Month: October 2017

  • वित्तीय साक्षरता देश की जरूरत

    वित्तीय साक्षरता देश की जरूरत

    वित्तीय शिक्षा

    21वीं शताब्दी की पहली दशाब्दी में लोगों में वित्तीय साक्षरता फैलाने की आवश्यकता को सभी ने स्वीकार किया। अधिकतर देश वित्तीय शिक्षा के लिए एकीकृत और समन्वित राष्ट्रीय रणनीति अपना रहे हैं। भारत एक बड़ी जनसंख्या वाला देश है, जहां राष्ट्रीय स्तर पर समग्र विकास पर जोर दिया जा रहा है और अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और इसके साथ एक जीवंत और स्थिर वित्तीय प्रणाली विकसित करने की तुरंत आवश्यकता महसूस की जा रही है, ऐसी स्थिति में यह और भी जरूरी हो गया है कि जल्दी ही एक राष्ट्रीय रणनीति तैयार करके उसे लागू किया जाए।

    वित्तीय साक्षरता फैलाने के कार्य में केन्द्र और राज्य सरकारें, वित्तीय नियामक, वित्तीय संस्थाएं, सभ्य समाज, शिक्षाविद् और अन्य एजेंसियां जैसे कई पक्ष शामिल हैं। इसलिए एक व्यापक राष्ट्रीय रणनीति बनाना जरूरी है, ताकि ये सभी उस रणनीति के अनुसार एकरूपता से काम करें और विरोधी उद्देश्‍यों के लिए काम न करें।
    इस प्रकार राष्ट्रीय रणनीति का उद्देश्य वित्तीय दृष्टि से एक जागरूक और सशक्त भारत बनाना है। इसका उद्देश्य एक विशाल वित्तीय शिक्षा अभियान चलाना है जिससे आर्थिक खुशहाली के लिए लोगों को उपयुक्‍त वित्‍तीय सेवाओं के जरिए अपने धन का अधिक कारगर तरीके से प्रबंधन करने में मदद मिल सके।
    वित्तीय साक्षरता क्या है?
    आर्थिक सहयोग और विकास संगठन ने वित्तीय साक्षरता की परिभाषा इस प्रकार दी है कि-यह वित्तीय जागरूकता, ज्ञान, कौशल, दृष्टिकोण और व्यवहार का संयुक्त समग्र रूप है, जिसकी सहायता से वित्तीय फैसले लिये जा सकें और व्यक्ति अपनी आर्थिक स्थिति को बेहतर बना सकें। लोग वित्तीय शिक्षा की प्रक्रिया के माध्यम से वित्तीय साक्षरता प्राप्त करते हैं।

    वित्‍तीय समावेशीकरण : सरकार की उच्‍च प्राथमिकता वाली नीति
    भारत सरकार ने वित्‍तीय साक्षरता को फैलाने के महत्‍व को स्‍वीकार किया है, ताकि घरेलू बचतों को निवेशों में लगाने के लिए जोरदार प्रयास किये जा सकें। लेकिन वित्‍तीय उत्‍पादों की विविधिता और जटिलता ने एक साधारण व्‍यक्ति के लिए सही प्रकार का फैसला लेना मुश्किल कर दिया है। वित्‍तीय साक्षरता से विश्‍वास, ज्ञान और कौशल में वृद्धि होती है, जिससे वित्‍तीय उत्‍पादों और सेवाओं का सही लाभ उठाया जा सकता है और अपनी वर्तमान तथा भावी परिस्थितियों पर अधिक नियंत्रण किया जा सकता है। वित्‍तीय साक्षरता से शोषण करने वाली वित्‍तीय योजनाओं और साहूकारों द्वारा लिये जाने वाले अधिक ब्‍याज से भी लोगों को और समाज को बचाने में मदद मिलती है।

    यह उम्‍मीद की जाती है कि वित्‍तीय शिक्षा से अर्थव्‍यवस्‍था में कई गुणा प्रभाव होगा। एक सुशिक्षित परिवार नियमित रूप से बचतें करेगा, सही योजनाओं में निवेश करेगा और अपनी आमदनी बढ़ायेगा। इस प्रकार व्‍यक्तियों की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा तथा समाज की भलाई होगी।

    अंतर्राष्‍ट्रीय अनुभव और भारत के लिए सबक
    विश्‍व में चैक गणराज्‍य, नीदरलैंड, न्‍यूजीलैंड, स्‍पेन और ब्रिटेन जैसे देश वित्‍तीय शिक्षा के लिए राष्‍ट्रीय रणनीति पहले ही लागू कर चुके हैं तथा कई अन्‍य देश रणनीति बनाने और उसे लागू करने की प्रक्रिया में हैं।

    भारत में विशाल विविधता को देखते हुए हमें राष्‍ट्रीय रणनीति के अंतर्गत कई स्‍तरों पर काम करना होगा। राष्‍ट्रीय रणनीति का प्रारूप तैयार कर लिया गया है, जिसके उद्देश्‍य हैं – 1. वित्‍तीय सेवाओं, विभिन्‍न वित्‍तीय उत्‍पादों और उनकी विशिष्‍टताओं की जानकारी के लिए उपभोक्‍ताओं को जागरूक बनाना और शिक्षित करना। 2. जानकारी को व्‍यवहार में बदलने की वृत्तियों को विकसित करना और 3. वित्‍तीय सेवाओं के लाभार्थियों के रूप में उपभोक्‍ताओं को उनके अधिकारों और जिम्‍मेदारियों की जानकारी देना।

    वित्‍तीय जगत में तेजी से हो रहे परिवर्तनों को देखते हुए रणनीतिक कार्य योजनाओं के जरिए राष्‍ट्रीय रणनीति को 5 वर्ष के अंदर लागू करने की व्‍यवस्‍था रखी गई है।

