Month: December 2018

  • यूरिया संकट पर मुख्यमंत्री कमलनाथ के उपाय सफल

    यूरिया संकट पर मुख्यमंत्री कमलनाथ के उपाय सफल

    कृषि विकास एवं किसान कल्याण विभाग लगातार कर रहा है समीक्षा

    भोपाल,21 दिसंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)।मुख्यमंत्री कमल नाथ के प्रयासों से प्रदेश में किसानों के लिये रबी सीजन में यूरिया सहित अन्य उर्वरकों की आपूर्ति बढ़ी है। इसके लिये कृषि एवं किसान कल्याण विभाग केन्द्र के रेल और रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय से लगातार सम्पर्क कर रहा है। उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री कमल नाथ ने किसानों की जरूरतों को देखते हुए गुरुवार को मंत्रालय में वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक में यूरिया की उपलब्धता की समीक्षा की थी। प्रदेश को जल्द ही यूरिया की 12 रेक्स मिलेंगी।

    प्रमुख सचिव, कृषि विकास एवं किसान कल्याण डॉ. राजेश राजौरा के अनुसार एनएफएल और चम्बल फर्टिलाइजर अपने प्लांटों से मध्यप्रदेश को तेजी से यूरिया की आपूर्ति करेंगे। नेशनल फर्टिलाइजर लिमिटेड (एनएफएल) का गुना प्लांट मध्यप्रदेश को ही यूरिया की आपूर्ति करने पर तेजी से विचार कर रहा है।

    वर्तमान में ग्वालियर के रेक पाइंट में 2600 मीट्रिक टन यूरिया पहुँच रहा है। इस पाइंट से ग्वालियर, दतिया और मुरैना जिले के किसानों को आपूर्ति होगी। शाजापुर में 3194 मीट्रिक टन, मण्डीदीप में 2700 मीट्रिक टन, हरपालपुर में इफ्को कम्पनी का 3139 मीट्रिक टन यूरिया पहुँच रहा है। इससे छतरपुर जिले के किसानों को यूरिया की आपूर्ति होगी। मण्डीदीप रेक पाइंट में एनएफएल कम्पनी का 3000 मीट्रिक टन, खण्डवा में 3194 मीट्रिक टन, गुना में 3017 मीट्रिक टन, सतना में 2600 मीट्रिक टन यूरिया दो दिनों में पहुँचने वाला है। खण्डवा में 1951 मीट्रिक टन यूरिया आज ही पहुँचा है। इसके वितरण की व्यवस्था के संबंध में कलेक्टर्स को निर्देश दे दिये गये हैं। मण्डीदीप रेक पाइंट में 24 दिसम्बर तक इफ्को का 3194 मीट्रिक टन यूरिया और पहुँचेगा, जिसका वितरण रायसेन, भोपाल और सीहोर जिले के किसानों को किया जायेगा।

    रेल मंत्रालय भी कर रहा है सहयोग

    भारत सरकार के रेल मंत्रालय के एडीशनल मेंबर (ट्रेफिक) श्री अनुराग ने आज प्रदेश के किसान-कल्याण और कृषि विकास विभाग को पत्र लिखकर जानकारी दी है कि उर्वरकों की 9 रैक ट्रांजिट में हैं, जो एक-दो दिन में प्रदेश को प्राप्त हो जायेंगी। पूर्व में देश के बंदरगाहों से डीएपी को ही उठाव करने की प्राथमिकता थी। मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ के प्रयासों के फलस्वरूप अब देशभर के किसानों के लिये यूरिया के रैक्स उठाने के लिये देश के अन्य राज्यों को भी प्राथमिकता दी जा रही है।

  • भाजपा को भारी पड़ा सिंधिया पर हमला करना

    भाजपा को भारी पड़ा सिंधिया पर हमला करना

    भोपाल,(डॉ.अजय खेमरिया)। ग्वालियर चंबल संभागों में कुल मिलाकर 34 विधानसभा की सीट्स है इस बार यहां बीजेपी को जबरदस्त नुकसान उठाना पड़ा है 2013 की तुलना में 13 सीट बीजेपी ने गंवा दी बसपा को भी एक सीट का नुकसान हुआ है।मुरैना ओऱ अशोकनगर जिलों में बीजेपी का सफाया हो गया।चुनाव परिणाम के आंकड़ो को अगर खंगाला जाए तो कुछ मोटे कारण निकलकर सामने आते है बीजेपी की इस पराजय के:
    (1)एट्रोसिटी एक्ट
    (2)खराब प्रत्याशी चयन
    (3)बीजेपी का संगठन स्तर पर उदासीनता
    (4)चुनाव प्रबन्धन के नाम पर कोई मैकेनिज्म का न होना जैसा 2003,2008,2013 में नजर आता था।
    (5)बीजेपी का पहली बार कांग्रेस कल्चर में अवतरित होना जहाँ हर सीट पर बीजेपी ने बीजेपी को हराया।

    सबसे पहले बात श्योपुर जिले की जहां बीजेपी के दुर्गालाल विजयवर्गीय बुरी तरह हारे है श्योपूर सीट से यहां कांग्रेस का टिकट सिंधिया जी के विरोध के बाबजूद बसपा से आये बाबू जंडेल मीणा को मिला पहली बार मीणा जाति ने यहां एकजुट होकर वोट किया जो लगभग 45 हजार है संख्या में। कांग्रेस के नेता चाह कर भी बाबू जंडेल का नुकसान नही कर पाये।मीणा के अलावा मुस्लिम और दलित आदिवासी भी कांग्रेस की बम्पर जीत का आधार बनें।इसके अलावा पूरी बीजेपी ने भी दुर्गालाल को निपटाने का काम किया, बीजेपी के लगभग सभी नेता टिकट बदलबाने के लिये अंतिम समय तक लगे रहे लेकिन पार्टी ने टिकट नही बदला परिणाम सामने है।संभव है टिकट बदलने से यहां इतनी बड़ी हार न हो पाती।जिले की दूसरी सीट है विजयपुर यहां जो उलटफेर हुआ वह कतई चौकाने वाला नही है कांग्रेस के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष रामनिवास रावत की हार पहले से ही तय थी वे खुद साल भर पहले ही क्षेत्र छोड़कर सबलगढ में सक्रिय थे लेकिन ऐनवक्त पर उनका टिकट नही बदला गया।रामनिवास रावत की हार उनके ही जमाये सिस्टम ने भी तय कर दी बसपा से लड़े बीजेपी नेता बाबूलाल मेवरा को लेकर चरचा थी वे रामनिवास के सबलगढ़ जाते ही कांग्रेस टिकट पर विजयपुर से लड़ सकते है लेकिन सब कुछ गड़बड़ा गया और बाबूलाल मेवरा हाथी की सवारी कर गए यही एक बड़ा फ़ेक्टर रहा रामनिवास रावत की हार का ।आमने सामने की फाइट में वे लगातार दो बार बीजेपी के सीताराम को हराते आ रहे थे लेकिन इस बार बीजेपी के नाराज वोटर और कार्यकर्ताओं की फ़ौज बाबूलाल के साथ जुट गई और दोनो को विरोधी लॉबी सीताराम को जीता ले गई।रामनिवास के लिये जीवन का सबसे बड़ा सदमा है क्योंकि वे इस सरकार में सिंधिया कोटे से सबसे ताकतवर मंत्री होते महेंद्र सिंह कालूखेड़ा के निधन के बाद रामनिवास ही उनके विकल्प थे लेकिन उनकी हार ने खुद के साथ सिंधिया का गणित भी बिगाड़ दिया।रामनिवास की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1993 की सरकार में वे मंत्री रह चुके है।उनकी हार का बुनियादी कारण 5 बार की एन्टीनकम्बेंसी ही है।

    (1)अब मुरैना जिले की चर्चा करें तो सबसे पहली सीट है सबलगढ।
    सबलगढ़ में बीजेपी प्रत्याशी चयन में भूल कर गई एक ही परिवार मेहरबान रावत को 30 साल से लगातार टिकट आबंटन नुकसानदेह साबित हुआ।एक ही रावत केंडिडेट होने के बाबजूद बीजेपी का तीसरे नम्बर पर रहना परिवार की खिलाफत का फैक्टर क्रिएट करता है यहां से कांग्रेस ने कुशबाह जाति पर दांव खेला जो सफल साबित हुआ कमलनाथ के प्रभावी भूमिका में होने से सुरेश चौधरी परिवार की नाराजगी भी कम हो गई सवर्ण खासकर ब्राह्मण,वैश्य,ठाकुर शुरू से ही मेहरबान रावत के विरुद्ध थे पहले उन्होंने बसपा को सपोर्ट किया फिर कुछ लोग कांग्रेस के पक्ष में आये नतीजतन बीजेपी के साथ केवल रावत और अन्य परम्परागत कैडर वोट रह गए यहां जादोन्न ठाकुरों,ब्राह्मण,और वैश्य वर्ग ने बीजेपी को अपना समर्थन नही दिया।एट्रोसिटी से ज्यादा रिएक्शन रावत परिवार के विरुद्ध था पार्टी अगर यहाँ बीरसिंह रावत,कमल रावत,या बादशाह रावत को टिकट देती तो शायद ये परिणाम नही आता ।बीजेपी के जिलाध्यक्ष खुद यहां से दावेदार थे।सीपी शर्मा,विनोद जादोन्न जैसे नेता मैनेज किये जा सकते थे पर संगठन सिर्फ नाम का नजर आया।पिछला चुनाव मेहरबान सिंह ये कहकर जीते थे कि ये उनका अंतिम चुनाव है इसके बाबजूद पार्टी ने बदलाब की जगह इसी परिवार को टिकट देकर रावत समाज मे भी अपना बेस गंवा दिया।

