Month: September 2018

  • कुपोषण बांट रहे आधुनिक खेत

    कुपोषण बांट रहे आधुनिक खेत

    अगर डॉक्टर आपको लगातार विटामिन और आयरन की गोलियां खाने को बोल रहे हैं तो गलती आप और डॉक्टर की नहीं उस खाने की है, जिसमें पोषक तत्व लगातार कम हो रहे हैं। पढ़िए खेती में देसी क्रांति
    अरविंद शुक्ला
    लखनऊ। अगर आप अपने पिछले कुछ वर्षों के डॉक्टरों के पर्चे पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि वे दवाओं के साथ विटामिन, जिंक वाली टैबलेट-कैप्सूल भी लिखते हैं, क्योंकि आप जो खाना (शाकाहारी-मांसाहारी) खाते हैं, उसमें ही पोषक तत्व कम हो गए हैं। अनाज में पोषक तत्व कम इसलिए हो गए हैं क्योंकि मिट्टी बेदम हो गई है। इसी कुपोषित मिट्टी में उगी फसल खाकर भारत के लोग पेट तो भर रहे हैं, लेकिन कुपोषित भी हो रहे हैं। “कुपोषण के लिए मिट्टी सीधे तौर पर जिम्मेदार है। पोषण रहित मिट्टी में उगने वाले फल, फूल और अनाज में निश्चित पोषक तत्वों की कमी होगी। यही हाल मांसाहार खाने वालों का है, बकरी हो या दूसरे पशु खाते तो मिट्टी में उगी चीजें हैं, तो उनमें भी डेफिशियेंसी (कमी) पाई जाती है। इसीलिए मेडिकल रिपोर्ट में आयरन, विटामिन, जिंक और दूसरे पोषक तत्वों की कमी होती है, जिसे पूरा करने के लिए डॉक्टर दवाएं लिखते हैं।

    “डॉ. विनय मिश्रा, निदेशक, केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान,लखनऊ कहते हैं। यह सरकारी संस्थान देश में मिट्टी पर शोध और सुधार के लिए जाना जाता है। कुपोषण भारत के साथ ही दुनिया के लिए गंभीर समस्या है। भुखमरी और कुपोषण पर आई ‘स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रीशन इन द वर्ल्ड, 2017′ के मुताबिक दुनिया भर में कुपोषित लोगों की संख्या 2015 में करीब 78 करोड़ थी तो 2016 में यह बढ़कर साढ़े 81 करोड़ हो गई। दुनिया के कुपोषित लोगों में से 19 करोड़ लोग भारत में रहते हैं। यानि की कुल आबादी के करीब 14 फीसदी लोग कुपोषण से जूझ रहे हैं। चिंताजनक ये है कि भारत में 0-5 साल तक के 38 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। भरपूर पोषक तत्व न मिलने का असर न सिर्फ उनके शारीरिक विकास पर पड़ता है, बल्कि मानसिक और पढ़ाई-लिखाई पर साफ नजर आता है। कुपोषण के कलंक से निपटने के लिए सरकार ने 2018 में तीन साल के लिए 9046.17 करोड़ रुपए से पोषण मिशन शुरुआत की है। सितंबर 2018 को पोषण माह के रूप में मनाया जा रहा है। देश के कई मंत्रालय, विभाग और संस्थाएं इसमें शामिल हैं, लेकिन कृषि नहीं है, जबकि कुपोषण का सीधा वास्ता खेत से है।

    पोषण रहित मिट्टी में उगने वाले फल, फूल और अनाज में पोषक तत्वों की कमी तो होगी ही। यही हाल मांसाहार खाने वालों का है, बकरी हो या दूसरे पशु खाते तो मिट्टी में उगी चीजें हैं, तो उनमें भी कमी पाई जाती है। इसीलिए मेडिकल रिपोर्ट में आयरन, विटामिन, जिंक और दूसरे पोषक तत्वों की कमी होती है, जिसे पूरा करने के लिए डॉक्टर दवाएं लिखते हैं। डॉ.विनय मिश्रा, निदेशक, केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, लखनऊ मिट्टी की तुलना मानव शरीर से करते हुए अहमदाबाद में रहने वाले पारंपरिक देसी वनऔषधियों के जानकार और वैज्ञानिक डॉ. दीपक आचार्य कहते हैं, “हम लोग अक्सर पहली बारिश के बाद मिट्टी से आने वाली खुशबू की बात करते हैं, ये खुशबू मिट्टी में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीव (एक्टीनो मायसिटीज़) की वजह से आती है। पहली बारिश पर आने वाली मिट्टी की सौंधी सुगंध शहरों से नदारद होने लगी है, और तो और अब गाँवों की मिट्टी से भी असल सौंधी सुगंध कम होने लगी है।” वो आगे बताते हैं, “ये सूक्ष्मजीव एंटीबॉयोटिक होते हैं और मिट्टी में रहते हुए कई तरह से फसलों की रक्षा करते हैं। कई देहाती इलाकों में बुजुर्ग जानकार तो मिट्टी की सौंधी सुगंध को ही मिट्टी की ताकत मानते हैं।