    वित्‍तीय साक्षरता और समावेशीकरण का आकलन करने के लिए नमूना सर्वेक्षण
    इस रणनीति में वित्‍तीय समावेशीकरण और वित्‍तीय साक्षरता की स्थिति का आकलन करने के‍ लिए राष्‍ट्रव्‍यापी नमूना सर्वेक्षण की व्‍यवस्‍था है। इस सर्वेक्षण के अंतर्गत वित्‍तीय समावेशीकरण की स्थिति, विभिन्‍न वित्‍तीय उत्‍पादों के बारे में वित्‍तीय जागरूकता का स्‍तर, सुविचारित फैसले लेने के लिए वित्‍तीय क्षमता का स्‍तर तथा धन के प्रति लोगों का नजरिया और जोखिम उठाने के प्रति उनकी सोच, जैसे पहलुओं का आकलन किया जाएगा।

    सर्वेक्षण के आकलन के आधार पर विभिन्‍न वित्‍तीय नियामक लोगों की आवश्‍यकताओं को ध्‍यान में रखते हुए वित्‍तीय शिक्षा के अपने प्रकल्‍प बनायेंगे, बाद में स्‍कूल पाठयक्रम, सोशल मार्किटिंग तथा रेडियो, टे‍लीविजन, समाचार पत्र आदि के माध्‍यम से इनका प्रचार किया जाएगा तथा समर्पित वित्‍तीय शिक्षा वेबसाइट भी विकसित की जाएगी। इस कार्य में स्‍व-सहायता समूहों, माइक्रो-वित्‍तीय संस्‍थाओं, निवेशकों और उपभोक्‍ता एसोसिएशनों आदि की भी सहायता लेने का प्रस्‍ताव है।

    स्‍कूल पाठ्यक्रम में वित्‍तीय शिक्षा
    सरकार का मानना है कि वित्‍तीय शिक्षा स्‍कूल से ही शुरू हो जानी चाहिए और लोगों को जीवन में जितना जल्‍दी हो सके, वित्‍तीय मामलों के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन ने स्‍कूलों के लिए अच्‍छे वित्‍तीय शिक्षा कार्यक्रम तैयार करने के उद्देश्‍य से सम्‍बद्ध पक्षों के लिए तथा नीति निर्माताओं की सहायता के लिए मार्ग-निर्देश तैयार किये हैं।

    लेकिन यह बात स्‍पष्‍ट रूप से समझनी होगी कि वित्‍तीय शिक्षा स्‍कूलों में पढ़ाये जाने के लिए अलग विषय नहीं होगा, इसे केवल स्कूल पाठ्यक्रम में उचित रूप से समावेशित करना होगा। उदाहरण के लिए स्‍कूलों में गणित के विषय में चक्रवृद्धि ब्‍याज के बारे में समझाया जाता है कि एक व्‍यक्ति –ए दूसरे व्‍यक्ति –बी को कुछ वार्षिक ब्‍याज दर पर पैसा उधार देता है और उस पर चक्रवृद्धि ब्‍याज लगता है। इस अवसर का फायदा वित्‍तीय शिक्षा के लिए उठाया जा सकता है और लोगों को इस तरह समझाया जा सकता है कि एक कंपनी बैंक से पैसा उधार लेती है, या एक बैंक उपभोक्‍ता, सामान्‍य निश्चित अवधि का जमा खाता खोलने की बजाय एक सामूहिक जमा खाता खोलता है। इसी प्रकार नैतिक शिक्षा के पाठ्यक्रमों में ऐसी बातें शामिल की जा सकती हैं, जो रोजमर्रा के वित्‍तीय लेन-देनों पर आधारित हों।

    केन्‍द्रीय माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड-सीबीएसई प्राथमिक स्‍तर से ऊपर वाली कक्षाओं के लिए स्‍कूल शिक्षा में समन्वित रूप से वित्‍तीय शिक्षा को शामिल करने के बारे में सिद्धांत रूप से सहमत हो गया है और इस संबंध में विशेषज्ञों की एक समिति का भी गठन किया गया है।

    वित्‍तीय शिक्षा के प्रचार में नियामकों की भूमिका
    भारत में विभिन्‍न वित्‍तीय नियामक, जैसे भारतीय रिजर्व बैंक, भारतीय प्रतिभूति नियमन बोर्ड-सेबी, विनियामक और विकास प्राधिकरण आदि बहुसूत्रीय प्रणाली के जरिए विशाल वित्‍तीय साक्षरता कार्यक्रम पहले ही शुरू कर चुके हैं।

    भारतीय रिजर्व बैंक ने स्‍कूल और कॉलेज के छात्रों, महिलाओं, ग्रामीण और शहरी गरीबों, रक्षा सेनाओं के कर्मचारियों, और वरिष्‍ठ नागरिकों सहित विभिन्‍न लक्षित समूहों को केन्‍द्रीय बैकों के बारे में और सामान्‍य बैंकिंग प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी देने के लिए ‘प्रोजेक्‍ट फाइनेंशियल लिटरेसी’’ नाम से एक परियोजना शुरू की है। सेबी ने देशभर में अनुभवी और जानकार लोगों की एक सूची तैयार की है, जो विभिन्‍न समूहों को बचतों, निवेश, वित्‍तीय आयोजन, बैंकिंग, बीमा, सेवानिवृत्ति के बाद धन के उपयोग की योजनाओं, आदि जैसे विभिन्‍न पहलुओं के बारे में जानकारी देने के लिए कार्यशालाओं का आयोजन करते हैं। विभिन्‍न राज्‍यों में अब तक ऐसी 3500 से अधिक कार्यशालाएं आयोजित की जा चुकी हैं, जिनसे लगभग 3 लाख लोग लाभ उठा चुके हैं।

