Month: April 2019

  • भगवा को आतंकवादी बताने वाले दिग्विजय सिंह अब खुद के हिंदू होने के प्रमाणपत्र बंटवाने लगे

    भगवा को आतंकवादी बताने वाले दिग्विजय सिंह अब खुद के हिंदू होने के प्रमाणपत्र बंटवाने लगे

    भोपाल,29 अप्रैल (प्रेस सूचना केन्द्र)।भाजपा की लोकसभा प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा के खिलाफ षड़यंत्र करके भगवा को आतंकवादी बताने वाले दिग्विजय सिंह अब खुद के हिंदू होने के प्रमाणपत्र बंटवा रहे हैं। जैसे जैसे मतदान की तारीख नजदीक आ रही है उन्होंने साधु संतों की फौज सड़कों पर उतार दी है जो लोगों को कांग्रेस प्रत्याशी दिग्विजय सिंह के हिंदू होने के प्रमाण पत्र बांट रहे हैं। आज ऐसे ही एक कथित महामंडलेश्वर को पत्रकारों के तीखे सवालों ने ऐसे झमेले में डाल दिया कि वे पहले तो पांच क्विंटल मिर्ची से यज्ञ करने फिर समाधि लेने की धमकी देने लग गए।

    कांग्रेस प्रवक्ता फिरोज सिद्दीकि के साथ एक होटल में पत्रकार वार्ता आयोजित करने वाले इस साधु स्वामी बैराग्यानांद ने खुद को निरंजनी अखाड़े के महामंडलेश्वर बताया और कहा कि मैं दिग्विजय सिंह की जीत की गारंटी लेकर आया हूं । अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए मैं पांच क्विंटल मिर्च से यज्ञ करूंगा, और उनकी जीत के लिए समाधि भी लगाऊंगा।पत्रकारों ने उनसे पूछा था कि वे भगवा आतंकवाद की परिभाषा रचकर हिंदुओं को बदनाम करने वाले कांग्रेस के दिग्विजय सिंह की पैरवी क्यों कर रहे हैं। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि नर्मदा की परिक्रमा करके दिग्विजय सिंह खुद को हिंदू साबित कर दिया है।

    पत्रकारों ने सवाल किया कि जो व्यक्ति सत्ता में रहकर साध्वी उमा भारती के बारे में अनर्गल प्रलाप करता था, साध्वी प्रज्ञा को भगवा आतंकवाद की कहानी में प्रताड़ना दिलवाता रहा आप उसकी पैरवी क्यों कर रहे हैं। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि जगतगुरु स्वामी स्वरूपानंद ने अपना आशीर्वाद देकर उन्हें धर्म की सेवा में लगाया है इसलिए बीस हजार साधू घर घर जाकर दिग्विजय सिंह की जीत के लिए वोट मांगेंगे।

    कांग्रेस प्रत्याशी की पैरवी करते हुए बैराग्यानंद अपना आपा खो बैठे और पत्रकारों पर ही अनर्गल आरोप लगाने लगे इस पर कई पत्रकार उखड़ गए और उन्होंने कहा कि हम चुनाव में कोई पार्टी नहीं हैं जो आप हमसे ही सवाल कर रहे हैं। इस बीच कई पत्रकारों से उनका विवाद होने लगा और संचालन कर रहे कांग्रेस प्रवक्ता फिरोज सिद्दीकि ने पत्रकार वार्ता समाप्त कर दी।

  • करकरे का माफिया कनेक्शन मुझे नहीं मालूम बोले त्रिपाठी

    करकरे का माफिया कनेक्शन मुझे नहीं मालूम बोले त्रिपाठी

    भोपाल,28 अप्रैल(प्रेस सूचना केन्द्र)।मध्यप्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक और बहुजन समाज पार्टी के नेता रहे आईपीएस सुभाष चंद्र त्रिपाठी ने कहा है कि उन्हें मुंबई के 2611/2013 को हुए हमले में असमय काल कवलित हुए हेमंत करकरे के माफिया कनेक्शन के बारे में कोई जानकारी नहीं है। वे तो सिर्फ इतना जानते हैं कि ड्यूटी के दौरान वे आतंकवादी की गोलियों से मारे गए थे और भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया था। इसी वजह से जब उन्होंने सुना कि भोपाल से भाजपा की ओर से लोकसभा प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा ने करकरे पर निर्दोष लोगों को झूठे मामलों में फंसाने वाला बताया है तो उन्होंने अपने साथियों से साथ मिलकर बयान की निंदा की।

    नशा माफिया और डाकू गिरोहों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के लिए मुस्तैद माने जाने वाले एस.सी.त्रिपाठी ने एक मुलाकात में बताया कि हेमंत करकरे ने अपना कर्तव्य निभाते हुए मुंबई हमले के दौरान मोर्चा संभाला था जहां उन्हें गोलियां लगीं थीं। जिन हालात में करकरे आगे आए थे वो निश्चय ही सराहनीय कदम था। हम इस मुद्दे पर और ज्यादा पहलुओं पर बात करके अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहते।

    मध्यप्रदेश में नशे की आवक के लिए दोषी पुलिस वालों पर कड़ी कार्रवाई कर चुके श्री त्रिपाठी से पूछा गया मुंबई में नशे का कारोबार करने वाला माफिया आखिर किसके संरक्षण में पनपा। करकरे की टीम ने जिन 75 के करीब एनकाऊंटर में अपराधियों को मारा उनमें दाऊद गेंग का एक भी नहीं था, सभी अरुण गवली या राजन गैंग के थे। इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि पुलिस ने ये कार्रवाई क्यों की इसके बारे में तो मुंबई एटीएस ही बता सकती है।

    देश के स्तर पर आईपीएस एसोसिएशन ने वर्दीधारी की मौत पर निंदा प्रस्ताव पारित किया पर मध्यप्रदेश के आईपीएस इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोल रहे हैं। ये जवाबदारी चंद सेवा निवृत्त आईपीएस ही क्यों निभा रहे हैं ये पूछा जाने पर उन्होंने कहा कि हम सिर्फ देश के लिए जान न्यौछावर करने वाले करकरे की बात कर रहे हैं, हमें उनके पुराने कामकाज के बारे में कुछ नहीं कहना। देश के स्तर पर जो लोग सवाल उठा रहे हैं उनका पक्ष वे ही बता सकते हैं।

    जब उनसे पूछा गया कि साध्वी प्रज्ञा ने खुद को प्रताड़ित किए जाने की बात कहते हुए हेमंत करकरे को इसके लिए दोषी बताया था तो उन्होंने कहा कि ये आरोप अदालत में साबित नहीं हुए हैं। उन्होंने कहा कि कई बार यदि प्रताड़ना की बात ठीक तरह से उठाई जाती है तो अदालत में दोषियों को सजा तक मिलती है। इस मुद्दे पर अदालत के सामने साक्ष्य नहीं आ पाए तो इसके लिए करकरे को दोषी कैसे माना जा सकता है।

    हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि देश में रुपए के लेनदेन पर कड़ी निगाह रखी जाती है इसके बावजूद चुनाव आयोग की निगरानी में काला धन बरामद हो रहा है जो जाहिर करता है कि देश की व्यवस्था में कोई लीकेज जरूर है। पुलिस के भी कई अफसर आपराधिक गतिविधियों में संलग्न रहते हैं पर इसके लिए पूरी पुलिस फोर्स को तो दोषी नहीं ठहराया जा सकता। हम सिर्फ यही कहना चाहते हैं।

