Month: April 2020

  • सेक्युलर रहबर की याद में

    सेक्युलर रहबर की याद में


    के. विक्रम राव -देशहित के मायने

    सत्रह साल हो गये| ठीक आज ही (9 अप्रैल), भारतमित्र, इस्लामी राष्ट्रनायकों में एक अकेले सेक्युलर व्यक्ति सद्दाम हुसैन अल टिकरीती को अमरीकी सेना ने फाँसी की सज़ा सुनाई गई थी। बगदाद में न्यायिक प्रक्रिया का ढकोसला दिखा था। उसकी बाबत उल्लेख हो जिसमें सद्दाम को मुत्युदण्ड मिला था। कल्पना कीजिए यदि कहीं जार्ज बुश पर ईरान में नरसंहार का मुकदमा चलता। प्रधान न्यायाधीश होता ओसामा बिन लादेन, अभियोजन पक्ष के प्रमुख होते उत्तरी कोरिया के किम जोंग इल और अदालत का स्थान होता क्यूबा ? सद्दाम हुसैन के साथ ठीक ऐसा ही हुआ। प्रधान न्यायाधीश रउफ अब्दुल रशीद थे जो अल्पसंख्यक जनजाति कुर्द के थे। प्रधानमंत्री थे नूरी अल मलिकी जिनकी शिया पार्टी अल दावा ने 1982 में दुजैल में सद्दाम पर जानलेवा हमला किया था। मुकदमें की सुनवाई के दौरान सद्दाम के तीन वकीलों की हत्या कर दी गई थी। एक प्रधान जज रिज़गार मोहम्मद अमीन को त्यागपत्र देने पर विवश कर दिया गया क्योंकि वे निष्पक्ष थे। दूसरे जज का रहस्यमय निधन हो गया था। सद्दाम के वकील, अमरीका के पूर्व महाधिवक्ता तथा मानवाधिकार कार्यकर्ता रेम्ज़े क्लार्क को ईराकी सरकार ने बगदाद से निकाल दिया था। अर्थात् विजेता ने तय किया कि पराजित को कैसा न्याय दिया जाय। अमरीका की न्यायप्रियता महज़ आडम्बर सिद्ध हुई। केवल चरमपन्थी लोग ही इस पीड़ा से अछूते रहेंगे। कारण? दर्द की अनुभूति के लिए मर्म होना चाहिए!

    अतः चर्चा का मुद्दा है कि आखिर अपदस्थ राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन का अंजाम ऐसा क्यों हुआ? मजहब के नाम पर बादशाहत और सियासत करने वालों को सद्दाम कभी पसन्द नहीं आए। उनकी बाथ सोशलिस्ट पार्टी ने रूढ़िग्रस्त ईराकी समाज को समता-मूलक आधार पर पुनर्गठित किया था। रोटी, दवाई, शिक्षा, आवास आदि बुनियादी आवश्यकताओं को मूलाधिकार बनाया था। पड़ोसी अरब देशों में मध्यकालीन बर्बरता ही राजकीय प्रशासन की नीति है, मगर बगदाद में कानूनी ढांचा पश्चिमी न्याय सिद्धान्त पर आधारित था। ईराक में चोरी का दण्ड हाथ काटना नहीं था, वरन् जेल की सज़ा होती थी। इसीलिए अमरीकी पूंजीवादी दबाव में शाही सऊदी अरब ने सद्दाम हुसैन के सोशिलिस्ट ईराक को नेस्तनाबूद करने में कसर नहीं छोड़ी। सऊदी अरब के बादशाह ने पैगम्बरे इस्लाम की जन्मस्थली के निकट अमरीकी बमवर्षक जहाजी बेड़े को जगह दी। नाना की मसनद (जन्म स्थली) के ऊपर से उड़कर अमरीकी आततायियों ने नवासे की मजारों पर कर्बला में बम बरसाए थे। अपनी पत्रकारी यात्रा के दौरान इस तीर्थस्थली की मीनारों को क्षतिग्रस्त देखकर मुझ जैसे गैर-इस्लामी व्यक्ति का दिल भर आया था कि सऊदी अरब के इस्लामी शासकों को ऐसा नापाक काम करते अल्लाह का भी खौफ नही हुआ? शकूर खोसाई के राष्ट्रीय पुस्तकालय में अमरीकी बमों द्वारा जले ग्रन्थों को देखकर मेरे गाइड ने मुझे उस दौर की याद बरबस दिलाई जब चंगेज खाँ ने (1258) मुसतन्सरिया विश्वविद्यालय की दुर्लभ किताबों का गारा बना कर युफ्रेट्स नदी पर पुल बनवाया था।