    खेत खलिहानों में कीटनाशकों के ताबड़तोड़ प्रयोगों ने इन्हें खत्म कर दिया है। नतीजतन अब पौधों में बीमारियां भी ज्यादा लगती हैं, उन्हें बचाने के लिए किसान ज्यादा कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं। जिसका सीधा असर हमारे शरीर पर भी होता है।” इंडियन फूड कंपोजिशन टेबल 2017 रिपोर्ट के शोधकर्ताओं ने देश के 6 अलग-अलग स्थानों से लिए गए 528 खाद्य पदार्थों में से 151 पोषक तत्वों को मापा था। जिसके अनुसार इन 28 वर्षों में गेहूं में गरीब 9 फीसदी कार्बोहाइड्रेट घटा है, जबकि गरीबों के भोजन में ये 8.5 फीसदी कम हुआ। वर्ष 2017 में आई राष्ट्रीय पोषण संस्थान हैदराबाद (एनआईएन) की रिपोर्ट बताती हैं कि पिछले तीन दशकों में खाद्य पदार्थों में पौष्टिक तत्वों की मात्रा तेजी से कम हुई है। एनआईएन ने खाने में पोषक तत्वों को लेकर करीब 28 साल बाद आंकड़े जारी किए थे। इंडियन फूड कंपोजिशन टेबल 2017 रिपोर्ट के शोधकर्ताओं ने देश के 6 अलग-अलग स्थानों से लिए गए 528 खाद्य पदार्थों में से 151 पोषक तत्वों को मापा था। जिसके अनुसार इन 28 वर्षों में गेहूं में गरीब 9 फीसदी कार्बोहाइड्रेट घटा है, जबकि गरीबों के भोजन में ये 8.5 फीसदी कम हुआ। गैर सरकारी संस्था डाउन टू अर्थ में छपी खबर के मुताबिक, भारत ही नहीं, दुनियाभर में खाद्य पादर्थों में पोषण का स्तर कम हुआ है। वर्ष 2004 में जर्नल ऑफ द अमेरिकन कॉलेज ऑफ न्यूट्रीशन में प्रकाशित शोध में शोधकर्ताओं ने 1950 से 1999 के बीच उगाई जाने वाली 43 फसलों का अध्ययन किया था। इन फसलों में छह जरूरी पोषक तत्व कैल्शियम, प्रोटीन, आयरन, फॉस्फोरस, राईबोफ्लेविन और एस्कोर्बिक एसिड पहले की तुलना में कम मिले थे। केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान,लखनऊ में मिट्टी के साथ अनाज और भूसे पर भी टेस्ट किए जा रहे हैं, जिसमें पोषक तत्व कम मिल रहे हैं। फोटो-गांव कनेक्शन केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान,लखनऊ के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. विनय मिश्रा कहते हैं, “देश को जब आजादी मिली उस दौरान मिट्टी में सिर्फ नत्रजन (नाइट्रोजन) की कमी थी, लेकिन आज जो मिट्टी की जांच हो रही है, उसमें जिंक, फास्फोरस और निकिल सब की कमी नजर आ रही है। हरित क्रांति के बाद भरपूर अन्न होना गर्व की बात थी, लेकिन अब हमें इस समस्या से निपटना होगा। असंतुलित रसायनों और कीटनाशकों के उपयोग ने कई समस्याएं खड़ी कर दी हैं।’ अच्छी और पोषित पैदावार के लिए किसी फसल को 17 पोषक तत्वों की जरूरत होती है। भारत की पारंपरिक खेती प्राकृति गोबर और फसल चक्र पर आधारित थी, हरित क्रांति के बाद खेतों में नाइट्रोजन, डीएपी और कीटनाशकों के सहारे खेती होने लगी। अति दोहन से उपजाऊ जमीनों में पोषक तत्व कम ( Micronutrient Deficiency in Soils ) हुए और जमीन में हानिकारक तत्व शामिल हुए। केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान लखनऊ की अपनी प्रयोगशाला में अब मिट्टी के साथ ही गेहूं, धान और सरसों के पौधे, बीज और भूसे पर भी प्रशिक्षण किया जा रहा है, ताकि उसमें पाए जाने वाले पोषक तत्वों का पता चल सके। रिपोर्ट ये बताती हैं कि अनाजों में जिंक समेत कई पोषक तत्व कम हुए हैं। संस्थान के निदेशक डॉ. विनय मिश्रा आगे कहते हैं, “खेतों में जैविक खादें, कंपोस्ट (गोबर खाद) डालना तो कम हुआ है। किसानों ने फसल चक्र अपनाना छोड़ा, इतना ही नहीं अब फसल काटने के बाद किसान फसल अवशेष में आग लगा देते हैं, ये बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी गाँव को लूटने के बाद उसे फूंक देना।” देसी खेती और रसायनमुक्त खेती को बढ़ावा देने वाले लोग पुराने ढर्रे पर खेती करने, देसी बीजों का इस्तेमाल करने और गाय-गोबर आधारित खेती को ही विकल्प बताते हैं।

