भोपाल की सांसद प्रज्ञा सिंह को भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय की समिति का सदस्य बना दिए जाने से विघ्न संतोषी ताकतों के पिछवाड़े मिर्ची लग गई है। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब साध्वी प्रज्ञा सिंह के प्रति सार्वजनिक तौर पर नाराजगी व्यक्त की थी तो उन्हें रक्षा समिति जैसे महत्वपूर्ण कार्य की जवाबदारी कैसे दी जा सकती है। भोपाल की सांसद से चिढ़ने वालों की फेरहिस्त बड़ी लंबी है। जबसे साध्वी प्रज्ञा को भाजपा ने सांसद के रूप में प्रोजेक्ट किया था तबसे उन्हें विवादों में घसीटने के प्रयास लगातार होते रहे हैं। अब जबकि वे 21 सदस्यों वाली रक्षा समिति की सदस्य बनाई गईं हैं तब यही विघ्न संतोषी अपना पिछवाड़ा संभालते हुए उछलने लगे हैं। साध्वी प्रज्ञा सिंह को 2008 में हुए मालेगांव बम धमाके का आरोपी बनाकर कांग्रेस के कुछ षड़यंत्रकारियों ने हिंदू आतंकवाद की नई परिभाषा गढ़ी थी। इसे खूब प्रचारित किया गया। कर्नल श्रीकांत पुरोहित को भी इस बम धमाके में आरोपित किया गया था जिन्हें बाद में निर्दोष पाया गया और अब वे सेना में दुबारा अपना काम संभाल चुके हैं। दरअसल तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल और उसके बाद कांग्रेस के ही सुशील कुमार शिंदे ने इस बम धमाके को हिंदू बनाम मुस्लिम झड़प का रूप देने का प्रयास किया था। कांग्रेस के ही दिग्विजय सिंह ने इसे हिंदू आतंकवाद का नाम देते हुए साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का अभियान चला दिया। देश में लंबे समय तक ये बम धमाका जातिगत वैमनस्य की वजह बना रहा। अब जबकि एनआईए की गढ़ी गई कहानी झूठी साबित हो रही है तब देश का एक बड़ा तबका इस पर संशय महसूस कर रहा है। इस मामले की सुनवाई कर रहे जज ने भी सवाल पूछा कि यदि एनआईए की कहानी झूठी है तो बम धमाका किसने किया था। दरअसल एनआईए के तत्कालीन अफसरों के माध्यम से कांग्रेस सरकार ने जिस तरह बम धमाके को साम्प्रदायिक रंग देने का प्रयास किया उससे आज भी लोग असमंजस महसूस कर रहे हैं। मालेगांव के बम धमाके में 7 लोगों की मौत हुई थी और सौ से अधिक लोग जख्मी हो गए थे। इस धमाके के वास्तविक आरोपियों को तो जांच के दायरे से बाहर कर दिया गया और आतंक के खिलाफ काम करने वालों को आरोपी बना दिया गया। जाहिर है कि अब जबकि साध्वी प्रज्ञा को देश की रक्षा समिति का सदस्य बना दिया गया है तब उनके खिलाफ षड़यंत्र रचने वाला बड़ा समूह आहत महसूस करेगा ही। अब समय आ गया है कि जब भारत की सेना और नागरिकों पर हिंदू आतंकवाद जैसा लांछन लगाने में असफल होने के बाद जो लोग बैचेन हो रहे हैं उनकी आपत्तियों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया जाना चाहिए। भारत में आतंकवाद फैलाने वालों पर कड़ी कार्रवाई होने से जो लोग परेशान महसूस करते हैं उनकी चिंता की जाएगी तो फिर भारत में भी एक नया पाकिस्तान बन जाएगा। आज पाकिस्तान ऐसे ही आतंकवादियों से परेशान है। भारत में इस आतंक की कमर तोड़ने के लिए सेना और सरकार को जो भी उपाय बन पड़ें बेखौफ होकर करने चाहिए। इसमें किसी आतंकवादी के मानवाधिकारों की चिंता करने वालों की भी खबर ली जाना जरूरी है।