    ईराकी समाजवादी गणराज्य के अपदस्थ राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन पर चले अभियोग और फिर सुनाए गये फैसले की मीनमेख निकालने के पूर्व खुदा के इस बन्दे की सुकृतियों से अवगत हो लें। भारत के हिन्दू राष्ट्रवादियों को याद दिलाना होगा कि सद्दाम हुसैन अकेले मुस्लिम राष्ट्राध्यक्ष थे जिन्होंने कश्मीर को भारत का अविभाज्य अंग कहा था। उनके राज में सरकारी कार्यालयों में नमाज़ अदायगी हेतु अवकाश नहीं मिलता था। कारण यही कि वे मज़हब को निजी आस्था की बात मानते थे। अयोध्या काण्ड पर जब इस्लामी दुनिया में बवण्डर उठा था, तो बगदाद शान्त था। सद्दाम ने कहा था कि एक पुरानी इमारत गिरी है, यह भारत का अपना मामला है। उन्हीं दिनों ढाका में प्राचीन ढाकेश्वरी मन्दिर ढाया गया था। तस्लीमा तसरीन ने अपनी कृति (लज्जा) में बांग्लादेश में हिन्दू तरूणियों पर हुए वीभत्स जुल्मों का वर्णन किया है। इसी पूर्वी पाकिस्तान को भारतीय सेना द्वारा मुक्त कराने पर शेख मुजीब के बांग्लादेश को मान्यता देने में सद्दाम सर्वप्रथम थे। इन्दिरा गांधी की (1975) ईराक यात्रा पर मेज़बान सद्दाम ने उनका सूटकेस उठाया था। जब रायबरेली से लोकसभा चुनाव (1977) में वे हार गईं थीं तो इन्दिरा गांधी को बगदाद में स्थायी आवास की पेशकश सद्दाम ने की थी। पोखरण द्वितीय (मई, 1998) पर भाजपावाली राजग सरकार को सद्दाम ने बधाई दी थी, जबकि कई परमाणु शक्ति वाले राष्ट्रों ने आर्थिक प्रतिबन्ध लादे थे। सद्दाम के नेतृत्व वाली बाथ सोशलिस्ट पार्टी के प्रतिनिधि भारतीय राजनैतिक पार्टियों के अधिवेशनों में शिरकत करते रहे। भारतीय राजनेताओं को स्मरण होगा कि भारतीय रेल के असंख्य कर्मियों को आकर्षक रोजगार सद्दाम ने वर्षों तक ईराक में उपलब्ध कराए। उत्तर प्रदेश सेतु निर्माण निगम ने तो ईराक से मिले ठेकों द्वारा बहुत लाभ कमाया। पैंतीस लाख अप्रवासी भारतीय श्रमजीवी सालाना एक खरब रुपये भारत भेजते थे। भारत को ईराकी तेल सस्ते दामों पर मुहय्या होता रहा। इस सुविधा का दुरूपयोग करने में कांग्रेसी विदेश मंत्री नटवर सिंह जैसे लोग तक नहीं चूके थे। आक्रान्त ईराक के तेल पर कई भारतीयों ने बेशर्मी से चाँदी काटी।