    मध्य प्रदेश के कृषि प्रसार अधिकारी और देश भर में घूम-घूम कर देसी अनाजों की किस्मों के संरक्षण में जुटे बीएस बारचे कहते हैं, “हमारे देश में अब अनाज तो खूब हो रहा है, लोगों को खाना भी मिल रहा है, लेकिन अनाज से लेकर दूध तक हम जो खाते-पीते हैं उनमें पोषक तत्व नहीं है। इसीलिए देश की बड़ी आबादी भरपूर खाने के बाद भी बीमारियों और कुपोषण से ग्रसित है। मोटे अनाज पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं अब सरकार इनको बढ़ावा दे रही है। वर्ष 2018 को मोटे अनाज के वर्ष के तौर पर मनाया जा रहा है।” दुनिया में खाने योग्य करीब 400 प्रजातियां हैं, जिन्हें बतौर खाद्य विकल्प देखा जाना चाहिए, लेकिन मुश्किल से 15-20 तरह के अन्न (धान, गेहूं आदि) को ही हम सदियों से उगाते आएं हैं, खाते आए हैं। खाने की मांग को देखते हुए नए संसाधन तलाशने होंगे। फसल चक्र अपनाने होंगे ताकि मिट्टी की उर्वरकता बरकरार रहे। मिट्टी पोषित होगी तो हम पोषित होंगे।- डॉ. दीपक आचार्य, देसी वनऔषधियों के जानकार और वैज्ञानिक पोषण विज्ञान में यूजीसी की सीनियर रिसर्च फ़ेलोशिप द्वारा डॉक्टरेट और आहार सलाहकार तनु श्री सिंह कहती हैं, “कुपोषण की समस्या तेजी से बढ़ी है क्योंकि आहार की संरचना (कंपोजिशन ऑफ डाइट) में बदलाव आया है और खाने-पीने की चीजों में पोषकता कम हुई है।” कुपोषण (Malnutrition) से निपटने के लिए क्या कैप्सूल ही काम आएंगे या दूसरे विकल्प हैं? इस सवाल के जवाब में डॉ. दीपक आचार्य कहते हैं, “दुनिया में खाने योग्य करीब 400 प्रजातियां हैं जिन्हें बतौर खाद्य विकल्प देखा जाना चाहिए, लेकिन मुश्किल से 15-20 तरह के अन्न को ही हम सदियों से उगाते आएं हैं, खाते आए हैं। धान, गेहूं, मक्का, बाजरा, ज्वार जैसी फसलों को ही लगातार उगाया जाता रहा है। जरूरत है फसल चक्र अपनाए जाने की। खाने की मांग को देखते हुए नए संसाधन तलाशने होंगे। फसल चक्र अपनाने होंगे ताकि मिट्टी की उर्वरकता बरकरार रहे.. मिट्टी पोषित होगी तो हम पोषित होंगे।”

