Month: November 2017

  • अड़ीबाज पुलिस और लाचार शिवराज

    अड़ीबाज पुलिस और लाचार शिवराज


    भोपाल,22 नवंबर,(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। मध्यप्रदेश की भारतीय जनता पार्टी सरकार अपनी चौथी पारी के लिए जिन महिला वोटों की खेती कर रही है उसके कारण स्त्री प्रताड़ना के मामलों में तो बाढ़ सी आ गई है। संपत्तियों पर कब्जे के लिए महिलाओं की आड़ लेकर धड़ाधड़ मुकदमे दर्ज हो रहे हैं। इनमें वे मामले भी शामिल हैं जिनमें स्त्रियां सचमुच प्रताड़ित हुईं हैं। इसके बावजूद सरकार की सदाशयता का लाभ लेकर ढेरों प्रकरण हर दिन सामने आ रहे हैं। सरकार की नासमझी और कथनी करनी में अंतर से व्यवस्था कैसे चौपट होती है, ये उसका सटीक उदाहरण है। खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पुलिस मुख्यालय जाकर आपराधिक मामलों की समीक्षा की। हालांकि ये काम गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह का था। पुलिस के जागरूक अधिकारियों ने बढ़ते अपराधों की जो वजहें बताई हैं उनमें मैदान में पुलिस की सक्रियता कम होना तो एक कारण है ही साथ में पुलिस के बीच बढ़ती अड़ीबाजी की घटनाएं भी शामिल हैं।

    कुछ समय से पुलिस के मैदानी पदों पर पदस्थापना के लिए चंदे की दरें जिस तरह बढ़ती रहीं हैं उससे पुलिस अपराध रोकने के बजाए खुद अपराध को बढ़ावा देने वाला संगठन बनकर रह गई है। सिपाही से लेकर तमाम मैदानी पदों पर पदस्थापना के लिए तो चंदा वसूला ही जा रहा है साथ में खामोशी से शहरों में जमे रहने के लिए बाकायदा फीस वसूली जाती है। अड़ीबाजी के मामलों की तो हालत ये है कि हवलदार और एएसआई तक इतने पावरफुल हो गए हैं कि वे टीआई या सीएसपी की फटकार को हवा में उड़ा देते हैं।जब जिले के पुलिस अधीक्षक उन पुलिसवालों के विरुद्ध कार्रवाई करते हैं तो वरिष्ठ पुलिस अधिकारी उन्हें रोक देते हैं।इन पुलिस अफसरों के भी सरकार से अच्छे संबंध बताए जाते हैं इसलिए पुलिस मुख्यालय में बैठे अफसर भी लाचारी महसूस करते हैं। सबसे बड़ी बात तो ये है कि खुद मुख्यमंत्री निवास के बाजू में स्थित श्यामला हिल्स थाने से भी अड़ीबाजी का ये काम धड़ल्ले से किया जा रहा है।

    हाल में पालीटेक्निक कालेज के एक शिक्षक के विरुद्ध एक महिला ने छेड़खानी की शिकायत श्यामला हिल्स थाने में की। थाने में पदस्थ एएसआई शिवेन्द्र मिश्रा ने शिक्षक के घर जाकर पांच लाख रुपए की मांग की। धमकाते हुए कहा कि उस महिला ने बलात्कार की शिकायत की है। यदि तुमने पैसे नहीं दिए तो फिर जेल जाने के लिए तैयार हो जाओ।उस महिला के दो साथी पहले से गवाही के लिए तैयार थे। आरटीओ दलाल के रूप में काम करने वाले संजय पाठक और रेखा परिहार ने ही उस महिला को घरेलू काम के लिए भेजा था और वे ही थोड़ी देर बाद थाने ले गए। रिश्वत का दबाव बनाने के लिए दोपहर में मीडिया के कुछ कैमरामेनों को भी पुलिस ने बुला लिया और शाम के अखबारों में मुकदमा दर्ज होने की सूचना भी दे दी। जबकि खुद पुलिस ने अपने रिकार्ड में शाम को मुकदमा दर्ज होना दिखाया है।