    बीमा नियमन और विकास प्राधिकरण पॉलिसी धारकों को अधिकारों और कर्तव्‍यों के बारे में और विवादों को हल करने के तरीकों के बारे में रेडियो, टेलीविजन और समाचार पत्रों के माध्‍यम से अंग्रेजी, हिन्‍दी तथा 11 अन्‍य भारतीय भाषाओं के जरिए सरल भाषा में संदेश और जानकारियां देते हैं।
    पेंशन निधि और विकास प्राधिकरण, आम जनता को सामाजिक सुरक्षा संबंधी संदेश देता है। इस प्राधिकरण ने पेंशन के बारे में आमतौर पर पूछे जाने वाले प्रश्‍नों की सूची को अपनी वेबसाइट पर डाला है तथा समाज के वंचित वर्गों को पेंशन सेवाओं का लाभ दिलाने के लिए यह विभिन्‍न गैर-सरकारी संगठनों के साथ सहयोग कर रहा है। इसी प्रकार, व्‍यावसायिक बैंक, स्‍टॉक एक्‍सचेंज, कमीशन एजेंसियों और म्‍युचुअल फंडों ने भी वित्‍तीय शिक्षा के बारे में प्रयास किये हैं। इसके लिए उन्‍होंने सेमिनार आयोजित किये हैं और समाचार पत्रों में अभियान चलाए हैं तथा क्‍या करना चाहिए और क्‍या नहीं करना चाहिए, जैसी जानकारियां उपलब्‍ध कराई हैं।

    इन सभी संस्‍थानों ने वित्‍तीय साक्षरता प्रदान करने के लिए जो विशाल सामग्री तैयार की है, उसको एकत्र करने और वर्गीकृत करने की आवश्‍यकता है, ताकि वह देश में वित्‍तीय शिक्षा के लिए ज्ञान का आधार बन सके।

    संस्‍थागत प्रबंधों के अंतर्गत राष्‍ट्रीय वित्‍तीय शिक्षा संस्‍थान की स्‍थापना की गई है, जिसके सदस्‍यों में विभिन्‍न नियामकों के प्रतिनिधि हैं। इस संस्‍थान का मुख्‍य उद्देश्‍य विभिन्‍न वित्‍तीय क्षेत्रों के लिए वित्‍तीय शिक्षा की सामग्री तैयार करना होगा। यह संस्‍थान खासतौर पर वित्‍तीय शिक्षा के लिए एक वेबसाइट भी तैयार करेगा।

    पूरी नीति पर अमल मौजूदा संस्‍थागत तंत्र के माध्‍यम से किया जाना है। वित्‍तीय समावेशीकरण और वित्‍तीय साक्षरता की वित्‍तीय स्थिरता और विकास परिषद की उप-समिति के तकनीकी दल को राष्‍ट्रीय नीति के अमल पर निगरानी रखने के लिए जिम्‍मेदारी सौंपी जाएगी।

    * इस लेख के लिए सामग्री 16.07.2012 को जारी भारतीय रिजर्व बैंक के वित्‍तीय शिक्षा की राष्‍ट्रीय रणनीति-2012 के प्रारूप से ली गई है। (पत्र सूचना कार्यालय, मुंबई)

  • मंहगी पड़ेगी सड़कों के बतंगड़ की साजिश

    मंहगी पड़ेगी सड़कों के बतंगड़ की साजिश


    -आलोक सिंघई-
    ठेठ देहाती किसान जब शहर जाता है तो वहां बिकते मठे को देखकर वो ये जरूर बोलता है कि इससे तो ज्यादा अच्छा हमारा गांव है जहां घर घर मही मिल जाता है। कुछ इसी तरह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अमेरिका के वाशिंगटन पहुंचकर जब वहां की खराब सड़कें देखीं तो बरबस बोल उठे कि इससे अच्छी सड़कें तो हमारे मध्यप्रदेश की हैं। उनकी इस प्रतिक्रिया को देश में गौरव के बोल समझा जा सकता था। आम नागरिक की प्रतिक्रिया यही होती कि हमारी सरकार ठीक दिशा में काम कर रही है। इसके विपरीत भारत के संवाद तंत्र के बतोलेबाजों ने सड़कों का बतंगड़ बना दिया। कुछ ने बगैर सोचे समझे इस सुर में अपने सुर भी मिला दिए। वे इस बतंगड़ के गुबार में छिपे साजिशकर्ताओं को नहीं पहचान पाए। कुछ ने तो पहचानने का जतन भी नहीं किया। राजनैतिक विरोधी होने का कथित धर्म समझकर कई बंधु मैदान में खम ठोकने भी जुट गए।

    जिन लोगों ने कांग्रेस की दिग्विजय सिंह सरकार का कुशासन करीब से देखा है वे भी मध्यप्रदेश में सड़कों के विस्तार से संतुष्ट नहीं हैं। होना भी नहीं चाहिए। प्रदेश में सड़कों की दुर्दशा भी कुछ यही है। बरसों के प्रयासों के बावजूद ऐसी ढेरों सड़कें हैं जो आज भी अपने निर्माण की बाट जोह रहीं हैं। इससे बड़ी संख्या उन सड़कों की हैं जिन पर सरकारी बजट की कुछ बूंदें हर साल गिरती हैं और मलहम पट्टी करके उन्हें चलने फिरने लायक बना दिया जाता है। वर्ष 2003 का विधानसभा चुनाव बिजली, सड़क और पानी के मुद्दे पर ही लड़ा गया था। कांग्रेस के बंटाढार मुख्यमंत्री दिग्गी का कहना था कि उनकी सरकार ने मानव विकास सूचकांकों पर ज्यादा ध्यान दिया इसलिए आधारभूत ढांचे के विस्तार के मामले में उनकी सरकार थोड़ा पिछड़ गई। जबकि हकीकत ये थी कि जाति, धर्म और वर्गों को बांटने में सिद्धहस्त कांग्रेस की सरकार ने पंचायती राज व्यवस्था जैसा नया शिगूफा छोड़ा था। गरीबी हटाओ के नारे पर हजारों करोड़ रुपए फूंक दिए थे। इसी तरह की ढेरों फर्जी योजनाओं पर जनता का बजट फूंक दिया गया और निर्माण कार्यों को कमीशन बाजी की भेंट चढ़ा दिया गया। मध्यप्रदेश की जनता ने इतनी नाकारा और बेशर्म सरकार इससे पहले नहीं देखी थी। नतीजतन उसने लगभग जन क्रांति के माध्यम से उस सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया। अपदस्थ दिग्गी को जेल भेजने का जनादेश उसके राघौगढ़ में जमा दौलत और रिलायंस जैसे समूहों में बेनामी निवेश के चलते हाहाकारी साबित हो सकता था। निर्माण की चुनौतियों से जूझने में लगी भाजपा की सरकारों ने विवाद बढ़ाने के बजाए निर्माण पर ज्यादा ध्यान दिया। नतीजतन आज मध्यप्रदेश की सड़कों की तस्वीर बदल चुकी है।

