Month: October 2019

  • कमलनाथ की पाखंडी मुहिम पर केन्द्र की रोक

    कमलनाथ की पाखंडी मुहिम पर केन्द्र की रोक

    भोपाल,22अक्टूबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। शुद्ध के लिए युद्ध नाम से चलाई गई कमलनाथ सरकार की पाखंडी मुहिम पर अंततः केन्द्र सरकार ने हस्तक्षेप करके विराम लगा दिया है। उज्जैन के एक घी व्यापारी पर लगाई गई रासुका का प्रकरण हटाकर केन्द्र के गृह विभाग ने राज्य सरकार की तमाम कार्रवाईयों को संदेह के दायरे में ला दिया है। रासुका हटाए जाने से बिलबिलाई कमलनाथ कांग्रेस ने इसके बाद अनर्गल प्रलाप शुरु कर दिया है।

    मध्यप्रदेश कांग्रेस की मीडिया विभाग की अध्यक्ष शोभा ओझा और उपाध्यक्ष अभय दुबे ने उज्जैन के घी व्यापारी कीर्ति वर्धन केलकर पर लगाई रासुका हटाने की कार्रवाई को शर्मनाक बताया है।अभय दुबे का कहना है कि कीर्ति वर्धन केलकर को 30 जुलाई 2019 को उज्जैन प्रशासन ने नकली घी बनाते हुए तथा केमिकल एवं रसायनों के साथ पकड़ा था। कार्रवाई करने वाले अमले का आरोप था कि व्यक्ति अपने परिसर में बेकरी शार्टनिंग के नाम पर मिलावटी घी का निर्माण कर रहा था। इस व्यक्ति से 45 किलो घी जब्त करके सैंपल को जांच के लिए भेजा गया था। जांच रिपोर्ट में सामग्री अवमानक (कम गुणवत्ता) स्तर की पाई गई। इसके बाद आरोपी के खिलाफ एफएसएस एक्ट 2006 की धारा 26(2)(ii) तथा नियम 2011 सहपठित धारा 51 के तहत अपराध पंजीबद्ध किया गया।

    खाद्य विभाग का आरोप था कि यह व्यक्ति आदतन अपराधी है। इसके पूर्व 2015 में भी इसका नमूना लिया गया था, तब भी सामग्री घटिया गुणवत्ता की पाई गई थी। वह प्रकरण न्यायालय में विचाराधीन है। दो प्रकरण बन जाने के कारण व्यापारी को आदतन अपराधी बताते हुए कलेक्टर ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 की धारा 3(2) के तहत कार्रवाई करने की अनुशंसा की गई थी। इस प्रकरण में केंद्रीय गृहमंत्रालय ने 10 अक्टूबर 2019 को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून 1980 की धारा 14 (1) के तहत रासुका की कार्रवाई को निष्प्रभावी कर दिया है।

    शोभा ओझा और अभय दुबे ने केंद्रीय गृहविभाग की इस कार्रवाई को शर्मनाक बताते हुए आरोप लगाया है कि मप्र भाजपा के बड़े नेता सत्ता में रहते हुए भी मिलावट खोरों के साथ खड़े थे और आज विपक्ष में रहकर भी मिलावटखोरों का साथ निभा रहे हैं।

    अभय दुबे का कहना है कि कमलनाथ सरकार ने शुद्ध के लिए युद्ध अभियान में अब तक 89 व्यापारियों के विरुद्ध मिलावटखोरी के लिए एफआईआर दर्ज की है। 31 मिलावटखोरों पर रासुका के तहत कार्रवाई की गई है। पूरे प्रदेश में इस साल 19 जुलाई से 16 अक्टूबर तक दूध उत्पादनों एवं अन्य खाद्य पदार्थों, पान मसाला सहित कुछ 7425 नमूने जांच के लिए दिए गए हैं। इनमें से राज्य प्रयोगशालाओं और अन्य प्रयोगशालाओं से कुछ 2147 नमूनों की रिपोर्ट आई है। इनमें 666 अवमानक (कम गुणवत्ता के) पाए गए हैं। 163 मिथ्याछाप(दूसरे ब्रांड के) पाए गए हैं। 40 मिलावटी पाए गए हैं। 36 सुरक्षित पाए गए और 30 प्रतिबंधित पाए गए हैं।