    ये गिरोह पुलिस के निर्देश में कई अन्य लोगों पर भी अड़ीबाजी का काम कर चुका है। रिश्वत की वसूली खुद पुलिस का एएसआई शिवेन्द्र मिश्रा करता है। जबकि गिरोह के सद्स्यों को सरकार से मिलने वाले हर्जाने की राशि और बाद में समझौते के नाम पर वसूली के लिए तैयार किया जाता है। इस घटना की जानकारी पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को भी दी गई लेकिन सभी लाचार थे। कई बड़े अफसरों ने तो टीआई से भी कहा कि मामले की पूरी छानबीन करके प्रकरण दर्ज करो लेकिन एएसआई ने तब तक प्रकरण दर्ज करके चालान भी अदालत में प्रस्तुत कर दिया। ये बात सही है कि अदालत में ये प्रकरण नहीं टिकेगा।साक्ष्य और परिस्थितिजन्य स्थितियों के बीच आरोपी खुद को बेगुनाह साबित कर लेगा,लेकिन तब तक वो अदालतों के चक्कर ही काटता रहेगा। इस तरह के एक नहीं सैकड़ों प्रकरण प्रदेश भर में रोज दर्ज किए जा रहे हैं। महिला अपराधों के मामलों में यदि पुलिस प्रकरण दर्ज नहीं करती है तो उसे दंड का भागी बनना पड़ता है ये भय दिखाकर अड़ीबाज पुलिस वाले दिल से प्रकरण दर्ज करने में जुट गए हैं।

    मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद को सख्त दिखाना चाहते हैं लेकिन उनकी पुलिस सरकार की असफलताओं को करीब से देख रही है। सरकार के कथित भ्रष्टाचारों की पोल भी सबसे पहले पुलिस के सामने ही खुलती है। इससे पुलिस की अड़ीबाजी की प्रवृत्ति खुलकर सामने आ रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह, डीजीपी ऋषि शुक्ला और तमाम बड़े अधिकारी पुलिस सुधार के नाम पर बैठकें कर रहे हैं। निर्देश जारी कर रहे हैं लेकिन हकीकत में जमीन पर स्थितियां पूरी तरह विपरीत हैं। पुलिस सड़कों पर गश्त लगा रही है। मैदानी अफसरों को कहा गया है कि अपराधियों की छानबीन करो ताकि जनता को पुलिस की मौजूदगी का भरोसा हो सके। लेकिन पुलिस को मैदान में उतारना अपराधों को और भी बढ़ाने की वजह बन रहा है। पुलिस के कामकाज का आकलन करने की व्यवस्था धराशायी होने से बदमाश पुलिस वाले तो मजा मौज कर रहे हैं जबकि हम्माली वाली ड्यूटी ईमानदार पुलिस वालों के पल्ले पड़ रही है।

    गृहमंत्री भूपेन्द्रसिंह पुलिस महकमे के बजाए परिवहन महकमे की व्यवस्थाएं संभालने में ज्यादा रुचि रखते हैं। उन पर सरकार की मैदानी व्यवस्थाएं संभालने की भी जवाबदारी है। मुख्यमंत्री के चहेते मंत्री होने के नाते उन्हें हर काम की आजादी भी मिली हुई है। इसके बावजूद पुलिस मुख्यालय के अफसरों ने उनके आदेशों के बजाए सीधे मुख्यमंत्री के आदेशों पर अमल करने की नीति अपना रखी है। यही वजह है कि गृहविभाग पर सीधे मुख्यमंत्री का हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है।