    भाजपा की सरकार ने सत्ता में आते ही 2004 में मध्यप्रदेश सड़क विकास निगम का गठन किया। इसका उद्देश्य खासतौर पर राज्य के राजमार्गों के निर्माण और उन्नयन के लिए किया गया था। प्रदेश की अधो संरचना के उन्नयन की जवाबदारी भी इसी निगम को दी गई। गठन के बाद से निगम ने 10039 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया है। अकेले निजी पूंजी निवेश से लगभग 5862 किलोमीटर लंबी सड़कें बनाई गईं। इन सड़कों के रखरखाव की जवाबदारी भी इन्हीं कंपनियों को दी गई। हालांकि सड़कों के साथ नालियां न बनाए जाने से हर बरसात में ये सड़कें भी क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। ठंड के सीजन में इसीलिए हर साल करोड़ों रुपए मरम्मत के नाम पर फूंकना पड़ते हैं।

    मध्यप्रदेश सड़क विकास निगम ने एशियन डेवलपमेंट बैंक से चार चरणों में 11000 लाख डॉलर का कर्ज लिया और ये सडकें बनवाईं। भारत सरकार की वीजीएफ योजना का भी खूब लाभ उठाया गया और मध्यप्रदेश सबसे ज्यादा वायबिलिटी केप फंडिंग पाने वाला राज्य बन गया। धड़ाधड़ लिए गए इन कर्जों से सरकार के पास इतना अधिक धन आया कि मध्यप्रदेश सड़क विकास निगम ने स्टेट डाटा सेंटर, मध्यप्रदेश सड़क विकास निगम का प्रशासनिक भवन, मुंबई का मध्यलोक भवन, नई दिल्ली का मध्यांचल भवन और मध्यप्रदेश भवन, क्रिस्टल आईटी पार्क जैसे भवन भी बना डाले। निगम की ओर से सिंगरौली में बीओटी योजना में एयरपोर्ट भी बनाया जा रहा है। निगम की आय से विदिशा, रतलाम, और शहडोल जिलों में चिकित्सा महाविद्यालयों, इंदौर में श्रमोदय विद्यालय भी बनवाए जा रहे हैं।

    अमेरिका की सड़कों की तुलना करने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बयान का बतंगड़ बनाने वालों की मंशा केवल इसी से भांपी जा सकती है कि वे जनता के बीच असंतोष के बीज बोकर सड़कों के नाम पर और भी ज्यादा कर्ज लेने की जरूरत जगाना चाहते हैं। सड़क विकास निगम ने अगले दस सालों की जो कार्ययोजना बनाई है उसमें राज्य के राजमार्गों की लंबाई बढ़ाकर 15000 किलोमीटर करना शामिल है। राज्य के बजट, मंडी बोर्ड और बहुपक्षीय एजेंसियों से जुटाए जाने वाले वित्तीय संसाधनों से सामान्य जिला मार्गों को मुख्य जिला मार्गों के रूप में उन्नयन किया जाना है। शहरों के ट्रेफिक से निपटने के लिए रिंग रोड बनाए जाने हैं। सभी मार्गों के लिए एकीकृत सड़क प्रणाली शुरु की जा रही है। जिसमें सभी सड़क निर्माण एजेंसियों की सड़कों को शामिल कर लिया गया है।

    गौरतलब है कि कांग्रेस के बंटाढार प्रदेश में भाजपा ने सत्ता में आकर आधारभूत संरचनाओं के विकास का महाअभियान तो चलाया लेकिन अब लोगों के सब्र का बांध टूटने लगा है। प्रदेश की जनता रोजगार, भोजन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मसलों पर सत्ता के खिलाफ लामबंद होने लगी है। आधारभूत संरचनाओं के विकास में रबड़ी पाने वाली एजेंसियां और उनके दलाल साफ तौर पर समझते हैं कि यदि इन जन आकांक्षाओं पर लगाम नहीं लगाई गई तो सड़कों के विकास के नाम पर अधिक कर्ज लेने का उनका अभियान ठंडा पड़ जाएगा। इसलिए इसी लाबी ने मुख्यमंत्री की एक सहज प्रतिक्रिया को जनता के बीच बखेड़ा बना दिया। सोशल मीडिया के बयानवीर हों या खुद को समर्पित समाजसेवी बताने वाले मीडिया कर्मी सभी एक सुर में दलालों की इच्छाओं में पंख लगाने जुट गए हैं। आज जब प्रदेश में कई हजार गुना मंहगी सड़कों का उद्देश्य उत्पादकता बढ़ाना होना था वहां आज पर्यटन जैसे खर्चीले अभियान को बढ़ावा दिया जा रहा है। जाहिर है ये उलटबांसी जन असंतोष की वजह बनने जा रही है,क्योंकि जनता की स्वतः स्फूर्त आय की भरपाई कोई भी सरकार एक रुपए के गेहूं चावल या दीन दयाल रसोई से नहीं कर सकती। भाजपा के रणनीतिकारों को ये अच्छी तरह समझ लेना चाहिए।