    गौरतलब है कि राज्य सरकार के अभियान को समर्थन देने के लिए कई जिलों में खाद्य अधिकारियों ने फर्जी तरीके से रिपोर्ट बिगड़वाई और व्यापारियों के विरुद्ध रासुका की कार्रवाई की है। इसकी शिकायतें कई जिलों से आ रहीं हैं और प्रकरण अदालतों में लंबित पड़े हैं। कुछ प्रकरणों को हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है और कई अन्य विचाराधीन हैं। इस मुहिम की आड़ में सत्ता के दलालों ने व्यापारियों को धमका चमकाकर लाखों रुपए वसूले हैं। व्यापारियों के नमूने अवमानक बताने के लिए खाद्य विभाग के अफसर फर्जी रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं और पुलिस कार्रवाई के नाम पर व्यापारियों से लाखों रुपए ऐंठे जा रहे हैं। स्थानीय निकायों ने भी खाद्य सुरक्षा के नाम पर अपनी टीमें बना लीं हैं जो व्यापारियों से महीना वसूल रहीं हैं। राज्य सरकार की इस पाखंडपूर्ण कार्रवाई के बावजूद बाजार में नकली खाद्य सामग्रियां धड़ल्ले से बिक रहीं हैं और निर्दोष व्यापारियों को परेशान किया जा रहा है। सरकार की इस कार्रवाई पर लगाम लगाकर केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने साफ जाहिर कर दिया है कि राज्य सरकार की अन्यायपूर्ण गतिविधियों पर वह चुप्पी साधे नहीं रह सकती।

  • वृक्षारोपण अभियान की जांच करेगा ईओडब्ल्यू

    वृक्षारोपण अभियान की जांच करेगा ईओडब्ल्यू

    भोपाल 11 अक्टूबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। वन मंत्री उमंग सिंघार का कहना है कि मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता बटोरने की ललक के चलते राज्य सरकार के खजाने को 450 करोड़ का नुकसान पहुंचा था। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड में अपना नाम दर्ज कराने के चक्कर में शिवराज ने जुलाई 2017 में एक ही दिन में नर्मदा किनारे 7 करोड़ पौधे लगाने का फरमान सुनाया। अधिकारी मना करते रहे, लेकिन मुख्यमंत्री की सनक के सामने किसी की नहीं चली। 30 प्रतिशत पौधे भी नहीं लगे और बजट पूरा निकाल लिया गया। कमलनाथ सरकार ने अब इस पर सख्त कदम उठाते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और तत्कालीन वनमंत्री डॉ. गौरीशंकर शेजवार सहित 6 अधिकारियों के खिलाफ आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो में एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए हैं।

    प्रदेश के वनमंत्री उमंग सिंघार ने आज पत्रकार वार्ता में शिवराज सरकार पर लगने वाले आरोपों को लेकर आज ये खुलासा किया। उनका कहना है कि अधिकारियों के रोकने के बावजूद तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान गिनीज बुक में नाम दर्ज कराने एक दिन में 7 करोड़ 10 लाख 39 हजार 711 पौधे लगाने का कथित झूठा रिकॉर्ड बनाते रहे। मजेदार बात यह है कि इतने सारे पौधे 20 रुपए से 200 रुपए के दर पर खरीदना दिखाया गया। इनके लिए गड्ढे करना दिखाया गया और इनके रोपण खाद्य और पानी के नाम पर भी करोड़ों रुपए निकाले गए। सरकारी रिकॉर्ड में 1 लाख 21 हजार 275 स्थानों पर 7.10 करोड़ पौधों की घोषणा की गई जबकि गिनीज बुक वल्र्ड ऑफ रिकॉर्ड को बताया गया कि मात्र 5 हजार 540 स्थानों पर 2 करोड़ 22 लाख 28 हजार 954 पौधे ही लगाए गए। यानि 3 गुना भ्रष्टाचार तो पहले ही साफ दिखाई दे रहा है। वनमंत्री का दावा है कि मात्र 5 से 7 प्रतिशत पौधे ही लगे हैं।

    वनमंत्री ने पत्रकार वार्ता में कहा कि शिवराज कार्यकाल में हुए पौधा रोपण कार्यक्रम में वन विभाग के अधिकारी वनमंत्री को ही गलत जानकारियां दे रहे हैं। उन्होंने बताया कि बैतूल के शाहपुर परिक्षेत्र में वृक्षारोपण की जानकारी मांगने पर अधिकारियों ने बताया था कि 2 जुलाई 2017 को 15625 पौधे रोपे गए इनमें से 11 हजार 140 पौधे जीवित हैं। जबकि 27 जून 2019 को स्वयं वनमंत्री ने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ मौका मुआयना किया तो मौके पर मात्र 2343 पौधे ही जीवित मिले। इस स्थान पर पौधों के लिए गड्ढे भी मात्र 9 हजार 985 ही खोदे गए थे। उन्होनें कहा कि गलत जानकारी देने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा रही है।

    इस पूरे मामले में अतिरिक्त मुख्य सचिव स्तर के आईएएस अधिकारी एपी श्रीवास्तव की भूमिका को संदिग्ध बताया जा रहा है। जिस समय यह घोटाला हुआ तब वे प्रमुख सचिव वित्त थे। उन्होंने ही इस वृक्षारोपण अभियान के लिए वित्तीय अनुमतियां दीं थीं। वर्तमान में श्रीवास्तव वन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव हैं। वनमंत्री ने उन्हें ही नोटशीट लिखकर इस घोटाले की शिकायत ईओडब्ल्यू को करने के निर्देश दिए हैं। मंत्रालय में चर्चा है कि जिस अधिकारी ने स्वयं घोटाले की राशि जारी की है वह इसकी शिकायत कैसे कराएगा?