    पुलिस मुख्यालय के आला अफसर भी दबी जुबान से इन स्थितियों को बयान कर रहे हैं। लेकिन उनका कहना है कि बढ़ते अपराधों की वजह पुलिस नहीं बल्कि सरकार की असफलताएं हैं। अपने लंबे कार्यकाल में सरकार रोजगार के साधन नहीं बढ़ा सकी है। आधारभूत ढांचे के विकास के नाम पर सरकार ने भारी धन व्यय किया है लेकिन इसका असर निचले स्तर तक नहीं पहुंचा है। चंद उद्योगपतियों की गिरफ्त में होने के कारण भारी बजट का अधिकांश हिस्सा बाजार में पहुंचने के बजाए सीधे उद्योगपतियों के खातों में पहुंचा है। अधिकतर उद्योगपतियों का जुड़ाव राष्ट्रीय नेताओं और प्रदेश के बाहर के औद्योगिक घरानों से है इसलिए मुनाफे की रकम भी प्रदेश में खर्च नहीं की गई है। प्रदेश पर कर्ज बढ़ा जिससे ब्याज भी बढ़ता गया है। नतीजतन आर्थिक अपराधों की संख्या में भारी इजाफा हो रहा है। किसानों की दुर्दशा और सरकार के शहरीकरण के अभियानों ने भी व्यवस्था को चौपट कर दिया है।

    भारतीय जनता पार्टी की सरकार अपने कुशल संगठन के भरोसे चौथी बार भी सत्ता में आने की तैयारी कर रही है। जबकि प्रमुख विपक्षी दल के रूप में कांग्रेस आज भी मैदान में धराशायी है। उसका न तो संगठन है और न ही उसके नेताओं में कोई सुरताल है। मैदान में लंबे समय से पदस्थ अफसरों ने जब महसूस कर लिया कि सरकार का हर काम चंदे से जुड़ा है तो उन्होंने अपनी मनमानी शुरु कर दी है। जिसका नतीजा बढ़ते अपराधों के आंकडों से साफ महसूस किया जा सकता है। सरकार अपराध पर नियंत्रण के लाख दावे करे लेकिन आने वाले समय में अपराधों की ये परिपाटी और भी तेजी से बढ़ती महसूस होगी।

  • किसान को माफिया से नहीं बचा पा रही भावांतर योजना

    किसान को माफिया से नहीं बचा पा रही भावांतर योजना


    भोपाल,(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।नीति आयोग की पहल पर मध्यप्रदेश को प्रयोगभूमि बनाने वाली भावांतर भुगतान योजना किसानों के शोषण और लूट का हथियार साबित हो रही है। लगातार संशोधनों के बाद योजना का मूल उद्देश्य कुचल गया है और अब इसने मंडियों में माफिया के हाथ मजबूत कर दिए हैं। बाजार से सरकार का नियंत्रण छूट गया है और मंडियों का प्रशासन व्यापारियों से गठजोड़ करके किसानों की फसलों से भारी कमीशन कबाड़ रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार इस कुशासन के सामने लाचार साबित हो रही है।

    राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के अध्यक्ष पं.शिवकुमार शर्मा इसे किसान हितैषी होने का पाखंड रच रही शिवराज सिंह सरकार की असफल योजना बता रहे हैं। उनका कहना है कि इस योजना के माध्यम से किसानों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। उनका कहना है कि इस योजना की असफलता के कारण किसान आगे बढ़कर सरकार के खिलाफ आंदोलन पर उतारू हो गए हैं। जब खुद मुख्यमंत्री, उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी, पार्टी और किसान कल्याण विभाग किसानों को इस योजना से सहमत नहीं करा पाए तो प्रमुख सचिव स्तर के 25अधिकारियों को मंडियों में भेजा जा रहा है। वे भी किसानों के आक्रोश को नहीं रोक पा रहे हैं और राधेश्याम जुलानिया जैसे अफसर अब किसानों को मजदूरी करने की सलाह देने लगे हैं।