  • डंपर कांड के विधिक सलाहकार तनखा को  लोकायुक्त की नियुक्ति गलत नजर आई

    डंपर कांड के विधिक सलाहकार तनखा को लोकायुक्त की नियुक्ति गलत नजर आई


    सरकार को घेरने में जुटी कांग्रेस की लाबी की करारी शिकस्त
    भोपाल 17 अक्टूबर, (पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। डंपर खरीदी कांड में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को क्लीनचिट दिलाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले हाईकोर्ट के वकील विवेक तनखा को अब नए लोकायुक्त जस्टिस नरेश गुप्ता की नियुक्ति गलत नजर आ रही है। विशेष कृपा से राज्यसभा सांसद बने विवेक तनखा का कहना है कि सरकार ने नैतिक आधार पर ये फैसला गलत लिया है।उनका कहना है कि नए लोकायुक्त महोदय वर्तमान उपलोकायुक्त जस्टिस माहेश्वरी से छह साल जूनियर हैं इसलिए ये फैसला न्यायपालिका की मान्य परंपराओं के विपरीत है।

    सामान्य प्रशासन विभाग ने बाकायदा अधिसूचना जारी करके जस्टिस नरेश गुप्ता की नियुक्ति की घोषणा कर दी है। वे दीवाली से एक दिन पहले कल अपना कार्यभार ग्रहण करेंगे।जस्टिस गुप्ता 2010 में मप्र हाईकोर्ट में न्यायाधीश बने थे।जनवरी 2016 में उनका तबादला ग्वालियर कर दिया गया। वे 30 जून 2017 को रिटायर हुए थे।

    जस्टिस गुप्ता की नियुक्ति पर सबसे पहले राज्यसभा सांसद और कांग्रेस के राष्ट्रीय विधि प्रकोष्ठ से जुड़े विवेक तनखा ने ट्वीट करके कहा कि सरकार ने रातोंरात लोकायुक्त बनाकर विधि के मान्य सिद्धांतों को तोड़ा है।उन्होंने नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह की चुप्पी पर भी आश्चर्य व्यक्त किया। इस मामले में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने बताया कि उन्होंने लगभग सवा साल से खाली पड़े लोकायुक्त पद को भरने के लिए सरकार को पत्र लिखा था। इसके जवाब में सरकार ने उन्हें सूचित किया कि मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के माननीय चीफ जस्टिस ने लोकायुक्त पद के लिए जस्टिस नरेश गुप्ता का नाम भेजा है। जाहिर है विपक्ष के नेता होने के नाते मैंने उसका अनुमोदन कर दिया।

    जस्टिस गुप्ता की नियुक्ति पर सवाल उठाने वाले आरटीआई एक्टिविस्ट अजय दुबे का कहना है कि लोकायुक्त की नियुक्ति को पहले कैबिनेट से मंजूरी ली जानी थी। बाद में इसे राज्यपाल के पास भेजा जाना था। लेकिन सरकार ने प्रस्ताव को सीधे राज्यपाल के पास भेज दिया। उनका सवाल है कि सरकार यह बताए कि आखिर ऐसी कौन सी जल्दी थी जो सरकार ने नियुक्ति का प्रस्ताव सीधे राज्यपाल को भेज दिया। जब सवा साल से पद खाली था तो कुछ दिन और इंतजार किया जा सकता था।हालांकि जब उनसे पूछा गया कि प्रक्रिया को छोड़कर इस नियुक्ति में गलत क्या है। इसके जवाब में उन्होंने चुप्पी साध ली।

    दरअसल ये मामला मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के वकीलों और कांग्रेस समर्थित जजों की लॉबी से जुड़ा है। विवेक तनखा लंबे समय से मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के फैसलों में दबदबा बनाए रहे हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही राजनीतिक दलों के विधि सलाहकारों के हित साधने में उन्हें महारथ हासिल है। इस बात का जस्टिस नरेश गुप्ता लंबे समय से विरोध करते रहे हैं। न्यायपालिका ने टकराव टालने के लिए ही उन्हें जबलपुर बेंच से हटाकर ग्वालियर भेज दिया था। सूत्रों का कहना है कि उप लोकायुक्त जस्टिस यू सी माहेश्वरी ने सवा साल में लगभग सौ मामलों पर स्वतः संज्ञान लेकर प्राथमिक जांच शुरु कराई थी। बाद में जब उन्हें पता लगा कि ये मामले बाकायदा षड़यंत्र पूर्वक लोकायुक्त संगठन को भेजे गए हैं तो उन्होंने उन मामलों की फाईलें ठंडे बस्ते में डाल दीं। इसी को लेकर तनखा की लॉबी लंबे समय से जस्टिस यू सी माहेश्वरी पर फैसले न लेने के आरोप लगा रही थी। उप लोकायुक्त के माध्यम से अपना राजनीतिक हित साधने में जुटे तनखा और उनके सहयोगियों का कहना है कि पूर्व लोकायुक्त जस्टिस पीपी नावलेकर ने अपने पूरे कार्यकाल में नौ मामलों में स्वतः संज्ञान लेकर जांच शुरु कराई थी जबकि उप लोकायुक्त यूसी माहेश्वरी ने सौ मामलों को संज्ञान में लेकर जांच शुरु कराई पर उन्हें लंबित कर दिया।

    अब जबकि सरकार ने हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की सिफारिश पर अमल करते हुए जस्टिस गुप्ता की नियुक्ति की प्रक्रिया आनन फानन में पूरी कर ली तो इससे सरकार को घेरने में जुटी तनखा की लॉबी बौखला गई है। उसका मानना है कि इतने लंबे समय तक लोकायुक्त नियुक्त न होने के दौरान विवेक तनखा की लॉबी ने जो मामले लोकायुक्त संगठन में भेजे उनसे कांग्रेस की रणनीति तो उजागर हो गई है लेकिन उनके लंबित रहने से सरकार को घेरने का उनका मकसद कामयाब नहीं हो सका है। इसे सरकार के संसदीय कार्य मंत्री नरोत्तम मिश्रा का मास्टर स्ट्रोक भी कहा जा रहा है। जस्टिस गुप्ता की नियुक्ति के बाद भ्रष्टाचार के मामलों पर फैसले लेने में तेजी आएगी और लंबित पड़े मामलों का निराकरण जल्दी हो जाएगा। इससे लंबे समय से लोकायुक्त संगठन में रहकर सरकार के विरोध में षड़यंत्र कर रहे जजों और अफसरों की भी भूमिका उजागर हो गई है। इससे लोकायुक्त संगठन में अब बड़े बदलावों की भी संभावना व्यक्त की जाने लगी है।