    सूत्रों के मुताबिक केन्द्रीय वन मंत्रालय से प्राप्त पांच सौ करोड़ रुपए की धनराशि को राज्य के अन्य विकास कार्यों पर भी खर्च किया गया था जबकि वृक्षारोपण अभियान वन विभाग के सामान्य बजट और कई निजी संस्थाओं के जन सहयोग से पूरा किया गया था। राज्य में पहली बार नर्मदा नदी के दोनों किनारों पर इतना बड़ा वृक्षारोपण अभियान चलाया गया था। ईओडब्ल्यू की जांच में ये साफ हो जाएगा कि बजट की धनराशि का किसी भी तरह दुरुपयोग नहीं किया गया था। वन विभाग की ही एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार इस अभियान में लगाए गए लगभग साठ फीसदी वृक्ष अभी भी जिंदा हैं और तीस फीसदी वृक्षारोपण हर अभियान में असफल होता ही है। ऐसे में केवल दस फीसदी वृक्षों के आंकड़ों के आधार पर रचा गया ये घोटाले का मायाजाल आगे चलकर कुछ अधिकारियों को निपटाने के साथ ही ठंडा पड़ जाएगा।

  • टेंडर होने तक पंचायतों की रेत मंडी जारी रहेगी

    टेंडर होने तक पंचायतों की रेत मंडी जारी रहेगी

    भोपाल,11 अक्टूबर(प्रेस सूचना केन्द्र)।खनिज साधन विभाग ने प्रदेश में रेत नियम-2019 के क्रियान्वयन की प्रक्रिया 43 जिलों में समूहवार शुरू की है। रेत खदानों की शुरू की गई निविदा प्रक्रिया की अंतिम तिथि 8 नवम्बर, 2019 निर्धारित की गई है। निविदाओं के बाद सफल उच्चतम बोली के निविदाकार को अपने जिले में रेत खदानों के संचालन की जिम्मेदारी दी जायेगी।तब तक रेत की सप्लाई पंचायतों से ही जारी रहेगी।

    राज्य शासन ने नई नीति के अनुसार जिले में रेत खदानों के संचालन के लिये सभी वैधानिक अनुमतियाँ प्राप्त करने में लगने वाले समय को देखते हुए निजी भूमि पर उपलब्ध रेत खदानों और ग्राम पंचायतों को हस्तांतरित रेत खदानों को पूर्व की भाँति निरंतर संचालित रखे जाने का निर्णय लिया है। जिन निजी भूमि एवं ग्राम पंचायतों की रेत खदानों को मानसून अवधि में प्रतिबंध लगने के पूर्व 30 जून, 2019 के पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त हो गई थी, ऐसी सभी खदानों को तत्काल संचालित करने के प्रस्ताव भेजने के निर्देश प्रमुख सचिव, खनिज साधन विभाग श्री नीरज मण्डलोई ने जिला कलेक्टर्स को दिये हैं।

    खनिज साधन मंत्री श्री प्रदीप जायसवाल ने बताया कि प्रदेश में नई नीति के अनुसार रेत खदानों की निविदा के लिये बड़ी संख्या में इच्छुक निविदाकार तैयारी कर रहे हैं। नई नीति से प्रदेश को रेत से 464 करोड़ रुपये के आरक्षित मूल्य से अधिक राजस्व प्राप्त होने की संभावना है। उन्होंने बताया कि प्रदेश में जन-सामान्य को रेत प्राप्त करने में दिक्कत न हो, इसे ध्यान में रखते हुए पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त निजी भूमि की रेत खदानों और ग्राम पंचायतों को हस्तांतरित रेत खदानों को चालू रखे जाने का निर्णय लिया गया है।

  • पंचायती राज में सुधार जरूरी बोले महामहिम

    पंचायती राज में सुधार जरूरी बोले महामहिम

    बदलते वैश्विक दौर में हस्तशिल्प और हथकरघा क्षेत्र का विकास चुनौतीपूर्ण

    भोपाल,10 अक्टूबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। राज्यपाल लालजी टंडन ने कहा है कि तेजी से बदलते वैश्विक दौर में हस्तशिल्प और हथकरघा क्षेत्र के विकास के लिये कार्य करना चुनौतीपूर्ण है। उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन हस्तशिल्प और हथकरघा पद्धति का विकास कर हम रोजगार के ज्यादा से ज्यादा अवसर निर्मित कर सकते हैं। बाजारवाद ने जिस तरह फिनिश माल की मांग बढ़ा दी है उस दौर में ग्रामीण उत्पादों की मार्केटिंग एक चुनौती है। राज्यपाल आज यहाँ हिन्दी भवन में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित त्रि-स्तरीय पंचायती राज प्रशिक्षण कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।