जो लोग आतंकवाद की पैरवी करते फिरते हैं उनके लिए साध्वी प्रज्ञा भारती के रक्षा समिति में चयनित होने पर चिंतित होना लाजिमी है। देश की सुरक्षा के प्रति चिंतन करने का काम वही लोग कर सकते हैं जो देश के लिए मरने मिटने के लिए तैयार हों। अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए तैयार हों। साध्वी प्रज्ञा सिंह मालेगांव बम धमाके के प्रताड़ना तंत्र से चोखी साबित होकर वापस आईं हैं। भोपाल की जनता ने षड़यंत्रकारी दिग्विजय सिंह को भारी मतों से हराकर उन्हें संसद भेजा है। महात्मा गांधी की हत्या निश्चित तौर पर निंदनीय और गलत थी। देश महात्मा गांधी की क्षति पूर्ति कभी नहीं कर सकता। इसके बावजूद नाथूराम गोड़से की देशभक्ति पर सवाल खड़े करना उन लोगों की सीमित दृष्टि का ही नतीजा है जो खरगोश की तरह आंखें बंद करके दुश्मन के चले जाने का भ्रम पालते फिरते हैं। साध्वी प्रज्ञा के बयानों पर लाख सवाल उठाए जाएं पर उनकी देशभक्ति शंका से परे है। रक्षा मंत्रालय या भारत सरकार के जिन भी लोगों ने साध्वी को ये महत्वपूर्ण जवाबदारी दी है उन्होंने देश को संदेश देने का प्रयास किया है कि वे रक्षा के मुद्दे पर किन्हीं भी सीमाओं तक जा सकते हैं। निश्चित रूप से भारत में आतंक फैलाने की मंशा रखने वालों के लिए ये कड़ा संदेश है।इसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है।
Month: November 2019
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छिंदवाड़ा का नया कमीशन एजेंट एपीडी आरके गुप्ता

भोपाल,19 नवंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। छिंदवाड़ा मॉडल की शान बघारकर मुख्यमंत्री बने कमलनाथ ने सत्ता संभालते ही छिंदवाड़ा में लगभग तीन हजार करोड़ के प्रोजेक्ट मंजूर कर दिए हैं। राज्य सरकार का खजाना खाली होने का शोर मचाकर वे प्रदेश को गुमराह कर रहे हैं और अपने चुनाव क्षेत्र में प्रदेश के संसाधन झोंकते चले जा रहे हैं। मुख्यमंत्री के इस अभियान की आड़ में अपना उल्लू सीधा करने वाले पीआईयू विभाग के एपीडी रमाकांत गुप्ता ने ठेकेदारों का नया गिरोह खड़ा करना शुरु कर दिया है। सबसे ज्यादा चंदा देकर वे सरकार के नीति नियंताओं के लोकप्रिय बने हुए हैं और कमाई के साथ साथ रिटायरमेंट के बाद अपनी पुर्ननियुक्ति की भूमिका भी बनाते जा रहे हैं।
कमलनाथ के अंधा बांटे रेवड़ी बार बार खुद को दे वाले अंदाज का फायदा उठाने वाले पीआईयू विभाग के एपीडी रमाकांत गुप्ता के रवैये से खासा असंतोष पनप रहा है लेकिन वे पूरी बेशर्मी से अपना भविष्य सुरक्षित करने में जुटे हुए हैं। गुप्ता के रवैये से न केवल छिंदवाड़ा बल्कि पूरे जबलपुर संभाग के अन्य विकास कार्य ठप हो गए हैं। जिन प्रोजेक्टों की समय सीमा पूरी हो चुकी है और बावजूद वे अधूरे हैं उनकी समय सीमा बढ़ाना एपीडी के अधिकार क्षेत्र में ही रहता है। मूल ठेके से जुड़े सप्लीमेंट्री सेक्शन की मंजूरी, स्टीमेट में सुधार, और लैब अप्रूवल जैसे कार्य भी एपीडी ही संपन्न कराते हैं। जाहिर है कि इन सभी कार्यों के लिए रमाकांत गुप्ता के दफ्तर में ठेकेदारों को मोटी रिश्वत देनी पड़ रही है। उगाही के इस तंत्र से जुड़े उनके करीबियों का कहना है कि इसमें माननीय मुख्यमंत्री जी के दफ्तर का खर्च भी शामिल है।
अपने पूरे सर्विसकाल में श्री गुप्ता ने ठेकों की परिपाटियों को अपनी परिभाषा की कसौटी पर कसा है। जब वे मुख्य अभियंता थे तब भी उन्होंने ठेकेदारों के कमीशन में से राजनेताओं का हिस्सा बढ़ाया था। यही वजह है कि उनके प्रमोशन धड़ाधड़ होते चले गए और अब वे अपने रिटायरमेंट के करीब आते आते सेवा वृद्धि की रणनीति पर तेजी से काम कर रहे हैं। उनके इस रवैये से ठेकेदारों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है और शर्तें पूरी न करने पर उन्हें अपने काम से भी हाथ धोना पड़ रहा है।
