शिवराज से मुक्ति मंहगी,सस्ती है भाजपा की हार


-आलोक सिंघई-
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब एक जनसभा में मध्यप्रदेश के अतिलोकप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का संबोधन किया तो लोग हैरान रह गए कि मोदी ने ऐसा क्यों बोला। लोगों का मानना था कि मोदी अपने सहयोगी की शान बढ़ाने के लिए ऐसा बोल गए।जबकि राजनीति के खुरपेंच खंगालने वालों को अहसास हो गया था कि मध्यप्रदेश की राजनीतिक उलटबांसी की जानकारी मोदी तक पहुंच चुकी है।इसके बाद पार्टी संगठन से जुड़े वरिष्ठ पदाधिकारी भी समय समय पर खरीदी जा रही लोकप्रियता की खबरों पर हैरान होते रहे,लेकिन शिवराज को कुर्सी पर बिठाए रखने वाले उद्योगपतियों और दलालों का जाल इतना मजबूत था कि उन्होंने शिवराज को पद से डिगने नहीं दिया। पार्टी संगठन के कई पदाधिकारी बार बार प्रयास करते रहे कि पार्टी के मौजूदा हालात बदलें पर विकल्पहीनता ने उन्हें खामोश कर दिया। ये विकल्पहीनता पार्टी के बधियाकरण का हिस्सा थी। चुन चुनकर कर्मठ नेताओं को पंगु बनाया जाता रहा। जो नेता कभी शक्तिकेन्द्र के रूप में सिर उठा सकता था उसके विरुद्ध आपरधिक मामले खोले जाते रहे। इलाकाई क्षत्रपों को उनके प्रतिद्वंदियों से घेरा जाता रहा। नतीजतन भाजपा एक ऐसी अंधीगली में पहुंच गई जहां आगे का रास्ता बंद था।

आज भाजपा की हार के लिए जिस एंटी इनकमबेंसी की बात कही जा रही है वो सत्ता विरोधी लहर तो भाजपा के भीतर से ही जन्म ले रही थी। चूहा बिल्ली के इस खेल में शिवराज जी भोली मुखमुद्रा से बच लिए लेकिन उनकी धर्मपत्नी साधना सिंह नेताओं की आंखों की किरकिरी बन गईं।प्रमुख सचिव एसके मिश्रा के माध्यम से सत्ता का शोषण करने की उनकी शैली पार्टी के भीतर चिढ़ की वजह बनने लगी। भ्रष्ट अफसरों को मैदानी कार्य देना और ईमानदार अफसरों को घर बिठा देने की वजह से बदनामियों की सुगबुगाहट शिवराज सिंह के पूरे कार्यकाल में हताशा फैलाती रही।यदि भाजपा और संघ के समर्पित कार्यकर्ताओं की जगह कांग्रेस में ये बातें फैलतीं तो पार्टी में ही विरोध के स्वर भी गूंजने लगते लेकिन भाजपा में शांति छाई रही और लोगों को सत्ता से चिढ़ का अहसास नहीं हुआ। अफसरों ने एसके मिश्रा के भ्रष्टाचारों पर खूब चर्चाएं कीं जो चटखारे लेकर सुनी सुनाई जाती रहीं। अंतिम दौर में शिवराज सिंह के बुधनी फार्म हाऊस की फिल्म पर भी लोगों ने आसानी से यकीन कर लिया,जबकि वो फार्म हाऊस शिवराज ने बैंक से कर्ज लेकर ख़ड़ा किया था। जो मुख्यमंत्री दो लाख दस हजार करोड़ से ऊपर का बजट खर्च करता हो उसके मात्र सात करोड़ के फार्म हाऊस को बड़ा भ्रष्टाचार माना गया।ये खबरें भी उन्हीं अफसरों ने उड़ाईं जो शिवराज में कमीशनखोरी करते हुए अरबपति बन गए थे।