    डॉ.विनय मिश्रा, निदेशक, केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, लखनऊ, मिट्टी के बारे में बताते हुए। (तस्वीर में बाएं) कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग रोकने और मिट्टी की सेहत (soil health) सुधारने के लिए वैसे तो कई योजनाएं चल रही हैं लेकिन साल 2015 में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने राष्ट्रीय मृदा स्वास्थ कार्ड योजना शुरू की। जिसके तहत किसानों की खेत की मिट्टी की जांचकर उन्हें मिट्टी की हालत बतानी हैं। “मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, किसानों और अनाज खाने वालों सबके लिए बहुत उपयोगी है। क्योंकि इसमें बताया जा रहा है कि उनके खेत में क्या कमी है और खाद-उर्वरक किस अनुपात में डालनी है। इसके परिणाम सामने आ रहे हैं। इसके साथ ही आईसीएआर और उसकी सहयोगी संस्थाएं अनाज और फल सब्जियों की ऐसी किस्मों भी विकसित कर रही हैं जो पोषण से भरपूर हैं। “डॉ. विनय बताते हैं।

  • न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी दर्ज़ा देना उचित

    न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी दर्ज़ा देना उचित

    क्या आपको पता है संविधान ने किसान को क्या अधिकार दिए हैं? एमएसपी को कानूनी दर्जा देने से क्या होगा किसानों को फायदा, क्योंकि कोर्ट भी कर चुका है किसानों को संविधानिक अधिकार देने की तरफदारी.. पढ़िए इस लेख में

    शुभम कुमार

    वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने पहले वित्त बजट भाषण में उल्लेख किया था कि केंद्र सरकार 2022 तक किसानों की आय को दोगुनी करने का इरादा रखती है। नीति आयोग ने इसे लेकर 2017 में एक शोध पत्र भी जारी किया था, जिसमें सरकार किसानों की आय वृद्धि के लिए कौन से कदम उठाएगी इसका पूरा ब्यौरा था। सरकार ने फसल बीमा पॉलिसी, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी), मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड, इनपुट प्रबंधन, प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना, प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना, जैसे किसानों के लिए विभिन्न फायदेमंद नीतियां शुरू की हैं। हालांकि, किसानों के लिए सबसे बड़ी बाधा इन नीतियों का गैर-प्रवर्तन या अनुचित कार्यान्वयन रही है। चिंता की बात यह है कि इतने प्रयासों के बाद भी देश के अधिकतर किसानों के लिए खेती करना एक दर्दनाक अनुभव है।

    आर्थिक सर्वेक्षण (2017-18) के अनुसार कृषि क्षेत्र में 2.1% की वृद्धि होने की संभावना है, जबकि औद्योगिक क्षेत्र में 4.4% और सेवा क्षेत्र में 8.3% पर बढ़ने की संभावना है। कृषि क्षेत्र में धीमी विकास दर एक चिंता का विषय है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी-2015-16) के आंकड़ों के मुताबिक कृषि क्षेत्र में 11,370 लोगों ने आत्महत्या की थी। पिछले दो वर्षों से नए आंकड़े जारी नहीं हुए। एनसीआरबी के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि कृषि मजदूरों में आत्महत्या की दर में उछाल आया है, जो की चिंता का विषय है। इसके पीछे मुख्य कारण कृषि गतिविधियों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव है, यानी सूखे या बाढ़ के कारण फसल का बर्बाद होना है। हाल ही में ”कृषि और अन्य ग्रामीण श्रमिकों (संरक्षण और कल्याण) विधेयक, 2018” को राज्य सभा में पेश किया गया है। इस विधेयक का मुख्य लक्ष्य है कृषि और ग्रामीण श्रमिकों को शोषण के खिलाफ सुरक्षात्मक और कल्याणकारी उपाय प्रदान करना।

    1960 के दशक में, हरित क्रांति ने कृषि क्षेत्र में बहुत सकारात्मक प्रभाव डाला और कृषि के आधुनिक तरीकों के साथ फसल उपज में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। हरित क्रांति के बाद सरकार ने सरकार और किसानों को सीधे जोड़ने के लिए एक चैनल स्थापित करने पर काम किया, ताकि किसानों को अपनी फसलों के लिए वाजिब न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल सके। हालांकि, बहुत से इलाकों में किसानों की अभी भी विनियमित थोक बाजारों तक पहुंच नहीं है और इसके कारण वे न्यूनतम समर्थन मूल्य की तुलना से कम दरों पर स्थानीय बाजारों में अपनी फसल बेचते हैं। एक शोध के अनुसार यह पाया गया है कि केवल 9.14% किसान अपनी फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य से अवगत हैं और भारत में केवल 6% किसान अपनी फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य प्राप्त करने में सक्षम हैं, बाकी किसान अपनी फसल को सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य की तुलना से कम कीमत पर बेचते हैं। इसी बिंदु पर ग़ौर करते हुए 2016 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने ‘डॉ गणेश उपाध्याय बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया’ मामले में केंद्र सरकार और राज्य सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी दर्जा प्रदान करने के लिए एक उपयुक्त कानून लाने का सुझाव दिया था। कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) ने भी अपने शोध के उपरांत केंद्र सरकार से सिफ़ारिश की है कि एक क़ानून द्वारा किसानों को अपने उत्पाद को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेचने का कानूनी अधिकार प्रदान करना चाहिए।