गौरतलब है कि छिंदवाड़ा के अधिकतर निर्माण कार्य ईपीसी पद्धति से कराए जा रहे हैं। जिनमें ज्यादातर ठेकेदार दिल्ली के ही हैं और वे नक्शा बनाने से लेकर संधारण और निर्माण के सभी कार्यों का ठेका ले रहे हैं। इस पूरी प्रक्रिया में ठेकों की लागत अनावश्यक रूप से बढ़ाई जा रही है। कई ठेकेदारों का आतंक इतना ज्यादा है कि विभाग के अफसर भी उनकी बात काटने में हिचकते हैं। बताते हैं कि आरके गुप्ता का मार्गदर्शन पाकर वे ठेकेदार गुंडागर्दी पर उतारू हो रहे हैं।
छिंदवाड़ा माडल के नाम पर लूट का आलम ये है कि भोपाल का हमीदिया अस्पताल जहां लगभग छह सौ करोड़ रुपए में बन रहा है वहीं छिंदवाड़ा के सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल की लागत 1600 करोड़ बताई गई थी। बाद में सरकार में बैठे अफसरों ने इसे घटाने का दबाव बनाया तो लागत 1100 करोड़ अनुमानित की गई। इस प्रक्रिया में आरके गुप्ता ने आंख मूंद ली और प्रदेश के खजाने से लगभग दोगुनी राशि व्यय किए जाने का राज मार्ग खोल दिया। पीआईयू के सर्वेसर्वा विजय वर्मा इस प्रक्रिया से पूरी तरह वाकिफ हैं लेकिन वे भी इसी तरह के हथकंडे अपनाते हुए अपना कार्यकाल तीन बार बढ़वा चुके हैं। ठेके की लागत घटाने के साथ साथ इस अस्पताल के लिए दुबारा टेंडर बुलाने पड़े थे, जिससे लागत भी बढ़ी और प्रोजेक्ट की समयसीमा भी बढ़ गई।
श्री गुप्ता जब पीडब्लयूडी के मुख्य अभियंता थे तब उन्होंने सड़कों के 200 करोड़ रुपए के कार्य को भी कई महीनों तक लटकाया था। ये निर्माण न्यू डेवलपमेंट बैंक से प्राप्त कर्ज से किया जाना था। गुप्ता की शर्तें पूरी नहीं होने के कारण उन्होंने इस प्रोजेक्ट को महीनों तक तकनीकी मंजूरी नहीं दी। जब विभाग में नए अभियंता की नियुक्ति हुए तब जाकर सड़कों के लिए तकनीकी मंजूरी दी जा सकी।इस तरह प्रदेश के संसाधनों से खिलवाड़ करने वालों के लिए गुप्ता एक सफल सरमाएदार बन गए हैं।
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बंदर हीरा खदान को मंजूरी बिना बेचने की तैयारी
बंदर हीरा खदान लेने के लिये 5 कम्पनियों ने प्रस्तुत किया दावा
तकनीकी बिड का मूल्यांकन 27 नवम्बर को पूर्ण किया जायेगा : मंत्री जायसवालभोपाल,14 नवंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। खनिज साधन मंत्री प्रदीप जायसवाल ने बताया है कि छतरपुर जिले की वर्षों से अनुपयोगी बंदर हीरा खदान लेने के लिये 5 बड़ी कम्पनियों ने 13 नवम्बर को खुली प्रथम चरण की तकनीकी निविदाओं में बिड जमा कर अपना दावा प्रस्तुत किया है। ये कम्पनियाँ हैं भारत सरकार का उपक्रम नेशनल मिनरल डेव्हलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एनएमडीसी), एस्सेल माइनिंग (बिरला ग्रुप), रूंगटा माइन्स लिमिटेड, चेंदीपदा कालरी (अडानी ग्रुप) तथा वेदांता कम्पनी।
मंत्री श्री जायसवाल ने बताया कि 55 हजार करोड़ रुपये की यह खदान रियो टिंटो कम्पनी ने छोड़ी थी। देश की इस सबसे बड़ी खदान के नीलामी प्रकरण में भारत सरकार के नियमानुसार लगभग 56 करोड़ रुपये की सुरक्षा निधि जमा कराई जानी थी। इसके लिये आवेदक कम्पनी की नेटवर्थ कम से कम 1100 करोड़ रुपये होना आवश्यक था।
खनिज साधन मंत्री ने बताया कि 13 नवम्बर की निविदा कार्यवाही के बाद अब तकनीकी बिड के मूल्यांकन का कार्य 27 नवम्बर, 2019 को पूर्ण किया जायेगा। इसके बाद 28 नवम्बर को प्रारंभिक बोली खोली जाएगी और उसके अगले दिन ऑनलाइन नीलामी सम्पादित की जाएगी।
