मुंबई 10 अक्टूबर,(प्रकाश बियाणी)। इण्डिया की तरह बीएसएनएल और एमटीएनएल सरकार के लिए गले की फ़ांस बन गई है. एयरटेल और वोडाफोन आइडिया जब जिओ के सामने हांफ रहे हैं तब वित्त मंत्रालय ने मान लिया है कि बीएसएनएल के उद्धार के लिए ७५ हजार करोड़ रुपए का निवेश नासमझी होगी. बीएसएनएल की वास्तविक परेशानी है कर्मचारियों की बहुतायत. वोडाफोन आयडिया करीब 9800 और एयरटेल करीब 8400 कर्मचारियों से कारोबार कर रही है वहीं बीएसएनएल के कर्मचारियों की संख्या है 1.60 लाख से भी ज्यादा है. जहाँ दूरसंचार क्षेत्र की निजी कम्पनियां की स्टाफ लागत 3 से 5 फीसदी है वहां बीएसएनएल इस मद पर खर्च कर रही है अपनी कुल कमाई का 75 फीसदी हिस्सा. यही नहीं, नए ग्राहकों को जोड़ने और प्रति यूजर कमाई के मामले में भी बीएसएनएल निजी दूरसंचार कम्पनियों से दौड़ में बहुत पीछे है. विगत तीन वर्षों में बीएसएनएल ने 2.2 करोड़ नए ग्राहक जोड़े जबकि जिओ ने 31.38 करोड़ और एयरटेल ने 6.19 करोड़. जिओ के 4जी ग्राहक प्रति यूजर औसतन खर्च कर रहे है 126 रुपए तो बीएसएनएल के २जी/३जी ग्राहक प्रति यूजर केवल 41 रुपया खर्च करते हैं. विडम्बना यह है कि बीएसएनएल सरकार से 2100 मेगा हर्ट्ज में 4जी स्पेक्ट्रम मांग रही है पर दूरसंचार मंत्रालय सुनवाई नहीं कर रहा है.
2008 में यही हुआ था जिसने बीएसएनएल की दुर्दशा की है. बीएसएनएल ने तब 9.30 करोड़ सेल्युलर लाइन्स के लिए 50 हजार करोड़ रुपए का टेंडर जारी किया था. दुनिया के तब इस सबसे बड़े टेलिकॉम कॉन्ट्रैक्ट को लेकर टेलिकॉम उपकरण बनानेवाली कम्पनियों ने बीएसएनएल पर वेंडर सिलेक्शन में पक्षपात का आरोप लगाया. तकनीकी ग्राउंड पर इस कॉन्ट्रैक्ट को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में मुकदमा दायर हुआ और मेगा आर्डर केंसल हो गया. इसके साथ बीएसएनएल ने मार्केट लीडर होने का मौका खो दिया. 2007-08 में बीएसएनएल के पास 37 हजार करोड़ रुपए नगद थे तो आज इसका सकल घाटा हो गया है 90 हजार करोड़ रुपए. यही नहीं, मई 2019 में बीएसएनएल की 2जी ग्राहक मार्केट में हिस्सेदारी रह गई है 17.6 फीसदी जबकि भारतीय एयरटेल और वोडाफोन की क्रमश: हिस्सेदारी है 34.9 फीसदी और 47.5 फीसदी. इसी तरह ब्रांडबैंड मार्केट में बीएसएनएल की हिस्सेदारी है मात्र 3.7 फीसदी जबकि वोडाफोन आयडिया, भारती एयरटेल और मार्केट लीडर जिओ की हिस्सेदारी है क्रमश: 18.6, 20.4 और 55.6 फीसदी.
बीएसएनएल के लिए सांत्वना की बात है कि इसके पास 7.5 लाख रूट कि.मी. का फायबर नेटवर्क है जिसके कारण कभी टेलिकॉम सेवा पर देश में इसका एकाधिकार था. दुर्भाग्य से आज यह साधारण लेंड लाइन फोन सेवा कम्पनी होकर रह गई है जिनकी संख्या भी मोबाईल की लोकप्रियता बढने के साथ लगातार घट रही है. संचार भवन के अकारण हस्तक्षेप, गैर जरूरी स्टाफ और उनका ग्राहक सेवा के प्रति एटीटयुड ने बीएसएनएल को सरकार के गले की फ़ांस बनाया है. टेलिकॉम उद्योग में जारी गला काट प्रतिस्पर्धा के चलते अब बीएसएनएल को उबारना सरकार के बूते की बात नहीं है.


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