    दरअसल अपने सबसे बड़े वोट बैंक किसान को खुश करने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने योजना आयोग की इस योजना को पहली बार मध्यप्रदेश में लागू किया है। जबकि इससे पहले इस योजना का पायलट प्रोजेक्ट गोवा में लागू किया गया था। जब व्यावहारिक कठिनाईयां सामने आईँ तो सरकार ने आनन फानन में संशोधन किए और पंद्रह संशोधनों के बाद भी मंडी माफिया पर लगाम लगाना संभव नहीं हो पाया है। सबसे बड़ी बात तो ये है कि किसानों की फसलों को सीलिंग सीमा में बांधकर रखा गया है। जिसके चलते अधिक फसलें उपजाने वाले किसानों की फसलें औने पौने दामों पर मंडी माफिया छीन रहा है।

    खुद को किसान हितैषी बताने वाली शिवराज सिंह चौहान की सरकार की नीतियों से एक ओर जहां किसान को उसकी फसलों का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है वहीं आम नागरिकों को कृषि उत्पादों के लिए मंहगी कीमत चुकानी पड़ रही है। किसानों के शोषण की नींव एक दशक पहले ही पड़ गई थी। जब शिवराज सिंह चौहान सरकार ने मंडी एक्ट पारित करके किसानों पर अपरोक्ष नियंत्रण करने का प्रयास किया था। पूर्ववर्ती कांग्रेसी सरकार के मंडी एक्ट में किसान अपने वोट से मंडियों के अध्यक्ष का चुनाव करता था। जबकि एक में संशोधन के बाद मंडी अध्यक्ष के पद करोड़ों रुपयों में बिकने लगे। यानि जिस किसान के पास ऋण पुस्तिका है वो केवल अपने वार्ड के सदस्यों का चुनाव करते हैं. अब ये वार्ड मेंबर मिलकर अध्यक्ष का चुनाव करते हैं। इस अप्रत्यक्ष चुनाव से मंडियों पर माफिया की सत्ता स्थापित हो गई है। अब जबकि मंडियों में पदाधिकारी और व्यापारी मिलकर किसानों की फसलों को लूटने लगे हैं तब एक्ट में बदलाव के दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं।

    सबसे बड़ी बात तो ये है कि मंडियों के इस माफिया ने सरकारी तंत्र के नेफेड(भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ मर्यादित) जैसे संगठनों को भी अपने कब्जे में ले लिया है। पिछली फसल की खरीद के दौरान नेफेड ने किसानों से एक जिले में लगभग90 हजार क्विंटल मूंग 2022 रुपए प्रति क्विंटल की दर से खरीदी थी। जब किसान आंदोलन के बाद दबाव में आई सरकार ने घोषणा की कि वो किसानों की फसलों को खरीदेगी तो नेफेड ने वही दाल व्यापारियों को बेच दी। व्यापारियों ने वही दाल सरकार को 5250 रुपए की दर पर बेच दी। इस तरह फसलों की बार बार खरीदी बिक्री ने आढ़तियों और माफिया को तो लाभ पहुंचाने के लिए सरकार को चूना लगाया है। राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के नेता पं. शिवकुमार शर्मा कहते हैं कि सरकार को झूठी शान छोड़कर इस योजना को तत्काल बंद करना चाहिए, तभी किसानों को माफिया के चंगुल से छुड़ाया जा सकता है।

    इस योजना को लेकर जो भ्रम फैले हैं उनके चलते किसान योजना में अपना पंजीयन नहीं करा पा रहे हैं। सरकार ने पंद्ह दिनों का समय बढ़ाकर आधार कार्ड, समग्र आईडी, फोटो, खसरे की प्रति, और ऋण पुस्तिका जैसे दस्तावेजों के आधार पर पंजीयन कराने के निर्देश दिए हैं पर इससे फर्जी किसानों का पंजीयन तो हो गया पर जरूरत मंद छोटा किसान अब भी वंचित ही रह गया है। मजबूरन सरकार को फसलों के रिकार्ड खंगालना पड़ रहे हैं कि खाद्यान्न लेकर मंडी में आने वाले किसान के पास जमीन है भी या नहीं। या फिर उसने वह खाद्यान्न खेत में बोया भी है या नहीं।