उल्लेखनीय है कि छतरपुर जिले में लगभग 3.50 करोड़ कैरेट के हीरे के भण्डार का अनुमानित मूल्य 55 हजार करोड़ रुपये है। इस पर राज्य शासन को प्राप्त होने वाली रॉयल्टी की दरों के आधार पर नीलामी सम्पन्न की जाएगी।
बक्सवाहा में हीरे की मौजूदगी का पता लगने के बाद आस्ट्रेलिया की रियो टिन्टो कंपनी ने बंदर प्रोजेक्ट को लीज पर लेकर यहां भारी मात्रा में हीरा पाए जाने का सर्वे किया था। इसके बाद उसने करोड़ों रूपए के हीरे सर्वेक्षण के नाम पर निकाले थे।
जब कंपनी से सरकार का अनुबंध खत्म हो गया और आगे के कार्य की अनुमति नहीं मिली तो कंपनी अपना सामान समेटकर चली गई। अब इसी प्रोजेक्ट को फिर से नीलाम किया जा रहा है।
अब देश की जानी-मानी कंपनियों ने हीरा खनन में अपनी रूचि दिखाई है। कंपनी के प्रतिनिधियों ने बंदर प्रोजेक्ट की भौगोलिक स्थिति समझने हेतु जंगल का दौरा किया और प्रोजेक्ट के बारे में जांच-पड़ताल की। जानकारी के मुताबिक बंदर डायमंड माइंस प्रोजेक्ट की नीलामी में अनेक कंपनियों ने रुचि दिखाई है।
आदित्य बिरला ग्रुप, अडानी ग्रुप, वेदांता ग्रुप, रूंगटा ग्रुप, एसेल ग्रुप, क्यूरा ग्रुप जैसी कंपनियों ने बकस्वाहा पहुँच कर बंदर प्रोजेक्ट की जानकारी ली साथ ही भौगोलिक स्थिति जानकर परिस्थितियों से रूबरू होकर प्रोजेक्ट के संबंध में चर्चाएं की गई जिसमें मुख्य रुप से भूमि सम्बन्धी और जंगल से सम्बंधित चर्चाएं हुई ।
कलेक्टर मोहित बुंदस ने बताया कि डायमंड प्रोजेक्ट के लिए निरीक्षण करने टीमें आई हैं। इस प्रोजेक्ट में रूचि रखने वाली कंपनियों की टीमों ने निरीक्षण करने के बाद विभिन्न बिन्दुओं पर चर्चा की।
यहां का प्रोजेक्ट शुरू होने से लोगों को रोजगार मिलेगा और बक्स्वाहा का नाम पूरे विश्व में हीरा खदान के रूप में जाना जाएगा।
इस प्रोजेक्ट का रकबा 356 हेक्टेयर है जिसमें से करीब 13 हेक्टेयर जंगल ऐसा है जो पन्ना टाईगर रिजर्व से लगा हुआ है साथ ही इमली घाट जहां ये खदान लगाई जानी है वहां जाकर भी कंपनियों ने मुआयना किया और वहां की स्थिति जानी।
बकस्वाहा ब्लॉक के हीरा खदान देखने पहुँची कंपनियों के साथ नरेंद्र सिंह परमार सचिव मध्यप्रदेश शासन, मोहित बुंदस कलेक्टर छतरपुर, अनुपम सहाय डीएफओ, तिलक सिंह एसपी, मनोज मालवीय एसडीएम बिजावर के साथ जिले का अमला मौजूद रहा।
प्रदेश शासन के सचिव नरेन्द्र सिंह परमार ने बताया कि बंदर हीरा खनन प्रोजेक्ट बक्स्वाहा की नीलामी प्रक्रिया की शुरूआत 5 अगस्त से शुरू की गई। प्रोजेक्ट की बोली 60 हजार करोड़ से शुरू होगी।
परमार ने बताया कि विभिन्न कंपनियों के प्रतिनिधियों से प्रोजेक्ट के बारे में चर्चा हुई है। पन्ना में रखे बक्स्वाहा के डायमंड को देखने के बाद प्रतिनिधियों ने भौगोलिक स्थिति जानने की इच्छा जताई थी। उन्हें यहां लाया गया है ताकि वे वस्तु स्थिति से भी अवगत हो सकें।
यहां आने वालों में 6 कंपनियों के प्रतिनिधि शामिल हैं। उधर डीएफओ अनुपम सहाय का कहना है कि पूरा प्रोजेक्ट वन क्षेत्र का है इसलिए एनओसी जारी होगी लेकिन यह भी देखना होगा कि इस जंगल को कहां स्थानांतरित किया जाए ताकि अच्छे किस्म का जंगल तैयार हो सके।
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Starvation in India,Causes,Statics,various goverment schemes