    साध्वी प्रज्ञा के आरोपों के बारे में उन्होंने कहा कि इससे ऐसा लग रहा है कि भारत में कानून का राज नहीं है। भारत एक बनाना इस्टेट बनकर रह गया है।सच्चाई ये है कि एनआईए की अदालत ने मालेगांव बम कांड के आरोपियों से मकोका हटाया है पर साध्वी प्रज्ञा और उनके सहयोगियों पर मुकदमा तो चलाया ही जा रहा है।वे बेदाग साबित होती हैं या नहीं ये भविष्य के गर्त में है।करकरे का पक्ष उनकी दस्तावेजी कार्रवाई से ही समझा जा सकता है।अदालत के फैसले से भी समझा जा सकता है कि चूक कहां हुई।

  • नए जूते पहिनकर परिवारवाद को कुचलने चलीं साध्वी प्रज्ञा

    नए जूते पहिनकर परिवारवाद को कुचलने चलीं साध्वी प्रज्ञा

    -आलोक सिंघई-

    आमचुनाव में साध्वी प्रज्ञा का नाम आते ही पूरे देश में एक बहस छिड़ गई है। मालेगांव बम धमाके को साम्प्रदायिक रंग देने के लिए जिस तरह से भगवा आतंकवाद की कहानी गढ़ी गई वो परिवारवाद को बचाए रखने के षड़यंत्रों का जीवंत दस्तावेज बन गई है। जिन जिन देशों में परिवारवाद ने सत्ता को अपने घर की चेरी बनाया उन सभी देशों में बाद में तानाशाही का नृशंस तांडव देखने मिला है। पीड़ित और शोषित जनता ने जब उस तानाशाही को कुचला तब जाकर वे देश विकास की सीढ़ियां चढ़ने में कामयाब हुए। साध्वी प्रज्ञा के माध्यम से मोदी सरकार ने उसी जनांदोलन का आव्हान किया है जो परिवारवाद और उसके पापों से देश को निजात दिला सकता है। भाजपा का ये प्रयास कई स्थानों पर तल्ख रूप में भी सामने आया है। पार्टी ने अपने ही कई दिग्गजों के टिकिट काट दिए और नए चेहरों को चुनावी समर में उतारा है। इस बदलाव ने भाजपा के भीतर ही घमासान मचा दिया है। चुनावी टिकिट की मारामारी में इसे मोदी शाह की हेकड़ी बताने का प्रयास किया गया, जबकि नई पीढ़ी के आम मतदाता इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं।

    परिवारवाद, वंशवाद,यारवाद, पैसावाद जैसे शब्द गढ़ने वाले छद्म बुद्धिजीवी केवल किसी परिवार विशेष के सदस्यों को राजनीति में उतारे जाने पर ह्ल्ला मचाते हैं। वे इसके असर और उसके पापों पर चर्चा नहीं करते। यही वजह है कि परिवारवाद का हल्ला तो मचता है लेकिन उससे मुक्ति दिलाने की राह नहीं दिखती। वो कारण भी नहीं समझ आते जो परिवारवाद के लिए खाद पानी का काम करते हैं। नेहरू गांधी परिवार को देश की समस्याओं की जड़ माना जाता है। भारत में 55 वर्षों तक इसी परिवार का शासन रहा है।इसे बनाए रखने के लिए उसके कारिंदों ने तरह तरह के पाप किए। रियासतों, खानदानों को गरीबी दूर करने के नाम पर लूटा। परिवारवाद के खिलाफ अलख जगाने वालों को देशद्रोही बताकर जेलों में सड़ने के लिए मजबूर कर दिया। आज जब इस परिवारवाद के खिलाफ आवाज बुलंद हो रही है तब इस परिवार की जेबी संस्था बन चुकी कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में देशद्रोह कानून को समाप्त करने का वादा किया है। उन कानूनी प्रावधानों को हटाने की बात कही जा रही है जो देश की सेना को कवच प्रदान करते हैं। ये इसलिए हो रहा है क्योंकि मौजूदा सरकार इसी के सहारे कश्मीर में वंशवाद की बेल को काट रही है।

    साध्वी प्रज्ञा एक राष्ट्रवादी परिवार की बेटी हैं। उनके पिता डाक्टर के रूप में जनसेवा करते थे। बचपन से समाजसेवा के संस्कार मिले तो लोगों को करीब से देखने का मौका मिला। जनता को परेशान करने वाले गुंडों से लड़कर उन्होंने जाना कि सरकारें किस तरह असामाजिक तत्वों को प्रश्रय देती हैं। बस यहीं से उनकी राह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर मुड़ गईं। देश को परिवार मानने वालों की ये जमात जगह जगह अपना प्रभाव बढ़ा रही थी। इस पर अंकुश लगाने के लिए इसके उभरते चेहरों पर धब्बे लगाना परिवारवाद की सूची में शामिल था। वर्ष 2002 में जब शिवसेना सुप्रीमो बाला साहब ठाकरे ने पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई की साजिशों से बढ़ती आतंकवादी घटनाओं के खिलाफ हिंदुओं के आत्मघाती दस्तों को तैयार करने का आव्हान किया तो भारत की जांच एजेंसियों ने संभावित घटनाओं पर निगाह रखने के लिए एक अनुसंधान विंग तैयार की थी। इस विंग का उद्देश्य था कि इसकी आड़ में कोई आपराधिक साजिशें न आकार लेने लगें। कहा गया कि मुंबई के सीरियल बमकांड की वजह से 1993 के बाद से एटीएस और एनआईए ने इन अनुसंधानों में महारथ हासिल कर लिया था। यही एक वजह थी कि हेमंत करकरे और उनके सहयोगियों को काम करने की बहुत आजादी मिली। बाद में इसी आजादी का दुरुपयोग आर्थिक साम्राज्य खड़ा करने के लिए किया जाने लगा।

    केन्द्रीय गृहमंत्री रहे सुशील कुमार शिंदे इस सारी कवायद से वाकिफ थे। इस छानबीन की जानकारी के आधार पर दुबई,यूएई के कारोबारियों से भी उनका गहरा संबंध स्थापित हो चुका था।गांधी परिवार के विश्वस्त होने के नाते दिग्विजय सिंह भी उनके करीब आ चुके थे। सूत्र बताते हैं कि जब रिलाइंस पेट्रोकेमिकल्स बाजार से पूंजी उठा रही थी तब दिग्विजय सिंह ने भी उसमें बड़ा निवेश किया था। बाद में गांधी परिवार के हस्तक्षेप के कारण ये कारोबार ठप हो गया और सभी निवेशकों को भारी घाटा उठाना पड़ा। इस प्रक्रिया में दिग्विजय सिंह भी तेल लाबी के नजदीक आ चुके थे। भारत में तेल की खपत बढ़ाने के लिए राजीव गांधी की सरकार ने सार्वजनिक परिवहन की जगह कार बाजार को संरक्षण देना शुरु कर दिया था। ये नीतियां जारी रहें इसके लिए लोगों को आपसी तू तू मैं मैं में उलझाना जरूरी था। बताते हैं कि इसी षड़यंत्र के तहत देश में कई स्थानों पर कम प्रहारक क्षमता वाले बम धमाके किए गए। इसे हिंदू मुस्लिम रंग देने के लिए ही मालेगांव में नमाज पढ़ने जाते मुसलमानों के बीच बम फोड़ा गया।