चुनाव के बाद शिवराज सिंह ने नोटबंदी, एट्रोसिटी एक्ट और जीएसटी को अपनी हार की वजह बताया था। जबकि एट्रोसिटी एक्ट पर शिवराज का दिया वो बयान सुर्खियां बना जिसमें उन्होंने कहा था कि कोई माई का लाल आरक्षण समाप्त नहीं कर सकता। सपाक्स के नेताओं का तो ध्येय वाक्य यही बना और उन्होंने भाजपा के वोट बैंक को छिन्न भिन्न करने में सफलता पाई। सपाक्स ने वोट तो बहुत कम पाए लेकिन भाजपा का जनाधार तोड़ दिया। भाजपा से हटा ये वोट कांग्रेस के खाते में गया और उसके वोट बैंक में भरपूर इजाफा हुआ। दंभी सवर्णों खासतौर पर ब्राह्मणों ने माई के लाल को ध्वजवाक्य बना लिया। आज भी वे इस ध्वजा को फहरा रहे हैं। भाजपा का कमजोर संगठन और दोयम दर्जे के अकुशल नेताओं को अपने करीब जुटा लेने की शिवराज सिंह की अकुशलता ने भाजपा को उसकी जड़ों से काट दिया। जबकि इसकी तुलना में जिस विंध्य प्रदेश को भाजपा के लिए खतरे की घंटी माना जा रहा था वहां संगठन के एक मजबूत स्तंभ बीडी शर्मा ने वो जादू बिखेरा कि जिसकी आंधी में अजय सिंह राहुल,और सुंदरलाल तिवारी जैसे दिग्गज भी उड़ गए। जिस अभय मिश्रा को राजेन्द्र शुक्ल के लिए चुनौती माना जा रहा था वे भी अंततः ध्वस्त कर दिए गए। इसका मतलब साफ है कि जिस चुनौती पर आसानी से विजय पाई जा सकती थी उसके सामने संगठन के अकुशल नेतृत्व ने हथियार डाल दिए। इसकी एक वजह ये भी थी कि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह फायरब्रांड नेता तो थे लेकिन उनमें संगठन क्षमता का नितांत अभाव देखने मिला। उनके पास संगठन को एकजुट करने का वक्त भी कम था लेकिन यदि वे सरताज सिंह, धीरज पटैरिया, रामकृष्ण कुसमारिया जैसे कई बागियों को मना पाते तो भाजपा कई सीटें आसानी से बचा लेती। भिंड, दमोह, बमोरी, पथरिया, महेश्वर जैसी सीटें ही भाजपा के पास आ जातीं तो वो आसानी से सरकार बनाने की स्थिति में आ जाती।

जो नोटबंदी और जीएसटी भाजपा की जीत की वजह बन जानी थीं उसे अपने भोंदू सलाहकारों की वजह से वे हार का कारण मानते रहे। नोटबंदी के बाद भाजपा की सरकार और संगठन को जिस तरह से व्यापारियों और आम लोगों का मार्गदर्शन करना था उन्होंने नहीं किया। उलटे शिवराज जी लोगों के बीच सफाई देते घूमते रहे कि नोटबंदी उन्होंने नहीं की है ये तो केन्द्र का फैसला है। समानांतर अर्थव्यवस्था को तोड़ने के लिए उठाए गए ये कदम कैसे लोगों की समृद्धि की चाभी बन सकते हैं इसे समझाने में असफल रहने के कारण नाराजगी बढ़ती गई। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर कमर के नीचे वार करने में भी कोई कोताही नहीं बरती। उसका एक विज्ञापन जो कहता था कि धंधा चौपट करने वाली सरकार बदल दो कई दिनों तक चलता रहा। जब जीएसटी काऊंसिल ने कांग्रेस हाईकमान से नाराजगी दर्ज कराई तब जाकर उसे बंद किया गया। ये विज्ञापन टैक्स चोरों को उकसाने वाला था लेकिन भाजपा के सलाहकार उसका जवाब नहीं दे पाए। इसकी तुलना में भाजपा के विज्ञापन नीरस और अहसान थोपने वाले थे जो भाजपा के दंभ की दीवार मजबूत करते चले गए।