    अखिल भारतीय किसान संघ समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) के नेतृत्व में अधिकांश किसान भारत भर में लंबे समय से विरोध कर रहे हैं। किसानों की मुख्य मांग यह रही है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की जाए और इसे कानूनी दर्ज़ा दिया जाए। हाल ही में दो सांसद, श्री राजू शेट्टी और श्री के. के. रागेश, ने लोक सभा और राज्य सभा में ”किसानों को कृषि वस्तुओं के लिए गारण्टी लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्यों का अधिकार विधेयक, 2018” (विधेयक) पेश किया है। यह विधेयक उत्तराखंड उच्च न्यायलय के फैसले और CACP की सिफारिशों के उपरोक्त सुझावों के साथ समन्वय में है। एआईकेएससीसी द्वारा दलील के अनुसार यह विधेयक किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य को ”कानूनी अधिकार” के रूप में दावा करने और शिकायत निवारण तंत्र भी प्रदान करेगा। विधेयक को कई प्रमुख क्षेत्रीय दलों से व्यापक स्वीकृति और समर्थन मिला है। यह विधेयक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में उपभोक्ताओं के संरक्षण के लिए आवश्यक वस्तुओं अधिनियम, 1955 या उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 जैसे क़ानून बहुत पहले से हैं। लेकिन किसानों के अधिकार और उनके संरक्षण के लिए ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। 2001 में खाद्य और कृषि संगठन सम्मेलन के दौरान खाद्य और कृषि के लिए संयंत्र आनुवांशिक संसाधनों पर अंतर्राष्ट्रीय संधि को मंजूरी दे दी गई थी, जिसके पश्चात भारत ने संयंत्र किस्मों और किसानों के अधिकार अधिनियम, 2001 पारित किया, जिससे प्रजनकों और किसानों के अधिकारों को मान्यता दी गयी। इसी प्रकार न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी अधिकार देना बहुत आवश्यक है क्यों कि कल्पना कीजिये कि भारत के संविधान में अनुच्छेद 32 नहीं होता, मसलन अगर मौलिक अधिकारों का हनन होता और उनके संरक्षण के लिए अगर कोई उपाय नहीं होता तो मौलिक अधिकार अप्रभावी हो जाते। उल्लंघनों के मामले में किसी भी कानूनी सहारे के बिना किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देना संवैधानिक उपचार के अधिकार के बिना संविधान से तुलना की जा सकती है।

    बात अगर किसानों के संवैधानिक अधिकारों की करें तो भारत का संविधान स्पष्ट रूप से किसानों को कोई अधिकार नहीं देता है। परन्तु भारतीय संविधान का भाग IV (अनुच्छेद 36-51) राज्य नीतियों के निर्देशक सिद्धांतों (डीपीएसपी) से संबंधित है, जो राज्य के सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों को दर्शाते हैं। राज्य डीपीएसपी के निर्देशक सिद्धांतों के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक की सामाजिक और आर्थिक स्थिति सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय उपाय करती है। ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे नगर निगम के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया था कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार के अहसास के लिए आजीविका का अधिकार आवश्यक है। उपर्युक्त संवैधानिक प्रावधानों, उच्चतम न्यायालय एवं उत्तराखंड उच्च न्यायालय के फैसले को पढ़ा जाए तो यह साफ़ है की किसानों को अपनी गरिमा की रक्षा के लिए आजीविका के पर्याप्त साधनों को सुरक्षित करने के लिए कुछ कानूनी अधिकार दिया जाना चाहिए, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित है अगर संविधान के अनुच्छेद 38(2) और अनुच्छेद 39(अ) को संयुक्त तौर से पढ़ें तो यह साफ़ हो जाएगा कि राज्य असमानता को खत्म करने और नागरिकों को आजीविका के पर्याप्त साधनों को सुरक्षित करने के अवसर प्रदान करने के लिए आवश्यक उपाय करेगा। उपर्युक्त संवैधानिक प्रावधानों, उच्चतम न्यायालय एवं उत्तराखंड उच्च न्यायालय के फैसले को पढ़ा जाए तो यह साफ़ है की किसानों को अपनी गरिमा की रक्षा के लिए आजीविका के पर्याप्त साधनों को सुरक्षित करने के लिए कुछ कानूनी अधिकार दिया जाना चाहिए, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित है। साथ ही साथ किसानों को शोषण से बचाने के लिए एक सुरक्षा तंत्र प्रदान करने की स्पष्ट आवश्यकता है।