Anushka R.Saxena * a Law Student *India is effectively the most predominant nation in South Asia. While this converts into impact and power for the Union government, Indians themselves appear to have not profited much from this. India’s probably weaker neighbours in terms of hunger deaths have in fact better placed themselves.
India, with a population of over 1.3 billion, has seen gigantic development in the previous two decades. Total national output has expanded 4.5 occasions and per capita, utilization has expanded multiple times. Additionally, sustenance grain creation has expanded very nearly multiple times. In spite of the marvellous mechanical and monetary developments, India is not able to give access to nourishment to the countless particularly ladies and youngsters.
Starvation in India Statistics:
As indicated by FAO assesses in The State of Food Security and Nutrition in the World, 2018 report, 195.9 million individuals are affected by starvation in India. By this measure, 14.8% of the population is suffering from starvation in India. Kids suffering from starvation in India have a higher danger of death even due to basic diseases, for example, looseness of the bowels, pneumonia, and other diseases which should be easily curable. The Global Hunger Index 2017 positions India at 100 out of 119 nations based on three driving pointers, commonness of squandering and hindering in youngsters under 5 years, under 5 tyke death rate, and the extent of undernourished in the population.
Causes of Starvation in India:
Poverty is the major reason attributed to the starvation in India. However, there are other reasons as well which contribute significantly to the cause of starvation in India. Lack of safe drinking water is another such cause which should not be ignored. Other factors which contribute significantly are diseases and the lack of facilities available in rural areas to fight them along with lack of access to food.
Initiatives by the Government:
A number of initiatives have been in place by the Government over the last few years to minimise the deaths related to starvation in India. For instance –
The Food Security Bill 2013 was enacted on 12 September 2013 as a food security scheme. Under this scheme, the beneficiaries were to be provided 5 kgs of grains every month which included rice, wheat and grains at nominal rates ranging from Rs 1/Kg to Rs 3/Kg.
Public Distribution System (PDS) has been in place since the year 1997. The objective of this scheme was to provide food to the poor at subsidised rates.
A number of other schemes have been launched by the Government from time to time. However, a lot still needs to be done in order to uplift the poor of our country. We all must support the Government in its initiatives in order to help our fellow citizens to uplift themselves and live a respectful life, at least, no one should die of starvation in India when we have an abundance of resources with us.