    सद्दाम को जार्ज बुश ने सेटन (शैतान) कहा था। टिकरीती गाँव का एक यतीम तरूण सद्दाम हुसैन अपने चाचाओं की कृपा पर पला। पैगम्बरे इस्लाम की पुत्री फातिमा का यह वंशज जब मात्र उन्नीस वर्ष का था तो बाथ सोशलिस्ट पार्टी में भर्ती हुआ। श्रम को उचित महत्व देना उसका दर्शन था। अमरीकी फौजों ने इस अपदस्थ राष्ट्रपति की जो मूर्तियां ढहा दी है, उनमें सद्दाम हुसैन हंसिया से बालियाँ काटते और हथौड़ा चलाते दिखते थे। अक्सर प्रश्न उठा कि सद्दाम हुसैन ईराक में ही क्यों छिपे रहे ? क्योंकि उन्होंने हार मानी नहीं, रार ही ठानी थी। अमूमन अपदस्थ राष्ट्रनेतागण स्विस बैंक में जमा दौलत से विदेश में जीवन बसर करते हैं। बगदाद से पलायन कर सद्दाम भी कास्त्रों के क्यूबा, किम जोंग इल के उत्तरी कोरिया अथवा चेवेज़ के वेनेजुएला में पनाह पा सकते थे। ये तीनों अमरीका के कट्टर शत्रु रहे । जब अमरीकी सैनिकों ने भूमिगत पुरोधा को पकड़ा था, पूछा कि आप कौन हैं? तो इसी दृढ़ता से सद्दाम का सधा जवाब था, ‘‘ईराक का राष्ट्रपति हूँ।’’

    भारत के सेक्युलर मुसलमानों को फख्र होगा याद करके कि ईराक में बुर्का लगभग लुप्त हो गया था। नरनारी की गैरबराबरी का प्रतीक यह काली पोशाक सद्दाम के ईराक में नागवार हो गई थी। कर्बला, मौसूल, टिकरीती आदि सुदूर इलाकों में मुझे बुर्का दिखा ही नहीं। स्कर्ट और ब्लाउज़ राजधानी बगदाद में आम लिबास था। माथे पर वे बिन्दिया लगाती थीं और उसे हिन्दिया कहती थीं। आधुनिक स्कूलों में पढ़ती छात्राओं, मेडिकल कालेजों में महिला चिकित्सकों और खाकी वर्दी में महिला पुलिस और सैनिकों को देखकर आशंका होती थी कि कहीं सेक्युलर भारत से आगे यह इस्लामी देश न बढ़ जाए।

    आज अमरीका द्वारा थोपे गये ‘‘लोकतांत्रिक’’ संविधान के तहत सेक्युलर निज़ाम का स्थान कठमुल्लों ने कब्जाया है। नरनारी की गैरबराबरी फिर मान्य हो गई है। दाढ़ी और बुर्का भी प्रगट हो गये हैं। ईराकी युवतियों के ऊँचे ललाट, घनी लटें, गहरी आंखें, नुकीली नाक, शोणित कपोल, उभरे वक्ष अब छिप गये। यदि आज बगदाद में कालिदास रहते तो वे यक्ष के दूत मेघ के वर्ण की उपमा एक सियाह बुर्के से करते। ईराक में ठीक वैसा ही हुआ जो सम्राट रजा शाह पहलवी के अपदस्थ होने पर खुमैनी राज में ईरान में हुआ, जहां चांद को लजा देने वाली पर्शियन रमणियां काले कैद में ढकेल दी गईं। इराक के नये संविधान में बहुपत्नी प्रथा, जुबानी तलाक का नियम और जारकर्म पर केवल स्त्री को पत्थर से मार डालना फिर से कानूनी बन गया हैं। लेकिन भाजपाई नेता जो मोहम्मद अली जिन्ना को सेक्युलर के खिताब से नवाज चुके हैं, सद्दाम हुसैन को सेक्युलर नहीं मानेंगे। उसके कारण भी हैं। सद्दाम हुसैन सोशलिस्ट थे| नित्य नमाज अता करते थे। कुरान की प्रति अपने साथ रखते थे। पैगम्बर के साथ ईसा मसीह का नाम लेते थे। मगर यहूदियों को शत्रु मानते थे।

    अब पुरोगामी मुस्लिम राष्ट्रों ने अमरीकी साम्राज्यवादी के साथ साजिश कर ईराक को फिर से मध्ययुग में ढकेल दिया।