    -लेखक डॉ राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, लखनऊ के छात्र हैं।

  • बच्चों की सुरक्षा में सचेत रहेंः राघवेन्द्र शर्मा

    मध्यप्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग में हुई विस्तृत चर्चा

    भोपाल,28 सितंबर(करुणा राजुरकर)। स्कूली बच्चों की सुरक्षा के विषय पर म.प्र. राज्य बाल आयोग ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के सहयोग से समन्वय भवन में आज एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया। कार्यशाला में विषय प्रवर्तन करते हुए म.प्र. बाल आयोग के अध्यक्ष श्री राघवेन्द्र शर्मा ने कहा कि आयोग का प्रमुख कार्य आर.टी.ई. तथा किशोर न्याय अधिनियम और लैंगिक अपराधों पर कारवाई करना है। उन्होंने नियमों के पालन में व्यवहारिक कठिनाईयों का उल्लेख करते हुए कहा कि मौलिक अधिकारों का हनन आपराधिक श्रेणी में आता है। श्रम कानून के हिसाब से 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे से काम करवाना अपराध है। नये चाइल्ड लेबर एक्ट में 14 वर्ष की उम्र के बाद बच्चे को कौशल विकास का प्रशिक्षण दिया जा सकता है। अत: इन सारे विराधाभासों को दूर करते हुए तथा म.प्र के सभी विभागों में बच्चों को लेकर जो भी नियमावली है, उन्हें एकजाई कर नये नियम बनाये जाने और उनकी मॉनिटरिंग बाल आयोग द्वारा किये जाने की आवश्यकता है।

    ए.आई.जी. सायबर क्राइम श्री सुधीर गोयनका ने प्रदेश के विद्यालयों से आये प्राचार्यों और प्रबंधकों को वाट्सएप, इंटरनेट के माध्यम से बच्चों द्वारा जाने-अनजाने में किये जा रहे अपराधों के बारे में जानकारी देते हुए उन्हें सचेत रहने के लिये कहा। उन्होंने बताया कि 13 वर्ष की उम्र से बच्चा अपना फेसबुक प्रोफाइल और 18 वर्ष के बाद ई-मेल आई डी बना सकता है। उन्होंने डिजीटल फुटप्रिंट को मैनेज करने के लिये विवेकपूर्ण इस्तेमाल करने की सलाह भी दी। एक महत्वपूर्ण बात उन्होंने प्रशिक्षार्णियों को यह भी बताई कि हमें अपने हर खाते का पासवर्ड ऐसे ही अलग रखना चाहिये, जैसे हर कमरे का एक ताला और चाबी रखते हैं।

    राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के तकनीकी विशेषज्ञ श्री रजनीकांत ने तैयार की जा रही नियमावली के महत्वपूर्ण बिंदुओं पर प्रकाश डाला और सुझाव भी आमंत्रित किए। उन्होंने बच्चों की सुरक्षा एवं अन्य समस्याओं के समाधान के लिये शिकायत पेटी लगाने के साथ-साथ स्कूल की संरचना, प्रबंधन सेनीटेशन जैसी सुविधाओं पर विशेष ध्यान देने की जरूरत बताई। उनका मानना था कि बच्चों को 5वीं कक्षा के पश्चात् ही कम्प्यूटर शिक्षा दी जानी चाहिये। उन्होंने बस्ते का बोझ घटाने के लिये किये जा रहे नवाचारों की भी चर्चा की।

    कार्यशाला के समापन पर प्रशिक्षणार्थियों ने बच्चों की शिक्षा-सुरक्षा और अन्य मुद्दों पर महत्वपूर्ण सुझाव दिये। इस अवसर पर बाल आयोग के सदस्य श्री आशीष कपूर, रवीन्द्र मोरे, सचिव श्रीमती शुभा वर्मा, जिला शिक्षा अधिकारी श्री धमेन्द्र शर्मा, राज्य शिक्षा केन्द्र के श्री रमाकांत तिवारी विशेष रूप से उपस्थित थे।