    (2)जिले की दूसरी सीट है जोरा।पहली बार बीजेपी के सूबेदार सिंह रजौधा जीते थे यहाँ2013 में उनकी हार हुई है इसके बाबजूद इस सीट पर बीजेपी के पास रजौधा का कोई विकल्प नही था पिछले चुनाव में उन्हें जिन त्यागी ब्राह्मणो ने खुलकर सहयोग किया था वे इस बार बनबारी शर्मा के साथ हो गए जो 2013 में नजदीकी मुकाबले में हार गए थे इसके अलावा किरार वोटर का एकमुश्त बसपा के मनीराम के साथ जाना भी यहॉ बीजेपी के लिये नुकसान कर गया।कैलारस और जोरा के व्यापारी वर्ग में भी बीजेपी का वोट कट गया ,कुशवाह वोट सबलगढ़ के कुशबाह के चलते कांग्रेस की तरफ गया इस तरह बीजेपी के रजौधा बाहर हो गए।

    (3)मुरैना की सीट पर मंत्री रुस्तम सिंह की हार पर किसी को आश्चर्य नही है मुरैना में दीवार पर मोटे हरूफ में लिखी इस हार को अनपढ भी पढ़ रहा था पर बीजेपी ने जानकर भी क्यों नही पढा ?ये समझ से परे है।ब्राह्मण, वैश्य दोनो समाज निजी रूप से रुस्तम सिंह के खिलाफ थी अगर रुस्तम सिंह की जगह हमीर पटेल या अनिल गोयल बीजेपी केंडिडेट होते तो मामला उलट सकता था यहां सबसे बड़ा फैक्टर रुस्तम सिंह ही थे ।

    (4)सुमावली की सीट पर बीजेपी के पास अजब सिंह कुशवाह के अलावा कोई अच्छा विकल्प नही था उन्होंने टक्कर भी ठीक दी लेकिन किरार और ब्राह्मण वोटर बीजेपी को उस अनुपात में नही मिला जितना जीत के लिये आवश्यक था किसानों की कर्जमाफी यहां एक फैक्टर रही है।दलित वोट भी बड़ी संख्या में बसपा से कटकर कांग्रेस की तरफ चला गया।

    (5)अंबाह में बीजेपी को सीधा नुकसान ब्राह्मण और ठाकुर बिरादरी ने पहुचाया इन्ही ने नेहा किन्नर को लड़ाया एट्रोसिटी का यहाँ ज्यादा असर था फिर व्यापारी वर्ग ने भी अंबाह पोरसा में बीजेपी का साथ नही दिया।

    (6)दिमनी में कांग्रेस का केंडिडेट बहुत एक्टिव था उसे सभी वर्गों का समर्थन मिला है बीजेपी यहां भी केंडिडेट के मामले में चूक कर गई अगर ब्राह्मण चेहरे या फिर केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर के बेटे को लड़ाया जाता तो परिणाम बदल सकता था यहाँ तोमर ठाकुरों ने भी इस बार बीजेपी का विरोध किया है।एट्रोसिटी यहां भी एक बड़ा फैक्टर रहा है।

    *मुरैना जिले में बीजेपी की इस पराजय का मूल कारण है दो बड़ी जातियों की नाराजगी ब्राह्मण और वैश्य। 2013 और 2018 में बीजेपी ने किसी भी ब्राह्मण को टिकट नही दी जबकि काँग्रेस ने इस बार 6 मे से 2 सीटों पर ब्राह्मणो को उतारा।वैश्य जाति में केएस के मालिक रमेश गर्ग की नाराजगी ने मुरैना,अंबाह,सबलगढ़ ओऱ जोरा सीटों पर खेल खराब कर दिया।बीजेपी का संगठन पूरे चुनाव में तमाशबीन नजर आया भगवान और केंडिडेट भरोसे हुए सभी जगह चुनाव।गुर्जर तो बीजेपी के परम्परागत रूप से यहां विरोधी थे ही।साथ ही बसपा का कोर वोटर पूरे जिले में कांग्रेस की तरफ ट्रांसफर हुआ और 2 अप्रेल की घटना के बाद सबसे ज्यादा पुलिस केस और जेल इस जिले में ब्राह्मण,वैश्य,ठाकुरों ने ही झेले थे इन सभी सम्मिलित कारणों ने जिले से बीजेपी के सफाये की पटकथा लिख दी थी।

    ……………….भिण्ड……………. .
    (1)भिण्ड की पराजय अप्रत्याशित नही है जिस तरह से अंतिम समय मे यहां टिकट फाइनल किया गया वह हार का कारण साबित हुआ बसपा प्रत्याशी संजू कुशबाह 5 साल से सक्रिय थे विधायक नरेंद्र कुशबाह के बागी होने,कांग्रेस के ब्राह्मण केंडिडेट आने से भिण्ड का पूरा गणित ही बीजेपी के खिलाफ हो गया था।90 फीसदी संगठन नरेंद्र कुशबाह के साथ था जो सिर्फ बीजेपी को हराने के लिये मैदान में थे।कांग्रेस की ठाकुर लॉबी ने भी चौधरी साब को हराने के लिये मेहनत की ।खुद चौधरी अपना पारिवारिक वजूद बरकरार नही रख पाए।भिण्ड की सीट पर चंबल में अकेली सीट थी जहां बसपा का वोट उसके साथ मजबूती से जुड़ा रहा।

    (2)अटेर की सीट पर बीजेपी के अरविंद भदौरिया इस बार जीतने में इसलिये सफल रहे क्योंकि यहां कांग्रेस और ब्राह्मण लॉबी में हेमन्त कटारे की जमकर खिलाफत की वहीँ भदौरिया बैल्ट में 2013 और उपचुनाव की तरह भीतरघात नही हो पाया,भाजपा के बड़े नेताओं की कम से कम भदौरिया ठाकुरों ने नही सुनी इसके अलावा हेमन्त का लगातार क्षेत्र से गायब रहना, उनका खराब व्यवहार भी उनकी हार का आधार बना है।

    (3)मेहगांव की सीट पर ओपीएस भदौरिया की जीत पहले से ही तय थी पिछली बार वे नजदीकी मुकाबले में हारे थे बीजेपी ने यहां भी केंडिडेट चयन में चूक की अच्छा होता यहाँ केपीएस भदौरिया को टिकट दी जाती वे अपने धनबल से भदौरिया वोटर्स में डिवीजन करा लेते बल्कि अन्य समाज का वोट भी ले सकते थे।राकेश शुक्ला इस मल्टी कास्ट सीट पर पहले दिन से ही फिट नही थे बसपा ने कौशल तिवारी को टिकट देकर उनकी सँभाबना और कमजोर कर दी। लोधी बघेल गुर्जर जैसी जातियों का समर्थन बीजेपी को नही मिला।राकेश शुक्ला 2013 में निर्दलीय लड़े थे उन्हें इसके बाबजूद बीजेपी टिकट देना गलत निर्णय साबित हुआ।

    (4)गोहद में भी केंडिडेट का सिलेक्शन गलत साबित हुआ चुनाव पूर्व एट्रोसिटी का सबसे ज्यादा हल्ला इसी सीट पर था कोई भी लाल सिंह आर्य की जीत की बात स्वीकार्य करने तैयार नही था।यहां विशुद रूप से एट्रोसिटी और माई के लाल फैक्टर ने बीजेपी को हराया है।

    (5)लहार की सीट पर डॉ गोविंद सिंह की जीत पहले से ही तय थी उनका जीवंत सम्पर्क इसका आधार है बीजेपी के रसाल सिंह अच्छे केंडिडेट थे लेकिन गुड्डू शर्मा ने बगाबत कर बीजेपी की सँभाबना को खत्म कर दिया गुड्डू शर्मा की बगाबत गोविंद सिंह को जिताने के लिये ही थी जिसे आसानी से हर कोई समझ रहा था।
    भिण्ड जिले में ऐसा पहली बार हुआ है जब कोई ब्राह्मण विधायक चुनकर नही आया है।बीजेपी के दोनों केंडिडेट राकेश शुक्ला और राकेश चौधरी दोनो हार गए और रमेश दुबे को जिस काम के लिये टिकट दी गई थी उसे उन्होंने भी पूरा कर दिया। इसी तरह मुरैना जिले में भी पहली बार हुआ है जब कोई ठाकुर विधानसभा नही पहुँचा है।
    भिण्ड-मुरैना में बीजेपी की हार एट्रोसिटी, माई के लाल,खराब केन्डिडेचर के चलते हुई है।मुरैना में ब्राह्मण,वैश्य,ठाकुर,जाटव गुर्जर,किरार, जातियां उसके खिलाफ रही है।
    भिण्ड में ठाकुर,वैश्य,जाटव,ब्राह्मणो के अलावा बघेल,लोधी,कौरव ने भी बीजेपी का साथ नही दिया।सिंधिया का आक्रमक प्रचार और बीजेपी का अतिशय रक्षात्मक रुख भी हार के ठोस कारणों में एक है।