    राज्यपाल श्री टंडन ने कहा कि पंचायत राज व्यवस्था हमेशा से ग्रामीण विकास की धुरी रही है। हमारे देश के हस्तशिल्प और हथकरघा की दुनियाभर में विशिष्ट पहचान रही है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मशीनीकरण के दौर ने इन कलाओं के विकास को प्रभावित किया है। प्राचीन दौर में इन कलाओं के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों को उनके गाँव में ही रोजगार के अधिक से अधिक अवसर मिल जाते थे। राज्यपाल ने कहा कि देश की आदिवासी संस्कृति की समृद्धि के लिये निरंतर प्रयास करना भी जरूरी है।

    डॉ. बी.आर. अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय, महू की कुलपति प्रो. आशा शुक्ला ने कहा कि विश्वविद्यालय डॉ. अम्बेडकर के सपनों और आदर्शों को केन्द्र में रखकर निरंतर कार्य कर रहा है। उन्होंने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अधिक से अधिक अवसर निर्मित करने के लिये पंचायत प्रतिनिधियों को प्रशिक्षण दिये जाने की व्यवस्था की गई है। विश्वविद्यालय द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में हस्तशिल्प और हथकरघा के विकास के लिये जागरूकता कार्यक्रम भी चलाये जा रहे हैं। प्रो. शुक्ला ने बताया कि इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में रायसेन, सीहोर और भोपाल जिले के कारीगरों और पंचायत प्रतिनिधियों को प्रशिक्षण दिये जाने की व्यवस्था है। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय ने महू के पास 12 गाँव गोद लिये हैं, इन गाँवों में सामाजिक विकास के लिये जन-जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है।

    कार्यक्रम को साथिया वेलफेयर सोसायटी की निदेशक श्रीमती स्मृति शुक्ला और हस्तशिल्प विकास निगम के प्रतिनिधि श्री महेश गुलाटी ने भी संबोधित किया।

  • बीएसएनएल से मुक्ति का समय

    बीएसएनएल से मुक्ति का समय

    मुंबई 10 अक्टूबर,(प्रकाश बियाणी)। इण्डिया की तरह बीएसएनएल और एमटीएनएल सरकार के लिए गले की फ़ांस बन गई है. एयरटेल और वोडाफोन आइडिया जब जिओ के सामने हांफ रहे हैं तब वित्त मंत्रालय ने मान लिया है कि बीएसएनएल के उद्धार के लिए ७५ हजार करोड़ रुपए का निवेश नासमझी होगी. बीएसएनएल की वास्तविक परेशानी है कर्मचारियों की बहुतायत. वोडाफोन आयडिया करीब 9800 और एयरटेल करीब 8400 कर्मचारियों से कारोबार कर रही है वहीं बीएसएनएल के कर्मचारियों की संख्या है 1.60 लाख से भी ज्यादा है. जहाँ दूरसंचार क्षेत्र की निजी कम्पनियां की स्टाफ लागत 3 से 5 फीसदी है वहां बीएसएनएल इस मद पर खर्च कर रही है अपनी कुल कमाई का 75 फीसदी हिस्सा. यही नहीं, नए ग्राहकों को जोड़ने और प्रति यूजर कमाई के मामले में भी बीएसएनएल निजी दूरसंचार कम्पनियों से दौड़ में बहुत पीछे है. विगत तीन वर्षों में बीएसएनएल ने 2.2 करोड़ नए ग्राहक जोड़े जबकि जिओ ने 31.38 करोड़ और एयरटेल ने 6.19 करोड़. जिओ के 4जी ग्राहक प्रति यूजर औसतन खर्च कर रहे है 126 रुपए तो बीएसएनएल के २जी/३जी ग्राहक प्रति यूजर केवल 41 रुपया खर्च करते हैं. विडम्बना यह है कि बीएसएनएल सरकार से 2100 मेगा हर्ट्ज में 4जी स्पेक्ट्रम मांग रही है पर दूरसंचार मंत्रालय सुनवाई नहीं कर रहा है.