    दिग्विजय सिंह अपने मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल में साध्वी प्रज्ञा की जांबाजी के किस्से सुन चुके थे। प्रज्ञा से जुड़े सहयोगी संगठनों पर जांच एजेंसियों की निगाह रखे जाने के कारण वे उस नेटवर्क से भी परिचित थे। यही वजह थी कि मालेगांव बम धमाके में हिंदू संगठनों की संलिप्तता दिखाने के लिए साध्वी को आरोपी बनाया गया। प्रताड़ना के बाद उन्हें अपना गवाह बनाकर भगवा आतंकवाद की कहानी को साबित करने का प्रयास भी किया गया। हालांकि इन सबसे डटकर मुकाबला करती हुई साध्वी प्रज्ञा साफ बाहर आ गईं। हेमंत करकरे की मौत के बाद एनआईए को एटीएस की जांच की असलियत मालूम पड़ गई थी।

    आज जब साध्वी प्रज्ञा भोपाल लोकसभा सीट से दिग्विजय सिंह के विरुद्ध मैदान में हैं तब परिवारवाद को बचाने के लिए किए जाने वाले षड़यंत्रों पर गौर किया जाना जरूरी है। परिवारवाद की आड़ में कैसे कैसे आर्थिक षड़यंत्र चलते हैं इन पर गौर करना भी जरूरी है। आपके आसपास ऐसे लोग भरे पड़े हैं जो अनैतिक साधनों का इस्तेमाल करते हुए परिवार को समृद्ध बनाने में जुटे रहते हैं। जो समाज के संसाधनों का उपयोग तो बेशर्मी से करते हैं पर उसे संवारने के लिए कोई प्रयास सफल नहीं होने देते। खुद दिग्विजय सिंह ने गांधी परिवार की तरह अपनी विरासत को संवारने के लिए कैसे सार्वजनिक व्यवस्थाओं को चौपट किया इसकी मिसाल उनके शासनकाल में देखी गई थी। आज भी उनके परिवार के सदस्य राजनीति के मैदान में हैं। हेमंत करकरे के सुपुत्र और दिग्विजय सिंह के सुपुत्र के बीच मित्रता के आधार क्या हैं इसे परखने के लिए किसी को दूर जाने की आवश्यकता नहीं हैं। परिवारवाद के षड़यंत्रों की तो कड़ी हर क्षेत्र में मौजूद है लेकिन राष्ट्रवाद के बहाने इन षड़यंत्रों का खुलासा होना और उन्हें धराशायी करने का ये अवसर भारत में पहली बार आया है।

    दिग्विजय सिंह को मध्यप्रदेश की जनता ने जनक्रांति के माध्यम से हराया था। एक बार फिर जब दिग्विजय सिंह परिवारवाद के शीर्ष पर पहुंचने का जतन कर रहे हैं तब मोदी सरकार ने परिवारवादी षड़यंत्रों की प्रताड़ना झेल चुकी साध्वी प्रज्ञा को मैदान में उतारा है। भोपाल के लोगों को तय करना है कि वे परिवारवाद को संरक्षण देना चाहते हैं या फिर राष्ट्रवाद को। यूं तो सारे देश में ये माडल एक समान रूप से लागू होता है पर भोपाल में इसकी अग्निपरीक्षा हो रही है और साध्वी प्रज्ञा ने नए जूते पहिनकर इससे निपटने की तैयारी कर ली है।

  • हिंदुत्व की नई परिभाषा में है सच्चा राष्ट्रवाद

    हिंदुत्व की नई परिभाषा में है सच्चा राष्ट्रवाद

    डॉ. वेदप्रताप वैदिक

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत ने मध्यप्रदेश यात्रा के दौरान ऐसा बयान दे दिया है, जो हिंदुत्व शब्द की परिभाषा ही बदल सकता है। अभी तक भारत में हिंदू किसे कहा जाता है और अहिंदू किसे? पहले अहिंदू को जानें। जो धर्म भारत के बाहर पैदा हुए, वे अहिंदू यानी ईसाई, इस्लाम, पारसी, यहूदी आदि! जो धर्म भारत में पैदा हुए, वे हिंदू यानी वैदिक, पौराणिक, वैष्णव, शैव, शाक्त, जैन, बौद्ध, सिख, आर्यसमाजी, ब्रह्म समाजी आदि। इन तथाकथित हिंदू धर्म की शाखाओं में चाहे जितना भी परस्पर सैद्धांतिक विरोध हो, उन सब को एक ही छत्र के नीचे स्वीकार किया जाता है। हिंदू-अहिंदू तय करने के लिए किसी सिद्धांत की जरूरत नहीं है। इस निर्णय का आधार सैद्धांतिक नहीं, भौगोलिक है।

    इसे ही आधार मानकर विनायक दामोदर सावरकर ने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘हिंदुत्व’ लिखा था। ‘हिंदुत्व’ की विचारधारा ने ही हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जन्म दिया था। सावरकरजी की मान्यता थी कि जिस व्यक्ति का ‘पुण्यभू’ और ‘पितृभू’ भारत में हो, वही हिंदू है। यानी जिसका पूजा-स्थल, तीर्थ, देवी-देवता, पैगंबर, मसीहा, पवित्र ग्रंथ आदि भारत के बाहर के हों, उसका पुण्यभू भी बाहर ही होगा। उसे आप हिंदू नहीं कह सकते चाहे भारत उसकी पितृभूमि हो यानी उसके पुरखों का जन्म स्थान हो। कोई भारत में पैदा हुआ है लेकिन, उसकी पुण्यभूमि मक्का-मदीना, यरुशलम, रोम या मशद है तो वह खुद को हिंदू कैसे कह सकता है? सावरकरजी की हिंदू की यह परिभाषा उस समय काफी लोकप्रिय हुई, क्योंकि उस समय मुस्लिम लीग का जन्म हो चुका था और इस्लाम के नाम पर अलग राष्ट्र की मांग जोर पकड़ने लगी थी। सावरकर का हिंदुत्व उस समय राष्ट्रवाद का पर्याय-सा बन गया था और लोग समझ रहे थे कि लीगी सांप्रदायिकता का यही करारा जवाब है। स्वयं सावकर ने भारत के आज़ाद होने के 15-20 साल बाद अपने अभिमत पर पुनर्विचार किया था।

    लेकिन संघ-प्रमुख मोहन भागवत ने ‘पुण्यभू’ की छूट देकर ‘हिंदू’ शब्द की परिभाषा को अधिक उदार बना दिया है। उन्होंने बैतूल के भाषण में कहा कि हिंदुस्तान में रहने वाला हर नागरिक उसी तरह हिंदू कहलाएगा, जैसे अमेरिका में रहने वाला हर नागरिक अमेरिकी कहलाता है, उसका धर्म चाहे जो हो। उनके इस तर्क को थोड़ा आगे बढ़ाएं तो यहां तक जा सकता है कि किसी नागरिक के पुरखे या वह स्वयं भी चाहे किसी अन्य देश में पैदा हुआ हो, यदि उसे नागरिकता मिल जाए तो वह खुद को अमेरिकी घोषित कर सकता है। यानी किसी के हिंदू होने में न धर्म आगे आएगा और न ही उसके और उसके पुरखों का जन्म-स्थल। यानी ‘पुण्यभू’ के साथ ‘पितृभू’ की शर्त भी उड़ गई। सैद्धांतिक और भौगोलिक दोनों ही आधार इस नई परिभाषा के कारण पतले पड़ गए।