    प्रत्येक नेक मुसलमान को और दुनिया के प्रगतिशीलों को सद्दाम बहुत याद आते रहेंगे|

    K Vikram Rao
    Mobile -9415000909
    E-mail –k.vikramrao@gmail.com

  • आयुर्वेद में पहले से उपलब्ध है वायरस मुक्ति का उपायःआचार्य हुकुमचंद शनकुशल

    आयुर्वेद में पहले से उपलब्ध है वायरस मुक्ति का उपायःआचार्य हुकुमचंद शनकुशल

    भोपाल,8 अप्रैल(प्रेस इन्फार्मेशन सेंटर)। आयुर्वेद की शास्त्रोक्त पद्धति से बनाई गईं औषधियां कोरोना को परास्त करने में पूरी तरह सक्षम हैं।इसके पहले भी वायरसों के हमलों से आयुर्वेद रक्षा करता रहा है। आधुनिक चिकित्सा के वैज्ञानिक अनुसंधानों के बीच आयुर्वेद की जो परंपरा भुला दी गई है उस पर अमल करके भारत को दुनिया का मार्गदर्शन करना चाहिए। राजधानी में भारतीय योग अनुसंधान केन्द्र आनंदनगर के संस्थापक आचार्य हुकुमचंद शनकुशल ने कोरोना के उपचार की जो दवाएं विकसित की हैं वे उनके माध्यम से लोगों को मुफ्त उपचार सेवाएं भी दे रहे हैं।

    श्री शनकुशल ने बताया कि उन्होंने आयनिक पानी और अग्नि तत्व के माध्यम से कोरोना के उपचार की पूरी विधि विकसित की है। इस उपचार विधि में स्वर्णिम जल, विष्णुजल,नस्य, और धूनी मसाला व शर्बत बनाया है जो कोरोना संक्रमण को रोकने में कारगर है। उन्होंने अपने दावे की प्रमाणिकता को साबित करने के लिए आयुर्वेद में दिए गए उपायों का भी विवरण प्रस्तुत किया है। आयनिक जल का प्रयोगशाला में भी परीक्षण कराया गया है जिससे इसके सुरक्षित होने का विश्वास बढ़ेगा। इन दवाओं से उन्होंने आम मरीजों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सफलता भी पाई है।

    योग और आयुर्वेद को पिछले पचास सालों से भी अधिक समय से वैज्ञानिक आधार पर परिभाषित करते रहे आचार्य हुकुमचंद शनकुशल ने बताया कि ये जग जाहिर तथ्य है कि पीने का पानी यदि शुद्ध हो तो कई बीमारियों से बचा जा सकता है। पानी हमारी कोशिकाओं का प्रमुख तत्व भी होता है। हमारा शरीर कई किस्म के न्यूरोन्स की गतिविधियों से ही सक्रिय रहता है। यही वजह है कि स्वर्णिम जल शरीर पर तुरंत असर करता है। इसे बनाने के लिए ज्वालामुखी के चार सौ फीट की गहराई से निकाले गए पानी का शोधन किया जाता है।इस पानी में सोना, मैग्नीशियम और एल्यूमीनियम जैसे तत्वों के लवण मौजूद हैं। गहन चुंबकीय क्षेत्र से गुजारे गए इस पानी को सोने और तांबे के बीच से गुजारा जाता है। यही वजह है कि ये आयनिक पानी हमारे शरीर पर तेज असर डालता है। सरकार यदि पहल करे तो आम जनता को ये जल बहुत सस्ती कीमत पर उपलब्ध कराया जा सकता है।

