
गुजरात में कांग्रेस के पराभव ने हिंदुस्तान में विदेशी राज की चूलें हिला दीं हैं। भारत में पैर जमाने वाले विदेशियों की पोल भी खुल गई और इसके बावजूद सत्ता नसीब न हो सकी। ये काम गुजरात में ही संभव था। किसी अन्य राज्य में ये दंगल हुआ होता तो भारत में विदेशियों का पंथ प्रशस्त हो गया होता। विदेशी शक्तियो ने एक बार फिर कांग्रेस के नेतृत्व में कथित सुधारवादी मुखौटे की आड़ में सत्ता संधान शुरु किया है। संघ और उससे जुड़े राष्ट्रवादियों को ये जानकर सुख का अहसास हो रहा है कि गुजरात में उनकी समर्थित सरकार बच गई। यही नहीं पिछले चुनाव की तुलना में उसे आठ फीसदी अधिक जन समर्थन भी हासिल हुआ है। इसके बावजूद ये चुनाव न केवल गुजरात बल्कि पूरे हिंदुस्तान के लिए खतरे की घंटी साबित हुआ है। अधिक मत मिलने के बावजूद भाजपा मौजूदा 116 सीटों में से भी केवल 99 सीटें हासिल कर सकी है। जबकि जीत के लिए उसे 93 सीटें चाहिए थीं।वहीं शोरशराबे और झूठे वादों की झड़ी लगाकर कांग्रेस 182 सीटों में से 77 जीत गई। जबकि पिछली बार उसके पास 61 सीटें थीं। पिछले चुनाव की तुलना में लगभग तीन फीसदी मतदान कम होने से भाजपा को क्षति पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा था जो सही साबित हुआ। भाजपा अपनी उम्मीदों से कम सीटें जीत सकी लेकिन इसके बावजूद जनता पर उसका भरोसा कायम रहा है।वहीं कांग्रेस तमाम तिकड़मों के बावजूद जनता का भरोसा नहीं जीत सकी। मत विभाजन से उसे वोट भी अधिक मिले और उसने सोलह सीटें भी अधिक पाईं हैं। बहुत सीटों पर हार जीत का अंतर भी कम हुआ है। इसकी वजह स्पष्ट ध्रुवीकरण है। लोगों ने भाजपा या कांग्रेस में से किसी एक को जिताने की कोशिश की जिसके चलते गुजरात में नियंत्रित मत विभाजन देखने में आया है। इस जीत में भाजपा के लिए कई संदेश छुपे हैं। सबसे बड़ा संदेश तो ये है कि भाजपा के सबका साथ सबका विकास के नारे ने विरोधियों को एकजुट कर दिया है। वे भाजपा को हराने के लिए किसी से भी हाथ मिलाने तैयार हैं। जमीन पर भाजपा के नेटवर्क की तुलना में कोई दल पासंग में नहीं ठहरता इसके बावजूद चुनावी रणनीति के बल पर वोट कबाड़ने में कांग्रेस कामयाब रही है। कांग्रेस ने पिछले कुछ सालों से संगठन को आऊटसोर्स करना शुरु कर दिया है। उसने भाजपा विरोधी देशी विदेशी ताकतों के सहारे संगठन खरीदने का भरपूर प्रयास किया, वो कामयाब भी हुई पर जीत नहीं पा सकी। गुजरात में पिछले कुछ सालों में सबसे अधिक चीनी कंपनियों का निवेश हुआ है। जीएसटी और नोटबंदी के बाद इन विदेशी कंपनियों की आर्थिक गतिविधियां उजागर होने लगीं हैं। तभी से इन कंपनियों ने गुजरात के बहाने मोदी सरकार को उखाड़ने की तैयारी की थी। बेरोजगार युवाओं के सहारे कांग्रेस ने हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश राठोर जैसे युवाओं को संगठन आऊटसोर्स किया। कांग्रेस ने इन युवाओं के जातिगत गणित के पीछे संगठन की रचना की। ये रणनीति पूरी तरह सफल हो सकती थी, लेकिन एन वक्त पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रौद्र रूप अपनाकर इस षड़यंत्र को कुचल डाला। इसमें संघ का जमीनी नेटवर्क, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की कुशल रणनीति, भाजपा कार्यकर्ताओं के बूथ मैनेजमेंट और भाजपा के तमाम जाने पहचाने मुद्दों का बड़ा योगदान रहा। भाजपा ने अपने लगभग सभी फार्मूले इस्तेमाल कर विदेशियों के षड़यंत्र को धराशायी कर दिया है। इन विदेशियों में सबसे प्रभावी भूमिका चीनी कंपनियों ने निभाई है। उन्होंने ही इस चुनाव में सबसे अधिक धन उपलब्ध कराया। वो तो सूरत के व्यापारियों की देशभक्ति और जिद थी जिसके सामने ये चाल नहीं चल सकी। जब भाजपा विरोधी षड़यंत्रकारी चिंतक चुनाव के दौरान कह रहे थे कि लड़कों ने मोदी को मैदान में उतरने पर मजबूर कर दिया तब वे उन विदेशी ताकतों की जय की इबारत लिख रहे थे। भाजपा को ये भी अहसास हो गया होगा कि विदेशी निवेश आकर्षित करने के चक्कर में उन्होंने कई वैश्विक शक्तियों का भी आव्हान कर लिया है। ये ताकतें हिंदुस्तान में एक कमजोर सरकार की आकांक्षी हैं। इसके लिए वे कोई भी कीमत देने को तैयार हैं। भाजपा को गुजरात के अनुभव के बाद अब पूरे देश में अपनी सरकारों पर नए तरीके से लगाम लगानी होगी। विकास की खजूर पर टंगी परिभाषा को जमीन पर लाना होगा। बड़े बांध,सड़कें, कारखाने और फ्लाईओवर लोगों का जीवन सरल तो बना सकते हैं पर रोजगार बिना वे भी असंतोष की वजह बन सकते हैं। कांग्रेस की नकलपट्टी करते हुए भाजपा की सरकारें जिस तरह लोगों को सरकारी नौकरियों का प्रलोभन दे रहीं हैं ये आगे चलकर कांग्रेस की ही तरह भाजपा के विनाश की वजह बनने जा रही हैं। भाजपा को ध्यान रखना होगा कि देश पूंजीवाद के मार्ग पर चल रहा है। इसलिए उसे लोगों को नौकर नहीं बादशाह बनाने के लिए तैयार होना होगा। उसे ध्यान रखना होगा कि नौकरशाही जिस तरह कांग्रेस के पतन की वजह बनी वही आगे चलकर भाजपा का नामोनिशान मिटाने की प्रमुख वजह भी बनेगी। भाजपा यदि लोगों को पैसा कमाने में मदद नहीं कर सकी तो उसका विकास का गुजराती माडल कभी भी दरक सकता है।
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