  • तंत्र शास्त्र सामाजिक विकास में सहयोगीःआनंदी बेन

    तंत्र शास्त्र सामाजिक विकास में सहयोगीःआनंदी बेन

    सांची विश्वविद्यालय में तंत्र और श्रीविद्या पर धर्म-धम्म सम्मेलन सम्पन्न

    भोपाल,19 दिसंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने आज रायसेन जिले सांची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय में जारी धर्म-धम्म सम्मेलन के समापन अवसर पर कहा कि तंत्र शास्त्र और श्रीविद्या, भक्ति और ज्ञान का अध्यात्मिक मार्ग है। इस विषय में जनमानस में अल्पज्ञान है, जिसे दूर करने की ज़रूरत है।

    विश्वविद्यालय के निवृतमान कुलपति आचार्य यज्ञेश्वर शास्त्री ने कहा कि तंत्रशास्त्र शोध की दृष्टि से पिछड़ रहा है। इस कॉन्फ्रेंस से शोध को बढ़ावा मिलेगा। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के चेयरमैन प्रो अरविंद पी जामखेड़कर ने कहा कि तंत्र पर केंद्रित इस सम्मेलन से उन्हें इतिहास को देखने की नई दृष्टि मिली है। विश्वविद्यालय के कुलसचिव श्री अदितिकुमार त्रिपाठी ने कहा कि तंत्र शास्त्र का उल्लेख भारतीय, बौद्ध और जैन साहित्य में प्रमुखता से मिलता है। इस मौके पर विश्वविद्यालय के कुलपति श्री मनोज श्रीवास्तव भी उपस्थित थे।

    समापन सत्र के पूर्व दो सामान्य सत्रों में अमेरिका से आए प्रो. देवाशीष बनर्जी ने तंत्र और वेदांत के अंतरसंबंधों पर प्रकाश डालते हुए दोनों की प्रकियाओं एवं उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। ऑस्ट्रिया के प्रो जयेन्द्र सोनी ने शैव सिद्धांत और शिवज्ञानबोध में शक्तिनिपात का उल्लेख करते हुए कहा कि शक्ति के बिना शिव की कल्पना नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि ज्ञान ही शाश्वत सत्य है और गुरु शिव का प्रतिरूप है।

    समापन कार्यक्रम में विश्वविद्यालय द्वारा गोद लिए गए गांव बिलारा के विद्यार्थियों को राज्यपाल ने फल, किताबें और मेडिकल फर्स्ट एड किट्स भेंट की। तीन दिन के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, फिनलैण्ड, बैल्जियम, कोरिया, श्रीलंका एवं नेपाल से 34 विदेशी विद्वान समेत 130 भारतीय विद्वान शामिल हुए। 6 सामान्य सत्र, 9 गोलमेज सम्मेलन और तीन अकादमिक सत्रों में 100 से अधिक शोधपत्र प्रस्तुत किए गए।

  • कांग्रेस के लिए रक्षा क्षेत्र फंडिंग का स्रोतःनरेन्द्र मोदी

    कांग्रेस के लिए रक्षा क्षेत्र फंडिंग का स्रोतःनरेन्द्र मोदी

    नई दिल्ली,15 दिसंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)।राफेल मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर बड़ा आरोप लगाया है. कांग्रेस पर पीएम मोदी ने पलटवार करते हुए कहा कि वो पैसा बनाने का रास्ता खोज रही है. कांग्रेस ने देश के रक्षा क्षेत्र को लूटा है.

    पीएम मोदी ने कहा, ‘कांग्रेस ने हमेशा पैसा बनाने का रास्ता खोजा है. कांग्रेस के लिए रक्षा क्षेत्र फंडिंग का स्रोत रहा है.’ उन्होंने कहा कि कांग्रेस के घोटालों से सेनाओं के मनोबल में गिरावट आई. उन्होंने (कांग्रेस) सेनाओं के मनोबल की भी चिंता नहीं की.

    उन्होंने ट्वीट कर कहा कि कांग्रेस के राज में यानी 40 और 50 के दशक में जीप घोटाला हुआ. 80 के दशक में बोफोर्स घोटाला हुआ. उन्होंने कांग्रेस राज के घोटालों की लिस्ट को लंबा करते हुए कहा कि उन्हीं की सरकार में अगस्ता और सबमरीन घोटाला हुआ.

    पीएम मोदी ने नई दिल्ली से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए तमिलनाडु के भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ संवाद के दौरान कहा, ‘कांग्रेस के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा क्षेत्र या तो तिरस्कृत क्षेत्र या फिर आय का स्रोत है. वे सब (कांग्रेस) इसे धन बनाने का जरिया मानते हैं चाहे इससे हमारे बलों के मनोबल पर ही प्रभाव क्यों न पड़ता हो.’

    प्रधानमंत्री ने कहा, ‘हमें अपने बलों पर गर्व है और उन पर विश्वास है.’ राजस्थान में हाल में चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने सेना द्वारा सितंबर 2016 में सीमा पार किए गए सर्जिकल स्ट्राइक पर ‘संदेह व्यक्त करने’ को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की निन्दा की थी.

    मोदी ने आरोप लगाया था कि सैन्य अभियान से विपक्ष को खुशी की जगह दुख हुआ. कांग्रेस पर उनका हमला ऐसे समय आया है जब गांधी ने मोदी पर सर्जिकल स्ट्राइक को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने तथा युवाओं को नौकरी देने में विफल रहने का आरोप लगाया.

    इधर, बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनिल बलूनी ने कहा कि राफेल पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दूध का दूध और पानी का पानी करने के बाद कांग्रेस और राहुल गांधी एंड कंपनी बौखला गई है. बीजेपी सोमवार को देश में 70 स्थानों पर प्रेस वार्ता के जरिये कांग्रेस द्वारा देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ और सरकार के खिलाफ षड्यंत्र रचने की साजिश को बेनकाब करेगी.

  • प्रो. आशा शुक्ला बनी कुलपति

    भोपाल,14 दिसंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। कुलाधिपति और राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने प्रो. आशा शुक्ला, विभागाध्यक्ष, महिला अध्ययन विभाग, बरकतउल्ला विश्वविद्यालय, भोपाल को डॉ. बी.आर. अंबेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय, महू का कुलपति नियुक्त किया है। प्रो. आशा शुक्ला की नियुक्ति कुलपति के पद का कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से पांच वर्ष की कालावधि अथवा 70 वर्ष की आयु, जो भी पूर्वतर हो के लिए की कई है।

    प्रो.शुक्ला लिंगभेद को दूर करने के लिए किए गए अपने विशेष प्रयासों के कारण जानी जाती हैं। उन्होंने विभिन्न सामाजिक विषयों पर कई पुस्तकें भी लिखी हैं और शोधपत्र प्रकाशित किए हैं।

  • शिवराज से मुक्ति मंहगी,सस्ती है भाजपा की हार

    शिवराज से मुक्ति मंहगी,सस्ती है भाजपा की हार


    -आलोक सिंघई-
    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब एक जनसभा में मध्यप्रदेश के अतिलोकप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का संबोधन किया तो लोग हैरान रह गए कि मोदी ने ऐसा क्यों बोला। लोगों का मानना था कि मोदी अपने सहयोगी की शान बढ़ाने के लिए ऐसा बोल गए।जबकि राजनीति के खुरपेंच खंगालने वालों को अहसास हो गया था कि मध्यप्रदेश की राजनीतिक उलटबांसी की जानकारी मोदी तक पहुंच चुकी है।इसके बाद पार्टी संगठन से जुड़े वरिष्ठ पदाधिकारी भी समय समय पर खरीदी जा रही लोकप्रियता की खबरों पर हैरान होते रहे,लेकिन शिवराज को कुर्सी पर बिठाए रखने वाले उद्योगपतियों और दलालों का जाल इतना मजबूत था कि उन्होंने शिवराज को पद से डिगने नहीं दिया। पार्टी संगठन के कई पदाधिकारी बार बार प्रयास करते रहे कि पार्टी के मौजूदा हालात बदलें पर विकल्पहीनता ने उन्हें खामोश कर दिया। ये विकल्पहीनता पार्टी के बधियाकरण का हिस्सा थी। चुन चुनकर कर्मठ नेताओं को पंगु बनाया जाता रहा। जो नेता कभी शक्तिकेन्द्र के रूप में सिर उठा सकता था उसके विरुद्ध आपरधिक मामले खोले जाते रहे। इलाकाई क्षत्रपों को उनके प्रतिद्वंदियों से घेरा जाता रहा। नतीजतन भाजपा एक ऐसी अंधीगली में पहुंच गई जहां आगे का रास्ता बंद था।