    यूं भी हिंदू शब्द तो शुद्ध भौगोलिक ही था। यह सिंधु का अपभ्रंश है। सिंध से ही हिंद बना है। प्राचीन फारसी में ‘स’ को ‘ह’ बोला जाता था, जैसे सप्ताह को हफ्ता! सिंध का हिंद हो गया। स्थान का स्तान हो गया। हिंद और स्तान मिलकर ‘हिंदुस्तान’ बन गया। हिंद से ही ‘हिंदू’, ‘हिंदी’, ‘हिंदवी’, ‘हुन्दू’, ‘हन्दू’, ‘इंदू’, ‘इंडीज’, ‘इंडिया’ और ‘इंडियन’ आदि शब्द निकले हैं। विदेशियों के लिए हिंदू शब्द भारतीय का पर्याय है। जब मैं पहली बार चीन गया तो चीन के विद्वान और नेता मुझे ‘इंदुरैन’ ‘इंदुरैन’ बोलते थे। यों तो भारत का प्राचीन नाम आर्यावर्त या भारत या भरतखंड ही है। मैंने वेदों, दर्शनशास्त्रों, उपनिषदों, आरण्यकों, रामायण, महाभारत या गीता में कहीं भी हिंदू शब्द कभी नहीं देखा। इस शब्द का प्रयोग तुर्की, पठानों और मुगलों ने पहले-पहल किया। वे सिंधु नदी पार करके भारत आए थे, इसलिए उन्होंने इस सिंधु-पर क्षेत्र को हिंदू कह दिया।

    भारतीयों ने विदेशियों या मुसलमानों द्वारा दिए गए इस शब्द को स्वीकार कर लिया, क्या यह हमारी उदारता नहीं है? ऐसे में विदेशी मज़हबों के मानने वालों को अपना कहने में हमें एतराज क्यों होना चाहिए? यदि इस देश में भारत के 20-22 करोड़ लोगों को हम अपने से अलग मानेंगे तो हम खुद को राष्ट्रवादी कैसे कहेंगे? इस देश को हम मजहब के आधार पर बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक में बांट देंगे। हम राष्ट्रवादी नहीं होंगे बल्कि जिन्नावादी होंगे। दुनिया में पाकिस्तान ही एक मात्र देश है, जो मजहब के आधार पर बना है। पाकिस्तान की ज्यादातर परेशानियों का कारण भी यही है। भारत का निर्माण या अस्तित्व किसी धर्म, संप्रदाय, मजहब, वंशवाद या जाति के आधार पर नहीं हुआ है। इसीलिए इसे सिर्फ ‘हिंदुओं’ का देश नहीं कहा जा सकता है। हां, इस अर्थ में यह हिंदुओं का देश जरूर है कि जो भी यहां का बाशिंदा है, वह हिंदू है। मोहन भागवत का मंतव्य यही है। यह मंतव्य अत्यंत पवित्र है, क्योंकि यह ‘हम’ और ‘तुम’ के भेद को खत्म करता है। ‘हिंदू’ की इस परिभाषा से सहमत होने का अर्थ है, सभी पूजा-पद्धतियों को स्वीकार करना। गांधीजी इसे ही सर्वधर्म समभाव कहते थे। इसे आधार बनाएं तो फिर राष्ट्रवादिता से कोई भी अछूता नहीं रह सकता। इसी दृष्टि से मैं अपने अभिन्न मित्र और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक स्व. कुप्प सी. सुदर्शन से कहा करता था कि भारत के मुसलमानों को राष्ट्रवादी धारा से जोड़ना बेहद जरूरी है। मुझे खुशी है कि राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के जरिए वही काम आज हो रहा है। यह कितनी अद्‌भुत बात है कि यह मंच तीन तलाक का विरोध कर रहा है और मुस्लिम समाज में अनेक सुधारों की पहल भी कर रहा है। ऐसी पहल सभी धर्मों में क्यों नहीं होती?

    यह इतिहास का एक बड़ा सत्य है और अकाट्य है कि किसी भी विचारधारा या सिद्धांत या धर्म का जन्म चाहे जिस देश में हुआ हो, उसके मानने वालों पर ज्यादा प्रभाव उनके अपने देश की परंपरा का ही होता है। इसी आधार पर दुबई के अपने एक भाषण में अरब श्रोताओं के बीच मैंने यह बात डंके की चोट पर कह दी थी कि भारत का मुसलमान दुनिया का श्रेष्ठतम मुसलमान है, क्योंकि भारत की हजारों साल की परम्परा उसकी रगों में बह रही है। बादशाह खान ने अब से लगभग 50 साल पहले मुझे काबुल में कहा था कि मैं पाकिस्तानी तो पिछले 19-20 साल से हूं, मुसलमान तो मैं हजार साल से हूं, बौद्ध तो मैं ढाई हजार साल से हूं और आर्य-पठान तो पता नहीं, कितने हजारों वर्षों से हूं। यदि इस तथ्य को सभी भारतीय स्वीकार करें तो सोचिए, हमारा राष्ट्रवाद कितना सुदृढ़ होगा।

  • सिंधी अस्मिता से खिलवाड़ बर्दाश्त नहींः केसवानी

    सिंधी अस्मिता से खिलवाड़ बर्दाश्त नहींः केसवानी

    भोपाल। सिंधु एजुकेशनल वेल्फेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष दुर्गेश केसवानी के नेतृत्व में सिन्धी समाज का एक प्रतिनिधि मंडल ने आज मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी से मिलकर इन्दौर के कांग्रेस उम्मीदवार पंकज संघवी के समर्थक द्वारा भाजपा प्रत्याशी शंकर लालवानी एवं सिंधी समाज को अपशब्द कहने वाले के कठोर कार्यवाही की मांग की है।  प्रतिनिधिमण्डल ने कहा कि आदर्श आचार संहिता लागू किये जाने के बाद भी कांग्रेस के इंदौर क्षेत्र से प्रत्याशी पंकज संधवी अपने समर्थक श्रेयश झवर के माध्यम से भाजपा उम्मीदवार शंकर लालवानी को सिंधी दलाल बताया गया है। सिंधी समाज को गोली मारने का कथन कहा गया है। जिसकी शिकायत की वीडियो चुनाव को सौंपी है। शंकर लालवानी भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं एवं सिंधी समाज के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। पंकज संघवी के समर्थक श्रेयश झवर द्वारा ऐसे कथन करने एवं इस अभद्रतापूर्ण टिप्पणी एवं भाषा का प्रयोग करने से प्रत्येक सिंधी समाज के लोगों को ठेस पहुँची है।  शिकायत में कहा है कि शंकर लालवानी न सिर्फ भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता है, सिंधी समाज आदर के केन्द्र भी हैं। उन पर ऐसी अभद्र टिप्पणी करने से सम्पूर्ण सिंधी समाज में रोष है। इसलिये इस प्रकरण को संज्ञान में लेकर आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले इन्दोर क्षेत्र से कांग्रेस के प्रत्याशी श्री पंकज सिंघवी एवं उनकें समर्थक श्रेयश झवर पर नियमानुसार वैधानिक कार्यवाही करने की मांग की।  इस अवसर पर चन्द्रकुमार तक्तानी, जयकिशन आहुजा, श्री महेश शर्मा, मनोज रायचंदानी, रवि सतवानी, रोहित जसवानी, दिनेश दुलानी, श्याम वाधवानी, हरिष कुमार, यश कुमार, संतोष ललवानी, नीरज कुमार सहित अनेक लोग उपस्थित थें। 