शिवराज सिंह सरकार का बोगस खुफिया तंत्र भी फीडबैक देने में असफल रहा। वो ये तो बताता रहा कि आपकी सरकार सत्ता विरोधी लहर की चपेट में आ गई है लेकिन इसकी वजह और निदान का रास्ता वो नहीं सुझा सका। वास्तव में भाजपा के विरुद्ध सत्ता विरोधी लहर इतनी तेज थी भी नहीं। केन्द्र सरकार ने आयातित ईंधन आधारित जिस सार्वजनिक परिवहन के स्थान पर बिजली से चलने वाले परिवहन को बढ़ावा देने की नीति बनाई। जल परिवहन को बढ़ाकर सार्वजनिक ट्रांसपोर्ट को सस्ता और स्वदेशी बनाने का प्रयास किया।परमाण्विक ऊर्जा और वैकल्पिक सोलर, विंड इनर्जी आधारित संयंत्रों को बढ़ावा देने की रणनीति को जन अभियान बनाने का प्रयास किया उससे तेल माफिया के कान खड़े हो गए। तेल माफिया ने भारत को ऊर्जा का गुलाम बनाने में कांग्रेसी सरकारों में बड़ा निवेश किया था। कार कंपनियों के माध्यम से सत्ताधीशों को मोटी रिश्वतें दिलाई गईं थीं। सड़कें चौड़ी करने के नाम पर भारत को जो कर्ज लेना पड़ा उसकी सूदखोरी को भी फलने फूलने का भरपूर अवसर मिला था।मोदी सरकार जिस तेजी से आयातित ईंधन की खपत घटाने की नीति पर काम कर रही है उससे तेल माफिया को अपने अस्तित्व पर संकट मंडराता नजर आने लगा है। इसे रोकने के लिए तेल उत्पादक देशों ने भारत में भारी धन निवेश किया। ये धन चुनावों से पहले अगड़ियों के माध्यम से बाजार में उतारा गया। पूरे बाजार में इससे खलबली मच गई। जब ये धन उतारा जा रहा था तभी सूदखोर व्यापारी चिल्ला रहे थे कि बाजार से धन गायब हो गया है। इसके बावजूद सरकार के मूर्ख खुफिया तंत्र के कान खड़े नहीं हुए। यही धन चुनाव से पहले मध्यप्रदेश में कमलनाथ ने भाजपा में विद्रोह फैलाने के लिए खर्च किया। छत्तीसगढ़ में जिस जोगी सरकार को भाजपा की बी टीम बताया जाता रहा वो दरअसल कांग्रेस की बी टीम थी। राजस्थान में भी यही काला धन भाजपा में विद्रोह की वजह बना। भाजपा संगठन के आत्मकेन्द्रित नेतागण इस समस्या को नहीं भांप सके और वे सरकार की ओर से प्रचार के नाम पर खर्च किए जा रहे धन को बटोरने की जुगत ही बिठाते रहे। नतीजतन कांग्रेस भाजपा के विरुद्ध जन आक्रोश भड़काने में सफल रही। ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाकर कांग्रेस उस षड़यंत्र से ध्यान हटाने में असफल रही जिसके चलते फर्जी वोटरों की आड़ में भाजपा के वोट बैंक का बड़ा हिस्सा काट दिया गया। इस सारे षड़यंत्र का केन्द्र मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत का कार्यालय था।ओपी रावत भी शिवराजसिंह चौहान के ही सताए अफसर थे जिन्होंने मौका देखकर चौका जड़ने में देरी नहीं लगाई।

ये सारा माहौल इसलिए परवान चढ़ा कि भाजपा ने संगठन को लगातार कमजोर किया और उसमें हवा हवाई नेताओं को आगे बढ़ाया जाता रहा। सत्ता पर कमीशनखोरों के बढ़ते प्रभाव ने जनहितकारी योजनाओं की डिलीवरी को बाधित किया। गोपाल भार्गव, भूपेन्द्र सिंह, माया सिंह, कुसुम मेहदेले,बाबूलाल गौर, विश्वास सारंग,रामपाल सिंह,सरताज सिंह, जैसे मंत्रियों के भ्रष्टाचार पर सरकार का कोई अंकुश नहीं था। शिवराज जी अपने पूरे कार्यकाल में ऐसे चापलूसों से घिरे रहे जिनका जनाधार नहीं था और वे मंत्रिपद की आड़ में केवल भ्रष्टाचार करने में लगे रहे। संगठन में भी ऐसे लोगों को बढ़ावा दिया जाता रहा जो अकुशल और आत्मकेन्द्रित थे। नतीजतन पूरी सत्ता और संगठन जनता से कटता चला गया। भाजपा की फौरी निदान करने वाली आर्थिक नीतियों ने प्रदेश को तो कर्जदार बनाया लेकिन उत्पादकता बढ़ाने में असफल साबित हुईं। वित्तमंत्री के रूप में जिस राघवजी भाई ने प्रदेश के आर्थिक विकास की इबारत लिखी उसे अर्जुनसिंह समर्थक सुंदरलाल पटवा की निजी खुन्नस के चलते चरित्रहीनता के लांछन से ध्वस्त कर दिया गया। कभी संवाद का केन्द्र रहा पत्रकार भवन दलालों के हाथों गिरवी रखा जाता रहा।ऐन चुनाव के मौके पर ये भवन भी सत्ता विरोधी षड़यंत्रों का केन्द्र बन गया।इस तरह से कई आत्मघाती नीतियों ने भाजपा के समर्पित कार्यकर्ताओं की फौज को हतोत्साहित करने का षड़यंत्र किया है।जिसकी एकमात्र वजह व्यक्ति केन्द्रित शिवराज सिंह चौहान का नेतृत्व रहा है। सत्ता से उतार दिए जाने के बाद भले ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से हार की जिम्मेदारी लेकर खुद को फ्री घोषित कर दिया है लेकिन वास्तव में उन्हें इतनी आसानी से बरी नही किया जा सकता। लाखों करोड़ों कार्यकर्ताओं की मेहनत और समर्पण की कीमत केवल चार शब्दों में माफी मांग लेने से नहीं चुकाई जा सकती। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नीति निर्धारकों को इस पर गौर करना होगा। मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार का पतन इतना मंहगा नहीं है जितनी मंहगी कीमत उसे शिवराज सिंह चौहान को लगातार सत्ता का केन्द्र बनाए रखने पर चुकानी पड़ रही थी।

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