    आज भाजपा की हार के लिए जिस एंटी इनकमबेंसी की बात कही जा रही है वो सत्ता विरोधी लहर तो भाजपा के भीतर से ही जन्म ले रही थी। चूहा बिल्ली के इस खेल में शिवराज जी भोली मुखमुद्रा से बच लिए लेकिन उनकी धर्मपत्नी साधना सिंह नेताओं की आंखों की किरकिरी बन गईं।प्रमुख सचिव एसके मिश्रा के माध्यम से सत्ता का शोषण करने की उनकी शैली पार्टी के भीतर चिढ़ की वजह बनने लगी। भ्रष्ट अफसरों को मैदानी कार्य देना और ईमानदार अफसरों को घर बिठा देने की वजह से बदनामियों की सुगबुगाहट शिवराज सिंह के पूरे कार्यकाल में हताशा फैलाती रही।यदि भाजपा और संघ के समर्पित कार्यकर्ताओं की जगह कांग्रेस में ये बातें फैलतीं तो पार्टी में ही विरोध के स्वर भी गूंजने लगते लेकिन भाजपा में शांति छाई रही और लोगों को सत्ता से चिढ़ का अहसास नहीं हुआ। अफसरों ने एसके मिश्रा के भ्रष्टाचारों पर खूब चर्चाएं कीं जो चटखारे लेकर सुनी सुनाई जाती रहीं। अंतिम दौर में शिवराज सिंह के बुधनी फार्म हाऊस की फिल्म पर भी लोगों ने आसानी से यकीन कर लिया,जबकि वो फार्म हाऊस शिवराज ने बैंक से कर्ज लेकर ख़ड़ा किया था। जो मुख्यमंत्री दो लाख दस हजार करोड़ से ऊपर का बजट खर्च करता हो उसके मात्र सात करोड़ के फार्म हाऊस को बड़ा भ्रष्टाचार माना गया।ये खबरें भी उन्हीं अफसरों ने उड़ाईं जो शिवराज में कमीशनखोरी करते हुए अरबपति बन गए थे।

    चुनाव के बाद शिवराज सिंह ने नोटबंदी, एट्रोसिटी एक्ट और जीएसटी को अपनी हार की वजह बताया था। जबकि एट्रोसिटी एक्ट पर शिवराज का दिया वो बयान सुर्खियां बना जिसमें उन्होंने कहा था कि कोई माई का लाल आरक्षण समाप्त नहीं कर सकता। सपाक्स के नेताओं का तो ध्येय वाक्य यही बना और उन्होंने भाजपा के वोट बैंक को छिन्न भिन्न करने में सफलता पाई। सपाक्स ने वोट तो बहुत कम पाए लेकिन भाजपा का जनाधार तोड़ दिया। भाजपा से हटा ये वोट कांग्रेस के खाते में गया और उसके वोट बैंक में भरपूर इजाफा हुआ। दंभी सवर्णों खासतौर पर ब्राह्मणों ने माई के लाल को ध्वजवाक्य बना लिया। आज भी वे इस ध्वजा को फहरा रहे हैं। भाजपा का कमजोर संगठन और दोयम दर्जे के अकुशल नेताओं को अपने करीब जुटा लेने की शिवराज सिंह की अकुशलता ने भाजपा को उसकी जड़ों से काट दिया। जबकि इसकी तुलना में जिस विंध्य प्रदेश को भाजपा के लिए खतरे की घंटी माना जा रहा था वहां संगठन के एक मजबूत स्तंभ बीडी शर्मा ने वो जादू बिखेरा कि जिसकी आंधी में अजय सिंह राहुल,और सुंदरलाल तिवारी जैसे दिग्गज भी उड़ गए। जिस अभय मिश्रा को राजेन्द्र शुक्ल के लिए चुनौती माना जा रहा था वे भी अंततः ध्वस्त कर दिए गए। इसका मतलब साफ है कि जिस चुनौती पर आसानी से विजय पाई जा सकती थी उसके सामने संगठन के अकुशल नेतृत्व ने हथियार डाल दिए। इसकी एक वजह ये भी थी कि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह फायरब्रांड नेता तो थे लेकिन उनमें संगठन क्षमता का नितांत अभाव देखने मिला। उनके पास संगठन को एकजुट करने का वक्त भी कम था लेकिन यदि वे सरताज सिंह, धीरज पटैरिया, रामकृष्ण कुसमारिया जैसे कई बागियों को मना पाते तो भाजपा कई सीटें आसानी से बचा लेती। भिंड, दमोह, बमोरी, पथरिया, महेश्वर जैसी सीटें ही भाजपा के पास आ जातीं तो वो आसानी से सरकार बनाने की स्थिति में आ जाती।

    जो नोटबंदी और जीएसटी भाजपा की जीत की वजह बन जानी थीं उसे अपने भोंदू सलाहकारों की वजह से वे हार का कारण मानते रहे। नोटबंदी के बाद भाजपा की सरकार और संगठन को जिस तरह से व्यापारियों और आम लोगों का मार्गदर्शन करना था उन्होंने नहीं किया। उलटे शिवराज जी लोगों के बीच सफाई देते घूमते रहे कि नोटबंदी उन्होंने नहीं की है ये तो केन्द्र का फैसला है। समानांतर अर्थव्यवस्था को तोड़ने के लिए उठाए गए ये कदम कैसे लोगों की समृद्धि की चाभी बन सकते हैं इसे समझाने में असफल रहने के कारण नाराजगी बढ़ती गई। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर कमर के नीचे वार करने में भी कोई कोताही नहीं बरती। उसका एक विज्ञापन जो कहता था कि धंधा चौपट करने वाली सरकार बदल दो कई दिनों तक चलता रहा। जब जीएसटी काऊंसिल ने कांग्रेस हाईकमान से नाराजगी दर्ज कराई तब जाकर उसे बंद किया गया। ये विज्ञापन टैक्स चोरों को उकसाने वाला था लेकिन भाजपा के सलाहकार उसका जवाब नहीं दे पाए। इसकी तुलना में भाजपा के विज्ञापन नीरस और अहसान थोपने वाले थे जो भाजपा के दंभ की दीवार मजबूत करते चले गए।

    शिवराज सिंह सरकार का बोगस खुफिया तंत्र भी फीडबैक देने में असफल रहा। वो ये तो बताता रहा कि आपकी सरकार सत्ता विरोधी लहर की चपेट में आ गई है लेकिन इसकी वजह और निदान का रास्ता वो नहीं सुझा सका। वास्तव में भाजपा के विरुद्ध सत्ता विरोधी लहर इतनी तेज थी भी नहीं। केन्द्र सरकार ने आयातित ईंधन आधारित जिस सार्वजनिक परिवहन के स्थान पर बिजली से चलने वाले परिवहन को बढ़ावा देने की नीति बनाई। जल परिवहन को बढ़ाकर सार्वजनिक ट्रांसपोर्ट को सस्ता और स्वदेशी बनाने का प्रयास किया।परमाण्विक ऊर्जा और वैकल्पिक सोलर, विंड इनर्जी आधारित संयंत्रों को बढ़ावा देने की रणनीति को जन अभियान बनाने का प्रयास किया उससे तेल माफिया के कान खड़े हो गए। तेल माफिया ने भारत को ऊर्जा का गुलाम बनाने में कांग्रेसी सरकारों में बड़ा निवेश किया था। कार कंपनियों के माध्यम से सत्ताधीशों को मोटी रिश्वतें दिलाई गईं थीं। सड़कें चौड़ी करने के नाम पर भारत को जो कर्ज लेना पड़ा उसकी सूदखोरी को भी फलने फूलने का भरपूर अवसर मिला था।मोदी सरकार जिस तेजी से आयातित ईंधन की खपत घटाने की नीति पर काम कर रही है उससे तेल माफिया को अपने अस्तित्व पर संकट मंडराता नजर आने लगा है। इसे रोकने के लिए तेल उत्पादक देशों ने भारत में भारी धन निवेश किया। ये धन चुनावों से पहले अगड़ियों के माध्यम से बाजार में उतारा गया। पूरे बाजार में इससे खलबली मच गई। जब ये धन उतारा जा रहा था तभी सूदखोर व्यापारी चिल्ला रहे थे कि बाजार से धन गायब हो गया है। इसके बावजूद सरकार के मूर्ख खुफिया तंत्र के कान खड़े नहीं हुए। यही धन चुनाव से पहले मध्यप्रदेश में कमलनाथ ने भाजपा में विद्रोह फैलाने के लिए खर्च किया। छत्तीसगढ़ में जिस जोगी सरकार को भाजपा की बी टीम बताया जाता रहा वो दरअसल कांग्रेस की बी टीम थी। राजस्थान में भी यही काला धन भाजपा में विद्रोह की वजह बना। भाजपा संगठन के आत्मकेन्द्रित नेतागण इस समस्या को नहीं भांप सके और वे सरकार की ओर से प्रचार के नाम पर खर्च किए जा रहे धन को बटोरने की जुगत ही बिठाते रहे। नतीजतन कांग्रेस भाजपा के विरुद्ध जन आक्रोश भड़काने में सफल रही। ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाकर कांग्रेस उस षड़यंत्र से ध्यान हटाने में असफल रही जिसके चलते फर्जी वोटरों की आड़ में भाजपा के वोट बैंक का बड़ा हिस्सा काट दिया गया। इस सारे षड़यंत्र का केन्द्र मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत का कार्यालय था।ओपी रावत भी शिवराजसिंह चौहान के ही सताए अफसर थे जिन्होंने मौका देखकर चौका जड़ने में देरी नहीं लगाई।