  • प्रज्ञा सच्ची राष्ट्रभक्तः विनय सहस्त्र बुद्धे

    प्रज्ञा सच्ची राष्ट्रभक्तः विनय सहस्त्र बुद्धे

                    भोपाल। देशद्रोही मानसिकता के लोग चुनाव लड़ सकते हैं तो भारत माता की एक बिटिया और सच्ची राष्ट्रभक्त भोपाल की प्रतिनिधि क्यों नहीं बन सकती। यह बात भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, मप्र के प्रभारी एवं राज्यसभा सांसद डॉ. विनय सहस्त्रबुद्धे ने बुधवार को टीटी नगर स्थित गैमन परिसर बी ब्लाक में भोपाल लोकसभा क्षेत्र के मुख्य चुनाव कार्यालय का उद्घाटन अवसर पर कही। कार्यक्रम का उद्घाटन मंचासीन पदाधिकारियों ने भारत माता, पंडित दीनदयाल उपाध्याय और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के चित्रों पर दीप प्रज्जवलित कर किया। कार्यक्रम का संचालन जिला अध्यक्ष विकास विरानी एवं आभार आलोक संजर ने माना।

    भगवा आतंकवाद शब्दावली के पीछे घिनौनी राजनीति

                    डॉ. सहस्त्रबुद्धे ने कहा कि भगवा आतंकवाद शब्दावली के गैर जिम्मेदाराना उपयोग के पीछे घिनौनी राजनीति है, जो कार्यकर्ता के नाते हमें समझलेनी चाहिए और जनता के बीच जाकर उसे समझाना चाहिए। आतंकवाद को कुछ लोगों ने मजहब विशेष से जोडऩे की कोशिश की। आतंक की प्रवृत्ति का संबंध एक मजहब विशेष, भगवा रंग के साथ जोडऩा इस संस्कृति का अपमान है। मोदी सरकार ने तलाक पीड़ित मुस्लिम बहिनों के लिए कानून लाने की कोशिश की तो विपक्ष ने सहयोग नहीं किया। साध्वी प्रज्ञा चुनाव मैदान में वोट बैंक की राजनीति को खत्म करने के लिए उतरी हैं इसलिए भोपाल नगरी को एक नया इतिहास रचने का अवसर मिला है। हमें समाज के सभी वर्गों में जाकर बताना है कि साध्वी प्रज्ञा भोपाल के विकास, 26लाख जनता की आकांक्षा को लेकर चुनाव लड़ रही हैं। साध्वी ने सोशल मीडिया पर अपील की है कि आम जनता की अपेक्षाओं को समाहित कर भोपाल का नया स्वरूप बनाया जाएगा।

    यह चुनाव विकास बनाम बंटाढार का है

                    पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं सांसद श्री प्रभात झा ने कहा कि इस चुनाव का महत्व अलग प्रकार से बन गया है। जिस उददेश्य के लिए यह चुनाव हो रहा है, उससे इस कार्यालय की प्रतिष्ठा और अधिक बढ़ जाती है। भोपाल लोकसभा का चुनाव सामान्य न होकर विकास बनाम बंटाढार का चुनाव है, इसलिए हम अपनी-अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करेंगे। कार्यालय के उद्घाटन का संदेश हम अपने कार्य की गति और बढ़ाएंगे। उन्होंने कहा कि ये चुनाव अपने आप में एक इतिहास बनाएगा। इसका अर्थ यह नहीं कर्मभूमि से किए कर्म से जो न्याय युद्ध शुरू हुआ है। उस न्याय युद्ध में न्याय होगा। ईश्वर न्याय करेगा और साध्वी प्रज्ञा चुनाव जीतेंगी। यह इसलिए होगा क्योंकि हम सब विश्वास भाव से काम करेंगे। हम सब साध्वी प्रज्ञा के प्रतीक के रूप में काम करेंगे। कार्यालय और कार्यकर्ता की मर्यादा बढ़ेगी। हमें और अधिक तेजी से जुटना है।

                    कार्यक्रम में लोकसभा प्रभारी जसवंत हाड़ा, प्रदेश उपाध्यक्ष रामेश्वर शर्मा, प्रदेश मंत्री श्रीमती कृष्णा गौर, संभागीय संगठन मंत्री आशुतोष तिवारी, महापौर आलोक शर्मा, प्रदेश प्रवक्ता श्री राहुल कोठारी, भगवानदास सबनानी, डॉ. हितेश वाजपेयी, श्री अंशुल तिवारी, श्री सत्यार्थ अग्रवाल सहित जिला पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता उपस्थित रहे। 

  • शहादत और प्रताड़ना के बीच उभरता राष्ट्रवाद

    शहादत और प्रताड़ना के बीच उभरता राष्ट्रवाद

    दिग्विजय सिंहःभगवा आतंकवाद से पिंड छुड़ाने की नाकाम कोशिश

    -आलोक सिंघई-

    साध्वी प्रज्ञा को भोपाल से लोकसभा प्रत्याशी बनाकर भाजपा ने राष्ट्रवाद बनाम परिवारवाद की बहस को तेज कर दिया है। ये बहस आम चुनाव के तीन चरण हो जाने के बाद आकार लेना शुरु हुई है। इस बहस की शुरुआत में जो संशय और सवाल उठ रहे हैं उससे आम मतदाता अभी तक समाधान के दौर तक नहीं पहुंच पाए हैं। आम मतदाता की तो छोड़िए भाजपा के कार्यकर्ता और वरिष्ठ नेता भी इस बहस को लेकर अभी ऊहापोह के बीच झूल रहे हैं। जब प्रत्याशी की घोषणा नहीं हुई थी और कांग्रेस के प्रत्याशी दिग्विजय सिंह ने क्षेत्र में जनसंपर्क शुरु कर दिया था तब भाजपा के नेताओं में खलबली मची हुई थी कि उनका विरोधी दल प्रचार में आगे निकलता जा रहा है। इस बीच भाजपा के कार्यकर्ताओं और टिकिट मांगने वाले नेताओं के बीच भी प्रतिस्पर्धा का माहौल था। हर नेता संपर्क करके खुद को बांका प्रत्याशी घोषित करवाने में जुटा हुआ था। बहुत देर बाद जब साध्वी प्रज्ञा को मैदान में उतारा गया तो टिकिट की दौड़ में जुटे इलाकाई नेतागण मुंह फुलाकर घूमते देखे जाने लगे। हालत ये हो गई कि प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे को इन नेताओं को लामबंद करना भारी पड़ रहा है।

