर बिकती है तो राज्य सरकार किसान से कोई भी टैक्स वसूल नहीं सकती।
    4. किसान अपनी फसल किसी राज्य में किसी भी व्यक्ति को बेच सकता है।
    5. किसान contract farming करने के लिये अब स्वतंत्र है।
    कई लोग इन कानूनों के विरुद्ध दुष्प्रचार कर रहें है।
    जो कि निम्नलिखित हैं :-
    1. आरोप :- सरकार ने मंडीकरण खत्म कर दिया है ?
    उत्तर :- सरकार ने मंडीकरण खत्म नहीं किया। मण्डियां भी रहेंगी। लेकिन किसान को एक विकल्प दे दिया कि अगर उसको सही दाम मिलता है तो वह कहीं भी अपनी फसल बेच सकता है। मंडी में भी और मंडी के बाहर भी।
    2. आरोप :- सरकार MSP समाप्त कर रही है ?
    उत्तर :- मंडीकरण अलग चीज़ है, MSP न्यूनतम समर्थन मूल्य अलग चीज़ है। सारी फसलें सब्ज़ी, फल मंडीकरण में आते हैं, MSP सब फसलों की नहीं है।
    3. आरोप :- सारी फसल अम्बानी व अड़ानी खरीद लेगा?
    उत्तर :— वह तो तब भी खरीद सकते हैं – आढ़तियों को बीच में डालकर।


    यह तीन कानून किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मुक्ति के कानून हैं।
    आज इस सरकार ने किसानों पर – कांग्रेस द्वारा लगाई हुई – “बन्दिश” को हटा कर,
    “हर किसी को” अपनी उपज बेचने के लिये आज़ाद कर के,
    “पूरे देश का बाज़ार” किसानों के लिये खोल दिया है।”
    किसानों को कोई भी टैक्स भी नहीं देना होगा।
    जो भी लोग विरोध कर रहे हैं वो उनकी अपनी समझ है।
    भारत के किसानों को असली आजादी की दहलीज तक लाने वाली ऐसी किसान हितैषी सरकार इससे पहले कभी नहीं बनी थी।
    क्योकि ये मोदी जी – बहुत अच्छे से जानते हैं कि – “किसान और जवान” – ही देश का आधार हैं।