    2008 में यही हुआ था जिसने बीएसएनएल की दुर्दशा की है. बीएसएनएल ने तब 9.30 करोड़ सेल्युलर लाइन्स के लिए 50 हजार करोड़ रुपए का टेंडर जारी किया था. दुनिया के तब इस सबसे बड़े टेलिकॉम कॉन्ट्रैक्ट को लेकर टेलिकॉम उपकरण बनानेवाली कम्पनियों ने बीएसएनएल पर वेंडर सिलेक्शन में पक्षपात का आरोप लगाया. तकनीकी ग्राउंड पर इस कॉन्ट्रैक्ट को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में मुकदमा दायर हुआ और मेगा आर्डर केंसल हो गया. इसके साथ बीएसएनएल ने मार्केट लीडर होने का मौका खो दिया. 2007-08 में बीएसएनएल के पास 37 हजार करोड़ रुपए नगद थे तो आज इसका सकल घाटा हो गया है 90 हजार करोड़ रुपए. यही नहीं, मई 2019 में बीएसएनएल की 2जी ग्राहक मार्केट में हिस्सेदारी रह गई है 17.6 फीसदी जबकि भारतीय एयरटेल और वोडाफोन की क्रमश: हिस्सेदारी है 34.9 फीसदी और 47.5 फीसदी. इसी तरह ब्रांडबैंड मार्केट में बीएसएनएल की हिस्सेदारी है मात्र 3.7 फीसदी जबकि वोडाफोन आयडिया, भारती एयरटेल और मार्केट लीडर जिओ की हिस्सेदारी है क्रमश: 18.6, 20.4 और 55.6 फीसदी.

    बीएसएनएल के लिए सांत्वना की बात है कि इसके पास 7.5 लाख रूट कि.मी. का फायबर नेटवर्क है जिसके कारण कभी टेलिकॉम सेवा पर देश में इसका एकाधिकार था. दुर्भाग्य से आज यह साधारण लेंड लाइन फोन सेवा कम्पनी होकर रह गई है जिनकी संख्या भी मोबाईल की लोकप्रियता बढने के साथ लगातार घट रही है. संचार भवन के अकारण हस्तक्षेप, गैर जरूरी स्टाफ और उनका ग्राहक सेवा के प्रति एटीटयुड ने बीएसएनएल को सरकार के गले की फ़ांस बनाया है. टेलिकॉम उद्योग में जारी गला काट प्रतिस्पर्धा के चलते अब बीएसएनएल को उबारना सरकार के बूते की बात नहीं है.

  • सरकार को मिला पिट्ठू महापौर बिठाने का हक

    सरकार को मिला पिट्ठू महापौर बिठाने का हक

    देश के नीति निर्धारकों ने सत्ता की चाभी जनता को देने की मंशा से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 40 में राज्यों को पंचायतों का गठन करने का निर्देश दिया था। स्वर्गीय राजीव गांधी ने 1991 में संविधान में 73 वां संविधान संशोधन अधिनियम 1992 लाकर पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता दे दी। मध्यप्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायती राज को जोर शोर से लागू किया गया। दस सालों तक दिग्विजय सिंह की सरकार पंचायती राज का ढोल पीटती रही। इसमें गली के गुंडों को संवैधानिक पदों पर पहुंचा दिया गया। नतीजा ये निकला कि घनघोर अराजकता फैल गई और कुशासन के चलते कांग्रेस की सरकार को जनता ने घरों से निकलकर सत्ता से बाहर धकिया दिया। संवैधानिक व्यवस्था संभाल रही कार्यपालिका और पंचायती राज व्यवस्था में तीखा टकराव हुआ नतीजन पूरी अफसरशाही ने जनता के आक्रोश का नेतृत्व संभाल लिया। ये आक्रोश इतना अधिक था कि सत्ता में आने के बाद भाजपा की सरकारें तमाम खामियों के बावजूद पंद्रह सालों तक सत्ता में टिकी रहीं। लोग कांग्रेस को सत्ता में नहीं आने देना चाहते थे और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इसे अपनी लोकप्रियता बताकर प्रदेश की अर्थव्यवस्था चौपट करने वाली घोषणाएं करते रहे। लोकप्रियता बटोरने के फार्मूलों पर चलने वाली शिवराज सिंह चौहान सरकार की प्रशासनिक असफलताओं ने एक बार फिर करवट ली और अनमने भाव के बीच कांग्रेस को सत्ता की चाभी मिल गई। इस बार राजीव गांधी नहीं हैं और कांग्रेस अपनी गलतियों को दुहराना नहीं चाहती। इसलिए नगरीय निकाय चुनावों से पहले कमलनाथ सरकार ने जनता से महापौर चुनने का हक छीन लिया है।