    दरअसल पिछले पंद्रह सालों के भाजपा शासनकाल में संगठन की घनघोर उपेक्षा की गई। संगठन में सुविधाभोगी नेताओं का जमघट लग गया। संगठन के प्रभारियों से संपर्क जोड़कर उन्हें बदनाम करने के प्रयास भी जोर शोर से हुए। ये काम वो लोग कर रहे थे जिन्हें तात्कालिक संगठन महामंत्री कप्तान सिंह सोलंकी ने अपदस्थ दिग्विजय सिंह और उनके भाई लक्ष्मण सिंह से तालमेल बिठाकर भाजपा में शामिल करा दिया था। वे सभी पंचायत स्तर तक फैल गए थे। जब शिवराज सिंह चौहान सत्तासीन हुए तो उन्होंने संगठन के उन्हीं पदाधिकारियों से काम लेना शुरु कर दिया। इस दौरान संघर्ष में प्रमुख भूमिका निभाने वाला भाजपा का मूल कैडर नेपथ्य में चला गया। शिवराज जी के कार्यकाल में संगठन के पुनर्गठन का काम भी धीमा पड़ गया। प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान के कार्यकाल में संगठन को जिस दयादृष्टि से चलाया गया उसके बीच यही आयातित पदाधिकारी मलाई काटते रहे। आज यदि मुख्यमंत्री कमलनाथ या दिग्विजय सिंह जोर जोर से कह रहे हैं कि मोदी ने अच्छे दिनों का वादा किया था लेकिन अच्छे दिन केवल भाजपा के कार्यकर्ताओं के आए हैं तो वे उन्हीं छद्म भाजपा के नेताओं की बात कर रहे हैं जो इतने लंबे कार्यकाल में जनता के बीच लहीम शहीम जीवन शैली के कारण ईर्ष्या के तौर पर देखे गए। संगठन के मूल कार्यकर्ता तो उपेक्षित ही रहे और उनमें से कुछ ने तो हितग्राही मूलक योजनाओं से खुद को जिंदा रखा और कुछ ने संगठन से किनारा कर लिया।

    साध्वी प्रज्ञा ने जब भोपाल पहुंचकर अपने खिलाफ मालेगांव बम धमाके के फर्जी आरोप में खुद को प्रताड़ित किए जाने का मुद्दा उठाया तो जनता के बीच से तो सकारात्मक प्रतिक्रिया आई लेकिन संगठन का अप्रशिक्षित कैडर इसे जनता का मुद्दा नहीं बना पाया। इसके विपरीत साध्वी प्रज्ञा ने अपने खिलाफ प्रताड़ित करने वाले मुंबई एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे का नाम लिया तो कांग्रेस ने इसे शहीद का अपमान करने वाला बयान बताना शुरु कर दिया। इस दौरान भी कैडर के भीतर से प्रताड़ना की कहानी को वांछित हवा नहीं दी गई। कैडर की इस असफलता का नतीजा ये हुआ कि कांग्रेस महात्मा गांधी की शहादत के समान ही इसे शहीद का अपमान बताने में जुट गई। भाजपा को हस्तक्षेप करके स्वयं को इस मुद्दे से अलग करना पड़ा। उसने ये कहकर पल्ला झाड़ा कि ये साध्वी का निजी अनुभव है हम शहादत का अपमान करने के पक्ष में नहीं हैं। कांग्रेस ने मराठी समाज को भी उकसाकर इस मुद्दे पर साध्वी प्रज्ञा और भाजपा के राष्ट्रवाद की मुखालिफत शुरु कर दी। हालत ये हो गई है कि भाजपा के नेतागण इस मुद्दे पर बचाव की मुद्रा में आ गए हैं उन्हें लगता है कि साध्वी पज्ञा ने अपनी राजनैतिक अपरिपक्वता के कारण उन्हें झमेले में फंसा दिया है। जिस मुद्दे पर पूरे देश में मतदान का तीसरा चरण स्पष्ट मतविभाजन की स्थिति में आ जाना चाहिए था भाजपा उस जनमत को अपने पक्ष में लामबंद करने में असफल रही है।

    वास्तव में प्रज्ञा सिंह तत्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे, और दिग्विजय सिंह जैसे कांग्रेस के नेताओं के षड़यंत्र का शिकार रहीं हैं। तत्कालीन गृह सचिव आर के सिंह ने बेशक इस आदेश का पालन करने के लिए नोटशीट लिखी पर इसे सरकार ने ही पारित किया और मुंबई एटीएस को मामले की छानबीन की जवाबदारी सौंपी। आज जब दिग्विजय सिंह चुनाव मैदान में हैं और उन्हें बीस में से पंद्रह लाख हिंदू मतदाताओं के वोट की दरकार है तब वे खुद को निर्दोष बताने के लिए कह रहे हैं कि उन्होंने भगवा आतंकवाद शब्द नहीं रचा, ये तो आरके सिंह की देन था। हालांकि केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने आरके सिंह का बचाव करते हुए कहा कि वे सचिव थे किसी मुद्दे पर फैसला लेने का अधिकार और दायित्व सरकार का होता है इसलिए भगवा आतंकवाद शब्द को हवा देने का षड़यंत्र दिग्विजय सिंह और सुशील कुमार शिंदे की जोड़ी ने ही किया था।

    इस मामले में जो लोग साध्वी प्रज्ञा की प्रताड़ना के बयान को शहादत का अपमान बताने में जुटे हैं वे वास्तव में शहादत की आड़ में परिवारवाद को स्थापित करने की अपनी जानी पहचानी सफल नीति पर अमल कर रहे हैं। बापू महात्मा गांधी की हत्या, श्रीमती इंदिरागांधी की जघन्य हत्या, स्वर्गीय राजीव गांधी की अमानवीय हत्या की आड़ लेकर सफल राजनीति करती रही कांग्रेस को हेमंत करकरे की शहादत के रूप में एक सुरक्षित छतरी मिल गई है। इसके विपरीत भाजपा हेमंत करकरे के कांग्रेस के षड़यंत्र में लिप्तता को नहीं उभार पाई है। मीडिया में भी उनकी बड़ी बेटी जुई करकरे का बयान प्रसारित किया गया जो अमेरिका के बोस्टन में रहती हैं। घटना के वक्त भी वे बोस्टन में ही थीं। पिता की गतिविधियां उन तक परिवारजनों के माध्यम से ही पहुंचती थीं। उनके बेटे आकाश करकरे और छोटी बेटी शायली के बारे में जुई कुछ नहीं बोलना चाहती। इसे वे उनकी निजता बताती हैं। जबकि आकाश करकरे क्या कारोबार करते हैं, उनका कारोबार कब स्थापित हुआ। वे किस देश में कारोबार करते हैं। दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्धन सिंह से उनके क्या कारोबारी संबंध हैं। उसमें पूंजी निवेश किसने और कितना किया था।तब क्या हेमंत करकरे उतना बड़ा निवेश करने की स्थिति में थे या नहीं इन मुद्दों पर भाजपा प्रकाश नहीं डाल पा रही है। ऐसे में वो आरोपों से घिर रही है।