    आचार्य हुकुमचंद शनकुशलः विश्व को स्वस्थ और सफल बनाने का सतत अनुष्ठान

    गौमूत्र से निर्मित विष्णुजल कोरोना जैसे वायरसों को निष्क्रिय करने में प्रभावी भूमिका निभाता है। शास्त्रोक्त विधि से इसे बनाने का विवरण कई ग्रंथों में पहले से मौजूद है। इसे बनाने के लिए आठ लीटर बछिया के मूत्र में आधा किलो सौंफ, आधा किलो धनिया मिलाकर 24 घंटे के लिए रख दिया जाता है। इसके बाद इसा अर्क उतार लिया जाता है। पांच लीटर इस अर्क में 250 ग्राम गंधक शोधित आंवला सार, 250 ग्राम चूना, 5 ग्राम लौंग, 5 ग्राम इलायची मिलाई जाती है। इसे नारंगी होने तक उबाला जाता है और फिर 24 घंटे बाद निथारकर छानकर रख लिया जाता है। इससे त्वचा को शुद्ध किया जाता है और शरीर पर भी छिड़ककर वायरस को निष्क्रिय कर दिया जाता है।

    कोरोना जिस तरह से मस्तिष्क की चेतना प्रभावित करता है और फेंफड़ों में रुकावट लाता है उसे बेअसर करने के लिए वैदिक नस्य बनाई जाती है। इसमें अपामार्ग, अरीठा, आक(मदार), गोलोचन, और केसर डालकर पीसा जाता है। इसे बनाने के लिए 25ग्राम चावल का आटा, 2 ग्राम शुद्ध केसर, 10 ग्राम अपामार्ग का आटा, 70 मिलीग्राम सफेद अर्क का दूध मिलाकर 24 घंटे बाद घोंटा जाता है। 5 ग्राम अरीठे का झाग 2 मिलीलीटर मिलाकर तब तक घोंटा जाता है जब तक कि ये सूख न जाए। इसमें 1 ग्राम शुद्ध गोलोचन मिलाकर घोंट दिया जाता है। इस नस्य को दिन में 11 बजे से 4 बजे के बीच सूंघा जाता है। अंगूठा और उसके पास वाली उंगली से चुटकी भर नस्य लेकर जोर से सूंघा जाता है। सूर्य की ओर नासा छिद्र करके सांस ली जाती है तो छींकें आने लगती हैं। कफ निकलने के बाद छींकें बंद हो जाती है। इसके बाद उंगली में थोड़ा गाय का घी मिलाकर नाक का सूखापन दूर कर दिया जाता है। इसके उपयोग से नाक से पानी बहना, सर्दी जुकाम और बुखार से रक्षा होती है और मस्तिष्कीय चेतना बढ़ती है।

    कोरोना में फेंफड़ों में फाईब्राईड विकसित हो जाते हैं और उनका स्पंज समाप्त होने लगता है।इससे फेंफड़ों में सांस रोक सकने की क्षमता समाप्त हो जाती है। इसका इलाज हवन प्रक्रिया से किया जाता है। हवन की जो समिधा बनाई जाती है उसमें अर्क(मदार) की लकड़़ी का उपयोग होता है। धूम लेने के लिए काले धतूरे के पत्ते, सत्यानाशी के बीज, बिल्ली की विष्टा, मोर पंख, गाय का सींग, सांप की केंचुली, नीम के पत्ते, वासा की छाल, अर्क के फूल, तुलसी पत्र, बहेड़ा पाऊडर, घी, शहद और गुग्गल मिलाकर धूनी दी जाती है। इससे फेंफड़े खराब नहीं हो पाते। अथर्व वेद की भूत विद्या में इस फार्मूले का विवरण दिया गया है। सन्निपात, भूत बाधा और नाड़ी चिकित्सा में ये विधि बहुत सफल साबित होती रही है। कोरोना वायरस को बेअसर करने में भी यही विधि रामबाण साबित होगी।

    गले की नली में खराश करने वाला कोरोना वायरस लिवर और किडनी को भी क्षतिग्रस्त करता है। इसके निदान के लिए आंवला, बहेड़ा, पारिजात और गुड़हल के फूल का शरबत रोगी को पिलाया जाता है। इससे वायरस का असर भी समाप्त होता है और पीड़ित की चेतना भी लौटने लगती है।