    ये सारा माहौल इसलिए परवान चढ़ा कि भाजपा ने संगठन को लगातार कमजोर किया और उसमें हवा हवाई नेताओं को आगे बढ़ाया जाता रहा। सत्ता पर कमीशनखोरों के बढ़ते प्रभाव ने जनहितकारी योजनाओं की डिलीवरी को बाधित किया। गोपाल भार्गव, भूपेन्द्र सिंह, माया सिंह, कुसुम मेहदेले,बाबूलाल गौर, विश्वास सारंग,रामपाल सिंह,सरताज सिंह, जैसे मंत्रियों के भ्रष्टाचार पर सरकार का कोई अंकुश नहीं था। शिवराज जी अपने पूरे कार्यकाल में ऐसे चापलूसों से घिरे रहे जिनका जनाधार नहीं था और वे मंत्रिपद की आड़ में केवल भ्रष्टाचार करने में लगे रहे। संगठन में भी ऐसे लोगों को बढ़ावा दिया जाता रहा जो अकुशल और आत्मकेन्द्रित थे। नतीजतन पूरी सत्ता और संगठन जनता से कटता चला गया। भाजपा की फौरी निदान करने वाली आर्थिक नीतियों ने प्रदेश को तो कर्जदार बनाया लेकिन उत्पादकता बढ़ाने में असफल साबित हुईं। वित्तमंत्री के रूप में जिस राघवजी भाई ने प्रदेश के आर्थिक विकास की इबारत लिखी उसे अर्जुनसिंह समर्थक सुंदरलाल पटवा की निजी खुन्नस के चलते चरित्रहीनता के लांछन से ध्वस्त कर दिया गया। कभी संवाद का केन्द्र रहा पत्रकार भवन दलालों के हाथों गिरवी रखा जाता रहा।ऐन चुनाव के मौके पर ये भवन भी सत्ता विरोधी षड़यंत्रों का केन्द्र बन गया।इस तरह से कई आत्मघाती नीतियों ने भाजपा के समर्पित कार्यकर्ताओं की फौज को हतोत्साहित करने का षड़यंत्र किया है।जिसकी एकमात्र वजह व्यक्ति केन्द्रित शिवराज सिंह चौहान का नेतृत्व रहा है। सत्ता से उतार दिए जाने के बाद भले ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से हार की जिम्मेदारी लेकर खुद को फ्री घोषित कर दिया है लेकिन वास्तव में उन्हें इतनी आसानी से बरी नही किया जा सकता। लाखों करोड़ों कार्यकर्ताओं की मेहनत और समर्पण की कीमत केवल चार शब्दों में माफी मांग लेने से नहीं चुकाई जा सकती। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नीति निर्धारकों को इस पर गौर करना होगा। मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार का पतन इतना मंहगा नहीं है जितनी मंहगी कीमत उसे शिवराज सिंह चौहान को लगातार सत्ता का केन्द्र बनाए रखने पर चुकानी पड़ रही थी।

  • मनीष गौतम रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार

    मनीष गौतम रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार

    अहमदाबाद,11 दिसबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। डायरेक्टर आफ रीजनल आऊटरीच ब्यूरो(आरओबी) के निदेशक और भारतीय सूचना सेवा के अधिकारी मनीष आर गौतम को गुजरात एंटी करप्शन ब्यूरो ने बीस हजार रुपए की रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया है।भोपाल दूरदर्शन में सहायक निदेशक रहा ये अधिकारी एक जादूगर से रिश्वत लेते धराया गया है।

    अहमदाबाद पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का यह प्रथम श्रेणी अधिकारी एक जादूगर को प्रचार कार्य का ठेका देने के लिए रिश्वत मांग रहा था। कलाकार की शिकायत पर एंटी करप्शन ब्यूरो ने नेहरूनगर में जाल बिछाया और गौतम को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों धर दबोचा।पुलिस ने उसके कब्जे से रिश्वत की रकम के रूप में बीस हजार रुपए बरामद किए हैं।

    प्राप्त जानकारी के अनुसार मनीष गौतम के विरुद्ध कई सालों से रिश्वतखोरी की शिकायतें मिलती रहीं हैं। भोपाल दूरदर्शन में संवाददाताओं को नियुक्त करने में रिश्वत लेने के संबंध में भी शिकायतें की गईं थीं लेकिन जांच एजेंसियों की शिथिलता के चलते कार्रवाई नहीं की जा सकी। फिलहाल गुजरात एंटी करप्शन ब्यूरो उन शिकायतों की भी छानबीन कर रहा है। गौतम की संपत्तियों की भी जानकारी जुटाई जा रही है।

  • मिजोरम में MNF ने कांग्रेस से सत्ता छीनी, पूर्ण बहुमत से बनाएगी सरकार

    मिजोरम में MNF ने कांग्रेस से सत्ता छीनी, पूर्ण बहुमत से बनाएगी सरकार

    आइजोल,11 दिसंबर,(प्रेस सूचना केन्द्र)। मिजोरम विधानसभा चुनाव की तस्वीर पूरी तरह साफ हो गई है। MNF पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बना रही है। MNF ने 26, कांग्रेस ने 5, बीजेपी ने 1 और निर्दलीय प्रत्याशियों ने 8 सीटों पर जीत दर्ज की है। हालांकि, इस चुनाव में कांग्रेस के मुख्यमंत्री पी. ललथनहवला चंफाई साउथ और सेरछिप दोनों सीटों से चुनाव हार गए हैं। बता दें कि 10 साल के बाद MNF फिर से राज्य की सत्ता पर काबिज होने जा रही है। मिजोरम में अब तक दो ही मुख्यमंत्री हुए हैं।

    इस बीच MNF प्रेजिडेंट जोरम थंगा ने कहा, ‘हमारी बीजेपी के साथ या किसी अन्य स्थिति में गठबंधन सरकार नहीं बनेगी क्योंकि हमारी पार्टी अपने दम पर सरकार बनाने में सक्षम है। हमने 40 में से 26 सीटों पर जीत दर्ज की है। हम NEDA (नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस) और NDA का हिस्सा हैं। लेकिन हम कांग्रेस या UPA के साथ नहीं जाना चाहेंगे।

    बता दें कि इस चुनाव में मिजो नैशनल फ्रंट के 40 प्रत्याशी मैदान में थे। बीजेपी के 39 और नैशनल पीपल्स पार्टी के 9 उम्मीदवार चुनाव में अपनी किस्मत आजमा रहे थे। मिजोरम में इस बार 75 फीसदी मतदान हुए। मिजोरम में MNF कार्यकर्ताओं ने मिठाई बांटकर और नाच-गाकर जश्न मनाना शुरू कर दिया है

    मिजोरम में 1998 से 2008 तक नैशनल फ्रंट के लीटर पु. जोरमथंगा की सरकार थी। 1987 में विधायक चुन कर आए जोरम थंगा पहली बार ही राज्य में शिक्षा एवं वित्त मंत्री बने थे। राज्य में बहुमत हासिल करने के लिए 21 सीटें मिलना जरूरी था। मिजोरम में इस बार कुल 209 प्रत्याशी मैदान में थे। वहीं, 2013 के चुनाव में मिजो पीपुल्स पार्टी को मात्र 5 सीटों पर जीत दर्ज हुई थी।

  • समर्थ हैं तो जरूरतमंदों की मदद करें बोलीं राज्यपाल

    समर्थ हैं तो जरूरतमंदों की मदद करें बोलीं राज्यपाल

    भोपाल 7 दिसंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)।राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने कोलार रोड स्थित दिल्ली पब्लिक स्कूल के तृतीय वार्षिक उत्सव में प्रायमरी, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक कक्षाओं में प्रथम आने वाले बच्चों, खेलकूद में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले बच्चों और संगीत के क्षेत्र में विशिष्ट प्रदर्शन करने वाले बच्चों को स्मृति-चिन्ह और प्रशस्ति पत्र प्रदान किये। उन्होंने स्कूल प्रबंधन को राजभवन परिवार के बच्चों को साँची घुमाने के लिये बसे उपलब्ध करवाने, बाल साहित्य प्रदान करने और पढ़े भोपाल में सक्रिय योगदान के लिये धन्यवाद दिया।