    साध्वी प्रज्ञा ने यदि भगवा आतंकवाद पर अपनी प्रताड़ना का जिक्र किया था तो उन्हें इस मुद्दे पर लोगों के मन में उठ रहे सभी सवालों का जवाब देना था। प्रकरण अदालत में होने के कारण वे कई मुद्दों पर चर्चा नहीं कर पा रहीं हैं। इसके बावजूद भाजपा को किसने रोका कि वे साध्वी के निर्दोष होने के बाजवूद उन्हें प्रताड़ित करने के मुद्दे को जनचर्चा न बनाएं। भाजपा के नेतागण शहादत को मुद्दा बनाए जाने के कांग्रेस के ट्रेप में फंस गए हैं। जबकि साध्वी के निर्दोष होने के बावजूद प्रताड़ित किए जाने का मुद्दा हवा नहीं पकड़ सका है।

    जिन लोगों ने साध्वी प्रज्ञा के छात्र जीवन को करीब से देखा है। उनका तेजाबी रूप देखा है वे भी साध्वी का पक्ष नहीं रख पा रहे हैं। जब प्रज्ञा सिंह नाम की ये छात्रा किसी पद पर नहीं थी तब उसके न्याय करने का ढंग लोगों के आकर्षण का केन्द्र बन चुका था। आरएसएस की पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण वे लोगों की निगाह में आईँ और उन्हें अपने पाले में खींचने के लिए दिग्विजय सिंह ने कई चरणों के प्रयास किए। जब वे सफल नहीं हुए तो उन्होंने भगवा आतंकवाद की कहानी के ट्रेप में साध्वी को फंसाने का जतन किया। अमानवीय यातना झेलने के बाद भी जब साध्वी प्रज्ञा टूटी नहीं और सत्ता परिवर्तन के बाद बदले माहौल में छानबीन हुई तो उसी एटीएस ने पाया कि साध्वी निर्दोष हैं। इसके बाद ही अदालत ने उन्हें जमानत पर रिहा किया।

    अब जबकि अदालत की प्रक्रिया अंतिम दौर में है और भविष्य में साध्वी प्रज्ञा के बेदाग बरी होने की पूरी संभावना है तब भाजपा ने उन्हें मैदान में खड़ा करके राष्ट्रवाद को समझाने का प्रयास किया है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह कह रहे हैं कि साध्वी प्रज्ञा को झूठे मामले में फंसाकर भगवा आतंकवाद का नाम देकर राष्ट्रवाद को लांछित करने का काम कांग्रेस के नेताओं ने किया है। वे सवाल करते हैं कि समझौता एक्सप्रेस में ब्लास्ट करने वाले आरोपी अब कहां हैं। भाजपा यदि शहादत और प्रताड़ना के बीच मौजूद राष्ट्रवाद के तत्व को समझाने में सफल होती है तो आगे आने वाले चरणों के मतदान में उसे अवश्य लाभ होगा। सबसे बड़ी बात तो ये है कि केवल राष्ट्रवाद को कुचलने के लिए परिवारवाद की ध्वजावाहक कांग्रेस ने कैसे कैसे षड़यंत्र किये ये भी स्थापित करना संभव हो सकता है। ये आम चुनाव इस तरह देश में एक क्रांतिकारी बदलाव के मोड़ पर खड़ा है। जनमत के आधार पर राष्ट्रवाद और परिवारवाद के बीच जीत हार का फैसला भी 23 मई को होना तय है।

  • पिद्दी सीट से चुनाव लड़ने क्यों पहुंचे राहुल

    पिद्दी सीट से चुनाव लड़ने क्यों पहुंचे राहुल

    भोपाल,15 अप्रैल(प्रेस सूचना केन्द्र)। केरल की वायनाड जैसी छोटी लोकसभा सीट से जीत सुनिश्चित करने पहुंचे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का दक्षिण प्रेम इस बार भारत की राजनीति को परिभाषित करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश की अमेठी लोकसभा सीट के अलावा वायनाड से जीत सुनिश्चित करने के पीछे कांग्रेस की रणनीति काम कर रही है।

    दरअसल देश में काले धन की जो समानांतर अर्थव्यवस्था कांग्रेस के शासनकाल में विकसित हुई थी वो कांग्रेस की शक्ति का आधार रही है। नोटबंदी और जीएसटी ने उस अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। इसी वजह से व्यापारियों और साहूकारों का बहुत बड़ा वर्ग आर्थिक सुधारों की लहर से खफा हो गया है। कांग्रेस गरीब की बात जरूर करती रही है लेकिन उसकी पृष्ठभूमि में खड़े राजा महाराजाओं और साहूकारों की शक्ति कांग्रेस को हर चुनौती का सामना करने में सहयोग प्रदान करता रहा है। दक्षिण में जिन स्वयंसेवी संस्थाओं और कंपनियों को प्रतिबंधित किया गया है उससे भी मोदी सरकार के विरोध में नाराजगी देखी गई और कांग्रेस को इस बार दक्षिण भारत जैकपाट नजर आ रहा है।

    केरल की वायनाड लोकसभा सीट के समीकरण देखे तो ये सीट2008 में अस्तित्व में आई. तब से अब तक इस सीट पर कांग्रेस का ही कब्जा है. इस सीट के तहत 7 विधानसभा सीटें आती हैं. ये सातों विधानसभा सीटें मनंथावाड़ी, सुल्तानबथेरी, कल्पेट्टा और कोझीकोड जिलों में पड़ती हैं. 2009 से इस सीट पर कांग्रेस के एमआई शानवास सांसद हैं. अब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के यहां से चुनाव लड़ने की वजह से यह संसदीय सीट हाई-प्रोफाइल सीटों में शुमार हो गई है और सभी की नजर इस सीट पर भी लग गई है.

    वायनाड जिले की आबादी 8.18 लाख है जिनमें से 4.01 लाख पुरुष और 4.15 महिलाएं है. इस जिले की साक्षरता दर 89.03 प्रतिशत है. वायनाड में 49.48% हिंदू, 28.65% जनसंख्या मुस्लिम और ईसाई समुदाय की आबादी 21.34% है. केरल में कांग्रेस की अगुवाई वाली गठबंधन का नाम है यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ). जबकि दूसरी तरफ वामपथी दलों का गठबंधन का नाम है लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ).

    2014 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को वायनाड पर महज 20,870 वोटों के अंतर से जीत हासिल हुई थी. कांग्रेस के एमआई शानवास को सीपीएम के सत्यन मोकेरी से सिर्फ 1.81 फीसदी अधिक वोट मिले थे. शानवास को 3,77,035 और मोकेरी को 3,56,165 वोट मिले थे. बीजेपी तब चुनाव में तीसरे स्थान पर रही थी और उसके प्रत्याशी पीआर रस्मिलनाथ को 80,752 वोट मिले थे.

    वायनाड लोकसभा सीट पर 2009 में पहली बार संसदीय चुनाव कराए गए जिसमें कांग्रेस को बड़ी जीत मिली थी. कांग्रेस के एमआई शानवास ने सीपीआई के एम रहमतुल्लाह को 1,53,439 के भारी अंतर से हराया था. शानवास को तब 4,10,703 और रहमतुल्लाह को 2,57,264 वोट मिले थे.

    कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी दक्षिण के रण में उतरकर वहां के राजनीतिक समीकरण साधने की रणनीति पर काम रहे हैं. एक दौर में दक्षिण भारत कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता था, लेकिन वक्त के साथ छत्रपों ने कांग्रेस की जमीन को कब्जा लिया है. ऐसे में राहुल दक्षिण के सियासी रण में खुद उतरकर अपनी सियासी जमीन को वापस पाने की है.