    श्री शनकुशल ने बताया कि पूरी चिकित्सा विधि अग्नि और आयनिक जल के प्रयोग पर केन्द्रित है। इसका असर अब तक वायरसों के आक्रमण से रक्षा के लिए होता रहा है। यजुर्वेद में भी इन विधियों का उल्लेख है। बड़े पैमाने पर ये कार्य सरकारी संरक्षण के बगैर संभव नहीं है। यदि कोरोना संक्रमितों को इस विधि से उपचार दिया जाए तो न केवल मरीजों को ठीक किया जा सकता है बल्कि देश के संसाधनों की बड़ी क्षति भी बचाई जा सकती है।

  • अफसरशाही की काली भेड़ें

    अफसरशाही की काली भेड़ें


    पी.नरहरि,सचिव जनसंपर्कः अफसरशाही को लांछन से बचाने का प्रयास

    कोरोना वायरस के हमले ने पूरी दुनिया को भयाक्रांत कर दिया है।एक अदृश्य शत्रु के हमले से चीन से लेकर अमेरिका, इटली, फ्रांस, ब्रिटेन,स्पेन जैसे मुल्क तबाही के दौर में पहुंच गए हैं। कोरोना ने भारत में भी अपने पैर पसार लिए हैं। संकट के इस दौर में कई समाजों,वर्गों और विचारों के लोगों का चरित्र भी उजागर होने लगा है। कहा भी गया है धीरज,धर्म,मित्र अरु नारी आपतकाल परखिए चारी।वायरस का संक्रमण फैलने से रोकने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपील के बाद पूरा देश लॉक डाऊन से गुजर रहा है। ऐसा पहली बार हुआ है कि हवाई और रेल सेवाएं भी पूरी तरह बंद कर दी गईं हैं। केवल परिवहन के लिए इन संसाधनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। देश भर में खाद्य वस्तुओं की आपूर्ति जारी रहे इसके लिए सरकार युद्ध स्तर पर जुटी हुई है। पूरा देश प्रधानमंत्री के आव्हान पर कोरोना महामारी को परास्त करने के उपाय ढूंढ रहा है और अपने स्तर पर अमल भी कर रहा है।इन हालात में राज्य सरकारें और उनके प्रशासनिक अमले पर काम का दबाव बढ़ता जा रहा है। किसी भी युद्ध में जिस तरह फौजों के सामने जीने और मरने की जद्दोजहद होती है उसी प्रकार इस समय सरकारी अमला भी चुनौतियों से गुजर रहा है। कई बहादुर अफसर अपनी हिकमत अमली से परिस्थितियों को नियंत्रित कर रहे हैं। कोरोना वायरस की कोई वैक्सीन अभी तक ईजाद नहीं हो पाई है। वैज्ञानिक जुटे हैं और यदि किसी देश का कोई दल वैक्सीन ईजाद भी कर लेता है तो वैक्सीन को बाजार में उतारने में लंबा समय लगने का अनुमान है। यही वजह है कि पूरी दुनिया में खौफ का माहौल है, लोगों को लगता है कि इस अदृश्य शत्रु के सामने उनकी बहादुरी टिक नहीं पाएगी। सरकार ने आम लोगों से अपील की है कि वे अपने घरों में रहें और संक्रमण फैलाने वाले वाहक न बनें। घरों में सफाई रखी जाए और वायरस के वसा से बने खोल को नष्ट करने के लिए डिटर्जेंट, साबुन, अल्कोहल युक्त हैंडवाश, ब्लीचिंग पाऊडर जैसे क्लोरीनीकरण करने वाले रसायनों, पोटेशियम परमेंगनेट जैसे आक्सीकरण एजेंटों का इस्तेमाल करके सफाई रखें। सरकारी दफ्तरों में भी इन रसायनों का प्रयोग करके सफाई रखी जा रही है। इसके बावजूद कई अफसर कोरोना की चपेट में आ गए हैं। उन्हें कोरोंटाईन करके घरों में और अस्पतालों में रखा जा रहा है उनका उपचार किया जा रहा है। शासन ने उन अफसरों की सैकेन्ड लाईन