    राज्यपाल ने कहा कि हर समर्थवान को जरूरतमंद की मदद करना चाहिये। इसी भावना के साथ बड़े स्कूल छोटे स्कूलों की मदद करें और गरीब बच्चों को आगे लाने का प्रयास करें। उन्होंने कहा कि अगर लोग अपने जन्म-दिन पर स्कूलों में जाकर बच्चों को फल-मिठाई आदि वितरित करेंगे, तो बच्चे तो खुश होंगे ही, उन्हें भी आत्म संतुष्टि मिलेगी।

    कार्यक्रम के प्रारंभ में स्कूल प्रबंधन ने राज्यपाल का स्वागत करते हुए उनके ही फोटो पर ऑटोग्राफ लिये और फूलों का पौधा भेंट किया। स्कूल की छात्रा सुश्री कमलप्रीत कौर ने राज्यपाल को चारकोल से बनाई गई उन्हीं की पेंटिंग भेंट की। कार्यक्रम के दूसरे चरण में स्कूलों के बच्चों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये गये।

    राज्यपाल ने स्कूली बच्चों को बाँटी किताबें और खेलकूद, पेंटिंग की सामग्री

    बच्चों को जब किसी विशिष्ट व्यक्ति के स्नेह और दुलार के साथ-साथ उपहार मिलता है, तो उनमें नई ऊर्जा का संचार होता है और उनके चेहरे की खुशी देखते ही बनती है। ऐसा ही अवसर शा.मा. शाला कुम्हारपुरा के स्कूल के बच्चों के लिये था, जब उन्हें राजभवन में राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने आमंत्रित कर खेलकूद का सामान, चित्रकला सामग्री और बाल साहित्य की किताबें बाँटीं।

    राज्यपाल ने बच्चों से कहा कि हमें अपना हर काम स्वयं करने की कोशिश करना चाहिये क्योंकि इससे आत्मबल बढ़ता है और हम सक्षम बनते हैं। उल्लेखनीय है कि श्रीमती पटेल ने पहले राजभवन में संचालित वर्तमान में कुम्हारपुरा स्कूल को गोद लेकर वहाँ के बच्चों की बेहतरी के लिये काम शुरू किये है। उनके प्रयासों से बैंक ऑफ बड़ोदा के सहयोग से प्राप्त खेल सामग्री, बीएसएनएल के सहयोग से प्राप्त पेंटिंग सामग्री एवं डी.पी.एस. स्कूल के सहयोग से प्राप्त बाल साहित्य बच्चों को भेंट किया गया।

    श्रीमती पटेल ने बच्चों को इण्‍डोर गेम्स कैरम, शतरंज, लूडो, रस्सी, बेडमिंटन और चित्रकला में कलर बुक, पेंटिंग स्टेंड और कलर्स दिये, वही किताबों में प्रेमचंद साहित्य के अलावा अनेक ज्ञानवर्धक किताबें दीं, जिसे पाकर बच्चे प्रसन्न और उत्साहित थे। कुम्हारपुरा स्कूल की 8वीं कक्षा की छात्रा सोनिया ने कार्यक्रम का संचालन किया। उसने कहा कि पहले हम लोगों के पास खेल, चित्रकला, संगीत और कम्प्यूटर जैसा कोई सामान नहीं था। राज्यपाल द्वारा दी गई सामग्री से हम सभी बच्चे खूब खेलेंगे, चित्रकारी करेंगे, संगीत सीखेंगे और स्मार्ट कक्षाओं में पढ़ाई भी करेंगे। इस अवसर पर बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति भी दी। इस मौके पर राज्यपाल के सचिव, उप सचिव और स्कूल प्रबंधन भी उपस्थित था।

  • गांव को बाजार की गुलामी से कैसे मिले आजादी

    गांव को बाजार की गुलामी से कैसे मिले आजादी

    लेखक : प्रभाकर केलकर ,भारतीय किसान संघ

    पिछले महीनो में देश के अनेक राज्यों में किसानों द्वारा अपनी मांगो को लेकर विधानसभा एवं संसद घेराव के मार्च का सिलसिला तेज हुआ है। किसान संगठनो की अलग अलग सभाऐं हो रही है। जिनमें अनेक राजनैतिक दलों के झण्डे एवं नेता भी शामिल होतें है और उत्तेजक भाषणों के साथ ये कार्यक्रम किसी अगली योजना के एलान के साथ समाप्त होते हैं… हर सभाओ में प्रमुख मुद्दे 1.कर्जमाफी 2. पेंशन 3. लाभकारी मूल्य 4.न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) होते हैं ,लेकिन समाधान की पहल नज़र नहीं आती है।

    विगत 30 वर्षो में अनेक सरकारें बनी अनेक योजनाए भी सामने आयी , पूरे देश में किसानों के नाम पर लगभग 3 लाख करोड़ की कर्जमाफी भी हुई लेकिन इन उपायों के वाबजूद किसानों की समस्याऐं समाप्त नही हुई । ये एक कटु सत्य है।

    उपरोक्त समस्याओं के उपाय पर विचार करने से पहले इसका विशलेषण करने का प्रयास करेगें कि देश के संचालन में कौन सी विचारधारा काम करती है। इसके लिये हमें देश व दुनिया में चलने वाली विचारधाराओं पर भी विचार करना होगा।

    सामान्यतः तीन प्रकार की विचारधाराऐं दिखाई पड़ती है-

    1. साम्यवादी विचारधारा

    2. पूंजीवादी विचारधारा

    3. भारत की स्वावलम्बी आत्मनिर्भर समाज की विचारधारा।

    1.साम्यवादी विचारधारा- सबसे पहलें साम्यवादी विचारधारा पर विचार करते है, साम्यवादी विचारधारा के अनुसार ‘‘सर्वहारा की विजय एवं शासन’’ का नारा दिया जाता है। लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं दिखाई देता। अन्त में वहां पर पोलित ब्यूरो एवं एक पार्टी (साम्यवादी विचारधाराओं वाली) का शासन हो जाता है। जिसका उदाहरण चीन एवं रूस आदि देश है।

    समाज को सुखी करने के नाम पर वे किसान , मजदूरों एवं समाज को सरकारी संसाधनों का बांटना एक उपाय मानते है जैसे -कर्जमाफी, पेंशन योजना आदि। इसका परिणाम यह होता है कि समाज या जनता सरकार पर निर्भर होती चली जाती है। वे चाहते भी यहीं हैं कि कोई व्यक्ति स्वतन्त्र विचार करके उनके किसी कार्य में हस्तक्षेप न करे। यदि कोई समूह स्वतन्त्र अभिव्यक्ति का प्रयत्न करता है तो उसे गोलियों से भून दिया जाता है ,जिसका जवलन्त उदाहरण चीन में 70 के दशक में हजारों छात्रों एवं युवाओं को मौत के घाट उतरा गया । रूस में तो ऐसे सेकड़ो उदाहरण है और इसलिये ऊपर से देश शक्तिशाली व अन्दर से वही देश खोखला दिखाई देता है। जनता को स्वतन्त्रता की अभिव्यक्ति के किसी भी प्रकार के अधिकार नहीं होते हैं।

    2. पूंजीवादी विचारधारा – यह व्यवस्था धीरे-धीरे बडे उद्योगपतियों व पॅूजीपतियों द्वारा लोकतान्त्रिक सत्ता का नियन्त्रण करती है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण अमेरिका के साथ-साथ अन्य लोकतांत्रिक देश भी है। अमेरिका के राष्ट्रपति पूॅजीपतियों के इशारों पर चलने के लिये मजबूर हो जाती है। भारत में जब मानसेन्टों बीज कम्पनी को अतिरिक्त दाम घटानें के लिये बाध्य किया और अनेक प्रतिबन्ध लगाये तब मानसेन्टों बीज कम्पनी के द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति को कहने पर उन्होनें भारत पर दबाव बनाकर उन प्रतिबन्धों को तत्काल हटाने के लिये मजबूर किया।यह घटना 2017 मे घटित हुई थी।

    पूंजीवाद का बोध वाक्य है ‘‘सर्वश्रेष्ठ की विजय’’ जिसका अर्थ है जो सबसे ताकतवर है उसका सभी संसाधनों पर अधिकार होगा। आज अमेरिका एवं अन्य अति विकसित देश इसी विचारधारा पर चलते दिखाई दे रहे है इन देशों द्वारा संसार के लगभग 80 प्रतिशत संसाधनों का उपयोग किया जाता है और प्रकृति का अति शोषण होता है ये देश अपनी ऐशोआराम की जिन्दगीं जीने के लिये एवं सुख सुविधाओं के लिये कार्बन एवं अन्य गैंसो का अतिशय उत्सर्जन करते हैं जिससे पूरी पृथ्वी का प्रदूषण खराब हो रहा है। पूंजीवादी व्यवस्था में पिछड़े देशों का शोषण होता है। पूंजीवादी देशों में असहाय, निर्धन व दिव्यांग जनता नारकीय जीवन जीने के लिये बाध्य होती है।