  • समलैंगिकता से आजादी के दाग कैसे धुलेंगे

    समलैंगिकता से आजादी के दाग कैसे धुलेंगे


    -डॉक्टर अरविन्द जैन-

    आज भारत के इतिहास में गौरव पूर्ण दिन हैं जिसमे सुप्रीम कोर्ट ने समलैंकिता को पूरी तरह से मान्यता दे दी. धारा377 को हटा दिया हैं जिससे अब पुरानी मान्यताओं को समाप्त कर दिया हैं .इसका तात्पर्य अब समान लिंग के पुरुष और महिलाये बेफिक्र होकर शारीरिक सम्बन्ध बना सकती /सकते हैं . हमारी समाज में तीन प्रकार के लोग होते हैं आदरणीय /महानुभाव /गणमान्य .इसका मतलब समाज देश परिवार में गणमान्यों को अधिक इज़्ज़त मिलेगी ! ये कैसा न्याय व्यवस्था हैं .जिस मुद्दे पर सरकार को बचाव करना था वहां चुप्पी साधी और जिस पर कोर्ट ने आदेश दिया उसको उलट दिया .
    मनुष्य का जन्म उसके अधीन नहीं हैं .उसका जन्म एक दुर्घटनाजन्य घटना हैं .उसका जन्म उसके मुताबिक नहीं होता .जन्म विकृति का सूचक हैं .कारण प्रकृति एक स्वाभाविक क्रिया हैं .प्रकृति (नेचर )और स्वभाव (हैबिट )में अंतर होता हैं .प्रकति का बदलना असंभव और स्वभाव स्थितिजन्य परिवर्तनशील हैं ,इसलिए हमारा जन्म वैध नहीं हैं ,हम अवैध संतान हैं .जो अपने मन मुताबिक जन्म न ले सके उसे क्या कहेंगे ? हमारा जन्म पिता के गर्भ से नहीं हुआ ,माता के गर्भ से हुआ .इसीलिए माता प्रकृति हैं और पिता विकृति हैं .पर धार्मिक सामाजिक मान्यता इसी पर आधारित हैं .संतान उतपत्ति के लिए नर मादा की आवश्यकता होती ही हैं .चाहे मानव हो या जानवर .जानवर अनचाहे काम वासना की पूर्ती करते हैं पर सन्तानोपत्ति के लिए मादा की जरुरत ही होगी .हां जानवरों में कुछ मर्यादा /सीमायें होती हैं पर मनुष्य विवेकवान होने से जानवर से भी हीन हैं .वर्तमान में कामवासना एक रोग हो गया हैं कामी पुरुष रोगी इसीलिए कामाग्नि को शांत करने के लिए प्राकृतिक और अप्राकृतिक संयोगों को तलाशता फिरता हैं .अप्राकृतिक संयोग एक अपराध के साथ अधार्मिक और असामाजिकता हैं .रोग के लिए हीनयोग, अतियोग और मिथ्या योग होता हैं जैसे वर्षा ऋतू में कम वर्षा होना ,या अतिवर्षा होना या वर्ष में ठण्ड या गर्मी पड़ना .ये रोगी होने के लक्षण हैं या रोग होने के .
    आज समलैंगिकता पर बहस चल रही हैं न्यायालय में कोई भी जीते या हारे .तर्क बहुत होते हैं अंतहीन होते हैं और विवाद का अंत सुखद नहीं होता हैं .एक सत्य होता हैं और असत्य के अनेकों लिए विवाद और तर्क की जरुरत होती हैं .समलैंगिकता का अर्थ नर नर और नारी नारी में संयोग .उनके समर्थको से जानना चाहता हूँ की क्या वे अपने परिवार में इस धारणा को स्वीकार करेंगे ?क्या वे अपने माँ पिता भाई बहिनो में इस प्रकार के प्रेम या बंधन को स्वीकार करेंगे ?इस प्रकार के बंधन की जीवन रेखा कितनी होती हैं या होगी ? क्या आजतक किसी भी साहित्य में स्त्रियों के समान पुरुषों के सौंदर्य का वर्णन किया गया हैं?मात्र काम वासना ही एकपक्ष हैं या सन्तानोपत्ति .यदि संतान चाहिए हैं तो स्त्री का होना अनिवार्य हैं .बिना स्त्री के संतान उत्पत्ति नहीं हो सकती ,स्त्री का अंतिम सुख उससे शिशु होने से और उसके द्वारा स्तनपान कराने में जो सुखानुभूति होती हैं क्या वह नारी नारी के साथ संभव हैं .? पुरुष पुरुष में कितना सुख की अभिलाषा पूर्ण हो सकती हैं ?