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निर्दोष सिखों के नरसंहार के दोषी कब दंडित होंगे
स. इकबाल सिंह लालपुरा
1984 में निर्दोष सिखों का बर्बरता से नरसंहार किया गया, सरेराह गले में टायर डालकर उन्हें जलाया गया, सामूहिक कत्ल किए गए, बलात्कार किए गए, लूट की गई और गुरुद्वारों को तोड़ दिया गया। अच्छे भले लोग भी ‘खून का बदला खून’, ‘खून के छींटे सिखों के घर तक पहुंचने चाहिए’ और ‘जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है’ की बातें करने लगे
31 अक्टूबर 1984 को देश की तात्कालिक प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का कत्ल उन्हीं की सुरक्षा में नियुक्त दो पुलिस कर्मचारियों (एक सब इंस्पेक्टर व एक सिपाही) ने प्रधानमंत्री के आवास पर ही कर दिया। किसी भी देश में प्रधानमंत्री व उसका निवास सबसे सुरक्षित स्थान होता है। जो भी व्यक्ति सेना, अर्धसैनिक दस्ते या पुलिस की वर्दी पहनता है, वह केवल देश के कानून व नागरिकों की सुरक्षा तक ही समर्पित होता है। उसका व्यक्तिगत धर्म/जाति का बंधन उसे अपनी ड्यूटी निरपक्षता से करने में रुकावट नहीं होना चाहिए। यदि सुरक्षा कर्मचारी अनुशासन की अवहेलना करें व रखवाले बनने की जगह कातिल, हत्यारे बन जाएं तब जरूर कुछ बड़े मानसिक कारणों की संभावना होती है।
इंदिरा गांधी जी पर हमला 31 अक्टूबर 1984 को सुबह तकरीबन 9:20 पर हुआ। तुरंत उन्हें ‘ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस’ दिल्ली में ले जाया गया। जहां पर डॉक्टरों ने 10:50 पर उन्हें मृत घोषित कर दिया। 11:00 बजे प्रातः ऑल इंडिया रेडियो प्रधानमंत्री जी को उन्हीं के दो सिख शस्त्रधारी अंगरक्षकों द्वारा कत्ल किया जाने का ऐलान करता है। साधारणत: ‘ग्रेव एंड सडन प्रोवोकेशन’ जो जुर्म की गंभीरता को नहीं बल्कि सजा को कम करने की प्रक्रिया है जिसका तात्पर्य यह है कि दोषी की भावनाओं को ठेस पहुंची तो उसने जुर्म कर दिया। पर दिल्ली सिख कत्लेआम की कहानी तो कुछ अलग ही है।
भावनाएं तो कुछ मिनटों के बाद ही शांत हो जाती हैं। परंतु दिल्ली में सिखों कत्लेआम कुछ मिनटों बाद नहीं, बल्कि कई घंटों की विचार मंथन से उत्पन्न हुई घटना प्रतीत होती है। । राजीव गांधी शाम 4:00 बजे वापस एम्स पहुंचते हैं। पहली पत्थरबाजी की घटना शाम 5:30 बजे तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह जी के एम्स पहुंचने पर होती है। रात में अकबर रोड दिल्ली के एक बंगले पर ऐसे कुछ मुख्य लोग इकट्ठे होते हैं, जिनमें से अधिकतर पर सिख कत्लेआम करवाने का दोष आज भी लगाया जाता है।
1 नवंबर 1984 को सुबह केवल दिल्ली ही नहीं भारत के कई राज्यों में सिखों का नरसंहार आरंभ होता है। जिन्होंने प्रधान मंत्री जी की हत्या की थी। उनमें से एक को तो गिरफ्तार कर लिया गया व दूसरे को मौके पर ही मार गिराया गया। परंतु नरसंहार उन हजारों निर्दोष सिखों का हुआ जिनका कोई जुर्म ही नहीं था।
निर्दोष सिखों का बर्बरता से नरसंहार किया गया, सरेराह गले में टायर डालकर उन्हें जलाया गया, सामूहिक कत्ल किए गए, बलात्कार किए गए, लूट की गई और गुरुद्वारों को तोड़ दिया गया। अच्छे भले लोग भी ‘खून का बदला खून’, ‘खून के छींटे सिखों के घर तक पहुंचने चाहिए’ और ‘जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है’ की बातें करने लगे। 