    3.भारतीय प्राचीन अर्थव्यवस्था- 1. जिसके अनुसार एक व्यक्ति कमायेगा , पूरे परिवार को खिलायेगा।

    2.पूंजीपतियों के लिये न्यासी सिद्धांत 3. शासन के लिये धर्म आधारित शासन चलाने की अनिवार्यता।

    1. एक व्यक्ति कमायेगा व दस को खिलायेगा का अर्थ है कि परिवार का मुखिया मेहनत करके कमायेगा व परिवार का पालन-पोषण करेगा।

    2. न्यासी सिद्धांत का अर्थ है पूंजीपति व्यापारी आदि परिवार खर्च के अलावा बचे हुए धन के समाज हित के लिये संरक्षक न्यासी होगें। जिसके उदाहरण है- सेठ , व्यापारी आदि के द्वारा पूरे देश में धर्मशालाऐ, तीर्थ क्षेत्रों का निर्माण व अन्न क्षेत्रों का संचालन आदि किया जाना हैं और हम देखते है कि यह अनादि काल से चला आ रहा है। पूरे विश्व में केवल भारत के अन्दर ही यह अनुठी व्यवस्था है , दुनिया में किसी भी देश में धर्मशाला बनाने का विचार नहीं है ।

    3.शासन/राज्य-राजा राज व्यवस्था, लोकतांत्रिक या गणराज्य मे धर्म यानि कानून के निर्देशों के अनुसार चलाते थें व हैं तथा ये तीनों मिलकर आत्मनिर्भर, स्वावलम्बी समाज का निर्माण करते है। जो वह समाज सरकार पर निर्भर नही होता है। जिससे समाज में स्वतन्त्र विचार पनपनें के लिए योग्य वातावरण बना रहता है। उपरोक्त विचारों की छाया मे वर्तमान किसान व मजदूरों को देखे तो सरकारे , संसाधनों को बांटकर इन वर्गो को परावलम्बी व पंगू बना रही हैं।

    किसानो को आत्मनिर्भर बनाने के लिये हमारी निम्न उपाय हो सकते हैः-

    1.उधोगपति-पूंजीपति , व्यापारि आदि अपने बचे हुए धन का समाज को सामथ्र्यवान बनाने के लिए उपयोग करें। जैसे कमाई के साधन देकर आत्मनिर्भर बनाऐ उदाहरण के लिए- सिलाई मशीन चलाने की ट्रेनिंग देकर उन्हें मशीन प्रदान करना आदि।

    2.सरकारे कर्जमाफी व पेंशन आदि के स्थान पर किसानों को प्रति एकड़ प्रति वर्ष निश्चित प्रोत्साहन राशि प्रदान करे।

    3.अनाज खरीदी के साथ प्रति क्विंटल प्रोत्साहन राशि दें व फसल बीमा के स्थान पर किसान सुरक्षा कोष बनाएं जिसमें से किसानों की फसल हानी होने पर उन्हें तत्काल सहायता प्रदान की जा सके।इस कोष में पेसों की स्थाई व्यवस्था के लिए इस कोष को देश की कृषि उपज मंण्डियों से जोड़ देना चाहिए।

    4.किसानों से कौनसी फसल बोना है, खरीदी की गैरेन्टी के साथ सरकारें अनुबन्ध कर सकती हैं।

    विगत अनेक वर्षो से कृषि वैज्ञानिकों द्वारा अनाज की आत्मनिर्भरता को लेकर देश के पूरे फसल चक्र में परिवर्तन कर दिया गया हैं, ‘‘इसके अन्तर्गत बहु फसली खेती के स्थान पर एक फसली खेती को प्रोत्साहन दिया गया हैं’’। यह प्रणाली किसानों के लिए हानिकारक बन गई हैं। पहले के समय में किसान बारह महिनों में लगभग 24 फसलें लेता था, इस कारण उसके घर मे सर्वदा कुछ ना कुछ अनाज बना रहता था। आज अनेक राज्यों में बरसाती मौसम में केवल सोयाबीन पैदा करते हैं जिसे खाया नही जा सकता हैं।

    कुछ विद्वान लोग किसानों को सोने का भाव, कर्मचारियों के वेतन एवं किसानों की आय की तुलना करते हैं, जबकि कर्मचारी केवल तीन प्रतिशत हैं और सोना बहुत कम लोग खरीद कर रख पाते हैं जैसे- एक कृषि उपज मंण्डी में एक सौ व्यापारी होते हैं और दस हजार किसान वहां अनाज बेचते हैं। स्वाभाविक रूप से व्यापारियों की आय किसानों से अधिक रहेगी और दोनों की तुलना करना उचित नहीं होगा।

    यहां उल्लेखनीय है कि किसानों को भी रासायनिक खाद, रासायनिक दवाई, पेस्टीसाईड, उन्नत बीज, कृषि यन्त्र आदि के लिए बाजारों पर निर्भर रहना पड़ता हैं, जिससे किसानों की खेती की लागत अत्यधिक मात्रा में बढ़ गई हैं। बाजारों पर निर्भर रहकर किसान एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था कभी भी आत्मनिर्भर नहीं हो सकती हैं और ग्रामीण भारत हमेशा गरीबी या आर्थिक तंगी में फॅसा रहेगा। कृषि वैज्ञानिकों को चाहिए कि वे रासायनिकों के उपयोग के स्थान पर किसानों को जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित करें। किसानों को चाहिए कि वे गाय आधारित जैविक खेती एवं पशुपालन के साथ खेती करें। ग्रामीण भारत में जब तक कुटिर एवं लघु उद्योगों को पुनः प्रारम्भ नहीं किया जायेगा तब तक ग्रामीण भारत आत्मनिर्भर, स्वावलम्बी भारत का चित्र नहीं बन सकता हैं।

    “जिस देश का समाज रोजगार के लिए सरकार, उद्योग एवं व्यापारियों पर निर्भर रहता है वह गुलामी की राह चलता हैं। जो समाज स्वरोजगार युक्त स्वाभिमान सम्पन्न जीवन जीता है वह निरन्तर सम्पन्नता में आगे बढ़ता जाता हैं’’ और दुनिया में उसकी साख बढ़ती जाती हैं। वर्तमान में हमारे देश मे ठीक इसका उल्टा होता हुआ दिखाई देता है। 1947 से पूर्व देश गुलाम था ,गाँव आत्मनिर्भर थे। वर्तमान में देश स्वतंत्र है लेकिन गाँव गुलाम हो गया है वह पूरी तरह बाज़ार पर निर्भर हो गया है। इस निर्भरता को कम करने से ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार संभव है।

  • देश का अन्नदाता आखिर कर्जदार क्यों?

    देश का अन्नदाता आखिर कर्जदार क्यों?

    देश का किसान संकट में है क्योंकि किसान कर्ज में पैदा होता है, कर्ज में जीता है और अब तो कर्ज के दबाव में इहलीला स्वत: समाप्त कर कर्ज से मुक्ति लेना चाहता है। सरकार किसी दल की हो, बार बार कर्ज माफी का ढोंगकरतथा कथित बुद्धिजीवियों की नजरों में उसे कामचोर बना देती है। हाल के वर्षो की याद करें तो 2009 में पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने ढोल पीटकर किसान को कर्ज माफी घोषित की। महाराष्ट्र का विदर्भ अंचल लगातार सूखा की चपेट में था और केन्द्र सरकार ने किसानों के घावों पर मरहम लगाने का काम तो किया लेकिन हकीकत इस बात से मेल नहीं खाती कि डॉ. मनमोहन सिंह सरकार की इस राजनीतिक उदारता से किसानों को कोई लाभ पहुंचा। रोग बढ़ता ही गया ज्यों-ज्यों दवा की।
    हाल में उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र और पंजाब ने भी कर्ज माफी की घोषणा की और अमल भी हो रहा है। इसके बाद कर्नाटक सरकार ने कर्ज माफी का कदम उठाया है। लेकिन कर्ज के दबाव में मौत का सिलसिला थमा नहीं है। इससे लगता है कि सरकारें इस मर्म को समझ नहीं पा रही है कि किसान की आवश्यकता आर्थिक सशक्तिकरण के उपाय किए जाने की है और यह तभी संभव है जब किसान के कृषि उत्पाद की कीमत इस प्रकार निर्धारित हो कि किसान का सशक्तिकरण हो। कृषि की बढ़ती लागत और कृषि उत्पाद के फिसलते मूल्यों ने किसान को संकट में डाला है। उसके खर्च काटकर उसे दो पैसे मिलने से आगामी फसल में निवेश के लिए किसान की बरकत होगी। इससे किसान की क्षमता बढ़ेगी, उसे दूसरों के सामने हाथ पसारने की नौबत नहीं आयेगी। कृषि वैज्ञानिक डॉ. स्वामीनाथन ने वर्षों पहले यही सुझाव दिया था।
    मध्यप्रदेश सरकार ने इस दिशा में कुछ ठोस पहल आरंभ की है। फलस्वरूप प्रदेश में कृषि उत्पाद मूल्य और कृषि उत्पाद विपणन आयोग बनाया जा रहा है। उद्देश्य सही दिशा में सोच प्रदर्शित करता है। इसके नतीजों पर कहना जल्दबाजी होगी लेकिन आयोग का गठन सामयिक और प्रासंगिक है, इसमें शायद ही दो राय हो। इसके अलावा खेती के लिए कर्ज जीरो प्रतिशत ब्याज पर दिया जा रहा है। मध्यप्रदेश सरकार ने फसलों के समर्थन मूल्य की गारंटी दी है। यहां तक कि मानसून के संकेत मिलने के बाद भी प्याज, दलहन की खरीद जारी रखी है।