  • लुटेरों की सोहबत से उकताने लगे कांग्रेसी

    लुटेरों की सोहबत से उकताने लगे कांग्रेसी


    मध्यप्रदेश के कांग्रेसजन इन दिनों चकित हैं। वे भौचक्के होकर देख रहे हैं कि उनकी पार्टी आखिर लुटेरों, ठगों और धूर्त लोगों के इर्द गिर्द क्यों सिमटती जा रही है। स्वाधीनता संग्राम सेनानियों के जो वंशज कभी पार्टी को अपना परिवार और सांसें समझते थे वह आज उन्हें पहचानने से भी इंकार क्यों कर रही है। दरअसल वे समझने तैयार ही नहीं कि उनकी कांग्रेस ने चोला बदल लिया है। कभी वह चोरी छुपे समाजविरोधी लोगों को प्रश्रय देती थी अब वह खुलेआम सत्ता के दलालों की बाहें थामे घूम रही है। इसकी वजह शायद ये कि वह अपने अंत की तस्वीर देखकर भयाक्रांत है।

    बरसों से घरों पर खाट तोड़ रहे जो कार्यकर्ता इस उम्मीद में प्रदेश कार्यालय पहुंचे कि उनके आलाकमान ने नया प्रदेश प्रतिनिधि भेजा है पर उनके हाथ निराशा ही लगी। इंजीनियर दीपक बावरिया से उन्हें उम्मीद थी कि वे पार्टी संगठन का विस्तार करके एक बार फिर बुलंद कांग्रेस खड़ी कर देंगे। जब पार्टी दफ्तर में उन्हें प्रदेश से हकाले गए नेता के बेटे के चंगुल में घिरा देखा तो वे चकित रह गए। शाम होते होते उनके धैर्य का बांध टूट गया और कमलनाथ जिंदाबाद के नारे लगाते हुए उन्होंने बावरिया को भागने पर मजबूर कर दिया। कांग्रेसियों के बीच ये बात फैल चुकी है कि बावरिया को भाजपा से सीटों का समझौता करने भेजा गया है। जबकि अब तक कमलनाथ प्रदेश भर में विजय का जाल बिछा रहे थे। बावरिया के आने से कमलनाथ के अलावा प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव, अजय सिंह, मुकेश नायक, सुरेश पचौरी जैसे वरिष्ठ नेता भी हलाकान हैं। उनके समर्थकों को वे कहां एडजस्ट करें ये नहीं समझ आ रहा है। क्योंकि बावरिया तो पहले से बनी बनाई सूची लेकर बैठे हैं। ज्यादातर कांग्रेसियों का कहना है कि आलाकमान को बरसों से कहते रहने के बावजूद प्रदेश में नेतृत्व को लेकर पार्टी ने संशय का माहौल बना रखा है। खुद राहुल गांधी चेहरा देखकर फैसले करते हैं। उन्होंने ही अरुण यादव को प्रदेश में पार्टी की कमान सौंप रखी है जबकि वे अब तक न कार्यकर्ताओं को एकजुट कर पाए हैं और न ही शीर्ष नेताओं का विश्वास पा सके हैं।

    इस बीच कांग्रेसियों ने अपनी ही पुरानी सरकार के खिलाफ बोलना शुरु कर दिया है। उनका कहना है कि जो सरकार बाकायदा श्वेत पत्र निकालकर दुनिया को ये बताती हो कि उसका दिवाला निकल चुका है उस सरकार के नेता को अब तक पार्टी ने क्यों गले में लटका रखा है। गौरतलब है कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने जनवरी 2003 में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना पर श्वेत पत्र निकाला था। जिसमें बताया गया कि भारत शासन ने 2000 से 2002 तक 1201 सड़कें बनाने की स्वीकृति प्रदान की है। इस दौरान 5853किमी. सड़कें बनाना है। इसके बावजूद तत्कालीन राज्य सरकार उन योजनाओं को साकार नहीं कर सकी क्योंकि उसने हर निविदा में ठेकेदारों से भारी धनराशि वसूलने की अड़ीबाजी की थी। कांग्रेस की सरकार जाने के बाद ठेकेदारों ने उन सभी सड़कों को धड़ाधड़ बना दिया क्योंकि नई सरकार बिजली , सड़क और पानी की सुविधाएं मुहैया कराने के नाम पर ही शासन में भेजी गई थी। जाहिर है कि कांग्रेस के मुख्यमंत्री ने प्रदेश हित और पार्टी हित को ताक पर धरकर स्वहित को सर्वोपरि माना था।

    इसी तरह जून 2003 में सरकार ने ऊर्जा के हालात पर श्वेत पत्र प्रकाशित किया और कहा कि छत्तीसगढ़ राज्य बन जाने के कारण हमारा बिजली उत्पादन प्रभावित हुआ है। हमारा वार्षिक घाटा बढ़कर 2100 करोड़ रुपए हो गया है। इसके बावजूद हमने सिंचाई पंपों को अस्थायी कनेक्शन और मुफ्त बिजली दी है। हालांकि सरकार के दावों की पोल गली चौबारों में खुल रही थी। लोग आंदोलन कर रहे थे। मध्यप्रदेश विद्युत मंडल के दफ्तरों को आग के हवाले किया जा रहा था। इस बीच सरकार ने 22 निजी बिजली उत्पादकों से अनुबंध किए। वे सभी अनुबंध फेल हो गए। जब जनता बिजली को लेकर भड़क गई तो सरकार ने कहा कि हमने मुफ्त बिजली देने का कार्यक्रम शुरु किया था इसलिए प्रदेश में बिजली की मांग बढ़ गई। बिजली चोरी भी बढ़ गई इसलिए बिजली की कमी हो गई। इसके बाद सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की बिजली इकाईयों पर निवेश शुरु कर दिया। बिरिसिंहपुर, अमरकंटक, मडी़खेड़ा जल विद्युत परियोजना, बाणसागर जल विद्युत परियोजना, पीथमपुर ,इंदिरासागर, महेश्वर जैसी परियोजनाओं का भरोसा भी जनता को दिलाया। इसके बावजूद सरकार की नाकामियों पर भड़की जनता एक भी बात सुनने तैयार नहीं थी।