    मंडी एक्ट में स्पष्ट प्रावधान है कि सरकार व्यापारी से जो खाद्यान्न खरीदेगी उसका भुगतान वो उसी दिन कर देगी। इसके विपरीत सरकार ने किसान को तीन महीने में भुगतान करने का वादा किया है जो सीधे तौर पर मंडी एक्ट का उल्लंघन है। प्याज, मूंग, उड़द और तुअर जैसी फसलों के भुगतान किसानों को छह महीनों में भी नहीं किए गए हैं जिससे किसानों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।

    मोदी सरकार ने सत्ता में आने के लिए किसान को उसकी फसल के पचास फीसदी हिस्से पर लाभकारी मूल्य देने का वायदा किया था।अब जबकि उसकी ही एक प्रदेश सरकार भावांतर योजना पर किसानों को मंडी माफिया से नहीं बचा पा रही है तब मोदी सरकार खामोश है और विपक्षी राजनीतिक दलों के लिए ये योजना एक अच्छा राजनीतिक हथियार साबित हो रही है।

  • नोटबंदी पर खामोशी घातक

    नोटबंदी पर खामोशी घातक

    नोटबंदी का एक साल पूरा होने के बाद भी देश में तू तू मैं मैं का दौर चल रहा है। भारत जैसे विशाल देश में नोटबंदी का फैसला एक बड़ी चुनौती रहा है। डा. नरसिम्हाराव की सरकार ने जब 1991 में मुक्त बाजार व्यवस्था लागू की तब वह भयाक्रांत थी। उसे भय था कि इससे कहीं देश की जनता भड़क न जाए। आजादी के बाद से जो देश नियोजित की गई अर्थव्यवस्था का दंश झेल रहा हो भला उसे खुले आसमान की सर्द हवाएं कैसे बर्दाश्त हो सकती हैं।इसके बावजूद देश ने नरसिम्हाराव की मंशा को समझा और उनकी सरकार को अपना आशीर्वाद दिया। उनके वित्तमंत्री डा मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री बनकर उसी नीति को आगे बढ़ाया। व्यापारी और कारोबारी सभी खामोशी से इस बदलाव को देख रहे थे। इसकी वजह ये थी कि विकास के नाम पर आर्थिक जंजाल में फंसे देशवासियो को उम्मीद थी कि पूर्ववर्ती कांग्रेसी सरकारों ने जातिवाद, संप्रदायवाद के नाम पर जिन फोकटियों को उनके सिर लाद दिया है कम से कम अब उनसे मुक्ति मिल जाएगी। लेकिन आज नोटबंदी के एक साल पूरा होने पर वे महसूस कर रहे हैं कि उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका है। नोटबंदी लागू होने के बाद बाजार से पुराने नोट तो गायब हो गए पर नए नोट बाजार में सप्लाई नहीं हो पाए। यही वजह थी कि बाजार में चलने वाली रोजमर्रा की उपभोकता वस्तुओं के खरीददार ही नहीं बचे। एक झटके से घरों में रखा पैसा तो खाते तक पहुंचा पर नोट के अभाव में लोगों ने खरीददारी बंद कर दी। अब जबकि नोटबंदी के समर्थन में आंकड़े सामने आ गए हैं तब ये कहा जा सकता है कि नोटबंदी ने लाभ तो पहुंचाया पर उतना नहीं जितने का अनुमान था। इसके बावजूद आज कांग्रेस के साथ भाजपा के सद्सय भी सरकार और खासतौर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गाली दे रहे हैं।