    उस समलैंगकिता वाले युगल से यह जानना चाहता हूँ कि समाज में वे स्वयं स्थापित हो सकते हैं या यदि उनके परिवार का कोई सदस्य उनकी बहिन या भाई को वे सामाजिकता देंगे .उनसे उनके पुत्र या पुत्रियों के जन्म की उम्मीद की जाना बेमानी होगी .क्या वे यदि बहुत बड़े महानगर में रहते हैं अनजान शहर में अपरिचित स्थान पर अपने आपको स्थापित कर सकेंगे और उनको कितना सम्मान आपस में या समाज से मिलेगा .ये सब कल्पना लोक में रहने की बात हैं जमीनी हकीकत का सामना कठिन होता हैं .
    क्या यह सब नैतिकता को स्वीकार्य हैं क्या ये सब करना प्राकृतिक हैं या अप्राकृतिक .ये सब अनुमान वे अपने परिवार और परिवारजनों से नहीं समझ सकते हैं .हमारी समाज ऐसे लोगों को हीन दृष्टि से देखते हैं . कामाग्नि एक अनिवार्यता हैं और एक वय के बाद कोई भी उससे बच नहीं सकता .पहले वह चोरी छिपे कुछ कृत्य करेगा या उनको दबाएगा या बलात्कार करेगा . इसीलिए एक उम्र के बाद शादी विवाह किया जाता हैं .और शादी करना वैध माना जाता हैं से संतान पैदा करना होता हैं जो वैध/अवैध माना जाता हैं सामाजिक व्यवस्थाओं में .अब जब नर नर और नारी नारी का संयोग होगा तो वे कुंठाग्रस्त होकर मानसिक रुग्णता से ग्रसित होंगे .उनको जिस सुख की आकांक्षा होती हैं वह समान प्रकृति में नहीं मिलेंगी .उन्हें विकृति से सुखानुभूति होंगी अन्यथा वे रुग्ण होंगे या अपराधी बन जायेंगे
    हमारे धार्मिक ग्रंथों में इन बातों पर अधिक ज़ोर नहीं दिया गया ,उन ग्रंथों में प्राकृतिक जीवन शैली जीने पर जोर दिया .अब कोई शिखंडी का उदाहरण देकर अपनी बात पर जोर दे रहे हैं पर यह जानना जरुरी हैं की यह यदि प्राकृतिक कृत्य होता तो उन्हें न्यायलय जाने की क्यों जरुरत पड़ती .
    इस बात में कोई तथ्य नहीं हैं की यह उनके मौलिक अधिकारों का हनन हैं .इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं हैं की आप क्या करते हैं कैसे करते हैं और क्यों करते हैं पर यदि वे स्वयं आइना के सामने खड़े हो या अपने परिवार या समाज को उजागर करे तब उनकी स्थिति बहुत सम्मानीय नहीं होगी या वे आबादी नियंत्रण में अपना योगदान दे रहे हैं .
    क्या वे अपने परिवार के सदस्यों को भी बढ़ावा दे रहे हैं या वे चाहेंगे की वे लोग भी समाज में गणमान्य माने जाए आदरणीय को सामाजिक स्वीकृति हैं पर गणमान्य को नहीं .
    दुर्जनम सज्जनं कर्तुरमुपायो न ही भूतले !
    अपानं शतधा धौतं न श्रेष्ठमिनिन्द्रियम भवेत् !!
    ऐसा कोई उपाय नहीं हैं जिससे दुर्जन मनुष्य सज्जन बन सकते हो ,क्योकि गुदा को चाहे सैकड़ों बार धोया जाय फिर भी वह मुख नहीं बन सकती .
    विषयों के पीछे सब भाग रहे हैं
    जिसमे विष हैं उसे चाह रहे हैं
    विष के स्वाद को चखने के बाद
    विषपान ही करना होगा जीवन भर
    न्यायालय से मान्यता मिलने से क्या कोई
    व्यवस्था बदल जाएंगी
    आदरणीय होने में हित हैं
    गणमान्य तिरस्कृत होते हैं और रहेंगे
    डॉक्टर अरविन्द जैन संस्थापक शाकाहार परिषद् A2 /104 पेसिफिक ब्लू ,नियर दी मार्ट होशंगाबाद रोड, भोपाल 462026 मोबाइल 09425006753