    वास्तव में पीव्हीनरसिंम्हाराव की केन्द्र सरकार में वित्तमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने मुक्त बाजार व्यवस्था की नीति पर चलने की घोषणा तो कर दी थी लेकिन उनकी ही कांग्रेसी सरकारें इस दिशा में चलने को तैयार नहीं थीं। मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह अपनी पार्टी को इसके लिए तैयार करने में बुरी तरह असफल रहे। उनकी ही पार्टी ने अपनी सरकार को घेरना शुरु कर दिया । इस बीच दिग्विजय सिंह ने अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए अपने समर्थकों को आगे बढ़ाने के लिए पार्टी के पुराने नेताओं को पीछे धकेलना शुरु कर दिया। उन पर झूठे मुकदमे बनाए गए। उन्हें तरह तरह के लांछन लगाकर बदनाम किया गया। पार्टी की जवाबदारियों से हटाया गया। नतीजतन कांग्रेस पार्टी के भीतर ही विद्रोह फैल गया। आज हाल ये हैं कि जैसे ही लोगों को मालूम पड़ा कि दीपक बावरिया दिग्विजय के इशारे पर काम कर रहे हैं और एक बार फिर वही दमन चक्र शुरु करने की तैयारी कर रहे हैं तो पार्टी के कार्यकर्ता भड़क गए। उन्होंने पार्टी के प्रदेश कार्यालय में ही बावरिया का ढोल बजा दिया।

    जबकि भाजपा की नई सरकार ने आते ही बिजली सुधारों पर तेजी के अमल करना शुरु कर दिया। नतीजतन तेरह सालों बाद आज बिजली की सप्लाई 125 फीसदी बढ़ गईहै। 2003 में जो बिजली सप्लाई 2899 मिलियन यूनिट थी वो साल भर के भीतर 30625 मिलियन यूनिट हो गई। आज प्रदेश में 64374 मिलियन यूनिट बिजली सप्लाई हो रही है। प्रदेश बिजली के मामले में आत्मनिर्भर है और वह गाहे बगाहे अपनी अतिरिक्त बिजली अन्य राज्यों को भी बेच लेता है। इसकी वजह ये है कि प्रदेश में बिजली का उत्पादन 2003 की तुलना में 243 फीसदी बढ़ गया है। मांग और आपूर्ति के बीच 129 फीसदी का इजाफा हुआ है। ट्रांसमिशन क्षमता में तेरह सालों में 236 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। अति उच्च दाब लाईनों भी बिछाई गईं और ये लगभग 82 फीसदी बढ़ गईं हैं। ये बिजली सप्लाई सुचारू रहे इसके लिए अति उच्च दाब केन्द्र 162 से बढ़कर 331 हो गए हैं। ट्रांसफार्मरों की उपलब्धता भी बढ़ी है, तेरह सालों में ये क्षमता 174 फीसदी ज्यादा हो गई है। बिजली के क्षेत्र में आर्थिक संकट दूर करने के लिए जो प्रयास किए गए उनसे पिछले पांच सालों में नकद राजस्व बढ़कर 17838 करोड़ रुपए हो गया है। इस तरह एक बीमारू राज्य को काफी प्रयासों के बावजूद विकसित राज्य बनाया गया है। इसके बावजूद कांग्रेस आलाकमान जनता के अपराधी और असफल नेता को सेवामुक्त करने में हिचक रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह ये बताई जा रही है कि सत्ता में रहते हुए उसने हाईकमान को मुद्रा सप्लाई में कमी नहीं की थी। भले ही प्रदेश के लोग हलाकान थे लेकिन आलाकमान मध्यप्रदेश के चंदे पर गुलछर्रे उड़ा रहा था।

    यही नहीं पंचायती राज का ढिंढोरा पीट रही तत्कालीन दिग्गी सरकार ने प्रदेश को कंगाली के दलदल में धकेल दिया था। प्रदेश की आर्थिक स्थिति का आकलन करने के लिए फरवरी 2004 में जो श्वेत पत्र निकाला गया उसमें कहा गया कि पूर्ववर्ती सरकार ने जो ऋण लिया उसका उपयोग विकास कार्यों में नहीं किया। बल्कि उसे गैर विकास कार्यों में ही खर्च कर दिया।शुद्ध लोक ऋण 7 हजार करोड़ से बढ़कर 31 हजार करोड़ तक पहुंच गया। हर व्यक्ति पर कर्ज बढ़कर 5183 हजार रुपए हो गया। सरकार ने 1999-2000 में शुद्ध ऋण का मात्र 24 फीसदी ही पूंजीगत विकास में खर्च किया गया। जबकि शेष राशि राजस्व व्यय के नाम पर उड़ा दी।सरकार को अपने कर्ज पर आय का 23 फीसदी ब्याज देना पड़ रहा था। हालात ये हो गए कि वित्तीय संस्थानों ने भी मध्यप्रदेश को कर्ज देने से मना कर दिया। कुशासन और कुप्रबंधन की इससे बडी़ मिसाल शायद ही कहीं देखने मिले। इसके बावजूद कांग्रेस आलाकमान अपनी राजनीतिक मौत सन्निकट देखकर प्रदेश में कंजर संस्कृति अपनाने पर उतर आया है।