प्रधानमंत्री की ये बात भी सही है कि पहले केन्द्र सरकार एक रुपया भेजती थी तो 85 पैसे जनता तक पहुंचते थे। अब एक रुपया सीधा जनता के खाते में पहुंचता है। सबसे बड़ी बात तो ये कि समानांतर अर्थव्यवस्था में मौजूद काला धन अपने मालिक के नाम पर बैंकों में पहुंचा। लोगों ने भले ही फर्जी खातों से रकम जमा कराई हो पर अब उस रकम पर टैक्स वसूली का मार्ग प्रशस्त हो गया है। भाजपा को अपने इस महाअभियान पर लगातार बोलना चाहिए था। लोगों को बताना था कि वे बदली परिस्थिति में क्या करें। लोगों की कठिनाई दूर होती तो वे ही नोट बंदी के ब्रांड एंबेसेडर बन गए होते। वे ही नोटबंदी को सफल बनाते। भाजपा ने एक साल पूरा होने पर नोटबंदी के फायदे गिनाना शुरु किया है। राज्यों में शासन कर रही उनकी सरकारें भी नोटबंदी पर असमंजस के हालात से जूझ रहीं हैं। भाजपा की राज्य इकाइयों ने यदि समय रहते मैदानी मोर्चा संभाला होता तो उन्हें इन हालात का सामना नहीं करना पड़ता जिनसे देश आज जूझ रहा है। भाजपा को इन बदले हालात पर खुलकर जनता का साथ देना चाहिए। जनता का साथ पाने का इससे अच्छा मौका उसे फिर कभी नहीं मिल पाएगा। कमोबेश यही स्थिति जीएसटी की है। जीएसटी पर भी भाजपा बोलने से कतरा रही है। भाजपा कैडर बेस पार्टी है। इसके बावजूद उसका कैडर नोटबंदी और जीएसटी को समझाने में बुरी तरह असफल साबित हो रहा है।यदि उसकी जगह कांग्रेस की सरकार होती तो लोग अब तक उसके कार्यकर्ताओं को गली कूंचों में धुन रहे होते। भाजपा को अपनी पूरी क्षमता के साथ जनता से संवाद करना होगा। उसे अपने फर्जी और थोपे हुए नेताओं से मुक्ति पानी होगी। जमीनी नेताओं को विश्वास में लेना होगा। उन्हें नोटबंदी और जीएसटी पर प्रशिक्षण देना होंगे। तब जाकर उन्हें मैदानी मोर्चा संभालना होगा। अभी चुनाव को वक्त है।यदि समय रहते भाजपा ने अपना दायित्व ठीक तरह से निभाया तो उसे देश के जनमानस का वैसा ही प्यार मिलता रहेगा जैसा देश ने मोदी सरकार को चुनते वक्त बरसाया था।

  • बलात्कारियों को सजा दिलाने पुलिस ने डॉ. हर्ष शर्मा को बुलाया

    बलात्कारियों को सजा दिलाने पुलिस ने डॉ. हर्ष शर्मा को बुलाया


    भोपाल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)3 नवंबर। 31 अक्टूबर की रात हबीबगंज रेलवे स्टेशन के नजदीक घटित सामूहिक बलात्कार की वारदात के बाद पुलिस ने अब दोषियों को दंडित कराने के लिए मोर्चा संभाल लिया है। बेहद शर्मनाक गेंगरेप की इस घटना के बाद आज पुलिस ने फोरेंसिक विशेषज्ञ को लेकर घटना स्थल का बारीकी से मुआयना किया। कई नए साक्ष्य भी जुटाए ताकि दोषियों को दंडित कराने के लिए सबूतों की कड़ी को आपस में जोड़ा जा सके। इसके लिए पुलिस ने प्रदेश के सबसे बड़े फोरेंसिक वैज्ञानिक डॉ.हर्ष शर्मा को बुलाया है।