    राज्यपाल महामहिम लालजी टंडन ने महापौर का चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से कराए जाने संबंधी सरकार के अध्यादेश को मंजूरी दे दी है। कमलनाथ का अनुमान है कि वे सत्ता के बल का इस्तेमाल करके आसानी से नगर निगमों में अपने पिट्ठू महापौर बिठा लेंगे। सरकार की मंत्रिपरिषद का फैसला है तो राज्यपाल को इसे मंजूरी देनी ही थी। भाजपा इस फैसले से सहमत नहीं है और भाजपा के दिग्गजों ने राज्यपाल से भेंटकर इस अध्यादेश के प्रति अपनी नाराजगी भी जताई थी। इस फैसले के पीछे काम कर रहे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने राज्यपाल पर दबाव बनाने के लिए बताते हैं राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा से बयान दिलवाया कि राज्यपाल को विधेयक पास करके अपने संवैधानिक दायित्वों का पालन करना चाहिए। इस सार्वजनिक बयान को लेकर राजभवन की नाराजगी की खबरों के बाद मुख्यमंत्री कमलनाथ स्वयं राज्यपाल महोदय से मिलने पहुंचे और कहा कि विवेक तनखा का बयान उनकी व्यक्तिगत राय है सरकार इससे इत्तेफाक नहीं रखती। एक तरह से सार्वजनिक माफीनामे के बाद राजभवन ने विधेयक को मंजूरी दे दी। जाहिर है कि कांग्रेस अब पंचायती राज जैसी गलती नहीं दुहराना चाहती है और वो चुने हुए जन प्रतिनिधियों के भरोसे बैठे रहने के बजाए अपने पिट्ठू नेताओं के माध्यम से शासन चलाना चाह रही है।

    दरअसल पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अब कमलनाथ सरकार में अपनी भूमिका का इस्तेमाल करके गलतियां सुधारने का प्रयास कर रहे है।वे राजनीति से सत्ता को मजबूत करने का फार्मूला तो पहले ही पा चुके हैं। अपने पुत्र जयवर्धन सिंह के माध्यम से वे प्रदेश के नगरीय ढांचे से प्रशासनिक धींगामुश्ती को पूरी तरह समाप्त करने का प्रयास कर रहे हैं। जयवर्धन सिंह नगरीय प्रशासन मंत्री हैं और कमलनाथ ने उन्हें वरद हस्त दे रखा है। भारत सरकार ने जबसे गांवों में जन सुविधाओं पहुंचाने के बजाए शहरीकरण की नीति पर जोर देना शुरु किया है तबसे नगरीय निकायों पर कब्जा जमाना सभी राजनीतिक दलों की ख्वाहिश बन चुकी है। भविष्य में नगरीय निकायों पर जिसका कब्जा होगा वही प्रदेश और देश की सत्ता पर काबिज हो सकेगा। कांग्रेस इसीलिए नगरीय निकायों में अपने पिट्ठू महापौर बिठाकर विकास की योजनाओं पर अपना नियंत्रण बनाना चाह रही है।

    केन्द्र से आने वाली अधिकतर योजनाओं की भी नोडल एजेंसी नगरीय निकाय होते हैं। इन सभी योजनाओं को मंजूरी के लिए महापौर की सहमति जरूरी होती है। नगरीय निकायों पर कब्जा जमाने की इस रणनीति से ठेकेदारों की पूरी लाबी सहमत है। सत्ता माफिया का रूप ले चुकी ये ताकतें जानती हैं कि यदि लोकतांत्रिक तरीके से नगरीय निकाय चलेंगे और निर्माण कार्यों के टेंडर खुलेआम सार्वजनिक मंच पर खोले जाएंगे तो फिर वे ठेके नहीं पा सकेंगे। यही वजह है कि जब दिग्विजय सिंह भोपाल से लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे तब यही ठेकेदारों की लाबी उनके समर्थन में भाजपा का साथ छोड़कर समर्थन दे रही थी। यदि जनता ने साध्वी प्रज्ञा को समर्थन देकर चुनाव न जिताया होता तो दिग्विजय सिंह एक सुपर मुख्यमंत्री के तौर पर सार्वजनिक मंच पर अपनी भूमिका निभाते देखे जाने लगते। हार के बाद वे पृष्ठभूमि में सक्रिय हैं और सरकार के फैसलों को प्रभावित कर रहे हैं।