    वायनाड और मल्लपुरम इलाके में कांग्रेस और ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की मजबूत पकड़ मानी जाती है. यही वजह है कि पिछले दो लोकसभा चुनाव से कांग्रेस लगातार जीत दर्ज कर रही है. ऐसे में राहुल के लिए वायनाड की राह में बहुत ज्यादा दिक्कतें नहीं होंगी.

    वायनाड एक पर्यटन स्थल भी है, इस लिहाज से भी राहुल गांधी के लिए इस लोकसभा सीट का चयन किया गया है।2008 से ही इस क्षेत्र का विस्तार किया जा रहा है। यहां आठ जन जातियां निवास करती हैं। इसलिए बजट का बड़ा हिस्सा यहां विकास के नाम पर खर्च किया जाता रहा है। कोआपरेटिव सोसायटी बनाकर भी यहां की खेती और पर्यटन को संरक्षण देने का प्रयास बरसों से किया जाता रहा है। कांग्रेस की निगाह बहुत लंबे समय से इस सीट पर थी और इसे दक्षिण के इलाकों में सुरक्षित लांच पेड की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।

    पर्यटन क्षेत्र वयनाड

    वयनाड पर्यटन संगठन (डबल्यूटीओ) वयनाड में ‘जिम्मेदार और सतत् पर्यटन’ की संस्कृति लाने में मुख्य भूमिका निभा रहा है, जिसने वयनाड के उत्तरी जिले की चार पगडंडियों की पहली पगडंडी आपको यहाँ मिलेगी।

    इन चार पगडंडियों में, हम आपका परिचय पहली पगडंडी ‘आउटडोर ट्रेल’ से कराएंगे जिसमें आपको वयनाड जिले के निम्नलिखित स्थल मिलेंगे ।

    चेम्ब्रा पीक

    2100 मीटर की ऊंचाई पर चेम्ब्रा पीक वयनाड के दक्षिणी हिस्से में मेप्पाडी के समीप स्थित है। यह इस क्षेत्र की चोटियों में सबसे ऊंची चोटी है और इसकी चढ़ाई काफी मुश्किलों भरी है। चेम्ब्रा पीक की चढ़ाई एक रोमांचक अनुभव है, जहां चढ़ाई के हर चरण में वयनाड का व्यापक विस्तार दिखाई पड़ता है और शिखर तक पहुंचते-पहुंचते यहां के दृश्य काफी विस्तृत बन जाते हैं। इस चोटी तक पहुंचकर वापस लौटने में एक दिन का समय लगता है। जो इसके शीर्ष पर कैंप करना चाहते हैं, बेशक उनके लिए तो यह एक यादगार अनुभव ही होगा।

    कैंपिंग के लिए इच्छुक व्यक्ति वयनाड के कलपेट्टा में स्थित डिस्ट्रिक्ट टूरिज्म प्रोमोशन काउंसिल से संपर्क कर सकते हैं।

    नीलिमला

    वयनाड के दक्षिणपूर्वी हिस्से में कलपेट्टा तथा सुल्तान बथेरी से आसानी से पहुंचे जाने वाली स्थिति में अवस्थित नीलिमला ट्रेकिंग के लिए एक उपयुक्त स्थान है, जहां ट्रेकिंग के लिए कई मार्ग उपलब्ध हैं। नीलिमला के शिखर पर से समीप की घाटी में मीनमुट्टी जलप्रपात का दृश्य बेहद यादगार हो उठता है।

    मीनमुट्टी जलप्रपात

    ऊटी और वयनाड को जोड़ने वाली मुख्य सड़क से 2 कि.मी. की ट्रैकिंग करते हुए नीलिमला के पास स्थित इस खूबसूरत मीनमुट्टी जलप्रपात तक पहुँचा जा सकता है। यह वयनाड जिले का सबसे बड़ा जलप्रपात है जहाँ तीन धाराएँ लगभग 300 मीटर से नीचे गिरती हैं।

    चेतलयम

    एक और जलप्रपात जो पर्यटकों को वयनाड की ओर आकर्षित करता है, चेतालयम जलप्रपात है जो वयनाड के उत्तरी इलाके के सुल्तान बतेरी के पास है। मीनमुट्टी जलप्रपात की तुलना में यह आकार में थोड़ा छोटा है। यह जलप्रपात और आसपास के इलाके ट्रैकिंग और पक्षी प्रेमियों के लिए बेहतरीन जगह है।

    पक्षीपातालम

    ब्रह्मगिरी की पहाडियों पर 1700 मी. की ऊंचाई पर घने वन में पक्षीपातालम स्थित है। इस क्षेत्र में बड़े-बड़े बोल्डर देखने को मिलते हैं, उनमें से कुछ तो सचमुच विशाल हैं। यहां मौजूद कई सारी गुफाएं विभिन्न प्रकार के पक्षियों, जंतुओं और वनस्पतियों की विशेष किस्मों के वासस्थान हैं। पक्षीपातालम मानंतवाडी के पास स्थित है और यहाँ जाने के लिए आपको तिरुनेल्ली से शुरु करते हुए, जंगल में लगभग 7 कि.मी. की ट्रैकिंग करते हुए जाना होगा। पक्षीपातालम जाने वालों को डीएफओ – उत्तरी वयनाड से अनुमति लनी होती है।

    बाणासुरा सागर बांध

    बाणासुरा सागर पर बना बांध भारत के सबसे बड़े बांध के रूप में जाना जाता है। यह बांध वयनाड जिले के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में स्थित है और यह करलाड झील के समीप है। बाणासुरा सागर बांध में बाणासुरा पीक की चढ़ाई के लिए प्रारंभ स्थान भी स्थित है। यहां का एक रोचक आकर्षण है द्वीपों का समूह, जिसका निर्माण जलाशय द्वारा आस-पास के क्षेत्रों को जलमग्न करने के कारण होता है।

    एक ओर जहाँ आप वयनाड के मनोरम दृष्यों, ध्वनियों और खुशबू का मज़ा लेंगे, वहीं आप वयनाड के कुछ दुर्लभ चीज़ें भी खरीदना चाहेंगे जैसे यहाँ के मसाले, कॉफ़ी, चाय, बांस की वस्तुएँ, शहद और जड़ी-बूटी के पौधे।

    वयनाड में ‘आउटडोर ट्रेल’ के बारे में अधिक जानकारी के लिए, वयनाड पर्यटन संगठन से संपर्क करें।

    संपर्क के विवरण

    महासचिव

    वयनाड पर्यटन संगठन

    वासुदेवा एडम, पोझुताना पी.ओ.

    वयनाड, केरल, भारत

    पिन – 673575

    टेलीफ़ोन +91-4936-255308, Fax.+91-4936-227341

    ई-मेल mail@wayanad.org

    कैसे पहुँचे

    नज़दीकी रेल्वे स्टेशन – कोझिकोड (कालीकट) रेल्वे स्टेशन 62 कि.मी. दूरी पर है

    नज़दीकी एयरपोर्ट – कोझिकोड (कालीकट) अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट लगभग 65 कि.मी. दूरी पर है

    लोकेशन

    अक्षांश : 11.75847, देशांतर : 76.093826