    सागर स्थित राज्य न्यायालयिक विज्ञान प्रयोगशाला के निदेशक डॉ.हर्ष शर्मा ने आज घटना स्थल का बारीकी से मुआयना किया। उन्होंने पुलिस को वारदात से जुड़े कई अहम सबूतों को एकत्र करने की सलाह दी। घटना स्थल पर मौजूद अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक तकनीकी सेवाएं दिनेश चंद सागर ,डी.पी.गुप्ता आईजी रेल, भोपाल स्थित फोरेंसिक शाखा के प्रभारी डॉ.दिनेश शर्मा एवं संबंधित पुलिस थानों के प्रभारी अधिकारियों के साथ घटना से सभी पहलुओं की छानबीन की।

    राजधानी के प्रमुख क्षेत्र में घटित इस घटना के बाद पुलिस को भारी बदनामी झेलनी पड़ रही है। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने पुलिस की अक्षमता के लिए सरकार को दोषी ठहराया है। जन न्याय दल के अध्यक्ष एड्व्होकेट बृजबिहारी चौरसिया ने कहा कि बलात्कार जैसे संज्ञेय अपराध में पीड़िता की रिपोर्ट लिखने में पुलिस ने देरी करके सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन किया है। वरिष्ठ पत्रकार अनिल तिवारी ने कहा कि देश की सर्वोच्च अदालत की संविधान पीठ ने ललिता कुमारी विरुद्ध स्टेट आफ यूपी मामले में किसी भी संज्ञेय अपराध में प्रथम सूचना रिपोर्ट तत्काल दर्ज करने के निर्देश दिए थे। दिल्ली में घटित निर्भया कांड के बाद अनुच्छेद 141 में पुलिस एक्ट में संशोधन करते हुए कहा था कि ड्यूटी पर तैनात किसी भी अधिकारी की कर्तव्य निर्वहन में लापरवाही पर धारा 166 ए के तहत कार्रवाई की जाना जरूरी है। इस धारा में लापरवाह अधिकारियों को समुचित आधार पाए जाने पर एक साल की सजा से दंडित किया जा सकता है।

    गौरतलब है कि विदिशा निवासी एक छात्रा जब 31 अक्टूबर को अपनी कोचिंग की पढ़ाई समाप्त करके ट्रेन पकड़कर घर जाने के लिए रेलवे पटरी से गुजर रही थी तभी वहां बैठे दो अपराधियों ने उसका अपहरण कर लिया था। उन्होंने लड़की से से बलात्कार किया और उसके सोने के कर्णफूल और मोबाईल भी छुड़ा लिए। यही नहीं उन्होंने अपने दो साथियों को भी बुला लिया। चारों अपराधियों ने लड़की से सात बार बलात्कार किया और लगभग चार घंटों तक उसे बंधक बनाए रखा था। बाद में अपराधियों के चंगुल से छूटकर लड़की ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। इस मामले में एमपीनगर पुलिस और हबीबगंज पुलिस ने अपना क्षेत्र न होने के कारण कार्रवाई करने से इंकार कर दिया। बाद में रेलवे पुलिस ने प्रकरण कायम कर मामले की तफतीश शुरु की।

    सबसे बड़ी बात तो ये है कि खुद लड़की ने अपने पिता के साथ मिलकर एक आरोपी को पक़ड़ा और उसे पुलिस के सुपुर्द किया। आज जब ये मामला अखबारों की सुर्खियां बना तब सरकार और पुलिस सभी सक्रिय हुए।

    मध्यप्रदेश सरकार को इस मामले में काफी अपयश झेलना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर पुलिस महकमें में अनावश्यक हस्तक्षेप करने के आरोप लगाए जा रहे हैं। जबकि गृह मंत्री भूपेन्द्र सिंह पर भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण देने के आरोप लग रहे हैं। पुलिस महानिदेशक ऋषि कुमार शुक्ला ने इस संबंध में पुलिस मुख्यालय में विशेष बैठक ली और आरोपियों को दंडित कराने के निर्देश दिए। भोपाल डीआईजी संतोष सिंह की कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान लगाए जा रहे हैं।