    ऐसा नहीं कि सरकार के इस फैसले से अफसरशाही बहुत खुश है। कतिपय आला अफसर सत्ता पर पकड़ बनाती कांग्रेस के फैसलों से नाखुश हैं। उन्हें लगता है कि अभी जनता के फैसलों के नाम पर वे प्रमुख भूमिका निभा लेते थे। अब जबकि सरकार अपने पिट्ठू जनप्रतिनिधियों के माध्यम से फैसले लागू करेगी तब उनकी भूमिका में बड़ी कटौती हो जाएगी। जिस तरह भाजपा शासनकाल में व्यापमं के माध्यम से नौकरियों की भर्तियां कराए जाने से अफसरशाही के हाथों से बड़ा अधिकार छीन लिया गया था उसी तरह नगरीय निकायों पर कब्जा जमाकर कांग्रेस सभी निर्माण कार्यों पर अपनी पकड़ बना लेगी। वैसे सूत्र बताते हैं कि शिवराज सिंह चौहान का व्यापमं से भर्तियां कराने का फैसला भी पृष्ठभूमि में सक्रिय रहकर दिग्विजय सिंह ने ही करवाया था। अपने छोटे भाई लक्ष्मण सिंह और भाजपा के मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा के बीच तालमेल स्थापित करवाकर भर्तियों के अधिकारों का केन्द्रीकरण किया गया था।उसी सलाह का लाभ लेते हुए शिवराज सरकार पर भर्ती घोटाले के आरोप लगाए गए। अब सत्ता में आने के बाद कांग्रेस उस व्यापमं घोटाले का नाम भी नहीं लेना चाहती। कांग्रेस में सत्ता के विकेन्द्रीकरण की कवायद से उपजी हताशा की वजह से दिग्विजय सिंह सत्ता के केन्द्रीकरण के सबसे बड़े पैरवीकोर बन चुके हैं और कमलनाथ सरकार भी अब सत्ता के केन्द्रीकरण की ओर कदम बढ़ा रही है। नगरीय निकाय चुनावों के संदर्भ में लिया गया फैसला इसकी सबसे बड़ी नजीर बन गया है।

  • मंहगे बांस सस्ते में बेचने के लिए बरेजों को आड़ बनाया

    मंहगे बांस सस्ते में बेचने के लिए बरेजों को आड़ बनाया

    पान बरेजों के लिए निस्तार दर पर बांस मुहैया कराए जाएंगे

    मंत्रि-परिषद के निर्णय

    भोपाल,5 अक्टूबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। मुख्यमंत्री कमल नाथ की अध्यक्षता में आज मंत्रालय में हुई मंत्रि-परिषद की बैठक में सामाजिक सुरक्षा पेंशन भुगतान के लिए जिलों को 550 करोड़ 2 लाख रूपये की राशि स्वीकृत करने का निर्णय लिया गया। यह राशि राज्य स्तरीय निराश्रित निधि खाते से मासिक आवश्यकतानुसार आहरित कर सामाजिक सुरक्षा पेंशन का भुगतान किया जायेगा। आईटीसी के अगरबत्ती उद्योग को सरकारी जंगलों का बांस सस्ते भावों पर मुहैया कराने के लिए कमलनाथ सरकार ने पान बरेजों के लिए निस्तार दर पर बांस मुहैया कराने का फैसला लिया है। सूत्र बताते हैं कि पान बरेजों के नाम पर खरीदा जाने वाला बांस सीधे अगरबत्ती उद्योग को मुहैया कराए जाने की तैयारी की जा रही है।

    मंत्रि-परिषद ने प्रदेश में होटल, रिसॉर्ट और हेरिटेज होटल की स्थापना के लिए ब्रॉण्ड्स को आकर्षित और प्रोत्साहित करने के लिए सतत् अनुदान उपलब्ध कराने की ब्रॉण्डेड होटल प्रोत्साहन नीति-2019 का अनुमोदन किया। ब्रॉण्ड्स को प्रदेश में स्थापित होने वाली परियोजनाओं की संभावनाओं को देखते हुए ब्रॉण्ड हॉटल्स, ब्रॉण्ड रिसॉर्टस और ब्रॉण्ड हेरिटेज हॉटल्स श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है।

    मध्यप्रदेश देश का पहला राज्य है, जिसने ब्राण्ड हॉटल्स की स्थापना पर इस तरह की नीति बनाई है। अनुमान है कि इस नीति से प्रदेश में अगले 5 वर्षों में ब्राण्ड हॉटल्स में कम से कम एक हजार लग्जरी और विश्व-स्तरीय नवीन कक्ष स्थापित हो सकेंगे। न्यूनतम 100 करोड़ रुपये अथवा उससे अधिक के निवेश से नवीन ब्राण्ड होटल की स्थापना पर उनके द्वारा होटल कक्षों के किराये से प्राप्त वार्षिक टर्न ओवर पर नीति अंतर्गत 3 वर्ष तक 20 से 30 प्रतिशत तक अनुदान दिया जायेगा। अनुदान की अधिकतम सीमा 3 करोड़ रुपये होगी। इसी प्रकार, ब्रॉण्ड रिसॉर्ट एवं ब्रॉण्ड हेरिटेज होटल को 3 वर्षों तक प्रतिवर्ष 2 करोड़ रुपये तक संचालन अनुदान दिया जायेगा। ब्रॉण्ड होटल को दिये जाने वाला यह अनुदान उन्हें नीति के तहत प्राप्त होने वाले पूँजी अनुदान के अतिरिक्त होगा।