    आज के परिप्रेक्ष्य में सोचें तो आजादी के संघर्ष के दौरान किसान की समस्याओं को लेकर संग्राम शुरू हुआ। आजादी के संघर्ष का किसान ध्वजवाहक बना। चंपारन और वारदोली आंदोलन ने देश की जनता को स्वाधीनता के प्रति जागरूक किया लेकिन जो दल आज किसानपरस्ती के ढोंग में कर्ज माफी की बात करते हैं, उन्होंने किसानों के सशक्तिकरण आंदोलन के समर्थन से मुंह मोड़ लिया था। उन्होंने जमीदारों का साथ दिया। अबबत्ता किसान के संघर्ष का विरोध नहीं किया क्योंकि किसानों का वोट बैंक उनकी ओर झुक चुका था। किसानों की लड़ाई में कंधा लगाने वाले जेपी, लोहिया, राहुल सांकृत्यायन, रामवृक्ष बेनीपुरी, नरेन्द्र देव, अशोक मेहता, किशोरी प्रसन्न सिंह, गंगाशरण सिंह, पं. रामनंदन मिश्र जैसे समाजवादी नेता शामिल रहे।
    इन्होंने संचार माध्यमों के जरिए खूब समर्थन दिया। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने तो किसानों के समर्थन में संदेश दिया लेकिन सच्चाई यह है कि किसानों की बदकिस्मती थी कि तब राजनेताओं के सामने सवाल था कि वे किसान और जागीदार, जमीदार के बीच एक का चुनाव करें ? किसे समर्थन दिया जाए? कांग्रेस की प्राथमिकता सूची से किसान बाहर हो गया। किसान की नाराजगी के डर से कांग्रेस ने किसान का विरोध नहीं किया लेकिन समर्थन से पीछे हट गयी। आजादी के बाद भी किसानों का संघर्ष जारी रहा लेकिन छितरा छितरा रहा। इसका नेतृत्व चौधरी चरण सिंह और देवीलाल ने संभाला। शरद जोशी और शरद पवार ने भी किसानों का साथ दिया। महेन्द्र सिह टिकैत भी जुझारू नेता हुए लेकिन उनकी आवाज दिल्ली के इर्द गिर्द सुनी गयी।
    किसानों के समर्थन में आज कुछ नेता सामने आए हैं लेकिन उनकी मौजूदगी परिस्थितिजन्य है। किसानों की आवाज बुलंद करने में दुर्भाग्य से ऐसा कोई नेता नहीं है जिसकी आवाज में वजन हो और देशव्यापी स्वीकार्यता हो। इसलिए तात्कालिक लाभ के लिए राजनेता कर्ज माफी की बात उठाकर मानों किसान के लिए राजनीतिक नजराना दिलाना चाहते है क्योंकि सरकारों ने बार-बार कर्ज माफी का ढिंढोरा पीटा लेकिन किसान कर्ज माफी के बावजूद कर्ज से मुक्ति नहीं पा सका। इसका कारण खोजने की आज जितनी प्रासंगिकता है, उतनी कभी नहीं रही। किसान खेती की लागत बढऩे से परेशान है, उपर से उसे फसल का वाजिब मूल्य नहीं मिल पा रहा है। न तो खाद्य प्रसंस्करण किसानों का उद्योग बन पाया है और न उसे आर्थिक सशक्तिकरण के लिए माली खुराक के बारे में सोचा गया है। फसल आने पर मूल्य गिरना फितरत बन चुकी है क्योंकि किसान भंडारण सुविधा के अभाव में तत्काल माल बेचता है। भंडारण और कोल्ड स्टोरेज की सुविधा आवश्यक है। अपमानजनक है कि किसान को मिलने वाली कर्ज माफी ने समाज में किसान की प्रतिष्ठा कम की है। किसान को कामचोर तक कहा गया है। लेकिन इस बात पर गौर नहीं किया गया कि इस कर्ज ग्रस्तता की जड़ कहां है।
    किसान का दुर्भाग्य तो आजादी के बाद ही शुरू हो गया जब सरकारों की नजरों में उद्योग तो चढ़ गया और कृषि दोयम दर्जे की हो गयी। किसान न्यूनतम सुविधाओं पर अपने सांस्कृतिक परंपरागत कृत्य से जूझता रहा। किसान को अन्नदाता कहकर उसका भावनात्मक शोषण किया गया। एक तरफ खेती घाटे का व्यवसाय बनती गयी दूसरी तरफ सरकार को कृषि उपज का मूल्य बढ़ न जाए, यह चिंता बनी रही। किसान सरकार की नजरों में गौण हो गया। किसान पूरी तरह प्रकृति के सहारे हो गया। अतिवृष्टि, सूखा, ओला जैसे संकट आते गए। सरकारों ने संकट की जड़ तक जाने के बजाए थोड़ी बहुत राहत देकर किसानपरस्ती की भरपूर सियासत कर उसे वोट बैंक समझ लिया। न तो किसान को अपनी फसल का मूल्य पाने का अधिकार मिला और न किसान की गिरती माली सेहत के प्रति सरकार ने गौर किया। ऐसे में दुबला और दो अषाड़ की कहावत तो तब सिद्ध हुई जब 1966-67 में हरित क्रांति का झंडा बुलंद हुआ।
    सरकार ने कृषि उत्पादन में इजाफा करने के लिए आह्वान किया लेकिन किसानी की बढ़ती लागत पर कतई गौर नहीं किया। कृषि से जुड़ा व्यापार खाद बीज पौध संरक्षण का कारोबार मल्टीनेशनल्स के हाथ में बंधक बन गया।इनका पूरा ध्यान वार्षिक लाभ कमाने पर केन्द्रित हो गया। किसान इस कारोबार की भूल भूलैया में ऐसा फंसा कि किसान के उसके कर्ज का घोड़ा बेलगाम हो गया। सहकारिता आंदोलन ने इसका जिक्र किया। नेताओं ने फ्रिक की, लेकिन राहत कहीं नजर नहीं आयी। किसानों पर कर्ज का बोझ, कार्पोरेट का मुनाफा बढ़ा। कार्पोरेट को सरकार ने सुविधा दी। उनका कर्ज भी माफ हुआ लेकिन किसान ने उत्पाद की मूल्य वृद्धि सरकार के राडार पर नहीं आयी। किसानी के अर्थशास्त्र को पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने समझा। किसानों के समर्थन में आंदोलन, लेव्ही विरोध जैसे अभियान चले। लेकिन सही उपचार का समय बहुत विलंब से आया। देश में राजनीतिक परिवर्तन से किसान के अनुकूल हवा के झौंके महसूस किए जा रहे हैं।
    किसान की समस्या की असल जड़ की ओर नरेन्द्र मोदी सरकार की निगाह गयी है। प्रधानमंत्री फसल बीमा, प्रधानमंत्री सिंचाई योजना, राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना, राष्ट्रीय गोकुल योजना, नीली क्रांति मूल्य स्थिरीकरण योजना, बाजार हस्तक्षेप योजना, ई विपणन मंच, कृषि उपज मंडियों को जोडऩे का काम शुरू हुआ है। किसानों को कर्ज सुविधा आसान और सस्ती हुई है। ब्याज 18 से चार प्रतिशत और बाद में मध्यप्रदेश में जीरो प्रतिशत हुआ है। किसान को जमीन का स्वाइल हेल्थकार्ड देकर लागत घटाने का उपक्रम आरंभ हुआ। वास्तव में आवश्यकता किसान को फसल का उचित मूल्य दिलाने, किसानी की लागत कम करने की है। इसी बीच मध्यप्रदेश सरकार ने कृषि उत्पाद मूल्य और विपणन आयोग के गठन का जतन किया है। समय बतायेगा कि किसानों को माफिक दवा मिलने से कर्ज मुक्ति का मार्ग स्वयं खुलेगा। किसानों को दरकार कर्ज मुक्ति की ही है, कर्ज माफी की नहीं। नरेन्द्र मोदी सरकार का 2022 तक किसान की आय दोगुना करने का संकल्प और तानाबाना भी कसौटी पर होगा। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कठिन डगर पर मोदी सरकार ने कदम बढ़ाया है। नीति सही है। दिशा भी सही है।