3 नवंबर तक देश की पुलिस, फौज और अदालतें खामोश रही, इंसानियत उनके ह्रदय में नहीं जागी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इन 3 दिनों में करीब 2800 सिख दिल्ली में और 3350 सिख भारत के दूसरे राज्यों में कत्लेआम की भेंट चढ़े। लूट खसोट और नुकसान का तो कोई हिसाब ही नहीं। सरकारी तंत्र चाहे अराजकता की तस्वीर बना रहा परंतु आम आदमी के ह्रदय में इंसानियत जरूर कचोटती रही। उन्होंने मजलूमों को अपनी छाती से लगाकर, अपने घर में छुपाकर भी रखा कई जगह बचाने वाले भी भीड़ तंत्र के शिकार बनें और यह भले लोग शरणार्थी कैंपों में भी उनका सहारा बने। ये हमला एक धर्म को मानने वालों के द्वारा दूसरे पंथ पर नहीं था बल्कि बदला लेने की नियत से अपराधियों और राजनीतिक दल के नापाक गठबंधन का घिनौना कृत्य था|
इस कत्लेआम की पड़ताल तो क्या होनी थी, पुलिस ने कोई मुकदमा भी दर्ज नहीं किया और न ही किसी अदालत ने कानून के पालन हेतु, स्वयं ही कोई कार्रवाई की। दुनिया भर में बदनामी के दाग से बचने हेतु तात्कालिक सरकार ने नवंबर 1984 में एक एडिशनल कमिश्नर पुलिस वेद मरवाह की अध्यक्षता में कमेटी बनाई । जिसे 1985 में बंद कर दिया गया। उस रिपोर्ट का भी कुछ पता नहीं। अगला कमीशन जस्टिस रंगनाथ मिश्रा का बना। जस्टिस रंगनाथ मिश्रा कमीशन ने कहा कि दोषियों की शिनाख्त करनी उसकी जिम्मेदारी का हिस्सा ही नहीं थी। इसी क्रम में अब तक 10 से अधिक कमीशन और कमेटियां बन चुकी हैं। परंतु पूर्ण इंसाफ की प्रक्रिया अभी देश की राजधानी दिल्ली में ही अधूरी है। देश के अन्य राज्यों में 35 साल पूरे होने के बाद भी सरकार इंसाफ की निष्पक्ष जांच, मुआवजा व दोषियों को सजा दिलाने हेतु पूरी तरह सजग नहीं है।
सन 1993 में मदन लाल खुराना जी की तरफ से बनाई गई ‘जस्टिस नरूला कमेटी’ को भी उस समय कि केंद्र सरकार ने मान्यता नहीं दी थी। पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेई जी की सरकार ने सन 2000 में ‘जस्टिस जी. टी. नानावती कमीशन’ का गठन करके इस नरसंहार की जांच को आगे बढ़ाया। जो आज भी कभी तेज ओर कभी धीमी गति से चल रही हैं।
बेगुनाह लोगों के कत्लेआम, लूटमार और औरतों के साथ बलात्कार करने वाले दोषियों को सजा करवाने की प्रक्रिया यदि 35 साल में पूरी नहीं हो सकी तो लगता है कि पूरी न्यायिक प्रक्रिया की भी जांच आवश्यक है।
आज जब सारा विश्व और विशेषकर भारत सरकार श्री गुरु नानक देव जी का 550 साला प्रकाश उत्सव बना रही है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की तरफ से सिख भाईचारे के हरे जख्मों पर मरहम लगाने का प्रयास हो रहा है। तो अच्छा हो, कि समय निश्चित करके 1984 के अपराधियों की सजा दिलवाने के कार्य को भी प्रमुखता से किया जाए।
( लेखक पंजाब पुलिस से सेवानिवृत्त डीआईजी हैं )
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अबकी बारी शिवसेना भारी, राऊत बोले सरकार बनाएंगे
मुंबई,2 नवंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। महाराष्ट्र में भाजपा शिवसेना युति के बीच मुख्यमंत्री को लेकर जो रार ठनी है उसका कोई समाधान होता नजर नहीं आ रहा है। 50-50 सीटों पर तालमेल से चुनाव लड़कर भाजपा ने 105 और शिवसेना ने 56 सीटें हासिल कीं हैं। स्वाभाविक तौर पर महाराष्ट्र के नागरिकों ने सर्वाधिक 25.7 प्रतिशत मत देकर भाजपा की निवृतमान सरकार को आगे अपना काम जारी रखने का जनादेश दिया है लेकिन उसका ये मत प्रतिशत तब है जब शिवसेना से उसका गठबंधन था। शिवसेना को भी इस चुनाव में 16.5 प्रतिशत मत प्राप्त हुए हैं। उसे भाजपा से गठबंधन की मंहगी कीमत चुकानी पड़ी है। यही वजह है कि शिवसेना अब अपना अस्तित्व बचाने के लिए आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाने की जिद पर अड़ी हुई है।