    तत्कालीन लोकायुक्त जस्टिस फैजानुद्दीन ने कांग्रेस की सरकार के मुख्यमंत्री और मंत्रियों को अलीबाबा और चालीस चोर की उपमा दी थी। उनके कार्यकाल में लोकायुक्त संगठन ने कड़ी सिफारिशें भी की थीं जिन्हें तत्कालीन सरकार ने कचरे के डिब्बे में डाल दिया था। अब अपने विधायक बेटे को पार्टी पर थोपने के अभियान में उन्होंने नई नवेली बहू को भी शरीक कर लिया है। जाहिर है कि जिस पीढ़ी के युवाओं ने दिग्गी की भ्रष्ट सरकार के कारनामे नहीं देखे हैं वे इस यात्रा से कुछ अमृत निकलने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। इसके बावजूद उन्हें अहसास नहीं कि उनकी ही पार्टी के दिग्गज ये ख्याली पुलाव कभी साकार नहीं होने देंगे।

  • अब समझौता शुल्क से निपट जाएंगे श्रमिकों के प्रकरण

    अब समझौता शुल्क से निपट जाएंगे श्रमिकों के प्रकरण

    भोपाल 12 अक्टूबर(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)

    प्रदेश में ईज ऑफ डूईंग बिजनेस के उद्देश्य से श्रम कानूनों में प्रक्रियाओं को श्रमिक एवं नियोजक के हित में सरल बनाया गया है। प्रावधानों को अधिक युक्‍तियुक्‍त किया गया है। विभागीय कार्यप्रणाली में पारदर्शिता के साथ सूचना प्रौद्योगिकी का व्‍यापक उपयोग करते हुए वर्ष 2014 से अब तक अनेक महत्वपूर्ण कदम इस संबंध में उठाये गये हैं।

    वॉलन्‍टरी कम्‍प्‍लायंस स्‍कीम

    अक्‍टूबर 2014 में प्रारंभ की गयी वॉलन्‍टरी कम्‍प्‍लायंस स्‍कीम विश्‍व बैंक, केन्‍द्र सरकार और अन्‍य राज्‍यों द्वारा सराही गयी है। स्कीम में 16 श्रम कानूनों में 61 रजिस्‍टर के स्‍थान पर एक रजिस्‍टर रखने तथा कार्यालयों में 13 रिटर्न की जगह मात्र 2 वार्षिक रिटर्न का प्रावधान किया गया है। पाँच वर्षों में संस्‍थान के अधिकतम एक बार निरीक्षण का प्रावधान किया गया है।

    श्रम कानूनों में संशोधन

    राज्‍य के 3 और केन्‍द्र के 15 श्रम कानूनों में संशोधन कर निवेशक एवं श्रमिक हितैषी बनाया गया है। राज्‍य के लाखों श्रमिकों के हित में सेवानिवृत्‍ति की आयु 58 से बढाकर 60 वर्ष की गयी। मध्यप्रदेश औद्योगिक नियोजन (स्थायी आज्ञा) अधिनियम के लागू होने संबंधी श्रमिक संख्‍या सीमा 20 से बढ़ाकर 50 की गयी तथा माइक्रो इण्‍डस्‍ट्रीज को इससे छूट दी गयी है। दस से कम श्रमिक संख्‍या वाले संस्‍थानों में निरीक्षण के लिए श्रम आयुक्‍त की अनुमति अनिवार्य की गयी है।

    मध्‍यप्रदेश श्रम कल्‍याण निधि अधिनियम से माइक्रो इण्‍डस्‍ट्रीज को छूट दी गयी है। श्रमिकों के अधिसमय कार्य के घंटों को किसी तिमाही में श्रमिकों की सहमति से 75 से बढ़ाकर 125 किये जाने का प्रावधान किया गया है। रात्रि पाली में महिलाओं की सुरक्षा को सुनिश्चित करते हुए रात्रि 8.00 बजे से सुबह 6.00 बजे तक कार्य की अनुमति का प्रावधान किया गया है। श्रमिकों को पिछले वर्ष में 240 दिन के स्थान पर 180 दिन कार्य करने पर उसी केलेण्डर वर्ष में सवैतनिक अवकाश की सुविधा उपलब्‍ध करायी गयी है। श्रमिकों की छंटनी की स्थिति में एक माह की सूचना के प्रावधान के स्थान पर तीन माह की सूचना के साथ न्यूनतम 3 माह के वेतन के भुगतान का प्रावधान किया गया है। किसी संस्थान में ले-ऑफ, छंटनी या बंदीकरण के लिए पूर्व अनुमति की आवश्यकता 100 श्रमिक वाले संस्थानों के स्थान पर 300 या अधिक श्रमिक वाले संस्थानों के लिए की गयी है। सेवा समाप्‍ति संबंधी औद्योगिक विवाद प्रस्‍तुत करने की समय-सीमा तीन वर्ष निर्धारित की गयी है।

    निवेशकों के हित में मध्‍यप्रदेश दुकान एवं स्‍थापना अधिनियम, ठेका श्रम अधिनियम, मोटर यातायात श्रमिक अधिनियम, भवन संन्निर्माण कर्मकार अधिनियम और अन्‍तर्राज्‍यीय प्रवासी कर्मकार अधिनियम प्रावधान किये गये हैं कि यदि अधिनियम में पंजीयन या लायसेंस व उसके नवीनीकरण आवेदन को 30 दिन में स्‍वीकृत नहीं किया जाता है तो इसे स्‍वत: पंजीकृत (डीम्‍ड) माना जाएगा। मध्‍यप्रदेश दुकान एवं स्‍थापना अधिनियम, मध्‍यप्रदेश औद्योगिक नियोजन (स्‍थाई आदेश) अधिनियम, समान पारिश्रमिक अधिनियम, श्रम विधि (विवरणी देने और रजिस्टर रखने से कतिपय स्थापनाओं को छूट) अधिनियम, न्यूनतम वेतन अधिनियम, वेतन भुगतान अधिनियम, विक्रय संर्वधन कर्मचारी (सेवा की शर्ते) अधिनियम में उल्‍लंघन के प्रकरण न्‍यायालय ले जाने के स्‍थान पर कार्यालय में समझौता शुल्‍क देकर निराकृत किये जाने का प्रावधान किया गया।