भी तैयार कर दी है। प्रथम पंक्ति के बीमार होने पर दूसरी पंक्ति जवाबदारी संभालेगी। ये व्यवस्था प्राचीन काल से हर युद्ध की परिस्थिति में अपनाई जाती है। इसके बावजूद पहली बार देखा जा रहा है कि कई अफसरों ने खुद को ड्यूटी से बचाने के लिए खुद को कोरोन्टाईन कर लिया है। वे भयभीत हैं और अपने ही घरों में रहकर जवाबदारी संभालने की बात कह रहे हैं। देश में कई स्थानों से अफसरों के आत्महत्या करने की खबरें भी आ रहीं हैं।अपनी चिट्ठियों में उन्होंने लिखा है कि काम का दबाव अहसनीय है।बेशक ये दौर बड़ा वेदनाभरा है। कोई भरोसा नहीं कि कोई व्यक्ति कब संक्रमण की चपेट में आ जाए और उसकी मौत की वजह बन जाए। संक्रमित व्यक्तियों के ठीक होने की दर भी बहुत अधिक है इसके बावजूद वैज्ञानिक इलाज न मालूम होने के कारण गारंटी नहीं है कि हर संक्रमित व्यक्ति बच ही जाएगा। अब इन हालात में अफसरों का जिम्मेदारियों से भागना कोई अचंभा नहीं है। इसके बावजूद बहाने बनाकर फर्जी सर्टिफिकेट लेकर खुद कोरेंटाईन कर लेना किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं हो सकता। हमारे देश की सरकारें अपने संसाधनों से जो आय अर्जित करती हैं उनका तीन चौथाई से भी अधिक हिस्सा सरकारी अमले को पालने पर खर्च किया जाता है। विकास योजनाओं को पूरा करने के लिए सरकारें कर्ज लेती हैं और जिसका ब्याज जनता को चुकाना पड़ता है। इसलिए जनता के खजाने से वेतन लेने वाले अफसरों की जवाबदारी और भी अधिक बढ़ जाती है। वे घरों में घुसकर इस युद्ध को नहीं जीत सकते। बेशक उन्हें शहादत देनी पड़ सकती है पर इसकी चिंता करने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है। आम जनता का पेट काटकर अब तक उन्हें पाला जाता रहा है। न उत्पादकता बढ़ाने का दबाव और न ही धंधे में घाटे का खौफ,दिन भर की अफसरी और शाम को क्लब हाऊसों में मजा मौज इन अफसरों की जिंदगानी रही है। अब जबकि 21 दिनों के लॉक डाऊन में आम जनता मूलभूत जरूरतों के लिए वंचित है तब अफसरों का तंत्र यदि मैदान से रफूचक्कर हो जाएगा तो फिर जन समस्याओं का निवारण कैसे हो पाएगा।प्रदेश के जनसंपर्क सचिव पी.नरहरि ने इस मुद्दे पर चल रहीं खबरों को देखते हुए बाकायदा अपील की है कि अफसरों की बहानेबाजी की खबरें भ्रामक हैं। सभी अफसर अपना काम मुस्तैदी से कर रहे हैं। यदि वे बीमार हो जाते हैं तो इसे उनकी गैरजिम्मेदारी न बताया जाए। उनकी बात सही है अफसरों पर बेवजह लांछन लगाना उचित नहीं है। अब तक केवल सरकारी तंत्र ही तो है जो कानून और व्यवस्था संभाले हुए है। संकट के इस दौर में समस्या को समझना जरूरी है। तभी समाधान खोजा जा सकता है।अब तक सरकारी तंत्र में चापलूसों को जो महत्व दिया जाता रहा है उनकी वजह से ही सरकारी तंत्र पर अंगुलियां उठ रहीं हैं। ये समय कसावट का है। चापलूसों की भीड़ भले ही घरों में छुप जाए पर योद्धा अफसर तो मैदान में डटे ही हैं। इसलिए सिरे से सरकारी व्यवस्था को खारिज करना नाइंसाफी होगी,इसके बावजूद अफसरशाही में घुसी काली भेड़ों की पहचान तो उजागर होनी ही चाहिए।