शिवसेना सांसद संजय राऊत ने आज अल्टीमेटम दिया है कि यदि भाजपा पंद्रह दिनों तक सरकार नहीं बना पाएगी तो फिर शिवसेना सरकार बनाने का दावा पेश करेगी। शिवसेना हर हाल में अपना मुख्यमंत्री बनाने की जिद पर अड़ी हुई है। उसके नेताओं का कहना है कि एक बार सत्ता का संचालन भाजपा कर चुकी है इसलिए इस बार शिवसेना को मौका मिलना चाहिए। भाजपा का कहना है कि गठबंधन के बीच भाजपा ने ज्यादा सीटें पाईं हैं इसलिए बड़े दल होने के नाते उसे सरकार चलाने का अवसर मिलेगा। हालांकि कम सीटें आने के लिए शिवसेना अब भाजपा को ही दोषी बता रही है। उसके नेताओं का कहना है कि भाजपा के मत प्रतिशत में गिरावट बता रही है कि भाजपा को सत्ता चलाने का जनादेश नहीं है। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के आए नतीजों के मुताबिक 2014 के 122 सीटों के मुकाबले भाजपा इस बार 105 सीटों पर ही जीत दर्ज कर सकी। चुनाव आयोग के आंकड़े के अनुसार पार्टी को 17 सीटों का नुकसान होने के साथ कुल मिले मतों में भी करीब दो फीसदी की गिरावट आई है। आंकड़ो के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अलावा महाराष्ट्र की राजनीति की तीन अहम पार्टियों शिवसेना, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के मत प्रतिशत में भी गिरावट आई है। इसकी वजह कई सीटों पर बागियों के मिले मत हैं।
भाजपा ने 2014 में 260 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे और उसके खाते में कुल पड़े मतों का 27.8 प्रतिशत गया जो इस चुनाव में घटकर 25.7 फीसदी रह गया। हालांकि, इस पिछले चुनाव में अकेले भाजपा लड़ी थी लेकिन इस बार वह शिवसेना के साथ गठबंधन में उतरी थी। शिवसेना को 288 सदस्यीय विधानसभा में 16.4 फीसदी मतों के साथ 56 सीटों पर जीत मिली है। इस प्रकार पिछले चुनाव के मुकाबले उसे सात सीटों और 2.9 फीसदी मतों का नुकसान हुआ है। हालांकि इस बार पार्टी ने 124 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे जबकि पिछली बार 282 पर उसने दावेदारी की थी।
इस चुनाव में निर्दलीय सहित 28 गुटों को कुल 23.06 प्रतिशत मत मिले हैं जो 2014 के चुनाव के मुकाबले नौ फीसदी अधिक है और इन दलों को 19 सीटें मिली थीं। इन छोटे दलों में प्रकाश आंबेडकर के नेतृत्व वाली वंचित बहुजन अगाड़ी और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एमआईएमआईएम) शामिल हैं।
इस बार 13 निर्दलीय जीतकर विधानसभा पहुंचे हैं। शरद पवार के नेतृत्व वाली राकांपा को इस बार 16.7 फीसदी के साथ 54 सीटें मिली है, जो 2014 के मुकाबले 13 सीटें अधिक है। हालांकि राकांपा के मत प्रतिशत में गिरावट आई है। पार्टी को 2014 में 17.2 प्रतिशत मत मिले थे। पार्टी ने 2019 में 117 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे।
कांग्रेस को 2014 के 18 फीसदी के मुकाबले इस बार 15.9 प्रतिशत मिले हैं। हालांकि, उसकी सीटें 42 से बढ़कर 44 हो गई है। कांग्रेस ने इस बार 147 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे जबकि पिछली बार 287 सीटों पर दावेदारी की थी। राज ठाकरे के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के मत प्रतिशत में भी गिरावट आई है। पार्टी को 2.3 प्रतिशत मत मिले हैं जो 2014 के मुकाबले 1.4 फीसदी कम है।