    प्रदेश सरकार के पर्यटन विकास के लक्ष्यों की पूर्ति के लिए मंत्रि-परिषद ने पर्यटन नीति-2016 को सक्षम, व्यवहारिक, व्यापक और पूंजी निवेश के अनुकूल बनाने के लिए प्रावधानित संशोधन को अनुमोदन प्रदान कर दिया। बैठक में मार्ग सुविधा केन्द्रों (वे-साईड एमेनिटीज) की स्थापना एवं संचालन की नीति 2016 में संशोधन का अनुमोदन किया गया। इसके अंतर्गत मध्यप्रदेश पर्यटन विकास निगम द्वारा पूरे प्रदेश में रोड नेटवर्क एवं यात्री सुविधाओं की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए मार्ग सुविधा केन्द्रों की स्थापना को प्रोत्साहित किया जाएगा। साथ ही, संभावित स्थलों और तैयार ब्राउन-फील्ड मार्ग सुविधा केन्द्रों का प्रचार-प्रसार किया जाएगा, ताकि निवेश का वातावरण तैयार हो।

    मंत्रि-परिषद ने आवास एवं पर्यावास नीति 2007 की कंडिका क्रमांक 5.4 को विलोपित करने का निर्णय लिया। इसमें निवेश के क्षेत्रों में भूखण्डीय विकास के लिए भूमि अथवा भू-खण्ड का क्षेत्रफल दो हेक्टेयर रखे जाने का प्रावधान था। इस कारण न्यूनतम दो हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता निर्मित होने से छोटी भूमि अनुपयोगी रह जाती थी। ऐसे क्षेत्रों में अवैध कॉलोनियाँ विकसित होने की संभावनाएँ बढ़ जाने से विकास की निरंतरता भी बाधित हो रही थी।

    रिसॉर्ट बार लायसेंस का सरलीकरण

    मंत्रि-परिषद ने राज्य के वन क्षेत्रों में पर्यटन को प्रोत्साहन देने के लिए रिसॉर्ट बार लायसेंस का सरलीकरण करने का निर्णय लिया। इसमें राष्ट्रीय उद्यानों के अतिरिक्त वन अभयारण्य के पास भी रिसॉर्ट बार लायसेंस की सुविधा दी जाएगी। रिसॉर्ट बार राष्ट्रीय उद्यान/अभयारण्यों की सीमा से 20 किलोमीटर की सीमा में स्थित होना चाहिए। रिसॉर्ट में दस कमरों के स्थान पर न्यूनतम पाँच कमरों का प्रावधान किया गया। रिसॉर्ट बार के लिए न्यूनतम क्षेत्र 2 हेक्टेयर को घटाकर एक एकड़ करने का निर्णय लिया गया। वन्य क्षेत्रों में स्थित रिसॉर्ट बार के लिए वार्षिक लायसेंस फीस पाँच कमरे के लिए 50 हजार, 6 से 10 कमरे के लिए एक लाख और 10 से अधिक कमरे वाले रिसॉर्ट के लिए डेढ़ लाख रूपये करने का निर्णय लिया गया है। सभी बार लायसेंसों की स्वीकृति और नवीनीकरण के प्रकरणों में अग्नि सुरक्षा संबंधी व्यवस्था के संबंध में निर्धारित प्रमाण-पत्र के स्थान पर जिला आबकारी अधिकारी तथा संबंधित रिसॉर्ट बार अनुज्ञप्तिधारी के संयुक्त हस्ताक्षर से रिपोर्ट ली जाएगी।

    मंत्रि-परिषद ने पान किसानों/पान बरेजा परिवारों को निस्तार दर पर बाँस उपलब्ध कराने का निर्णय लिया। वन विभाग द्वारा जारी आदेश को 10 मार्च 2019 से ही पान बरेजा परिवारों की निस्तार नीति में शामिल करते हुए कार्योत्तर अनुमोदन प्रदान किया गया। संशोधित निस्तार नीति वर्ष-2019 का भी अनुमोदन किया गया।

    मंत्रि-परिषद ने भारतीय पुलिस सेवा (संवर्ग) नियम के अनुसार 31 अक्टूबर,2019 तक की अवधि के लिए पुलिस महानिदेशक ग्रेड में एक पद निर्मित करने का निर्णय लिया। इसी के साथ, संविदा आधार पर निरंतर किए गए कोर्ट मैनेजर का कार्यकाल 31 मार्च 2020 तक अथवा नियमित कोर्ट मैनेजर के पदों पर भर्ती होने तक, जो भी पहले हो, इस शर्त के साथ अंतिम बार निरंतर करने का निर्णय लिया गया। मंत्रि-परिषद ने मुंबई स्थित मध्यालोक भवन का संचालन एवं संधारण मध्यप्रदेश राज्य पर्यटन विकास निगम को सौंपने का भी निर्णय लिया।